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Thursday, August 05, 2021

लोकतंत्र में विरोध की प्रवृत्ति उसकी आत्मा है: मैनेजर पांडेय


प्रोफेसर मैनेजर पांडेय हिंदी के वरिष्ठ आलोचक हैं. सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना दोनों क्षेत्र में इन्होंने लेखन किया है. आलोचना की विचारधारा, सामाजिकता और साहित्य के समाजशास्त्र पर इनका विशेष जोर रहा है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रतिष्ठित भारतीय भाषा केंद्र से ये लंबे समय तक जुड़े रहे. प्रोफेसर पांडेय जीवन के अस्सीवें साल में हैं और आलोचना कर्म में अभी भी सक्रिय हैं. दिल्ली स्थित आवास पर उनसे अरविंद दास ने बातचीत की, एक अंश प्रस्तुत है:

देश 75 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है. पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी राजनीतिक दल का वर्चस्व बढ़ा है, विपक्ष की भूमिका कम हुई है. ऐसे में समाज में साहित्यकार की क्या भूमिका आप देख रहे हैं?
किसी भी लोकतंत्र में विरोध की प्रवृत्ति उसकी आत्मा है. विरोध स्वीकार्य नहीं भी हो तो भी सत्ता को उसका सम्मान करना चाहिए. साहित्यकार वर्तमान और भविष्य की चिंता के बारे में बताता है. जब विरोध की राजनीति परिदृश्य से गायब हो रही हो तब साहित्यकारों की भूमिका बनती है. वे जनता की समस्याओं के बारे में सहीं ढंग से सोचे, लिखें और बोलें ताकि लोग सजग हों. असल में दिक्कत यह है कि सत्ताधारी वर्ग साहित्य पढ़ते ही नहीं. वे नहीं जानते कि साहित्य क्या कह रहा है, क्या कहना चाह रहा है. समस्या यह है कि अबकी सरकार विरोध को बर्दाश्त नहीं करती है. अनेक पत्रकार सत्ता विरोधी लेखन की वजह से पकडें गए उन पर ब्रिटिश कालीन राजद्रोह (सिडिशन) का कानून लगा है.
आप आलोचना में सामाजिकता पर जोर देते रहे हैं. कोरोना महामारी के समय में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एक दूरी दिखाई दी है...
साहित्य के माध्यम से ही आलोचकों की भूमिका तय होती है. यदि कविता सत्ता विरोधी है तो आलोचक का काम है कि उसका विवेचन कर लोगों के सामने ले आए. साथ ही भाषा का खेल को खोलना आलोचना का दायित्व है. कोरोना काल में बिहार, उत्तर प्रदेश के बहुत सारे मजदूरों का विभिन्न शहरों- दिल्ली, बैंगलौर, हैदराबाद, से पलायन हुआ है. दर्दनाक स्थितियों में यातना सहते हुए वे भागे. बैचेन करने वाले ये दृश्य हमने टीवी पर देखे. इन्हें प्रवासी मजदूर कहा गया. बिहार का मजदूर जो दिल्ली आया वह प्रवासी कैसे हो गया? दूसरे देश में जाने वाले, गिरमिटिया, को प्रवासी मजदूर कहा जाता था. अगर एक प्रांत से दूसरे प्रांत में जाना ही प्रवासी होना है तो फिर सारा केंद्र सरकार प्रवासियों की सरकार हो जाएगी. ऐसे ही ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ जैसे नारे कोराना से बचाव के लिए बने हैं. सोशल डिस्टेंसिंग इस देश में पाँच हजार वर्षों से है. दलितों को दूर रखने का काम सवर्ण करते रहे हैं. आप इसे फिजिकल डिस्टेंसिंग (शारीरिक दूरी) कहिए. एक आलोचक इन्हीं सब चीजों पर विचार कर सकता है, लोगों का ध्यान आकृष्ट कर सकता है. पिछले दिनों मैंने वेबिनारों में इन पर बातचीत की है.
किसान आंदोलन, एनआरसी, सीएए के खिलाफ आंदोलनों में साहित्यकारों का जुड़ाव किस रूप में आप देख रहे हैं?
कुछ लोग इन आंदोलनों से जुड़े. दिल्ली के अगल-बगल में वे धरना-प्रदर्शन में भी गए. लेकिन जेपी मूवमेंट के दौरान जिस तरह साहित्यकार जुडें, जैसे रेणु या नागार्जुन, उस तरह से बड़े लेखक इन आंदोलनों से नहीं जुड़े है. कारण चाहे जो भी हो. यह भी भय हो कि सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करे. जितने बड़े पैमाने पर साहित्यकारों को इनमें शामिल होना चाहिए था, वे नहीं हुए.
