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Thursday, November 17, 2022

कुमार शहानी की फिल्म माया दर्पण के पचास साल


फिल्मकार कुमार शहानी की विशिष्ट पहचान है. खास कर समांतर सिनेमा (कला सिनेमा) के वे पुरोधा हैं. दुनिया भर में उनकी चर्चा एक अवां-गार्द (Avant-garde) फिल्म निर्देशक के रूप में होती रही है. पिछली सदी के साठ के दशक में जब पुणे में फिल्म संस्थान की शुरुआत हुई, उन्होंने समांतर सिनेमा के एक अन्य प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक, मणि कौल, के साथ फिल्म निर्देशन का प्रशिक्षण लिया. संस्थान में उन्हें महान फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक का साहचर्य मिला. घटक को वे अपना गुरु मानते हैं. प्रशिक्षण के बाद शहानी एक फेलोशिप पर पेरिस गए और प्रसिद्ध फ्रेंच फिल्म निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसां की फिल्म 'उन फाम डूस (ए जेंटल वूमन,1969)' में सहायक-निर्देशक के रूप में काम किया. लौट कर जब वे भारत वापस आए अपनी पहली फिल्म-‘माया दर्पण’ को निर्देशित किया.‘माया दर्पण’ (1972) उनकी सबसे चर्चित फिल्म है, जो पचास वर्ष पूरे कर रही है. यह फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन के सहायता से बनी थी.

