Sunday, May 17, 2026

‘क्राउड सोर्सिंग’ के तहत बनी पहली फिल्म मंथन

 


समांतर सिनेमा के दौर के फिल्मकारों से श्याम बेनेगल की फिल्में काफी अलग रही. इन फिल्मों की विशिष्ट पहचान है. मुख्यधारा से अलग, समीक्षकों ने उनकी फिल्मों को मध्यमार्गी कहा. उनकी फिल्में आर्थिक रूप से भी सफल रही. पचास साल पहले रिलीज हुई फिल्म मंथनइसका श्रेष्ठ उदाहरण है. यह फिल्म आज भी प्रासंगिक बनी हुई है, जिसमें भारतीय ग्रामीण समाज में जातिगत विभेद उभर कर सामने आता है. साथ ही सत्तर के दशक के भारतीय समाज की आलोचना भी दिखाई देती है कि किस तरह गाँव की सामाजिक संरचना को बाहरीलोग अपने नजरिए से देखते हैं और बदलाव लाने की कोशिश करते है.

बहरहाल, एक बातचीत में श्याम बेनेगल ने मुझे कहा था: हर फिल्म एक सीखने की प्रक्रिया होती है, फिल्म बनाना अपने आसपास, अपने लोगों, अपने देश को बेहतर समझने की प्रक्रिया है, यह खुद को शिक्षित करने का एक तरीका है.’ यह फिल्म दिखाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और परिवर्तन का औजार बन सकता है.

समांतर सिनेमा के फिल्मकार हमेशा फिल्म बनाने कि लिए वित्तीय संकट से जूझते रहे. उन्हें वित्त निगम से काफी सहायता मिला रहा पर श्याम बेनेगल ने फिल्म बनाने के लिए फिल्म वित्त निगम से ऋण नहीं लिया था. उनकी पहली फिल्म 'अंकुर (1974)' और दूसरी फिल्म 'निशांत (1975)' को ‘ब्लेज एडवरटाइजिंग’ ने वित्तीय सहायता दी थी, जबकि तीसरी फिल्म 'मंथन (1976)' गुजरात के दुग्ध सहकारी संस्था के सदस्यों की सहायता से बनी. यह तीनों ही फिल्में व्यावसायिक रूप ले सफल रही. व्यावसायिक रूप से बेनेगल की फिल्मों की तुलना मलयालम फिल्म के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन से की जा सकती है, जिनकी अधिकांश फिल्में ‘बाक्स ऑफिस’ पर भी सफल रही.

मंथन फिल्म का निर्माण गुजरात के पांच लाख डेयरी किसानों ने किया था. एक तरह से क्राउड सोर्सिंग के तहत बनी हिंदुस्तान की यह पहली फिल्म है. यह फिल्म डेयरी सहकारी आंदोलन के इर्द-गिर्द रची गई है. भारत में दुग्ध क्रांति के जनक रहे डॉक्टर वर्गीज कुरियन इस फिल्म निर्माण के पीछे थे.

इस फिल्म में गिरीश कर्नाड, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे, कुलभूषण खरबंदा, अनंत नाग जैसे कलाकारों को एक साथ परदे पर देखना सुखद है. इन कलाकारों की अदाकारी और गोविंद निहलानी के कुशल फिल्मांकन की वजह से करीब पचास साल बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती. असल में बेनेगल की फिल्में पीढ़ियों से संवाद करती है, नए अर्थ के साथ उद्घाटित होती है.

वर्ष  1977 में फिल्म को बेस्ट फिल्म और बेस्ट स्क्रीनप्ले (विजय तेंदुलकर) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस फिल्म के नेगेटिव क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिसे फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशनने निर्देशक के साथ मिल कर संरक्षित किया और फिर 2024 में कान फिल्म समारोह में क्लासिक खंड में इसका प्रदर्शन किया गया. बाद में इसे देश के चुनिंदा सिनेमाघरों में भी रिलीज किया गया था,

बेनेगल की फिल्मों में वस्तुनिष्ठता पर काफी जोर रहता था, जो इस फिल्म में भी दिखाई देती है. यहाँ कोरी भावुकता नहीं है, कोई काल्पनिकता नहीं है. सादगी के साथ अपने समय और समाज के साथ जुड़ाव फिल्म की विशेषता है.

