पिछली सदी के 70 के दशक में समांतर सिनेमा आंदोलन थिएटर से आए अदाकारों के लिए मुफीद रहा. यह दौर 80 के दशक तक चला. मराठी रंगमंच के अभिनेता नाना पाटेकर, नसीरुद्दीन शाह व ओम पुरी के हमउम्र थे. हालांकि हिंदी सिनेमा में गमन (1978) फिल्म से उन्होंने कदम रखा पर उन्हें प्रसिद्धि 90 के दशक में रिलीज हुई परिंदा, प्रहार, अग्निशाक्षी और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों से मिली.
एक पत्रकार के नोट्स
Sunday, October 11, 2026
नटसम्राट- नाना पाटेकर
पिछली सदी के 70 के दशक में समांतर सिनेमा आंदोलन थिएटर से आए अदाकारों के लिए मुफीद रहा. यह दौर 80 के दशक तक चला. मराठी रंगमंच के अभिनेता नाना पाटेकर, नसीरुद्दीन शाह व ओम पुरी के हमउम्र थे. हालांकि हिंदी सिनेमा में गमन (1978) फिल्म से उन्होंने कदम रखा पर उन्हें प्रसिद्धि 90 के दशक में रिलीज हुई परिंदा, प्रहार, अग्निशाक्षी और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों से मिली.
Saturday, October 03, 2026
फिल्म-27 डाउन की याद, जिसकी चर्चा अक्सर छूट जाती है
समांतर सिनेमा की हिंदी में जब भी बात होती है, मणि कौल, कुमार शहानी की फिल्मों का नाम ऊपर आता है. उनकी फिल्में मसलन, उसकी रोटी, माया दर्पण साहित्यिक कृतियों पर आधारित रही. हिंदी उपन्यास, अठारह सूरज के पौधे (रमेश बक्षी), पर आधारित और राष्ट्रीय पुस्कार से सम्मानित एक फिल्म ‘27 डाउन’ की चर्चा अक्सर छूट जाती है. इस फिल्म के निर्देशक अवतार कौल थे, जिनका आज (27 सितंबर) जन्मदिन है. महज 35 वर्ष की आयु में डूबने से उनकी मौत हो गई और उनके नाम बतौर निर्देशक यही एक मुकम्मल फिल्म है.
हाल ही में प्रकाशित किताब ‘अवतार कौल: द (इन) कंप्लीट स्टोरी’ में विनोद कौल ने नोट किया है कि, “यह सोचकर एक अजीब-सी कसक होती है कि यह फिल्म इतनी सारी दूसरी फिल्मों की शुरुआत थी, और अवतार की यात्रा का अंत भी. वह हमें और कितना कुछ दे सकते थे.” मणि कौल इस फिल्म के बड़े प्रशंसक थे. मणि कौल और शहानी की तरह ही अवतार ने सिनेमा का विधिवत प्रशिक्षण लिया था. वे 60 के दशक में न्यूयॉर्क के सिटी यूनिवर्सिटी में फिल्म निर्माण के छात्र थे.
आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में इसे रेखांकित किया जाता रहा है? जहाँ ‘उसकी रोटी’ या ‘माया दर्पण’ आम दर्शकों के लिए बोधगम्य नहीं रही, वहीं 27 डाउन आसानी से दर्शकों के भाव बोध का हिस्सा बन जाती है.
आजाद भारत में जवान हो रही पीढ़ी के सपने, कश्मकश, स्त्री-पुरुष संबंधो, सामाजिक दबाब और वैयक्तिक इच्छा के द्वंद को रेल के रूपक के माध्यम से निर्देशक ने बेहद कुशलता औऱ संवेदनशीलता के साथ श्वेत-श्याम छवियों में उकेरा है. ट्रेन कंडक्टर संजय (एम के रैना) और एलआईसी में नौकरी करने वाली शालिनी (राखी) इस फिल्म के मुख्य पात्र है.
प्रसंगवश, एनएसडी से प्रशिक्षित एम के रैना की यह पहली फिल्म थी. जहाँ रैना ने एक ऐसा किरदार को निभाया है जो निर्णय लेने में अक्षम है, घुटता रहता है और दो पाटों के बीच पीसता रहता है. संजय एक ऐसा नायक है कि जिसके जीवन में कहीं ठौर नहीं है और वह रेल के डिब्बे की तरह यात्रा में हमेशा भटकने के लिए अभिशप्त है. वहीं शालिनी का किरदार उस दौर में स्त्री पात्रों से साफ अलग है. एक काम-काजी स्त्री के चरित्र को राखी ने बखूबी निभाया है. संजय के व्यक्तिव पर उसके रौबदार पिता (ओम शिव पुरी) की छाया हमेशा हावी रहती है.
इस फिल्म के रेल के कुछ दृश्य हमेशा के लिए मन में रच-बस जाते हैं. चलती गाड़ी में इस फिल्म को शूट किया गया था. उल्लेखनीय है कि सिनेमैटोग्राफर ए के बीर (एफटीआईआई) की यह पहली फिल्म थी और उन्हें राष्ट्रीय पुस्कार मिला. लेकिन इस फिल्म में ध्वनि के इस्तेमाल को भी अलग परखा जाना चाहिए. हरिप्रसाद चौरसिया और भुवनेश्वर मिश्र ने इस फिल्म का संगीत दिया था साथ सत्यजीत रे के सहयोगी रहे बंसी चंद्रगुप्त ने प्रोडक्शन डिजाइन किया था.
