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Sunday, April 05, 2026

युद्ध के बीच रंगमंच पर ‘आइंस्टीन’

 
मशहूर अदाकार नसीरुद्दीन शाह अपने सोलो नाटक ‘आइंस्टीन’ को लेकर दर्शकों के बीच करीब दस वर्षों से आते रहे हैं, पर युद्ध और विध्वंस की खबरों की बीच यह नाटक जितना आज प्रासंगिक हो उठा है शायद ही कभी रहा हो.

जीनियस भौतिक शास्त्री अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन वृत्त को समेटे, ग्रैबिएल इमैनुएल के लिखे इस नाटक का मंचन जब ‘श्रीराम लागू रंग अवकाश’, पुणे में हो रहा था, आसमान में तारों की चमक खो सी गई थी. अमेरिका को कोसते हुए आइंस्टीन जब कहते हैं-‘या तो आप युद्ध के साथ होते हैं या उसके विरुद्ध!’, ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच हो रहे जंग की अनुगूंज साफ सुनाई दे रही थी. कला या साहित्य युद्ध रोक नहीं पाता पर यथार्थ से वह हमें रोज रू-ब-रू करवाता है.
पचहत्तर वर्षीय शाह जैसे ही आइंस्टीन के किरदार में प्रवेश करते हैं हम भूल जाते हैं कि वह हमारे बीच के अदाकार हैं, एक वैज्ञानिक नहीं! साक्षेपता के सिद्धांत या गुरुत्वाकर्षण की बात करते हुए वे एक कुशल शिक्षक जैसे विश्वसनीय लगते हैं. गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को समझाते हुए एक सीन के दौरान उन्होंने दो दर्शक को भी मंच पर बुला लिया, जो कि मेरे लिए अप्रत्याशित था.
शाह इस नाटक में छिहत्तर वर्षीय आइंस्टीन (1879-1955) के व्यक्तित्व को बेहद खूबसूरती से हमारे सामने लाते हैं. अपने हाव-भाव, भंगिमा, विट से वे दर्शकों को एक ऐसे हाड़-मांस के व्यक्ति से साक्षात्कार करवाते हैं जो युदध के, एटम बम के खिलाफ था, एक पैसेफिस्ट (अमन पसंद) था. उसके सब सिद्धांत, प्रमेय मानवता के लिए थे, उसके खिलाफ नहीं. आइंस्टीन अपनी सीमाओं के बावजूद विश्वसनीय लगते हैं.
एकालाप में आइंस्टीन अपने बचपन, स्कूल, नाजी जर्मनी और अमेरिकी युद्ध लिप्सा की हमसे बातें करते हैं. इस फ्लैशबैक में मंच पर कुछ तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन यह नाटक बिना किसी ताम-झाम के हमारे सामने खुलता है. बेहद सामान्य एक कमरे का सेट (स्टडी रूम), जिसमें चारों तरफ किताबें फैली हुई है, हैंगर पर कोट टंगा है, एक मेज, ब्लैक बोर्ड, वायलिन, जूते और ऐसी ही कुछ मामूली सी चीजें. समकालीन नाटकों में म्यूजिकल का जोर बढ़ा है, जो लोगों का मनोरंजन में सहायक होता है. इसके विपरीत शाह के नाटकों मसलन, ‘इस्मत आपा के नाम’, ‘फादर’, ‘आंइस्टाइन’ जैसे में शाह का जोर संवाद और अभिनय पर रहता आया है.
शाह अपने बेहद प्रभावी और रोचक अभिनय के दम पर दर्शकों को करीब डेढ़ घंटे तक बांधे रखते हैं. कभी अपने मौजे को तलाशते, तो कभी वायलिन के ‘बो’ तलाशते आइंस्टीन बेहद सहज लगते हैं. नाटक में एक जगह वह किस्सा सुनाते हैं कि शादी की रात जब वे अपनी पत्नी के साथ घर लौटे, तब उन्हें एहसास हुआ कि वे चाबी भूल गए हैं. बीच-बीच में हास्य का पुट इस नाटक को बोझिल नहीं बनने देता.
पिछले पैतालीस वर्षों में एक साथ हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में ‘मोटले प्रोडक्शन’ ने विभिन्न प्रस्तुतियों के जरिए रंगमंच को संवृद्ध किया है. उम्र के इस पड़ाव पर आइंस्टीन का किरदार निभाते नसीरुद्दीन शाह को रंगमंच पर देखना सुकून देता है.