Thursday, May 07, 2026

मलयालम सिनेमा का नया स्वर: टिकट टू करेला

 


बीस साल पहले दिल्ली में ओसियान फिल्म समारोह के दौरान, सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में हिंदी के आलोचक और मेरे शिक्षक (गाइड) वीर भारत तलवार ने लगभग धकेलते हुए मुझे कहा कि देखो, अडूर गोपालकृष्णन वहाँ बैठे हैं, जाओ बात करो!

मैं उनके पास जाकर बैठ गया. लौटा तो मैंने सर से कहा कि उनसे एफटीआईआई, ऋत्विक घटक की बातें की और क्या बातें करता, उनकी फिल्में ही नहीं देखी है. सर ने कहा, ठीक कहते हो बिना फिल्म देखे क्या बात करते. खैर, बाद में मैंने उनकी फिल्में देखी और लंबी बातचीत की जो प्रकाशित भी हुई.

दो दशक पहले तक बिना सब-टाइटल के हिंदी के इतर फिल्में देखना बहुत मुश्किल था. फिल्म-समारोह में कभी-कभार फिल्में देखने को मिल जाती थी. साथ ही भारतीय सिने जगत में बॉलीवुड इतना हावी रहा है कि क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की चर्चा भी नहीं होती. बांग्ला फिल्में और खास कर सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक या मृणाल सेन जैसे फिल्मकार अपवाद रहे हैं.

पिछले दिनों द हिंदूअखबार से जुड़े पत्रकार एस आर प्रवीण की किताब टिकट टू केरला (द स्टोरी ऑफ मलयालम सिनेमा) प्रकाशित हुई जो केरल से बाहर रहने वाले, अन्य भाषाई दर्शकों को संबोधित है. यह किताब पाठकों को मलयालम सिनेमा के संवृद्ध इतिहास, परंपरा और वर्तमान फिल्मों से परिचय कराती है.

कोरोना महामारी के दौरान, ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से मलयालम में रिलीज हुई 'जलीकट्टू ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, ‘जोजी’, ‘आरकारियम’, ‘मालिक’ आदि मलयालम फिल्मों की खूब चर्चा हुई. लॉकडाउन के बीच मध्यवर्गीय दर्शकों ने इन फिल्मों को हाथों-हाथ लिया. ‘जोजी’ और ‘आरकारियम’ फिल्म में तो ‘लॉकडाउन’ और ‘मास्क’ के रूपक का कथ्य में खूबसूरती से निरूपण भी हुआ है.  प्रवीण इन फिल्मों को न्यू वेबकहते हैं. इसी क्रम में हाल के वर्षों में काथल, आतम, उलोझक्कू जैसी फिल्मों ने खूब सुर्खियां बटोरी.

पिछले एक दशक में बनी मलयालम फिल्मों को देखकर हम कह सकते हैं कि मलयालम सिनेमा में यह एक नए युग की शुरुआत है जहाँ पॉपुलर और समांतर की रेखा मिट रही है. कम लागत से बनने वाली इन फिल्मों में नई विषय-वस्तु  और सहज अभिनय पर जोर है. यही कारण है कि फहाद फासिल जैसे कुशल अभिनेता (कुंबलंगी नाइट्स, जोजी, मालिक) की हिंदी दर्शकों के बीच भी खूब प्रशंसा हुई.

सत्तर-अस्सी के दशक में समांतर सिनेमा की धारा को मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, के जी जार्ज, जी अरविंदन, शाजी करुण ने संवृद्ध किया था. उनकी फिल्मों ने मलयालम सिनेमा को देश-दुनिया में स्थापित किया, पर उसके बाद ऐसा लगा कि कथ्य और शैली में मलयालम सिनेमा पिछड़ गई.