सूरदास पर आपने पीएचडी की थी, अनेक समकालीन रचनाकारों पर भी लिखा है. आपके प्रिय रचनाकार कौन रहे हैं?
मैंने अपने समय के ही रचनाकारों का नाम लूँगा. सूर-तुलसी-कबीर सबके प्रिय हैं. एक हैं बाबा नागार्जुन. उनसे मेरा व्यक्तिगत संबंध था. वे जब दिल्ली आते थे तब मेरे घर पर रुकते थे. बाबा नागार्जुन मुख्यत: किसान-मजदूरों के कवि थे. वे जन आंदोलनों के कवि थे. दलित, आदिवासी पर उन्होंने कविता लिखी है. इन सब कारणों से वे मुझे पसंद हैं. वे जटिलता को कला नहीं मानते थे. एक उनकी कविता है-जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं, जनकवि हूँ मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं. बहुत लोग हकलाहट को ही कविता समझते हैं, नागार्जुन उनमें से नहीं हैं. दूसरे मेरे प्रिय कवि हैं आलोकधन्वा जिन्होंने लिखना बंद कर दिया है. तीसरे मेरे प्रिय कवि हैं, जिन पर मैंने लिखा भी है, कुमार विकल. पंकज चतुर्वेदी, बोधिसत्व की कविता भी मुझे पसंद हैं.
आपको नामवर सिंह ‘आलोचकों का आलोचक’ कहते थे...
नामवर सिंह मुझे किनारे करने के लिए इस तरह के फतवे देते थे. उनके कहने का अर्थ ये था कि मैं व्यावहारिक आलोचनाएँ नहीं लिखता. जो आदमी सूरदास पर पूरी किताब लिखा हो उसे व्यावहारिक आलोचना नहीं लिखने वाला कहना कैसी ईमानदारी है! मैंने उपन्यास और लोकतंत्र किताब में अनेक उपन्यासों की आलोचना की है. अभी मेरी किताब आई है-हिंदी कविता का अतीत और वर्तमान. उसमें कई लेख हैं व्यावहारिक आलोचना के. और तो और देश के विभाजन को लेकर अज्ञेय ने जो कविता-कहानी ‘शरणार्थी’ में लिखी उसका विवेचन-विश्लेषण भी मैंने किया. विभाजन त्रासदी पर छायावादी कवियों, प्रगतिशीलों ने भी नहीं लिखा. फुटकर कविता की अलग बात है. हम रचना का मूल्यांकन करते हैं, रचनाकार का नहीं. इसलिए आलोचकों का आलोचक कहना झूठ है.
जेएनयू से आप लंबे समय तक जुड़े रहे हैं. जिस तरह का आरोप-प्रत्यारोप इन दिनों सुनाई दे रहा है वह विश्वविद्यालय की स्वतंत्रता/स्वायत्तता पर सवाल खड़े करता है?
जेएनयू की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को नष्ट करने के लिए कुछ लोग लगे हुए हैं. फिर भी अगर जेएनयू के छात्र और अध्यापक, जो इसकी प्रतिष्ठा करना चाहते हैं, जीवित, जागृत और सजग रहें तो नष्ट नहीं होगा. मेरी जितनी समझ बनी है, देश की उच्च शिक्षा ही संकट में है उसी में जेएनयू भी है.
आप 'दारा शिकोह' पर लंबे समय से काम करते रहे हैं. कब तक किताब प्रकाशित होने की उम्मीद है.
ऐसा है, ये आप जो आप देख रहे हैं (सोफे पर फैली किताबों की तरफ इशारा करते हुए), दारा शिकोह पर मैं काम कर रहा हूँ. एक-दो महीने में पूरा कर लूँगा, फिर किताब प्रेस में जाएगी.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Tuesday, January 14, 2020

सितारे जमीन पर

भारत में सिनेमा महज मनोरंजन का मुख्य स्रोत नहीं है, बल्कि ‘पॉपुलर संस्कृति’ का हिस्सा भी है. सिनेमा के कलाकारों को सितारों का दर्जा हासिल है. ये सेलिब्रेटी माने जाते हैं. बॉलीवुड से लेकर दक्षिण सिनेमा के सितारे अपनी इस छवि के बदलौत राजनीति के क्षेत्र में भी उतरे, जिनमें कई सफल रहे और कई नाकाम. जहाँ एमजी रामचंद्रन, जयललिता आदि काफी सफल रहीं, वहीं अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता असफल रहे. पिछले कुछ समय से रजनीकांत और कमल हासन जैसे अभिनेता राजनीति में हाथ अजमाने की कोशिश कर रहे हैं.