पिछले दिनों तिग्मांशु धूलिया ने हिंदी फिल्मों में कहानी के न होने का जिक्र किया था. ऐसा नहीं है कि कहानी का कोई अभाव हो, बस साहित्य के तरफ आज के निर्देशक रुख नहीं करना चाहते है.
Saturday, September 26, 2026
A Talent Gone Too Soon: In Memory of Awtar Kaul Awtar Kaul
Whenever Hindi parallel cinema is discussed, the names of Mani Kaul and Kumar Shahani inevitably come to the fore. Their critically acclaimed films such as Uski Roti and Maya Darpan were based on outstanding literary works. Yet, 27 Down (1973), a National Award-winning film based on the Hindi novel Atharah Suraj ke Paudhe, is often left out of the discussion. 27 Down was directed by Awtar Kaul (1939-74). On the very day the National Award was announced, Awtar died by drowning in Bombay (now Mumbai). It remains the only completed feature film he ever directed. The film was also honoured at the prestigious Locarno and Mannheim international film festivals.
Awtar’s
Heartwrenching Life Journey
In the recently
published book Awtar Kaul: The (In)Complete Story,
Vinod Kaul, former executive director of Rajya Sabha TV and Awtar’s nephew,
writes about the director's life, family, travels and the making of the film.
The book also includes recollections from the film’s cinematographer, sound
recordist and some film critics. Vinod Kaul writes in the book at one point:
“It is bittersweet to think about this film [27 Down] as the
starting leg of so many others and the end of Awtar’s. What all could he have
given us!”
After Bhuvan Shome and Sara Akash, Mani Kaul, Kumar
Shahani and Awtar received loans from the Film Finance Corporation to make
films. 27 Down was made on a modest budget of two lakh rupees.
Raakhee was a successful actress in commercial cinema at
the time, yet, she agreed to star in the film without demanding any
remuneration and also sans makeup.
Commenting on
how he sees Awtar’s filmmaking as distinct from that of Mani Kaul’s and Kumar
Shahani’s, veteran theatre actor and
director M.K. Raina shares an anecdote about Awtar and Mani Kaul:
“Awtar would say, you make cine-ma, I make cine-baap. You operate the camera, I
turn the camera faster.”
Through the
metaphor and symbolism of the railway, Awtar sensitively and skillfully
captured in black-and-white images the dreams, dilemmas and the alienation of a
generation coming of age in independent India; the tensions in relationships
between men and women; social pressures, and the conflict between personal
desire and social responsibility. It still resonates with the youth of India,
particularly those living away from the centres of power and opportunity.
27 Down’s central characters are Sanjay (M.K. Raina), a railway ticket conductor and
Shalini (Raakhee), a typist working for Life Insurance Corporation. Shalini is
responsible for supporting her two younger siblings and grandfather. She works
in Mumbai, far away from her Pune home. Her grandfather does not want Shalini
to enter into a relationship with someone who might distance her from the
family.
Sanjay, the
protagonist, seems to have no place he can truly call home. Like a railway
carriage, he appears condemned to remain perpetually in transit. His
personality is overshadowed by his imposing father, played by Om Shivpuri.
In the film’s
opening scene, Sanjay is asleep on a train. The sound of the moving train is heard,
followed by a voice-over: “Is that the same bridge again?... There are so many
bridges along the way. It feels as though from the beginning until now, I have
been crossing countless bridges. There are people who travel from one place to
another. As for me, I seem to have set out from somewhere only to keep moving
somewhere.”
27 Down was M.K. Raina’s first film. He plays a character incapable of making
decisions, constantly suffocated and caught between opposing
forces. Shalini, meanwhile, is markedly different from the female
characters generally seen in Hindi cinema of that period. Burdened by family
responsibilities, she is a working woman who makes independent decisions about
her relationships and takes the initiative herself. Raakhee portrays the
character with remarkable conviction.
After the film’s
release, in September 1974, Atharah Suraj ke Paudhe
was republished under the title 27 Down. Dedicated
to Awtar, the new edition carried a foreword by Ramesh Bakshi. He wrote that
the novel was the story of a Sanjay belonging to a new generation, who
continually fought an 18-day Mahabharat within
himself—between his wife, his lover, his father, his job, his ambitions, his
indecisiveness and the relentless chaos of life.
27 Down is a classic. It contains certain images of trains and railway platforms
that remain etched in the viewer’s memory forever. Much of the film was shot on
moving trains using a handheld camera. Notably, freshly graduated from FTII,
this was cinematographer A.K. Bir’s first film. He received the National Award
for his work on it. The film’s use of sound, too, deserves special attention. Hariprasad Chaurasia
and Bhubaneshwar Mishra composed the music while Bansi Chandragupta, who had
worked closely with Satyajit Ray, designed the production.
