Saturday, March 14, 2026

त्रिवेणी कला संगम के 75 साल

 मशहूर कलाकार मकबूल फिदा हुसैन की एक पेंटिंग है जिसमें एक घोड़ा नृत्य कर रहा है, दूसरा सितार बजा रहा है और तीसरा पेंटिंग कर रहा है. कला की यह त्रिवेणी हुसैन ने नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी के लिए बनाई थी, जब वे 70 के दशक में मंडी हाउस स्थित ‘त्रिवेणी’ में अड्डा जमाते थे.आजाद भारत की सांस्कृतिक गतिविधियों, शिक्षण-प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र रहा त्रिवेणी कला संगम के 75 साल पूरे हुए हैं.

नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी ने महज दो कमरो से ‘त्रिवेणी’ की यात्रा कनॉट प्लेस से शुरु की थी, फिर वर्ष 1962 में मंडी हाउस का बेसमेंट इसका ठिकाना बना. देश की आजादी के समय
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
खास कर हिंदी थिएटर के विकास की कथा ‘त्रिवेणी’ के बिना अधूरी है. पुराने जमाने के लोग आज भी बी वी कारंत, हबीब तनवीर, शीला भट्ट (दिल्ली आर्ट थिएटर), ओम शिवपुरी (दिशांतर) के नाटकों को याद करते हैं. इब्राहिम अल्काजी और बैरी जॉन ने यहाँ पर अपनी प्रोडक्शन की प्रस्तुतियाँ दी.
साथ ही वर्ष 1972 में स्थापित फैसल अल्काजी के ‘रुचिका थिएटर ग्रुप’ के कई नाटकों ने यहीं पर रूप ग्रहण किया था. चर्चित वास्तुशिल्पी जोसेफ स्टेन का बनाया तानसेन मार्ग पर स्थित मौजूदा केंद्र देश के नाट्यकर्मियों, नर्तकों, कला प्रेमियों का आज भी एक महत्वपूर्ण ठौर बना हुआ है. साथ किंवदंती बन चुके ‘त्रिवेणी कैफे’ युवा कलाकारों, छात्रों, पत्रकारों, नाट्यकर्मियों को लुभाता है. जब हम शाम में एक मित्र के साथ त्रिवेणी कैफे में बैठे थे, खूबसूरत खुले सभागार में ‘छऊ’ नाट्य शैली में एक प्रस्तुति की तैयारी चल रही थी.
इतिहास के झरोखों से कलाप्रेमियों को रू-ब-रू करवाने के लिए एक प्रदर्शनी समेत अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. त्रिवेणी से जुड़ी अपनी स्मृतियों को फैसल अल्काजी इस हफ्ते एक संवाद में साझा करेंगे.
न सिर्फ मकबूल फ़िदा हुसैन बल्कि ओडिसी नृत्य के प्रसिद्ध नर्तक केलु चरण महापात्र, फोटोग्राफर ओ पी शर्मा का त्रिवेणी से गहरा जुड़ाव रहा. शुरुआती दौर में मणिपुरी नृत्य के सिद्ध कलाकार एवं गुरु नबा कुमार इससे जुड़ गए थे. नबा कुमार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में मणिपुरी नृत्य के शिक्षक थे, जहाँ पर सुंदरी श्रीधरानी छात्र थी. बाद में उदय शंकर के अल्मोड़ा स्थित ‘इंडिया कल्चर सेंटर’ में उन्होंने नृत्य की शिक्षा ग्रहण की थी. गुरुदत्त और जोहरा सहगल उनके सहपाठी थे.
75 साल पूरे होने के अवसर पर नर्तकों के लिए लिखी श्रीधरानी की पुस्तक ‘अ डांसर प्रिपेयर्स’ का पुनर्प्रकाशन किया गया है. इस किताब की शुरुआती पंक्ति है: 'डांस करने से पहले हम चलना सीखें. चलने से पहले हम किस तरह खड़े हों यह सीखें’. डांस सीख रहे युवाओं को संबोधित करती यह पतली-सी किताब महत्वपूर्ण है.

