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Sunday, August 06, 2023

पर्दे पर मिलान कुंदेरा का साहित्य


 द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग मिलान कुंदेरा (1923-2023) की बहुचर्चित कृति है. उनकी मृत्यु के बाद साहित्य पर टीका-टिप्पणी हुई लेकिन उपन्यास पर इसी नाम से अमेरिकी फिल्मकार फिलिप कॉफमैन के निर्देशन बनी फिल्म (1988) उपेक्षित रही. मूल चेक में लिखा यह उपन्यास (1984) पहले अंग्रेजी में ही छपा था. फिल्म के बाद ही किताब की धूम दुनिया भर में मची थी.

यह उपन्यास दर्शनइतिहासराजनीतिमानवीय संबंधोंद्वंदो, अधिनायकवादी सत्ता के दुरुपयोग को 1968 में प्राग स्प्रिंग (चेकोस्लोवाकिया) की पृष्ठभूमि में अद्भुत शिल्प में रचता है. इस बहुस्तरीय किताब के कई अंश को निर्देशक ने नहीं छुआ है. मसलन फिल्म में उपन्यासकार नहीं दिखता है. फिर भी उपन्यास के मूल कथ्य और किरदारों को स्क्रीनप्ले में सुरक्षित रखा गया है. उपन्यास से अलग फिल्म एक स्वतंत्र विधा के रूप में हमें प्रभावित करती है. कई दृश्यकिरदारों के प्रभावी अभिनय और संगीत जेहन में टंगे रह जाते हैं.

टॉमास एक कुशल सर्जन है जो प्राग में रहता है. उसके कई स्त्रियों से संबंध है. तेरेजा से मुख्तसर सी मुलाकात के बाद वह शादी कर लेता है. टॉमास के संबंध हालांकि अन्य स्त्रियों से जारी रहते हैं. सबीना एक ऐसी स्वतंत्रचेता पेंटर है जिसके साथ भी टॉमास के अंतरंग रिश्ते हैं. सबीना की सहायता से तेरेजा की नौकरी एक फोटोग्राफर के रूप में लग जाती है. 1968 में जब साम्यवादी सोवियत संघ की सेना टैंकों के साथ प्राग पर धावा बोलती है, तब हम उसी के लेंस से लोमहर्षक दृश्य देखते हैं. फिल्मकार ने दस्तावेजी फुटेज के साथ बेहद खूबसूरती से टैंको के ईद-गिर्द लोगों के विरोध प्रदर्शन को चित्रित किया है. प्राग के निवासी अपने घर-बार छोड़ कर दूसरे देशों में रिफ्यूजी बनने को मजबूर हैं. फिल्म में आए घरमानवीय अस्तित्वस्वतंत्रता का सवाल मौजू है. आज जब रूसी सेना यूक्रेन में हैद अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग फिल्म प्रासंगिक हो उठी है.

उपन्यास की तरह ही फिल्म में टॉमासतेरेजासबीना देश छोड़ कर स्विट्जरलैंड चले जाते हैं. यहाँ सबीना की मुलाकात फ्रांज (प्रोफेसर) से होती है. तेरेजा स्विट्जरलैंड को स्वीकार नहीं कर पाती है और प्राग लौट आती है. सबीना फ्रांज को छोड़ कर अमेरिका चली जाती है. टॉमास को एहसास होता है कि वह तेरेजा के बिना नहीं रह सकता है और फिर पीछे-पीछे प्राग लौट आता है. लेकिन फिर भी उसके संबंध अन्य स्त्रियों के साथ बने रहते हैं. टॉमास (डेनियल डे लेविस), तेरेजा (जूलीएट बिनोचे) और सबीना (लेना ओलेन) के बीच संबंधों के तनाव, अस्तित्व के भारीपन और हल्केपन के द्वंद को बेहद खूबसूरती से फिल्म सामने लाती है.

