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Saturday, January 27, 2024

मिथिला पेंटिंग ही मेरी खेती-बाड़ी है: शांति देवी

 


मिथिला चित्र शैली अपने अनोखेपन और बारीकी के लिए देश-दुनिया में प्रतिष्ठित है, और कलाजगत में खास महत्व रखती है। इस पारंपरिक कला में 70 के दशक से मैथिल समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों का दखल बढ़ा, जिसने इसे एक अलग तेवर दिया। ब्राह्मणों और कायस्थों से इतर इन समुदायों के निजी-जीवन, आस-पड़ोस की जिंदगी की झलक इन चित्रों में देखी जा सकती है। खास तौर पर दुसाध कलाकारों ने गोदना शैली को अपनाया, जिसमें समांतर रेखाओं, वृत्तों और आयातों में गोदना को ज्यामितीय ढंग से सजाया जाता है। इनमें उनके लोक देवता वीर योद्धा राजा सहलेस का जीवन वृत्त मिलता है। साथ ही काम-काज और पेशे का चित्रण भी है। शांति देवी के चित्र भरनी शैली से मिलते-जुलते हैं। शांति देवी और उनके पति शिवन पासवान को मिथिला कला में योगदान के लिए पद्मश्री देने की घोषणा हुई है। पिछले दिनों अरविंद दास ने शांति देवी से उनकी कला यात्रा और गोदना शैली को लेकर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंशः


अरविंद दास: अपनी लंबी मिथिला कला यात्रा के उतार-चढ़ावों के बारे में बताइए...

शांति देवी: चालीस साल से ज्यादा समय से मैं इस कला से जुड़ी हूं। यह तो हमारी परंपरा है, धरोहर है, जो हमने अपनी दादी-नानी से सीखी है। मेरी मां (कौशल्या देवी) और सास (कुसमा देवी) दोनों को ही मिथिला कला में राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वर्ष 1976 में मेरी शादी शिवन से हुई। बहुत संघर्ष और गरीबी से गुजरी हूं। मैं अब लोगों से यही कहती हूं कि मिथिला पेंटिंग ही मेरी खेती-बाड़ी है। शादी के बाद हम दोनों ने मिलकर पेंटिंग बनाई है।


अरविंद दास: आप दोनों पति-पत्नी की प्रसिद्धि गोदना शैली को लेकर है। इससे पहले जितवारपुर (मधुबनी) की चानो देवी, रौदी पासवान भी गोदना पेंटिंग जुड़े रहे हैं...

शांति देवी: सत्तर के दशक के आखिर में रौदी पासवान भाई और चानो देवी के साथ ही हमने पेंटिंग बनानी शुरू की। राजा सहलेस की कहानी को हमने पेंटिंग में उतारना शुरू किया। चानो देवी शांत स्वभाव की विशुद्ध कलाकार थीं।

अरविंद दास: मिथिला के कायस्थों और ब्राह्मणों की पेंटिंग चर्चित रही है। कछनी (कायस्थ), भरनी (ब्राह्मण) शैली से आपकी पेंटिंग किस रूप में अलग है?

शांति देवी: असल में मेरी पेंटिंग मिथिला पेंटिंग है। राजा सलहेस की कहानी भी पेंटिंग में मैंने बनाई है। मेरे पति गोदना शैली में पेंटिंग करते रहे हैं। जब मैंने दुर्गा, सीता की पेंटिंग (रामायण-महाभारत) बनाई तो काफी विरोध हुआ। मुझसे कहा गया कि मैं अपने देवता को चित्रित करूं। मैंने कहा कि कलाकार की कोई जाति नहीं होती। कलाकारों की ओर से मुझे किसी तरह के विभेद का सामना नहीं करना पड़ा। बौआ देवी के साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं, उनकी बेटी जैसी हूं। गंगा देवी (मिथिला पेंटिंग की प्रसिद्ध कलाकार) के साथ भी मेरी मुलाकात रही है, उनके साथ दो महीने अहमदाबाद में रही। मैंने किसी की शैली कॉपी नहीं की है।

अरविंद दास: अभी आपने चंद्रयान-तीन को लेकर एक पेंटिंग बनाई, जिसकी खूब चर्चा भी हुई...

