Monday, May 09, 2022

कान फिल्म समारोह और ‘नीचा नगर’ की याद


फ्रांस का प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह इस महीने (17-28 मई75वीं वर्षगांठ मना रहा हैवहीं भारत अपनी आजादी का अमृत महोत्सव भी मना रहा है. स्वतंत्र भारत का सांस्कृतिक इतिहास सिनेमा के बिना नहीं लिखा जा सकता है. खास कर हिंदी सिनेमा (बॉलीवुड) की इसमें बड़ी भूमिका रही है. इस साल कान समारोह में भारत को ऑनर ऑफ कंट्री के रूप में शामिल किया गया है. यह एक नई परंपरा की शुरुआत है, जिससे कान के फिल्म बाजार में फिल्मकारों को नेटवर्किंग का मौका मिलेगा. साथ ही कई भारतीय फिल्में भी यहाँ दिखाई जाएंगी.

इन सबके बीच यह याद करना जरूरी है कि वर्ष 1946 में जब कान फिल्म समारोह की शुरुआत हुईउसी वर्ष भारतीय फिल्मों की कान यात्रा शुरु हो गई थी. कान में उस साल चेतन आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म नीचा नगर को प्रतिष्ठित पाम डी ओर पुरस्कार दिया गया था (उस समय इसे ग्रांड पिक्चर पुरस्कार कहा जाता था). नीचा नगर भारत की एकमात्र ऐसी फिल्म हैजिसे यह सम्मान हासिल है.

वर्तमान में इस फिल्म को कोई याद नहीं करता. सिनेमा के इतिहासकारों की नजर से भी यह वर्षों ओझल ही रहा है. जबकि वर्ष 1946 में ही रिलीज हुई ख्वाजा अहमद अब्बास की बंगाल के अकाल पर बनी फिल्म धरती के लाल और नीचा नगर ने भारतीय सिनेमा में एक ऐसी नव-यथार्थवादी धारा की शुरुआत की जिसकी धमक देश-दुनिया में सुनी गई. बाद में जाकर विमल राय ने दो बीघा जमीन’ (1953) में और सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली (1955) में सामाजिक यथार्थ को संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया. उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों ने भी कान समारोह में सुर्खियाँ बटोरी थी. इस बार भी रे की फिल्म प्रतिद्वंदी (1970) (नवीनीकृत प्रिंट) कान समारोह में विशेष रूप से दिखाई जाएगी.

नीचा नगर के निर्माण के प्रसंग का जिक्र बलराज साहनी ने मेरी फिल्मी आत्मकथा में विस्तार से  किया है. उन्होंने चेतन आनंद को उद्धृत करते हुए लिखा है कि चेतन ने उनसे कहा था- इस समय आजाद प्रोड्यूसर अस्तित्व में आया है. इस अस्थिर सी परिस्थिति की आशावादी संभावनाएँ भी हैं. इस समय अच्छे सुशिक्षित और प्रगतिशील लोग अगर हिम्मत करें तो फिल्म-इंडस्ट्री को पहले से अधिक यथार्थवादी मोड़ दे सकते हैं. चेतन आनंद इस फिल्म के लिए बलराज साहनी को लेना चाहते थेपर फिल्म बनाने के लिए उस वक्त ब्रिटिश सरकार से लाइसेंस मिलता था. एक लाइसेंस रफीक अनवर को मिला था और इस शर्त पर कि वे खुद इस फिल्म के हीरो होंगे उन्होंने चेतन आनंद को फिल्म निर्देशित करने का मौका दिया था. बहरहालयह फिल्म इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से प्रभावित थी. उस दौर में प्रगतिशीलवामपंथी विचारधारा में आस्था रखने वाले अनेक संस्कृतिकर्मी बंबई (मुंबई) फिल्म उद्योग में मौजूद थे. मुंबई में वर्ष 1943 में भारतीय जन नाट्य संघ-इप्टा का गठन हुआ. इप्टा का उद्देश्य जन संस्कृति का प्रसार और उसके माध्यम से फासीवाद और साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ना था. प्रसंगवशइप्टा नाम रोम्यां रोलां की चर्चित किताब पीपुल्स थिएटर पर आधारित है.

धरती के लाल का निर्माण इप्टा ने ही किया थाजिसमें बलराज साहनी की भी भूमिका थी. धरती के लाल की तरह ही नीचा नगर फिल्म में भी संगीत सितार वादक रवि शंकर ने दिया था, जो इप्टा से जुड़े थे. यह उनकी पहली फिल्म थी. हम रुकेंगे भी नहीं गाने के संगीत और फिल्मांकन में अहिंसक प्रतिरोध और स्वतंत्रता की अनुगूंज मुखर रूप से सुनाई देती है. यहाँ मशाल लिए स्त्री और पुरुष एक साथ कदमताल कर रहे हैं.

नीचा नगर फिल्म की कहानी एक उद्योगपति सरकार (रफी पीर)जो ऊंचा नगर में रहता है और नीचा नगर में रहने वाले गरीबों के इर्द-गिर्द घूमती है. सरकार चाहता है कि एक नाला नीचा नगर की ओर मोड़ दिया जाए. गाँव के लोगों के जमीन पर उसकी नजर है. गाँव के लोग इसके विरोध में उठ खड़े होते हैं. नाला की वजह से बीमारी फैलती है और महामारी का रूप ले लेती है. गाँव वाले सरकार के बनाए अस्पताल में जाने को मजबूर होते हैं, पर बलराज की बहन रूपा उस अस्पताल में जाने से मना कर देती है और दम तोड़ देती है. गाँव वालों के इस संघर्ष में सरकार की बेटी माया भी साथ देती है. फिल्म में नीचा नगर के लोगों का जालिम सरकार हाय हाय का नारा दोअर्थी है. सरकार एक पात्र नहींप्रतीक है यहाँ. ध्यान रहे यह फिल्म ब्रिटिश हुकूमत के दौर में बनी थी! फिल्म की विषय-वस्तु आज भी प्रासंगिक है.