Sunday, December 07, 2025

लल्ल दैद् को वाणी देतीं मीता वशिष्ठ

 

पिछले दिनों मीता वशिष्ठ अपने एकल नाटक, कश्मीर की चर्चित संत कवयित्री, ‘लल्ल दैद्’ को लेकर एक बार फिर मंच पर दिखीं. असल में, चौदहवीं सदी की इस कवयित्री की उत्तर भारत में उस रूप में चर्चा नहीं होती जिस तरह हम कबीर, सूर, तुलसी या मीरा की करते हैं. इसकी क्या वजह है?
यह पूछने पर कि आपने ‘लल्ला’ को ही अपने एकल अभिनय के लिए क्यों चुना, जबकि भक्त कवियों में दक्षिण में अंडाल या उत्तर में मीरा ज्यादा लोकप्रिय रही हैं? मीता कहती हैं कि ‘पिछले सात सौ वर्षों से लल्ल दैद् की कविता- ‘वाख’, कश्मीरी आम लोगों की जुबान में रची-बसी साझी संस्कृति का हिस्सा रही है. हिंदू और मुस्लिम समुदाय दोनों के बीच लल्ला की मौजूदगी रही है.’
साथ ही लल्ला की कविता में जो लय है उस पर वो जोर देती हैं. संत कवियों की तरह ही लल्ला की कविता में रहस्य और आत्मानुभूति दोनों मौजूद है. जीवन, योग, ईश्वर, आत्मा आदि उनके विषय रहे.
श्रुति परंपरा के रूप में लल्ला की कविता सैकड़ों वर्षों से लोगों का कंठाहार बनी रही. अपने एकल अभिनय में मीता ने लल्ला के जीवनवृत्त और उनकी कविता को मंच पर प्रस्तुत किया. एक साथ हिंदी, कश्मीरी और अंग्रेजी जुबान का प्रयोग मंच पर दिखा. कश्मीरी और हिंदी भाव प्रवाह में सहायक रही पर वहीं अंग्रेजी में जैसे ही वा
ख का पाठ मंच पर वह करती रसानुभूति में खलल पड़ता. साथ ही पटकथा में विस्तार का अभाव दिखा.
ब्राह्मण कुल में जन्मी लल्ला की शादी बारह वर्ष की उम्र में हो गई पर वह गृहस्थी के लिए नहीं बनी थी. भक्ति भाव और अध्यात्म में वह डूबी रहती थी. वह शिव की साधना के लिए मंदिर जाती थी. इसे घर-परिवार के लोग संशय से देखते थे और गार्हस्थ जीवन कलहपूर्ण रहा. 26 वर्ष की उम्र में वह घर छोड़ कर निकल गई और शैव संत सिद्ध श्रीकांत से अपना शिष्य बना लेने का आग्रह किया. दीक्षा के बाद वह संन्यासी बन गई और अकेले ही साधना के मार्ग पर चल पड़ी. जाहिर है उस दौर में एक स्त्री के लिए यह आसान नहीं था, आज भी नहीं है! उन्हें तरह-तरह का तिरस्कार झेलना पड़ा जिसे उन्होंने अपने बाख में वर्णन किया है.
उन्होंने अपने एक वाख में लिखा है कि ‘उन्हें हजार गालियों मुझे देने दो, मेरे दिल में इसके लिए कोई जगह नहीं है. मैं शिव की हूँ. क्या राख से शीशे को कोई क्षति पहुंचती है? उसकी चमक और बढ़ ही जाती है.’
जैसा कि कबीर की कविता में कहत कबीर या संत तुकाराम की कविता में तुकाराम का उल्लेख मिलता है उसी तरह लल्ला अपनी कविताओं मौजूद हैं 'मैं लल्ला' के रूप में.
लल्ला की कविताओं में संस्कृत और फारसी का मेल है. साथ ही सिद्ध और नाथ साहित्य परंपरा का विकास दिखाई देता है. पर उनके दोहे में जो अनुभूति व्यक्त हुई है वह निजी है, नया है. एक वाख में वह कहती हैं: मन नया है/चाँद नया है/ जल का विशाल विस्तार नया है/ मैं लल्ला एक नई घटना हूँ.
आज के समय में हिंसा के बीच कश्मीरी अस्मिता को भी नएपन की जरूरत है!

Monday, August 04, 2025

गुजिश्ता खुशबुओं के दिन: कैफी और मैं


पुणे में व्यावसायिक मराठी रंगमंच काफी संवृद्ध है, वहीं हिंदी और अंग्रेजी नाटकों का भी एक अलग दर्शक वर्ग है.

