Monday, November 26, 2007

कामगार के हाथ





पिछले बारह सालों से दिल्ली में हूँ लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला देखने, घूमने का मौका कभी नहीं मिल पाया. इस बार एक मित्र के आग्रह पर व्यापार मेला घूमा तो जरूर पर ‘बाज़ार से गुजरा हूँ लेकिन ख़रीदार नहीं हूँ’ का भाव लिए हुए ही.

मेले में घूमते हुए उत्तर आधुनिकतावादी चिंतक ज्याँ बौद्रिला का कहना, ‘पूँजीवीदी समाज में केंद्रीय स्थान उत्पादन को नहीं बल्कि उपभोग को है’ मन में कौंधता रहा.

मेले में भीड़ काफ़ी थी. मैं एक स्टॉल पर बनारसी साड़ी की बारीकियों से उलझता रहा...पर खरीदार वहाँ नहीं थे.

बनारस से आए बुनकर बिलाल के चेहरे पर माल नहीं बिकने का दर्द स्पष्ट झलकता था. कबीर की रहँटा की याद आई.

कबीर याद आए-‘सुखिया सब संसार है खावे और सोवे, दुखिया दास कबीर है जागे और रोवे.’

मित्र ने थाईलैंड के स्टॉल से लकड़ी के बने खूबसूरत एक स्त्री की दुआ में जुड़े हाथ मुझे भेंट किए. मैं उन हाथों को हाथ में लिए सोचता रहा- ‘दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए’

Saturday, November 10, 2007

इस बार जेएनयू का रंग कैसा


जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में इस बार भी मार्क्स, लेनिन, भगत सिंह के नारे लगे. लेकिन...इस बार जेएनयू का रंग कैसा- आइसा, आइसा का नारा बुलंदी पर रहा.
जेएनयू छात्रसंघ में पहली बार आइसा चारों पदों (अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव) पर विजयी रही. पहली बार जेएनयू के इतिहास में एसएफआई -एआईएसएफ का सफ़ाया हुआ. ज़ाहिर है नंदीग्राम, सिंगुर का मुद्दा चुनाव में हावी रहा. आरक्षण के मुद्दे ने भी अपना रंग दिखाया, दो पदों पर 'यूथ फॉर इक्वलिटी' के प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे.
पारंपरिक 'प्रेसिडेंसिल डिबेट' की रात 'राम के नाम' पर घमासान हुआ.पहली बार डिबेट पूरी नहीं हो पाई. जबकि ऐसा लग रहा था कि चुनाव स्थगित हो सकता है जेएनयू की जनता ने भारी मतों से चुनाव को सफल बनाया. लोकतंत्र फिर जीता.

Thursday, September 20, 2007

एक संपूर्णता के लिए

घुघुआ मना उपजे घना’ गाते-झूलते हुए सुनी दादी-नानी की कहानी अब याद नहीं। याद हैं उनके जीवनानुभव जो उन्होंने भोगे थे। माँ ने कभी कहानी नहीं सुनाई। शायद उनके पास उन अनुभवों का अभाव था जो कहानी कहने के लिए जरूरी होता है, या संभव है कि अपने अनुभवों को हमसे बाँटना उचित न समझा हो। बहरहाल, कविता-कहानी से जुड़ाव छुटपन में ही हो गया था। बड़े भाई साहित्य के छात्र थे। जिस साल मैंने गाँव से दसवीं पास किया उसी साल उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए करने के लिए अपना नामांकन जेएनयू में करवाया था। छुट्टीयों में घर आने पर उन्होंने जेएनयू की बहुत सी बातों के अलावा वहाँ पर पढ़ाई गई कहानियों की चर्चा की थी। वीर भारत तलवार उन्हें कहानियाँ पढ़ाते थे। वे कहते थे कि तलवार जब कहानी पढ़ाते हैं उनके चेहरे पर रसोद्रेक स्पष्ट देखा जा सकता है। कहानी पढ़ाते समय उनका चेहरा सुर्ख हो जाता है । कभी भावुक, कभी आह्लादित तो कभी आवेशित हो उठते हैं।

जहाँ से मैं ने एम.ए किया वहाँ कहानी पढ़ाने के नाम पर लीपा-पोती का काम ज्यादा हुआ। वैसे भी कहानी के बारे में अक्सर सुनने को मिलता है कि कहानी पढ़ाने की नहीं, पढ़ने की चीज है। और छात्रों को खुद पढ़ लेने की ‘नेक’ सलाह अधिकांश शिक्षक दिया करते हैं। कुछ साल पहले जब मैं ने जेएनयू में एम. फिल हिन्दी में दाखिला लिया भाई साहब की बातें अनायास याद हो आई थी। मैं ने अनुमति लेकर एम.ए के छात्रों के संग कथा-साहित्य की कक्षाँए की।

तलवार जब कहानी पढ़ाते हैं तो पूरी नेम-टेम और नियम-निष्ठा के साथ। कहानी पढ़ाते समय वे इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि छात्रों की रूचि पाठ में आद्योपांत बनी रहे । विशेषकर नई कहानी पढ़ाते समय वे कहानीकारों के छुए-अनछुए प्रसंगों की चर्चा करते चलते हैं। व्यक्तिगत संस्मरण भी इसमें शामिल रहता है। लेकिन इसके बाद वे हठात कहानी पढ़ाने नहीं लग जाते। कहानीकार की अन्य कहानियों के ताने-बाने से उस कहानी तक पहुँचते हैं, फिर उसके बरक्स कहानी की व्याख्या करते हैं। फिर भी तलवार इस बात को स्वीकार करते हैं कि कहानी कैसे और कहाँ से बताई जाए, उनके लिए हमेशा एक सवाल रहा है। कहानी पढ़ाते समय वे अपने पहनावे का भी खासा ध्यान रखते हैं। कहानी अगर प्रेम कहानी हुई तो उनका पहनावा वैसा नहीं होता जैसा अन्य कहानी पढ़ाते समय। ‘कफ़न’ और ‘रसप्रिया’ के लिए अलग-अलग पहनावा।

यहाँ पर एक कहानी ‘कोसी का घटवार’ की चर्चा प्रासांगिक होगा। अदभुत प्रेम कहानी है यह। सच है कि जैसी प्रेम कहानी नई कहानी के दौर में लिखी गई वैसी कहानी हिन्दी साहित्य में दुर्लभ हैं। हां! ‘उसने कहा था’ एक अपवाद कही जाएगी। इस प्रेम में वाचालता नहीं है। पूरी कहानी में प्रेम जैसा कोई शब्द नहीं है। पर स्थायी भाव के रूप में वह पूरी कहानी में व्याप्त है। एक पीड़ा भरी प्रतीक्षा, जिसे नामवर सिंह ने नई कहानी की एक प्रमुख विशेषता कहा है, कहानी पढ़ने-सुनने वालों को देर तक कचोटती रहती है। इस प्रेम में ईर्ष्या नहीं है। द्वेष नहीं है। कोई प्रतिशोध नहीं है। कहानी का पाठ और आलोचना के बाद सवालों का दौर चलता है। छात्रों के सवाल का जबाब आमतौर पर तलवार सीधे नहीं देते। ढूँढों! खोजो! पता लगाओ! उनका प्रिय जुमला है। इस कहानी में एक प्रसंग है –गुसाई ने गौर से लछमा के मुख की ओर देखा। वर्षों पहले ज्वार और तूफान का वहाँ कोई चिह्न नहीं था। यह पूछने पर कि लछमा के चेहरे पर विगत प्रेम प्रसंग की कोई छाप न हो, कोई छाया न उभरे, कोई हलचल न दीखे... यह कैसे संभव है ? अगर प्रेम सच्चा है तो वर्षों बाद भी, एक सीमा में रह कर ही सही, फूटेगा जरूर। कितना ही सामाजिक मान-मर्यादाओं में बँध कर रहे आदमी। तलवार का जवाब था- मैं इस सवाल का जवाब नहीं दूँगा, बेहतर है कहानी के लेखक शेखर जोशी हिन्दी विभाग बुलाये जाएँ और उनसे ही यह सवाल किया जाए।

साहित्य अपने समय और समाज से अलहदा नहीं होता । वह हमें यंत्रवत होने से बचाता है। खुद को टटोलने को मजबूर करता है। अगर यह सच है कि प्रेम करने के बाद आदमी पहले जैसा नहीं रह जाता है, तो सच यह भी है कि आदमी अगर संवेदनशील हो तो एक अच्छी कहानी या कविता पढ़ कर वही आदमी नहीं रह जाता है जो उस कविता कहानी पढ़ने के पहले था। साहित्य के अच्छे लेखक, शिक्षक-आलोचक हमारी संवेदनशीलता को बढ़ाते-बचाते हैं। सर्वग्रासी बाजार के इस दौर में विषय के नाम पर चर्चा अर्थशास्त्र, कंप्यूटर या प्रबंधन जैसे विषयों की ही की जा रही है। साहित्य के विभाग विश्वविद्यालयों में हाशिये पर धकेले जा रहे हैं । साहित्य जैसी विषयों की प्रासांगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है। जबकि मानवीय संवेदनाओं को भोथरा होने से बचाने के लिए साहित्य का पठन-पाठन हर दौर में जरूरी है, वर्तमान में कहीं ज्यादा। युवा कवि पंकज चतुर्वेदी के कुछ शब्द ले कर कहें तो- समाज के शरीर में/ एपेन्डिक्स की तरह/ अनावश्यक लगते हुए हैं हम/ फिर भी/ न जाने क्यों/ जरूरी से हैं/ एक संपूर्णता के लिए/ वह अर्थ की हो या व्यर्थता की।
(20 सितम्बर 1947 को जन्मे वरिष्ठ आलोचक वीर भारत तलवार जीवन के साठ साल पूरे कर रहे हैं, चित्र में प्रो. तलवार के साथ लेखक। )

Monday, September 03, 2007

भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी


कवि रघुवीर सहाय ने कविता के जरिए 25-30 साल पहले कहा था- हिंदी है मालिक की/ तब आज़ादी से लड़ने की भाषा फिर क्या होगी?/ हिंदी की माँग/ अब दलालों की अपने दास-मालिकों से/ एक माँग है/ बेहतर बर्ताव की/ अधिकार की नहीं. तब समकालीन भूमंडलीकरण का उड़नखटोला भारत नहीं पहुँचा था. पर ये पंक्तियाँ मौजूदा समय में हिंदी की सूरते-हाल बखूबी बयां करती है. करोड़ो वंचितों, दलितों, स्त्रियों के संघर्ष की भाषा होने के कारण ही महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने आजादी के आंदोलन के दौर में हिंदी के पक्ष में पुरजोर ढंग से वकालत की थी. उन्होनें हिंदी को स्वराज से जोड़ा . आज हिंदी संघर्ष की भाषा होने की ताक़त खोती जा रही है. आम जन से भाषा की दूरी बढ़ती जा रही है. हिंदी पर बाजार और संचार के माध्यमों का दबाव है. दशकों से सत्ता की घोर उपेक्षा झेल रही हिंदी को लेकर भारतीय समाज में गहरी उदासीनता है.

भूमंडलीकरण एक ऐसा कनखजूरा है जिसके बावन हाथ हैं. वर्तमान जीवन का कोई पहलू, कोई कोना इससे अछूता नहीं है. 90 के दशक में भारत में उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण की प्रकिया ने अपने साथ संचार क्रांति लेकर आया, या कहना चाहिए कि संचार माध्यमों के रथ पर चढ़ कर ही भूमंडलीकरण ने भारत में अपना पाँव फैलाया. वर्तमान में केबल, इंटरनेट, मोबाइल के माध्यम से एक नई हिंदी गढ़ी जा रही है. यह हिंदी फिल्मों, सिरीयलों, विज्ञापनों, समाचार पत्रों और खबरिया चैनलों के माध्यम से तेजी से फैल रही है. सच है कि देश-विदेश में हिंदी की पहुँच इससे काफी बढ़ी है. सच है कि विज्ञापन की हिंदी सहज ही लोगों के दिल में जगह बना लेती है, लेकिन यह भाषा भूमंडलीकरण के साथ फैल रही उपभोक्ता संस्कृति की है, विमर्श की नहीं. इस भाषा में लोक-राग और रंग नहीं है जहाँ से हिंदी अपनी जीवनीशक्ति पाती रही है .