बकौल बलराज साहनीचेतन आनंद नीचा नगर के माध्यम से आर्थिक वर्गों की मुठभेड़ की कहानी कहना चाहते थे'. इस फिल्म में उनकी समाजवादी चेतना दिखाई देती है. चेतन आनंद सिनेमा को जन माध्यम मानते हुए इसमें जन समुदाय को शामिल करने पर जोर देते थे. फिल्म निर्माण के दौरान देश में आजादी के लिए उथल-पुथल मचा था. महात्मा गाँधी पटल पर छाए हुए थे. फिल्म में गाँधी टोपी पहने बलराज (अनवर) और चरखा चलाती रूपा (कामिनी कौशल) दिखाई देती हैं.

आजादी के बाद हिंदी सिनेमा उद्योग में सामाजिक यथार्थ की इस धारा पर बड़ी पूंजी हावी रही, मनोरंजन का तत्व केंद्र में रहा. साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में बलराज साहनी जैसे अदाकारों पर स्टार भारी पड़े, चेतन आनंद जैसे निर्देशक हाशिए पर चले गए.  नीचा नगर फिल्म की धारा समांतर सिनेमा के रूप से हालांकि आज भी जारी है. ऐसे में कान समारोह के 75वीं वर्षगांठ पर इस फिल्म की ऐतिहासिक भूमिका रेखांकित की जानी चाहिए. कान फिल्म समारोह में भले ही नीचा नगर पुरस्कृत हुई, दुर्भाग्य ऐसा रहा कि भारत में व्यावसायिक रूप से यह रिलीज नहीं हो पाई थी. फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था.


(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, May 01, 2022

प्रत्येक फिल्म निर्माण सीखने की एक सतत प्रक्रिया: श्याम बेनेगल'

 



मशहूर फिल्म निर्देशकदादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित श्याम बेनेगल 87 वर्ष की उम्र में आज भी रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं. फिलहाल वे अपनी नई फिल्म मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ के निर्माण में व्यस्त हैं. फिल्म इस साल सितंबर में रिलीज होगी. यह फिल्म बांग्लादेश के जनक और बंगबंधु’ के नाम से चर्चित शेख मुजीबुर्रहमान (1920-1975) के जीवन पर आधारित है. पिछले महीने बेनेगल ने इस फिल्म का पोस्टर रिलीज किया. लेखक-पत्रकार अरविंद दास ने उनसे बातचीत कीएक अंश प्रस्तुत है:

पहले आपने महात्मा गाँधीसुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू के ऊपर फिल्म और डॉक्यूमेंट्री बनाई हैयह फिल्म किस तरह अलग है?

 

यह भी एक ऐतिहासिक जीवनपरक फिल्म हैजैसा कि  द मेकिंग ऑफ महात्मा या नेताजी सुभाष चंद्र बोसद फॉरगॉटेन हीरो थी. मुजीब हमारे उपमहाद्वीप के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे. उन्होंने बांग्लादेश को जन्म दिया. उनकी कहानी बहुत रोचक है. खुद भी वे बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे. वे किसी धनाढ्य या जमींदार परिवार से ताल्लुक नहीं रखते थेजैसा कि उस दौर के ज्यादातर राजनीतिक नेता थे. वे मध्यवर्ग से आते थे और कामकाजी थे. उनकी पृष्ठभूमि नेहरू या गाँधी जी के जैसी नहीं थी.

 

यह फिल्म भारत और बांग्लादेश सरकार के सहयोग से बन रही है. इसके बारे में कुछ विस्तार से बताएँ?

 

हांयह भारत और बांग्लादेश सरकार के संयुक्त प्रयास का फल है. पिछले साल बांग्लादेश ने आजादी का 50वां और शेख मुजीब का 100वां सालगिरह मनाया था. जब हमने फिल्म पर काम करना शुरू किया तब देर हो चुकी थी और यह फिल्म समारोह का हिस्सा नहीं बन पाई. इस फिल्म के सारे कलाकार बांग्लादेश से हैं.

 

आपने पिछली सदी के सत्तर के दशक में अंकुरनिशांतमंथन जैसी फिल्में बनाईफिर बाद के दशक में मुस्लिम स्त्रियों को केंद्र में रख कर मम्मोसरदारी बेगम और जुबैदा फिल्में आई, जीवनीपरक फिल्में भी निर्देशित की. आपके लिए विविध विषयों को समेटती इस लंबी फिल्मी यात्रा के क्या मायने हैं?

मेरे लिए प्रत्येक फिल्म का निर्माण सीखने की एक सतत प्रक्रिया है. फिल्म निर्माण के माध्यम से आप अपने आस-पड़ोसलोगों और देश में बारे में जानते-समझते हैं. फिल्म बनाते हुए आप खुद को शिक्षित करते हैं.

आपकी कई फिल्में सामाजिक मुद्दों के इर्द-गिर्द है. एक बार आपने कहा था कि सिनेमा से समाज को हम बदल नहीं सकते पर वह बदलाव का एक जरिया हो सकता है. क्या अब भी आप ऐसा मानते हैं?

बिलकुललेकिन फिल्म आपको अंतर्दृष्टि भी देती है. आपको कुछ ज्यादा सीखने की जरूरत नहीं है. यह अंतर्दृष्टि न सिर्फ खुद के बारे में बल्कि वातावरणपृष्ठभूमि के बारे में भी मिलती है. साथ ही अपने देशइतिहास और भी बहुत सी चीजों के बारे में भी.

वर्तमान समय में सब तरफ हिंसा, संघर्ष दिखाई देता हैं. आप सांसद भी रहे हैं. समकालीन समाज में सिनेमा की क्या भूमिका देखते हैं? उदाहरण के लिए द कश्मीर फाइल्स फिल्म ने समाज को ध्रुवीकृत किया है

हांयह समस्या है. सिनेमा आपको प्रभावित करती है और दुनिया के प्रति आपके नजरिए को भी निर्धारित करती है. मैंने द कश्मीर फाइल्स नहीं देखी हैपर इसके बारे में सुना है. एक फिल्मकार के रूप में इतिहास के प्रति आपकी एक जिम्मेदारी होती है. जिस फिल्म में जितना प्रोपगेंडा होगा, उसका महत्व उतना ही कम होगा. फिल्म का इस्तेमाल प्रोपगेंडा के लिए भी होता है, पर ऐतिहासिक फिल्मों को बनाते हुए वस्तुनिष्ठता का ध्यान रखना जरूरी है. बिना वस्तुनिष्ठता के यह प्रोपगेंडा हो जाती है.

वर्तमान समय में सिनेमा की जो स्थिति है उसके बारे में आपका क्या कहना है?