पिछले दिनों चर्चित अदाकार नसीरुद्दीन शाह अपना नाटक द फादर’ लेकर आए थे, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा. वहीं रविवार को पुणे के रंगमंच पर मशहूर अदाकारा शबाना आजमी दिखाई थी. खचाखच भरे सभागार में दर्शकों का उत्साह देखते बना.

असल में,  रमेश तलवार निर्देशित बहुचर्चित नाटक कैफी और मैं’ में शबाना आजमी एक बार फिर से दर्शकों से रू-ब-रू थी. यह नाटक अपने बीसवें साल में है. अगले महीने वे पचहत्तर वर्ष की हो जाएँगी, ऐसे में रंगमंच पर उनकी सक्रियता थिएटर को लेकर उनके जुनून को दिखाता है.

संस्कृतिकर्मी और अदाकार शौकत आजमी की आपबीती याद की रहगुजर और कैफी आजमी के साक्षात्कारों, खतो-किताबत को यह नाटक समेटे है जिसे जावेद अख्तर ने बुना है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है शौकत के नजरिए से कैफी और उनके संबंधों, कैफी की शायरी, उनके सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार यहाँ दिखाई देते हैं.

शौकत की भूमिका में शबाना आजमी और कैफी की भूमिका में कंवलजीत सिंह मंच पर थे. पर ऐसा नहीं कि यह नाटक केवल दो तरक्कीपसंद लोगों के आपसी प्रेम संबंधों का दस्तावेज बन कर रह गया है, बल्कि इसके मार्फत मानवीय मूल्यों, सहजीवन और आजाद भारत के सपनों की अभिव्यक्ति भी यहाँ मिलती है. एक ऐसे दौर को हम जीते हैं, जो अतीत का पन्ना हो चला है. हमारे हिस्से महज खुशबू रह गई है!

कैफी की जीवन यात्रा के कई रंग हैं. वे उर्दू के प्रगतिशील धारा के प्रमुख शायर रहे और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के अग्रणी स्वर. वहीं हिंदी सिनेमा के लिए उन्होंने जी गीत रचे, वे हमारी थाती हैं. आश्चर्य नहीं मंच पर उनके लिखे गीतों के टुकड़ों को जसविंदर सिंह ने गाया और दर्शक उनसे पूरा गाने की फरमाइश करते रहे.

चर्चित अदाकार जोहरा सहगल ने इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन के शुरुआती दिनों को याद करते हुए लिखा है कि हर एक कलाकार जो बंबई (मुंबई) में 1940 और 1950 के बीच रह रहा थावह किसी न किसी रूप में इप्टा से जुड़ा था. गीत-संगीतनृत्यनाटक के जरिए मौजूदा ब्रिटिश साम्राज्यवादी हुकूमत और फासीवाद से लड़ने के लिए इप्टा का गठन किया गया थाजिसके केंद्र में मेहनतकश जनता की संस्कृति थी. कैफी के साथ शौकत भी इप्टा से एक अदाकार के रूप में जुड़ी थी. देश विभाजन को आधार बना कर बनी फिल्म गर्म हवा’ (1974) में उनका अभिनय आज भी याद किया जाता है.

सज्जाद जहीर, चेतन आनंद, के ए अब्बास, सरदार जाफरी, इस्मत चुगताई, मजरूह सुल्तानपुरी, दीना पाठक, बलराज साहनी, भीष्म साहनी, कृष्ण चंदर जैसे उर्दू-हिंदी साहित्य के कद्दावर नाम इस नाटक में लिपटे चले आते हैं. इस तरह से यह नाटक साहित्य-सिनेमा के एक सुनहरे दौर का वृत्तांत भी रचता है.  


इस साल गुरुदत्त की जन्मशती मनाई जा रही है. कागज के फूल के लिए कैफी आजमी के लिखे गीतवक्त ने किया क्या हंसी सितम’ और बिछड़े सभी बारी बारी’ को समीक्षकों ने रेखांकित किया. जहाँ ये गीत लोगों की जबान पर बस गए, वहीं फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई. उन्हें सफलता मिली चेतन आनंद की फिल्म हकीकत के लिखे गानों के साथ, जो बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही और चेतन आनंद-मदन मोहन-कैफी आज़मी की जोड़ी चल निकली.

