Sunday, May 17, 2026

‘क्राउड सोर्सिंग’ के तहत बनी पहली फिल्म मंथन

 


समांतर सिनेमा के दौर के फिल्मकारों से श्याम बेनेगल की फिल्में काफी अलग रही. इन फिल्मों की विशिष्ट पहचान है. मुख्यधारा से अलग, समीक्षकों ने उनकी फिल्मों को मध्यमार्गी कहा. उनकी फिल्में आर्थिक रूप से भी सफल रही. पचास साल पहले रिलीज हुई फिल्म मंथनइसका श्रेष्ठ उदाहरण है. यह फिल्म आज भी प्रासंगिक बनी हुई है, जिसमें भारतीय ग्रामीण समाज में जातिगत विभेद उभर कर सामने आता है. साथ ही सत्तर के दशक के भारतीय समाज की आलोचना भी दिखाई देती है कि किस तरह गाँव की सामाजिक संरचना को बाहरीलोग अपने नजरिए से देखते हैं और बदलाव लाने की कोशिश करते है.

बहरहाल, एक बातचीत में श्याम बेनेगल ने मुझे कहा था: हर फिल्म एक सीखने की प्रक्रिया होती है, फिल्म बनाना अपने आसपास, अपने लोगों, अपने देश को बेहतर समझने की प्रक्रिया है, यह खुद को शिक्षित करने का एक तरीका है.’ यह फिल्म दिखाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और परिवर्तन का औजार बन सकता है.

समांतर सिनेमा के फिल्मकार हमेशा फिल्म बनाने कि लिए वित्तीय संकट से जूझते रहे. उन्हें वित्त निगम से काफी सहायता मिला रहा पर श्याम बेनेगल ने फिल्म बनाने के लिए फिल्म वित्त निगम से ऋण नहीं लिया था. उनकी पहली फिल्म 'अंकुर (1974)' और दूसरी फिल्म 'निशांत (1975)' को ‘ब्लेज एडवरटाइजिंग’ ने वित्तीय सहायता दी थी, जबकि तीसरी फिल्म 'मंथन (1976)' गुजरात के दुग्ध सहकारी संस्था के सदस्यों की सहायता से बनी. यह तीनों ही फिल्में व्यावसायिक रूप ले सफल रही. व्यावसायिक रूप से बेनेगल की फिल्मों की तुलना मलयालम फिल्म के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन से की जा सकती है, जिनकी अधिकांश फिल्में ‘बाक्स ऑफिस’ पर भी सफल रही.

मंथन फिल्म का निर्माण गुजरात के पांच लाख डेयरी किसानों ने किया था. एक तरह से क्राउड सोर्सिंग के तहत बनी हिंदुस्तान की यह पहली फिल्म है. यह फिल्म डेयरी सहकारी आंदोलन के इर्द-गिर्द रची गई है. भारत में दुग्ध क्रांति के जनक रहे डॉक्टर वर्गीज कुरियन इस फिल्म निर्माण के पीछे थे.

इस फिल्म में गिरीश कर्नाड, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे, कुलभूषण खरबंदा, अनंत नाग जैसे कलाकारों को एक साथ परदे पर देखना सुखद है. इन कलाकारों की अदाकारी और गोविंद निहलानी के कुशल फिल्मांकन की वजह से करीब पचास साल बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती. असल में बेनेगल की फिल्में पीढ़ियों से संवाद करती है, नए अर्थ के साथ उद्घाटित होती है.

वर्ष  1977 में फिल्म को बेस्ट फिल्म और बेस्ट स्क्रीनप्ले (विजय तेंदुलकर) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस फिल्म के नेगेटिव क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिसे फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशनने निर्देशक के साथ मिल कर संरक्षित किया और फिर 2024 में कान फिल्म समारोह में क्लासिक खंड में इसका प्रदर्शन किया गया. बाद में इसे देश के चुनिंदा सिनेमाघरों में भी रिलीज किया गया था,

बेनेगल की फिल्मों में वस्तुनिष्ठता पर काफी जोर रहता था, जो इस फिल्म में भी दिखाई देती है. यहाँ कोरी भावुकता नहीं है, कोई काल्पनिकता नहीं है. सादगी के साथ अपने समय और समाज के साथ जुड़ाव फिल्म की विशेषता है.

Thursday, May 07, 2026

मलयालम सिनेमा का नया स्वर: टिकट टू करेला

 


बीस साल पहले दिल्ली में ओसियान फिल्म समारोह के दौरान, सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में हिंदी के आलोचक और मेरे शिक्षक (गाइड) वीर भारत तलवार ने लगभग धकेलते हुए मुझे कहा कि देखो, अडूर गोपालकृष्णन वहाँ बैठे हैं, जाओ बात करो!

मैं उनके पास जाकर बैठ गया. लौटा तो मैंने सर से कहा कि उनसे एफटीआईआई, ऋत्विक घटक की बातें की और क्या बातें करता, उनकी फिल्में ही नहीं देखी है. सर ने कहा, ठीक कहते हो बिना फिल्म देखे क्या बात करते. खैर, बाद में मैंने उनकी फिल्में देखी और लंबी बातचीत की जो प्रकाशित भी हुई.