शांति देवी: हां, बिलकुल। मुझसे जब G20 के लिए पेंटिंग बनाने को कहा गया तब मैंने कहा कि राजा सलहेस, गीता-रामायण जिंदगी भर बनाई है। कुछ नया बनाने की इच्छा है। मैंने कहा कि पोता-पोती के संग टीवी पर मैंने चंद्रयान को देखा है, उसे ही बनाना चाहती हूं। मैंने रॉकेट को उड़ते देखा था, कल्पना चावला के बारे में सुना था। उसी सब को अपनी पेंटिंग में उतारा। प्रधानमंत्री मोदी से भी मेरी मुलाकात हुई और मैंने उन्हें अपनी पेंटिंग के बारे में विस्तार से बताया था।

अरविंद दास: हमने सुना है प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ भी आप एक बार अपनी पेंटिंग लेकर डेनमार्क प्रतिनिधिमंडल के संग गई थीं, उस अनुभव के बारे में कुछ बताएं...

शांति देवी: हां, दस बाय दस की एक पेंटिंग (फूल-पत्ती के संग) राजा सहलेस को लेकर बनाई थी। उसी को लेकर 1983 में मैं डेनमार्क गई। वह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। बाद में जापान, जर्मनी, नॉर्वे, मलेशिया, दुबई आदि जगहों पर भी गई। पुपुल जयकर, मनु पारेख की प्रेरणा से मैं डेनमार्क गई थी। मेरी अमेरिका जाने की इच्छा है अब। वैसे मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूँ. मेरी पढ़ाई बस नौवीं कक्षा तक हुई है।



अरविंद दास: आप बच्चों के संग भी वर्कशॉप करती रही हैं, नई पीढ़ी की इस पेंटिंग में कैसी रुचि है?

शांति देवी: जी, बहुत वर्कशॉप मैंने किए हैं। अभी हाल ही में मैंने कानपुर में पांच सौ बच्चों के संग वर्कशॉप किया। मिथिला के घर-परिवार के बच्चों में इस पेंटिंग के प्रति रुचि तो है ही, आजकल राज्य से बाहर भी लोगों में इस पेंटिंग को लेकर आकर्षण बढ़ा है और काफी लोग उत्साह से सीख रहे हैं। आपको बताऊँ कि पांच-छह साल के बच्चों को भी मैंने पेंटिंग बनाते देखा है

अरविंद दास: गोदना शैली में नए कलाकारों के बारे में आपका क्या कहना है?

शांति देवी: बहुत प्रतिभावान कलाकार आज हैं। शिवन खुद गोदना शैली में बनाते रहे हैं। उर्मिला देवी, महामना देवी, दिलीप कुमार पासवान गोदना के अच्छे कलाकार हैं, जिनसे काफी उम्मीदें हैं।


अरविंद दास: अपनी कला यात्रा का कोई ऐसा अनुभव जो आप शेयर करना चाहें...

शांति देवी: मैं देश-विदेश में अपनी पेंटिंग लेकर लोगों के बीच कई बार गई हूं। चार बार जापान (हासेगावा मिथिला आर्ट इंस्टिट्यूट) गई। एक बार नब्बे साल के एक बुजुर्ग वहां मुझे मिले, जो मुझसे और बौआ देवी से मिथिला पेंटिंग सीखना चाहते थे। मैंने उनसे पूछ दिया कि बाबूजी अब आपको यह सीखने की क्या जरूरत है। उन्होंने मुझसे कहा कि जब मैं ऊपर जाऊंगा तो यही न लेकर जाऊंगा! मेरा दिमाग खुल गया और अपनी परंपरा पर गर्व भी हुआ।

(नवभारत टाइम्स, 27.01.24) 


Tuesday, February 21, 2023

दादी की थातीः मिथिला पेपर मेसी कला की सिद्धहस्त कलाकार सुभद्रा देवी

 
सूरजकुंड हस्तशिल्प अंतरराष्ट्रीय मेले (3-19 फरवरी) में हर बार की तरह मिथिला या मधुबनी पेंटिंग के स्टॉल थेपर मेरी नज़र पेपर मेसी कला पर टिकी थी. दरअसल, पिछले दिनों बिहार के मधुबनी जिले (सलेमपुर गाँव) की सुभद्रा देवी को कला के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री देने की घोषणा हुई. इस बार खुद सुभद्रा देवी अपनी कला लेकर उपस्थित भले नहीं थीपर उनकी पोतीअनुभा कर्ण की बनाई कलाकृतियां मिथिला शैली में दिखाई दे रही थी. अपनी दादी की थाती को उन्होंने संभाल रखा है. घर-परिवार के अलावे सुभद्रा देवी ने सैकड़ों कलाकारों को पेपर मेसी कला में प्रशिक्षित किया है.