In 2024, the
film’s restored version was screened at the International Film Festival of
India in Goa. Mani Kaul was a great admirer of the film. Raina says it was Mani Kaul who suggested his name to
Awtar for the film. Mani Kaul would go to watch rehearsals at the National School of Drama (NSD) where
he was a student. Later, Awtar and Bakshi went to NSD to meet him and discuss
the book and the scenario. Raina fondly remembers Awtar and the days of making
the film, describing them as a time of “complete madness” when everyone was
equally involved in the creative process.
(For the Outlook )
27 डाउन की याद
विनोद कौल की पुस्तक ‘अवतार कौल: द (इन) कम्प्लीट स्टोरी’ के बहाने अरविंद दास ने चर्चित फ़िल्म ‘27 डाउन’ को याद किया है और इस फ़िल्म के नायक एम. के. रैना से बातचीत भी की है. यह फ़िल्म हिंदी के लेखक रमेश बक्षी के उपन्यास ‘अठारह सूरज के पौधे’ पर आधारित है. समानांतर सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा साहित्यिक कृतियों से अपना रिश्ता बनाता था. कम साधनों और सीमित तकनीक के बावजूद उस दौर में ऐसी फ़िल्में बनीं, जिन्हें आज भी देखना सिनेमा देखने के सुख से भर देता है. क्या दौर था. पैसे कम थे, तकनीक सीमित लेकिन सिनेमा के लिए जुनून भरपूर. प्रस्तुत है यह आलेख.
एक
समांतर सिनेमा की हिंदी में जब भी बात होती है, मणि कौल, कुमार शहानी की फिल्मों का नाम ऊपर आता है. उनकी फिल्में मसलन, उसकी रोटी, माया दर्पण साहित्यिक कृतियों पर आधारित रही. हिंदी उपन्यास, अठारह सूरज के पौधे, पर आधारित और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित एक फिल्म ‘27 डाउन’ (1973) की चर्चा अक्सर छूट जाती है. इस फिल्म के निर्देशक अवतार कौल (1939-1974) थे. जिस दिन इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई, उसी दिन बॉम्बे में डूबने से उनकी मौत हो गई और उनके नाम बतौर निर्देशक यही एक मुकम्मल फिल्म है. इस फिल्म को प्रतिष्ठित लोकार्नो और मैनहाइम अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी पुरस्कृत किया गया.
हाल ही में प्रकाशित किताब ‘अवतार कौल: द (इन) कंप्लीट स्टोरी’ में विनोद कौल (राज्य सभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक और निर्देशक के भांजे) ने निर्देशक के जीवन, परिवार, यात्रा और इस फिल्म के बारे में लिखा है. साथ ही फिल्म से जुड़े सिनेमैटोग्राफर, साउंड रिकॉर्डिस्ट और कुछ फिल्म समीक्षकों की टिप्पणियाँ भी शामिल की है. किताब में उन्होंने एक जगह नोट किया है, “यह सोचकर एक अजीब-सी कसक होती है कि यह फिल्म इतनी सारी दूसरी फिल्मों की शुरुआत थी और अवतार की यात्रा का अंत भी. वह हमें और कितना कुछ दे सकते थे.”
मणि कौल और शहानी की तरह ही अवतार ने सिनेमा का विधिवत प्रशिक्षण लिया था. वे 60 के दशक में न्यूयॉर्क के सिटी यूनिवर्सिटी में फिल्म निर्माण के छात्र थे. वर्ष 1969 में मणि कौल ने मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पर फिल्म बनाई. साथ ही इसी साल मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ फिल्म भी आई. कम बजट की इन फिल्मों में सितारों या ‘स्टार’ पर जोर नहीं था. फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों को कथा के लिए चुना. बिंब और ध्वनि के सुरूचिपूर्ण इस्तेमाल ने इन फिल्मों को व्यावसायिक सिनेमा से अलग एक खास पंक्ति में ले जाकर खड़ा किया. यहीं से हिंदी में 'न्यू वेब सिनेमा' या समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी गई.
यहाँ पर यह नोट करना उचित होगा कि मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ के बाद फिल्म वित्त निगम से मणि कौल, कुमार शहानी और अवतार कौल को फिल्म बनाने के लिए ऋण मिला था. ‘27 डाउन’ फिल्म महज दो लाख के बजट पर बनी थी. राखी उस दौर में कमर्शियल फिल्मों की सफल अभिनेत्री थी, फिर भी बिना पैसे लिए, बिना मेकअप के, सादे साड़ी में (जो वह अपने घर से लेकर आती थी) उन्होंने इस फिल्म में काम करना चाहा. एक जगह किताब में विनोद कौल ने एक वाकया का जिक्र किया है कि राखी को शूटिंग के दौरान एक जगह लगा कि शॉट दृश्यात्मक रूप से जम नहीं रहा और यह बात उन्होंने अवतार से कही कि पेड़ फ्रेम में बाधा बन रहा है और इससे कंपोजिशन बिगड़ रहा है, जिस पर बहुत ही शांत और दृढ़ता से उन्होंने जवाब दिया कि ‘यह पेड़ मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है.’ राखी को ये बात पसंद नहीं आई पर उन्हें पता था कि सिनेमा निर्देशक का माध्यम है.