दो दशक पहले तक बिना सब-टाइटल के हिंदी के इतर फिल्में देखना बहुत मुश्किल था. फिल्म-समारोह में कभी-कभार फिल्में देखने को मिल जाती थी. साथ ही भारतीय सिने जगत में बॉलीवुड इतना हावी रहा है कि क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की चर्चा भी नहीं होती. बांग्ला फिल्में और खास कर सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक या मृणाल सेन जैसे फिल्मकार अपवाद रहे हैं.

पिछले दिनों द हिंदूअखबार से जुड़े पत्रकार एस आर प्रवीण की किताब टिकट टू केरला (द स्टोरी ऑफ मलयालम सिनेमा) प्रकाशित हुई जो केरल से बाहर रहने वाले, अन्य भाषाई दर्शकों को संबोधित है. यह किताब पाठकों को मलयालम सिनेमा के संवृद्ध इतिहास, परंपरा और वर्तमान फिल्मों से परिचय कराती है.

कोरोना महामारी के दौरान, ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से मलयालम में रिलीज हुई 'जलीकट्टू ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, ‘जोजी’, ‘आरकारियम’, ‘मालिक’ आदि मलयालम फिल्मों की खूब चर्चा हुई. लॉकडाउन के बीच मध्यवर्गीय दर्शकों ने इन फिल्मों को हाथों-हाथ लिया. ‘जोजी’ और ‘आरकारियम’ फिल्म में तो ‘लॉकडाउन’ और ‘मास्क’ के रूपक का कथ्य में खूबसूरती से निरूपण भी हुआ है.  प्रवीण इन फिल्मों को न्यू वेबकहते हैं. इसी क्रम में हाल के वर्षों में काथल, आतम, उलोझक्कू जैसी फिल्मों ने खूब सुर्खियां बटोरी.

पिछले एक दशक में बनी मलयालम फिल्मों को देखकर हम कह सकते हैं कि मलयालम सिनेमा में यह एक नए युग की शुरुआत है जहाँ पॉपुलर और समांतर की रेखा मिट रही है. कम लागत से बनने वाली इन फिल्मों में नई विषय-वस्तु  और सहज अभिनय पर जोर है. यही कारण है कि फहाद फासिल जैसे कुशल अभिनेता (कुंबलंगी नाइट्स, जोजी, मालिक) की हिंदी दर्शकों के बीच भी खूब प्रशंसा हुई.

सत्तर-अस्सी के दशक में समांतर सिनेमा की धारा को मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, के जी जार्ज, जी अरविंदन, शाजी करुण ने संवृद्ध किया था. उनकी फिल्मों ने मलयालम सिनेमा को देश-दुनिया में स्थापित किया, पर उसके बाद ऐसा लगा कि कथ्य और शैली में मलयालम सिनेमा पिछड़ गई.

प्रवीण लिखते हैं कि सदी के पहले दशक के आखिरी वर्षों में मलयालम मुख्यधारा की फिल्मों में बदलाव की शुरुआत होती है. दर्शकों को सिनेमाघरों में कुछ भी सार्थक देखने को नहीं मिल रहा था और वे थिएटर से मुंह मोड़ रहे थे. लेखक अंजलि मेनन की चर्चित फिल्म 'बैंगलोर डेज' (2008) और अलफोंस पुथरेन की प्रेमम (2015) फिल्म की खास तौर पर चर्चा करते हैं. सांई पल्लवी ने प्रेमम फिल्म से सिने जगत में प्रवेश किया.

हाल के वर्षों में रिलीज हुई मलयालम फिल्में केरल के समाज में रची-बसी है. इन फिल्मों में जाति, लिंग का सवाल और राजनीतिक स्वर भी मुखर रूप से व्यक्त हुआ है, जो बॉलीवुड में इन दिनों मुश्किल से सुनाई पड़ता है.

जियो बेबी की ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ जब रिलीज हुई तब हिंदी क्षेत्र में सोशल मीडिया पर इस फिल्म को लेकर काफी बहस हुई थी. ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ की शुरुआत ‘द ग्रेट इंडियन ड्रामा’ यानी शादी से होती है. इस फिल्म के केंद्र में एक शादी-शुदा जोड़ा है. घर-परिवार के सदस्यों के रिश्ते, धर्मसत्ता, पितृसत्ता और खासकर स्त्रियों के साथ मध्यवर्गीय परिवार में जो लैंगिक भेदभाव है उसे रसोईघर के माध्यम से खूबसूरती से निरूपित किया गया है. फिल्म में अपनी इच्छाओं, डांस के प्रति अपने लगाव को दबा कर अदाकार निमिषा सजयन सुबह-दोपहर-शाम घर के पुरुषों की ‘क्षुधा’ शांत करने की फिक्र में रहती है, पर उसकी फिक्र किसे है! पुरुष भोजनभट्ट हैं. अखबार पढ़ने में, योग करने में मशगूल हैं, वहीं स्त्री नमक-तेल-हल्दी की चिंता में आकंठ डूबी हुई है.