 पेपर मेसी (पापिए माशे) फ्रेंच शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है मसला हुआ या कटा हुआ कागज़. इस कला में कागज को पहले पानी में भिगोया जाता हैफिर लुगदी बनाई जाती है. गोंदफेविकोल के सहारे उसे एक आकार दिया जाता है. धूप में सुखाने के बाद उन पर विभिन्न रंगों से चित्रकारी की जाती है. सांचों (मोल्ड) का इस्तेमाल इस कला में होता रहा हैपर सुभद्रा देवी अपने कुशल हाथों से ही इस कला को दशकों से गढ़ती रही. चर्चित मिथिला कलाकार चंद्रकला देवी भी पेपर मेसी कला से जुड़ी रहीपर सही मायनों में सुभद्रा देवी ने इसे ऊंचाई पर पहुँचाया है.

 

मुगल काल में पेपर मेसी कला का विकास हुआ. इस कला को लोग कश्मीर से जोड़ कर देखते रहे हैंजहाँ पर इसकी विकसित परंपरा रही है. वर्ष 2019 में कश्मीर के फैयाज अहमद जान को पेपर मेसी के लिए पद्मश्री मिल चुका है. ऐसा नहीं कि देश के अन्य भागों में इस कला का विकास नहीं हुआ हो. ओड़िशाराजस्थानमध्यप्रदेशकेरलआंध्र प्रदेश में भी इस कला के विभिन्न रूप दिखाई देते हैंलेकिन जहाँ इस कला में ज्यादातर दैनंदिनी जीवन में इस्तेमाल की जाने वस्तुएँमुखौटेखिलौनेटेबल लैंपपेन स्टैंडतश्तरी आदि दिखाई देते हैंमिथिला में जो पेपर मेसी का रूप है वह अभी भी पारंपरिक लोक कथाओं और संस्कृति को समेटे है. आश्चर्य नहीं कि मेले में अनुभा कर्ण और उनके पति अवधेश कर्ण की बनाई मछलीकछुआबसहागणेश की आकृतियां पेपर मेसी कला में ढली हुई दिखाई दे रही थी.

 

उल्लेखनीय है कि पिछले पचास सालों में जगदंबा देवीगंगा देवीसीता देवीमहासुंदरी देवीबौआ देवीगोदावरी दत्तदुलारी देवी को मिथिला चित्रकला के लिए पद्मश्री मिल चुका है. वर्ष 1936 में जन्मी (बलौर मधुबनी) सुभद्रा देवी गंगा देवी, महासुंदरी देवी की पीढ़ी की कलाकार हैं जिन्हें उपेंद्र महारथी ने पेपर मेसी पर मिथिला चित्रकला को उकेरने को प्रेरित किया था. इस कला को वे  करीब पचास वर्षों से साध रही हैं. पद्म श्री पुरस्कार की घोषणा से वे काफी खुश हैं. बातचीत के दौरान उत्फुल्लता से वे कहती हैं कि उन्होंने बचपन में ही अपनी दादी-नानी के साथ शादी-विवाह और पर्व-त्योहार के समय कोहबरअरिपन बनाना सीखा था. 


मिथिला में शादी के बाद नवविवाहित वर-वधू जिस घर में चार दिन तक रहते हैंउसे कोहबर कहा जाता है. कोहबर की रस्मों के साथ मिथिला कला विभिन्न रूपों लिपटी हुई चली आती हैं. गौरी पूजा के लिए हाथी जनक डाला वे वर्षों बनाती रही.

 

असल में, महिलाएं शादी-विवाह, पर्व-त्योहारों पर लंबे समय से दीवारोंकपड़ों और कागजों पर कोहबरदशावतारअरिपनबांसपर्री और अष्टदल कमल जैसी अनुष्ठानिक चित्र बनाती रही है. इन चित्रों का लौकिक और आध्यात्मिक महत्व है. पिछली सदी के 1960 के दशक में इस क्षेत्र में आए भीषण अकाल ने इस कला को कागज के मार्फत मिथिला से बाहर पहुँचाया तब सिद्धहस्त मिथिला कलाकारों से देश और दुनिया का परिचय हुआ. समय के साथ इस पारंपरिक कला में आधुनिक विषय-वस्तुएँ भी शामिल होते गई जो इस कला के विकसनशील होने का प्रमाण है. कोहबरपूरइनअष्टदल कमलबांसपर्री के अतिरिक्त मिथिला पेंटिंग में वर्तमान में  सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक रंग भी दिखाई पड़ते हैं. पिछले वर्षों में पर्यावरण भी एक विषय के रूप में इसमें शामिल हुए हैं. साथ ही भ्रूण हत्या और सांप्रदायिकता जैसे विषयों को भी कलाकारों ने अपनी कला  का आधार बनाया है.