जहाँ ‘उसकी रोटी’ या ‘माया दर्पण’ आम दर्शकों के लिए बोधगम्य नहीं रही, वहीं ‘27 डाउन’ आसानी से दर्शकों के भाव बोध का हिस्सा बन जाती है. बहरहाल, सिनेमा के अध्येता मनमोहन चड्ढा ने ‘हिंदी सिनेमा का इतिहास’ में ठीक ही लिखा है कि ‘सन 1968 से सन 1980 के बारह वर्षों में विश्व भर में भारत ही एक ऐसा देश था, जहाँ नए फिल्मकार के लिए अपनी पहली फिल्म बना लेना बहुत आसान था.’ क्या आज यह संभव है?
आजाद भारत में जवान हो रही पीढ़ी के सपने, कश्मकश, स्त्री-पुरुष संबंधों, सामाजिक दबाव और वैयक्तिक इच्छा के द्वंद को रेल के रूपक और प्रतीकों के माध्यम से निर्देशक ने बेहद कुशलता औऱ संवेदनशीलता के साथ श्वेत-श्याम छवियों में उकेरा है. ट्रेन कंडक्टर संजय (एम के रैना) और एलआईसी में नौकरी (टाइपिस्ट) करने वाली शालिनी (राखी) इस फिल्म के मुख्य पात्र है. शालिनी के माता-पिता नहीं है, दो छोटे भाई-बहन और दादाजी का भरण-पोषण का जिम्मा उसके सिर है. वह पुणे से दूर बॉम्बे में नौकरी करती है. उसके दादाजी नहीं चाहते कि शालिनी किसी ऐसे के साथ संबंध बनाए जो उन्हें दूर कर दे.
संजय एक ऐसा नायक है कि जिसके जीवन में कहीं ठौर नहीं है और वह रेल के डिब्बे की तरह यात्रा में हमेशा भटकने के लिए अभिशप्त है. संजय के व्यक्तित्व पर उसके रौबदार पिता (ओम शिव पुरी) की छाया हमेशा हावी रहती है.
फिल्म के शुरुआती दृश्य में संजय ट्रेन के बर्थ पर सोया है. रेल की आवाज है और वॉइस ओवर:
“फिर वही पुल है क्या, शायद पुल ही है. कितने सारे पुल आते हैं रास्ते में, लगता है शुरू से अब तक मैं बेहिसाब पुलों पर से गुजर रहा हूँ. लोग है जो एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं. मैं हूँ कि कहीं से चल कर कहीं चला रहा हूँ...” एम के रैना की यह पहली फिल्म थी. रैना ने एक ऐसे किरदार को निभाया है जो निर्णय लेने में अक्षम है, घुटता रहता है और दो पाटों के बीच पीसता रहता है.
वहीं शालिनी का किरदार उस दौर के हिंदी सिनेमा के स्त्री पात्रों से साफ अलग है. पारिवारिक बोझ से दबी, कामकाजी स्त्री के चरित्र को राखी ने बखूबी निभाया है जो अपने संबंधों को लेकर स्वतंत्र निर्णय लेती है, पहल खुद करती है.
आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में इसे अलग से रेखांकित किया जाता रहा है? फिल्म के रिलीज होने के बाद सितंबर 1974 में ‘अठारह सूरज के पौधे’ 27 डाउन के नाम से पुनर्प्रकाशित हुई. अवतार कौल को समर्पित, नई भूमिका में रमेश बक्षी ने लिखा: उपन्यास नई पीढ़ी के उस संजय की कहानी है जो पत्नी, प्रेमिका, पिता, नौकरी, अपनी महत्वाकांक्षाओं, अपनी निर्णय हीनता और आपाधापी के बीच महाभारत के अठारह दिनों का युद्ध अपने अंदर लड़ता रहता है...”
हर क्लासिक फिल्मों की तरह ही इस फिल्म के रेल, प्लेटफार्म के कुछ दृश्य हमेशा के लिए मन में रच-बस जाते हैं. चलती गाड़ी में "हैंडहेल्ड कैमरा" के सहारे इस फिल्म के अधिकांश हिस्सों को शूट किया गया था. उल्लेखनीय है कि सिनेमैटोग्राफर ए के बीर (एफटीआईआई) की यह पहली फिल्म थी और उन्हें फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. लेकिन इस फिल्म में ध्वनि के इस्तेमाल को भी अलग से परखा जाना चाहिए. हरिप्रसाद चौरसिया और भुवनेश्वर मिश्र ने इस फिल्म का संगीत दिया था. वहीं सत्यजीत रे के सहयोगी रहे बंसी चंद्रगुप्त ने प्रोडक्शन डिजाइन किया था.
वर्ष 2024 में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा में इस फिल्म के पुनर्संरक्षित रूप (रिस्टोर्ड वर्जन) में प्रस्तुत किया गया. मणि कौल इस फिल्म के बड़े प्रशंसक थे. इस फिल्म के मुख्य अभिनेता, चर्चित कलाकार, रंगकर्मी एम के रैना कहते हैं कि मणि कौल ने ही अवतार को उनका नाम सजेस्ट किया था, वे एनएसडी में रिहर्सल देखने आते थे. किताब में एम के रैना के हवाले से बातें नहीं मिलती है. मैंने उनसे इस फिल्म और उसके बहाने समांतर सिनेमा को लेकर बातचीत की.