सिनेमा काफी बदल गया है. फिल्म देखने के लिए आप जरूरी नहीं कि सिनेमाघर ही जाएँ. टीवी और ओटीटी प्लेटफार्म ने सिनेमा का एक विकल्प दिया है. ज्यादातर लोग टीवी पर ही फिल्में देखते हैं. इसने फिल्मकारों के सिनेमा बनाने के ढंग को प्रभावित किया है.

फिर सिनेमा का क्या भविष्य आप देखते हैं?

हम भविष्य की ओर नजर गड़ाए हुए हैं. मुझे नहीं पता कि सिनेमा का क्या भविष्य होगा. सिनेमा का भविष्य है, पर जरूरी नहीं कि यह उसी रूप में हो जैसा हमने सोचा था. सिनेमा को गढ़ने में इतिहास और तकनीक दोनों की ही भूमिका होती है. सिनेमा का रूप बदल जाता है. आप किस तरह सिनेमा देखते हैं, वह भी सिनेमा का भविष्य तय करेगा.

‘गर्म हवा’ के सलीम मिर्जा, एम एस सथ्यू की यादों में बलराज

 


हिंदुस्तान में नव-यथार्थवादी सिनेमा की नींव रखने वाले अभिनेता बलराज साहनी (1913-1973) का आज 109वां जन्मदिन है. आजादी से पहले वे मुंबई में इप्टा (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) के कलाकार थे. फिर ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में बनी फिल्म 'धरती के लाल' (1946) से उनके अभिनय की चर्चा होने लगी. विमल राय की दो बीघा जमीन (1953) में रिक्शा चालक के अपने किरदार को जिस तरह उन्होंने निभाया है, वह आज भी मेथड एक्टिंग में विश्वास रखने वाले अभिनेताओं के लिए एक मानक है. तपते डामर पर नंगे पाँव कोलकाता की सड़कों पर रिक्शा दौड़ाते बलराज साहनी की छवि अपनी मार्मिकता में हिंदी सिनेमा में अद्वितीय है.  

परीक्षित साहनी की किताब नान कानफॉर्मिस्टमेमोरिज ऑफ माय फादर बलराज साहनी के आमुख में अमिताभ बच्चन ने लिखा है कि जब वे निजी यात्रा पर मुंबई नौकरी तलाशने गए और पहले-पहल फिल्मी दुनिया के जिस तरह के अनुभव हुए उससे वे विचलित थे. वे दुविधा में थे. उनके पिता ने उन्हें सलाह दिया था कि बलराज साहनी की तरह बनोवह फिल्म उद्योग में होकर भी उससे बाहर हैं. वे लीक पर चलने वाले कलाकार नहीं थे.

खुद बलराज साहनी ने मेरी फिल्मी आत्मकथा में लिखा है- अभिनेता बनने के बजाय लेखक और निर्देशक बनना मेरे स्वभाव के बहुत अनुकूल था. अगर मैं अच्छा निर्देशक बन जाता, तो फिर अपने विचारों के अनुसारअपनी मर्जी की फिल्में बना सकता. तब मैं आज की तरह हिंदी फिल्मों के घटियापन के रोने रो रोकर दिल की भड़ास न निकालताबल्कि उन्हें मोड़ देने की कोशिश कर सकता’. बलराज राजनीतिक-साहित्यिक चेतना से संपन्नवाम विचारधारा में विश्वास रखने वाले अभिनेता थे. जिसे हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है उस दौर के वे गवाह थे. हालांकि मुंबई फिल्म उद्योग के प्रति वे आलोचनात्मक रवैया रखते थे.

उन्होंने अपने करियर में सौ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय कियापर एम एस सथ्यू निर्देशित गर्म हवा’ (1974) में सलीम मिर्जा के किरदार को आज भी लोग याद करते हैं.  यह भूमिका खुद उनके दिल के करीब थी. 

देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. आजादी के साथ देश विभाजन की त्रासदी भी आई थी. बलराज साहनी रावलपिंडी में जन्मे थे. उन्होंने अपने भाई के साथ विभाजन की विभीषिका और बर्बादी का मंजर देखा था. मुंबई में पाकिस्तान से आए फिल्मकारों की कमी नहीं थी. विभाजन एक ऐसा विषय था जिस पर कोई भी फिल्म बनाना नहीं चाहते थे. ऐसा लगता है कि वे उन स्मृतियों को फिर से जीना नहीं चाहते थे.

बलराज साहनी ने आत्मकथा में इस बात को नोट करते हुए लिखा है-सन 1947 की मौत की आंधी हमारे सिरों पर से होकर गुजर गईलेकिन उसके आधार पर हम न कोई बढ़िया फिल्म बना सकेऔर न ही उस भावुकता से ऊपर उठ कर साहित्य में उसका अमिट चित्रण ही कर पाए.’  गौरतलब है कि उनके भाईहिंदी के चर्चित लेखकभीष्म साहनी ने विभाजन की त्रासदी को तमस (1974)  उपन्यास में उकेरा. बाद में गोविंद निहलानी ने इसे दूरदर्शन के लिए निर्देशित भी किया.

बहरहाल92 वर्षीय एम एस सथ्यू उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, मैं बलराज साहनी को इप्टा  और जुहू आर्ट थिएटर के दौर से जानता था और उनके साथ काम किया था.’ वे कहते हैं कि बलराज साहनी एक महान अभिनेता थे. उनके साथ पहले भी मैंने कमर्शियल फिल्मों में काम किया थापर गर्म हवा उनका एक महत्वपूर्ण एक्टिंग एसाइनमेंट था.’  दुर्भाग्यवश बलराज साहनी इस फिल्म के रिलीज होने से पहले ही गुजर गए. बेटीशबनमकी आत्महत्या के कारण वे सदमे में थे. गर्म हवा की डबिंग खत्म होने के एक दिन बाद उन्हें हार्ट अटैक आया था. इस फिल्म में भी उनकी बेटी की आत्महत्या का एक ऐसा प्रसंग हैजिसे उन्होंने बिना किसी नाटकीयता के निभाया है. उनकी विस्फारित आँखें दुख को बिना कुछ कहे बयां करती हैं. कहते हैं कला जीवन का अनुकरण करती है!