किसी भी भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों का विशिष्ट योगदान रहा है. हिंदी इसका अपवाद नहीं है. उन्नीसवी सदी के आखिरी तथा बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में हिंदी भाषा, विशेष रूप से हिंदी गद्य के विकास और परिमार्जन में हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं के योगदान का ऐतिहासिक महत्व है. पर पिछले दशकों में हिंदी के स्वरूप में काफी तेजी से बदलाव हुआ है. खास तौर पर हिंदी अखबारों में, जिसकी पहुँच भारत के कोने-कोने में बढ़ती जा रही है. 90 के दशक में तकनीक उपलब्धता, फैलते बाजार तथा सरकार की उदारीकरण की नीतियों के कारण देश में हिंदी के दर्जनों खबरिया चैनलों का प्रवेश हुआ. हिंदी अखबारों की भाषा पर इन चैनलों का खासा प्रभाव दिखता है.

80 के दशक के किसी भी अखबार की सुर्खियां स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ और अभिधापरक हुआ करती थी. अखबार की सुर्खियों से खबरों का आभास अच्छी तरह मिल जाता था. अंग्रेजी के उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल होता था जो सहज और सरल हों, जिससे पूरी पंक्ति के प्रवाह में बाधा नहीं पड़ती हो. प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर और सुरेंद्र प्रताप सिंह जैसे पत्रकारों ने इस दशक में ऐसी भाषा का प्रयोग शुरू किया जिसकी पहुँच हिंदी के बहुसंख्य पाठकों तक थी. इन पत्रकारों ने बोलियों और लोक से जुड़ी हुई भाषा का इस्तेमाल किया जिससे अखबार की भाषा लोगों के सरोकारों से जुड़ी.

लेकिन आज अखबारों की सुर्खियां चुटीली, मुहावरेदार और अंग्रेजी की छौंक लिए होती है. कई बार शीर्षक और खबर में तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है. बजट और चुनाव जैसी महत्वपूर्ण खबरों को भी मनोरंजक भाषा में प्रस्तुत करने का चलन जोर पकड़ रहा है. हिंदी समाचार पत्रों के कई संपादक इस भाषा के पक्ष में दलील देते हुए मिलते हैं. पर सवाल है कि हिंदी समाज का वह कौन सा वर्ग है जो इस भाषा को अपना कर गौरवान्वित हो रहा है, और जिसके प्रतिनिधि होने का दावा हिंदी के अखबार आज कर रहे है?

भाषा महज अभिव्यक्ति का साधन ही नही है. भाषा में मनुष्य की अस्मिता स्वर पाती है. उसमें सामाजिक-साँस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति होती है. समय के साथ होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों की अनुगूँज उसमें सुनाई पड़ती है. भूमण्डलीकरण के बाद हिंदी के अखबारों में भाषा का रूप जितनी तेजी से बदला है उतनी तेजी से हिंदी मानस की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना नहीं बदली है. नतीजतन यह बदलाव अनायास न होकर सायास है. एक खास उभर रहे उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रखकर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह शहरी नव धनाढ्य वर्ग है जिसकी आय में अप्रत्याशित वृद्धि उदारीकरण, बाजारीकरण और भूमण्डलीकरण के दौर में हुई है. यही वर्ग खुद को इस भाषा में अभिव्यक्त कर रहा है. इस वर्ग में हिंदी क्षेत्र के बहुसंख्यक किसान, मजदूर, स्त्री तथा दलित नहीं आते. हिंदी के विद्वान-आलोचक राम विलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि समाज में वर्ग पहले से ही होते हैं. भाषा में कठिन और अस्वभाविक शब्दों के प्रयोग से वे नहीं बनते किंतु इन शब्दों के गढ़ने और उनका व्यवहार करने के बारे में वर्गों की अपनी नीति होती है.

हिंदी के साथ शुरू से ही यह विडंबना रही है कि कुछ निहित राजनीतिक स्वार्थों के चलते कभी इसे उर्दू, कभी तमिल तो कभी अंग्रेजी के बरक्स खड़ा किया जाता रहा. स्वाभाविक हिंदी जिसे बहुसंख्य जनता बोलती-बरतती है, का विकास इससे बाधित हुआ . राजभाषा हिंदी को वर्षों तक ठस, संस्कृतनिष्ठ, उर्दू-फारसी शब्दों से परहेज के तहत तैयार किया गया. क़ाग़ज पर भले ही राष्ट्रभाषा-राजभाषा हिंदी का विशाल भवन तैयार किया जाता रहा, सच्चाई यह है कि हिंदी की जमीन लगातार कमजोर होती गई. राजनीतिक स्वार्थपरता, सवर्ण मानसिकता तथा राष्ट्रभाषा-राजभाषा के तिकड़म में सबसे ज्यादा दुर्गति हिंदी की हुई. 1960 के दशक में उत्तर भारत में अंग्रेजी हटाओ, और दक्षिण भारत में हिंदी हटाओ के राजनीतिक अभियान में भाषा किस कदर प्रभावित हुई इसे हिंदी कवि धूमिल ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया था- तुम्हारा ये तमिल दुःख/ मेरी इस भोजपुरी पीड़ा का/ भाई है/ भाषा उस तिकड़मी दरिंदे का कौर है.

हिंदी की अस्मिता विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों से मिलकर बनी हैं. कबीर से लेकर प्रेमचंद और बाबा नागार्जुन का साहित्य इसका दृष्टांत है. हिंदी भाषा का विकास और प्रसार इन्हीं बोलियों, क्षेत्रीय भाषाओं के साथ संवाद के माध्यम से संभव है. तब कहीं जाकर सही मायनों में हिंदी अखिल भारतीय भाषा होने का दावा कर सकती है.

सरकारी संस्थानों ने, जिनका काम हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहयोग देना है, हिंदी का प्रचार-प्रसार कम, अपकार ज्यादा किया है. सरकार और उसकी सहयोगी संस्था हर साल बस हिंदी दिवस मना कर अपने कर्तव्य की इति श्री समझ लेती है.

आजादी के 63 साल बाद भी समाज विज्ञान, विज्ञान और तकनीक जैसे विषयों पर कोई ढंग का हिंदी में मौलिक लेखन काफी ढूढ़ने पर मिलता है. हिंदी में कायदे की कोई शोध पत्रिका नहीं मिलती जिसमें शोध लेख छपवाया जा सके. देश के प्रतिष्ठित उच्च अध्ययन संस्थानों में सारा शोध अंग्रेजी भाषा में हो रहा है. देश की बहुसंख्य जनता की जिसमें कोई हिस्सेदारी नहीं है. सारा शोध जिन गरीबों, पिछड़ों, दलित-आदिवासियों, स्त्रियों को केंद्र में रख कर किया जाता उसकी पहुँच उन तक कभी भी नहीं हो पाती. पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की आज भी खरे हैं तालाब जैसी किताबें, जिसकी सफलता और पहुँच असंदिग्ध है, उन लोगों पर करारा व्यंग्य है जो इस बात का रोना रोते है कि हिंदी में लोक-मन को छूने वाली भाषा में साहित्य से इतर कोई रचना संभव ही नहीं है. राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी भारत में राजनीति जैसी किताब की हिंदी में पुनर्रचना कर एक नई पहल की शुरूआत करते हैं. कभी समाजशास्त्री केएल शर्मा ने एनसीईआरटी की समाजशास्त्र की किताब मूल हिंदी में लिख कर साबित किया था कि स्कूल-कालेज की समाजविज्ञान की किताबें हिंदी में लिखना संभव है. दिक्कत यह है कि हिंदी क्षेत्र के कई विद्वान अंग्रेजी और हिंदी दोनों में दक्ष होने के बावजूद हिंदी में लिखने की जहमत नहीं उठाते. इसकी वजह सिर्फ आर्थिक नहीं, कहीं गहरे अवचेतन में हिंदी के प्रति हीनता बोध भी है.

भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी का ऐसा हौव्वा खड़ा किया जा रहा है कि हिंदी के पक्ष में की गई किसी भी बात को दकियानूसी विचार करार दिया जाता है. निहित स्वार्थ के कारण हिंदी के एजंडे को हिंदी और अंग्रजी के प्रभुवर्गों ने आपसी गठजोड़ कर हथिया लिया है.

निस्संदेह अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा है. इस भाषा के माध्यम से हम एक बड़े समूह तक अपनी बात पहुँचा सकते हैं. इस भाषा की जानकारी भूमंडलीकरण के इस दौर में हमारी जरूरत है. इस बात से शायद ही किसी को कोई गुरेज हो कि अंग्रेजी के बूते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीयों की एक पहचान बनी हैं. पर अंग्रेजी अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधि कभी नहीं कर सकती. देश-विदेश में रह रहे भारतीयों की अस्मिता, उसकी असली पहचान निज भाषा में ही संभव है. कवि विद्यापति ने सदियों पहले इसी को लक्ष्य कर देसिल बयना सब जन मिट्ठा कहा होगा. अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत एक बड़ा बाजार है. इस बाजार में हिंदी में आज अंग्रेजी के शब्दों को ठूँस कर हिंदी को विश्व भाषा बनाने की मुहिम चल रही है. कई अखबारों में हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का प्रयोग जोर पकड़ रहा है. क्या यह विचित्र नहीं कि जो भाषा ठीक से राष्ट्रीय ही नहीं बन पाई हो उसे अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश की जा रही है ?

20वीं सदी के आरंभिक दशकों में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद से लड़ कर हिंदी ने सार्वजनिक दुनिया (पब्लिक स्फ़ियर) में अपनी एक भूमिका अर्जित की थी. इस दुनिया में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा संभव था. आजादी के बाद प्रतिक्रियावादी, सवर्ण प्रभुवर्ग जिनकी साठगांठ अंग्रेजी के अभिजनों के साथ थी, हिंदी की सार्वजनिक दुनिया पर क़ाबिज़ होते गये. इससे हिंदी की सार्वजनिक दुनिया सिकुड़ती और आमजन से कटती चली गई. एक बार फिर हिंदी को महज बोल-चाल के माध्यम तक ही सीमित रखने का कुचक्र चल रहा है.

भूमंडलीकरण का सबसे प्रभावी औजार है सूचना. यह सूचना इंटरनेट के माध्यम से पूरे भूमंडल के फासले को चंद लम्हों में नापने का माद्दा रखती है. लेकिन चूँकि सत्ता की भाषा अंग्रेजी है, इंटरनेट की भाषा भी अंग्रेजी ही है. बहरहाल, हिंदी देर ही सही अंग्रेजी के गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब हो रही है. इसका सबूत है विभिन्न वेब साइटों पर मौजूद हिंदी के अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ. इससे हिंदी का प्रसार और पहुँच देश-विदेश में तेजी से हो रहा है. साथ ही हाल के वर्षों में जिस तेजी से हिंदी के ब्लॉग इंटरनेट पर फैलें है, एक उम्मीद बंधती है कि ठेठ हिंदी का ठाठ फिर से जीवित होगा. क्योंकि यहाँ हर लेखक को अपनी भाषा में कहने-लिखने की छूट है. इसका अंदाजा विभिन्न ब्लॉगों की भाषा पर एक नजर डालने पर लग जाता है. पर किसी भी तकनीक की उपयोगिता उसके इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर करती है. सवाल है कि जिस समाज में सूचना तकनीक का इस्तेमाल एक छोटे तबके तक सीमित हो, जिस भाषा में की-बोर्ड तक उपलब्ध नहीं वह भाषा-समाज किस तरह इंटरनेट का इस्तेमाल कर आगे बढ़ेगा ?