हिंदी के प्रतिष्ठित रचनाकार निर्मल वर्मा की इसी नाम से लिखी कहानी (माया दर्पण) पर जब फिल्म बन कर आई, सिनेमा अध्येताओं और समीक्षकों ने निर्देशक की मौलिक दृष्टि और सिनेमाई भाषा की सराहना की थी. पिछली सदी के 70-80 के दशक में उनकी और मणि कौल की फिल्मों (उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा आदि) में कहानी कहने की प्रयोगात्मक शैली की चर्चा खूब हुई. पेरिस के ला मोंद, अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में भी उनकी फिल्मों की चर्चा होती थी. बहरहाल, ‘माया दर्पण’ को हिंदी में ‘बेस्ट फिल्म’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
‘माया दर्पण’ की विशिष्टता की क्या वजह है? क्यों हिंदी सिनेमा में इस फिल्म को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है? इस फिल्म में रंगों और ध्वनि के इस्तेमाल से जिस सिनेमा संसार को रचा गया है, वह अलहदा है. पाकिस्तानी शायर जिया जालंधरी ने कहा है: रंग बातें करें और बातों से खुशबू आए’. कुमार शहानी बातचीत में कहते हैं ‘रंग हमारे होने की सुगंध को परिभाषित करता है.’ प्रसंगवश, शहानी अक्सर अपने जन्म स्थान लरकाना (सिंध, पाकिस्तान) की चर्चा करते हैं. साथ ही रंगों के मेल और भारतीय सभ्यता और संस्कृति में इसकी केंद्रीयता को रेखांकित करते रहे हैं.
कथानक निर्मल वर्मा की कहानी पर आधारित होने के बावजूद यह फिल्म उसका अतिक्रमण करती है. सिनेमा तकनीकी आधारित कला है, लेकिन तकनीकी यहाँ निर्देशक पर हावी नहीं है. ‘माया दर्पण’ की कहानी के केंद्र में तरन (अदिति) है, जो अपने पिता (दीवान साहब) और विधवा बुआ के साथ एक छोटे शहर में रहती है. आजादी के बाद भारतीय समाज में आ रहे सामाजिक बदलाव, औद्योगीकरण की आहट इस कहानी में प्रवासी इंजीनियर बाबू के माध्यम से आई है. इस कहानी के एक प्रसंग में बुआ कहती है: “सोचती हूँ जब आज बाबू तेरे लिए ऊंची जात और बड़े घराने की बात चलाते हैं, तो क्या यह ठीक है? वह बात आज कहाँ रही, जो वर्षों पहले थी? आज अपनी कौन इज्जत रह गई है, जो बड़े घर-घराने का लड़का मिले! लेकिन उन्हें यह बात समझाये कौन?” कहानी से अलग शहानी इस फिल्म में हाशिए पर पड़े समाज को भी लेकर आते हैं, जहाँ उनकी वर्ग-चेतन दृष्टि का पता चलता है. इंजीनियर बाबू मजदूरों के बीच ‘लिटरेसी कार्यक्रम’ चलाते हैं. तरन जाति-वर्ग भेद को तोड़ती है.
सामंती और पितृसत्तात्मक परिवेश में तरन के अकेलापन और अवसाद को निर्मल वर्मा की कहानी उकेरती है, लेकिन इस कहानी में तरन अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने का निर्णय नहीं ले पाती. सामंती परिवेश की हदबंदियां उसे जकड़ी हुई है, जबकि उसका भाई उसे तोड़ कर निकल चुका है. फिल्म में सामंतवाद का विरोध किया गया. है, जो कहानी में नहीं है. यह सारी बातें फिल्म में कलात्मक ढंग से आई है, जहाँ निर्देशक की ‘फॉर्म’ के प्रति एकनिष्ठता दिखती है. कुछ वर्ष पहले एक इंटरव्यू में जब मैंने फिल्म में कहानी से अलग ‘ट्रीटमेंट’ के बाबत उनसे सवाल पूछा था तब उन्होंने कहा था: “मैंने ‘माया दर्पण’ में सामंतवादी उत्पीड़न दिखाने की कोशिश की है. इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्पीड़न को तोड़ने की कोशिश की है. उस डांस में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ है. यह काली के रंग में भी है.” कुमार शहानी कहते हैं कि 'जब आप फिल्म बनाते हैं तब आप एक विशिष्ट काम करने की इच्छा रखते हैं-- खास कर जब आप स्वतंत्रता की बात करते हैं, जिसकी चाहत सबमें रहती है.' एक तरह से वैयक्तिक स्वतंत्रता इस फिल्म की मूल भावना है. कला में यह स्वतंत्रता किस रूप में आए, शहानी की यह फिल्म इस बात की खोजबीन करती है.
मणि कौल की तरह ही कुमार शहानी की फिल्मों में बिंब (इमेज) सायास रूप से भारतीय चित्रकला से प्रेरित दिखते हैं. अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह जैसे समकालीन फिल्मकारों पर इन अवांगार्द फिल्म निर्देशकों का स्पष्ट प्रभाव है, जिसे वे खुले मन से स्वीकारते भी है. खुद ‘माया दर्पण’ की तरन पर रॉबर्ट ब्रेसां की फिल्म ‘मूशेत (1967)’ के केंद्रीय पात्र का प्रभाव दिखता है, जिसकी आलोचना सत्यजीत रे ने की थी. साथ ही उनकी फिल्मों पर ऋत्विक घटक की फिल्मों का भी प्रभाव है. बावजूद सारे प्रभावों और आलोचना के कुमार शहानी की फिल्मों में कहानी कहने की जो शैली है वह उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अलग पंक्ति में खड़ा करता है.
'माया दर्पण' फिल्म में ध्वनि के प्रयोग के साथ संगीत के इस्तेमाल पर भी बातचीत की जानी चाहिए. हवेली के ‘टाइम-स्पेस’ को भास्कर चंदावरकर के संगीत और वाणी जयराम के स्वर ने खूबसूरती से उभारा है. कुमार शहानी कहते हैं, ‘जाहिर है, आप देखेंगे कि इस फिल्म के बाद जितनी मेरी फिल्में हैं वे ‘म्यूजिकल एपिक्स’ है’. 'तरंग', 'कस्बा', 'ख्याल गाथा' और 'चार अध्याय' उनकी अन्य चर्चित फिल्में हैं. उनकी फिल्मों पर हिंदी में गंभीर विवेचना की जरूरत है. ये फिल्में भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगी हैं, राजनीतिक विचारधारा का यहाँ समावेश है. असल में, शहानी दोनों के बीच कुशलता से आवाजाही करते रहे हैं.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Tuesday, October 25, 2022

अनूठे लेखक निर्मल वर्मा से अधूरा साक्षात्कार: हियर एंड हियरआफ्टर

 