बंगाल विभाजन को लेकर आजादी के तुरंत बाद निमाई घोष की छिन्नमूल (1950) फिल्म आई. बाद में ऋत्विक घटक ने इस त्रासदी को केंद्र में रख कर कई महत्वपूर्ण फिल्में निर्देशित की. वे खुद को विभाजन की संतान कहते थे. पर जैसा कि सथ्यू कहते हैं कि आजादी के पच्चीस साल तक किसी ने पंजाब के विभाजन को लेकर सिनेमा नहीं बनाया था. उन्होंने फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन की सहायता से इस्मत चुगताई की अप्रकाशित कहानी पर यह फिल्म बनाई. वे कहते हैं कि इस्मत आपा उनकी पत्नी शमा जैदी के करीब थी. शमा जैदी ने कैफी आजमी के साथ मिल कर इसफिल्म की  पटकथा लिखी है. फिल्म में शौकत आजमी की भी यादगार भूमिका है.

गर्म हवा में आगरा में रहने वाले सलीम मिर्जा देश विभाजन के बाद पाकिस्तान जाने से इंकार कर देते हैं जबकि उनके भाई हलीम मिर्जानाते-रिश्तेदार वतन छोड़ देते हैं. आस-पड़ोस की राजनीतिसांप्रदायिक हलचल अनुकूल नहीं है. मिर्जा से उनका घरकारोबार छिन जाता है. उन पर जासूसी का आरोप लगता है. फिल्म में एक जगह सलीम मिर्जा कहते हैं: ‘जो भागे हैं उनकी सजा उन्हें क्यों दी जाए जो न भागे हैं और न भागना चाहते हैं.” विभाजन की पृष्ठभूमि में मिर्जा परिवार की कथा के माध्यम से घर और अस्मिता की अवधारणा; प्रेम, विश्वासघात जैसे भाव को खूबसूरती से बुना गया है. फिल्म के आखिर में सलीम मिर्जा भी देश छोड़ कर पाकिस्तान जाने का निर्णय लेते हैं पर रास्ते में रोजी-रोटीनौकरी की मांग को लेकर निकला जुलूस मिलता है जिसमें वे और उनके बेटे (फारुख शेख) शामिल हो जाते हैं. एक तरह से कंधे से कंधा मिला कर बेहतरी की लड़ाई के लिए वे मुख्यधारा से जा मिलते हैं. कैफी आजमी की आवाज में यह मिसरा सुनाई देता है- धारा में जो मिल जाओगेबन जाओगे धारा.

देश में सांप्रदायिकता फिर से सिर उठाए खड़ी है. कभी नागरिकता कानून के नाम पर तो कभी लव जिहादबीफ बैन के बहाने मुसलमानों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. उनके खिलाफ दुष्प्रचार बढ़ रहा है. धर्म संसद में उन्हें खुले आम धमकी दी जा रही है. सथ्यू कहते हैं देश का ताना-बाना इससे बिखर रहा है. धर्मनिरपेक्षता पर चोट पहुँच रही हैं. वे वर्तमान सरकार और सत्ताधारी पार्टी की राजनीति को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं.

'गर्म हवा' के बाद विभाजन को लेकर पॉपुलर और समांतर सिनेमा से जुड़े निर्देशकों की कई फिल्में आई हैं, लेकिन सलीम मिर्जा का किरदार सब पर भारी है. बलराज साहनी ताउम्र सांप्रदायिकता के खिलाफ खड़े रहे. कला और जीवन उनके यहाँ अभिन्न था. सलीम मिर्जा का किरदार बलराज साहनी से बेहतर शायद ही कोई और निभा सकता था. 

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Friday, April 29, 2022

मैथिली की पहली फिल्म ‘कन्यादान’


मैथिली के चर्चित लेखक हरिमोहन झा (1908-1984) के लिखे उपन्यास 'कन्यादान' (1933) में इस संवाद को पढ़ते ही ठिठक गया. सी सी मिश्रा और रेवती रमण के बीच यह संवाद है:

रे. रे: नाउ यू आर गोइंग टू सी हर विथ योर आईज

(आब त अहाँ स्वंय अपना आँखि सँ देखबाक हेतु चलिये रहल छी)

मि. मिश्रा: बट ह्वाट आइ वैल्यू मच मोर दैन ब्यूटी इज पर्सनल ग्रेस एंड चार्म. द सीक्रेट ऑफ अट्रैक्शन लाइज इन दी आर्ट ऑफ पोजिंग. यू हैव सीन द बिविचिंग पोजेज ऑफ दि फेमस सिनेमा स्टार लाइक देविका रानी. (“रूप से भी कहीं अधिक मैं लावण्य और लोच को समझता हूँ. आकर्षण की शक्ति तो भाव भंगिमा में भरी रहती है. सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री देविका रानी ऐसे नाज-नखरे दिखलाती है कि दिल पर जादू चल जाता है.”)

हरिमोहन झा मैथिली साहित्य में यह वर्ष 1933 में लिख रहे थे,  जब सिनेमा का प्रसार गाँव-कस्बों तक नहीं पहुँचा थापर मैथिली साहित्य में सिनेमा की आवाजाही हो रही थी. हरिमोहन झा एक ऐसे लेखक थे जिन्होंने आधुनिक मैथिली साहित्य को लोकप्रिय बनाया. ‘कन्यादान’ पुस्तक शिक्षित मैथिल परिवारों का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई. यह पुस्तक द्विरागमन’ समय मिथिला में स्त्रियों के साथ दिया जाने लगा. कहते हैं कि इस किताब को पढ़ने के लिए कई लोगों ने मैथिली सीखी. कन्यादान-द्विरागमन’ उपन्यास पर फणि मजूमदार के निर्देशन में वर्ष 1964-65 में फिल्म बनीजो वर्ष 1971 में कन्यादान नाम से रिलीज हुई. सिनेमा शुरुआती दौर से ही कला के अन्य रूपों को प्रभावित करता रहा है. साथ ही सौ वर्षों के इतिहास में सिनेमा का जादू क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्मों में हिंदी से कम नहीं हैपर बॉलीवुड के दबाव में अधिकांश की अनदेखी ही हुई.