(जनसत्ता, 17 सितंबर 2010 को संपादकीय अग्रलेख के रुप में प्रकाशित)

Wednesday, May 30, 2007

मधुबनी पेंटिंग का अनुपम सौंदर्य

मिथिला या मधुबनी पेटिंग के नाम से प्रसिद्ध कलाकृतियों को देख कर मन सहसा विद्यापति, बाबा नागार्जुन की कविताओं की ओर भागने लगता है। इन रंगों में मिथिला की लोक संस्कृति रची-बसी है। पिसे हुए चावल, दूध, सिंदूर, और हल्दी के रंगों से मिथिला की औरतें घर की दीवारों पर सदियों से चित्रों को उकेरती रही है। समय के साथ ये चित्र दीवारों से काग़ज पर उतर आये। पहले कोहबर, पूरइन, सामा-चकेवा और देवी-देवता ही इन चित्रों में थे। अब इनमें देश-विदेश की राजनैतिक घटनाएँ और सामाजिक चिंताएँ भी आकार लेती हुई दिखती है। पिछले दशकों में मिथिला पेंटिंग ने अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पर भारत के कलाजगत और कलाप्रेमियों के बीच अब भी यह अपना एक मुकाम तलाश रही है।

सदियों पुराने कला के इस रूप को देश-विदेश की मुख्यधारा में लाने का श्रेय विदेशी विद्वानों और कलाप्रेमियों को जाता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के ब्रिटिश अधिकारी डब्लू. जी. आर्चर 1930 के दशक में तस्वीरों के माध्यम से मिथिला पेंटिंग को पहली बार दुनिया के सामने लाए। मिथिला क्षेत्र में 1934 में आये भीषण भूकंप के दौरान क्षतिग्रस्त मकान की दीवारों पर उन्होनें कोहबर, रेल वगैरह के चित्रों को देखा। 1970 के दशक में अमेरिकी मानवशास्त्री रेमण्ड ओएंस और जर्मनी की इरेका मोसर ने मधुबनी पेंटिंग को मिथिला जा कर देखा-परखा और शोध किया। अमेरिका स्थित एथनिक आर्टस फाउण्डेशन ने दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर में एक प्रदर्शनी ‘मिथिला पेंटिंगः एक कला रूप का विकास’ का आयोजन पिछले महीने ( 14-26 जनवरी) किया था । यह संस्था पिछले पच्चीस सालों से मिथिला पेंटिंग का प्रचार-प्रसार कर रही है। संस्था के अध्यक्ष प्रो. डेविड सेण्टन कहते हैं, “मिथिला पेंटिंग में अपार संभावनाएँ हैं। जरूरत है प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें अनुकूल सुविधाएँ मुहैया कराई जाने की।” इस संस्था ने सन् 2003 में मधुबनी में ‘मिथिला कला संस्थान’ की स्थापना की। यह संस्थान हर साल बीस छात्रों को छात्रवृत्ति दे कर मिथिला पेंटिंग को प्रोत्साहित करता है।


संस्थान के निदेशक चित्रकार संतोष कुमार दास कहते हैं “गंगा देवी और सीता देवी की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के बाद जिस तरह से इस कला को प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया। शिक्षा और मूलभूत सुविधायों के अभाव में कलाकार किसी तरह इस पुराने कला रूप को बचाए हुए हैं।” महिलाओं की विशेष उपस्थिति इस पेंटिंग की विशेषता रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा के रूप में इन्होनें इसे बचाए रखा। राँटी की दलित कलाकार उर्मिला देवी कहती हैं “दिक्कत, सब चीजों का दिक्कत है। खेती-बारी कुछ नहीं है। सरकार कोई सहायता नहीं करती है। किसी तरह हम जी रहे है। बिचौलिए को औने-पौने दाम पर हम अपनी कला बेचने को मजबूर हैं।”

इस कला में कायस्थों और ब्राह्मणों की उपस्थिति शुरू से ही रही है पर पिछले कुछ सालों में दलित विशेषकर, दुसाधों ने निजी जीवन की धटनाओं और वीर-योद्धा राजा सलहेस की कहानियों को चित्रों में उतार कर इसे एक नई भंगिमा दी है। ब्राह्मणों की भरनी और कायस्थों की कछनी शैली से इतर दलितों ने गोदना शैली को अपनाया है।

मिथिला पेटिंग में अब प्राकृतिक रंगों के बदले एक्रिलिक रंगों का प्रयोग होने लगा है। इससे पेंटिंग के जल्दी बिखरने का खतरा नहीं रहता है। मिथिला के रीति- रिवाजों के साथ अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद , सांप्रदायिकता और भ्रूण हत्या जैसी पेंटिंग को देख कर इसके फैलाव और विकास की झलक मिलती है। पुरूषों की भागेदारी ने इस कला को एक नया तेवर दिया है। पर सवाल है कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित कलाकार किस तरह इस कला को जीवित रख पायेंगे ।
(राजस्थान पत्रिका,जयपुर से 10 मई 2007 को प्रकाशित)


Tuesday, December 12, 2006

City of Perth

'विर्ड, दे वेयर वंस इन लव'

पर्थ एयरपोर्ट पर उतरते ही हल्की गर्मी का एहसास होने लगा।  नवंबर के आख़िरी दिनों में मौसम यहाँ काफ़ी ख़ुशनुमा है। लंबी यात्रा के बाद मुझे भूख लगी है। रकसेक को यूथ हॉस्टल में पटक मैं टहलने निकल गया। शहर अनजाना है। हॉस्टल के आस-पड़ोस से आगे बहुत दूर नहीं निकलना चाहता, गोकि सिटी सेंटर ज़्यादा दूर नहीं है। 

कुछ दूर भटकने पर सामने एक चाइनीज रेस्तरां दिखा और मैंने Spinach का बना एक डिश ऑर्डर कर दिया, पर वह इतना तीख़ा था कि हलक के अंदर नहीं गया और मैं पानी पीकर वापस लौट आया। पहली विदेश यात्रा है और वेजिटेरियन होने की वजह से जहाँ-तहाँ खाने में झिझक भी। अगले दिन जब मैं नाश्ते के लिए विश्वविद्यालय के कैफेटेरिया में खड़ा था तो देखा कि जहाँ वेजिटेरियन का बोर्ड चस्पां है, वहां मछलियाँ भी रखी हैं!

मैं मीडिया: पॉलिसिज, कल्चर्स एंड फ्यूचर्स इन द एशिया फेसिफिक रिजनविषय पर होने वाले एक सेमिनार में भाग लेना आया हूँ। मुझे हिंदी पत्रकारिता पर वैश्विक तकनीक का प्रभावविषय पर पेपर पढ़ना है, जो मेरे पीएचडी शोध का एक हिस्सा है। तकनीक के अनेक प्रभावों में एक प्रभाव यह भी है कि हिंदी की पहुँच एक साथ ही स्थानीय (लोकल) और वैश्विक (ग्लोकल) हो गई है। मेरा ब्लॉग पर्थ में बैठा कोई उसी वक़्त पढ़ सकता है जिस वक़्त मैं दिल्ली या किसी अन्य जगह पर बैठ कर लिख रहा होता हूँ।

कर्टिन यूनिवर्सिटी के कैंपस में घूमते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी सिद्धहस्त फ़ोटोग्राफर ने ख़ूबसूरत लैंडस्केप को अपने कैमरे में क़ैद कर रखा हो। यह बात पूरे शहर पर भी एक तरह से लागू होती है। शहर साफ़-सुथरा और खुला-खुला है। वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा शहर है पर्थ, पर आबादी बमुश्किल दस-बारह लाख (दस साल बाद अब बीस लाख के क़रीब है)।

सेमिनार में भाग लेने मलेशिया से आई अमीरा फिरदौस कहती है कि यूनिवर्सिटी का कैंपस मुझे अपने घर सा लगता है।’  ख़ुद वह मलय विश्वविद्यालय में मीडिया पढ़ाती है। बातों-बातों में पता चला कि उसके माता-पिता भी विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं और उसका बचपन विश्वविद्यालयों के कैंपस में ही गुज़रा है।

वह कहती है, ‘दोनों जब अमेरिका में फुलब्राइट स्कॉलर थे, तब मिले थे। दोनों अब अलग रहते हैं। मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली। तब मैं छोटी थी।’ 

विर्ड, दे वेयर वंस इन लव, बिना किसी भाव के उसने कहा।

ख़ुद अमीरा ने प्रेम विवाह किया है। जिंस और कमीज़ के ऊपर चादर लेपेटे, हँसमुख और बच्चों सी सूरत वाली अमीरा बातूनी और सहज है। भारत को लेकर उसके पास ढेर सवाल हैं। हम जब ब्रेकफास्ट कर रहे थे तब उसने बड़ी मासूमियत से पूछा कि क्या हिंदुस्तान की सारी महिलाएँ ऐश्वर्या रॉय की तरह ही सुंदर होती हैं?’  मैंने मुस्कुरा दिया। 

भारत से चर्चित फ़िल्म निर्देशक श्याम बेनेगल भी सेमिनार में भाग लेने आए हैं। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में विभाजन के चित्रण पर व्याख्यान दिया, जिस पर मैंने कुछ सवाल उठाए।  मैंने कहा कि हिंदी के प्रगतिशील साहित्यकी तरह ही हिंदी सिनेमा विभाजन की त्रासदी से भागता रहा है, ‘गरम हवाजैसे एक-दो अपवाद को छोड़ कर। इसे उन्होंने सहजता ने नहीं लिया और चिढ़ से गए।
Norman Lindsay's etching 

सेमिनार के बाद मुझे आलोक वाजपेयी मिले, जो बेनेगल के व्याख्यान के दौरान मौजूद थे। कानपुर के सिनेमा प्रेमी आलोक पर्थ में मनोचिकित्सक हैं। उन्होंने मेरे सवाल पर सहमति जताई और बातचीत के दौरान मुझे अगले दिन डिनर का न्योता दिया।  साथ ही उन्होंने मुझे नार्मन लिंडसेकी प्रदर्शनी देखने को भी कहा, जो इन दिनों पर्थ के म्यूजियम में लगी हुई है।  पता चला कि नार्मन लिंडसे ऑस्ट्रेलिया के चर्चित, बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कलाकार-लेखक थे और पहली बार उनके बनाए 200 इचिंग को एक साथ दिखाया गया है, इनमें न्यूड etching-stipple भी शामिल हैं। दुनिया भर में लिंडसे की पेटिंग, नक्काशी की ख़ूब सराहना और आलोचना हुई है। ख़ास करके न्यूड कलाकृतियाँ काफ़ी विवादास्पद रही है। 

इस प्रदर्शनी के बाद मैं वेस्ट ऑस्ट्रेलियन म्यूजियमभी गया, जहाँ ऑस्ट्रेलिया के aboriginals की संस्कृति, जीवन-यापन के बारे में एक खंड अलग से है। पर्थ शहर में घूमते हुए मुझे कुछ आदिवासी-मूलनिवासी दिखे थे ज़रूर, पर अलग-थलग। समाज और शहर दोनों से कटे। मेरी उत्सुकता उनसे मिलने की थी, पर उनकी भाषा सुन और रंग-ढंग देख कर मैंने टाल दिया। साथ ही मुझे सेमिनार के दौरान एक ऑस्ट्रेलियाई स्कॉलर ने उनसे घुलने-मिलने से मना किया था और दूर रहने की सलाह दी थी

मुझे शहर घूमने की इच्छा दी, पर उससे कहीं ज़्यादा समंदर देखने को मन मचल रहा था। अमीरा भी तैयार बैठी थी और हम scarbrough beach घूमने गए।  समंदर, समंदर का किनारा कहीं ना कहीं शहर की संस्कृति को एक खुलापन देता हैदिल्ली में तो प्रेम के कोने भी काफ़ी मुश्किल से मिलते हैं!