इस फिल्म को देखते हुए मुझे हिंदी के कवि रघुवीर सहाय की कविता ‘पढ़िए गीता’ की याद आती रही: पढ़िए गीता/ बनिए सीता/ फिर इन सब में लगा पलीता/किसी मूर्ख की हो परिणीता/निज घर-बार बसाइए/ होंय कँटीली/आँखें गीली/लकड़ी सीली, तबियत ढीली/घर की सबसे बड़ी पतीली/ भरकर भात पसाइए. हालांकि फिल्म में निमिषा सजयन ने जिस किरदार को निभाया है वह न गीता पढ़ती है, न सीता ही बनती है. एक विद्रोही चेतना से वह लैस है. यह चेतना फिल्म के आखिर में दिखाई पड़ती है जिसे एक ‘डांस स्वीकेंस’ के माध्यम से निर्देशक ने फिल्माया है. एक तरह से यह फिल्म भारतीय समाज में व्याप्त सामंती प्रवृत्तियों का नकार है. यह फिल्म भले ही मलयाली समाज में रची-बसी हो पर अपनी व्याप्ति में अखिल भारतीय है और यही वजह है कि निर्देशक ने पात्रों को कोई नाम नहीं दिया है.

फिल्म के रिलीज होने के बाद मैंने जियो बेबी से बातचीत में पूछा था कि द ग्रेट इंडियन किचन’ बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया? उन्होंने कहा था असल में शादी के बाद मेरे मन में अपनी पत्नी के साथ किचन में काम करने ख्याल आया. तब मैंने अपनी माँ, बहन और बीवी के बारे में सोचा. मेरे लिए किचन एक जेल की तरह रहा. फिर मुझे अपनी स्वतंत्रता का अहसास हुआ. साथ ही मेरे मन में सवाल उठे कि हम तो पुरुष हैं, लेकिन स्त्रियों की आजादी का क्या? मैंने निश्चय किया कि किचन जो स्त्रियों के लिए एक बेड़ी है उसे लेकर मुझे फिल्म बनानी है.

हालिया मलयालम न्यू वेब एक परंपरा का विकास है, जिसके जड़े गहरी है. उल्लेखनीय है कि के जी जार्ज की ‘अदामिंते वारियेल्लू’ का प्रभाव द ग्रेट इंडियन किचन पर दिखाई देता है. लेखक ने 1970 के दशक के न्यू वेब से जुड़े प्रमुख फिल्मकारों अडूर गोपालकृष्णन, जी अरविंदन, जॉन अब्राहम, शाजी करुण का उल्लेख किया है. इस क्रम में अडूर के साथ एक लंबी बातचीत भी किताब में शामिल है.

उल्लेखनीय है कि अडूर की फिल्म स्वयंवरम’ (1972) से मलयालम सिनेमा में समांतर सिनेमा की धारा की शुरुआत मानी जाती है. इस फिल्म के बारे में टिप्पणी करते हुए फिल्म समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता (सीइंग इज विलिविंग: 248)  ने लिखा है- “स्वंयवरम में जो नवाचार के दर्शन हुए उसने केरला और उसके सिनेमा जगत को चकित कर दिया था.” इस फिल्म में मनोरंजन प्रधान व्यावसायिक सिनेमा के फार्मूले को धता बताते हुए कोई नाच-गाना नहीं था. पूरी फिल्म को वास्तविक लोकेशन पर ही शूट किया गया था. यह फिल्म दो युवा प्रेमी विश्वनाथ और सीता के माध्यम से समाज और व्यक्ति के बीच संघर्ष और स्वाधीनता के सवाल को चित्रित करती है. इसे फिल्म को ऑपरेटिव, चित्रलेखा ने प्रोड्यूस किया था. किताब में प्रवीण ने चित्रलेखा फिल्म सोसाइटी (जिसके निर्माण में एफटीआईआई से निकले युवा फिल्मकारों का भूमिका रही) के माध्यम से केरल में सिनेमाई संस्कृति के निर्माण को अलग से रेखांकित किया है. लेखक ने अडूर के हवाले से लिखा है कि हमने तीन सूत्री योजना बनाई जिसके तहत केरल में फिल्म सोसाइटी आंदोलन  को शुरू करने, सिनेमा पर उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित करने और गुणवत्ता से संपन्न फिल्मों का निर्माण शामिल था.

यहां पर यह नोट करना उचित होगा कि अडूर ने अपने पूरे फिल्मी करियर के दौरान कमर्शियल फिल्मों के दायरे से बाहर रहे. सिनेमा निर्माण के व्यावसायिक दायरे से बाहर रहने के कारण उन्होंने पूरे करियर में महज बारह फिल्में ही निर्देशित किया है. गौरतलब है कि अडूर विषय-वस्तु के लिहाज से किसी फिल्म में खुद को दोहराया नहीं. उनकी फिल्मी यात्रा को देखने पर यह स्पष्ट है. जहाँ ‘एलिप्पथाएम’ में आजादी के बाद के सामंती समाज और घुटन का चित्रण है वहीं ‘मुखामुखम’ में एक मार्क्सवादी राजनीतिक कार्यकर्ता फिल्म के केंद्र में है. ‘अनंतरम’ में एक फिल्मकार की रचना प्रक्रिया से हम रू-ब-रू होते हैं, जहां यथार्थ और कल्पना में सहज आवाजाही है. यहाँ रचनाकार के सामने शाश्वत सवाल है कि हम रचें कैसे? वहीं ‘मतिलुकल’ में ‘स्वयंवरम’ की तरह स्वतंत्रता एवँ मुक्ति का प्रश्न प्रमुखता से उभरा है, हालांकि फिल्म निर्माण की दृष्टि से अनंतरम के करीब है. ‘कथापुरुषन’ में आत्मकथात्मक स्वर है, इस फिल्म में सामंती हदबंदियों को तोड़ा गया है. फिल्म की शूटिंग भी उन्होंने अपने पुश्तैनी घर में ही की. अडूर का सिनेमा आजादी के बाद परंपरा और आधुनिकता के कशमकश को, केरल की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को, बदलती हुई राजनीति के परिप्रेक्ष्य में निरूपित करता है. यहां विभिन्न स्तरों पर विस्थापन और अस्मिता की खोज मौजूद है.