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अचानक से आधी-अधूरी यह फिल्म दिखी. उत्साहवश जब मैंने यूट्यूब पर इस फिल्म को देखा तो निराशा हाथ लगी. ऐसा लगता है कि फिल्म मूल रूप में अपलोड नहीं की गई है. फिल्म का अंत भी वैसा नहीं हैजैसा कि लोग बताते रहे हैं. जब वर्ष 1971 में इसे रिलीज किया गया था तब दरभंगा-मधुबनी और पटना में लोगों ने देखा और सराहा था. उस पीढ़ी के लोगों के जेहन में यह फिल्म थीपर हमारी पीढ़ी के लिए महज यह एक सूचना भर रही. इस सिलसिले में जब मैंने पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय से कुछ वर्ष पहले संपर्क साधा तो उनका कहना था कि उनके डेटा बैंक में ऐसी कोई फिल्म नहीं है. मनोरंजन के साथ-साथ फिल्म का सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व होता है. भाषा के प्रसार के साथ ही सिनेमा समाज की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का भी एक माध्यम है. सिनेमा के खोने से आने वाली पीढ़ियां उन स्मृतियों से वंचित हो जाती है जिसे फिल्मकार ने सिनेमा में अभिव्यक्त किया था. इस फिल्म के मूल प्रिंट को खोज कर सरकार को इसके संग्रहण की व्यवस्था करनी चाहिए.  ‘कन्यादान’ फिल्म को मैथिली की पहली फिल्म होने का गौरव प्राप्त है.

हास्य-व्यंग्य के माध्यम से मिथिला का सामाजिक यथार्थ इस फिल्म (उपन्यास) में व्यक्त हुआ है. विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त एक युवकसी सी मिश्रा की शादी एक ग्रामीण अशिक्षित युवतीबुच्चीदाई से हो जाती है. स्त्री शिक्षा की अनदेखीबेमेल विवाह और दहेज की समस्या इसके मूल में है. फिल्म की पटकथा नवेंदु घोष और संवाद फणीश्वरनाथ ‘रेणु ने लिखे थे. फिल्म से जुड़े कलाकार गोपालचाँद उस्मानीलता सिन्हातरुण बोस आदि की मातृभाषा मैथिली नहीं थीपर मैथिली के रचनाकार चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’ की इस फिल्म में एक प्रमुख भूमिका थी. शूटिंग मुंबई और मिथिला में हुई थी और फिल्म में मैथिली और हिंदी का प्रयोग हैस्त्रियों के हास-परिहाससभागाछीशादी के दृश्य आदि में मिथिला का लोक उभर कर आया है. ‘जहिया से हरि गेलागोकुला बिसारी देला’ और ‘सखि हे हमर दुखक नहि ओर’ जैसे करुण गीत पचास साल बाद भी अह्लादित करते हैं और मिथिला की संस्कृति की झलक देते हैं. इस फिल्म के गीत-संगीत में चर्चित लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान था.

जैसा कि आम तौर पर साहित्यिक कृति पर आधारित फिल्मों के साथ होता रहा हैकिताब के लेखक निर्देशक के फिल्मांकन से कम ही संतुष्ट होते हैं. इसका एक कारण तो यह है कि साहित्यकार यह समझ नहीं पाते कि फिल्म में बिंब की भूमिका प्रमुख होती है. जिस रूप में साहित्यकार ने कथा को अपने लेखन में चित्रित किया हैउसी रूप में फिल्म में नहीं ढाला जा सकता है. मसलन ‘कन्यादान-द्विरागमन’ उपन्यास का देशकाल आजादी के पहले का समाज है (जहाँ ‘कन्यादान’ का रचनाकाल वर्ष 1933 का है वहीं ‘द्विरागमन’ वर्ष 1943 में लिखी गई थी)जबकि फिल्म लगभग तीस साल के बाद बनी है. हरिमोहन झा ने इस फिल्म के बारे में लिखा है- ‘चित्र जेहन हम चाहैत छलहूँ तेहन नहि बनि सकल (फिल्म हम जैसा चाहते थे वैसा नहीं बन सकी)’. बहरहालउन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि इस फिल्म ने मैथिली में सिनेमा बनाने का रास्ता दिखाया और ‘मधुश्रावणी’, ‘ललका पाग’, ‘ममता गाबय गीत’ जैसी फिल्में आगे जाकर बनी. 

जिस दौर में ‘कन्यादान’ फिल्म बन रही थी उसी दौर में एक अन्य मैथिली फिल्म ‘नैहर भेल मोर सासुर’ भी बन रही थी जो ‘ममता गाबय गीत’ के नाम से काफी बाद में जाकर अस्सी के दशक के मध्य में रिलीज हुई. इस फिल्म के प्रिंट भी आज दुर्लभ हैं. भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में जब भी पुरोधाओं का जिक्र किया जाता हैतब दादा साहब फाल्के के साथ हीरा लाल सेनएसएन पाटनकर और मदन थिएटर्स की चर्चा होती है. मदन थिएटर्स के मालिक थे जेएफ मदन. एल्फिंस्टन बायस्कोप कंपनी इन्हीं की थी. पटना स्थित एलफिंस्टन थिएटर (1919), जो बाद में एलफिंस्टन सिनेमा हॉल के नाम से मशहूर हुआमें पिछली सदी के दूसरे-तीसरे दशक में मूक फिल्में दिखायी जाती थीं. आज भी यह सिनेमा हॉल नये रूप में मौजूद है. जाहिर हैबिहार में सिनेमा देखने की संस्कृति शुरुआती दौर से रही है. आजादी के बाद मैथिली-मगही-भोजपुरी में सिनेमा निर्माण भी हुआपर बाद में जहां तक सिनेमा के संरक्षण और पोषण का सवाल हैबिहार का वृहद समाज उदासीन ही रहा है.

जब भी बिहार के फिल्मों की बात होती हैभोजपुरी सिनेमा का ही जिक्र किया जाता है. मैथिली फिल्मों की चलते-चलते चर्चा कर दी जाती है. जबकि पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढैबो’ और ‘ममता गाबए गीत’ का रजिस्ट्रेशन ‘बाम्बे लैब’ में वर्ष 1963 में ही हुआ और फिल्म का निर्माण कार्य भी आस-पास ही शुरू किया गया था. इस फिल्म में निर्माताओं में शामिल रहे केदारनाथ चौधरी बातचीत के दौरान हताश स्वर में कहते हैं-भोजपुरी फिल्में कहां से कहां पहुँच गई और मैथिली फिल्में कहां रह गई!’ लेकिनयहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि भोजपुरी और मैथिली फिल्मों के अतिरिक्त साठ के दशक में फणी मजूमदार के निर्देशन में ही ‘भईया’ नाम से एक मगही फिल्म का भी निर्माण किया गया था. पचास-साठ साल के बाद भी मैथिली और मगही फिल्में विशिष्ट सिनेमाई भाषा और देस की तलाश में भटक रही है.

