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Friday, August 19, 2022

शहरनामा-झंझारपुर



जिले की चाह लिए एक कस्बा

गाँवों से घिरा झंझारपुर एक कस्बा हैजो शहर होना चाहता है. बिहार के मधुबनी जिले के इस सब डिवीजन के अंदर जिला बनने की ख्वाहिश कई दशक से है. जैसा कि छोटे कस्बों में रहने वालों की चाह होती हैस्कूल से पढ़-लिखकर हर कोई दरभंगा-दिल्ली की रेलगाड़ी पकड़ना चाहता है. अब तो दरभंगा में हवाईअड्डा भी है! क्या यह शहर हैयह सवाल बहुत बाद में हमारे मन में आयाजब हमने शहरों को देखा और वहीं के होकर रह गए. लेकिन हमारे बचपन का तो यही पहला शहर है. यहाँ थाना हैबाजार हैकोर्ट--कॉलेज हैस्टेडियम भी है. हांयहां के बांस टॉकीज’ में ही हमने पहली फिल्म देखी. माँ भी कहती है कि मैथिली की पहली फिल्म कन्यादान’ उन्होंने वर्ष 1972-73 में बांस टॉकीज में ही देखी थी.

जिसके आंगन बहती है नदी

झंझारपुर के आंगन में नदी बहती है. असल में कमला और बलान नदियों के तट पर बसा यह शहर राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहा है. यह लोकसभा क्षेत्र भी है जहाँ से चुनकर देवेंद्र यादव जैसे सांसद केंद्र सरकार में मंत्री बने. पर बिहार के राजनीतिक इतिहास में यह पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र की वजह से जाना जाता हैजो झंझारपुर विधानसभा से चुन कर बिहार के मुख्यमंत्री बनते रहे. लंगड़ा चौक पर बैठ कर राष्ट्रीय जनता दल के नेताप्रोफेसर रामदेव भंडारी को अखबार बांचते हमने देखा और बाद में राज्यसभा में भी. यहीं हमने राजीव गाँधीचंद्रशेखरवी पी सिंह और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता को देखा-सुना. दादी के मुँह से लाट साहबों से किस्से सुने.  भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में झंझारपुर स्थित थाने को घेरने-जलाने की बात भी मैंने स्वतंत्रता सेनानियों के मुँह से सुनी है. किसी इतिहासकार को इस शहर के राजनीतिक इतिहास को पंक्तिबद्ध करनी चाहिए.

सांस्कृतिक एकता का पुल

बीसवीं सदी की शुरुआत में कमला-बलान नदी पर करीब दो सौ बीस फीट लंबा रेल बिज्र बना कर अंग्रेजों ने झंझारपुर को अन्य शहरों से जोड़ा था. 1970 के दशक की शुरुआत में इस पुल को रेल-सह-सड़क में तब्दील कर दिया गया, जो दशकों तक लोगों के लिए कौतुक का केंद्र बना रहा. ट्रैफिक के कारण और बाढ़ के दिनों में यह अक्सर परेशानी का सबब भी रहा. अब यह पुल इतिहास के पन्नों में है. पिछले दिनों इसी पुल के समांतर रेलवे ने एक ब्रिज तैयार कर दिया. वैसे दस-बारह साल पहले ही राष्ट्रीय राजमार्ग 57 ने इस ‘अजीबोगरीब पुल’ की अहमियत कम कर दी थी. कोसी के किनारे बसे शहर अब कमला-बलान के करीब आ गए हैं. रेलमार्ग और राजमार्ग मिथिला की सांस्कृतिक एकता के पुल हैजो शहर के कारोबारियों के लिए भी नए अवसर लेकर आया है.

कला पारखी की तलाश में

मधुबनी मिथिला पेंटिंग का दूसरा नाम है, हालांकि यह नाम मिथिला पेंटिंग के साथ न्याय नहीं करता. झंझारपुर के आस-पड़ोस के लगभग हर गाँव में मिथिला पेंटिंग होती है. दरभंगा-मधुबनी से दूरी होने की वजह से कलाकारों की पहुँच सत्ता केंद्रों तक नहीं हो पाती है. मधुबनी जिले के रांटी’ और जितवारपुर’  गांव राष्ट्रीय पटल पर छा गएझंझारपुर के गाँव उसी तरह कला पारखियों के इंतजार में हैं. क्या पता कोई सीता देवीगंगा देवीदुलारी देवी भविष्य के गर्भ में छिपी हो?