दिल्ली को समंदर के किनारे होना चाहिए था, इससे शहर का सौंदर्य निखरता है। पर्थ से लौटने पर जब मैं अपने एक क़रीबी मित्र से यात्रा के बारे में जिक्र कर रहा था तो उसने चुटकी ली—‘अच्छा तो आपको अमीरा बीच घूमाने ले गई थी।मित्र ने यात्रा के दौरान महिलाओं से ज़्यादा घुलने-मिलने से मना जो किया था!

With Film Director Shyam Benegal at the Seminar

Friday, December 08, 2006

Globalisation and Hindi Media

Unprecedented changes have been taking place, in the last two decades, in the realm of media. Hindi media or regional journalism in India is no exception. Global technologies, which paved the way for Information Revolution, are part and parcel of globalisation process. With the onset of liberalisation, privatisation and globalisation in 1991 in India, Hindi journalism gained a new confidence vis-à-vis its English counterparts. It has become global and local at the same time. It is being published from many regional centers with the help of new found technologies. Now packaging and designing is good. Pages have increased drastically. More supplements are coming out.

If we compare today’s any Hindi newspaper with that of, say fifteen or twenty years ago, we can conclusively say that it is more market oriented. In other words Hindi journalism is an industry now. What media analyst and critic Adorno and Horkhemier had said of culture industry is becoming true for Hindi journalism today, which had played a leading role in India’s independence struggle. Contents are being determined by the prevailing forces of market and advertising departments. Relationship between production departments and editorial board is fast changing.

This paper will analyse the impact of global technologies on Hindi journalism in India, taking Nav Bharat Times, Delhi a prominent Hindi daily, as a case study.

( Abstract of the paper titled"Impact of Global Technologies on Hindi Journalism: A Case Study of Navbharat Times, New Delhi" presented at Media: Policies, Cultures and Futures in the Asia Pacific Region Conference organised by MARG at Curtin University of Technology, Perth, Western Australia on 27-29 November 2006)

Wednesday, October 18, 2006

गरीबी को सम्मान


शांति के संदर्भ में निर्धनता निवारण को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करना एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है। यूरोप के देशों में औधोगिक क्रांति और साम्राज्यवाद के फैलाव के बाद आई संपन्नता ने उन्हें गरीबी से उदासीन बना दिया। मध्ययुग की गरीबी की स्मृतियाँ उनके लिए आज कोई मानी नहीं रखता। उन्होंने अशांति को युद्ध से जोड़ कर अपने को मुक्त कर लिया। पर अस्तित्व की रक्षा का सवाल बुनियादी सवाल है जो अशांति का गहरा कारण है।

गरीबी का सवाल हर सभ्यताओं के अनुभवों का अहम हिस्सा रही है। टॉलस्टाय से लेकर गाँधी तक ने इसे बखूबी पहचाना। गाँधी ने संपन्नता की बजाय सादगी की तरफ ले जाने वाली नीतियों, मूल्यों पर जोर दिया। धर्म और राजनीति के साझे सरोकार से गरीबी को चुनौती देने की वकालत उन्होंने की।

मोहम्मद यूनुस ने समाज के सबसे बुनियादी सवाल गरीबी के सवाल को अपनी नीतियों का हिस्सा बनाया है। इससे पहले गुर्याड मेंडल और अर्मत्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों ने इस सवाल को सामाजिक संपन्नता के लिए जरूरी बताया था पर हमारे राजनेताओं की आँखे नहीं खुली। संपन्नता के सतही सपने- बड़े बाँध, बड़े हवाई अड्डे, महानगर आदि – वे दशकों से लोगों को दिखाते रहे हैं। साथ ही गरीबी में निहित असहायता, आक्रोश की वे अनदेखी करते रहे हैं ।

यूनुस के ग्रामीण बैंक में स्त्रियों की केंद्रीय भूमिका है। वर्तमान में बाजार को असीमित महत्व देकर समाज की असली शक्ति समुदाय को पंगु बना दिया गया है । स्त्री का सशक्तीकरण कर ही समुदाय की आधारशिला परिवार को मजबूत बनाया जा सकता है । राष्ट्र के सम्यक् और सम्रग नवनिर्माण के लिए जरूरी है कि इस तरफ ध्यान दिया जाए।

भारत और बांग्लादेश कि साझी संस्कृति और तकरीबन एक से सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारण युनूस की अवधारणा भारत के लिए सही बैठती है। भारत में पिछले दो दशकों से यह प्रयोग चल रहा है। भारतीय ग्रामीण बैंक, सेवा( सेल्फ इम्पलॉयड वीमेंस एसोशिऐसन) और परिवर्तन जैसे संगठन इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं ।

भूमंडलीकरण के इस दौर में गरीबी उन्मूलन तीसरी दुनिया और नवस्वाधीन राष्ट्रों के नीति निर्माताओं और सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। मोहम्मद यूनुस को सम्मानित करना गाँधी के उस तावीज को दुनिया के सामने लटकाने जैसा है जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जब भी तुम्हारे मन में अगले कदम के बारे में दुविधा हो उस अंतिम व्यक्ति को याद करो जो अपनी असहायता और अभाव से जुझ रहा है और खुद से सवाल करो कि तुम्हारा यह कदम उसकी सहायता कर पायेगा कि नहीं ? यदि सहायता कर पायेगा तो निस्संदेह आगे बढ़ो।

( जेएनयू में समाजविज्ञान के प्रोफेसर आनंद कुमार से अरविंद दास की बातचीत पर आधारित )

Saturday, September 23, 2006

ये क्या जगह है दोस्तो

छात्र – छात्राओं की खुली दुनिया का जिक्र आते ही जेएनयू का नाम आता है । इसीलिए यहाँ पढ़ने की हसरत हर युवा में होती है । जिनकी साध पूरी हो जाती है वे तालीम के एक नये माहौल से साक्षात्कार करते हैं । साथ ही एक सामुदायिक रिश्ते और चेतना की परिभाषा समझते हैं । यहाँ की इसी खूबी के कारण आज ‘ जेएनयू संस्कृति ’ नाम का जुमला विश्वविद्यालयी संसार में आम हो चुका है । इस संस्कृति और खुले माहौल को करीब से देखने की कोशिश की है अरविंद दास ने

नवल – नवेलियों का
उन्मुक्त लीला-प्रांगण
यह जेएनयू
असल में कहा जाए तो कह ही डालूं
बड़ी अच्छी है यह जगह
बहुत ही अच्छी
और क्या कहूँ ।

बाबा नागार्जुन ने यह बात बजरिए कविता सन 1978 में कही थी । ‘यह जेएनयू ’शीर्षक से लिखी इस कविता में आगे वे इस विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की अपनी इच्छा जाहिर करते हैं। नागार्जुन की यह तमन्ना असल में देश के उन युवाओं की हसरत व्यक्त करती हैं जो मानसून के आते ही हर साल इस विश्वविद्यालय के दरवाजे पर दस्तक देने आ जाते हैं ।

वैसा ही मंजर है आजकल जेएनयू में । अपने जीवन का सबसे पुरउम्मीद दौर गुजारने के लिए छात्र- छात्राएँ परिसर को गुलजार करने में लगे हैं । एक खुली दुनिया में कदम रखने का अहसास उनके साथ है । इस सत्र में नामांकन शुरू हो चुका है । अकादमिक स्थलों , विभिन्न स्कूलों ,कैंटीन की दीवारों पर चिपके पोस्टरों , इबारतों में नए रंग की खुशबू महसूस की जा सकती है । पुराने छात्र , कामरेड नए छात्र- छात्रओं की नामांकन प्रकिया में बढ़ – चढ़कर सहयोग दे रहे हैं । हां ! जेएनयू में रैगिंग के लिए कोई जगह नहीं। आप बतौर मेहमान यहाँ स्वीकार किए जाते हैं । जेएनयू का यह खास रिवाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम है । शायद यहीं से इस संस्थान की विशिष्टता शुरू हो जाती है ।

अरावली की पहाड़ियों पर पुराने बरगद, नीम, और पीपल के पेड़ों के बीच बोगनबेलिया, अमलतास और गुलमोहर से सजे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अगर आप पहली बार पधारे हैं तो इस बात से शायद ही इंकार करें कि यहाँ की फिजा दिल्ली में हो कर भी ‘दिल्ली में नहीं’ का अहसास कराती है । असल में जेएनयू की एक अलग ही तहजीब है जो इसे अन्य विश्वविद्यालयों से अलग बनाती है । लगता है, यह पंडित नेहरू ख्वाब की वह ताबीर है जिससे जुड़ने का सपना देश के हर कोने का युवा करता है ।

भले ही यह संस्थान एक खास खयाल का पोषक कहलाए और इस पर मास्को- बीजिंग की घुट्टी पिलाने का तोहमत लगे, मगर एक जनतांत्रिक माहौल सभी को प्रभावित करता है । पूरी तरह आवासीय इस विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के रिश्ते भी एक खुलेपने को दर्शाते हैं । इनके आवास को एक –दूसरे के करीब बनाया गया है ताकि एक स्वस्थ, सामुदायिक नाता विकसित हो । यहां का जनतांत्रिक माहौल बनाने में वाद-विवाद और बहस-मुबाहिसों का बड़ा योगदान है । प्रश्न करने की प्रवृति और वाद-विवाद की संस्कृति यहाँ महज कक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देर तक होने वाली पब्लिक मीटिगों और ढाबा तक फैली हुई है ।

छोटे शहरों –गाँवों से आने युवाओं के लिए विश्वविद्यालय के शुरूआती दिन तरह-तरह के अनुभव वाले होते हैं । किसी को अंग्रेजीदां, बिंदास लड़कियों की माया भरमाती है तो किसी को यहाँ का इंकलाबी माहौल। कहते हैं यह वह जगह है जहाँ हर साल कई ‘ रामसजीवन ’ बनते हैं। आज यहाँ जिस ‘ अफलातूनी मोहब्बत ’ की बात होने लगी है उनका विकास यों ही चंद दिनों में नहीं हो गया । कई पुराने बताते हैं : ‘हम तो हंसी तो फंसी के फलफसे वाले समाज से आए थे। बड़ा वक्त जाया होने के बाद जाना कि वह हंसी तो और ही कुछ कहती थी। अक्सर ही यह हंसी दोस्ती का आमंत्रण थी। लेकिन आज वक्त बदल चुका है। दूर से आने वाले युवा भी इतनी उम्मीद का भार लेकर नहीं आते कि भरभरा कर गिरने की नौबत आ जाए।

हिंदी में पीएचडी कर रही निधि अपना तजुर्बा बताती हैं: ‘शुरू शुरू में जब मैं अपने सहपाठी से बातचीत करती थी तो आभास नहीं था कि वह दोस्ताना संबंध को प्रेम मानने लगेगा। उसे समझाना मेरे वश में नहीं था। आखिर में मुझे दोस्ती तोड़नी पड़ी। ’ हालांकि बिहार-यूपी या सुदूर इलाकों से आने वाले नए छात्र इस बात को मानने को तैयार नहीं कि यहाँ कि चमकीली दुनिया में वे प्रेम और दोस्ती का फर्क ही भूल जाएं। आज के युवा करियर को लेकर ज्यादा खबरदार हैं।