ममता गाबय गीत’ के निर्माण से जुड़े रहे केदार नाथ चौधरी इस फ़िल्म के मुहूर्त से जुड़े एक प्रंसग का उल्लेख करते हुए अपनी किताब ‘अबारा नहितन’ में लिखते हैं कि जब वे फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ से मिले (1964) तो उन्होंने मैथिली फ़िल्म के निर्माण की बात सुन कर भाव विह्वल होकर कहा था-अइ फिल्म केँ बन दिऔ. जे अहाँ मैथिली भाषाक दोसर फिल्म बनेबाक योजना बनायब त’ हमरा लग अबस्से आयब. राजकपूरक फिल्मक गीतकार शैलेंद्र हमर मित्र छथि (इस फ़िल्म को बनने दीजिए. यदि आप मैथिली भाषा में दूसरी फ़िल्म बनाने की योजना बनाए तो मेरे पास जरूर आइएगा. राजकपूर की फ़िल्मों के गीतकार शैलेंद्र मेरे मित्र हैं)’.  इस फ़िल्म के निर्माण के आस-पास ही रेणु की चर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ नाम से फ़िल्म बनी. इस फ़िल्म में मिथिला का लोक प्रमुखता से चित्रित है और फ़िल्म में एक जगह तो संवाद भी मैथिली में सुनाई पड़ता है. क्या ‘तीसरी कसम’ मैथिली में बन सकती थीकेदारनाथ चौधरी कहते हैं कि ‘निश्चित रूप से. यदि ‘तीसरी कसम’ फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्म का स्वरूप  बहुत अलग होता.’ यह सवाल भी सहज रूप से मन में उठता है कि यदि ‘विद्यापति’ (1937) फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्मों का इतिहास कैसा होता? कन्यादान’ फिल्म में रेणु की छाप फिल्म के संवाद में प्रमुखता से दिखती है. जैसा कि हमने नोट किया फिल्म में मैथिली के साथ-साथ हिंदी भाषा का भी प्रयोग है. जिसे फिल्म का एक पात्र झारखंडी सी सी मिश्रा के साथ बातचीत में ‘कचराही’ (कचहरी में जिस भाषा में गवाही दी जाती हो) बोली कहते हैं. ‘मारे गए गुलफाम में भी रेणु लिखते हैं: ‘कचराही बोली में दो-चार सवाल-जवाब चल सकता हैदिल-खोल गप तो गांव की बोली में ही की जा सकती है किसी से.

प्रसंगवश, नवेंदु घोष और रेणु की जोड़ी एक बार फिर से ‘मैला आँचल’ उपन्यास पर बनने वाली फिल्म ‘डागदर बाबू’ में साथ आई थी. मन में सहज रूप से यह सवाल उठता है कि नवेंदु घोषजिन्होंने ‘कन्यादान’ और ‘तीसरी कसम’ फिल्म की पटकथा लिखी थीके निर्देशन में बनने वाली इस फिल्म का क्या स्वरूप होताबिंबो और ध्वनियों के माध्यम से यह फिल्म मैला आँचल कृति को किस तरह नए आयाम में प्रस्तुत करती?70 के दशक के मध्य में यह फिल्म बननी शुरू हुई थीपर निर्माता और वितरक के बीच अनबन के चलते इसे अधबीच ही बंद करना पड़ा. उस दौर के लोग ‘डागदर बाबू’ की शूटिंग और फिल्म के पोस्टर को आज भी याद करते हैं. रेणु के पुत्र दक्षिणेश्वर प्रसाद राय कहते हैं कि फिल्म के 13 रील तैयार हो गए थे. वे बताते हैं कि ‘मायापुरी’ फिल्म पत्रिका में ‘आने वाली फिल्म’ के सेक्शन में इस फिल्म का पोस्टर भी जारी किया गया था. नवेंदु घोष के पुत्र और फिल्म निर्देशक शुभंकर घोष कहते हैं कि उस वक्त वे फिल्म संस्थानपुणे (एफटीआईआई) में छात्र थे और अपने पिता को असिस्ट करते थे. वे दुखी होकर कहते हैं, “बाम्बे लैब में इस फिल्म के निगेटिव को रखा गया था. 80 के दशक में बंबई में आई बाढ़ में वहाँ रखा निगेटिव खराब हो गया... अब कुछ नहीं बचा है.” शूटिंग के दिनों को याद करते हुए शुभंकर घोष नॉस्टैल्जिक हो जाते हैं. वे कहते हैं “काफी खूबसूरत कास्टिंग थी. धर्मेंद्रजया बच्चनउत्पल दत्तपद्मा खन्नाकाली बनर्जी इससे जुड़े थे. जब रेणु की जन्मभूमि फारबिसगंज में इसकी शूटिंग हो रही थी तब धर्मेंद्र-जया को देखने आने वालों का तांता लगा रहता था. कई लोग पेड़ पर चढ़े होते थे.’ फिल्म के प्रसंग में वे आर डी बर्मन के दिए संगीत का जिक्र खास तौर पर करते हैं. वे कहते हैं कि नंद कुमार मुंशी जो इस फिल्म के निर्माता एस.एच. मुंशी के पुत्र हैंकिसी तरह आरडी बर्मन के गीतों को संरक्षित करने में उनकी सहायता करें. घोष कहते हैं कि फिल्म में पंचम ने असाधारण संगीत दिया थाजो मुंशी परिवार के पास ही रह गया. कन्यादन के निर्माता भी एस.एच. मुंशी ही थे. संभव है कि कन्यादान फिल्म का प्रिंट मुंशी परिवार के पास हो. यदि ‘डागदर बाबू’ फिल्म बन के तैयार हो गई होती तो हिंदी सिनेमा की थाती होती. शुभंकर याद करते हुए बताते हैं कि उनके पिता नवेंदु घोष और रेणु अच्छे दोस्त थे. ‘मैला आंचल’ की पॉकेट बुक की प्रति हमेशा अपने पास रखते थे और वर्षों तक उन्होंने उसकी पटकथा पर काम किया था.