मिथिला के इतिहासकार राधाकृष्ण चौधरी ने लिखा है कि झंझारपुर के बने कांस्य-पीतल के बर्तनों की मांग दक्षिणी राज्यों में थी. आज भी बाजार में कुशल कारीगर मौजूद हैंलेकिन वस्तुओं की मांग नहीं है. बाजार में गहमागहमी रहती हैपर वह रौनक नहीं जो तीन दशक पहले तक थी. कई मारवाड़ी उद्यमी शहर छोड़ कर दिल्लीसूरतमुंबई जा बसे हैं.

बेलारही का पुस्तकालय

शहरी क्षेत्र से सटे गांव बेलारही में 85 साल पुराना एक पुस्तकालय है, मिथिला मातृ-मंदिर. पिछले दिनों इसे सांसद-विधायक विकास निधि से किताबों की आमद हुई है. शहर में एक भी पुस्तकालय न होना अखरता है, जबकि ललित नारायण जनता कॉलेज करीब साठ साल पुराना है. केजरीवाल और टेवरीवाल हाईस्कूल से निकले पुराने छात्र पूरे देश में मौजूद हैंलेकिन अपनी मातृ संस्था की सुध किसे है! कहते हैं प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर डी एन झा ने अपनी नौकरी की शुरुआत झंझारपुर से ही की थी. यशवंत सिन्हा ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के दौरान अपना पहला प्रशिक्षण नजदीक के 'सिमरा' गाँव के निवासी आइएएस भागीरथ लाल दास के साथ किया था. शांति स्वरूप भटनागर सम्मान से सम्मानित गणितज्ञ अमलेंदु कृष्ण भी इसी जगह से ताल्लुक रखते हैं.

कोई भी बन जाए भोजन भट्ट

मिथिला अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता की वजह से पूरी दुनिया में जाना जाता है. शहर में ‘पग-पग पोखर माछ मखान’ है. तरह-तरह की मछलीकिस्म-किस्म के चावलचूड़ासाग-सब्जीआम के विभिन्न प्रकार किसी को भी भोजन भट्ट’ बनाने के लिए पर्याप्त हैं. अब स्ट्रीट फूड- मुरहीचूड़ाकचरीचप के साथ-साथ चाउमीन और चाट भी नुक्कड़-चौराहे पर मिलने लगे हैं.

आस-पड़ोस के लोग शहर छोड़कर महानगरों में जा बसे हैंलेकिन वे शादी-ब्याहछठ आदि में गामक घर’ देखने जरूर आते हैं. यदि यहाँ स्वास्थ्य सुविधा बहाल हो जाए तो आने वाले सालों में लोग वापस अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे और अपने अनुभव से इस शहर को संवृद्ध करेंगे. यूं एक मेडिकल कॉलेज का निर्माण कार्य जोर-शोर से चल रहा है.

{आउटलुक (5 सितंबर 2022)}

Friday, November 05, 2010

मगध की शांति

सन् 1991 की मई की गर्मियों में लोकसभा चुनाव की लहर थी. हज़ारों लोगों की हुजूम के साथ मैं भी राजीव गाँधी को सुनने गया था.

सच कहूँ तो सुनने से ज्यादा दरअसल देखने गया था. इतना याद है कि किसी ने मुझे अपने कंधे पर बिठा कर राजीव गाँधी को दिखाया था. वे झंझारपुर आए थे, मेरे गाँव का कस्बा. इसी झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी की टिकट पर चुनाव जीत कर जगन्नाथ मिश्र बिहार में राज करते रहे.

राजीव गाँधी को देख कर मैं बहुत खुश हुआ था. लेकिन तब तक हमारे स्कूल की दीवारों पर राजीव गांधी और कांग्रेस के विरोध में नारे दिखने लगे थे. बाल मन में जब हम उन नारों के मायने ढूँढ़ रहे थे, उसी दौरान बिहार में सत्ता समीकरण भी बदला था. लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सत्ता संभाल ली थी.

चरवाहा विद्यालय जैसी योजनाओं और आम जनों की भाषा में बात करने की अपनी विशिष्ट शैली की वजह से देश-विदेश की मीडिया की नजरों में वे तुरंतहीरोबन गए थे. एक नए विहान की आस लोगों के मन में जगी थी. लेकिन उसके बाद मीडिया में बिहार की जो छवि बनती गई वह अब एक इतिहास है.