 

जहाँ मिथिला कला की खूब चर्चा होती है वहीं पेपर मेसी का जिक्र नहीं के बराबर होता है. इसका बाजार भी विकसित नहीं हो पाया है. जबकि वर्ष 1981 में  ही सुभद्रा देवी को राज्य पुरस्कार और वर्ष 1991 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस कला को लेकर वर्ष 2004 में स्पेन भी गईं. बहरहाल, सुभद्रा देवी कहती हैं कि उन्होंने अपनी कला यात्रा की शुरुआत मिथिला चित्रकला से ही किया था और बाद में पेपर मेसी को साधा. उनकी कला में मिथिला की संस्कृति और परंपरा की झलक दिखाई देती है.

 

वे कहती हैं कि  70 के दशक में पटना में शिल्प अनुसंधान संस्थान के लिए मैंने कनिया-पुतरा (कपड़े)पेंटिंग (कागज) और सामा-चकेवा (मिट्टी) बनाया था. सामा चकेवा को काफी पसंद किया गया और मुझे पुरस्कार मिला था. हंसती हुई वे कहती हैं कि 90 के दशक में एक बार मद्रास गईं तब उनको एक मैडम ने कहा कि 'राजा-रानी की शादी का सीन बना दीजिए'. जिस पर उन्होंने कहा कि 'राजा-रानी की शादी का मुझे नहीं पता. रामचंद्र भगवान की शादी हुई नवही विधि से शादी-विवाह को हम जानते हैं. कोहबरकन्यादानमंडप आदि पेपर मेसी पर बीस दिनों तक उन्होंने वहाँ बनाई थी. वे जोर देकर कहती हैं कि मिथिला पेंटिंग को मैंने नहीं छोड़ा.

 

उम्मीद की जानी चाहिए कि सुभद्रा देवी को मिले इस सम्मान के बाद कलाप्रेमी मिथिला की इस पारंपरिक कला रूप को परखने की कोशिश करेंगे. साथ ही इसे कला बाजार में उचित जगह मिल पाएगा.


Thursday, February 16, 2023

मिथिला कला के पेपर मेसी रूप का सम्मान

 


पेपर मेसी कला को आम तौर पर लोग मिथिला से जोड़ कर नहीं देखते हैं. असल मेंमिथिला चित्रकला या मधुबनी कला की ख्याति देश-विदेश में ऐसी फैली कि सांस्कृतिक रूप से संवृद्ध इस क्षेत्र की अन्य लोक कला की उपेक्षा हुई. मिथिला में चित्रकला के अलावे पेपर मेसीसिक्की आर्ट और टेराकोटा शिल्प की भी विकसित परंपरा रही है. हालांकि सहयोग और संरक्षण के अभाव में कला के ये रूप कालांतर में पिछड़ गए. पारंपरिक रूप से मिथिला कला से महिलाएँ जुड़ी रही हैं.

पिछले दिनों मधुबनी जिले के सलेमपुर गाँव की सुभद्रा देवी को जब कला के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री दिए जाने की घोषणा हुई तब लोगों का ध्यान बिहार की इस कला की ओर गया. बिहार में इस कला को स्थापित करने में 87 वर्ष की सुभद्रा देवी की प्रमुख भूमिका रही है.

पद्म श्री पुरस्कार की घोषणा से वे काफी खुश हैं. सदियों से मिथिला की महिलाएँ अरिपनकोहबर दशावतारबांसपुरइनमछली आदि को दीवारों पर उकेरती रही हैं. पिछली सदी के 60 के दशक में इस क्षेत्र में आए भीषण अकाल ने इस कला को कागज के मार्फत मिथिला से बाहर पहुँचाया तब जाकर गंगा देवीसीता देवीमहासुंदरी देवीगोदावरी दत्त और बौआ देवी जैसे सिद्धहस्त कलाकारों से देश और दुनिया का परिचय हुआ.

समय के साथ इस पारंपरिक कला में आधुनिक विषय-वस्तुएँ भी शामिल होते गईंजो इस कला के विकसनशील होने का प्रमाण है. सुभद्रा देवी इसी पीढ़ी की कलाकार हैं. वे कहती हैं कि उन्होंने अपनी कला यात्रा की शुरुआत मिथिला चित्रकला से ही किया था पर बाद में पेपर मेसी को साधा. उनकी कला में मिथिला की संस्कृति और परंपरा की झलक दिखाई देती है.

वे कहती हैं कि  70 के दशक में पटना में शिल्प अनुसंधान संस्थान के लिए मैंने कनिया-पुतरा (कपड़े)पेंटिंग (कागज) और सामा-चकेवा (मिट्टी) बनाया था. सामा चकेवा को काफी पसंद किया गया और मुझे पुरस्कार मिला था. इस घटना के बाद  संस्थान के सेनगुप्ता और उपेंद्र महारथी ने उन्हें मिट्टी-कागज को छोड़ कर मिथिला कला को पेपर मेसी पर उकेरने को प्रेरित किया.