कैफी ने पहली नज्म महज  ग्यारह साल की उम्र में पढ़ी थी. मुंबई आने से पहले ही उनकी प्रसिद्धि औरत नज्म (उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे...) से फैल चुकी थी. इसी नज्म को सुन कर शौकत ने ठान लिया था कैफी ही उनके जीवन साथी बनेंगे और उन्होंने उनके साथ बंबई के एक 'होल टाइमर कम्युनिस्ट' के साथ कम्यून में रहने  का फैसला किया.

जब कैफी समाज के हाशिए पर रहने वालों के साथ काम कर रहे थे तभी उन्होंने मकान नज्म लिखा था. जब मंच से कैफी के इन नज्म से इन पंक्तियों का पाठ किया गयाआज की रात बहुत गर्म हवा चलती है/आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी/सब उठोमैं भी उठूँ तुम भी उठोतुम भी उठो/कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी, तब लगा कि किस तरह उनकी कविता समकालीन है. कैफी जैसा रचनाकार समय-सीमा के परे है.

इन नाटक के लिए मंच पर बेहद कम साजो-सामान का इस्तेमाल किया गया. फिरोज अब्बास खान निर्देशित 'तुम्हारी अमृतानाटक में हमने शबाना को देखा है. इस नाटक में अमृता और जुल्फी के बीच प्रेम प्रसंग को खतों के माध्यम से संवेदनशील और मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है. ठीक वही शैली इस नाटक में भी अपनाई गई है. जहाँ शौकत के किरदार में शबाना ने प्रभावित किया वहीं ऐसा लगा कि कंवलजीत कैफी ने किरदार के लिए तैयारी करके नहीं आए थे. कई बार संवाद अदायगी में वे फिसले. वे रसास्वादन में बाधा बन कर सामने आया. उल्लेखनीय है कि कैफी के किरदार को जावेद अख्तर निभाते रहे हैं, हमने उन्हें मिस किया. 

आजमगढ़ जिले के मिजवां गाँव में जन्मे कैफी आजमी भले गाँव से वर्षों से दूर रहे, पर उनकी शायरी में गाँव-जवार रचा-बसा रहा. वर्षों बाद वे गाँव लौटे और शौकत के साथ मिल कर घर बनाया, बच्चों के लिए स्कूल, सड़क और अन्य सुविधाओं के लिए लड़ाई लड़ी थी.

याद आया कि पाँच साल पहले मी रक्सम’ फिल्म कैफी के पुत्र बाबा आजमी से निर्देशित किया और शबाना आजमी ने प्रस्तुत किया था. इस फिल्म में निम्नवर्गीय मुस्लिम परिवार के जीवन और संघर्ष का चित्रण है. मी रक्सम’ फिल्म आजमगढ़ जिले के मिजवां गाँव के आस-पास अवस्थित है. मिजवां के दृश्य मोहक हैं. बकौल बाबा आजमी एक बार कैफी आजमी ने उनसे पूछा था कि ‘क्या तुम कोई फिल्म मिजवां में शूट कर सकते हो?’

फिल्म की तरह ही यह नाटक मशहूर शायर, नग्मा-निगार और मानवीय मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध कैफी के प्रति श्रद्धांजलि है.


(एनडीटीवी के लिए)

Sunday, April 27, 2025

'स्वांग' की राजनीतिक चेतना


'महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स’ (मेटा) के तहत नाटकों के चयन में विषय-वस्तु को लेकर पर्याप्त विविधता दिखाई देती रही है. पिछले दशक में यह नाट्य महोत्सव रंगकर्मियों के बीच अपना एक मुकाम हासिल किया है. पिछले दिनों दिल्ली में हुए इस नाट्य समारोह में एक तरफ रामायण के मिथक को आधार बना कर ‘दशानन स्वप्नसिद्धी (कन्नड़)’ जैसे नाटक की प्रस्तुति हुई, वहीं ‘एलजीबीटी प्लस’ समुदाय को केंद्र में रख कर ‘बी-लव्ड’ जैसे आधुनिक नाटक भी देखने को मिले. बहरहाल, इस बार चुने गए दस नाटकों में हिंदी और बुंदेलखंडी में प्रस्तुत नाटक ‘स्वांग: जस की तस’ नाटक अपनी प्रस्तुति को लेकर काफी चर्चा में रहा. इसे बेस्ट डायरेक्टर, साउंड-म्यूजिक, अदाकारी समेत कई पुरस्कार मिले.


