इस बार ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ के लिए ऑस्कर पुरस्कार जोआकिम ट्रायर निर्देशित ‘सेंटिमेंटल वैल्यू’ को मिला. यह पहली नॉर्वेजियन फिल्म है जिसे यह सम्मान मिला है. भारत की तरफ से नीरज घेवान की फिल्म ‘होमबाउंड’ की भी दावेदारी थी, पर अंतिम नामांकन में फिल्म जगह नहीं बना पाई.
एक पत्रकार के नोट्स
Sunday, March 29, 2026
अनुपस्थिति पिता की: सेंटिमेंटल वैल्यू
Saturday, March 14, 2026
त्रिवेणी कला संगम के 75 साल
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
Sunday, March 01, 2026
पिता-पुत्री के संबंधों की संवेदनशील पड़ताल: One Battle After Another
क्या चर्चित फिल्म निर्देशक पॉल थॉमस एंडरसन ऑस्कर पुरस्कार पाने में इस बार सफल होंगे? यह सवाल सिनेमा प्रेमियों के मन में हैं. असल में उनकी फिल्म ‘वन बैटल आफ्टर अनदर’ को 98वें ऑस्कर पुरस्कार के लिए 13 नॉमिनेशन मिले हैं, जिसमें बेहतरीन फिल्म, निर्देशक, अभिनेता, सह-अभिनेता आदि शामिल हैं. उल्लेखनीय है कि रेयान कूगलर निर्देशित फिल्म 'सिनर्स’ को 16 नामांकन मिले हैं.
पिंचन के वर्ष 1990 में प्रकाशित उपन्यास ‘विनलैंड' से प्रेरित यह फिल्म अमेरिकी समाज और राजनीति की पड़ताल करती है, पर बिना मुखर हुए. समकालीनता, ट्रंप युग पैबस्त है इस फिल्म में.
यह एक ब्लैक कॉमेडी है, जिसमे लियोनार्डो डिकैप्रियो एक क्रांतिधर्मी पिता के किरदार के रूप में दिखाई देते हैं. प्रसंगवश, एंडरसन और पिंचन की जोड़ी ने वर्ष 2014 में इनहेरेंट वाइस को परदे पर साकार किया था. इस फिल्म को रचनात्मक रूप से परदे पर लाने में एंडरसन को करीब बीस वर्ष लग गए और उनकी रचनात्मक प्रक्रिया को मुकम्मल रूप से हम इस फिल्म में देखते-परखते हैं. आश्चर्य नहीं कि समकालीन फिल्मकारों में एंडरसन का नाम का ऊपर आता है.
बहरहाल, घेटो (डिकैप्रियो) और उनकी पार्टनर परफेडिया बेवर्ली हिल्स (टेयाना टेलर) ‘फ्रेंच 75’ नाम एक एक चरमपंथी संस्था से जुड़े रहे जो अमेरिकी समाज में बराबरी लाने की लड़ाई के लिए हिंसा का सहारा लेता है. परफेडिया बंदूक लहराती हुई उद्घोषणा करती है: खुली सीमाएँ, स्वतंत्र विकल्प, स्वतंत्र शरीर और भय से मुक्ति.” लेकिन इसी तरह की हिंसा की एक कार्रवाई जब असफल होती है तब उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है. घेटो अपनी नवजात बेटी और नई पहचान के साथ एक सहज जीवन जीने की कोशिश करते हैं, पर उनके पीछे कर्नल लॉकजाउ (शॉन पेन) पड़े है. पेन का अभिनय अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है. उनका हाव-भाव, अंदाज जुगुप्सा और हास्य एक साथ पैदा करता है.
बॉब एक वेबजह की जिंदगी जी रहे होते हैं. नशे का सहारा और पुरानी क्रांतिकारी फिल्मों को देखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है, पर सोलह साल बाद अतीत बॉब का पीछा करता है. इस बार केंद्र में उनकी पार्टनर नहीं बल्कि बेटी (चेज इनफिनिटी) है.
दौड़-भाग के सिनेमाई वृत्तांत को एंडरसन ने खूबसूरती से बुना है. इस तरह एक मुकम्मल सिनेमा को हम देखते हैं. बिंब और ध्वनि का संयोजन दर्शकों को बांधे रखता है. थोड़ी लंबी होने का बावजूद फिल्म का स्क्रीनप्ले इसे बोझिल नहीं बनने देता है. सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक इस फिल्म का मजबूत पक्ष है.