Sunday, March 01, 2026

पिता-पुत्री के संबंधों की संवेदनशील पड़ताल: One Battle After Another


 क्या चर्चित फिल्म निर्देशक पॉल थॉमस एंडरसन ऑस्कर पुरस्कार पाने में इस बार सफल होंगेयह सवाल सिनेमा प्रेमियों के मन में हैं. असल में उनकी फिल्म वन बैटल आफ्टर अनदर को 98वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए 13 नॉमिनेशन मिले हैं, जिसमें बेहतरीन फिल्मनिर्देशकअभिनेतासह-अभिनेता आदि शामिल हैं. उल्लेखनीय है कि रेयान कूगलर निर्देशित फिल्म 'सिनर्स’ को 16 नामांकन मिले हैं.

पिंचन के वर्ष 1990 में प्रकाशित उपन्यास ‘विनलैंडसे प्रेरित यह फिल्म अमेरिकी समाज और राजनीति की पड़ताल करती हैपर बिना मुखर हुए. समकालीनता, ट्रंप युग पैबस्त है इस फिल्म में.

यह एक ब्लैक कॉमेडी हैजिसमे लियोनार्डो डिकैप्रियो एक क्रांतिधर्मी पिता के किरदार के रूप में दिखाई देते हैं. प्रसंगवश, एंडरसन और पिंचन की जोड़ी ने वर्ष 2014 में इनहेरेंट वाइस को परदे पर साकार किया था.  इस फिल्म को रचनात्मक रूप से परदे पर लाने में एंडरसन को करीब बीस वर्ष लग गए और उनकी रचनात्मक प्रक्रिया को मुकम्मल रूप से हम इस फिल्म में देखते-परखते हैं. आश्चर्य नहीं कि समकालीन फिल्मकारों में एंडरसन का नाम का ऊपर आता है.

बहरहाल, घेटो (डिकैप्रियो) और उनकी पार्टनर परफेडिया बेवर्ली हिल्स (टेयाना टेलर) फ्रेंच 75 नाम एक एक चरमपंथी संस्था से जुड़े रहे जो अमेरिकी समाज में बराबरी लाने की लड़ाई के लिए हिंसा का सहारा लेता है. परफेडिया बंदूक लहराती हुई उद्घोषणा करती हैखुली सीमाएँस्वतंत्र विकल्पस्वतंत्र शरीर और भय से मुक्ति. लेकिन इसी तरह की हिंसा की एक कार्रवाई जब असफल होती है तब उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है. घेटो अपनी नवजात बेटी और नई पहचान के साथ एक सहज जीवन जीने की कोशिश करते हैं, पर उनके पीछे कर्नल लॉकजाउ (शॉन पेन) पड़े है. पेन का अभिनय अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है. उनका हाव-भाव, अंदाज जुगुप्सा और हास्य एक साथ पैदा करता है.

बॉब एक वेबजह की जिंदगी जी रहे होते हैं. नशे का सहारा और पुरानी क्रांतिकारी फिल्मों को देखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है, पर सोलह साल बाद अतीत बॉब का पीछा करता है. इस बार केंद्र में उनकी पार्टनर नहीं बल्कि बेटी (चेज इनफिनिटी) है. 

दौड़-भाग के सिनेमाई वृत्तांत को एंडरसन ने खूबसूरती से बुना है. इस तरह एक मुकम्मल सिनेमा को हम देखते हैं. बिंब और ध्वनि का संयोजन दर्शकों को बांधे रखता है. थोड़ी लंबी होने का बावजूद फिल्म का स्क्रीनप्ले इसे बोझिल नहीं बनने देता है. सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक इस फिल्म का मजबूत पक्ष है.

सीक्रेट कोड भूल चूके, अस्त-व्यस्त, ड्रेसिंग गाउन में सड़कों पर भागते, फोन बूथ पर झुंझलाते, बेटी को तलाशते बॉब हास्य पैदा करते हैं, वहीं वीरान सड़कों पर कार का पीछा करते हुए जब वे दिखते हैं तब यह फिल्म एक्शन थ्रिलर का रोमांच पैदा करती है.

यह फिल्म पूरी तरह से अमेरिकी समकालीन संस्कृति में रची बसी है जहाँ  अमेरिकी-मेक्सिको सीमा पर प्रवासियों के समूह के घेराबंदी में हम समकालीन राजनीतिक अनुगूंज और हास्यास्पद नस्लीय श्रेष्ठता बोध एक साथ हम देखते हैं. एक अलग स्तर पर जाकर यह फिल्म क्रांतिधर्मी पिता-पुत्री के संबंधों की संवेदनशील पड़ताल करती है.  