जहां सरकारी नाट्य उत्सवों में सत्ता और व्यवस्था की आलोचना, टीका-टिप्पणी गायब होती जा रही है, ‘स्वांग: जस की तस’ नाटक में मुखर रूप से समकालीन राजनीति पर चोट उल्लेखनीय है. ऐसा नहीं कि ऐसे में दर्शकों के मनोरंजन में कोई बाधा पहुँची हो.

चर्चित लेखक विजय दान देथा की कहानी ‘ठाकुर का रूठना’ पर आधारित यह नाटक पारंपरिक ‘स्वांग’ शैली के लोक तत्वों का इस्तेमाल कर समकालीन सामाजिक-राजनीतिक अराजक व्यवस्था को सामने लाती है. नाटक के केंद्र में एक ठाकुर है जो बात-बेबात रूठ जाता है और लोगों पर बिना किसी सोच-विचार के अपना निर्णय थोपता रहता है. उसके काम करने की अराजक शैली से सभी परेशान रहते हैं.

ऐसे ही एक दिन ठाकुर गाँव वालों से कहता है कि जितने भी पानी से भरे कुएँ है उसे रेत से भर दे! गाँव वाले परेशान हाल में ठाकुर की माँ (अभिषेक गौतम) के पास फरियाद लेकर पहुँचते हैं. ठाकुर अम्मा की बात से रूठ कर गाँव छोड़ कर चला जाता है, फिर उसे मनाने की कवायद होती है.

अम्मा की भूमिका में गौतम काफी प्रभावी थे, साथ ही उन्हें नमन मिश्रा (ठाकुर) और पूजा केवट (ठकुराइन) का सहयोग मिला. गौतम को सहयोगी अभिनेता के रूप में उत्कृष्ट भूमिका के लिए पुरस्कृत भी किया गया. स्वांग शैली में गीत-संगीत की प्रमुख भूमिका होती है. इस नाटक में मुख्य कलाकार नमन और पूजा दोनों ही अपने गायन से कथा को आगे ले जाने में कुशल दिखे. वाद्य यंत्रों के साथ मंच पर बैठे संगीतकारों की टोली ने उन्हें भरपूर साथ दिया.

स्वांग की लोक-चेतना सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से जुड़ी होती है. इस नाटक में निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर ने हास्य-व्यंग्य और लोक गीत-संगीत का इस्तेमाल करते हुए इसे बखूबी निभाया है. वे कहते हैं कि ‘स्वांग महज एक लोक नाटक शैली नहीं है, बल्कि ऐसा सशक्त समाजिक औजार भी है जो समुदाय के भीतर जागरूकता फैलाने का काम करती है.’

यह बात अन्य लोक नाट्य शैली नौटंकी, तमाशा, बिदेसिया आदि के बारे में भी सच है. बोलचाल की भाषा और सहज संवाद इन लोक नाट्कों की विशेषता रही है जिसे आधुनिक रंगमंच में प्रशिक्षित कलाकार इस्तेमाल कर रहे हैं. आश्चर्य नहीं कि पिछले वर्षों में दिल्ली जैसे महानगर में भी इस तरह के नाटक दर्शकों को अपनी ओर खींचने में सफल रहे हैं

Sunday, April 07, 2024

पहरेदारी में जीवन: एवलांच


पिछले महीने 'महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स’ (मेटा) के तहत दिल्ली में हुए नाटकों के प्रदर्शन में ‘एवलांच (हिमस्खलन)’ नाटक अपनी प्रस्तुति, विषय-वस्तु और अदाकारी को लेकर चर्चा में रहा. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के स्नातक गंधर्व दीवान के निर्देशन में हिंदुस्तानी भाषा में हुए इस नाटक का ‘स्टेज डिजाइन’ अपने-आप में अनूठा था.