बिहार में हर चुनाव विशिष्ट रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव के बारे में दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी ने लिखा था कि 'बिहार में यदि चुनाव नहीं देखा तो क्या देखा.' एक बार फिर से बिहार में हो रहे विधानसभा चुनाव पर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मीडिया की निगाहें टिकी है. विकास के मुद्दे और जातीय समीकरणों के बीच इस बार कांग्रेस की अलख जगाने पार्टी के महासचिव युवराजराहुल गाँधी बिहार चुनाव के मैदान में उतरे हैं. लेकिन 20 वर्षों में बिहार के राजनीतिक समीकरणों में गाँधी परिवार का करिश्मा अब धूमिल पड़ गया है. हेलिकॉप्टरों से उड़ती धूल से बिहार की जनता की आँखें अब नहीं चौधियाती. इन वर्षों में जो लोग कांग्रेसी थे उन्होंने भी पाले बदल लिए. झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के पुत्र विधानसभा चुनाव जीते थे, पर वे कांग्रेस से नहीं, बल्कि फिर इस बार की तरह जनता दल (एकी) से चुनाव लड़े थे.

मीडिया में विकास पुरूषनीतिश कुमार के विकास कार्यों की तारीफ हो रही है. चुनावी पंडित कह रहे हैं कि इस बार चुनाव में जातीय समीकरण नहीं, विकास की बातें वोटरों के मन में है. लेकिन विकास की बात सड़कों से शुरू होकर सड़कों पर ही खत्म हो जा रही है.

मेरे गाँव की सड़क जो अधपकी बीच में ही बन कर रह गई थी वह पिछले 20 वर्षों में वैसी ही है. बिजली कभी-कभी अतिथि सा आ जाती है. प्राथमिक स्कूल में मास्टर साहब बच्चों को हांकते रहते हैं. इन्हें देख नागार्जुन के दुखरन मास्टर की याद ताजा हो जाती है. गंदगी में पनपते मलेरिया के मच्छरों के बीच लोग रामभरोसे जी रहे हैं. पूरे इलाक़े के लिए एक खस्ताहाल अस्पताल है जिसमें किसी गर्भवती महिला या मरीज के लिए खून देने की भी व्यवस्था नहीं है. ऐसा लगता है कि इन वर्षों में रेणु के मैला आंचल में और ज्यादा धूल भर गई हो.

नब्बे के दशक में बिहार से छात्रों का दूसरे राज्यों में जो पलायन शुरू हुआ वह बदस्तूर जारी है. इन वर्षों में उच्च शिक्षा की बदहाली जिस कदर हुई वह किसी से छुपी नहीं है. इसका दंश सबसे ज्यादा हमारी पीढ़ी ने भोगा है. हां, हाल के वर्षों में बीच-बीच में बिहार में प्रस्तावित नालंदा विश्वविद्यालय और इससे जुड़ी गौरव की चर्चा हो जाती है, बस!

हम जैसे मध्यम वर्ग से आए लोग जिनके पास सांस्कृतिक पूँजी और आय थी, मौक़ा मिलते ही महानगर की ओर भाग लिए और भूमंडलीकरण-उदारीकरण के रथ पर चढ़ने की कोशिश में है. पर मेरे साथ गाँव की स्कूल में पढ़ने और खेलने वाले मेरे दोस्त नथुनी पासवान और मदन मंडल वहीं कहीं छूट गए. जो किसान और खेतिहर मज़दूर काम की तलाश में शहर आए वे एक स्लम से निकल कर दूसरे स्लम में फँसेHh हैं.

बिहार में जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था नहीं सुधरेगी तब तक विकास की कोई भी बात बेमानी है. लेकिन जैसा कि मगध कविता संग्रह की एक कविता में श्रीकांत वर्मा ने लिखा है: कोई छींकता तक नहीं/ इस डर से/ कि मगध की शांति भंग ना हो जाए/ मगध को बनाए रखना है, तो/ मगध में शांति रहनी ही चाहिए.

ऐसा लगता है चुनावी महापर्व में वर्षों बाद बिहार में आई शांति को मीडिया अपने सवालों से भंग नहीं करना चाहता.

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 4 नवंबर 2010 को प्रकाशित)