चर्चित कवि आलोकधन्वा ने लिखा है-मीर पर बातें करो/ तो वे बातें भी उतनी ही अच्छी लगती हैं/ जितने मीर.  हाल ही में प्रकाशित विनीत गिल की किताब- हियर एंड हियरआफ्टरनिर्मल वर्माज लाइफ इन लिटरेचर (Here and Hereafter: Nirmal Verma’s Life in Literature)पढ़ते हुए ये पंक्तियाँ याद आती रही. यह किताब हिंदी के अनूठे लेखक निर्मल वर्मा (1929-2005) के जीवन और साहित्य को समेटे है. इस किताब को लेखक ने दीवानगी की सादगी’ में लिखा है. इसमें आलोचना नहीं हैखंडन-मंडन नहीं है. हिंदी साहित्य संसार से दूर रह कर निर्मल वर्मा से प्रेम करने वाले विनीत अकेले नहीं हैं. हिंदी और हिंदी के अलावे विभिन्न भाषाओं में निर्मल वर्मा के प्रशंसकों की एक अलग दुनिया है. इस किताब में युवा लेखक निर्मल के लेखन की गलियों से गुजर कर अपने लिए एक ठौरआइकन की तलाश में दिखता है.   

हिंदी में निर्मल वर्मा के साहित्य के ऊपर पर्याप्त विवेचन-विमर्श उपलब्ध है, पर ऐसा नहीं कि निर्मल को लेकर अंग्रेजी में लेखन नहीं हुआ है. ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित वे अंग्रेजी की दुनिया में भी एक परिचित नाम हैं. उनके लेखन का विपुल मात्रा में अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है. शिमला में जन्मेनिर्मल की शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी माध्यम में ही हुई थी. सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में उन्होंने एमए किया था और पिछली सदी में 60 का पूरा दशक यूरोप में बिताया था. वर्ष 1972 में वे दिल्ली लौटे थे.

निर्मल वर्मा ने कहानीउपन्यासयात्रा वृत्तांतनिबंधआलोचनाडायरी जैसी विधाओं में भरपूर लेखन किया. साथ ही यूरोप प्रवास में उन्होंने चेक साहित्य का अनुवाद भी कियापर उन्होंने अपनी आत्मकथा नहीं लिखी. वे कहते थे: ‘सिद्धांततमुझे नहीं लगता कि एक लेखक को आत्मकथा लिखनी चाहिए. मुझे अपना जीवन सार्वजनिक करने में गहरा संकोच होता है.” वैसे भी अधिकांश आत्मकथा लेखन आत्मश्लाघा ही होता है. ऐसे में निर्मल वर्मा की मुकम्मल जीवनी का अभाव है. हियर एंड हियरआफ्टर’ किताब भी इस मामले में निराश ही करती है.

आत्मकथा को लेकर निर्मल में जैसा संकोच का भाव थाउसी तरह विनीत में भी जीवनी लेखन को लेकर एक संकोच दिखता है. वे इस किताब को साहित्यिक जीवनी’ के करीब रखने के हिमायती है. वे निर्मल के लेखकीय व्यक्तित्व, परिवेश (शिमला-दिल्ली-यूरोप) भाव बोध के निर्माणसर्जना और उनके ऊपर लेखकों के प्रभाव का जिक्र करते हैं, लेकिन एक 'अधूरे साक्षात्कार' की तरह ही. किताब में उनके प्राग (चेकोस्लोवाकिया) प्रवास का विवरण रोचक है. 

प्रसंगवशपिछले दिनों ही पत्रकार अक्षय मुकुल ने हिंदी के रचनाकार अज्ञेय की जीवनी राइटररेबेलसोल्‍जरलवर: द मैनी लाइव्ज़ ऑफ अज्ञेय’ नाम से लिखी हैजो अज्ञेय के निजी जीवन, साहित्यसमाज और एक युग के राजनीतिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को विस्तार से हमारे सामने लेकर आती है. विनीत इस किताब में निर्मल वर्मा को अज्ञेय का असली वारिस कहते हैंपर किताब में आगे वे यह भी जोड़ते हैं कि  सच्चाई यह है कि वर्मा का लेखन किसी तयशुदा परंपरा में नहीं आता और इस अर्थ में उनका लेखन प्रामाणिक तौर पर भारतीय और यूरोपीय दोनों ही है.”  असल मेंनिर्मल वर्मा हिंदी साहित्य के इतिहास में नयी कहानी आंदोलन के कहानीकार के रूप में समादृत रहे हैं. उनकी 'परिंदेकहानी हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानियों में गिनी जाती है. उनकी कहानियों में मानवीय अनुभूतियों, व्यक्ति के अकेलापनअवसादघनीभूत पीड़ा का चित्रण मिलता है. शहरी मध्यवर्गीय जीवन, स्त्री-पुरुष संबंध, घर की तलाश अधिकांश कहानी के केंद्र में है. उनकी कहानियों में परिवेश मुखर होकर सामने आता है.