रेणु’ का जन्मशती वर्ष भी है. जहाँ साहित्यिक हलकों में रेणु और हरिमोहन झा के साहित्य की चर्चा आज भी होती हैवहीं ‘कन्यादान’ फिल्म की चर्चा कहीं नहीं होती. रेणु के योगदान का उल्लेख नहीं होता. इस फिल्म में विद्यापति के गीत के साथ ही प्रसिद्ध लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान है. एक साथ इतने सारे दिग्गज इस फिल्म से जुड़े रहे पर इस ऐतिहासिक फिल्म के संग्रहण में सरकार की कोई रुचि नहीं रही. साथ ही वृहद समाज भी उदासीन ही रहा

सिनेमा के वरिष्ठ अध्येता मनमोहन चड्ढा ने हाल में छपी अपनी किताब- ‘सिनेमा से संवाद’ में नोट किया है कि आधुनिक हिंदी भाषा-साहित्य और भारतीय सिनेमा का विकास लगभग साथ-साथ हुआ. उन्होंने सवाल उठाया है कि जहाँ साहित्य समीक्षा और आलोचना की एक सुदीर्घ परंपरा बन गई वहीं हिंदी में सिनेमा पर सुचिंतित विमर्श क्यों नहीं हो पायाक्यों हम सिनेमा के धरोहर को सहेजने को लेकर तत्पर नहीं हुएउल्लेखनीय है कि मूक फिल्मों के दौर में भारत में करीब तेरह सौ फिल्में बनींजिसमें से मुट्ठी भर फिल्में ही आज हमारे पास है. ‘नेशनल फिल्म आर्काइव’ के निदेशक रहे सुरेश छाबरिया भारत की मूक फिल्मों को ‘अ लॉस्ट सिनेमैटिक पैराडाइज’ कहते हैं. उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘लाइट ऑफ एशिया- इंडियन साइलेंट सिनेमा (1912-34)’ में भारत में बनी मूक फिल्मों का विस्तार से जिक्र किया है. बहरहालबॉलीवुड का ऐसा दबदबा रहा कि हिंदी भाषी दर्शकों के सरोकार क्षेत्रीय सिनेमा से नहीं जुड़े. हाल में मलयालमतमिल आदि भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की सफलता को छोड़ दें तो बहुत कम हिंदी भाषी सिनेमा प्रेमी और अध्येता क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में रुचि रखते हैं. 

कन्यादान’ फिल्म में मैथिली के रचनाकार चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’ की भी प्रमुख भूमिका थी. फिल्म निर्माण के दौरान मुंबई प्रवास को अपनी डायरी ‘कन्यादान फिल्मक नेपथ्य कथा’ में उन्होंने नोट किया है. वे लिखते हैं: ‘कन्यादान फिल्मक एक बड़का आकर्षण इ जे भारतक विभिन्न भाषा मैथिलीक आंगन में एकत्र भ गेल अछि. हिंदीउर्दूबंगलामराठीगुजरातीपंजाबीमगहीभोजपुरी आदिक कलिका सब जेना मैथिलीक एक सूत्र में गथा क माला बनि गेल हो (कन्यादान फिल्म का एक बड़ा आकर्षण यह है कि भारत की विभिन्न भाषा मैथिली के आंगन में एकत्र हुई है. हिंदीउर्दूबांग्लामराठीगुजरातीपंजाबीमगहीभोजपुरी आदि कलियाँ सब जैसे एक सूत्र मे गूँथ कर माला बन गई हो). मैथिली फिल्म ‘कन्यादान’ का महत्व इस बात में भी निहित है कि किस तरह देश के विविध भाषा-भाषी ने मैथिली में फिल्म संस्कृति की शुरुआत की थी. 

मराठीबांग्लाअसमियाभोजपुरी सहित भारत में करीब पचास भाषाओं में फिल्में बनती हैं. इन भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में देश के विभिन्न भागों के लोग एक-दूसरे से जुड़ते रहे हैंएक दूसरे की विविध भाषा-संस्कृति से परिचित होते रहते हैं. सही मायनों में हिंदी सिनेमा के विकास का रास्ता क्षेत्रीय सिनेमा से होकर ही जाता है. पिछले दिनों मैथिली में बनी अचल मिश्र की फिल्म ‘गामक घर’ (गाँव का घर) की खूब चर्चा हुईपर लोग मैथिली सिनेमा के इतिहास से अपरिचित ही रहे. यदि ‘कन्यादान’, ‘ममता गाबय गीत’ जैसी फिल्मों के धरोहर को सहेजने के प्रयास हुए होते तो शायद ऐसा नहीं होता.

 (हंस पत्रिका, अप्रैल 2022 में प्रकाशित)

Tuesday, April 26, 2022

पीढ़ियों के साथ संवाद करती श्याम बेनेगल की फिल्में

पिछले दिनों आलिया भट्ट ने कहा कि गंगूबाई काठियावाड़ी’ के किरदार की तैयारी के दौरान  उन्होंने मंडी फिल्म देखी थी. वर्ष 1983 में रिलीज हुई श्याम बेनेगल निर्देशित इस फिल्म में आलिया भट्ट की माँ सोनी राजदान एक सेक्स वर्कर की भूमिका में है. दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित श्याम बेनेगल 87 वर्ष की उम्र में आज भी सक्रिय हैं और नई पीढ़ी के साथ उनका संवाद कायम है. 

सिनेमा पीढ़ियों को आपस में जोड़ती हैंहाल ही में बेनेगल ने मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन फिल्म  निर्देशित किया है. ऐतिहासिकजीवनीपरक विषयों के फिल्मांकन में उन्हें महारत हासिल है. वे कहते हैं कि ऐतिहासिक विषयों पर आधारित फिल्मों में एक निश्चित मात्रा में वस्तुनिष्ठता का होना जरूरी है. साथ ही वे फिल्मकारों की इतिहास के प्रति जिम्मेदारी पर जोर देते हुए आगाह करते हैं कि बिना वस्तुनिष्ठता के फिल्म प्रोपगेंडा बन जाती हैकश्मीर फाइल्स फिल्म के संदर्भ में इस कथन का महत्व बढ़ जाता है.