मुख्यधारा की राजनीति में रहते हुए ये सितारे भले ही सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करें, पर आम तौर पर ये चुप ही रहते हैं. इसका कारण भी स्पष्ट है. सिनेमा एक व्यवसाय है, जिसमें बड़ी पूंजी दांव पर लगी रहती है. साथ ही ये कई कंपनियों के ‘ब्रांड एंबेसडर’ होते हैं और कई सरकारी विज्ञापनों में भी शामिल होते हैं. ऐसे में राजनीतिक पक्षधरता का खुल कर जाहिर करना कारोबार के लिए जोखिम भरा हो सकता है.

पिछले दिनों चर्चित अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जाकर विद्यार्थियों से मिली और उनके साथ अपनी कुछ देर की मौजूदगी दर्ज की. दरअसल, जेएनयू पिछले कुछ महीनों से संघर्ष का परिसर बना हुआ है. दीपिका कुछ नकाबपोश गुंडो की हिंसा में घायल जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष आईशी घोष से भी मिली. उनकी यह तस्वीर सोशल मीडिया में खूब वायरल हुई. इसके बाद यह स्वाभाविक ही था कि कुछ लोगों ने इस कदम की तारीफ की, वहीं उन्हें ‘ट्रोल’ भी किया गया. लोगों ने इसे हाल ही में रिलीज हुई ‘छपाक’ फिल्म के प्रोमोशन से भी जोड़ा.

दरअसल, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी), जामिया-जेएनयू में हुए हिंसा के खिलाफ विरोध पूरे देश में विश्वविद्यालयों के कैंपस से लेकर सड़कों पर दिखाई पड़ रही है. इसमें कई बॉलीवुड के कलाकार और निर्देशक भी शामिल हैं. अनुराग कश्यप जैसे कुछ फिल्म निर्देशक तो काफी मुखर हैं. यों फिल्म दुनिया की कुछ हस्तियों ने सीएए का समर्थन भी किया. किसी भी आंदोलन में युवाओं-विद्यार्थियों की अग्रणी भूमिका रही है. पिछले दिनों दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों में पुलिस की लाठी से एक पुरुष मित्र को बचाती दो छात्राओं और पुलिस को गुलाब का फूल देती एक छात्रा की तस्वीर काफी वायरल हुई. इस पूरे दौर में हिंसा के खिलाफ छात्र-छात्राओं ने विरोध प्रदर्शन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

आजादी के आंदोलन, आपातकाल के खिलाफ आंदोलन, इस दशक की शुरुआत में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए प्रदर्शन आदि में छात्र-छात्राओं और युवाओं ने आगे बढ़ कर भागेदारी की थी. आपातकाल के दौरान किशोर कुमार, देवानंद और मनोज कुमार जैसे कलाकारों ने भी सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज किया था. 

सत्ताधारी दल के कई नेता और मंत्री आपातकाल के विरोध में हुए आंदोलनों में से ही निकले हैं. हाल ही में दिवंगत हुए राकांपा के नेता और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे देवीप्रसाद त्रिपाठी आपातकाल के दौरान छात्रनेता के रूप में उभरे थे.

बहरहाल, कुछ दिन पहले दफ्तर में बैठा खबरों में उलझा था और नज़र टीवी स्क्रीन पर थी कि अपनी धुन में बांसुरी बजाते एक युवा की आवाज कानों में पड़ी. धुन इस गीत की थी : ‘थोड़ा सा प्यार हुआ है, थोड़ा है बाकी’. बांसुरी की आवाज में इस फिल्मी गाने में एक कशिश थी. कवि वीरेन डंगवाल के शब्दों में- गोया एक फ़रियाद है अज़ान सी. साहित्य हो या सिनेमा वह सामाजिक यथार्थ के चित्रण के साथ प्रेम और सामाजिक सौहार्द की ही बात करता है.