आम तौर पर साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों से उनके रचनाकार खुश नहीं रहते हैं, कुंदेरा अपवाद नहीं थे. पर यदि हम ग्रैबिएल गार्सिया मार्केज़ या सलमान रुश्दी के उपन्यासों पर बनी फिल्मों से इस फिल्म की तुलना करें तो यह फिल्म उपन्यास की देह और आत्मा को परदे पर साकार करने में सफल रही है. उपन्यास की तरह ही फिल्म का फलसफा है: हम जीवन एक ही बार जीते हैंजिसकी तुलना न हम पिछले जीवन से कर सकते हैं न ही इसे आने वाले जीवन में बेहतर बना सकते हैं

Tuesday, October 25, 2022

अनूठे लेखक निर्मल वर्मा से अधूरा साक्षात्कार: हियर एंड हियरआफ्टर

 

चर्चित कवि आलोकधन्वा ने लिखा है-मीर पर बातें करो/ तो वे बातें भी उतनी ही अच्छी लगती हैं/ जितने मीर.  हाल ही में प्रकाशित विनीत गिल की किताब- हियर एंड हियरआफ्टरनिर्मल वर्माज लाइफ इन लिटरेचर (Here and Hereafter: Nirmal Verma’s Life in Literature)पढ़ते हुए ये पंक्तियाँ याद आती रही. यह किताब हिंदी के अनूठे लेखक निर्मल वर्मा (1929-2005) के जीवन और साहित्य को समेटे है. इस किताब को लेखक ने दीवानगी की सादगी’ में लिखा है. इसमें आलोचना नहीं हैखंडन-मंडन नहीं है. हिंदी साहित्य संसार से दूर रह कर निर्मल वर्मा से प्रेम करने वाले विनीत अकेले नहीं हैं. हिंदी और हिंदी के अलावे विभिन्न भाषाओं में निर्मल वर्मा के प्रशंसकों की एक अलग दुनिया है. इस किताब में युवा लेखक निर्मल के लेखन की गलियों से गुजर कर अपने लिए एक ठौरआइकन की तलाश में दिखता है.   

हिंदी में निर्मल वर्मा के साहित्य के ऊपर पर्याप्त विवेचन-विमर्श उपलब्ध है, पर ऐसा नहीं कि निर्मल को लेकर अंग्रेजी में लेखन नहीं हुआ है. ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कारों से सम्मानित वे अंग्रेजी की दुनिया में भी एक परिचित नाम हैं. उनके लेखन का विपुल मात्रा में अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है. शिमला में जन्मेनिर्मल की शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी माध्यम में ही हुई थी. सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में उन्होंने एमए किया था और पिछली सदी में 60 का पूरा दशक यूरोप में बिताया था. वर्ष 1972 में वे दिल्ली लौटे थे.

निर्मल वर्मा ने कहानीउपन्यासयात्रा वृत्तांतनिबंधआलोचनाडायरी जैसी विधाओं में भरपूर लेखन किया. साथ ही यूरोप प्रवास में उन्होंने चेक साहित्य का अनुवाद भी कियापर उन्होंने अपनी आत्मकथा नहीं लिखी. वे कहते थे: ‘सिद्धांततमुझे नहीं लगता कि एक लेखक को आत्मकथा लिखनी चाहिए. मुझे अपना जीवन सार्वजनिक करने में गहरा संकोच होता है.” वैसे भी अधिकांश आत्मकथा लेखन आत्मश्लाघा ही होता है. ऐसे में निर्मल वर्मा की मुकम्मल जीवनी का अभाव है. हियर एंड हियरआफ्टर’ किताब भी इस मामले में निराश ही करती है.

आत्मकथा को लेकर निर्मल में जैसा संकोच का भाव थाउसी तरह विनीत में भी जीवनी लेखन को लेकर एक संकोच दिखता है. वे इस किताब को साहित्यिक जीवनी’ के करीब रखने के हिमायती है. वे निर्मल के लेखकीय व्यक्तित्व, परिवेश (शिमला-दिल्ली-यूरोप) भाव बोध के निर्माणसर्जना और उनके ऊपर लेखकों के प्रभाव का जिक्र करते हैं, लेकिन एक 'अधूरे साक्षात्कार' की तरह ही. किताब में उनके प्राग (चेकोस्लोवाकिया) प्रवास का विवरण रोचक है. 