बात मजाक में कही गई है, लेकिन सच है कि जेएनयू बंगाल, त्रिपुरा और केरल के बाद भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ पर मार्क्सवादी व्यवस्था और विचार हावी रहे हैं। शुरूआती दिनों से लेकर अब तक कैंपस के औसत छात्र-छात्राओं और अध्यापकों का रूझान वामपंथी विचारधारा की तरफ दिखता है। यहाँ की दाखिला नीति ही ऐसी है कि जिसमें गरीब, पिछड़े इलाकों से आने से आने वाले छात्रों का प्रवेश आसान हो सके । इसके लिए उन्हें अतरिक्त ‘डेप्रिवेशन पांइट्स ’ दिए जाते हैं। हालांकि 1984 में इस नीति को रद्द कर दिया गया। दस साल बाद 1994 में छात्रों के आंदोलन के बाद यह दाखिला नीति फिर लागू की गई। 2003-2004 के आकादमिक सत्र में 1318 छात्रों का नामांकन हुआ जिसमें से 594 छात्र निम्न तथा मध्य आय वर्ग से थे। 724 छात्र उच्च आय वर्ग से थे। साथ ही 354 छात्र ऐसे थे जिनकी शिक्षा पब्लिक स्कूलों में हुई थी जबकी 964 छात्र ऐसे थे जिनकी शिक्षा म्यूनिसिपल एवं गैर-पब्लिक स्कूलों में हुई।

जेएनयू में भले ही खास विचारधारा का फरहरा लहराता रहा, पर बदलाव की हवा यहाँ भी पुरअसर रही। दो दशक पहले यहाँ हिन्दी एक सहमी हुई भाषा थी। आज वह एक ताकत है। कैंपस में व्यवहार की भाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकार्यता अंग्रेजी से कम नहीं है। हिन्दी भाषियों के दबदबे के अलावा टीवी चैनलों ने हिंन्दुस्तानी को यहाँ कि सहज भाषा बना दिया है। एक पुराने कामरेड हंसकर कहते हैं कि हमारे वक्त में ‘प्रेम’ करने के लिए अंग्रेजी के शब्दकोश चाटे जाते थे। अब लगता है हिन्दी में भी प्यार किया जा सकता है । यह बात भले ही हल्केपन में कही गई है, पर आमिताभ बच्चन से लेकर टीवी के नामी प्रस्तोताओं, फिल्मी सितारों की हिन्दी ने अपनी भाषा के हक में माहौल तो बना ही दिया है। जेएनयू में हिन्दी को लेकर हीनभावना के दिन लद गए लगते हैं।

पहरावे के जिक्र के बिना यहाँ की बात अधूरी ही रहेगी। जिस जींस-कुर्ते और झोले की शोहरत पूरे देश के रोशनख्याल परिसर में रही, उसका जनक जेएनयू ही है। कभी यहाँ पैंट-कोट पहन कर चलने वाला असहज हो जाता था, क्योंकि जेएनयू की फक्कड़ी का श्रृंगार जींस-कुर्ते से ही संभव था। अब बाजारवादी रूझान ने माहौल बदला है। पहरावे चाल-चलन में रंगीनी यहाँ भी आई है। लंबी कारें, मोबाइल एक नया समाज साफ दिखाने लगे हैं। ठाठ का मजाक उड़ाने वाले भी गाड़ियों के मॉडल और माइलेज पर मुबाहिसा करते दिख जाऐंगे। उदारीकरण के जीत का एक नमूना यहाँ भी देखा जा सकता है। हालांकि अभिनव कामरेड सफाई में कहते हैं कि उपभोक्तावादी दौर में हम डिब्बाबंद नहीं रह सकते।

बहरहाल जेएनयू के छात्र-छात्राओं की वर्ग चेतना किसी भी संस्थान को पाठ पढ़ा सकती है। ये चेतना उन्हें जाति, धर्म, आय-भेद से ऊपर बौद्धिक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ने को प्रेरित करती है। समाजशास्त्र में एमए कर रहे राजस्थान के बाबूलाल भील बताते हैं: ‘मेरे मन में अपनी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का ख्याल हर वक्त रहता है, पर सहपाठी, मित्रों, और शिक्षकों ने किसी भी तरह की हीनमन्यता को मेरे अंदर घर नहीं करने दिया।

सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक, इतिहास में शोधरत सरोज झा कहते हैं : ‘वहाँ मैं खुद को मिसफिट पाता रहा। एक तरह का ‘स्नाबिश एटीट्यूड’ वहाँ मिलता है। जेएनयू आकर आप अपने समय और समाज से साक्षात्कार करते हैं।’

निजी आजादी की भी बड़ी नजीर आपको यहीं मिलेगी। इसका उदाहरण लैंगिक जागरूकता को लेकर बनाया गया फोरम ‘अंजुमन’ है। इसके सदस्य मारियो कहते हैं:मुबंई के जिस कॉलेज से मैंने स्नातक किया था वहाँ ऐसी किसी संस्था के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। यहाँ हर किसी को अपना स्पेस मिला है। मैं अगर समलैंगिक हूँ, इससे दूसरों को क्या परेशानी है ?’
लेकिन ऐसा नहीं है कि यह स्पेस मुँहमांगे मिल गया हो। इसके लिए छात्रों ने काफी संघर्ष किया है। कैंपस के अंदर यौन-उत्पीड़न को रोकने के लिए बना संगठन जीएसकैश जिसका उदाहरण है। इसका गठन आठ मार्च 1999 को किया गया। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान से पीएचडी कर रही ग्रेसी सिंह कहती हैं: यहाँ के छात्रों की बौद्धिक जागरूकता उन्हें पूर्वग्रह से मुक्त करती है। लिंग, जाति,धर्म या क्षेत्र के प्रति किसी भी तरह का भेदभाव छात्रों के मन में नहीं दिखता है।’ इसी प्रकार जाति के आद्हार पर किसी भी तरह के भेदभाव को रोकने के लिए कैंपस में समान अवसर कार्यालय का गठन किया गया है।

विश्वविद्यालय सही मायनों में अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। केरल से लेकर कश्मीर तक और उत्तर-पूर्व राज्यों से लेकर मध्य भारत के कोने-कोने से यहाँ छात्र शुरूआती दिनों से आते रहे हैं। यह आवासीय परिसर छात्र – छात्राओं को एक-दूसरे को नजदीक से जानने का अवसर देता है। जो कुछ भी भ्रांतियाँ या पूर्वग्रह अन्य जाति या धर्म के प्रति रहते हैं, धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं। अरबी भाषा और साहित्य में शोधरत अताउर रहमान कहते हैं:‘मदरसा से पढ़ने के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया में जब मैंने दाखिला लिया, वहाँ अपनों के बीच ही सिमटा रहा। यहाँ आकर पहली बार दुनिया को दूसरों की नजर से देखा।’

इसके बावजूद विदेशी छात्रों को अपनी ओर आकर्षित करने में विश्वविद्यालय अभी तक सफल नहीं हो पाया है। एक सत्र में बमुश्किल 50-60 विदेशी छात्र नामांकन लेते हैं। दो साल पहले समाजशास्त्र विभाग ने ग्लोबल स्टडीज प्रोग्राम शुरू किया था जिससे विदेशी छात्रों का आना बढ़ा है। कहना होगा कि विदेशी छात्रों को कैंपस की आबो-हवा में ढलते देर नहीं लगती है। हिन्दी में एमए कर रहे अमेरिका के विलियम टायलर ने पिछले साल ‘आईसा’ की ओर से भारतीय भाषा साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान में ‘काउंसिलर’ के पद के लिए चुनाव लड़कर सबको चौंका दिया था। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में एमए कर रहे वियतनाम के फांग सिर्फ हिंदी गाने सुनते हैं बल्कि टूटी-फूटी हिंदी बोलने भी लगे हैं।

जेएनयू में पढ़ाना किसके लिए फख्र की बात नहीं है। कुछेक अपवादों को छोड़ कर शिक्षकों की नई पीढ़ी ने देश-विदेश के अकादमिक क्षेत्र में अपनी दक्षता साबित की है। लेकिन जैसा कि समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो आनंद कुमार कहते हैं, कार्य के प्रति आत्मविश्वास और गरिमा का भाव नई पीढ़ी के शिक्षकों में घटता दिख रहा है। वे शिक्षकों के बीच आपसी संवादहीनता और उनकी राग दरबारी प्रवृति के बढ़ने का भी जिक्र करते हैं।

कैंपस के छात्र भले ही इंकार करें, पर कई अध्यापक इस बात को स्वीकारते हैं कि 70 के दशक के मुकाबले वर्तमान में शोध का स्तर इस संस्थान में भी गिरा हैं। प्रो रोमिला थापर कहती हैं पहले छात्र-छात्राओं में शोध को लेकर जो उत्साह था वह कम हुआ है। इस उदासीनता के लिए प्रो आनंद कुमार सामाजिक व्यवस्था को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं। वे कहते हैं कि आज इसकी कोई गारंटी नहीं कि यदि आपने एक अच्छी थीसिस लिख दी तो सम्मानजनक नौकरी किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में पा ही जाएंगे।

सत्तर के दशक में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके देवीप्रसाद त्रिपाठी बताते हैं कि उनके समय में आईएएस जैसी परीक्षा की तैयारी दोयम दर्जे का काम माना जाता था। छात्र इसे स्वीकार करने में शरमाते थे। जेएनयू के छात्र रह चुके वर्तमान में प्रोबेशनरी (प्रशिक्षु) आईएएस प्रणव ज्योतिनाथ कहते हैं, ‘जेएनयू के शिक्षित, जागरूक छात्र अगर आईएएस ज्वायन करते हैं तो निस्संदेह नौकरशाही के लिए अच्छी बात है। योजना बनाने, उनके क्रियान्वयन में छात्रों का अनुभव लाभदायक ही होगा।’

उदारीकरण के बाद उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राज्य की घटती भूमिका तथा बेरूखी छात्र-छात्राओं के बीच निराशा का वातावरण तैयार कर रही है। भारतीय भाषा केंद्र में इसी महाने अपनी थीसिस जमा कर रहे फैजान अहमद कहते हैं ‘मेरे सामने बड़ा सवाल है कि इसके बाद क्या ?’ यहीं चिंता अर्थशास्त्र में पीएचडी कर रहे रामानंद राम की भी है। वे पूछते हैं कि अगर अवसर बहुराष्ट्रीय कंपनियों या प्रशासनिक सेवाओं में हो तो कोई क्यों नहीं उधर जाए ? आखिरकार नौकरी तो सबको करनी है।

यह मानना होगा कि वाम के इस गढ़ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ा है। स्कूल ऑफ आट्स एंड एस्थेटिक्स और ला एंड गवर्नेंस जैसे स्कूलों में फोर्ड फाउंडेशन का पैसा लगाया जा रहा है। अर्थशास्त्र, विदेशी भाषा के छात्रों को बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऊँची तनख्वाह देकर ले जा रही हैं। छात्र शोध को अधबीच छोड़कर नौकरी करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। प्रश्न उठता है कि ऐसे में इस उच्च अध्ययन संस्थान में शोध का भविष्य क्या होगा?