प्रसंगवश, सड़कों पर निकले जुलूस में ‘हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है’, और ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर’ जैसे गाने खूब सुनाई दिए. इसे हिंदी फिल्मों के चर्चित गीतकार शैलेंद्र ने लिखा है. हालांकि जिस दौर में शैलेंद्र ने इसे लिखा था वह दौर अलग था. बॉलीवुड में ‘इप्टा’ की पृष्ठभूमि से आए निर्देशक-अभिनेता और प्रगितशील लेखक संघ से जुड़े लेखक-गीतकार काफी सक्रिय थे. इनमें से कई लोगों की राजनीतिक पक्षधरता स्पष्ट थी. 

सिनेमा से जुड़े लेखक या सितारे इसी समाज के हिस्से हैं और जाहिर है कि समाज की हलचलों से वे दूर नहीं रह सकते. अगर कुछ युवा सितारे व्यापक महत्व के मुद्दे पर अपनी दखल दर्ज कर रहे हैं तो उनकी आवाज को लोकतंत्र की मजबूती के रूप में देखना चाहिए. हॉलीवुड में ऐसे सितारों, फिल्म निर्देशकों की लंबी परंपरा है जो राजनीतिक घटनाक्रमों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहे हैं. तीन साल पहले ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप ने गोल्डन ग्लोब अवार्ड समारोह के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर जमकर निशाना साधा था और खरी-खोटी सुनाई थी.

असल में लंबे समय से पॉपुलर संस्कृति का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में होता रहा है. आखिरकार सिनेमा एक सांस्कृतिक उत्पाद है, जो अपने समय को कलात्मक ढंग से रचता है. पिछले दिनों विद्यार्थियों के प्रदर्शन से प्रेरित होकर सुधीर मिश्रा ने ट्विटर पर लिखा कि वे अपनी पहली फिल्म ‘ये वो मंजिल तो नहीं’ का ‘रिमेक’ बनाएँगे. गौरतलब है कि 1987 में आई यह फिल्म छात्र राजनीति के इर्द-गिर्द थी, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.

(जनसत्ता, 14.01.2020)

Thursday, November 21, 2019

संघर्ष का परिसर: जेएनयू

किसी भी व्यक्ति या संस्थान के जीवन में पचास साल का ख़ास महत्व होता है. दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का यह पचासवां वर्ष है. होना तो यह चाहिए कि विश्वविद्यालय के लिए यह उत्सव का वर्ष होता, जहां उसकी उपलब्धियों और खामियों की समीक्षा होती. लेकिन छात्रावास की फीस में अप्रत्याशित बढ़ोतरी और जेएनयू की लोकतांत्रिक जीवन शैली पर प्रशासन के दबिश देने की मंशा के खिलाफ जेएनयू के विद्यार्थियों को सड़कों पर उतरना पड़ा.

जेएनयू उच्च शिक्षा के लिए देश और विदेश मे एक जाना-पहचाना नाम है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) की ओर से जारी नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग में जेएनयू उच्च पायदानों पर रहा है. हालांकि वर्ष 2016 से जेएनयू की चर्चा शिक्षा के एक उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान से ज्यादा देशद्रोह, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को लेकर विचारधारात्मक संघर्ष के परिसर के रूप में होती रही है. अब लोगों को समझ में आने लगा है कि इसके पीछे किस तरह की राजनीति और कारोबारी प्रचार और संचार तंत्र का हाथ रहा है.

शुरुआती दौर से जेएनयू की छवि एक प्रगतिशील विचारधारा और राजनीतिक रुझान वाले संस्थान की रही है, लेकिन किसी भी उत्कृष्ट विश्वविद्यालय की तरह यह एक लोकतांत्रिक परिसर है जहाँ बहस-मुबाहिसा और प्रतिरोध के स्वर हमेशा बुलंद रहे हैं. खासतौर पर आपातकाल के दौरान जेएनयू सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का एक केंद्र बन कर उभरा था. सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ छात्र-छात्राओं ने एक बड़ा संघर्ष किया था. राजनीतिक सक्रियता जेएनयू के छात्रों को विरासत में मिली है. एक बार फिर से खबरिया चैनलों में जेएनयू को लेकर पूर्वाग्रह है और सोशल मीडिया में कई लोगों ने ‘शट डाउन जेएनयू’ जैसे हैशटैग के साथ ‘जेएनयू बंद करो’ का अभियान चलाया.