पेपर मेसी में कागज को पानी में गलाकर पहले लुगदी बनाई जाती हैफिर कलाकार गोंद मिलाकर उसे धूप मे सुखाते हैं. विभिन्न आकृतियों में गढ़ कर उस पर रंग चढ़ाया जाता है. शुरुआत में सुभद्रा देवी कागज के साथ मिथिला इलाके में आसानी से उपलब्ध मेथी और दर्द मैदा पेड़ के छाले के सहारे काम करती थी. लोक में उपलब्ध प्राकृतिक रंगों से आकृतियों को रंगती थी. इसे उन्होंने अपनी दादी-नानी को इस्तेमाल करते हुए देखा था. बचपन की स्मृतियाँ उनके काम में परिलक्षित होती रही हैं.

बाद में जब वे बिहार से बाहर अपनी कला लेकर गईं तब मुल्तानी मिट्टीफेविकोल जैसे अवयवों का इस्तेमाल उन्होंने शुरु किया. उनकी इस कला में परंपरा और आधुनिक विषय-वस्तुओं दोनों का समावेश दिखता है. एक तरफ जनक डालागौरी पूजा के लिए हाथीमछली जैसे मिथकीय विषयों को वे गढ़ती रही हैंवहीं लोक में इस्तेमाल की जाने वाली सजावटी सामानखिलौने को भी आकार देती हैं. कल्पना से हाथों के सहारे विभिन्न आकृतियाँ गढ़ने में वे सिद्धहस्त हैं और उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय हैं. वर्तमान में इस कला में मोल्ड’ का इस्तेमाल बढ़ा हैपर सुभद्रा देवी इसका इस्तेमाल नहीं करती हैं. वर्ष 1981 में उन्हें राज्य पुरस्कार और वर्ष 1991 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस कला को लेकर वर्ष 2004 में विदेश (स्पेन) भी गईं.

सुभद्रा देवी बताती हैं कि 90 के दशक में जब वे एक बार मद्रास गई तब उन्हें राजा-रानी को उकेरने को कहा गयापर उन्होंने मिथिला की लोक परंपरा में व्याप्त सीता-राम की शादीकोहबरमंडपकन्यादान के इर्द-गिर्द जो विधि-विधान के किस्से हैं उसे कई दिनों तक विभिन्न रूपों में उकेरा था. पेपर मेसी में उन्होंने मिथिला की पारंपरिक कला रूपों को खूबसूरती से पिरोया है. वे कहती हैं कि उन्होंने मिथिला कला को नहीं छोड़ा है. मिथिला में कोहबर के दौरान चार दिनों तक गौरी पूजा की विधि है जिसमें हाथी के ऊपर सिंदूर डाला जाता है. पहले हाथी मिट्टी का बना होता रहा है पर आज पेपर मेसी के बने हाथी का इस्तेमाल भी प्रचलन में आया है.

पेपर मेसी कला का विकास मुगल काल में हुआ. कश्मीर में इस कला ने काफी ऊँचाई हासिल की. ओड़िशाराजस्थानमध्यप्रदेशकेरलआंध्र प्रदेश में भी इस कला के विभिन्न रूप दिखते हैं. सुभद्रा देवी ने सैकड़ों कलाकारों को इस कला में प्रशिक्षित किया हैजिनमें से कुछ को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार भी मिले हैं. हालांकि पेपर मेसी के कलाकार सिर्फ कला के सहारे जीवन-बसर नहीं कर सकते. अभी इसका बाजार विकसित नहीं हुआ है. इस कला को सरकार और लोक के सहयोग की जरूरत है.

Sunday, November 21, 2021

लोक कला में समकालीन विषयों का चित्रण हो: अविनाश कर्ण

 