दो
अरविंद दास: 27 डाउन से आप कैसे जुड़े?
एम के रैना: जब मुझे फिल्म में अवतार कौल ने कास्ट किया, मैं ड्रामा स्कूल (एनएसडी) में ही था. वे हॉस्टल आए थे. नसीर (नसीरूद्दीन शाह) मुझसे जूनियर था तो उसने कहा कि कोई फिल्ममेकर बाहर आया है, वो तुमसे मिलना चाहता है. मैंने कहा कि बकवास न कर, बैठ के चुपचाप चाय पी ले. तो उसने कहा, नहीं, सीरियसली कह रहा हूँ, कोई बाहर है. तो वहाँ देखा दो आदमी थे. एक राइटर थे रमेश बक्षी और दूसरे अवतार. उन्होंने कहा कि तुम हमारे साथ चलो, खाना खाओ हमारे साथ. तो हम राइटर के घर गए तो वहाँ उन्होंने रिवील किया कि ऐसा प्रोजेक्ट है, हम ऐसा-ऐसा कर रहे हैं. तो तुमसे बात करेंगे. अच्छा, यह जो डायरेक्टर था, यह अमेरिका में पढ़ के आया था. ही वॉज़ ट्राइंग टू अंडरस्टैंड मैं हूँ कैसा बंदा. सीरियस काम करेगा कि नहीं. तो फिर जब बातें की, तब उसने कहा कि मैंने दुनिया का सबसे बेस्ट थिएटर देखा है न्यूयॉर्क में. सो ही वॉज़ वैरी हैप्पी कि तुम मतलब यू बिलॉन्ग टू दैट एंड उस तरह का सोच है तुम्हारा भी. तो फिर किताब दे दी पढ़ने के लिए कि तीन दिन में तुम पढ़ लो फिर बात करेंग. मैंने एक रात में ही पढ़ ली सारी किताब. फिर मैंने फोन किया. त्रिवेणी के लॉन में बैठ के हम बातें करने लगे. तो मैंने बताया किताब के बारे में कि उसमें क्या है, क्या नहीं है. क्यों संजय डी-क्लास्ड आदमी है, बिलकुल लोनली है, डायरेक्शनलेस है, ट्रैक... यू नो, सारा जो सिंबॉलिज्म उसमें है. पटरियाँ हैं, वो पैरेलल हैं, मिलती कहीं नहीं...तब उसने अपना सिनेरियो दिया मुझे कि अब यह पढ़ो. पाँच-छह दिन हम रोज़ मिलते रहे, बात करते रहे. फिर उसने कहा-ठीक है, वी आर कास्टिंग यू. हम तुम्हें बताएंगे, तुम्हें बॉम्बे कब आना है. तो कोई 6-7 महीने के बाद बॉम्बे पहुँचा मैं और स्ट्रेट शूटिंग शुरू हो गई हमारी.
अरविंद दास: यह 1973 की बात है
एम के रैना: ना ना, 1972 की बात है.
अरविंद दास: पिछले दिनों फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने हिंदी फिल्मों में कहानी के न होने का ज़िक्र किया. ऐसा नहीं है कि हमारे आस-पास कहानी का कोई अभाव हो, बस साहित्य के तरफ आज के निर्देशक रुख नहीं करना चाहते है. इस तरह की फिल्में आज मुश्किल दिख रही है...
एम के रैना: इसके लिए हमें सरकार को क्रेडिट देना होगा, जिन्होंने फिल्म वित्त निगम (एफसीसी) बनाया. उस वक्त फिल्म वित्त निगम साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों के निर्माण पर जोर देता था. यह तो कमाल हुआ न. साहित्य हेल्पड देम ऑल, इस पर किसी ने ध्यान भी नहीं दिया. मणि ने भी यही किया, कुमार ने भी यही किया, अवतार ने भी यही किया, बासु भट्टाचार्य ने भी यही किया, बासु चटर्जी ने भी... सभी को हिंदी साहित्य की कहानियों में दम लगा. दे वेयर मॉडर्न स्टोरीज़. उस दौर में राइटर भी कुछ नया करना चाहता था, शिल्प के लेवल पे, फॉर्म के लेवल पे, कंटेंट के लेवल पे. उस वक्त आज ही तरह लल्लू-पंजू नहीं थे एफसीसी में. बी के करंजिया थे, हृषीकेश मुखर्जी थे जिनमें सिनेमा को लेकर पैशन था. जब ‘कस्बा (कुमार शहानी की फिल्म)’ रुक गई थी बीच में तब मुखर्जी ने कहा कि इस फिल्म को पूरी करनी है किसी भी सूरत में. फिर उन्होंने और पैसे दिए कुमार को.
अरविंद दास: आप किस रूप में उस दौर को याद करते हैं?