नाटक को कमानी सभागार के मंच पर एक बंद स्पेस में किया गया, जहाँ पर तापमान बेहद कम रखा गया. साथ ही ऊंची पहाड़ियों पर तेज बहने वाली हवा के माध्यम से देशकाल का बोध करवाया गया था. असल में, तुर्की के नाटककार टूनजेर जूजुनलू के इसी नाम से लिखे नाटक पर आधारित यह नाटक पहाड़ी इलाके में एक गाँव में अवस्थित है. यहाँ नौ महीने तक हिमस्खलन का खतरा रहता है. इस अवधि में जोर से बोलने, हंसने, चीखने यहाँ तक कि प्रसव की भी मनाही है.
एक तरह से सत्ता ने नौ महीने तक बोलने की मनाही कर रखी है. इस नाटक में न तो पात्रों का कोई नाम हैं न किसी देश या स्थान का ही नाम लेखक-निर्देशक ने दिया है. सब पात्र आपस में फुसफुसाहट में ही बात करते हैं. यहाँ तक कि उनके कदमों की आहट भी सुनाई नहीं देती.
बोलने या दूसरो शब्दों में सत्ता से सवाल करने की मनाही एक ऐसा सच है, जो आज पूरी दुनिया में कमोबेश व्याप्त है. इस लिहाज से नाटक का विषय अति प्रासंगिक है. काफ्का के साहित्य में जो हताशा और मानवीय संत्रास है, यह नाटक देखते हुए भी हमें उसी तरह का बोध होता है.
नाटक के दौरान बंद स्पेस में घुटन और भय को हम तेजी से महसूस करते हैं. मंच पर प्रवेश करते ही जूजुनलू यह कथन लिखा हुआ दिखता है: ‘हिमस्खलन महज एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि हमने अपने मन में इस भय का निर्माण कर रखा है’.
शार्दूल भारद्वाज, जिन्हें हमने ‘ईब आले ऊ’ फिल्म में देखा था, इस नाटक में युवा पुरुष की भूमिका में थे, वहीं श्वेता पासरिचा उनकी पत्नी की भूमिका में थी. पति के किरदार को भारद्वाज और आसन्न प्रसवा स्त्री की भूमिका को पासरिचा ने कुशलता से निभाया. विक्रम कोचर, अश्वथ भट्ट के साथ-साथ स्वरूपा घोष और राजीव गौर सिंह जैसे मंजे अभिनेता बूढ़े पति-पत्नी की प्रभावी भूमिका में मौजूद थे.
दो अंक के इस नाटक में पहला अंक बेहद धीमा है, दूसरे अंक में तीव्रता आती है. समाज के मुखिया का युवा स्त्री (पासरिचा) को जिंदा दफनाने का फरमान दिया जाता है, चूंकि उसका बच्चा समय से पहले जन्म लेने को है. अंत में उसका पति (भारद्वाज) इस फैसले का विरोध करता है और बंदूक उठा लेता है.
प्रतीकात्मक रूप से यह नाटक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवालों को घेरे में लेती है. बोलने पर पहरेदारी सत्ता के स्वभाव के अनुकूल है, पर यह हमारी स्वतंत्रता पर भी प्रश्नचिह्न है. जैसा कि हिंदी के कवि उदय प्रकाश ने अपनी एक कविता में लिखा है: आदमी/मरने के बाद/.कुछ नहीं सोचता/ आदमी/ मरने के बाद/ कुछ नहीं बोलता/ कुछ नहीं सोचने/और कुछ नहीं बोलने पर/ आदमी मर जाता है.

Sunday, January 07, 2024

Darpana At 75: A Beacon Of Artistic Courage And Vision

 

In the final scene of ‘About Ram’, a theatre piece directed by acclaimed puppeteer Anurupa Roy, Dasharath's son Ram is completely alone, seated on the throne with the coveted raj mukut. Sita is not with him. Questions swirl in front of the audience: What is Ram’s existence without Siya? Is the attainment of power the only goal? Recently staged at the 44th Vikram Sarabhai International Festival—a three-day annual arts festival held in the memory of Vikram Sarabhai— ‘About Ram’ mesmerised the audience at the beautifully designed Natarani Amphitheatre of Darpana.

Situated on the banks of the Sabarmati River, close to the serene Gandhi Ashram in Ahmedabad, 'Darpana' was established in 1948. The institute has completed seventy-five years of existence and it epitomises Mahatma Gandhi’s ethos of pluralism. Accomplished dancer Mrinalini Sarabhai and renowned scientist Vikram Sarabhai were the fulcrum around which it flourished initially and today, under the tutelage of their daughter Mallika Sarabhai, it bravely continues to reflect and analyse social reality through the arts.  

Although it started as an institute for the performing arts, later on, it included drama, music, puppetry and martial arts. It has successfully trained students, welcomed art aficionados from various nationalities across the world and become an international centre for multicultural arts and ideas in India. Mrinalini once said, “When Darpana was founded, it was regarded as a cultural oddity and a curiosity in the industrial city of Ahmedabad where artistic activity had hardly any place. But my husband Vikram kept telling me that someday Darpana would have a strong influence in Gujarat.” 