मुझे याद है कि पिछले दशक में जब मैं जेएनयू का छात्र था तो समाजशास्त्र में राजस्थान के भील समुदाय से एक छात्र ने एमए में नामांकन लिया था. हम एक ही हॉस्टल में रहते थे. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि  ‘मेरे मन में अपनी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का ख्याल हर वक्त रहता है, पर सहपाठी, मित्रों, और शिक्षकों ने किसी भी तरह की हीनमन्यता को मेरे अंदर घर नहीं करने दिया.” बहरहाल, एक आंकड़ा के मुताबिक 2017-18 के दौरान जेएनयू में पढ़ने वाले करीब 40 प्रतिशत छात्रों के परिवार की मासिक आय 12 हजार रुपए से कम  आंकी गई थी. जेएनयू की नामांकन पद्धति में सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र–छात्राओं को नामाकंन के लिए ‘डेप्रिवेशन पाइंट्स’ दी जाती है.

जेएनयू में सबसिडी की वजह से पढ़ाई लिखाई के खर्चे, छात्रावास की फीस वगैरह बेहद कम हैं और इस लिहाज से शुरुआती दौर से देश के कोने-कोने से प्रतिभावान छात्र पढ़ने और शोध करने आते रहे हैं. इनमें से कई विद्यार्थी अपने परिवार और रिश्तेदारों में पहली पीढ़ी के होते हैं, जिन्होंने उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय का रूख किया होता है.  पिछले दिनों, 1981-83 के दौरान जेएनयू के छात्र रहे, अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता, अभिजीत बनर्जी ने भी बातचीत में इस बात का जिक्र किया था कि उनके दौर में भी जेएनयू में देश के विभिन्न हिस्सों से छात्र मौजूद थे, जो इसकी खूबी थी. इस तरह जेएनयू अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता रहा.

पूरी दुनिया में शिक्षा को ‘पब्लिक गुड’ मानने और शिक्षा के निजीकरण को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है. अमेरिका और ब्रिटेन में विद्यार्थियों को कर्ज लेकर महंगी उच्च शिक्षा पूरी करनी होती है. नतीजतन, एक खास वर्ग तक ही उच्च शिक्षा की पहुँच है. इसके उलट जर्मनी और फ्रांस में उच्च शिक्षा में कई तरह का वित्तीय अनुदान यानी सबसिडी देकर सस्ता बनाया गया है. इस दशक में इंग्लैंड में उच्च शिक्षा में महंगी ट्यूशन फीस को लेकर कई बार छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया है.

मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में देश में उच्च शिक्षा को विभिन्न तरह के अनुदान देकर सुलभ बनाया गया था. उदारीकरण के बाद कई निजी विश्विद्यालय उभरे हैं, जिनका जोर गुणवत्ता पर कम अपने कारोबार को बढ़ाने पर ज्यादा है. महंगी फीस होने के कारण एक खास वर्ग के बच्चे ही इन विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं. उच्च शिक्षा में निवेश को हम तात्कालिक नफे-नुकसान के आधार पर नहीं तौल सकते हैं.

राजनेताओं-शिक्षाविदों ने देश निर्माण में शिक्षा के महत्व को हमेशा महत्वपूर्ण माना है. उच्च शिक्षा कई तरह की जातीय-वर्गीय-लैंगिक बाधाओं को तोड़ता है और समाज के हाशिए पर रहने वाले कमजोर तबकों को आगे बढ़ने के अवसर देता है. पिछले पचास वर्षों में जेएनयू ने देश को बेहतरीन शिक्षक, अध्येता, राजनेता, नौकरशाह, समाजसेवी और पत्रकार दिए हैं. कहा जा सकता है कि भारत जैसे विकासशील देश में जेएनयू सामाजिक न्याय और समानता का एक सफल मॉडल है. जेएनयू की स्थापना के पचासवें वर्ष में उच्च शिक्षा को लोक हित में मानते हुए एक सार्थक विमर्श होना चाहिए, ताकि हम राष्ट्र निर्माण की सही दिशा में आगे बढ़ सके. यही जेएनयू की परंपरा रही है. 