एम के रैना: एक पागलपन था, एक मस्तानगी थी. हम सब यंग थे. दिन में हमारी मंडली जमती थी समोवर (कैफे) में. फिर शाम को ये लोग दारू पीने जाते थे. इसी तरह हम मृणाल सेन से मिले. मैंने उनके साथ दो फिल्में की. माया दर्पण उसी दौर में शूट हो रही थी. मेरी सबसे अच्छी दोस्ती हो गई. हमारा एक ‘गैंग’ जैसा था..जैसे 'सतह से उठता आदमी' में आई वॉज़ एन एक्टर बट आई वॉज़ आल्सो लाइक अ मैनेजर. पैसे होते नहीं थे. मणि को कान समारोह में फिल्म भेजनी थी. दिल्ली में मंजीत बाबा ने उसका पोस्टर बनाया. प्रिंट कंधे पर उठा कर इंटरनेशनल फेस्टिवल का जो ऑफिस है खान मार्केट में वहाँ लेकर मैं गया. हम पैसे की बात नहीं करते थे. बांद्रा में एक जगह थी, मैक्स. आई थिंक गोअन, बिलकुल अमेरिकन ओरिजिनल लगता था. गली थी. गली बीइंग टर्न्ड इनटू बार इन द नाइट. वहाँ बंसी चंद्रगुप्त होता था, गोगी आनंद होता था... ऑल ऑफ देम वुड ड्रिंक फेनी...बट दैट वॉज़ वन आस्पेक्ट..दे वेल सेलिब्रेट इन द इनविंग.. बट व्हेन इट केम टू टॉकिंग अबाउट सिनेमा, टॉकिंग अबाउट लिटरेचर, टॉकिंग अबाउट आर्ट डायरेक्शन वी बिकेम वेरी सीरियस. एक जुनून, पैशन टीम के सब साथियों में था, चाहे वे कैमरामैन हो या साउंड रिकॉर्डिस्ट. एक्सपेरिमेंट्स बहुत करता था बीर (सिनेमैटोग्राफर). बिफोर शूट उन दिनों लिलीज़ बनाते थे ये लोग. एक्सपोज़र लिलीज़ करते थे कि किस एक्सपोज़र पे करूँगा इसको शूट... ऑल वेयर इक्वली इन्वॉल्व्ड. एडिटर भी ऐसे ही मिले हमें एक्चुअली. वो दौर था कि भाई कुछ बदल के, कुछ अलग काम करना है.
अरविंद दास: अवतार की फिल्म मेकिंग को मणि और कुमार शहानी से कैसे अलग देखते हैं?
एम के रैना: मणि और अवतार का आपस में जोक चलता था. मणि, तू सिने-मा बनाता है ना, मैं सिने-बाप बनाता हूँ. अवतार कहता था, तू कैमरा चलाता है ना, मैं कैमरा तेज घुमाता हूँ. सो दे वुड टॉक एंड लाफ अबाउट इट.
अरविंद दास: समांतर सिनेमा आंदोलन क्यों बिखर गया?
एम के रैना: समांतर सिनेमा में एक ज़बरदस्त मोड़ आया जब कुछ डायरेक्टरों ने फिल्म स्टार्स लेने शुरू किए. उन्होंने सोचा कि वी विल ब्रेक इनटू द बिगर मार्केट... दैट हैज बीन द डिफीटिंग पॉइंट व्हिच दे डिडेंट रियलाइज़.. गोविंद (निहलानी) ने भी लिया, केतन (मेहता) ने भी ले लिया. यदि प्रादेशिक स्तर पर वहां की सरकार नए फिल्मकारों को मदद करे तो देश में सिनेमा की सूरत बदल सकती है.
अरविंद दास: आपकी यह पहली फिल्म थी, पर आप कैमरे के सामने काफी कॉन्फिडेंट लग रहे...
एम के रैना: हमारे यहाँ ट्रेनिंग में दो चीजें बहुत इनडायरेक्टली आती थीं. एक तो हमारे पास बहुत ही छोटा इनडोर इंटीमेट थिएटर है. वहाँ पर तीन फुट पे मेरा स्पेक्टेटर होता है. तो वहाँ हम जब एक्टिंग करते थे तो यू हैव टू रिस्ट्रेन योरसेल्फ, वो ट्रेनिंग नैचुरली आती है आपको और जब ओपन एयर में करते हैं तो आपका थोड़ा सा अलग एप्रोच होता है... यू हैव ऑल दिस टेंडेंसी, हाउ टू रीच टू द ऑडियंस. तो वो ट्रेनिंग यहां बहुत काम आई. इनफैक्ट मणि ने एक दिन कहा कि, तू हमारे सिनेमा के लिए बेस्ट एक्टर है. मैंने पूछा, कैसे? उसने कहा, यार, तू सिनेमा को समझता है. तुझे यह फिक्र नहीं होता कि तेरा फोटो आया कि नहीं आया.. यू नो द फिल्म बेसिकली.
अरविंद दास: क्या संजय का किरदार 21वीं सदी के तीसरे दशक में पीछे छूट गया है या आज भी मौजूद है?