बांग्लादेश के जनक और बंगबंधु के नाम से चर्चितबांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रीशेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान (1920-1975) मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन फिल्म के केंद्र में हैं. पिछले साल उनकी जन्मशती मनाई गई और बांग्लादेश ने भी आजादी के पचास वर्ष पूरे किए. बेनेगल कहते हैं कि मुजीब इस उपमहाद्वीप के बेहद खास शख्सियत थेजिन्होंने एक नए राष्ट्र को जन्म दिया. उनकी कहानी रोचक है. खुद वे बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे.’ क्या यह फिल्म उनकी द मेकिंग ऑफ महात्मा और नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ के करीब हैवे कहते हैं कि चूँकि यह भी एक ऐतिहासिक जीवनीपरक फिल्म हैइस लिहाज से इसे हम गाँधी और बोस फिल्म के नजदीक कह सकते हैं. हालांकि वे जोड़ते हैं कि शेख मुजीब की पृष्ठभूमि गाँधी या नेहरू की तरह नहीं थी. वे धनाढ्य या जमींदार नहीं थे. वे एक काम-काजी शख्स थे और मध्यवर्ग से ताल्लुक रखते थे. गौरतलब है कि इसी कड़ी में जवाहरलाल नेहरू की किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया पर आधारित बेनेगल की भारत एक खोज सीरिज भी हैजो उन्होंने दूरदर्शन के लिए बनाई थी.

 

वर्ष 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों के साथ हत्या कर दी गई थी. शेख मुजीब के भारतीय नेताओं के साथ मधुर संबंध थे. इस फिल्म को भारत और बांग्लादेश की सरकार का सहयोग प्राप्त है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश-दुनिया में जिस तरह आज संघर्ष दिखाई पड़ रहा हैसिनेमा के माध्यम से दो राष्ट्रों के नजदीक आने की पहल स्वागत योग्य है. सिनेमा के इतिहास में इस तरह के उदाहरण बहुत कम ही मिलते हैं. पचास साल पहले बनी ऋत्विक घटक की फिल्म तिताश एकटि नदीर नाम’ (1973) अपवाद ही कही जाएगी जो मुजीब’ फिल्म की तरह ही भारत और बांग्लादेश सरकार के संयुक्त परियोजना का हिस्सा थी.

मुजीब फिल्म की शूटिंग भारत और बांग्लादेश में हुई है. बांग्लादेश के कलाकार अरिफिन शुभो ने मुजीब का किरदार निभाया है. बेनेगल कहते हैं कि फिल्म निर्माण के जरिए आप सतत रूप से कुछ सीखते हैं. आप अपने आस-पड़ोसलोगों और देश के बारे में जानते हैं. सितंबर के आखिर में इस फिल्म के रिलीज होने की संभावना है. यह फिल्म शेख मुजीबुर्रहमान के जीवन को संपूर्णता में चित्रित करती है.

श्याम बेनेगल की फिल्मों का दायरा काफी व्यापक और विविध रहा है. समांतर सिनेमा के दौर के फिल्मकारों मसलनमणि कौलकुमार शहानी आदि से उनकी फिल्में अलग हैं. मुख्यधारा से अलग, समीक्षकों ने उनकी फिल्मों को मध्यमार्गी कहा. उनकी फिल्में आर्थिक रूप से भी सफल रही. साथ ही उन्होंने बॉलीवुड को कई बेहतरीन अदाकार दिए हैं. एनएसडीएफटीआईआई से प्रशिक्षित नए अभिनेताओं के लिए उनकी फिल्मों ने एक ऐसा स्पेस मुहैया कराया जहाँ उन्हें प्रतिभा दिखाना का भरपूर मौका मिला. उल्लेखनीय है कि बेनेगल की पहली फिल्म अंकुर (1974) से ही शबाना आजमी ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा था. मंडी’ फिल्म से हमने बात शुरु की थीइस फिल्म में शबाना आजमी, स्मिता पाटील, नसीरुद्दीन शाहओम पुरीपंकज कपूरनीना गुप्ताइला अरुणअमरीश पुरीकुलभूषण खरबंदा जैसे कलाकारों को परदे पर एक साथ दिखना किसी आश्चर्य से कम नहीं!

 

श्याम बेनेगल की फिल्मी यात्रा के कई चरण हैं. पिछली सदी के 70 के दशक में अंकुर’, ‘निशांत’, ‘भूमिका जैसी फिल्में जहाँ सामाजिक यथार्थ और स्त्रियों की स्वतंत्रता के सवाल को समेटती हैवहीं मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’, ‘जुबैदा जैसी फिल्में मुस्लिम स्त्रियों के जीवन को केंद्र में रखती है. इस बीच उन्होंने जुनूनत्रिकाल जैसी फिल्म भी बनाई जो इतिहास को टटोलती है. फिर बाद में बेनेगल ऐतिहासिक जीवनीपरक फिल्मों की ओर मुड़े. पिछली सदी में जहाँ एक निश्चित अंतराल पर उनकी फिल्में आती रहींवहीं नई सदी में यह रफ्तार धीमा पड़ा है. वर्ष 2010 में रिलीज हुई वेल डन अब्बा के बारह वर्ष के बाद मुजीब’ आ रही है. बातचीत में बेनेगल टीवी और ओटीटी प्लेटफार्म के संदर्भ में एक वैकल्पिक स्पेस के उभार को रेखांकित करते हैं.

नई सदी में सिनेमा निर्माण और दृश्य संस्कृति में काफी बदलाव आया है. इसे बेनेगल भी स्वीकार करते हैं. वे कहते हैं कि सिनेमा काफी बदल गया है. जरूरी नहीं कि सिनेमा देखने के लिए हम सिनेमाघर ही जाएँ. ज्यादातर लोग टेलीविजन पर ही फिल्म देखते हैं.’ ऐसे में सिनेमा का क्या भविष्य हैबेनेगल कहते हैं कि सिनेमा का भविष्य तो हैपर आवश्यक नहीं कि हमने जैसा सोचा था वैसा ही हो! बहरहालफिलहाल हम वर्तमान की बात करें. आज भी सिनेमा को लेकर बेनेगल में एक युवा फिल्मकार की तरह ही उत्साह है. समांतर सिनेमा के पुरोधा की रचनात्मक सक्रियता हमारे लिए आश्वस्तिपरक है.


(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)