प्रवीण लिखते हैं कि सदी के पहले दशक के आखिरी वर्षों में मलयालम मुख्यधारा की फिल्मों में बदलाव की शुरुआत होती है. दर्शकों को सिनेमाघरों में कुछ भी सार्थक देखने को नहीं मिल रहा था और वे थिएटर से मुंह मोड़ रहे थे. लेखक अंजलि मेनन की चर्चित फिल्म 'बैंगलोर डेज' (2008) और अलफोंस पुथरेन की प्रेमम (2015) फिल्म की खास तौर पर चर्चा करते हैं. सांई पल्लवी ने प्रेमम फिल्म से सिने जगत में प्रवेश किया.

हाल के वर्षों में रिलीज हुई मलयालम फिल्में केरल के समाज में रची-बसी है. इन फिल्मों में जाति, लिंग का सवाल और राजनीतिक स्वर भी मुखर रूप से व्यक्त हुआ है, जो बॉलीवुड में इन दिनों मुश्किल से सुनाई पड़ता है.

जियो बेबी की ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ जब रिलीज हुई तब हिंदी क्षेत्र में सोशल मीडिया पर इस फिल्म को लेकर काफी बहस हुई थी. ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ की शुरुआत ‘द ग्रेट इंडियन ड्रामा’ यानी शादी से होती है. इस फिल्म के केंद्र में एक शादी-शुदा जोड़ा है. घर-परिवार के सदस्यों के रिश्ते, धर्मसत्ता, पितृसत्ता और खासकर स्त्रियों के साथ मध्यवर्गीय परिवार में जो लैंगिक भेदभाव है उसे रसोईघर के माध्यम से खूबसूरती से निरूपित किया गया है. फिल्म में अपनी इच्छाओं, डांस के प्रति अपने लगाव को दबा कर अदाकार निमिषा सजयन सुबह-दोपहर-शाम घर के पुरुषों की ‘क्षुधा’ शांत करने की फिक्र में रहती है, पर उसकी फिक्र किसे है! पुरुष भोजनभट्ट हैं. अखबार पढ़ने में, योग करने में मशगूल हैं, वहीं स्त्री नमक-तेल-हल्दी की चिंता में आकंठ डूबी हुई है.

इस फिल्म को देखते हुए मुझे हिंदी के कवि रघुवीर सहाय की कविता ‘पढ़िए गीता’ की याद आती रही: पढ़िए गीता/ बनिए सीता/ फिर इन सब में लगा पलीता/किसी मूर्ख की हो परिणीता/निज घर-बार बसाइए/ होंय कँटीली/आँखें गीली/लकड़ी सीली, तबियत ढीली/घर की सबसे बड़ी पतीली/ भरकर भात पसाइए. हालांकि फिल्म में निमिषा सजयन ने जिस किरदार को निभाया है वह न गीता पढ़ती है, न सीता ही बनती है. एक विद्रोही चेतना से वह लैस है. यह चेतना फिल्म के आखिर में दिखाई पड़ती है जिसे एक ‘डांस स्वीकेंस’ के माध्यम से निर्देशक ने फिल्माया है. एक तरह से यह फिल्म भारतीय समाज में व्याप्त सामंती प्रवृत्तियों का नकार है. यह फिल्म भले ही मलयाली समाज में रची-बसी हो पर अपनी व्याप्ति में अखिल भारतीय है और यही वजह है कि निर्देशक ने पात्रों को कोई नाम नहीं दिया है.

फिल्म के रिलीज होने के बाद मैंने जियो बेबी से बातचीत में पूछा था कि द ग्रेट इंडियन किचन’ बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया? उन्होंने कहा था असल में शादी के बाद मेरे मन में अपनी पत्नी के साथ किचन में काम करने ख्याल आया. तब मैंने अपनी माँ, बहन और बीवी के बारे में सोचा. मेरे लिए किचन एक जेल की तरह रहा. फिर मुझे अपनी स्वतंत्रता का अहसास हुआ. साथ ही मेरे मन में सवाल उठे कि हम तो पुरुष हैं, लेकिन स्त्रियों की आजादी का क्या? मैंने निश्चय किया कि किचन जो स्त्रियों के लिए एक बेड़ी है उसे लेकर मुझे फिल्म बनानी है.