इस किताब को प्रवीण ने विभिन्न निर्देशकों, सिनेमेटोग्राफरों और सिने जगत से जुड़े अन्य लेखक-कलाकारों से बातचीत के बाद तैयार की है. किताब के बीच-बीच में लंबे इंटरव्यू दिए गए हैं जो कई बार पाठकों के लिए पढ़ने के प्रवाह के दौरान बाधा बन कर आता है. साथ ही किताब में रेफरेंस लिस्टका न होना खटकता है.

चूंकि किताब का लेखक एक पत्रकार है इस लिहाज से इसमें हाल में मलयालम सिनेमा जगत में स्त्री कलाकारों के शोषण, भेदभाव पर जो बहस हुई उस पर टिपप्णी भी शामिल है. वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव (डब्लूसीसी) के दखल से बनी जस्टिस हेमा कमिटी के रिपोर्ट की विस्तार से चर्चा है.

फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के स्नातक, अन्नायूम रसूलम (2013) फिल्म से चर्चा में आए राजीव रवि (गैंग्स ऑफ वासेपुर के सिनेमैटोग्राफर) पुणे के दिनों को याद करते हुए एक जगह कहते हैं कि ऋत्विक घटक की मेघे ढाका तारा के आखिरी हिस्से को वे खूब देखते थे. रोने के लिए वे इसे देखा करते थे! प्रसंगवश, अडूर भी बातचीत में मेघे ढाका तारा को खूब शिद्दत से याद करते हैं. फिल्म संस्थान में घटक उनके गुरु रहे. मलयालम सिनेमा के प्रगतिशील इतिहास के निर्माण में फिल्म संस्थान पुणे की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

मलयालम सिनेमा की शुरुआत वर्ष 1930 में बनी विगाथाकुमारन फिल्म से होती है जिसे जे सी डेनियल ने निर्देशित किया था. करीब सौ साल के इतिहास की यात्रा को लेखक ने इस किताब में समेटा है. शैली कहानी कहने की है. पर यहां विश्लेषण और आलोचनात्मक दृष्टि का अभाव है.

अंत में, मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल को पिछले दिनों सिनेमा में योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, वहीं ममूटी को पद्म भूषण दिया गया. जब मैंने जियो बेबी से मोहन लाल के अवदान के बार में पूछा तब उनका कहना था, ‘यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मैं मोहनलाल के अभिनय करियर के दौरान जीवित हूँ.  उनके कुछ अभिनय, उनकी हंसी, और सिनेमा से बाहर की गई कुछ बातें—इन सबने मुझे एक निर्देशक और इंसान के रूप में गहराई से प्रभावित किया है. मोहनलाल एक चमत्कार हैं—ऐसा चमत्कार जो कभी-कभी ही होता है.’ वहीं ममूटी के अभिनय की विशेषता यह है कि फिल्मी दुनिया के दोनों पाटों-देसी और मार्गी, उन्होंने एक साथ साधा है. एक तरफ व्यावसायिक सिनेमा में स्टार की हैसियत से उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, वहीं दूसरी तरफ सधे, भाव-पूर्ण अभिनय से उन्होंने कला फिल्मों में अपनी काबिलियत को साबित किया. ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘महायानम’ और ‘किंग’ जैसी फिल्मों के साथ ‘मेला’, ‘यवनिका’, ‘अनंतरम’, ‘विधेयन’ और ‘मतिलुकल’ जैसी कलात्मक फिल्में भी उनके खाते में है. यहां नोट करना उचित होगा कि प्रयोग करने, नए निर्देशकों के साथ काम करने में उन्हें गुरेज नहीं है. किताब में संक्षेप में मलयालम सिनेमा के इन प्रसिद्ध कलाकारों के बार में भी जानकारी दी गई है.

(समालोचन के लिए)

Sunday, April 05, 2026

युद्ध के बीच रंगमंच पर ‘आइंस्टीन’

 
मशहूर अदाकार नसीरुद्दीन शाह अपने सोलो नाटक ‘आइंस्टीन’ को लेकर दर्शकों के बीच करीब दस वर्षों से आते रहे हैं, पर युद्ध और विध्वंस की खबरों की बीच यह नाटक जितना आज प्रासंगिक हो उठा है शायद ही कभी रहा हो.