प्रसंगवशपिछले दिनों ही पत्रकार अक्षय मुकुल ने हिंदी के रचनाकार अज्ञेय की जीवनी राइटररेबेलसोल्‍जरलवर: द मैनी लाइव्ज़ ऑफ अज्ञेय’ नाम से लिखी हैजो अज्ञेय के निजी जीवन, साहित्यसमाज और एक युग के राजनीतिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को विस्तार से हमारे सामने लेकर आती है. विनीत इस किताब में निर्मल वर्मा को अज्ञेय का असली वारिस कहते हैंपर किताब में आगे वे यह भी जोड़ते हैं कि  सच्चाई यह है कि वर्मा का लेखन किसी तयशुदा परंपरा में नहीं आता और इस अर्थ में उनका लेखन प्रामाणिक तौर पर भारतीय और यूरोपीय दोनों ही है.”  असल मेंनिर्मल वर्मा हिंदी साहित्य के इतिहास में नयी कहानी आंदोलन के कहानीकार के रूप में समादृत रहे हैं. उनकी 'परिंदेकहानी हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानियों में गिनी जाती है. उनकी कहानियों में मानवीय अनुभूतियों, व्यक्ति के अकेलापनअवसादघनीभूत पीड़ा का चित्रण मिलता है. शहरी मध्यवर्गीय जीवन, स्त्री-पुरुष संबंध, घर की तलाश अधिकांश कहानी के केंद्र में है. उनकी कहानियों में परिवेश मुखर होकर सामने आता है.

वर्ष 1958 में प्रकाशित उनकी बहुचर्चित कहानी संग्रह परिंदे के बारे में नामवर सिंह ने लिखा था: “फकत सात कहानियों का संग्रह परिंदे निर्मल वर्मा की ही पहली कृति नहीं है बल्कि जिसे हम नयी कहानी कहना चाहते हैंउसकी भी पहली कृति है.”   बाद में हालांकि आलोचकों ने नामवर सिंह की इस स्थापना पर सवाल उठाया था. 50 के दशक में नयी कहानी आंदोलन में इलाहाबाद के साहित्यकारों (अमरकांतशेखर जोशीमार्कण्डेय) की बड़ी भूमिका थी. निर्मल वर्मा उनसे दूर दिल्ली में थे.

नामवर सिंह के ही संपादन में  आलोचना पत्रिका (1989) के निर्मल वर्मा पर केंद्रित अंक में लिखे शोध लेख ('निर्मल वर्मा की कहानियों का सौंदर्यशास्त्र और समाजशास्त्र') में वीर भारत तलवार ने नोट किया है कि नई कहानी के दूसरे सभी कहानीकारों और निर्मल की कहानियों के बीच बहुत अधिक फर्क है...निर्मल की कहानियों का अनूठापन मुख्यततीन बातों में है-काव्यात्मक भाषाचमत्कारपूर्ण कल्पना और रहस्यात्मकता. यही तीन मुख्य विशेषताएं हैं जो उन्हें नई कहानी के दूसरे सभी कहानीकारों सेऔर शायद हिंदी की पूरी कथा-परंपरा सेअलग करती हैं.”  निर्मल वर्मा के लेखन में शब्द और स्मृति बीज पद की तरह आते हैं. उनकी कहानियों में भी स्मृतियों की बड़ी भूमिका है जो परिंदे से लेकर कव्वे और काला पानी तक में मौजूद है. 

