Sunday, August 02, 2026

दुख की दुनिया के भीतर सपनों का संगीत


पिछले दिनों चर्चित अदाकार नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि उन्होंने जीवन में बेहतरीन नाटक पुणे में देखे. वे श्रीराम लागू राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के शुभारंभ के अवसर पर परेश रावल के साथ बातचीत कर रहे थे. पुणे में शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ मराठी थिएटर की समृद्ध परंपरा रही है, पर यहाँ भारतीय भाषाओं के नाटकों का प्रदर्शन गाहे-बगाहे ही होता रहा है. इस मायने में भारतीय थिएटर के महान कलाकार श्रीराम लागू की याद में इस महोत्सव की शुरुआत बेहद सुखद है.


महोत्सव के दौरान मल्लिका तनेजा का बहुचर्चित सोलो नाटक- ‘डू यू नो दिस सांग’ का मंचन हुआ. यह म्यूजिकल नाटक बेहद भावपूर्ण और सधा हुआ है. इस नाटक में वे दर्शकों को अपनी सांगीतिक यात्रा का सहयात्री बनाती हैं.

‘सो जा रे गुड़िया रे, सपनों की दुनिया में खो जा रे...’, गीत पूरे नाटक का टेक है. मंच पर गुड्डे-गुड़ियों, माइक्रोफोन और हारमोनियम के साथ, अपने गीतों के माध्यम से तनेजा दर्शकों को एक ऐसी दुनिया मे ले जाती है जहाँ विगत स्मृतियाँ हैं, दुख हैं, सपने हैं और उनके खोने की कहानी है. इस नाटक को उन्होंने एक वर्ष तक बहुत सारे स्त्रियों के साथ बातचीत के बाद बुना है. मंच पर वे उस शख्स को तलाशती है, जो खो गई. उसकी आवाज खो गई. गीत गुम हो गए. पर क्यों? कैसे?

इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश में वह अपने ही अलग-अलग रूपों में ढल जाती है और कभी स्वयं उसी स्त्री का रूप धारण कर लेती है. मल्लिका कहती है: "यह आवाज मंच की आवाज थी, इस दुनिया की आवाज थी. यह मेरे बहुत क़रीब थी, एक ऐसी आवाज जिसे मैंने बेहद प्यार किया और शायद आज भी करती हूँ."

कहानी माँ और बेटी के संवाद के माध्यम से यह मंच पर घटित होता है. यहाँ प्रीत का गीत है, सतरंगी सपने है. बालों में जगुनू सजाने की ख्वाहिश है. रातों को रास्तों पर जाने की ख्वाहिश है. पर यहाँ सदियों से घर की चौखट बड़ी दिखती है, जहाँ से टकराकर स्त्री की आवाज फिर-फिर लौट आती रही है.

गीत-संगीत इस नाटक का सशक्त पक्ष है. कुछ मौलिक रचनाओं के साथ पारंपरिक लोक गीतों का भी इस्तेमाल हुआ है. नाटक के दौरान मल्लिका दर्शकों से ‘वली तू है जमाली, तेरी ही रोशनी में दुनिया होती जमाली/वली तेरे मन में भी कोई न कोई अरमान है क्या/ बोल तू मन की गांठे खोल तू’ पढ़ने कहती है. नाटक शुरु होने से पहले दर्शकों के हाथ में एक पर्चा थमा दिया जाता है और दर्शक अदाकार के साथ-साथ इसे गाते हैं.

यह सहभागिता, सामूहिकता सोशल मीडिया के इस दौर में आभासी नहीं रह जाती है. यहाँ हमें रंगमंच की शक्ति और सौंदर्य का दर्शन एकसाथ होता है. भरे सभागार में मल्लिका अपनी सधी आवाज के सम्मोहन और संवाद अदायगी तथा अनौपचारिक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखती है. इसके साथ ही, उनके संग संवाद भी कायम रहता है. जो समकालीन नाटकों में इसे विशिष्ट बनाता है. महोत्सव में असमिया नाटक ‘रघुनाथ’ और हिंदी नाटक ‘होम इन ए सूटकेस’ की भी काफी चर्चा हुई.

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