जीनियस भौतिक शास्त्री अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन वृत्त को समेटे, ग्रैबिएल इमैनुएल के लिखे इस नाटक का मंचन जब ‘श्रीराम लागू रंग अवकाश’, पुणे में हो रहा था, आसमान में तारों की चमक खो सी गई थी. अमेरिका को कोसते हुए आइंस्टीन जब कहते हैं-‘या तो आप युद्ध के साथ होते हैं या उसके विरुद्ध!’, ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच हो रहे जंग की अनुगूंज साफ सुनाई दे रही थी. कला या साहित्य युद्ध रोक नहीं पाता पर यथार्थ से वह हमें रोज रू-ब-रू करवाता है.
पचहत्तर वर्षीय शाह जैसे ही आइंस्टीन के किरदार में प्रवेश करते हैं हम भूल जाते हैं कि वह हमारे बीच के अदाकार हैं, एक वैज्ञानिक नहीं! साक्षेपता के सिद्धांत या गुरुत्वाकर्षण की बात करते हुए वे एक कुशल शिक्षक जैसे विश्वसनीय लगते हैं. गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को समझाते हुए एक सीन के दौरान उन्होंने दो दर्शक को भी मंच पर बुला लिया, जो कि मेरे लिए अप्रत्याशित था.
शाह इस नाटक में छिहत्तर वर्षीय आइंस्टीन (1879-1955) के व्यक्तित्व को बेहद खूबसूरती से हमारे सामने लाते हैं. अपने हाव-भाव, भंगिमा, विट से वे दर्शकों को एक ऐसे हाड़-मांस के व्यक्ति से साक्षात्कार करवाते हैं जो युदध के, एटम बम के खिलाफ था, एक पैसेफिस्ट (अमन पसंद) था. उसके सब सिद्धांत, प्रमेय मानवता के लिए थे, उसके खिलाफ नहीं. आइंस्टीन अपनी सीमाओं के बावजूद विश्वसनीय लगते हैं.
एकालाप में आइंस्टीन अपने बचपन, स्कूल, नाजी जर्मनी और अमेरिकी युद्ध लिप्सा की हमसे बातें करते हैं. इस फ्लैशबैक में मंच पर कुछ तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह नाटक बिना किसी ताम-झाम के हमारे सामने खुलता है. बेहद सामान्य एक कमरे का सेट (स्टडी रूम), जिसमें चारों तरफ किताबें फैली हुई है, हैंगर पर कोट टंगा है, एक मेज, ब्लैक बोर्ड, वायलिन, जूते और ऐसी ही कुछ मामूली सी चीजें. समकालीन नाटकों में म्यूजिकल का जोर बढ़ा है, जो लोगों का मनोरंजन में सहायक होता है. इसके विपरीत शाह के नाटकों मसलन, ‘इस्मत आपा के नाम’, ‘फादर’, ‘आंइस्टाइन’ जैसे में शाह का जोर संवाद और अभिनय पर रहता आया है.
शाह अपने बेहद प्रभावी और रोचक अभिनय के दम पर दर्शकों को करीब डेढ़ घंटे तक बांधे रखते हैं. कभी अपने मौजे को तलाशते, तो कभी वायलिन के ‘बो’ तलाशते आइंस्टीन बेहद सहज लगते हैं. नाटक में एक जगह वह किस्सा सुनाते हैं कि शादी की रात जब वे अपनी पत्नी के साथ घर लौटे, तब उन्हें एहसास हुआ कि वे चाबी भूल गए हैं. बीच-बीच में हास्य का पुट इस नाटक को बोझिल नहीं बनने देता.
पिछले पैतालीस वर्षों में एक साथ हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में ‘मोटले प्रोडक्शन’ ने विभिन्न प्रस्तुतियों के जरिए रंगमंच को संवृद्ध किया है. उम्र के इस पड़ाव पर आइंस्टीन का किरदार निभाते नसीरुद्दीन शाह को रंगमंच पर देखना सुकून देता है.

Sunday, March 29, 2026

अनुपस्थिति पिता की: सेंटिमेंटल वैल्यू



इस बार ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ के लिए ऑस्कर पुरस्कार जोआकिम ट्रायर निर्देशित ‘सेंटिमेंटल वैल्यू’ को मिला. यह पहली नॉर्वेजियन फिल्म है जिसे यह सम्मान मिला है. भारत की तरफ से नीरज घेवान की फिल्म ‘होमबाउंड’ की भी दावेदारी थी, पर अंतिम नामांकन में फिल्म जगह नहीं बना पाई.