(जनसत्ता, 21 नंवबर 2019)

Wednesday, October 30, 2019

हारिल हैं हम तो

स्मृतियां अक्सर अनकहे दस्तक देती हैं. कभी किसी बातचीत के बीच या कभी किसी सिनेमा, संगीत के माध्यम से या कई बार बिना किसी आश्रय के. करीब 23 वर्षीय युवा अचल मिश्र की मैथिली फिल्म-‘गामक घर (गांव का घर)’ की इन दिनों मीडिया में खूब चर्चा है. इस फिल्म में मिथिला में बसे एक गांव की यादें हैं, जहां से निर्देशक का जुड़ाव है. इस फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद मेरा भी मन बचपन के दिनों में लौट आया.
पिछले कुछ वर्षों में बिहार के बाहर मीडिया में लोक पर्व छठ की खूब चर्चा होती रही है. वहीं छठ के इर्द-गिर्द ही मिथिला में एक और लोक पर्व- ‘सामा-चकेवा’ भी मनाया जाता रहा है, लेकिन वह अनदेखा रह जाता है. कार्तिक महीने में छठ के अगले दिन ‘सामा-चकेवा’ की शुरुआत होती है, जो आठ दिनों तक चलती है.
यह लोक पर्व भाई-बहन के आपसी प्रेम को दिखाता है. इसी मौसम में हिमालय से मैदान की ओर पक्षियां प्रवास के लिए आते हैं. युवतियां मिट्टी की आकृतियों में विभिन्न पक्षियों को अपने रंग में रंगती हैं. सामा-चकेवा पक्षियों का स्वागत इस पर्व से जुड़ा है. लोक गीतों के साथ सामा की विदाई होती है, इस आग्रह के साथ कि वे फिर से लौट कर मिथिला की धरती पर आयें.
मिथिला की चर्चित सिक्की कला भी सामा की ‘पौती’ के रूप में दिखायी पड़ती है. मेरे लिए सामा-चकेवा मिथिला की संस्कृति का एक अहम हिस्सा है, जिसमें मिथिला पेंटिंग, सिक्की कला, लोक गीतों की झलक है. दूसरे स्तर पर देखें, तो प्रकृति के साथ मनुष्य के सहज संबंधों की अभिव्यक्ति भी इस लोक पर्व में मिलती है.
जब से गांव-घर छूटा है, मैंने इस पर्व को मनाते हुए नहीं देखा. ‘दिल्ली-एनसीआर’ में तो इसकी चर्चा भी नहीं होती, जहां मिथिला समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग रहता है. बहरहाल, मेरा एक दोस्त कहता है, ‘यार, शाम होते ही आजकल तुमपे उदासी क्यों छाने लगती है.’ मैं उसके जवाब में ‘नहीं तो’ कह कर उसकी बात को टालने की कोशिश करता हूं. मैं ‘होमसिक’ कभी नहीं रहा, लेकिन अक्सर इस मौसम में शाम ढलते-ढलते एक अजीब सी ‘नॉस्टेल्जिया’ मेरे अंदर घर करने लगती है.
जेएनयू के दिनों में मेरे हॉस्टल के कमरे की बालकनी में ठीक सामने एक बरगद का पेड़ था और टेरेस पर एक झुरमुट पीपल. इन पेड़ों पर हर साल प्रवासी पक्षियों के झुंड आते थे. नवंबर आते ही मैं इनका इंतजार करता था. मुझे नहीं पता होता कि ये किस देश से आते थे.
वियोग में होते थे या प्रेम में? निर्वासन की पीड़ा झेल रहे थे या सैर-सपाटे के मूड में. या किसी सहचर की खोज में भटक रहे थे? कवि उदय प्रकाश ने ‘नींव की ईंट हो तुम दीदी’ शीर्षक कविता में लिखा है- हमारा क्या है दिदिया री!/ हारिल हैं हम तो/ आयेंगे बरस दो बरस में कभी/ दो-चार दिन मेहमान-सा ठहर कर/ फिर उड़ लेंगे. ‘गामक घर’ एक रूपक है, हम जैसे ‘हारिलों’ के लिए.

प्रभात खबर, 30 अक्टूबर 2019

Saturday, October 19, 2019

बहस-मुबाहिस के पक्ष में अभिजीत बनर्जी


इस बार अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार अमेरिकी नागरिक अभिजीत बनर्जी, एस्थर डुफलो और माइकल क्रेमर को गरीबी उन्मूलन के लिए किए गए उनके शोध के लिए दिया गया है. प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा भारत में हुई और वह प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन के बाद एमए करने जेएनयू, दिल्ली आ गए थे. चूँकि बनर्जी की जड़ें भारत में है, इस वजह से उनकी उपलब्धियों पर गर्व स्वाभाविक है और मीडिया में जेएनयू की खास तौर पर चर्चा है.