एम के रैना: संजय अभी भी है. लाखों-करोड़ों लोग उस संघर्ष में हैं अभी भी. शहर में रहने वाले जेन ज़ी को छोड़ दीजिए, वो तो थोड़ा प्रिविलेज्ड हैं, लेकिन जो जेन ज़ी कस्बे में है, जिसके घर में आमदनी नहीं है बाप के पास, जो फँसा हुआ है घर में, घर की ज़िम्मेदारी समझता है. तो वो तो संजय ही है. वो तो करोड़ों में हैं अपने यहाँ. आज भी फिल्म की रीच है. अब तो निगेटिव भी रिस्टोर किया गया है. अभी हम फिल्म मेकर्स का एक कोर्स कर रहे हैं दिल्ली में. तो मैं इस फिल्म के कुछ दृश्य दिखाता हूँ. लोग ठहर कर सोचने लगते हैं कि क्या ऐसा हुआ है? ऐसी फिल्म भी बनी है क्या?
(समालोचन वेबसाइट के लिए)
Sunday, September 20, 2026
मिथिला की चित्रकला
पिछले कुछ वर्षों से अशोक कुमार सिन्हा मिथिला चित्रकला को लेकर लगातार लेखन कर रहे हैं. हाल ही में उनकी लिखी किताब ‘मिथिला चित्रकला: रंगो और रेखाओं का सफर’ प्रकाशित हुई है जिसमें वे इस कला की शैलियों, जैसे कोबहर, अरिपन, गोदना आदि का विस्तार से वर्णन करते हैं. साथ ही इस कला के इतिहास और विशेषताएँ को सहज भाषा में प्रस्तुत करते हैं.
मिथिला चित्रकला पिछले कुछ वर्षों में ‘मधुबनी आर्ट’ के रूप में देश-विदेश में चर्चा में बनी रही है. ‘मिथिला या मधुबनी चित्रकला?’ शीर्षक लेख में वे लिखते हैं कि ‘मधुबनी सिर्फ एक जिला है, जबकि यह कला ऐतिहासिक मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई है.’ सदियों से मिथिला की महिलाएँ अरिपन, कोहबर, मछली, साँप, सूर्य, चंद्र आदि दीवारों पर उकेरती रही हैं. पर 1960 के दशक में (1964-65) आए अकाल ने इस कला को मिथिला से बाहर पहुँचाया. औपचारिक शिक्षा से वंचित और बिना किसी नेटवर्क के जगदंबा देवी, गंगा देवी, सीता देवी, महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त, बौआ देवी जैसी कलाकार इसे देश-विदेश लेकर गईं. गंगा देवी, जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी जहाँ कचनी (लाइन) शैली में सिद्धहस्त थीं, वहीं सीता देवी, बौआ देवी भरनी शैली में. हालांकि बाद के दशकों में दलित कलाकारों के दख़ल से इस शैली में विस्तार आया और गोदना शैली भी इससे जुड़ गई.
एक परंपरा के रूप में लोक में कोहबर और अरिपन लिखने की कला सदियों पुरानी है. पिछले दशकों में समकालीन विषय-वस्तु भी इस कला का आधार बने हैं. साथ ही पहले जहाँ लोक में उपलब्ध प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था वहीं अब एक्रेलिक रंगों का प्रयोग होने लगा है. दीवार से उतर कर ये चित्र कागज, कपड़ा और विभिन्न वस्तुओं पर अपना रूप ग्रहण करने लगे हैं. देश और विदेश के विभिन्न भागों में आज अनेक मिथिला कलाकार अपनी कूची में रंग भर रहे हैं.
इस किताब में विस्तार से कचनी, भरनी, तांत्रिक, गोदना शैली का जिक्र है. विभिन्न शैलियों को निरूपित करते हुए किताब में शामिल चित्र पाठकों को इस चित्र शैली के कला पक्ष को अच्छे से स्पष्ट करते हैं. कलाकारों के साथ-साथ जिन विभूतियों ने मिथिला कला को देश-दुनिया में प्रतिष्ठा दिलाने में योगदान दिया, मसलन, विलियम आर्चर, ललित नारायण मिश्र, भास्कर कुलकर्णी, टोकियो हासेगावा आदि पर भी लेखक ने टिप्पणी दी है.
सामान्य पाठकों के लिए लिखी गई यह किताब परिचयात्मक है. चित्रों का इस्तेमाल इसे पठनीय बनाता है, हालांकि चित्रकारों का नाम नहीं होना खटकता है.
किताब: मिथिला चित्रकला (रंगों और रेखाओं का सफर)
लेखक: अशोक कुमार सिन्हा
प्रकाशक: क्राफ्ट चौपाल, पटना
मूल्य: 500
Sunday, September 13, 2026
दोहरी जिंदगी: लोक कथा में मुक्ति चेतना
राजस्थान के चर्चित लेखक विजय दान देथा (बिज्जी) की जन्मशती मनाई जा रही है. उन्होंने राजस्थान की मिट्टी में रची-बसी लोक कथाओं और मौखिक परंपरा को जतन से ढूंढा और पुनर्नवा किया. उनकी रचनाओं की पहुँच अनुवाद के माध्यम से देश-दुनिया तक फैली जिसने नाटक, सिनेमा, दास्तानगोई से जुड़े कलाकारों को रूपांतरित करने, आधुनिक रंग में रंगने का मौका दिया. बात हबीब तनवीर-श्याम बेनेगल की हो (चरण दास चोर), मणि कौल-अमोल पालकेर (दुविधा) की हो, पुष्पेंद्र सिंह (लजवंती, केंचुली) या महमूद फारुकी (चौबोली) की.