सूधो सनेह को मारग
पिछले साल जब अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र में शोधरत शबूरी सेन ने अंग्रेजी साहित्य के शोध छात्र तारा प्रकाश से शादी की तो जेएनयू परिसर के सामान्य-सी बात थी। पर कैंपस के बाहर यह एक खबर थी। जहाँ शबूरी सेन बेहद खूबसूरत हैं, तारा मेधावी किंतु दृष्टिहीन हैं। इस समय दोनों दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज में व्याख्याता है।

विभिन्न जाति और धर्म में बंटा भारतीय समाज जिसे ‘बेमेल’ विवाह कह कर विरोध करता रहा है वह जेएनयू को मान्य नहीं। जब से जेएनयू अस्तित्व में आया यहां विभिन्न जाति, समुदाय और धर्म की पृष्ठभूमि से आये छात्र – छात्राओं के बीच प्रेम संबंध बनते रहे हैं। यों तो युवाओं के बीच प्रेम संबंध का होना किसी भी विश्वविद्यालय के लिए सामान्य-सी बात है। जेएनयू की विशेषता यह है कि वर्षों साथ-साथ उठते-बैठते साहचर्य से विकसित प्रेम संबंधो की परिणति विवाह में होती है और काफी सफल रही है।

जेएनयू में पहले बैच के छात्र रहे, वर्तमान में विश्वविद्यालय में भूगोल के अध्यापक हरजीत सिंह बताते हैं ‘: तीस साल पहले जब हमने अपने धर्म के बाहर शादी की घरवालों ने काफी विरोध किया। पर हमें अपने गाइड प्रो मुनीस रजा और मित्रों का काफी सहयोग मिला था। ’ हरजीत सिंह कई ऐसे जोड़े के बारे में बताते हैं जिन्होनें अंतरजातीय विवाह किया है। इनमें कई आज जेएनयू के विभिन्न विभागों में अध्यापक हैं। यहाँ का पूरा समाजशास्त्र विभाग इसका प्रतीक है।

शादीशुदा शोधार्थियों के लिए बने छात्रावासों में कई ऐसी जोड़ियाँ हैं जिन्होनें समाज की प्रचलित मान्यताओं को खारिज कर शादी की है। ऐसी ही एक जोड़ी सुजान-राशिद की है। सुजान ईसाई हैं राशिद मुसलमान। सुजान कहती हैं: ‘धर्म हमारे प्रेम में कभी आड़े नहीं आया। धर्म व्यक्ति का निजी मामला है। ’ वे कहती हैं कि ऐसा नहीं कि हमारे बीच मतांतर नहीं है पर हम ध्यान रखते हैं कि मनांतर न हो।

पीएचडी अंतिम वर्ष के छात्र चंदन श्रीवास्तव कहते हैं : जिसे आप प्रेम कहते हैं असल में वह मैरिज ऑफ कनवीनियंस है, दो कैरियर ओरियेंटेड लोगों का आपसी मेल। पूँजीवादी समाज में प्रेम संभव नहीं है।’ सुजान इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि मैरिज ऑफ कनवीनियंस तब कहा जायेगा जब आपके पास चुनाव न हो। यहाँ के पढ़े-लिखे, काबिल छात्र बाहर जा कर शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई यहाँ प्रेम करने के लिए किसी को बाध्य नहीं करता।

नई पहचान देंगे


कुलपति प्रो बी बी भट्टाचार्य से बातचीत।

आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा के अन्य संस्थानों से जुड़े रहे हैं। जेएनयू किन मायनों में इन संस्थानों से अलग है?
जेएनयू की दीखिला नीति ही ऐसी है कि वह अपने यहाँ पूरे भारत के छात्रों को नामांकन के लिए ‘इनसेंटिव’ देता है। दूसरे संस्थानों में जोर ‘कटऑफ’ पर दिया जाता है, हम सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र – छात्राओं के लिए डेप्रिवेशन पाइंट्स देते है। आध्यापकों, छात्र – छात्राओं की अकादमिक उत्कृष्टता और सामाजिक सरोकार जेएनयू को अन्य विश्वविद्यालय से विशिष्ट बनाता है। यहाँ के छात्र – छात्राओं की राजनीतिक चेतना काफी जागृत है।


बाजार का दबाव, नौकरी की चिंता अकादमिक उत्कृष्टता को प्रभावित नहीं कर रही है?मैं नहीं मानता कि बाजार का दबाव अकादमिक उत्कृष्टता को प्रभावित कर रहा है। आप केवल सामाजिक विज्ञान, कला जैसे विषयों की ओर ही ध्यान दे रहे हैं। बायोटेक्नालॉजी, लाइफ साइंस में हमारे यहाँ काफी अच्छा काम हो रहा है। नौकरी की चिंता कुछ विषयों में जरूर दिखाई पड़ती है। लेकिन अर्थशास्त्र, विदेशी भाषा जैसे विषयों में काफी संभावनाएं हैं। अच्छा शोध करने वाले संजीदा अध्यापकों, छात्र – छात्राओं की तादाद अन्य संस्थानों की तुलना में काफी है।

फेलोशिप वगैरह का उपयोग छात्र शोध में कम, प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी में ज्यादा कर रहे है। आप की क्या प्रतिक्रिया है?
हम इसे नहीं रोक पायेंगे। आईएएस जैसे करियर काफी सुरक्षित है, जबकि सामाजिक विज्ञान मानविकी में शोधकार्य अनिश्चितताएं लिए हुए है। इस क्षेत्र में सरकार पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही है। अमेरिका जैसे विकसित देश में उच्च शिक्षा के अच्छे संस्थान गिने-चुने हैं। इससे शोधार्थी के सामने नौकरी की समस्या है। लेकिन कुछ ही शोधार्थीयों की सर्वोच्च प्राथमिकता आईएएस वगैरह होती है। जेएनयू से उच्च शिक्षा प्राप्त छात्र अपनी योग्यता का इस्तेमाल राष्ट्रीय योजनाओं को बनाने में करते हैं तो इसमें बुरा क्या है? देश को अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर नौकरशाह सबकी जरूरत है।

नवनियुक्त कुलपति के रूप में आपकी प्राथमिकताएं क्या रहेंगी?आज देश के बाहर आईआटी, आईआएम जैसी संस्थाएँ ही जानी जाती है । हमारी कोशिश रहेगी कि आने वाले वर्षों में आक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालयों की तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जेएनयू की पहचान हो। मेरा जोर अकादमिक स्तर को और बेहतर बनाने पर रहेगा। यहां केवल भारतीय और पारंपरिक विषयों के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था नहीं होगी बल्कि नैनो टेक्नालॉजी,बायो टेक्नालॉजी,स्वास्थ्य और औषध विज्ञान आदि में शोध और विकास की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही अर्थशास्त्र, विज्ञान और प्रौधोगिकी में इंटीग्रेटेड एप्रोच के तहत अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था होगी।

सरोकार और सक्रियता

विश्वविद्यालय में यह किस्सा आम है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने वामपंथी विचारधारा वाले बुद्धिजीवियों को एक टापू पर बिठाए रखने के लिए 1969 में जेएनयू की स्थापना की ताकि वे एक ही जगह सिमटे रहें। लेकिन विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति कुछ अलग ही किस्सा बयां करती है। यह बात आपातकाल के दौरान ही साफ हो गई थी कि यहाँ के छात्रों के सामाजिक सरोकार और प्रखर राजनैतिक चेतना महज कैंपस तक ही सीमित नहीं है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव देवीप्रसाद त्रिपाठी (डीपीटी) आपातकाल के दौरान छात्र संघ के अध्यक्ष थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, जो विश्वविद्यालय की कुलाधिपति थीं, को छात्रों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा था। उन दिनों को याद करते हुए डीपीटी भावुक हो उठते हैं। वे कहते हैं: ‘भुलाने पर जो और भी याद आए, भला कोई ऐसे को कैसे भुलाए।’ जेएनयू उस दौर में तानाशाही, अधिनायकवादी शासन के प्रतिरोध का केन्द्र था । सरकार की ज्यादतियों को झेलते हुए छात्र- छात्राओं ने संघर्ष जारी रखा। त्रिपाठी मीसा के तहत गिरफ्तार कर लिए गए। फिर भी छात्र भूमिगत रहकर लोकतांत्रिक अधिकारों की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए काम करता रहा।

जेएनयू छात्र संघ की स्थापना सितंबर 1971 में हुई। छात्र संघ का संविधान छात्र- छात्राओं ने मिलकर तैयार किया। इसे बनाने में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वर्तमान महासचिव प्रकाश करात की प्रमुख भूमिका थी। वे 1973-74 में छात्र संघ के अध्यक्ष थे। छात्र संघ एक स्वतंत्र इकाई है जिसमें प्रशासन का कोई दखल नहीं होता। संविधान की इसी विशिष्टता के कारण ही आपातकाल के दौरान भी छात्र संघ को प्रतिबंधित नहीं किया जा सका।

1983 में विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो पीएन श्रीवास्तव के कार्यकाल के दौरान छात्रों के एक वर्ग ने परिसर में तोड़फोड़ और हिंसा की। कुछ छात्रों को निष्काष्ति भी किया गया था। साथ ही प्रशासन ने छात्रों के लोकतांत्रिक हित और डेप्रिवेशन पांइट्स जैसे प्रावधानों पर अंकुश लगाया। इस एक घटना को छोड़कर कैंपस में आमतौर पर छात्रों की राजनैतिक गतिविधियां शांतिपूर्ण रहीं। हाल के कुछ वर्षों में जरूर फिर से छात्रों के कुछ संगठनों द्वारा हिंसा की छिटपुट घटनाएं सामने आई हैं।

जहां देश के अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र संघ गैर-राजनीतिक गतिविधियों का अड्डा बन चुके हैं। जेएनयू छात्र संघ एक मॉडल के रूप में उभरा है। यहां पर छात्र संघ चुनाव खास मुद्दों को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों में वाद-विवाद के जरिए सादगी और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होता है। चुनाव एक त्योहार की तरह है जिसमें कैंपस के सभी छात्र- छात्राओं की भागीदारी होती है। अमूमन यहां का हर छात्र किसी न किसी छात्र संगठन का सदस्य होता है। एक आंकड़े के मुताबिक पहली सितम्बर, 2003 तक विश्वविद्यालय में छात्र – छात्राओं की कुल संख्या 4857 थी। छात्र संघ चुनाव के एक दिन पहले होने वाला अध्यक्षीय वाद-विवाद इस चुनाव का दिलचस्प पहलू है।
नब्बे के दशक से पहले यहां की छात्र राजनीति एसएफआई( स्टूडेंट फेडरेशन आफ इंडिया) विरूद्ध एफटी( फ्री थिंकर्स) के द्विध्रुवीय कोने तक ही सिमटी थी। नब्बे के बाद राष्ट्रीय स्तर पर देश में जो राजनीतिक परिदृश्य था वह यहां भी खुल कर उभरा। मंडल और मंदिर की राजनीति की अनुगुंज यहां भी सुनाई दी । इन्हीं वर्षों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, नेशनल स्टूडेंट यूनियन् ऑफ इंडिया, और आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन उभरा।

उन दिनों को याद करते हुए 1993-94 में छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके प्रणय कृष्ण कहते हैं: एसएफआई की वाम राजनीति से बेहतर विकल्प और दक्षिणपंथी छात्र राजनीति से आई चुनौती को आईसा ने बखूबी स्वीकार किया।’ दिवंगत छात्र नेता चंद्रेशखर, जिनकी 31मार्च 1997 को बिहार के सिवान में हत्या कर दी गई, के जुझारू व्यक्तित्व को उस दौर के छात्र आज भी याद करते हैं। चंद्रेशखर आईसा से दो बार छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए थे। वाम के इस गढ़ में एबीवीपी के संदीप महापात्रा 2000-2001 में अध्यक्ष चुने गए थे। यहां छात्र – छात्राओं का एक बड़ा वर्ग है जो राजनाति को आपदधर्म के रूप में लेता है। हालांकि हाल के सालों में राजनाति के प्रति एक किस्म की उदासीनता और करिअर के प्रति विशेष सक्रियता दिखाई देती है। पर वर्तमान छात्र संघ के अध्यक्ष मोना दास इससे इंकार करती हैं। वे छात्रों की राजनातिक जागरूकता के रूप में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के कॉफी कार्नर के विरूद्ध इसी साल तैयार जनमत का उदाहरण देती हैं। पर जैसा कि छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके (1974-1975) प्रो आनंद कुमार कहते हैं: ‘राजनीति के प्रति निराशा और उदासीनता पूरे देश में हैं... फिर भी जेएनयू के छात्रों ने अपने परिसर की जरूरतों और देश, दुनिया के प्रति एक न्यूनतम सरोकार और सक्रियता की परंपरा को बनाए रखा है।’