वर्ष 1958 में प्रकाशित उनकी बहुचर्चित कहानी संग्रह परिंदे के बारे में नामवर सिंह ने लिखा था: “फकत सात कहानियों का संग्रह परिंदे निर्मल वर्मा की ही पहली कृति नहीं है बल्कि जिसे हम नयी कहानी कहना चाहते हैंउसकी भी पहली कृति है.”   बाद में हालांकि आलोचकों ने नामवर सिंह की इस स्थापना पर सवाल उठाया था. 50 के दशक में नयी कहानी आंदोलन में इलाहाबाद के साहित्यकारों (अमरकांतशेखर जोशीमार्कण्डेय) की बड़ी भूमिका थी. निर्मल वर्मा उनसे दूर दिल्ली में थे.

नामवर सिंह के ही संपादन में  आलोचना पत्रिका (1989) के निर्मल वर्मा पर केंद्रित अंक में लिखे शोध लेख ('निर्मल वर्मा की कहानियों का सौंदर्यशास्त्र और समाजशास्त्र') में वीर भारत तलवार ने नोट किया है कि नई कहानी के दूसरे सभी कहानीकारों और निर्मल की कहानियों के बीच बहुत अधिक फर्क है...निर्मल की कहानियों का अनूठापन मुख्यततीन बातों में है-काव्यात्मक भाषाचमत्कारपूर्ण कल्पना और रहस्यात्मकता. यही तीन मुख्य विशेषताएं हैं जो उन्हें नई कहानी के दूसरे सभी कहानीकारों सेऔर शायद हिंदी की पूरी कथा-परंपरा सेअलग करती हैं.”  निर्मल वर्मा के लेखन में शब्द और स्मृति बीज पद की तरह आते हैं. उनकी कहानियों में भी स्मृतियों की बड़ी भूमिका है जो परिंदे से लेकर कव्वे और काला पानी तक में मौजूद है. 

निर्मल वर्मा के लेखन से जो मोहाविष्ट हैं उन्हें काव्यात्मक भाषाबिंबों की असंगततारहस्यीकरण के मद्देनजर तलवार के लेख को पढ़ना चाहिए. उन्होंने कहानियोंलेखों से उदाहरण देकर निर्मल की जीवन दृष्टि और कला को रेखांकित किया हैसाथ ही विस्तार से उसे प्रश्नांकित भी किया है. विनीत ने अपनी किताब में निर्मल वर्मा के एक पत्र के हवाले से लिखा है कि वे आलोचना के इस अंक से खुश नहीं थे. साहित्य में सामाजिक यथार्थ भाषा के माध्यम से ही व्यक्त होता हैआश्चर्यजनक रूप से विनीत अपनी किताब में निर्मल वर्मा की भाषा पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं करते. एक चुप्पी है यहां.

निर्मल वर्मा की कहानियों को रंगमंच पर भी प्रस्तुत किया गया. खास कर धूप का एक टुकड़ाडेढ़ इंच मुस्कानवीकएंडदूसरी दुनिया इनमें प्रमुख हैं. उनकी कहानी माया दर्पण पर समांतर सिनेमा के चर्चित निर्देशक कुमार शहानी ने इसी नाम फिल्म भी बनाई. एक बातचीत में शहानी ने मुझसे कहा था कि निर्मल ने अनेक बार यह फिल्म देखीपर उन्हें पसंद नहीं आईयह काफी अजीब था.’ निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ में सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता, जबकि इस फिल्म के अंत में यह स्पष्ट है.

विनीत गिल ने किताब की भूमिका में वैश्वीकरण के इस दौर में 'विश्व साहित्य' की अवधारणा पर सवाल उठाया है. हिंदी में लिखा साहित्य विश्व साहित्य क्यों नहीं है? गीतांजलि श्री के हिंदी उपन्यास 'रेत समाधि' (टूम ऑफ सैंड, अनुवाद डेजी रॉकवेल) को मिले अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के बाद यह सवाल 'बीच बहस में' है-- खास कर अंग्रेजी 'पब्लिक स्फीयर' (लोक वृत्त) में. 