Friday, September 11, 2026
In a Changing World, Detha's Stories Remind Us How Folklore Can Question Power
The centenary year celebration of
renowned Rajasthani writer and Padma Shri awardee Vijaydan Detha (1926-2013) is
an opportunity to revisit his work that has travelled far beyond the landscape
in which it was born. Detha, also known as Bijji, painstakingly explored,
collected and revived the folk tales and oral traditions deeply rooted in the
soil of Rajasthan. Through translations, his stories reached readers across
India and the world, while theatre practitioners, filmmakers and Dastangoi
performers found in them rich material for reinterpretation and contemporary
expression.
The list of artists drawn to
Detha’s work is remarkable. Habib Tanvir and Shyam Benegal adapted Charandas
Chor, Mani Kaul and Amol Palekar brought Duvidha to the screen, Prakash Jha adapted
Parineeti, Pushpendra Singh made Lajwanti, and Mahmood Farooqui adapted
Chouboli for Dastangoi, among many others.
What is it about Detha’s folk
tales that continues to connect them with everyone, from young artists to urban
audiences? I have had an answer recently in Pune, during a performance of
Detha’s well-known story Dohri Zindagi.
Told in Marwari and Hindi, Dohri
Zindagi revolves around two miserly and greedy merchants who arrange the
marriage of their unborn children while they are still in the womb. Both
households are blessed with daughters but one of the merchants decides to raise
his daughter as a boy. Driven by the lure of dowry, the two are eventually
married off. The truth about this same-sex marriage is revealed on their
wedding night. Gradually, however, love begins to blossom between the two
women. Rejected and despised by society, they create new identities for
themselves – Beejan and Teejan.
Directed by Gurleen Judge and
Neha Singh, the play moves beyond a story of greed and avarice to confront
questions of same-sex relationships in a feudal society and the duplicity of
modern social structures. The story feels strikingly contemporary because its
emotional core remains immediately recognisable. Some members of the Pune
audience appeared uncomfortable with a few of the play’s “bold” scenes on
stage. That discomfort, however, was precisely what the directors intended to
provoke.
Detha was born on September 1,
1926, in Borunda, near Jodhpur, into a family associated with the bardic
tradition of Rajasthan. His monumental 14-volume Baatan Ri Phulwari (Garden of
Tales) brought together a vast collection of Rajasthani folk tales and has
subsequently been translated into Hindi and other languages, earning wide
appreciation.
Yet Detha’s importance lies not
merely in preserving folklore. His stories repeatedly transform folk narratives
into sites of questioning and resistance. Whether in Duvidha, Lajwanti or Dohri
Zindagi, women find themselves trapped within patriarchal structures while
experiencing an intense yearning for love, dignity and freedom. In Detha’s
stories, a ghost can be a lover, a companion or an ally. A ghost appears in
both Duvidha and Dohri Zindagi, blurring the boundaries between the real and
the imagined.
Duvidha, in particular, can be
read as a feminist tale about agency, desire and the limited choices available
to women within patriarchal society beautifully depicted on screen by Mani
Kaul. Through its unique non-linear narrative style, the film treads between
the real and the imaginary.
Detha’s folk imagination createsspaces in which women can challenge identities imposed upon them even if those challenges come at a considerable cost.
A few years ago, when I asked
filmmaker Pushpendra Singh about adapting Detha’s stories, he spoke about the
fundamental challenge facing any artist working with folklore:
“As an artiste, you constantly
grapple with how to translate a [folk] tale or adapt a literary piece. As a
storyteller, you also want your stories to look contemporary. Old feudalism has
given way to something new, not so widely seen in today’s Rajasthan.”
This perhaps explains the
enduring appeal of Detha. His stories are rooted in the geography of Rajasthan
and its cultural memory, yet they are not confined by them. The folk element in
Detha’s writing comes through its language, idiom, humour and dialogue. But
beneath the texture of folklore lies a persistent engagement with power,
desire, social hierarchy and freedom.
When Detha wrote Dohri Zindagi
around four decades ago, there was little open discussion in Indian society
about same-sex relationships. When the story is adapted for the stage today,
contemporary voices and concerns inevitably become part of it. It is therefore
hardly surprising that the performers in Dohri Zindagi also felt free to
comment on contemporary Indian politics.
Along with his close friend and
noted folklorist and musicologist Komal Kothari, Detha founded the Rupayan
Sansthan, an institution devoted to documenting and promoting the folklore,
art, music and cultural traditions of Rajasthan. Detha’s birth centenary is an
opportunity to ask why folk narratives continue to matter in a rapidly changing
world. His stories remind us that folklore is not a frozen tradition. It is
capable of questioning power.
As performed during Mahindra
Excellence in Theatre Awards (META) last year in Delhi, the award-winning play
Swang: Jas Ki Tas (in Bundelkhandi dialect), which is based on his story Thakur
Ka Roothana, uses elements of the traditional folk performance style of Swang
to expose the contemporary social and political disorder around us.
Detha’s stories continue to find
new readers, filmmakers, theatre practitioners and audiences. They speak in the
language of folklore, but they ask questions about contemporary realities which
confront us.
(The Wire)