सीक्रेट कोड भूल चूके, अस्त-व्यस्त, ड्रेसिंग गाउन में सड़कों पर भागते, फोन बूथ पर झुंझलाते, बेटी को तलाशते बॉब हास्य पैदा करते हैं, वहीं वीरान सड़कों पर कार का पीछा करते हुए जब वे दिखते हैं तब यह फिल्म एक्शन थ्रिलर का रोमांच पैदा करती है.
यह फिल्म पूरी तरह से अमेरिकी समकालीन संस्कृति में रची बसी है जहाँ अमेरिकी-मेक्सिको सीमा पर प्रवासियों के समूह के घेराबंदी में हम समकालीन राजनीतिक अनुगूंज और हास्यास्पद नस्लीय श्रेष्ठता बोध एक साथ हम देखते हैं. एक अलग स्तर पर जाकर यह फिल्म क्रांतिधर्मी पिता-पुत्री के संबंधों की संवेदनशील पड़ताल करती है.
Sunday, February 01, 2026
सत्य की खोज में पत्रकार: सेमोर हर्श
इस डॉक्यूमेंट्री के लिए निर्देशक लाउरा पॉयट्रैस और मार्क ओबेनहाउस पिछले बीस साल से 88 वर्षीय हर्श के पीछे पड़े थे. जैसा कि हम जानते हैं खबरों के पीछे रहने वाला खबर होने से हमेशा बचना चाहता है. हर्श के नाम कई ऐसी खबरें रही है जिसने अमेरीकी सत्ता को लोकहित के सामने झुकने को मजबूर किया है. हर्श उन घटनाओं का विवरण देते हैं.
वियतनाम युद्ध के दौरान माई लाय नरसंहार को उजागर कर हर्श ने सुर्खियाँ बटोरी थी, जिसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार (1970) से नवाजा गया. इस नरसंहार में अमेरिकी सेना ने बर्बर तरीके से महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया था और इसे आम लोगों की नजर से छिपा कर रखा. हर्श की रिपोर्ट के बाद अमेरिकी जनता वियतनाम युद्ध के विरोध में सड़कों पर उतर आई.
बाद में ‘वाटरगेट स्कैंडल’, इराक युद्ध के दौरान अबू गरीब जेल में अमेरीकी सेना की ज्यादतियों सहित उनके कई रिपोतार्ज ने अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में खलबली मचा दी थी.
बहरहाल, यह डॉक्यूमेंट्री जितना हर्श के पत्रकारीय जीवन वृत्त को ऑडियो-वीडियो फुटेज के माध्यम से सामने लाती है उतनी ही अमेरिकी पत्रकारिता के एक दौर और दुरभिसंधियों को भी. एक जगह हर्श कहते हैं ‘अमेरिकी इतिहास लिखना कितना मुश्किल है’. पत्रकारिता का वर्तमान भविष्य का इतिहास बनता है यदि तथ्यों के प्रति हम जागरूक और सत्यनिष्ठ रहे. एक तरफ सूचना और संवाद करने की जिम्मेदारी पत्रकारों की है, वहीं पत्रकारिता सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पाद भी है. हर्श कहते हैं कि ‘हमारी संस्कृति अत्यधिक हिंसक है. ऐसा नहीं हो सकता कि ऐसा हमारे घर में हो और हम दूसरी तरफ नज़र फेर लें’. पर दुर्भाग्य से आज ऐसी कई खबरें हमारे सामने से गुजर जाती है जिसकी तह में जाने की जहमत मीडियाकर्मी नहीं उठाते. सत्ता के सच को ही ‘सूत्रों के हवाले’ से पाठकों, दर्शकों के सामने परोस देते हैं.
इस डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से हम यह भी देखते हैं कि किस तरह अमेरिकी जनता का एक हिस्सा हर्श को उनकी सच्चाई के लिए नापसंद करता रहा. पर हर्श सत्ता से बेलाग सच कहने से हिचके नहीं. पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में भी लोग ‘सत्य’ को तथ्य के आधार पर नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर जाँचते-परखते हैं.
उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय, इस डॉक्यूमेंट्री में बेहद संक्षिप्त लेकिन हर्श के निजी जीवन से भी दर्शकों का साक्षात्कार होता है.