पिछले हफ्ते राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मिथिला पेंटिंग में योगदान के लिए रांटी गांव (मधुबनी) की दुलारी देवी को पद्मश्री से सम्मानित किया. यह गाँव मधुबनी पेंटिंग का गढ़ रहा है. इससे पहले इस गाँव की महासुदंरी देवी और गोदावरी दत्त को भी मिथिला पेंटिंग के लिए पद्मश्री मिल चुका है. मिथिला कला में पारंपरिक रूप से कायस्थ और ब्राह्मण परिवार की महिलाओं का वर्चस्व रहा है, हालांकि पिछली सदी के सत्तर-अस्सी के दशक से समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं का दखल बढ़ा है. दुलारी देवी खुद अति पिछड़े समुदाय (मल्लाह) से ताल्लुक रखती हैं. बीएचयू से फाइन आर्टस में प्रशिक्षित, रांटी के ही युवा चित्रकार अविनाश कर्ण इन दिनों आर्टरीच इंडिया के सहयोग से एक कम्यूनिटी प्रोजेक्ट के तहत मुस्लिम लड़कियों को मिथिला पेंटिंग सीखा रहे हैं. इससे पहले मुस्लिम समुदाय मधुबनी पेंटिंग से नहीं जुड़ा. इस प्रोजेक्ट और मिथिला कला में आ रहे बदलाव को लेकर अरविंद दास ने उनसे रांटी स्थित स्टूडियो में बातचीत की, एक अंश:

अपने स्टूडियो और कम्यूनिटी आर्ट परियोजना के बारे में आप हमें बताइए?

आर्ट बोले स्टूडियो शुरु करने की योजना मेरे मन में बहुत पहले से थी. हमारे समुदाय में जो लोग पेंटिंग नहीं सीख पाते हैं, वजह चाहे आर्थिक हो या सामाजिक, मेरी यह इच्छा है कि वे इसे सीखे. मिथिला पेंटिंग में समकालीन कला विषयों को लेकर मैं पेंटिंग करता रहा हूँ. मुझे कुछ ऐसे लोग चाहिए थे जो इन विषयों को लेकर काम करें. मैंने बीएचयू से फाइन आर्ट्स में ट्रेंनिंग ली है, मेरी इच्छा है कि मिथिला कला में अपनी ट्रेनिंग का इस्तेमाल करुँ. यहाँ कलाकारों के बीच में समन्वय नहीं है. आर्ट बोले के माध्यम से मैं इसे बढ़ावा देना चाहता हूँ.

कुछ मुस्लिम लड़कियों की पेंटिंग मुझे स्टूडियो में दिखी है. पहले मुस्लिम समुदाय इससे कभी नहीं जुड़ा, ऐसा क्यों?

इनके अंदर ख्वाहिशें थी, पर इन्हें मौका नहीं मिल रहा था. मधुबनी के नजदीक के गाँव-शेख टोली, गोशाला चौक की लड़कियां इससे जुड़ी है. इन्हें अपने परिवार से भी प्रोत्साहन मिल रहा है. ये नए विषय लेकर आ रही हैं. जैसे मुस्लिम समुदाय में जो दहेज की समस्या है, सामाजिक सौहार्द, स्त्री सशक्तिकरण, सामाजिक मुद्दें इनकी पेंटिंग में दिखता है. हम आपस में बातचीत करके विषय तय करते हैं. कोहबरराम-सीता से अलग ये नया प्रयोग कर रही हैं.

हाल के दिनों में युवा कलाकारों का जोर समकालीन विषयों की ओर बढ़ा है. पहले पारंपरिक विषयों के चित्रण पर जोर था. आप इसके बारे में क्या कहेंगे?

समकालीन विषयों, सामाजिक मुद्दों को पहले भी मिथिला पेंटिंग में चित्रित किया जाता रहा है. गंगा देवी (1928-1991) ने इसकी शुरुआत की थी. उनकी शैली बहुत ही खूबसूरत थी और भी कुछ कलाकारों ने मिथकों, पारंपरिक विषयों से अलग विषय को उठाया था. बाद में बाजार में मिथिला पेंटिंग की विशिष्टता खोने लगी थी. कला तो यह पहले से ही थी, अब फिर से क्राफ्ट से इसे कला की ओर मोड़ा जा रहा है.

आप बनारस शहर से रांटी गाँव आए. क्या अनुभव रहा है आपका?

कोरोना लॉकडाउन के दौरान मैं गाँव लौट आया. यहाँ संसाधनों की कमी भले हो पर अब मैं रांटी रह कर ही आर्ट बोले के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर इस कला को आगे ले जाना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि यहाँ के कलाकार आर्थिक रूप से मजबूत बने. यहाँ कई लोग सवाल उठाते हैं कि मधुबनी कला में फाइन आर्टस के तत्वों की क्या जरूरत हैलेकिन मेरा कहना है कि मधुबनी कला को समकालीन कला से जोड़ने, इसमें बदलाव की जरूरत है.

दुलारी देवी की पेंटिंग की शैली के बारे में आप क्या कहेंगें?

दुलारी देवी पारंपरिक शैली में पेंटिंग करती रही हैं. सीता स्वयंवर में जो शैली उनकी रही है, वह कायम है. आपने देखा होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्होंने जो पेंटिंग भेंट की और जिसे उन्होंने ट्विट किया वह पारंपरिक शैली में समकालीन विषय के चित्रण का बढ़िया उदाहरण है. मछली और हवाई जहाज का इसमें चित्रण है. उनकी शैली कचनी-भरनी ही है.