निर्मल वर्मा के लेखन से जो मोहाविष्ट हैं उन्हें काव्यात्मक भाषाबिंबों की असंगततारहस्यीकरण के मद्देनजर तलवार के लेख को पढ़ना चाहिए. उन्होंने कहानियोंलेखों से उदाहरण देकर निर्मल की जीवन दृष्टि और कला को रेखांकित किया हैसाथ ही विस्तार से उसे प्रश्नांकित भी किया है. विनीत ने अपनी किताब में निर्मल वर्मा के एक पत्र के हवाले से लिखा है कि वे आलोचना के इस अंक से खुश नहीं थे. साहित्य में सामाजिक यथार्थ भाषा के माध्यम से ही व्यक्त होता हैआश्चर्यजनक रूप से विनीत अपनी किताब में निर्मल वर्मा की भाषा पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं करते. एक चुप्पी है यहां.

निर्मल वर्मा की कहानियों को रंगमंच पर भी प्रस्तुत किया गया. खास कर धूप का एक टुकड़ाडेढ़ इंच मुस्कानवीकएंडदूसरी दुनिया इनमें प्रमुख हैं. उनकी कहानी माया दर्पण पर समांतर सिनेमा के चर्चित निर्देशक कुमार शहानी ने इसी नाम फिल्म भी बनाई. एक बातचीत में शहानी ने मुझसे कहा था कि निर्मल ने अनेक बार यह फिल्म देखीपर उन्हें पसंद नहीं आईयह काफी अजीब था.’ निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ में सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता, जबकि इस फिल्म के अंत में यह स्पष्ट है.

विनीत गिल ने किताब की भूमिका में वैश्वीकरण के इस दौर में 'विश्व साहित्य' की अवधारणा पर सवाल उठाया है. हिंदी में लिखा साहित्य विश्व साहित्य क्यों नहीं है? गीतांजलि श्री के हिंदी उपन्यास 'रेत समाधि' (टूम ऑफ सैंड, अनुवाद डेजी रॉकवेल) को मिले अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के बाद यह सवाल 'बीच बहस में' है-- खास कर अंग्रेजी 'पब्लिक स्फीयर' (लोक वृत्त) में. 

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

 

Sunday, April 17, 2022

साहित्य व सिनेमा के बीत संवाद: Drive My Car


यूसुके हमागुची निर्देशित जापानी भाषा की फिल्म ड्राइव माय कारको पिछले दिनों सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फिल्म के लिए ऑस्कर पुरस्कार मिला. यह फिल्म रचनात्मक जीवन, प्रेम, सेक्स, विवाहेत्तर संबंध जैसे जटिल विषय को सहजता से सामने लेकर आती है. प्रसिद्ध जापानी रचनाकार हारुकी मुराकामी की इसी नाम से लिखी कहानी पर फिल्म आधारित है, हालांकि उनकी कुछ अन्य कहानियों, जो कि मेन विदाउट वीमेनमें संकलित है, की झलक भी मिलती है. बावजूद इसके फिल्म महज कहानी को रूपांतरित नहीं करती. सिनेमा का सम्मोहन हमें तीन घंटे तक बांधे रखता है. कार में यात्रा के दौरान टाइम और स्पेसको जिस खूबसूरती से निर्देशक ने फिल्माया है और संपादित किया है वह कहीं से फिल्म को बोझिल नहीं बनाता है. बिना किसी अवरोध और नाटकीयता के फिल्म एक प्रवाह में आगे बढ़ती जाती है.

फिल्म काफूकू (हिदेतोशी निशिजिमा) और ओटो (रिका किरिशिमा) दंपत्ति के इर्द-गिर्द है. दोनों रंगमंच-टीवी-फिल्म की दुनिया से जुड़े  हैं. ओटो के कई पुरुषों के साथ संबंध हैं, जिसे काफूकू जानता है. पर इस बात को लेकर वह कभी ओटो से कोई सवाल नहीं करता. ओटो की अचानक मौत हो जाती है. कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं. काफूकू अकेला हो जाता है. दो साल बाद हिरोशिमा में एक थिएटर समारोह में चेखव के नाटक अंकल वान्याके निर्देशन का उसे प्रस्ताव मिलता है, जहाँ उसे ड्राइवर के रूप में एक युवती मिसाकी (टोको मिउरा) मिलती है. उससे  वह अपने मन की व्यथा साझा करता है. इस क्रम में हम एक रिश्ते को उभरते देखते हैं. मिसाकी की कहानी से रू-ब-रू होते हैं. यहां फिल्म दुख, संत्रास, अपराध बोध जैसी मानवीय संवेदनाओं को चित्रित करती है. 