He wasright of course. The Amphitheatre at Darpana was packed when ‘About Ram’ was staged. The audience consisted of people of all ages, including children. The play is extremely topical. It is not about Lord Ram, but ‘Purushottam’ Ram. With the inauguration of the Ram Temple this month in Ayodhya, the Hindi public and political sphere is agog with intense activities. These activities are also being linked to the Lok Sabha elections to be held later this year. Political Ram dominates the discourse over spiritual Ram! Religion is no longer a private matter; it has the support of the State. It is not without reason that posters of ‘Rajtilak ki Karo Taiyari, Aa Rahi Hai Prabhu Ram ji ki Swari’ are seen at many places in Ahmedabad.

In our time, the debate around the plurality of cultural forms has become extremely difficult. Interpretation and reinterpretation of myths is not easy. The story of Ram has been told in more than three hundred ways. Many different forms of Ram Katha are also prevalent in oral traditions which have not been written down. However, in north India, Ramcharitmanas written by poet-saint Tulsidas hold sway over the masses.

Ram’s story remains the same and it has been recounted many times, but the craft of storytelling sets apart ‘About Ram’, which has modern connotations. The special feature of this play was the movement between different forms of art such as puppetry, animation and acting. The artists onstage were successful in bringing the main characters of Ramayana, Ram, Sita, Hanuman and Ravana vividly to life before the audience through puppetry and brilliant acting. The usage of sound and light was skillfully done. The director, Anurupa, was present on the stage with the puppets and actors. 

***

At Darpana, the emphasis in the initial decades was on classical dances, but in the late 60s, the teaching and training of modern theatre and puppetry were formally started here, the credit for which goes to Kailash Pandya, Damini Mehta and Mehar Contractor. Renowned puppeteer Dadi Pudumjee was trained in puppetry at Darpana Academy.

When dancer, actor and activist Mallika Sarabhai was appointed the director of this organisation in 1977, the discussion of social change through art came to the centre of Darpana. The organisation also associated itself with development and communication. Thousands of students were trained here through performances in India and abroad. The organisation made an effort to take its presentations to ordinary people. In keeping with the times, there is a natural fusion in them between various forms of art, media as well as technology.

The 44th Vikram Sarabhai International Festival showcased Darpana’s social commitment through the medium of the arts with verve. Shakespeare’s famous play, 'Macbeth', was also staged during the festival. Directed by Massimiliano Troiani with Mallika Sarabhai, this play too had glimpses and echoes of political issues of the country and the world like ‘About Ram’. Today, when art has distanced itself from political issues, Darpana stands out as a beacon of artistic courage and vision. 

(Outlook, 07.01.24)

Sunday, October 29, 2023

हिंसा के बीच द्रौपदी के सवाल

 


मशहूर फ्रेंच दार्शनिक रोलां बार्थ ने मिथक के प्रसंग में भाषा के रूपक का इस्तेमाल किया है, जिसका अर्थ इस्तेमाल करने पर ही हमारे सामने स्पष्ट होता है. महाभारत महाकाव्य की ‘द्रौपदी’ एक ऐसी मिथकीय चरित्र है जो लेखकों, कलाकारों को बार-बार अपनी तरफ आकृष्ट करती रही हैं. नए संदर्भों में इस चरित्र की सवर्था नई व्याख्या होती रही हैं. स्त्री विमर्श के इस दौर में द्रौपदी महज द्रुपद की बेटी, पांचाली या पांडवों की पत्नी नहीं है. वह अपनी पहचान और सवालों को लेकर उपस्थित होती है. महाभारत के युद्ध के केंद्र में द्रौपदी का चरित्र है. प्रतिशोध और हिंसा के बीच न्याय का सवाल बार-बार सामने आता है. क्यों द्रौपदी को युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है? क्यों द्रौपदी को अपना पति चुनने का अधिकार नहीं दिया गया? हिंसा के बाद आखिर क्या शांति स्थापित हो पाई?


पिछले दिनों दिल्ली के श्रीराम सेंटर सभागार में युवा नाट्यकर्मियों की संस्था ‘ट्रेजर आर्ट एसोसिएशन’ ने ‘अग्निसुता द्रौपदी’ नाटक का मंचन किया, जिसके केंद्र में द्रौपदी और उसके सवाल ही थे. इस नाटक को युवा रंगकर्मी मोहन जोशी ने लिखा है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित जॉय माईस्नाम और साजिदा की जोड़ी इस नाटक के पीछे थी. जहाँ परिकल्पना और निर्देशन जॉय का था, वहीं मंच पर साजिदा थी. इससे पहले मैंने इस टीम का प्रॉडक्शन-‘तमाशा-ए-नौंटकी’ और ‘अंधा युग’ देखा था और प्रभावित हुआ था.