( जनसत्ता रविवारी, 31 जुलाई 2005 को प्रकाशित, चित्र में ,गंगा ढाबा पर बैठे कुछ लोग)

Thursday, September 07, 2006

खेंचे है मुझे कुफ्र

कबूल’ एक बार फिर से देखी। दिल्ली में हाल के बर्षों में ‘मल्टीकॉमप्लेक्स’ सिनेमाघरों के बनने से फिल्म देखना आसान नहीं रहा। सौ डेढ़ सौ खर्च करने से पहले कई बार बटुआ टटोलना पड़ता है।

बहरहाल, लंबे अर्से बाद एक मुकम्मल फिल्म देखने को मिली। शेक्सपीयर के नाटक ‘मैकबेथ’ से प्रेरित इस फिल्म की कहानी मुंबई के माफिया संसार के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन इर्ष्या, द्वेष और खून-खराबे के बीच प्रेम एक शाश्वत भाव के रूप में पूरी फिल्म पर एक झीने आवरण-सा छाया रहता है। कलाकारों के अभिनय, निर्देशन, संपादन, संवाद, संगीत का सगुंफन इतनी कुशलता से हुआ है कि लगता है राष्ट्रीय नाट्य विधालय के किसी सभागार में किसी उच्च कोटि के नाटक का मंचन हो रहा है। सब कुछ आंखों के सामने जीवंत ! मुझे याद नहीं कि हाल के वर्षों में नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, पंकज कपूर, इरफान खान और तब्बू जैसे सिद्धहस्त कलाकार एक साथ पर्दे पर आए हों।

फिल्म देखने का चस्का छुटपन में ही लग गया था। शुरू-शुरू में पहला दिन पहला शो देखने की दिवानगी सी रहती थी। उस समय छोटे शहरों में टिकट की कीमत भी कम थी। पर धीरे-धीरे बॉलीवुड की अधिकतर फिल्मों की एक-सी घीसी-पिटी फार्मूलाबद्ध कहानी, कलाकारों के कृत्रिम अभिनय,भोंडे संवाद आदि बोरियत का सबब बनने लगे।

बात शायद 1995-96 की है। तब दिल्ली विश्वविधालय में नामांकन करवाया ही था। उन दिनों अखबारों में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन एस डी) के एक ग्रेजुएट पीयूष मिश्रा की अदाकारी की खूब चर्चा थी। श्रीराम सेंटर के तलघर में एन ईवनिंग विद पीयूष मिश्रा देखने का मौका मिला। बाद में नाटकों में रूचि बढ़ती गई। नसीरूद्दीन शाह, मनोहर सिंह, सीमा विस्वास जैसे कलाकारों को भी देखा-सुना। पर पीयूष की उस अदाकारी में जाने क्या जादू था, या मेरी भावुकता कि अब भी उस कार्यक्रम की स्वर लहरियाँ कानों में गूँजती है।

मकबूल के माफिया डान अब्बाजी (पंकज कपूर) के सहयोगी काके को देखकर चौंक पड़ा। अरे! ये तो पीयूष हैं! इन वर्षों में अक्सर उस शाम की चर्चा, जो मैं ने पीयूष के संग बिताई था, मित्रों के संग करता रहता रहा था। लंबा अर्सा हो गया उन्हें मंच या पर्दे पर नहीं देखा। मणिरत्नम की फिल्म ‘दिल से’ में सीबीआई के एक इंसपेक्टर की छोटी मगर प्रभावपूर्ण भूमिका में वे जरूर दिखे थे पर खुशी से ज्यादा निराशा हुई। इतना बड़ा कलाकार और इतनी छोटी भूमिका! कुछ दिन पहले रंगमंच से जुड़े एक मित्र ने बताया कि आजकल वे फिर से मुंबई में है। अस्सी के उत्तरार्द्ध में भी वे मुंबई गए थे पर फिल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आई।

जब से समांतर सिनेमा का दौर मद्धिम पड़ा, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी जैसे संजीदा निर्माता-निर्देशक भी मुख्यधारा की फिल्मों की ओर रूख करने लगे। नतीजतन नाटकों की पृष्ठभूमि के कलाकारों के लिए बॉलीवुड में अजनबीपन बढ़ा है। नसीरुद्दीन शाह फिल्मी दुनिया से अपने मोहभंग को कई बार दोहरा चुके हैं।

असल में आज मुबंइया फिल्मों में जिस तरह से ग्लैमर बढ़ा है वहां पर ये कलाकार अपने को ‘अनफिट’ पाते हैं। खूबसूरत सपने बेचेने वाले, बाजार को अपना भगवान मानने वाले निर्माता-निर्देशकों के लिए इन कलाकारों की कला बेमानी है।

पंकज कपूर, इरफान खान जैसे सधे कलाकार भी वर्षों से मुबंई में हैं। करीब आठ-दस साल पहले मैंने ‘एक डॉक्टर की मौत’ में उन्हें देखा था। मकबूल ने उनकी अभिनय क्षमता को फिर से साबित किया है। पर दसेक सालो में एक-दो अच्छी भूमिका इन कलाकारों को कितनी संतुष्टि दिला पाती होगी? इस बात पर बहस की जा सकती है कि मंच के ये कलाकार यदि नाटक से जुड़े रहें तो अपनी कला का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। व्यावसायिक सिनेमा इनकी कला का बेजा इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल यह भी हैं कि हमारा हिन्दी समाज इन कलाकारों की कितनी कद्र करता है? सच तो यह है कि अभी भी हिन्दी समाज में नाटकों को लेकर कोई विशेष अभिरूचि नहीं दिखलाई देती है। अपवादों को छोड़ कर स्कूलों-कॉलेजों में मंचन, शिक्षण या प्रशिक्षण की कोई विधिवत व्यवस्था नहीं है।

दिल्ली की ही बात करें तो नाटक देखने वालों का एक सीमित वर्ग है जो हर नाटक में नजर आता है। अन्य जगहों की स्थिति भी निराशाजनक ही है। और फिल्मों से मिलने वाला मेहनताना, शोहरत, एक माध्यम के रूप में बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँच पाने की क्षमता को नजरअंदाज करना कलाकारों के लिए बहुत ही मुश्किल है। गालिब से शब्द उधार लेकर कहूँ तो इनकी स्थिति- 'इमां मुझे रोके है तो खेचे है मुझे कुफ्र' की है।

कुछ दिन पहले इसी स्तंभ में कवि-कथाकार उदय प्रकाश ने मुंबई में रह रहे एनएसडी के ही एक स्नातक की दुखद विक्षिप्त स्थिति के बारे में लिखा था। मुझे बरबस सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चाँद चाहिए’ के केन्द्रीय पात्र हर्ष का चरित्र याद हो आया। सब अनुपम खेर या नसीरुद्दीन शाह की तरह ही भाग्यशाली नहीं होते। हमारे समाज को इन कलावंतो की कितनी चिंता है?




(चित्र में, पंकज कपूर और पीयूष मिश्रा)
(जनसत्ता, नई दिल्ली 16 मार्च, 2004 को दुनिया मेरे आगे कॉलम में प्रकाशित)

Wednesday, September 06, 2006

रंग और रभस

एशियाई जीवन के सबरंग

अंत भला तो सब भला । आँठवे ओसियान – सिनेफैन एशियाई फिल्म समारोह के लिए यह बात बखूबी कही जा सकती है । बीते दिनों फुटबाल महासमर का अंत भले ही जिनेदिन जिदान के दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार और दुःखद विदाई के साथ हुआ हो , पर दिल्ली के सिरीफोर्ट सभागार में उस रविवार की रात ईरान की फुटबाल टीम के जीत का जश्न सभी ने मनाया । असल में , दस दिन तक चले इस समारोह का समापन 23 जुलाई को मनोरंजक कॉमेडी ‘आफ साइड ’ के प्रदर्शन के साथ हुआ ।

जफर पनाही निर्देशित इस फिल्म का कथानक यथार्थ से वावस्ता है । फुटबाल की शौकीन कुछ लड़कियाँ स्टेडियम जा कर मैच का लुत्फ लेना चाहती है , पर ईरान में इस पर पाबंदी है । अपना भेष बदल कर , चोरी- छिपे लड़कियाँ किसी तरह स्टेडियम पहुँच तो जाती है पर पुलिस की निगाहों से बच नही पाती । डाक्युमेंट्री शैली में बनी यह फिल्म हमें इस यथार्थ से रू-ब-रू करवाती है कि खेल की भी अपनी एक संस्कृति है । इस संस्कृति पर पुरूषवादी वर्चस्व सामंती समाज में स्त्रियों की दारूण दशा को और भी दयनीय बनाती है । पिछले दो दशको में ईरानी सिनेमा ने अंतरराष्ट्रीय जगत में एक विशिष्ट मुकाम बनाया है । अब्बास केरोस्तामी , मोहसेन मखमलबफ की कई फिल्मों को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है । गौरतलब है कि बर्लिन फिल्म समारोह में जूरी ग्रैंड पुरस्कार से सम्मानित इस फिल्म के ईरान में प्रदर्शन पर रोक लगी हुई है । मानवीय संवेदनाओ से लिपटी सीधे-सादे कथानक को बिना किसी ताम झाम के एक अनोखी सिनेमाई भाषा में कहना ईरानी सिनेमा की विशेषता है जो इसे दर्शकों के बीच काफी मकबूल बनाती है । इसी समारोह में दिखाई गई मोहसेन मखमलबफ की फिल्म ‘सेक्स ओ फलसफा ’ ( सेक्स एण्ड फिलासफी ) संगीत , नृत्य और उत्कृष्ट अभिनय के साथ – साथ कथानक की विशिष्टता के लिए याद की जाएगी । प्रेम और सेक्स के इर्द–गिर्द धूमती यह फिल्म आधुनिक समाज में सेक्स के प्रति अतिरिक्त मोह और उदारता , फलतः मानवीय संबंधो में प्रेम की कमी की ओर इशारा करती है ।

फिल्में हमें यथार्थ की दुनिया से फंतासी की ओर ले जाती है । पर इस स्वप्नलोक में भी यथार्थ की पुनर्रचना फिल्म को एक कला माध्यम के रूप में विशिष्ट बनाती है। एशियाई समाज की हलचलों, जीवन के द्वंद ,अभाव-अभियोगों को संपूर्णता में दिखाती इन फिल्मों को एक मंच पर लाने का ओसियान – सिनेफैन का यह प्रयास निस्संदेह काबिलेतारीफ है । बीजिंग फिल्म अकादमी के प्रोफेसर और फिल्म निर्देशक से फे कहते हैं कि कान – बर्लिन जैसे फिल्म समारोहो में बाजार का घटाटोप समारोह की मूल संवेदना से मेल नहीं खाता है । यह समारोह अभी इस से अछूता है । हांगकांग के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक स्टेनले क्वान का कहना है कि अपनी फिल्मों के दर्शकों से मिलने का , उनकी टीका-टिप्पणी को जनाने का इससे बेहतर मौका हमें कहाँ मिलेगा ? समारोह में जुटी दर्शकों की भीड़ इसकी गवाही दे रही थी । पर इस बार का समारोह थोड़ा महंगा था । 20 रूपये की टिकट फिल्मों के लिए रखी गई थी । इसकी मार सबसे ज्यादा झेली विश्वविद्यालय के छात्रों ने । बहरहाल यह समारोह एशियाई समाज को जानने-समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो रहा है ।