हालिया मलयालम न्यू वेब एक परंपरा का विकास है, जिसके जड़े गहरी है. उल्लेखनीय है कि के जी जार्ज की ‘अदामिंते वारियेल्लू’ का प्रभाव द ग्रेट इंडियन किचन पर दिखाई देता है. लेखक ने 1970 के दशक के न्यू वेब से जुड़े प्रमुख फिल्मकारों अडूर गोपालकृष्णन, जी अरविंदन, जॉन अब्राहम, शाजी करुण का उल्लेख किया है. इस क्रम में अडूर के साथ एक लंबी बातचीत भी किताब में शामिल है.

उल्लेखनीय है कि अडूर की फिल्म स्वयंवरम’ (1972) से मलयालम सिनेमा में समांतर सिनेमा की धारा की शुरुआत मानी जाती है. इस फिल्म के बारे में टिप्पणी करते हुए फिल्म समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता (सीइंग इज विलिविंग: 248)  ने लिखा है- “स्वंयवरम में जो नवाचार के दर्शन हुए उसने केरला और उसके सिनेमा जगत को चकित कर दिया था.” इस फिल्म में मनोरंजन प्रधान व्यावसायिक सिनेमा के फार्मूले को धता बताते हुए कोई नाच-गाना नहीं था. पूरी फिल्म को वास्तविक लोकेशन पर ही शूट किया गया था. यह फिल्म दो युवा प्रेमी विश्वनाथ और सीता के माध्यम से समाज और व्यक्ति के बीच संघर्ष और स्वाधीनता के सवाल को चित्रित करती है. इसे फिल्म को ऑपरेटिव, चित्रलेखा ने प्रोड्यूस किया था. किताब में प्रवीण ने चित्रलेखा फिल्म सोसाइटी (जिसके निर्माण में एफटीआईआई से निकले युवा फिल्मकारों का भूमिका रही) के माध्यम से केरल में सिनेमाई संस्कृति के निर्माण को अलग से रेखांकित किया है. लेखक ने अडूर के हवाले से लिखा है कि हमने तीन सूत्री योजना बनाई जिसके तहत केरल में फिल्म सोसाइटी आंदोलन  को शुरू करने, सिनेमा पर उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित करने और गुणवत्ता से संपन्न फिल्मों का निर्माण शामिल था.

यहां पर यह नोट करना उचित होगा कि अडूर ने अपने पूरे फिल्मी करियर के दौरान कमर्शियल फिल्मों के दायरे से बाहर रहे. सिनेमा निर्माण के व्यावसायिक दायरे से बाहर रहने के कारण उन्होंने पूरे करियर में महज बारह फिल्में ही निर्देशित किया है. गौरतलब है कि अडूर विषय-वस्तु के लिहाज से किसी फिल्म में खुद को दोहराया नहीं. उनकी फिल्मी यात्रा को देखने पर यह स्पष्ट है. जहाँ ‘एलिप्पथाएम’ में आजादी के बाद के सामंती समाज और घुटन का चित्रण है वहीं ‘मुखामुखम’ में एक मार्क्सवादी राजनीतिक कार्यकर्ता फिल्म के केंद्र में है. ‘अनंतरम’ में एक फिल्मकार की रचना प्रक्रिया से हम रू-ब-रू होते हैं, जहां यथार्थ और कल्पना में सहज आवाजाही है. यहाँ रचनाकार के सामने शाश्वत सवाल है कि हम रचें कैसे? वहीं ‘मतिलुकल’ में ‘स्वयंवरम’ की तरह स्वतंत्रता एवँ मुक्ति का प्रश्न प्रमुखता से उभरा है, हालांकि फिल्म निर्माण की दृष्टि से अनंतरम के करीब है. ‘कथापुरुषन’ में आत्मकथात्मक स्वर है, इस फिल्म में सामंती हदबंदियों को तोड़ा गया है. फिल्म की शूटिंग भी उन्होंने अपने पुश्तैनी घर में ही की. अडूर का सिनेमा आजादी के बाद परंपरा और आधुनिकता के कशमकश को, केरल की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को, बदलती हुई राजनीति के परिप्रेक्ष्य में निरूपित करता है. यहां विभिन्न स्तरों पर विस्थापन और अस्मिता की खोज मौजूद है.