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

 

Saturday, September 22, 2012

शिमला में निर्मल वर्मा

सितंबर की इस शाम बारिश की गंध और हवा में रोमांस है. बादलों का घेरा शहर को अपने आगोश में लिए हुए हैं. शर्ट में ठंड लगती है पर स्वेटर या स्वेट शर्ट पहनने का मन नहीं होता. ऊंची पहाड़ियों पर देवदार के पेड़ शांत और स्थिर खड़े हैं. जैसे वे सिर्फ आपको सुनेंगे भर, कहेंगे कुछ नहीं. एक आकाशधर्मा गुरु की तरह जिसके पास आपके विचारों, भावों को सुनने का पर्याप्त समय होता है.

रात की इस खामोशी और अंधेरे में गेस्ट हाउस में सिर्फ हमारी साँसे सुनाई दे रही है. पता नहीं बगल के कमरे में कोई है भी या नहीं. मैंने धीरे से रीना से कहा- 'भूत से डर तो नहीं लगता!

दिल्ली की भागमभग से दूर, मैदानों में पले-बढ़े हमारे लिए हिल स्टेशनों की नीरवता एक ख्याल सी लगती है. यूँ तो शिमला कई बार आया, पर शादी के बाद यह शिमला की पहली यात्रा थी. कुछ शब्द हमारी जबान पर मुश्किल से चढ़ते हैं. मेरे लिए हनीमून एक ऐसा ही शब्द है.

बहरहाल, छाता लेकर जब हम अगले दिन शहर घूमने निकले तो धूप के छोटे-छोटे टुकड़े खिले थे. आसमान पूरी तरह साफ नहीं था. कुछ दिनों से यहाँ बारिश हो रही थी. पर ऐसा क्यों लग रहा है कि शिमला से हर वर्ष शिमला छीजता जा रहा है. या यह सिर्फ मेरे मन का वहम है!

शहर तो वही है. मॉल रोड, गिरजा घर, गेयटी थियेटर, पुरानी किताबों की दुकानें और दूर  सामने की जाखू की पहाड़ी पर स्थित हनुमान की विशाल मूर्ति.  फिर ऐसा क्यों लगता है मुझे?

शाम होते ही मॉल रोड पर सैलानियों की भीड़ इतनी कि पाँव रखने की जगह नहीं. शोर-शराबा और बीयर की गंध!  रात होते ही सड़कों पर आवारा कुत्ते. पता नहीं पहाड़ पर स्थित शहरों में रोमांस होता है या उसकी ओबा-हवा में जो हमें अपनी ओर खींचती है.

अपने अंदर इतिहास की कई गाथाएँ समेटे वॉयसराय लॉज (वर्तमान में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) एक ऐतिहासिक धरोहर (हेरिटेज ब्लिडिंग) है. पर बाहर से यह जितना भव्य दीखता है अंदर से उतना ही खोखला. छत से टप टप रिसता पानी, लकड़ियों में लगे घुन और रख-रखाव की बुरी व्यवस्था इस इमारत की बदहाली की कहानी बयां करती है. कहते हैं कि निर्मल वर्मा ने अपने चर्चित उपन्यास लाल टीन की छत यहीं रह कर लिखा था.

निर्मल वर्मा की कहानियों, यात्रा वृत्तांतों में शिमला कई बार, कई तरहों से आया है. बचपन की स्मृतियाँ किसी भी लेखक, रचनाकर के लिए बेहद कीमती होती हैं. और यदि वह रचनाकार निर्मल वर्मा की तरह प्रतिभावान हो तो रचनाकार की स्मृतियों के साथ शहर एक पाठक के मन में अपना संसार गढ़ते हैं.

शिमला जब-जब गया मन हर बार लाल टीन की छत वाले निर्मल वर्मा के उस शहर को ढूंढ़ता रहा. शाम में मॉल रोड स्थित गेयटी थिएटर में निर्मल वर्मा की दो कहानियों धूप का एक टुकड़ा और डेढ़ इंच ऊपर का मंचन है. बाहर सड़कों पर जितनी ही ज्यादा भीड़ है, इस खूबसूरत थिएटर के अंदर उतने ही कम लोग. 