हम व्यक्तित्व के उस गोपनीय कोने में दाखिल होते हैं जहां पर प्रवेश वर्जित है. आत्मा पर लगे खरोंच को जिस खूबसूरती से काफूकू का किरदार उकेरता है, सवाल है कि क्या वह  'वान्या' की तरह ही अभिनय कर रहा है? क्या जीवन एक नाटक है, जहाँ हम सब अभिनय करते हैं?

इस फिल्म की खासियत यह है कि एक साथ ही यह साहित्य, सिनेमा और नाटक के बीच आवाजाही करती है. मुराकामी की कहानियों में जो फलसफा है उसे निर्देशक ने एक नई दृष्टि से परदे पर उतारा है. 

इन वर्षों में कोई भी भारतीय फिल्म ऑस्कर पुरस्कार नहीं जीत पाई है. करीब बीस साल पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म श्रेणी में लगानसे उम्मीद जगी थी, लेकिन उसके बाद कोई भी फिल्म अंतिम दौर तक भी नहीं पहुँच पाई.  क्या भारतीय फिल्में ड्राइव माय कारकी तरह साहित्य का सहारा नहीं ले सकती? ऐसा नहीं कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का अभाव हो.

उल्लेखनीय है कि ऑस्कर से सम्मानित सत्यजीत रे की फिल्में साहित्यिक कृतियों पर ही आधारित रही हैं. बॉलीवुड की बात करें तो यहाँ पर यह नोट करना उचित होगा कि साहित्य पर फिल्म बनाने की शुरुआत प्रेमचंद की कृति सेवासदनपर बनी फिल्म (1934) के साथ ही शुरु हो गई थी, लेकिन सिनेमा पर बाजार का दबाव ऐसा रहा कि फिल्मकार साहित्य से संवाद करने से परहेज ही करते रहे. 

Saturday, June 30, 2018

एक कवि जो चौकीदार है

उमेश पासवान
यदि किसी कवि से बात करनी हो और आपके पास उनका नंबर नहीं हो तो आप क्या करेंगे? आप प्रकाशक को फोन करेंगे, अकादमी से नंबर मांगेंगे.

पर क्या आप मानेंगे कि मैंने थाने में फोन किया और एक कवि का नंबर मांगा.

सच तो यह है कि पहले मैंने साहित्य अकादमी को ही फोन किया था जिसने इस कवि को उसकी कविता पुस्तक वर्णित रस के लिए मैथिली भाषा में इस वर्ष (2018) का साहित्य अकादमी 'युवा साहित्य पुरस्कार' के लिए चयन किया है. पर उनके पास नंबर नहीं था.

मधुबनी जिले के लौकही थाना प्रभारी ने ख़ुशी-ख़ुशी मुझसे उस कवि का नंबर शेयर किया. असल में पेशे से चौकीदार उमेश पासवान इस थाने में कार्यरत हैं. पर जब आप बात करेंगे तो ऐसा नहीं लगेगा कि आप किसी पुलिसवाले से बात कर रहे हैं. शुद्ध मैथिली में उनसे हुई बातचीत का सुख एक कवि से हुई बातचीत का ही सुख है. हालांकि वे कहते हैं कि उनके लिए कविता अपनी पीड़ा को कागज पर उतारने का जरिया है.