बहरहाल, ट्रायर की फिल्म स्थानीय होते हुए अपनी अपील में वैश्विक है. असल में, पिता-पुत्री के संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती यह फिल्म घर, परिवार, रिश्ते, अहं और अकेलेपन को टटोलती है. नोरा (रेनेट रेंसवे) और अग्नेस (इंगा लिलिआस) दो बहनें है जिनके अपने पिता गुस्ताव (स्टेलन स्कार्सगार्ड) के साथ संबंध मधुर नहीं रहे. अपनी पत्नी से तलाक के बाद गुस्ताव, जो कि एक सफल फिल्मकार हैं, नार्वे छोड़ कर स्वीडन में रहने लगे, पर पत्नी की मौत के बाद उनका साक्षात्कार अपनी बेटियों से होता है. नोरा एक सफल थिएटर कलाकार है. जहाँ अग्नेस का अपना परिवार है वहीं नोरा अंतर्मन के द्वंदों से लड़ती अकेली रहती है. गुस्ताव लंबे समय के अंतराल के बाद एक पटकथा पर काम कर रहे हैं जो आत्मकथात्मक है और नोरा को ध्यान में रख कर ही उन्होंने लिखा है. वे चाहते हैं कि नोरा इस फिल्म में काम करे पर नोरा यह कहते हुए इंकार कर देती है ‘हमारे बीच संवाद ही कहां हैं’!
फिल्म नोरा के अंतर्मन पर पिता की अनुपस्थिति और भावात्मक विलगाव के प्रभावों को संवेदनशीलता से उकेरती है. जहां अग्नेस अपेन पिता के प्रति सहृदय है, वहीं नोरा निर्मम. यहां संवाद से ज्यादा संवादहीनता है. गुस्ताव नशे में फोन पर नोरा से कहते हैं: ‘मैं संवेदनशील हूँ, जो कि तुम भी हो और इन अर्थों में हम समान हैं.’ गुस्ताव उसी पुश्तैनी घर में फिल्म को शूट करना चाहते हैं, जिसे वो छोड़ चुके हैं. घर का बिंब फिल्म में बार-बार, विभिन्न दृश्यों में अगल तरीके से आता है.
एक भावनात्मक लगाव किरदारों का इस घर से है. सारा ड्रामा घर के इर्द-गिर्द ही घटता है. जहाँ निर्देशक काव्यात्मक दृश्यों को रचता है, वही अभिनय से कलाकार सफेद और स्याह के बीच के स्पेस को जीवन के रंग से भरता है. और जहाँ कहीं खाली स्पेस बचा‌ रहता है, उसके लिए निर्देशक ने बैंकग्राउंड संगीत का कुशलता से इस्तेमाल किया है.
मशहूर फ्रेंच फिल्म निर्दशक रॉबर्ट ब्रेसां ने एक जगह नोट किया है: ‘बिंब और ध्वनियाँ उन लोगों की तरह होती हैं जो यात्रा में एक-दूसरे से परिचित होते हैं और बाद में अलग नहीं हो पाते.’ इस फिल्म की यात्रा में दो बहनों के बहिनापे, एक संवेदनशील पिता और पुत्री की ‘कलात्मक स्वतंत्रता’, अहं, बचपने में मनोमस्तिष्क पर पड़े प्रभावों को बिना वाचाल हुए कैमरा सहजता से बिंबों (फ्लेशबैक) और ध्वनियों के सहारे सामने लाता है. आखिर में, नोरा अपने पिता की फिल्म में काम करती है और दोनों की आपसी दूरियाँ सिमट आती है.
ट्रायर की फिल्म ‘द वर्स्ट पर्सन न द वर्ल्ड’ में रेनेट रेंसवे की अदाकारी को सबने सराहा था. एक बार फिर से इस फिल्म में अपनी प्रतिभा से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने लोगों ध्यान खींचा है. साथ ही स्टेलन स्कार्सगार्ड का अभिनय भी उत्कृष्ट है.

Saturday, March 14, 2026

त्रिवेणी कला संगम के 75 साल

 मशहूर कलाकार मकबूल फिदा हुसैन की एक पेंटिंग है जिसमें एक घोड़ा नृत्य कर रहा है, दूसरा सितार बजा रहा है और तीसरा पेंटिंग कर रहा है. कला की यह त्रिवेणी हुसैन ने नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी के लिए बनाई थी, जब वे 70 के दशक में मंडी हाउस स्थित ‘त्रिवेणी’ में अड्डा जमाते थे.आजाद भारत की सांस्कृतिक गतिविधियों, शिक्षण-प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र रहा त्रिवेणी कला संगम के 75 साल पूरे हुए हैं.

नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी ने महज दो कमरो से ‘त्रिवेणी’ की यात्रा कनॉट प्लेस से शुरु की थी, फिर वर्ष 1962 में मंडी हाउस का बेसमेंट इसका ठिकाना बना. देश की आजादी के समय
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
खास कर हिंदी थिएटर के विकास की कथा ‘त्रिवेणी’ के बिना अधूरी है. पुराने जमाने के लोग आज भी बी वी कारंत, हबीब तनवीर, शीला भट्ट (दिल्ली आर्ट थिएटर), ओम शिवपुरी (दिशांतर) के नाटकों को याद करते हैं. इब्राहिम अल्काजी और बैरी जॉन ने यहाँ पर अपनी प्रोडक्शन की प्रस्तुतियाँ दी.
साथ ही वर्ष 1972 में स्थापित फैसल अल्काजी के ‘रुचिका थिएटर ग्रुप’ के कई नाटकों ने यहीं पर रूप ग्रहण किया था. चर्चित वास्तुशिल्पी जोसेफ स्टेन का बनाया तानसेन मार्ग पर स्थित मौजूदा केंद्र देश के नाट्यकर्मियों, नर्तकों, कला प्रेमियों का आज भी एक महत्वपूर्ण ठौर बना हुआ है. साथ किंवदंती बन चुके ‘त्रिवेणी कैफे’ युवा कलाकारों, छात्रों, पत्रकारों, नाट्यकर्मियों को लुभाता है. जब हम शाम में एक मित्र के साथ त्रिवेणी कैफे में बैठे थे, खूबसूरत खुले सभागार में ‘छऊ’ नाट्य शैली में एक प्रस्तुति की तैयारी चल रही थी.
इतिहास के झरोखों से कलाप्रेमियों को रू-ब-रू करवाने के लिए एक प्रदर्शनी समेत अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. त्रिवेणी से जुड़ी अपनी स्मृतियों को फैसल अल्काजी इस हफ्ते एक संवाद में साझा करेंगे.
न सिर्फ मकबूल फ़िदा हुसैन बल्कि ओडिसी नृत्य के प्रसिद्ध नर्तक केलु चरण महापात्र, फोटोग्राफर ओ पी शर्मा का त्रिवेणी से गहरा जुड़ाव रहा. शुरुआती दौर में मणिपुरी नृत्य के सिद्ध कलाकार एवं गुरु नबा कुमार इससे जुड़ गए थे. नबा कुमार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में मणिपुरी नृत्य के शिक्षक थे, जहाँ पर सुंदरी श्रीधरानी छात्र थी. बाद में उदय शंकर के अल्मोड़ा स्थित ‘इंडिया कल्चर सेंटर’ में उन्होंने नृत्य की शिक्षा ग्रहण की थी. गुरुदत्त और जोहरा सहगल उनके सहपाठी थे.
75 साल पूरे होने के अवसर पर नर्तकों के लिए लिखी श्रीधरानी की पुस्तक ‘अ डांसर प्रिपेयर्स’ का पुनर्प्रकाशन किया गया है. इस किताब की शुरुआती पंक्ति है: 'डांस करने से पहले हम चलना सीखें. चलने से पहले हम किस तरह खड़े हों यह सीखें’. डांस सीख रहे युवाओं को संबोधित करती यह पतली-सी किताब महत्वपूर्ण है.

Sunday, March 01, 2026

पिता-पुत्री के संबंधों की संवेदनशील पड़ताल: One Battle After Another


 क्या चर्चित फिल्म निर्देशक पॉल थॉमस एंडरसन ऑस्कर पुरस्कार पाने में इस बार सफल होंगेयह सवाल सिनेमा प्रेमियों के मन में हैं. असल में उनकी फिल्म वन बैटल आफ्टर अनदर को 98वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए 13 नॉमिनेशन मिले हैं, जिसमें बेहतरीन फिल्मनिर्देशकअभिनेतासह-अभिनेता आदि शामिल हैं. उल्लेखनीय है कि रेयान कूगलर निर्देशित फिल्म 'सिनर्स’ को 16 नामांकन मिले हैं.

पिंचन के वर्ष 1990 में प्रकाशित उपन्यास ‘विनलैंडसे प्रेरित यह फिल्म अमेरिकी समाज और राजनीति की पड़ताल करती हैपर बिना मुखर हुए. समकालीनता, ट्रंप युग पैबस्त है इस फिल्म में.

यह एक ब्लैक कॉमेडी हैजिसमे लियोनार्डो डिकैप्रियो एक क्रांतिधर्मी पिता के किरदार के रूप में दिखाई देते हैं. प्रसंगवश, एंडरसन और पिंचन की जोड़ी ने वर्ष 2014 में इनहेरेंट वाइस को परदे पर साकार किया था.  इस फिल्म को रचनात्मक रूप से परदे पर लाने में एंडरसन को करीब बीस वर्ष लग गए और उनकी रचनात्मक प्रक्रिया को मुकम्मल रूप से हम इस फिल्म में देखते-परखते हैं. आश्चर्य नहीं कि समकालीन फिल्मकारों में एंडरसन का नाम का ऊपर आता है.

बहरहाल, घेटो (डिकैप्रियो) और उनकी पार्टनर परफेडिया बेवर्ली हिल्स (टेयाना टेलर) फ्रेंच 75 नाम एक एक चरमपंथी संस्था से जुड़े रहे जो अमेरिकी समाज में बराबरी लाने की लड़ाई के लिए हिंसा का सहारा लेता है. परफेडिया बंदूक लहराती हुई उद्घोषणा करती हैखुली सीमाएँस्वतंत्र विकल्पस्वतंत्र शरीर और भय से मुक्ति. लेकिन इसी तरह की हिंसा की एक कार्रवाई जब असफल होती है तब उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है. घेटो अपनी नवजात बेटी और नई पहचान के साथ एक सहज जीवन जीने की कोशिश करते हैं, पर उनके पीछे कर्नल लॉकजाउ (शॉन पेन) पड़े है. पेन का अभिनय अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है. उनका हाव-भाव, अंदाज जुगुप्सा और हास्य एक साथ पैदा करता है.

बॉब एक वेबजह की जिंदगी जी रहे होते हैं. नशे का सहारा और पुरानी क्रांतिकारी फिल्मों को देखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है, पर सोलह साल बाद अतीत बॉब का पीछा करता है. इस बार केंद्र में उनकी पार्टनर नहीं बल्कि बेटी (चेज इनफिनिटी) है. 

