Sunday, September 13, 2026

दोहरी जिंदगी: लोक कथा में मुक्ति चेतना

 


राजस्थान के चर्चित लेखक विजय दान देथा (बिज्जी) की जन्मशती मनाई जा रही है. उन्होंने राजस्थान की मिट्टी में रची-बसी लोक कथाओं और मौखिक परंपरा को जतन से ढूंढा और पुनर्नवा किया. उनकी रचनाओं की पहुँच अनुवाद के माध्यम से देश-दुनिया तक फैली जिसने नाटक, सिनेमा, दास्तानगोई से जुड़े कलाकारों को रूपांतरित करने, आधुनिक रंग में रंगने का मौका दिया. बात हबीब तनवीर-श्याम बेनेगल की हो (चरण दास चोर), मणि कौल-अमोल पालकेर (दुविधा) की हो, पुष्पेंद्र सिंह (लजवंती, केंचुली) या महमूद फारुकी (चौबोली) की.

सवाल है कि ऐसा क्या है इन लोक कथाओं में जो युवा कलाकारों से लेकर शहरों में रहने वाले, अभिजात्य दर्शकों को भी जोड़ता रहा है?
पिछले दिनों पुणे में बिज्जी की चर्चित कहानी ‘दोहरी जिंदगी’ के मंचन और दर्शकों की प्रतिक्रिया में इस सवाल का जवाब दिखा. मारवाड़ी और हिंदी में कही गई इस कहानी में दो कंजूस और लालची सेठ अपने अजन्मे बच्चों की शादी कोख में ही तय कर देते हैं. पर दोनों के घर बेटी ही जन्म लेती है. एक सेठ अपनी बेटी को बेटे की तरह पालता है और दहेज के लालच में दोनों की शादी कर दी जाती है. सुहागरात के दिन इसका भेद खुलता है. फिर धीरे-धीरे दोनों स्त्रियों के बीच प्रेम पनपता है. समाज में मिले तिरस्कार के बीच वे दोनों खुद को नई पहचान देती है- बीजां और तीजां.
गुरलीन जज और नेहा सिंह द्वारा निर्देशित यह नाटक में लोभ-लालच के आगे बढ़ कर, सामंती समाज में समगैंलिक संबंधों और आधुनिक समाज में दुचित्तापन को हमारे सामने लाता है. यह कहानी अपनी कथ्य और समकालीन भाव बोध की वजह से दर्शकों के करीब लगती है. मंच पर कुछ ‘बोल्ड सीन’ की वजह कुछ दर्शक असहज भी दिखे, निर्देशक की मंशा भी यही थी!
देथा की कहानी चाहे वह ‘दुविधा’ हो ‘लजवंती’ हो या ‘दोहरी जिंदगी’, इनमें एक स्त्री की पितृसत्तात्मक बंधन में जकड़न, प्रेम की उत्कट चाह और मुक्ति की चेतना दिखाई देती है. यहां भूत भी प्रेमी या सहयोगी हो सकता है! दुविधा की तरह दोहरी जिंदगी में भूत की मौजूदगी है.
कुछ साल पहले मैंने युवा फिल्मकार पुष्पेंद्र सिंह से देथा की कहानियों के रूपांतरण को लेकर जब सवाल किया, तब उन्होंने कहा था: “एक कलाकार के रूप में आप लगातार इस सवाल से जूझते रहते हैं कि किसी [लोक] कथा को किस तरह पर्दे पर उतारा जाए या किसी साहित्यिक रचना का रूपांतरण कैसे किया जाए… एक कहानीकार के रूप में आप यह भी चाहते हैं कि आपकी कहानियाँ समकालीन दिखाई दें.” यही वजह है कि आधुनिक कलाकार इन पारंपरिक कहानियों के माध्यम से समकालीन सामाजिक-राजनीतिक अराजक व्यवस्था को भी सामने लाते रहे है.
देथा कि कहानियों में लोक का रंग अपनी पूरी शिद्दत के साथ भाषा, मुहावरे और संवाद में दिखाई देता है. करीब चालीस साल पहले देथा ने ‘दोहरी जिंदगी’ लिखी तब समाज में समलैंगिक संबंधो को लेकर खुल कर बात नहीं होती थी. आज जब इसे मंच पर रूपांतरित किया गया जाहिर समकालीन स्वर खुद-ब-खुद इसमें जुड़ते गए. अकारण नहीं कि दोहरी जिंदगी में अदाकार वर्तमान राजनीति पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूके.

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