नाटक खत्म होने के बाद थिएटर से निकल कर हम सामने ही एक किताब की दुकान में घुस गए. तरह तरह की किताबों से सजे इस दुकान में निर्मल वर्मा की कोई किताब नहीं मिली. मैंने दुकानदार से लगभग चिढ़ कर कहा, आपका शहर निर्मल वर्मा को याद कर रहा है और आपके यहाँ उनकी एक भी किताब क्यों नही है.

जवाब में यह चिर-परिचित जुमला सुनने को मिला- हिंदी की किताबें कहाँ बिकती हैं!

चीड़ों पर चाँदनी संस्मरण में निर्मल वर्मा ने लिखा है, क्या यह शिमला है-हमारा अपना शहर-या हम भूल से कहीं और चले आए हैं

इस बार शिमला से आने के बाद मेरे मन में यह सवाल गूँजता रहा.

(समांतर स्तंभ के तहत जनसत्ता, 26 सितंबर 2012 को प्रकाशित)

Saturday, March 27, 2010

यात्रा में प्रेम: वियना डायरी


ढलती रात में मेघाच्छन्न आकाश तले, रंग-बिरंगी रौशनियों से नहाए वियना की गलियों में मेरे मन में एक मुग्ध नायिका की छवि उभरी.


बारिश की गंध से भरी सुबह ऐसा लगा कि यह शहर एक नव विवाहिता गृहणी हो. खुशी-खुशी घर के सारे काम निबटा कर जिसे दफ़्तर जाने की जल्दी है, लेकिन काजल जली रात की मधुर स्मृति मन में अब तक रिस रही है और गाहे-बगाहे उसके चेहरे पर स्मित मुस्कुराहट फैल जाती है.

दोपहर भीनी धूप में सड़क पर भटकते हुए मुझे एहसास हुआ कि वह नव विवाहिता एक प्रौढ़ा बन गई जिसके अंदर मोहक स्मृतियों का सुख है और ज़माने का ग़म.

शाम में शहर उस विरहनी नायिका में बदलता दिखा जो बेखुदी में खोई है.

ऐसा लगा जैसे विवियन के शांत और सौम्य चेहरे पर यह शहर अपने सारे भावों सहित रूप बदलता रहता है.

उसकी हँसी में मुझे जाने क्यों विषाद की झलक दिखी. ऐसी झलक अपने प्रेम को खोने के बाद उपजती है. लेकिन उसके चेहेरे पर बदली की तरह आ-जा रही मुस्कुराहट में जीवन को पूरे रंगों में जीने की चाहत थी.

कॉफ़ी पीने के बाद विवियन ने यह कह कर मुझसे विदा ली कि वह अगले दिन शाम को दफ़्तर से आने के बाद फिर मिलेगी और यदि मेरी इच्छा हो तो उसकी दोस्त मुझे दिन में वियना विश्वविद्यालय दिखा सकती है.

विवियन की दोस्त, वेरेना, जर्मन भाषा की छात्र है और दिल्ली में रह चुकी है. हिंदी से उसका लगाव देख मैं चौंक पड़ा.

मैंने देखा मेरे मोबाइल पर एक मैसेज है.

'हेलो जी, मैं विवि की सहेली हूं. अगर आपको वियना मे घूमना पसंद करता तो हमलोग आज दोपहर को मिल सकते. 16.15 शॉटटेनटॉर स्टेशन के पास...'

'शुक्रिया.' मैंने जवाब में लिख भेजा.

जब मैंने शॉटटेनटॉर स्टेशन के लिए ट्यूब ली, तो एक और मैसेज दिखा. अब मैं यू 2 के प्लेटफ़ॉर्म पर हूं...छोटी सूरत, नीली टोपी और काला कोट!'

मैसेज पढ़ कर मैं मुस्कुरा उठा.

सैकड़ों साल (वर्ष 1365 में स्थापित) पुराने वियना विश्वविद्यालय का यह वर्तमान ऐतिहासिक भवन क़रीब सवा सौ साल पुराना है.