दौड़-भाग के सिनेमाई वृत्तांत को एंडरसन ने खूबसूरती से बुना है. इस तरह एक मुकम्मल सिनेमा को हम देखते हैं. बिंब और ध्वनि का संयोजन दर्शकों को बांधे रखता है. थोड़ी लंबी होने का बावजूद फिल्म का स्क्रीनप्ले इसे बोझिल नहीं बनने देता है. सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक इस फिल्म का मजबूत पक्ष है.

सीक्रेट कोड भूल चूके, अस्त-व्यस्त, ड्रेसिंग गाउन में सड़कों पर भागते, फोन बूथ पर झुंझलाते, बेटी को तलाशते बॉब हास्य पैदा करते हैं, वहीं वीरान सड़कों पर कार का पीछा करते हुए जब वे दिखते हैं तब यह फिल्म एक्शन थ्रिलर का रोमांच पैदा करती है.

यह फिल्म पूरी तरह से अमेरिकी समकालीन संस्कृति में रची बसी है जहाँ  अमेरिकी-मेक्सिको सीमा पर प्रवासियों के समूह के घेराबंदी में हम समकालीन राजनीतिक अनुगूंज और हास्यास्पद नस्लीय श्रेष्ठता बोध एक साथ हम देखते हैं. एक अलग स्तर पर जाकर यह फिल्म क्रांतिधर्मी पिता-पुत्री के संबंधों की संवेदनशील पड़ताल करती है.  

Sunday, February 01, 2026

सत्य की खोज में पत्रकार: सेमोर हर्श


पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री कवर-अप बेहद प्रासंगिक है. वैसे तो यह वृत्तचित्र चर्चित अमेरिकी खोजी पत्रकार सेमोर हर्श की पत्रकारिता की यात्रा को समेटे है, पर हम इसमें अमेरिका की वर्तमान कारगुजारियों की ध्वनि भी सुन सकते हैं. वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण या ईरान पर हमले की बार-बार चेतावनी के बरक्स यदि हम कवर-अप’ में शामिल दुनिया में अमेरिकी हस्तक्षेप और हिंसा को देखे तो पाते हैं कि एक पत्रकार की नजर में पत्रकारिता लोक सेवा है जिसका काम उन तथ्यों को उजागर करना है जिसे सत्ता आम जनता से छिपाना चाहती है. इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का जुमला राजनीतिक सत्ता के हमेशा काम आता है.

इस डॉक्यूमेंट्री के लिए निर्देशक लाउरा पॉयट्रैस और मार्क ओबेनहाउस पिछले बीस साल से 88 वर्षीय हर्श के पीछे पड़े थे. जैसा कि हम जानते हैं खबरों के पीछे रहने वाला खबर होने से हमेशा बचना चाहता है. हर्श के नाम कई ऐसी खबरें रही है जिसने अमेरीकी सत्ता को लोकहित के सामने झुकने को मजबूर किया है. हर्श उन घटनाओं का विवरण देते हैं.

वियतनाम युद्ध के दौरान माई लाय नरसंहार को उजागर कर हर्श ने सुर्खियाँ बटोरी थी, जिसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार (1970) से नवाजा गया.  इस नरसंहार में अमेरिकी सेना ने बर्बर तरीके से महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया था और इसे आम लोगों की नजर से छिपा कर रखा. हर्श की रिपोर्ट के बाद अमेरिकी जनता वियतनाम युद्ध के विरोध में सड़कों पर उतर आई.

बाद में वाटरगेट स्कैंडल’, इराक युद्ध के दौरान अबू गरीब जेल में अमेरीकी सेना की ज्यादतियों सहित उनके कई रिपोतार्ज ने अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में खलबली मचा दी थी.

बहरहाल, यह डॉक्यूमेंट्री जितना हर्श के पत्रकारीय जीवन वृत्त को ऑडियो-वीडियो फुटेज  के माध्यम से सामने लाती है उतनी ही अमेरिकी पत्रकारिता के एक दौर और दुरभिसंधियों को भी. एक जगह हर्श कहते हैं अमेरिकी इतिहास लिखना कितना मुश्किल है’.  पत्रकारिता का वर्तमान भविष्य का इतिहास बनता है यदि तथ्यों के प्रति हम जागरूक और सत्यनिष्ठ रहे. एक तरफ सूचना और संवाद करने की जिम्मेदारी पत्रकारों की है, वहीं पत्रकारिता सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पाद भी है. हर्श कहते हैं कि हमारी संस्कृति अत्यधिक हिंसक है.  ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसा हमारे घर में हो और हम दूसरी तरफ नज़र फेर लें’.  पर दुर्भाग्य से आज ऐसी कई खबरें हमारे सामने से गुजर जाती है जिसकी तह में जाने की जहमत मीडियाकर्मी नहीं उठाते. सत्ता के सच को ही सूत्रों के हवाले’ से पाठकों, दर्शकों के सामने परोस देते हैं.

इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हम यह भी देखते हैं कि किस तरह अमेरिकी जनता का एक हिस्सा हर्श को उनकी सच्चाई के लिए नापसंद करता रहा. पर हर्श सत्ता से बेलाग सच कहने से हिचके नहीं. पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में भी लोग सत्य’ को तथ्य के आधार पर नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर जाँचते-परखते हैं.

उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय, इस डॉक्यूमेंट्री में बेहद संक्षिप्त लेकिन हर्श के निजी जीवन से भी दर्शकों का साक्षात्कार होता है.