Sunday, July 05, 2026

आत्म का शोक गीत ‘पर्सेपोलिस’

मशहूर लेखिका और फिल्मकार मार्जान सतरापी (1969-2026) को उनकी आत्मकथात्मक-चित्रात्मक-संस्मरणात्मक कृति पर्सेपोलिससे दुनिया भर में जो मकबूलियत हासिल हुई वह विरले को नसीब होता है. ईरान में जन्मी और फ्रांस को कर्मभूमि बनाने वाली सतरापी की यह कृति वर्ष 2000 में फ्रांस में प्रकाशित हुई और फिर बाद के वर्षों में अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में अनुदित हुई.

संपूर्ण कृति के अंग्रेजी अनुवाद के बीसवें संस्करण की भूमिका (2023) में उन्होंने लिखा था कि किताब के प्रकाशन के समय ऐसा लग रहा था कि मानवता ने किसी तरह अपनी गलतियों से सबक ले ली है. इक्कीसवीं सदी में हम आखिरकार इस बात को समझ गए हैं कि पृथ्वी पर सबका समान अधिकार है और हम सब एक ही जाति के हैं—मानव जातिऔर यह किताब पुरानी पड़ जाएगी.’  पर ऐसा हुआ नहीं.

असल में यह किताब जितना स्मृति लेख है उतना ही हमारे समय का दस्तावेज भी. राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आलोचना का जो स्वर इस कृति में दिखाई देता है वह इसे समय-काल और देश की सीमा से परे ले जाता है. मूल स्वर में यह किताब युद्ध विरोधी है. इन अर्थों में जितना यह सतरापी की निजी डायरी प्रतीत होता है उतना ही ईरान की इस्लामी क्रांति की पृष्ठभूमि में उम्र की वय संधि पर खड़ी मार्जी के छीजते बचपन का शोकगीत भी है.

चूंकि मैंने इसे अंग्रेजी अनुवाद में पढ़ा है इसलिए मूल फ्रेंच में इसका आस्वाद कैसा है कह नहीं सकता, पर अंग्रेजी में विट के मार्फत, सफेद-स्याह रेखाचित्रों से सजाई गई यह कृति समकालीन ईरान के राजनीतिक इतिहास को पाठकों के सामने खोल कर रख देती है. इस कृति के समकक्ष हम पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित आर्ट स्पीगलमैन की होलोकॉस्ट के वृत्तांत को रचती चित्रात्मक कृति माउस को रख सकते हैं जिससे सतरापी प्रभावित रही.

पर्सेपोलिस इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में व्याप्त अधिनायकवादी सत्ता की निर्मम आलोचना करती है. किताब की शुरुआती में हिजाब पहने एक लड़की है और शुरुआती पंक्ति है: ‘यह मैं हूँ 10 वर्ष की, साल 1980.’  फिर ईरान-इराक युद्ध (1980-88) शुरु होता है. चौदह वर्ष की मार्जी घर-परिवार छोड़ कर आगे की पढ़ाई करने वियना चली जाती है जहाँ पहचान का संकट उस पर हावी है. अठारह वर्ष की मार्जी वापस अपने वतन लौटती है, लेकिन यूरोप जाने के लिए वह अभिशप्त है. इन कहानियों को चार खंडों में लिखा गया.

आज विश्व युद्ध की विभीषिका से जूझ रहा है. घर और स्वतंत्रता की तलाश भूमंडलीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में बढ़ गई है. यही वजह है कि यह कृति आज भी प्रासंगिक बनी हुई है.  पश्चिमी देशों में नजर में ईरान की पहचान एक धार्मिक-कट्टरपंथी राजनीतिक सत्ता तक सीमित है जबकि ईरानी सभ्यता-संस्कृति की विरासत पर्सेपोलिस में है. किताब के दूसरे भाग में वियना प्रवास के दौरान मार्जी एक जगह आहत होकर, गुस्से में कहती है: मैं ईरानी हूँ और मुझे इस बात का गर्व है.

एक स्त्री के लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हैं इसे सतरापी ने ईरान और यूरोप के अपने निजी भोगे हुए अनुभवों के सहारे बिना किसी लाग-लपेट के उकेरा है जो इसे मुखर और मार्मिक बनाता है.  

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