कबीर के बारे में प्रधानमंत्री मोदी बोल रहे थे कि कैसे उनके लिए कविता जीवन-यापन से जुड़ी हुई थी. ठीक यही बात युवा कवि उमेश पासवान कहते हैं. वे कहते हैं कि चौकीदार थाने के लिए आँख का काम करता है. उनका कहना है- मैं गाँव-गाँव जाकर जानकारी इकट्ठा करता हूँ और इस क्रम में उनके सुख-दुख, आशा-अभिलाषा का भागीदार भी बनता हूँ. खेत-खलिहान, घर-समाज का दुख, कुरीति, भेदभाव, लोगों की पीड़ा मेरी कविता की भूमि है.

उनकी एक कविता है- गवहा संक्राति. सितंबर-अक्टूबर महीने में मिथिला में किसान धान के कटने के बाद खेत में उपज बढ़ाने के निमित्त इस पर्व को मनाते हैं. पर भुतही, बिहुल और कमला-बलान नदी में आने वाली बाढ़ की त्रासदी में इस इलाके में पर्व-त्योहार की लालसा एक किसान के लिए हमेशा छलावा साबित होती है. वे इस कविता में लिखते है:

बड़ अनुचित भेल/गृहस्त सबहक संग ऐबेर/खेती मे लगाल खर्चा/ मेहनति-मजदुरी/ सभ बाढ़िंक चपेटि मे चलि गेल/ पावनि-तिहार में सेहन्ता लगले रहि गेल

(बड़ा अनुचित हुआ/ इस बार गृहस्थ सबके साथ/ खेती में लगा खर्च/ मेहनत-मजदूरी/ सब बाढ़ के चपेट में चला गया/ पर्व-त्योहार की अभिलाषा लगी ही रह गई)

आगे वे लिखते हैं कि किस तरह किसान खेत में जाकर सेर के बराबर/ उखड़ि के जैसा बीट’/ समाठ के जैसा सिसकी बात करेंगे?

साहित्य अकादमी के इतिहास में मेरी जानकारी में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी दलित को मैथिली भाषा में पुरस्कार मिला है.

यह पूछने पर कि क्या आपको इस बात की अपेक्षा थी कि कभी साहित्य अकादमी मिल सकता है? उमेश कहते हैं- नहीं, मुझे आश्चर्य हुआ. मेरे घर-परिवार के लोग अकादमी को नहीं जानते. जब मैंने इस पुरस्कार के बारे में अपनी माँ से कहा तो पहला सवाल उन्होंने किया कि इसमें पैसा मिलता है या देना पड़ता है?’

उमेश ने पुरस्कार में मिलने वाली राशि को शहीदों के बच्चों के निमित्त जमा करने का निर्णय लिया है.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2004 में मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर भाषा का दर्जा दिया गया, पर दुर्भाग्यवश मैथिली भाषा-साहित्य में ब्राह्मणों और कर्ण कायस्थों की उपस्थिति ही सब जगह नजर आती है जबकि पूरे मिथिला भू-भाग में यह बोली ओर समझी जाती रही है.

ऐसा नहीं कि मैथिली में अन्य जाति, समुदाय से आने वाले सक्षम कवि-लेखक नहीं हुए हैं. दुसाध समुदाय से ही आने वाले विलट पासवान बिहंगमकी कविता को लोग आज भी याद करते हैं. पर जब पुरस्कार देने की बात आती है तो इनके हिस्से नील बट्टा सन्नाटा आता है.

उमेश कहते हैं इसके लिए आप पुरस्कार समिति या ज्यूरी से पूछिए और देखिए कि उसमें प्रतिनिधि किनका है? वे मैथिली के प्रचार-प्रसार की बात करते हैं और कहते हैं कि मैथिली को प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम बनाए जाने की आवश्यकता है.

उमेश कहते हैं कि मेरे घर में पढ़ने-लिखने का माहौल नहीं था, पर पिताजी चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूँ… वर्ष 2008 में पिताजी की मृत्यु के बाद मुझे अनुकंपा के आधार पर थाने में चौकीदारी मिल गई. अब मैं अपने सपनों को कविता के माध्यम से जीता हूँ.” 


(लल्लन टॉप वेबसाइट पर प्रकाशित)