मधुबनी पेंटिंग का क्या भविष्य आप देखते हैं?

समकालीन कला के बाजार पर जो संकट है उसका फायदा लोक कला को मिल रहा है. न सिर्फ मधुबनी बल्कि अन्य पारंपरिक, लोक कला के लिए भी यह सच है. लेकिन लोक कला का भविष्य बहुत बढ़िया तब तक हम नहीं देख रहे जब तक इसमें समकालीन विषय-वस्तु नहीं जुड़े. मधुबनी पेंटिंग को मुख्यधारा में लाने के लिए नए विषय वस्तु तलाशने होंगे.

 

Tuesday, November 16, 2021

मिथिला पेंटिंग से जुड़ रहा मुस्लिम स्वर

 

ईद मुबारक, सरवरी बेगम

पिछले हफ्ते मिथिला पेंटिंग (मधुबनी पेंटिंग) के क्षेत्र में योगदान के लिए दुलारी देवी को जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री से सम्मानित किया तब मैं उनके गाँव रांटी में था. रांटी मधुबनी जिले से बिल्कुल सटा हुआ है. इस गाँव की महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त को इससे पहले मिथिला पेंटिंग के लिए पद्मश्री मिल चुका है. मिथिला कला में पारंपरिक रूप से कायस्थ और ब्राह्मण परिवार की महिलाओं का वर्चस्व रहा है, हालांकि पिछली सदी के सत्तर-अस्सी के दशक से समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों की महिलाओं का दखल बढ़ा है. विशेषकरदुसाधों ने निजी जीवन की धटनाओं और वीर-योद्धा राजा सलहेस की कहानियों को चित्रों में उतार कर इसे एक नई भंगिमा दी है. ब्राह्मणों की भरनी और कायस्थों की कचनी शैली से इतर दलितों ने गोदना शैली को अपनाया है. हाल ही में रांटी के युवा कलाकार अविनाश कर्ण ने मुस्लिम समुदाय की लड़कियों को इस कला से जोड़ा है, जिसे रेखांकित किए जाने की जरूरत है.

दुलारी देवी अति पिछड़े समुदाय (मल्लाह) से आती हैं. बिना किसी शिक्षा-दीक्षा के उनकी शादी बचपन में एक निठल्ले से कर दी गई. कुछ समय के बाद उन्होंने अपने पति को छोड़ दिया. खेतों में मजदूरी और संपन्न लोगों के घर झाड़ू-बुहारी करते उनका समय बीतता रहा. इसी क्रम में जब वो मिथिला चित्र शैली की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकार कर्पूरी देवी के घर काम करती थी तो उनकी उत्सुकता इन चित्रों के प्रति बढ़ी. कुछ वर्ष पहले जब मेरी मुलाकात उनसे हुई थी तब उन्होंने कहा था, “मैं जब महासुंदरी देवीकर्पूरी देवी को चित्र बनाती हुई देखती थी तो मेरी भी इच्छा होती थी मैं भी इन्हें बनाऊँ. मैंने महासुंदरी देवी के साथ छह महीने की ट्रेनिंग ली और फिर चित्र बनाने लगी.”  फिर धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ती गई. मधुबनी स्थित विद्यापति टॉवर में उन्होंने अपनी कूची से सीता के जन्म से लेकर उनकी जीवन यात्रा का मनमोहक भित्ति चित्र बनाया है. मिथिला पेंटिंग को लेकर वह चैन्नईकोलकाताबैंगलोर आदि जगहों पर भी गई.

दुलारी देवी के चित्रांकन की शैली कचनी से मिलती है. इस शैली में रेखाओं की स्पष्टता पर जोर रहता है. उनके चित्रों में पारंपरिक विषयों के अतिरिक्त उनके जीवन की छवियाँआत्म संघर्ष अंकित है. जहां दुलारी देवी पारंपरिक विषयों, रीति-रिवाजोंअनुष्ठान आदि को अपनी पेंटिंग का विषय बनाती हैं, वहीं रांटी के युवा कलाकार अविनाश कर्ण, शांतनु दास समकालीन विषयों को चित्रित करते हैं. उस दिन रांटी में स्थित अविनाश कर्ण के स्टूडियो- आर्ट बोले, में बिखरी पेंटिंग को देख कर मिथिला पेंटिंग में आ रहे बदलावों की झलक मिली जिससे इस कला के भविष्य के प्रति एक उम्मीद बंधती हैं. मिथिला में महिलाओं को कोहबर, राम-सीता, मछली, नाग आदि विषय परंपरा के रूप में मिली हैं. अविनाश ने जहाँ बचपन से अपने गाँव में मिथिला पेंटिंग की बारीकियों को देखा है, वहीं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से फाइन आर्टस में विधिवत प्रशिक्षण भी लिया है. इसी तरह शांतनु दास की शिक्षा-दीक्षा का असर उनकी कला पर दिखता है. इससे पहले रांटी के ही चर्चित वरिष्ठ कलाकार, संतोष कुमार दास बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय से फाइन आर्टसमें प्रशिक्षण ले चुके थे.