समारोह में एक तरफ समकालीन वैश्विक राजनैतिक –सामाजिक प्रश्नो को उठाती फिल्मों का प्रदर्शन हुआ , तो दूसरी ओर मानवीय मूल्यों – प्रेम , शांति और समन्वय को आत्मसात किए बौद्ध दर्शन से जुड़ी हुई फिल्मों का एक विशेष खण्ड महात्मा बुद्ध के जन्म के 2550 साल पूरे होने के अवसर पर दिखाई गई । इजराइल – फिलिस्तीनी संघर्ष को केंद्र में रख कर बनी हेनी अब्बू असद की फिल्म ‘अल जाना (पैराडाइज नाउ)’ भावपूर्ण अभिनय ,संपादन , और कसी हुई पटकथा के कारण चर्चित रही । ईराक पर अमेरिकी आक्रमण के फलस्वरूप वहाँ के लोगों के जीवन में आये भूचाल को मोहम्मद अल-दारदजी ने ‘अहलाम (द ड्रीम्स) ’ में दिखाया है जो हमारी संवेदना को गहरे झकझोरती है । सामिर नसर की फिल्म ‘सीड्स ऑफ डाउट’ 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के वर्लड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमलों के बाद एक अलजिरीयाई मूल के वैज्ञानिक तारिक सीलमानी और उनकी पत्नी माया, जो जर्मनी में शांतिपूर्ण ढंग से अपना जीवन बसर कर रहे थे, के संबंधों में आए अविश्वास और उसकी परिणती को खूबसूरती से चित्रित करती है । आतंकवाद की छाया प्रेमपरक मानवीय संबंधो को भी किस कदर अपने घेरे में ले चुकी है ,यह फिल्म हमें इस भयावह यथार्थ से परिचय कराती है ।

राहुल ढोलकिया की चर्चित फिल्म ‘परजानिया’ निस्संदेह राकेश शर्मा की डाक्यूमेंट्री ‘फाइनल सोल्यूशन’ के बाद गुजरात नरसंहार पर बनी एक अतिसंवेदनशील फिल्म है । फिल्म का प्रदर्शन अभी तक भारतीय सिनेमाघरों में नही हुआ है । बौद्ध दर्शन को ले कर 1925 में बनी फिल्म ‘प्रेम संन्यास’ , और अपने दौर में काफी चर्चित रही ‘सिद्धार्थ’ को देखना पुराने जमाने की ओर लौटने जैसा था । हाल में बनी ‘द लास्ट मोंक ’ , ‘ एंग्री मोंक ’ का प्रर्दशन भी समारोह में किया गया । लद्दाख की वादियों को ‘द लास्ट मोंक’ में खूबसूरत ढंग से कैद किया गया है। पर कमजोर पटकथा फिल्म के मुक्त प्रवाह में बाधक है।

समारोह में प्रेम , सेक्स और विवाहेत्तर संबंधो को लेकर बनी कई फिल्मो का प्रदर्शन हुआ । उदघाटन फिल्म पैन नलिन निर्देशित ‘वैली ऑफ फ्लावर्स ’ प्रेम की शाश्वतता के निरूपण के लिए कम , सेक्स के अकुण्ठ चित्रण को ले कर दर्शकों के बीच काफी चर्चा में रही । फिल्म में सेक्स के कई दृश्य ऐसे थे जिनका ताल-मेल कथानक से बिठाना मुश्किल था । फ्रांस , जापान और जर्मनी के सहयोग से बनी यह फिल्म एक खास पश्चिमी दर्शक वर्ग के लिए बनाई गई प्रतीत होती है । विवाहेत्तर संबंधो को लेकर बनी हुर जीन हो निर्देशित कोरियाई फिल्म ‘अप्रैल स्नो ’ और रितुपर्णो घोष की बांग्ला फिल्म ‘ दोसर ’का कथानक अप्रत्याशित रूप से समान था । नूरी विलगे सेयलन की फिल्म ‘ क्लाइमेट्स ’ विवाहेत्तर संबंधो को लेकर बनी अन्य फिल्मों में उत्कृष्ट थी । पति-पत्नी के मनोभावों , आवेगों , तनाव और त्रासदी का निरूपण अदभुत है । संबंधों में आए ठहराव को छाया चित्रों की शैली में लिए गए शॉट्स के माध्यम से निर्देशक ने दिखाया है , जो इस फिल्म के मुख्य पात्र भी हैं ।
जेफरे जेतूरियन निर्देशित फ़िलिपींस की फ़िल्म ' द बेट कलेक्टर ' को एशियाई प्रतियोगिता खंड में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया । भारतीय प्रतियोगिता खंड में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार रामचंद्र पी एन की फिल्म ‘शुद्ध’ को मिला । ' द बेट कलेक्टर ' में एक अधेड़ महिला की विषम परिस्थतियों में अदम्य जिजीविषा का यथार्थ चित्रण है । ‘शुद्ध’ में सामंती व्यवस्था के टूटने और सामाजिक संरचना में आए बदलाव के फलस्वरूप आपसी संबंधों की पड़ताल दक्षिण भारत के एक गाँव को केन्द्र में रख कर की गई है। समारोह में चालीस देशों से आई तकरीबन 120 फिल्मों का एक बड़ा हिस्सा युवाओं के जीवन , स्वप्न और संघर्ष को लेकर था । फिलिपींस से आई मार्क मेली की फिल्म ‘ द पैशन ऑफ जेस हुसोन ’ एक युवा के सपने को करूणा मिश्रित हास्य और व्यंग्य के माध्यम से दिखाती है । जेस हुसोन का एक ही सपना है कि वह किसी भी तरह अमेरिका पहुँच जाए । इसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार है । इस विषय वस्तु को नसीरूद्दीन शाह ने चार एक साथ चलने वाली कहानियों के माध्यम से अपनी फिल्म ‘यूँ होता तो क्या होता ’ में भी दिखाया है । इस फिल्म के लगभग सभी किरदार अमेरिका की ओर रूख किए हुए है । पर अंत त्रासदी में होती है । भूमंडलीकरण के इस दौर में अमेरिकी वर्चस्ववादी संस्कृति के प्रति उपेक्षा और मोहभंग भी दिखाई पड़ता है अंजन दत्त की फिल्म ‘ द बोंग कनेक्शन ’ में । समारोह में पुरस्कृत बांग्लादेश की फिल्म ‘ ओंतरजात्रा ’ विसंस्कृतिकरण के इस दौर में अपने जड़ो को तलाशती एक संवेदनशील फिल्म है । तुर्की से आई ‘टू गर्लस’ , मिश्र की ‘डाउनटाउन गर्लस’ और ‘दुनिया’ जैसी फिल्में अरब देशों में औरतों की स्थिति उनके सपने और संघर्ष से हमारा परिचय कराती है ।

समारोह की खास उपलब्धि भारतीय फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक और हांगकांग के स्टेनले क्वान को श्रद्धांजली देते हुए उनकी फिल्मों का प्रदर्शन रही । ऋत्विक घटक की सात फिल्मों के साथ- साथ निर्देशक अनूप सिंह की फिल्म एकटी नदिर नाम ,जो ऋत्विक घटक को समर्पित थी, का प्रदर्शन किया गया ।

कहते हैं प्रतिभाएँ अक्सर अराजकता लिए हुए होती है । ऋत्विक घटक एक ऐसी ही प्रतिभा थे । एक बार फिल्म निर्देशक सईद मिर्जा ने उनसे पूछा कि आपकी फिल्मों का प्रेरणास्रोत क्या है ? उनका जवाब था , एक पॉकेट में शराब की बोतल दूसरे में बच्चों की सी संवेदनशीलता । 6 फरवरी 1976 को जब उनका देहांत हुआ तब वे महज इक्यावन वर्ष के थे । अराजकता उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा भले रही हो , पर उनकी फिल्मों से वह कोसो दूर रही । अजांत्रिक , मेघे ढाका तारा , कोमल गांधार , सुवर्ण रेखा , तिताश एकटी नदिर नाम जैसी उनकी फिल्में भारतीय सिनेमा की थाती है । बंगाल के अकाल और विभाजन की त्रासदी की छाप उनके मनोमस्तिष्क पर जीवनपर्यंत रही । निर्वासन की पीड़ा उनकी फिल्मों के केंद्र में है , जिसके वे भोक्ता थे ।

सुवर्णरेखा की कथा विभाजन की त्रासदी से शुरू होती है । फिल्म के आरंभ में ही एक पात्र कहता है यहाँ कौन नही है रिफ्यूजी ? ऋत्विक घटक निर्वासन की समस्या को एक नया आयाम देते हैं । यह समस्या सिर्फ विस्थापन की ही नहीं है । आज भूमंडलीय ग्राम में जब समय और स्थान के फासले कम से कमतर होते चले जा रहे हैं हमारी अस्मिता की तलाश बढ़ती ही जा रही है । ऋत्विक की फिल्में हमारे समय और समाज के ज्यादा करीब है । प्रसंगवश, स्टेनले क्वान की एवरलास्टिंग रिग्रेट, रूज, रेड रोज व्हाईट रोज जैसी फिल्मों में स्त्री अस्मिता की तलाश और पहचान बार बार उभर कर सामने आती है । ‘ रूज ’ फिल्म में स्त्री की अस्मिता के साथ- साथ शहर की अस्मिता की तलाश भी गुँथी हुई है ।

ऋत्विक घटक ने भारतीय सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया । पुणे स्थित भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में उनके छात्र रह चुके मणि कौल , कुमार शहानी , अदूर गोपालकृष्णण ,जो भारतीय न्यू वेव सिनेमा के जनक माने जाते है , खुद को ‘ ऋत्विक घटक की संतान ’ कहलाने में फक्र महसूस करते हैं । अदूर गोपालकृष्णण घटक के इप्टा की पृष्ठभूमि और संगीत के कलात्मक इस्तेमाल की ओर इशारा करते हैं । फिल्म निर्देशक मणि कौल कहते हैं कि अब भी मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ । उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला । अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है । मणि कौल का मानना है कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे । उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाये । ऋत्विक घटक की ज्यादातर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रही । वे ताउम्र वित्त की समस्या से जुझते रहे । समांतर सिनेमा में अपनी आस्था रखने वाले निर्देशक आज भी किसी न किसी रूप में इस समस्या से जुझते हैं

इन्हीं सवालों को लेकर समारोह में ‘ भारतीय सिनेमा में समांतर आवाजें ’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में समांतर सिनेमा से जुड़े निर्माता- निर्देशकों ने अपने विचार रखे । सामारोह में समकालीन भारतीय उत्कृष्ट सिनेमा की कमी सालती रही। सत्यजीत रे , ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों से प्रभावित भारतीय समांतर सिनेमा की धारा सूख चुकी है । क्या समांतर सिनेमा अब भी एक संभावना है ? ओसियान – सिनेफैन से हाल ही में जुड़े मणि कौल कहते हैं हमारी कोशिश है कि मुख्यधारा की फिल्मों से जुड़े लोगों और समांतर सिनेमा में अपनी आस्था रखने वालों के बीच संवाद कायम रहे । साथ ही ओसियान – सिनेफैन फिल्म निर्माण के क्षेत्र की ओर अपना कदम बढ़ा रही है , कोशिश है कि वित्त की एक ऐसी व्यवस्था की जाए कि समांतर सिनेमा की धारा को पुनर्जीवित किया जा सके ।
(चित्र में बाँए से, कुमार शहानी, मणि कौल, मदन गोपाल सिंह, रजत कपूर और केतन मेहता)