वर्ष 2016 से जेएनयू की चर्चा में नकारात्मक तत्वों का बोलबाला रहा है. इसमें देश की वर्तमान राजनीति और सोशल मीडिया का भी योगदान है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1969 में जब जेएनयू की स्थापना हुई, देश में नक्सलबाड़ी आंदोलन का दौर था. एक तरह से जेएनयू की जन्मकुंडली में ही राजनीतिक सरोकारों और हाशिए पर रहने वाले समाज के लोगों के प्रति संवेदना का भाव रहा है.

प्रतिष्ठित ‘दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स’ के बदले जेएनयू में नामांकन उन्होंने क्यों लिया इसे याद करते हुए अभिजीत बनर्जी ने खुद लिखा है कि ‘जेएनयू की फिजा अलग थी. जेएनयू की ऊबड़-खाबड़, बेढ़ब खूबसूरती कुछ अलग थी जबकि डी-स्कूल (दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स) किसी भी दूसरे भारतीय संस्थान की तरह ही था. खादी कुर्ते में, पत्थरों पर बैठे बहस करते छात्रों में मैंने खुद को देखा था.’

एक गर्बीली गरीबी और बहस-मुबाहिसा की परंपरा जेएनयू में आज भी कायम है. वामपंथी रुझान के बावजूद जेएनयू एक लोकतांत्रिक जगह है.
अभिजीत बनर्जी अपनी किताब के साथ

पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक दुनिया में लोकतांत्रिक ढंग से बहस-मुबाहिसा के लिए जगह सिकुड़ी है. यह बात ना सिर्फ राजनीति बल्कि मीडिया के लिए भी सच है. प्रसंगवश, एस्थर डुफलो के साथ लिखी हाल ही में प्रकाशित उनकी किताब- ‘गुड इकानामिक्स फॉर हार्ड टाइम्स’ में उन्होंने जिक्र किया है कि किस तरह लोकतंत्र के ऊपर सोशल मीडिया का नाकारात्मक प्रभाव पड़ा है. उन्होंने लिखा है: इंटरनेट का विस्तार और सोशल मीडिया के विस्फोट से पक्षपातपूर्ण रवैए में बढ़ोतरी हुई है.’ इस संदर्भ में वे फेक न्यूज और सोशल मीडिया में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को भी रेखांकित करते हैं जिससे विचार-विमर्श प्रभावित हुआ है.

वर्ष 2016 में जब जेएनयू में तथाकथित देश विरोधी नारे लगाने की बात को लेकर सरकार ने छात्र नेताओं को जेल भेजा तब उन्होंने जोर देकर कहा था देश को जेएनयू जैसे सोचने-विचारने वाली जगह की ज़रूरत है और सरकार को निश्चित तौर पर दूर रहना चाहिए. प्रसंगवश, वर्ष 1983 में कुलपति प्रोफेसर पीएन श्रीवास्तव के कार्यकाल के दौरान जब जेएनयू में छात्र आंदोलन हुआ था तब सैकड़ों छात्रों को तिहाड़ जेल जाना पड़ा. अभिजीत बनर्जी भी उनमें शामिल थे. हालांकि बाद में सरकार ने सारे आरोप वापस ले लिए थे.

(राजस्थान पत्रिका, 19 अक्टूबर 2019)

Tuesday, April 23, 2019

बेगूसराय में 'गली बॉय'


कन्हैया कुमार
प्रसिद्ध संपादक प्रभाष जोशी ने कहीं लिखा था कि ‘बिहार में यदि चुनाव नहीं देखा तो क्या देखा.’ उत्तर प्रदेश भले ही लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाला राज्य हो, पर लोकतंत्र के रंग चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा बिहार में ही खिलते रहे हैं. 17वीं लोकसभा का चुनाव इसका अपवाद नहीं है.

इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव की भाषण शैली को लोग मिस कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि लालू यादव की इस कमी को बेगूसराय से भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे कन्हैया कुमार पूरा कर रहे हैं. ना सिर्फ अखबारों और टीवी चैनलों पर बल्कि सोशल मीडिया में भी कन्हैया कुमार की खूब चर्चा है. पापुलर मीडिया और वेबसाइट पर उनके भाषणों को खूब देखा-सुना जाता है.