Sunday, February 01, 2026

सत्य की खोज में पत्रकार: सेमोर हर्श


पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री कवर-अप बेहद प्रासंगिक है. वैसे तो यह वृत्तचित्र चर्चित अमेरिकी खोजी पत्रकार सेमोर हर्श की पत्रकारिता की यात्रा को समेटे है, पर हम इसमें अमेरिका की वर्तमान कारगुजारियों की ध्वनि भी सुन सकते हैं. वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण या ईरान पर हमले की बार-बार चेतावनी के बरक्स यदि हम कवर-अप’ में शामिल दुनिया में अमेरिकी हस्तक्षेप और हिंसा को देखे तो पाते हैं कि एक पत्रकार की नजर में पत्रकारिता लोक सेवा है जिसका काम उन तथ्यों को उजागर करना है जिसे सत्ता आम जनता से छिपाना चाहती है. इसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का जुमला राजनीतिक सत्ता के हमेशा काम आता है.

इस डॉक्यूमेंट्री के लिए निर्देशक लाउरा पॉयट्रैस और मार्क ओबेनहाउस पिछले बीस साल से 88 वर्षीय हर्श के पीछे पड़े थे. जैसा कि हम जानते हैं खबरों के पीछे रहने वाला खबर होने से हमेशा बचना चाहता है. हर्श के नाम कई ऐसी खबरें रही है जिसने अमेरीकी सत्ता को लोकहित के सामने झुकने को मजबूर किया है. हर्श उन घटनाओं का विवरण देते हैं.

वियतनाम युद्ध के दौरान माई लाय नरसंहार को उजागर कर हर्श ने सुर्खियाँ बटोरी थी, जिसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार (1970) से नवाजा गया.  इस नरसंहार में अमेरिकी सेना ने बर्बर तरीके से महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया था और इसे आम लोगों की नजर से छिपा कर रखा. हर्श की रिपोर्ट के बाद अमेरिकी जनता वियतनाम युद्ध के विरोध में सड़कों पर उतर आई.

बाद में वाटरगेट स्कैंडल’, इराक युद्ध के दौरान अबू गरीब जेल में अमेरीकी सेना की ज्यादतियों सहित उनके कई रिपोतार्ज ने अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में खलबली मचा दी थी.

बहरहाल, यह डॉक्यूमेंट्री जितना हर्श के पत्रकारीय जीवन वृत्त को ऑडियो-वीडियो फुटेज  के माध्यम से सामने लाती है उतनी ही अमेरिकी पत्रकारिता के एक दौर और दुरभिसंधियों को भी. एक जगह हर्श कहते हैं अमेरिकी इतिहास लिखना कितना मुश्किल है’.  पत्रकारिता का वर्तमान भविष्य का इतिहास बनता है यदि तथ्यों के प्रति हम जागरूक और सत्यनिष्ठ रहे. एक तरफ सूचना और संवाद करने की जिम्मेदारी पत्रकारों की है, वहीं पत्रकारिता सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पाद भी है. हर्श कहते हैं कि हमारी संस्कृति अत्यधिक हिंसक है.  ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसा हमारे घर में हो और हम दूसरी तरफ नज़र फेर लें’.  पर दुर्भाग्य से आज ऐसी कई खबरें हमारे सामने से गुजर जाती है जिसकी तह में जाने की जहमत मीडियाकर्मी नहीं उठाते. सत्ता के सच को ही सूत्रों के हवाले’ से पाठकों, दर्शकों के सामने परोस देते हैं.

इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हम यह भी देखते हैं कि किस तरह अमेरिकी जनता का एक हिस्सा हर्श को उनकी सच्चाई के लिए नापसंद करता रहा. पर हर्श सत्ता से बेलाग सच कहने से हिचके नहीं. पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में भी लोग सत्य’ को तथ्य के आधार पर नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर जाँचते-परखते हैं.

उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय, इस डॉक्यूमेंट्री में बेहद संक्षिप्त लेकिन हर्श के निजी जीवन से भी दर्शकों का साक्षात्कार होता है. 