अविनाश इन दिनों एक गैर सरकारी संस्थान आर्टरीच इंडिया और कलाकार सीमा कोहली के सहयोग से एक सामुदायिक परियोजना, अक्स, पर काम कर रहे हैं. आस-पास के गाँव की मुस्लिम लड़कियों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ कर उन्होंने मिथिला पेंटिंग को एक नया आयाम दिया है. धर्म और जाति से बंटे समाज में इस तरह की पहल स्वागतयोग्य है. वे कहते हैं कि मुस्लिम लड़कियों के अंदर मिथिला कला को सीखने की ख्वाहिश वर्षों से थी पर उन्हें कोई एवेन्यू नहीं मिल रहा था.’ मधुबनी के नजदीक शेख टोली, गौशाला चौक की मुस्लिम लड़कियाँ मिथिला पेंटिंग में नए-नए विषय लेकर आ रही हैं जिसमें सांप्रदायिक सौहार्द, मुस्लिम समाज में दहेज, स्त्रियों पर होने वाली हिंसा और अन्य सामाजिक मुद्दे प्रमुख हैं.  

यहाँ यह नोट करना उचित होगा कि मिथिला पेंटिंग में पारंपरिक विषयों से इतर समकालीन मुद्दों को लाने का श्रेय प्रसिद्ध कलाकार, पद्मश्री से सम्मानित, गंगा देवी (1928-1991) को जाता है जिन्होंने पिछली सदी के अस्सी के दशक में अमेरिका की अपनी यात्रा को मधुबनी शैली में चित्रित किया. सीता देवी, गंगा देवी की पीढ़ी के बाद के दशक में, बाजार के फैलने से मिथिला पेंटिंग में क्राफ्ट पर जोर बढ़ा और कलाकार की विशिष्ट छाप गायब होने लगी. इक्कीसवीं सदी में मिथिला पेंटिंग के कला रूप में उत्तरोत्तर विकास दिखा है. मिथिला चित्र शैली में भ्रूण हत्यादहेजअंतरराष्ट्रीय आतंकवाद जैसे समसामयिक विषय पारंपरिक विषयों के साथ साथ चित्रित किए जाने लगेवर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों के बाद संतोष कुमार दास ने सांप्रदायिकता को लेकर गुजरात सीरीज बनाई थी जो काफी चर्चित रही. लोक कला में इस तरह के राजनीतिक-सामाजिक विषय पहले नजर नहीं आते थे. इन दिनों पेंटिंग की अच्छी कीमत भी कलाकारों को मिलने लगी है. पहले औने-पौने दामों पर बिचौलिये मधुबनी के कलाकारों की पेंटिंग बेचते थे.

कुछ साल पहले रांटी के ही शांतनु दास ने हिंदी और मैथिली के कवि नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता अकाल और उसके बाद को अपनी कूची का आधार बनाया. साहित्य को मिथिला पेंटिंग का विषय बनाना एक नया प्रयोग था जिसे काफी सराहना मिली. अविनाश कहते हैं कि यहाँ संसाधनों की कमी भले हो पर अब मैं रांटी रह कर ही आर्ट बोले के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर इस कला को आगे ले जाना चाहता हूँ. मैं चाहता हूँ कि यहाँ के कलाकार आर्थिक रूप से मजबूत बने.’ ‘आर्ट बोले स्टूडियो में सरवरी बेगम, सलेहा शेख, सजिया बुशरारहमती खातून, शमीमा परवीन की जो पेंटिंग दिखी वह कलात्मक रूप से अभी भले ही परिपक्व न हो, लेकिन विषय-वस्तु का फैलाव, मुस्लिम समुदाय का जुड़ाव इस पेंटिंग के विकसनशील होने का प्रमाण है. किसी भी कला की तरह मिथिला पेंटिंग में नवतुरिया स्वर और नए प्रयोग की जरूरत है, जो सदियों पुराने इस कला को एक नई पहचान दे सकें.

 (न्यूज 18 हिंदी के लिए)