असल में, कन्हैया कुमार जहाँ पिछले तीन वर्षों में विपक्षी पार्टियों और नागरिक समाज के लिए एक ‘पोस्टर बॉय’ बन कर उभरे हैं, वहीं वे केंद्र में सत्तासीन बीजेपी और संघ की आँखों की किरकिरी हैं. राष्ट्रवाद, आतंकवाद और राजद्रोह इस चुनाव में बीजेपी के लिए मूल मुद्दे हैं. रोजगार, विकास और ‘अच्छे दिन’ पीछे छूट गए लगते हैं. और यही वजह है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता अपने चुनावी भाषणों में ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ की खूब चर्चा करते हैं. गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली में फरवरी 2016 में एक कार्यक्रम के दौरान तथाकथित देश विरोधी नारे के आरोप में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष, सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ के नेता, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी हुई थी. इसका पूरे देश में विरोध हुआ. कैंपस और कैंपस के बाहर छात्र, बुद्धिजीवी सड़क पर उतरे. मोदी सरकार के मुखर विरोधी के रूप में कन्हैया कुमार की पहचान बनी. उनकी भाषण देने के शैली को युवाओं ने खूब पसंद किया. उनका भाषण और ‘आजादी’  का कौल हाल ही में ‘गली बॉय’ फिल्म के माध्यम से एक बार फिर से चर्चा में है.

निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले कन्हैया कुमार मूल रूप से बेगूसराय के हैं. ‘नेता नहीं बेटा चाहिए’ का नारा इन दिनों वहाँ की फिजां मे गूंज रहा है. बेगूसराय में वाम विचारधारा की जमीन भी वर्षों से रही है और इस वजह से इसे ‘बिहार का लेनिनग्राद’ कहा जाता रहा है. वहीं जेएनयू भी वामपंथी विचारों के लिए जाना जाता है. जेएनयू की छात्र राजनीति में, जहाँ कन्हैया कुमार केंद्र में रहे, सरोकार और सक्रियता की परंपरा शुरुआती दौर से रही हैं. समाज के हाशिए पर रहने वाले, उपेक्षितों के प्रति एक संवेदना हमेशा रही है और वाद-विवाद-संवाद की स्वस्थ परंपरा से जेएनयू की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत में पहचान बनी.  भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की छात्र इकाई आइसा से जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे, बिहार के चंद्रशेखर ने जब जमीन पर काम करना शुरु किया तो मोहम्मद शाहबुद्दीन के समर्थकों ने उनकी वर्ष 1997 में हत्या कर दी. जेएनयू में आज भी छात्र उन्हें शिद्दत से याद करते हैं. करीब 20 वर्ष बाद जेएनयू की छात्र राजनीति ने कन्हैया कुमार के रूप में देश को एक जुझारू छात्र नेता दिया है. 
  
कन्हैया कुमार वाम विचारधारा के प्रतिनिधि हैं, भाजपा के गिरिराज सिंह दक्षिणपंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, राष्ट्रीय जनता दल के तनवीर हसन सामाजिक न्याय का. भारतीय राजनीति में जातिगत गोलबंदी और धर्म महत्वपूर्ण धुरी हैं जिसके इर्द-गिर्द चुनाव प्रचार और वोट डाले जाते हैं. चर्चित लेखक हरिशंकर परसाई ने अपने निबंध-हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं, में वर्षों पहले जो लिखा था वह कमोबेश आज भी सच है:

“कृष्ण ने कहा, मैं ईश्वर हूं. मेरी कोई जाति नहीं है.
उन्होंने कहा देखिए न, इधर भगवान होने से तो काम नहीं न चलेगा. आपको कोई वोट नहीं देगा. जात नहीं रखिएगा तो कैसे जीतिएगा?
जाति के इस चक्कर से हम परेशान हो उठे. भूमिहार, कायस्थ, क्षत्रिय, यादव होने के बाद ही कोई कांग्रेसी, समाजवादी या साम्यवादी हो सकता है. कृष्ण को पहले यादव होना पड़ेगा, फिर चाहे वे मार्क्सवादी हो जाएं.”
पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के भोला सिंह ने तनवीर हसन को हराया था, जबकि सीपीआई के राजेंद्र प्रसाद सिंह तीसरे स्थान पर रहे थे. इस चुनाव में तीनों ही इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं. इस त्रिकोणीय लड़ाई ने चुनावी मुकाबले को मीडिया के लिए दिलचस्प बना दिया है. पर चुनावी हार, जीत से इतर, निस्संदेह, कन्हैया कुमार इस चुनाव में वर्चस्वशाली सत्ता के विरुद्ध एक चुनौती बन कर उपस्थित हैं. यह भारतीय लोकतंत्र की जीत है.

(जानकी पुल पर प्रकाशित)