Sunday, January 11, 2026

रेडियो सीलोन के सौ साल

रील्स, मीम्स और सोशल मीडिया के इस दौर में रेडियो सीलोन (श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन) की लोकप्रियता का अंदाजा नई पीढ़ी को नहीं है, लेकिन इस स्टेशन से प्रसारित ‘बिनाका गीतमाला’ की यादें पुरानी पीढ़ी के लोगों के जेहन में आज भी है. बिनाका गीतमाला की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण इसके होस्ट अमीन सायानी थे. आम बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा में उनकी उद्घोषणा: ‘बहनो और भाइयो मैं आपका दोस्त अमीन सायानी, और लेकर आया हूँ आपका पसंदीदा प्रोग्राम, बिनाका गीतमाला’, का श्रोता बेसब्री से इंतजार करते थे.


दक्षिण एशिया के पहले रेडियो स्टेशन, रेडियो सीलोन, के पिछले दिनों (16 दिसंबर) सौ साल पूरे हुए. द्वितीय विश्व यु
द्ध के दौरान ब्रिटिश हकूमत ने जर्मनी और जापान के दुष्प्रचार के खिलाफ इसका खूब इस्तेमाल किया था. बहरहाल, रजत पटल पर सिनेमा से अलग फिल्मी गीत-संगीत का स्वतंत्र अस्तित्व रहा है. इस श्रव्य संस्कृति के निर्माण में रेडियो सीलोन की भूमिका ऐतिहासिक रही. यहाँ से प्रसारित हिंदी फिल्मी गानों की दीवाने लाखों थे. इसाबेल अलोंसो ने अपनी किताब-‘रेडियो फॉर द मिलियंस’ में ठीक ही नोट किया है कि रेडियो सीलोन के माध्यम से बनने वाली ‘फिल्मी संस्कृति’ के आड़े भारत और पाकिस्तान की सरहद नहीं आई, न ही नवनिर्मित राष्ट्र-राज्य की राजनीतिक और भाषाई नीतियाँ ही कारगर हुई.

श्रीलंका की आजादी (1948) के तुरंत बाद सीलोन ने हिंदी भाषा में व्यावसायिक कार्यक्रम की शुरुआत की. श्रव्य माध्यम होने के नाते रेडियो प्रसारण में शब्द और संगीत की केंद्रीय भूमिका रहती है.

वर्ष 1952 में पहली बार ‘गीतमाला’ का प्रसारण हुआ जिसके उद्घोषक थे अमीन सयानी. ‘गीतमाला’ के साथ यहाँ से फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम भी प्रसारित होते थे, जिसमें श्रोताओं की भागेदारी होती थी. ‘संगीत सीढ़ी’ (पायदान) के तहत हर हफ्ते गानों की लोकप्रियता तय की जाती थी. करीब चालीस वर्षों (1988 तक) तक यहाँ से ‘गीतमाला’ प्रसारित होता रहा. कई रेडियो क्लब बने, जहाँ पर प्रसारित कार्यक्रमों की चर्चा होती थी.

असल में, आजाद भारत में सरकार की एक नीति ने ऑल इंडिया रेडियो से फिल्मी गानों के प्रसारण पर ग्रहण लगा दिया था. यह ग्रहण 1952 से 1957 तक लगा रहा. अक्टूबर 1952 में जब बी वी केसकर देश के नए सूचना और प्रसारण मंत्री बने तब उन्होंने ऐलान किया कि ‘ये गाने दिनों दिनों अश्लील होते जा रहे हैं और पाश्चात्य देशों की धुनों का कॉकटेल हैं.’ उस समय हर दिन कुछ घंटे विभिन्न रेडियो स्टेशन से फिल्मी गानों का प्रसार होता था. केसकर ने निर्देश जारी किया कि रेडियो स्टेशन से हिंदी गानों का प्रसार नहीं होगा. हिंदी फिल्मी गानों की लोकप्रियता को देखते हुए सिनेमा उद्योग के लिए यह आघात से कम नहीं था. केसकर रेडियो के माध्यम से केसकर शास्त्रीय और सुगम संगीत का प्रसार करना चाहते थे. वे कहते थे कि फिल्म संगीत भारतीय संगीत परंपरा से दूर चला गया है.

इस रोक के बाद फिल्मी गीत-संगीत की तलाश में श्रोताओं ने अन्य रेडियो स्टेशन की खोज शुरू की और रेडियो सीलोन उनका ठौर बना. सरकार को हालांकि झुकना पड़ा और वर्ष 1957 में विविध भारती की स्थापना की गई, जहाँ से फिल्मी गीत-संगीत का प्रसारण ‘पंचरंगी कार्यक्रम’ के तहत शुरू हुआ. वर्ष 1989 से 1994 तक विविध भारती से अमीन सायानी ने बिनाका गीतमाला का प्रसारण किया.