इस किताब को प्रवीण ने विभिन्न निर्देशकों, सिनेमेटोग्राफरों और सिने जगत से जुड़े अन्य लेखक-कलाकारों से बातचीत के बाद तैयार की है. किताब के बीच-बीच में लंबे इंटरव्यू दिए गए हैं जो कई बार पाठकों के लिए पढ़ने के प्रवाह के दौरान बाधा बन कर आता है. साथ ही किताब में रेफरेंस लिस्टका न होना खटकता है.

चूंकि किताब का लेखक एक पत्रकार है इस लिहाज से इसमें हाल में मलयालम सिनेमा जगत में स्त्री कलाकारों के शोषण, भेदभाव पर जो बहस हुई उस पर टिपप्णी भी शामिल है. वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव (डब्लूसीसी) के दखल से बनी जस्टिस हेमा कमिटी के रिपोर्ट की विस्तार से चर्चा है.

फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के स्नातक, अन्नायूम रसूलम (2013) फिल्म से चर्चा में आए राजीव रवि (गैंग्स ऑफ वासेपुर के सिनेमैटोग्राफर) पुणे के दिनों को याद करते हुए एक जगह कहते हैं कि ऋत्विक घटक की मेघे ढाका तारा के आखिरी हिस्से को वे खूब देखते थे. रोने के लिए वे इसे देखा करते थे! प्रसंगवश, अडूर भी बातचीत में मेघे ढाका तारा को खूब शिद्दत से याद करते हैं. फिल्म संस्थान में घटक उनके गुरु रहे. मलयालम सिनेमा के प्रगतिशील इतिहास के निर्माण में फिल्म संस्थान पुणे की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

मलयालम सिनेमा की शुरुआत वर्ष 1930 में बनी विगाथाकुमारन फिल्म से होती है जिसे जे सी डेनियल ने निर्देशित किया था. करीब सौ साल के इतिहास की यात्रा को लेखक ने इस किताब में समेटा है. शैली कहानी कहने की है. पर यहां विश्लेषण और आलोचनात्मक दृष्टि का अभाव है.

अंत में, मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल को पिछले दिनों सिनेमा में योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, वहीं ममूटी को पद्म भूषण दिया गया. जब मैंने जियो बेबी से मोहन लाल के अवदान के बार में पूछा तब उनका कहना था, ‘यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मैं मोहनलाल के अभिनय करियर के दौरान जीवित हूँ.  उनके कुछ अभिनय, उनकी हंसी, और सिनेमा से बाहर की गई कुछ बातें—इन सबने मुझे एक निर्देशक और इंसान के रूप में गहराई से प्रभावित किया है. मोहनलाल एक चमत्कार हैं—ऐसा चमत्कार जो कभी-कभी ही होता है.’ वहीं ममूटी के अभिनय की विशेषता यह है कि फिल्मी दुनिया के दोनों पाटों-देसी और मार्गी, उन्होंने एक साथ साधा है. एक तरफ व्यावसायिक सिनेमा में स्टार की हैसियत से उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, वहीं दूसरी तरफ सधे, भाव-पूर्ण अभिनय से उन्होंने कला फिल्मों में अपनी काबिलियत को साबित किया. ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘महायानम’ और ‘किंग’ जैसी फिल्मों के साथ ‘मेला’, ‘यवनिका’, ‘अनंतरम’, ‘विधेयन’ और ‘मतिलुकल’ जैसी कलात्मक फिल्में भी उनके खाते में है. यहां नोट करना उचित होगा कि प्रयोग करने, नए निर्देशकों के साथ काम करने में उन्हें गुरेज नहीं है. किताब में संक्षेप में मलयालम सिनेमा के इन प्रसिद्ध कलाकारों के बार में भी जानकारी दी गई है.

(समालोचन के लिए)