छात्रों की गहमागहमी चारों तरफ़ है. मैंने नोट किया कि यूरोप में छात्र लाइब्रेरी में काफ़ी वक्त गुज़ारते हैं. छुट्टी के दिनों में भी लाइब्रेरी में भीड़ दिखती है.

विश्वविद्यालय में घूमते हुए अनायास मुझे अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक की बात याद हो आई कि 'यूरोप में जहाँ सैकड़ों वर्ष पुराने विश्वविद्यालय आज भी दमक रहे हैं, वहीं भारत के विश्वविद्यालय अपने यौवन काल में ही चरमरा गए.'

विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर, शीशे के बने पाए पर उन प्रोफ़ेसरों की पोर्ट्रेट साइज़ की तस्वीरें लगी हुई हैं जिन्हें प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं. उनके साथ एक तस्वीर ऐसी भी है जिसके चेहरे पर प्रश्नवाचक चिह्न लगा है.

वेरेना ने बताया कि यह प्रश्नवाचक चिह्न इंगित करता है कि दूसरे विश्वयुद्द के दौरान नाजियों ने यहूदियों को उनके शोध से रोका और प्रताड़ित किया. उनको देश से बाहर जाना पड़ा और यदि ऐसा नहीं होता तो यह प्रतिमा उनमें से किसी की हो सकती थी.

वेरेना ने बताया कि विश्वविद्यालय के फ़ंड में कटौती की बात को लेकर छात्रों का विरोध चल रहा है.

विश्वविद्यालय में घूमते हुए शाम हो चली. शहर के एक पुराने कॉफ़ी हाउस में विवियन हमारा इंतज़ार कर रही थी.

कॉफ़ी हाउस का हर कोना भरा हुआ था. बीयर, कॉफ़ी और सिगरेट की मिली-जुली गंध, हँसी के कहकहे और शोर.

विवियन और वेरेना ने कॉफ़ी ली और मैंने निर्मल वर्मा की याद में बीयर का एक छोटा मग लिया.
वेरेना ने कहा कि कॉफ़ी के प्यालों के साथ चीयर्स कहना अच्छा शगुन नहीं होता.

'कोई बात नहीं हम पहल करें तो शायद बात बदल जाए.'

चीयर्स!!!

हमारी मेज से सटे एक मेज पर कुछ लड़के-लड़कियाँ ज़ोर-ज़ोर से गा बजा रहे थे.

आपकी अपेक्षा के विपरीत जब बच्चा अतिथि के सामने विचित्र व्यवहार करता है तब जिस तरह का भाव आपके चेहरे पर होता है, कुछ-कुछ ऐसा ही भाव विवियन के चेहरे पर दिखा.

विवियन ने बस इतना कहा, 'वियनावासियों की एक तस्वीर ये भी है.'

'मुझे पसंद है.'

विवियन के चेहरे पर थकान झलक रही थी. उसकी अंगुलियों को मैंने अपने हाथों में ले लिया.

मैंने गौर किया कि उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कुराहट उभर रही है और थकान कम होने का भाव है.

काफ़ी ज़िद के बावजूद विवियन और वेरेना ने मुझे बिल का भुगतान नहीं करने दिया.

मैंने वेरेना से साथ डिनर करने का आग्रह किया लेकिन उसे कहीं जाना था और उसने हमसे विदा ली.

एक चीनी कहावत है कि 'यात्रा के दौरान प्रेम में नहीं पड़ना चाहिए.' इसे निर्मल वर्मा ने अपने यात्रा संस्मरण में कहीं नोट किया है.

लेकिन वियना एक ऐसा शहर है जिसके प्रेम में पड़े बिना आप रह भी नहीं सकते.

दिन में लियोपोल्ड म्यूजियम में घूमते हुए मैंने प्रसिद्ध चित्रकार गुस्ताव क्लिम्ट की कुछ पेंटिंग ख़रीदी थी.

'कार्डस में से जो भी तुम्हे पसंद है चुन लो, मैं उस पर तुम्हारा नाम लिख दूँगा.'

'नहीं, भारत पहुँच कर मुझे ये कार्ड तुम भेजना.' विवियन ने कहा.

(तस्वीर में , वियना विश्वविद्यालय और कॉफ़ी हाउस, जनसत्ता, 'समांतर' स्तंभ में 7 मई 2011 को प्रकाशित)