Sunday, December 21, 2025

द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली: नागरिक राष्ट्रवाद की अनुगूंज

 


फ्रेंच फिल्मकार जां रेनुआ ने कहा था कि ‘सिनेमा की शब्दावली में ‘कमर्शियल’ फिल्म वह नहीं होती जो पैसा कमाए, बल्कि वह फ़िल्म होती है जिसकी कल्पना और निर्माण व्यवसायी के मानदंडों के अनुसार किया गया हो.’ सुर्खियां ओर बॉक्स ऑफिस पर पैसे बटोर रही आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ देखते हुए यह बात मन में आती रही.

भारत और पाकिस्तान की पृष्ठभूमि में अति राष्ट्रवाद, हिंसा, जासूसी के इर्द-गिर्द बुनी गई इस फिल्म में पिछले दो दशक में घटी आतंकवादी घटनाओं का इतिवृत्त मिलता है पर कल्पना और यथार्थ का घालमेल है. यहां कला कम, राजनीतिक स्वर ज्यादा स्पष्ट हैं. लेकिन जैसा कि कवि शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा है: जो नहीं है/ जैसे कि ‘सुरुचि’/उसका ग़म क्या?
'घर में घुस कर मारने' की बात करने के वाली, 'धुरंधर' के साथ ‘द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली’ का होना सुखद है, जो पिछले दिनों ही जियो-हॉट स्टार प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीम हुई. स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए आज भी वितरण बड़ी समस्या बनी हुई है. बहरहाल, पंद्रह वर्ष पहले ‘पीपली लाइव’ फिल्म से चर्चा में आई अनुषा रिजवी की यह फिल्म धुरंधर के साफ विपरीत है. यहाँ प्रोपगैंडा नहीं है, बल्कि नागरिक राष्ट्रवाद की अनुगूंज है. सब लोग साथ-साथ मिल जुल कर रह सकते हैं, फल-फूल सकते हैं. परेशानियों के बावजूद जहाँ चांदनी रात में ‘बुलबुल को गुल मुबारक, गुल को चमन मुबारक/हम बेकसों को अपना प्यारा वतन मुबारक’ गुनगुनाया जा सकता है.
यहाँ राष्ट्र में जो उठा-पठक चल रहा है उसे घर के अंदर चल रहे ‘ड्रामे’ से जोर कर देखा गया है. घर के अंदर एक युवा जोड़े की शादी का तनाव है क्योंकि दोनों के धर्म अलग हैं. पर इसे मनोरंजक तरीके से हल्के-फुल्के अंदाज में परोसा गया है, एक बहाव में हम कहानी से साथ आगे बढ़ते हैं. ऐसा लगता है कि हुमायूं का मकबरा चश्मदीद की तरह समकालीन समय को परख रहा है और कह रहा है कि यह समय भी बीत जाएगा!
किस्सागोई शैली में बुनी गई इस फिल्म में महज एक दिन की कहानी है जो दक्षिण दिल्ली के एक घर के अंदर घटित होती है. केंद्र में दिल्ली का एक उच्च मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार है. जहाँ ‘धुरंधर’ में स्त्री पात्रों के लिए जगह बेहद कम है, वहीं शम्सुद्दीन परिवार में स्त्रियों का जोर है.
बानी जो कि एक लेखिका है, अपने लिए विदेश में अवसर ढूंढ़ रही है. ‘डेडलाइन’ का दबाव उसके सिर पर है, पर एक के बाद एक ‘अतिथि’ उसके घर आते जा रहे हैं. दो पीढ़ियों की नोंक-झोंक या जुगलबंदी के बीच बात से बात निकलती चलती है. यहाँ शादी, प्रेम, तलाक की बातचीत बेहद सहज है, हालांकि जो सहज नहीं है वह है एक लेखक के अंदर का डर कि कौन सी बात किसे बुरी लग जाएगी? क्या लिखा जाए, क्या नहीं? और यहीं पर यह फिल्म प्रभावी हो उठती है कि अभिव्यक्ति की आजादी न हो तो फिर लोकतंत्र के क्या मायने रह जाएँगे? महज डेढ़ घंटे फिल्म में कई गैप्स हैं, जिसे दर्शकों की उम्मीद के सहारे भरने, सोचने-विचारने के लिए छोड़ दिया गया है.