नृत्यांगना सुंदरी श्रीधरानी ने महज दो कमरो से ‘त्रिवेणी’ की यात्रा कनॉट प्लेस से शुरु की थी, फिर वर्ष 1962 में मंडी हाउस का बेसमेंट इसका ठिकाना बना. देश की आजादी के समय
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-संवारा.
खास कर हिंदी थिएटर के विकास की कथा ‘त्रिवेणी’ के बिना अधूरी है. पुराने जमाने के लोग आज भी बी वी कारंत, हबीब तनवीर, शीला भट्ट (दिल्ली आर्ट थिएटर), ओम शिवपुरी (दिशांतर) के नाटकों को याद करते हैं. इब्राहिम अल्काजी और बैरी जॉन ने यहाँ पर अपनी प्रोडक्शन की प्रस्तुतियाँ दी.
साथ ही वर्ष 1972 में स्थापित फैसल अल्काजी के ‘रुचिका थिएटर ग्रुप’ के कई नाटकों ने यहीं पर रूप ग्रहण किया था. चर्चित वास्तुशिल्पी जोसेफ स्टेन का बनाया तानसेन मार्ग पर स्थित मौजूदा केंद्र देश के नाट्यकर्मियों, नर्तकों, कला प्रेमियों का आज भी एक महत्वपूर्ण ठौर बना हुआ है. साथ किंवदंती बन चुके ‘त्रिवेणी कैफे’ युवा कलाकारों, छात्रों, पत्रकारों, नाट्यकर्मियों को लुभाता है. जब हम शाम में एक मित्र के साथ त्रिवेणी कैफे में बैठे थे, खूबसूरत खुले सभागार में ‘छऊ’ नाट्य शैली में एक प्रस्तुति की तैयारी चल रही थी.
इतिहास के झरोखों से कलाप्रेमियों को रू-ब-रू करवाने के लिए एक प्रदर्शनी समेत अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. त्रिवेणी से जुड़ी अपनी स्मृतियों को फैसल अल्काजी इस हफ्ते एक संवाद में साझा करेंगे.
न सिर्फ मकबूल फ़िदा हुसैन बल्कि ओडिसी नृत्य के प्रसिद्ध नर्तक केलु चरण महापात्र, फोटोग्राफर ओ पी शर्मा का त्रिवेणी से गहरा जुड़ाव रहा. शुरुआती दौर में मणिपुरी नृत्य के सिद्ध कलाकार एवं गुरु नबा कुमार इससे जुड़ गए थे. नबा कुमार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में मणिपुरी नृत्य के शिक्षक थे, जहाँ पर सुंदरी श्रीधरानी छात्र थी. बाद में उदय शंकर के अल्मोड़ा स्थित ‘इंडिया कल्चर सेंटर’ में उन्होंने नृत्य की शिक्षा ग्रहण की थी. गुरुदत्त और जोहरा सहगल उनके सहपाठी थे.
75 साल पूरे होने के अवसर पर नर्तकों के लिए लिखी श्रीधरानी की पुस्तक ‘अ डांसर प्रिपेयर्स’ का पुनर्प्रकाशन किया गया है. इस किताब की शुरुआती पंक्ति है: 'डांस करने से पहले हम चलना सीखें. चलने से पहले हम किस तरह खड़े हों यह सीखें’. डांस सीख रहे युवाओं को संबोधित करती यह पतली-सी किताब महत्वपूर्ण है.
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