द्रौपदी के चरित्र के माध्यम से हमारे समय में हिंसा के बीच अपने अस्तित्व और पहचान के सवाल को उठाया गया है. मणिपुर हो यूक्रेन या फिलिस्तीन सब जगह हिंसा के दृश्य दिखाई दे रहे हैं, ऐसे में महाभारत के विभिन्न प्रसंग, चरित्र उभर कर हमारे सामने आ जाते हैं. साथ ही युद्ध और शांति के सवाल भी हमें मथते रहते हैं. क्या महाभारत से हम कोई सबक ले पाएँ हैं?

महाभारत जैसे महाकाव्य को एक निश्चित समयावधि में मंच पर कुशल रूप में प्रस्तुत करना किसी भी निर्देशक के लिए एक चुनौती है. इस नाटक को देखते हुए लगता रहा है कि दृश्य बहुत तेजी से मंच पर घटित हो रहे हैं और अभिनेता हड़बड़ी में हैं. फिर भी इस नाटक के कई दृश्यों का संयोजन बेहद कुशलता से किया गया था और वे आकर्षक थे. चौसर के खेल और द्रौपदी को दांव पर लगाने के प्रसंग के लिए निर्देशक ने सवर्था नई युक्ति का सहारा लिया है. इसमें मिजोरम के प्रसिद्ध बांस नृत्य की झलक दिखाई देती हैं. खुद जॉय मणिपुर के हैं. महाभारत के विभिन्न प्रसंगों को निर्देशक ने बेहद कम साजो-सामान के साथ मंच पर प्रस्तुत किया. अवतार साहनी की प्रकाश परिकल्पना नाटक के अनुकूल थी.

दिल्ली या देश किसी भी शहर में आज व्यावसायिक थिएटर करना आसान नहीं है. संसाधनों के अभाव में गैर पेशवर या नौसिखुए कलाकारों से ही अभिनय करवाना पड़ता है. इस नाटक में भी युवा नाट्यकर्मियों के जुनून मंच पर दिखाई दे रहे थे, लेकिन उन्हें अभी और अभ्यास और कला के प्रति समर्पण की जरूरत है.

Saturday, September 30, 2023

गौहर जान की याद: आन बान जिया में लागी


 उन्नीसवीं सदी के आखिर और पिछली सदी की शुरुआत में जिस समय संचार का साधन अविकसित था, गौहर जान की ख्याति बनारस से दरभंगादरभंगा से कलकत्ताकलकत्ता से मैसूरपुणे तक पहुँच गई थी. हिंदुस्तानी संगीत की इस स्वर-साधिका की ठुमरीख्यालटप्पे के कद्रदान हर महफिल में पाए जाते थे. गौहर की गायकी के किस्से जितने चर्चित हैं उतनी ही आन-बान-शान के भी.  

जीते जी किंवदंती बन चुकी गौहर जान के बारे में संगीत विशेषज्ञ गजेंद्र नारायण सिंह ने लिखा है, अपने जमाने में धन और यश के जिस शिखर पर पहुँचीवह पहुँच अन्य गायिकाओं के लिए ख्वाब थी.’ वह दौर नवाबों, महाराजाओं और रईसों की महफिलों का थाजहाँ तवायफों के माध्यम से हिंदुस्तानी संगीत कला का विकास हुआ. उनकी रची ठुमरी कैसी ये धूम मचाई कन्हैया री आज भी सुनाई देती है. 

वर्ष 1873 में आजमगढ़ में जन्मी एलीन एंजेलिना योवार्ड अर्मेनियाई रॉबर्ट विलियम योवार्ड और भारतीय मूल की विक्टोरिया हेमिंग्स की बेटी थीजो बाद में गौहर जान (मलका जान की बेटी) कहलाई. जन्म के 150 साल बाद उनके रोचक व्यक्तित्व और गायकी के किस्सों को दिल्ली के कमानी सभागार में मूर्त देखना फिर से संगीत इतिहास के उन पन्नों में लौटने जैसा थाजिसकी चर्चा आज नहीं होती. गोकि बात जब स्त्रियों के संघर्ष और संगीत के क्षेत्र में योगदान की हो तो आज भी वह उतना ही प्रासंगिक है.  पुरुष प्रधान सामंती समाज में किस तरह एक स्त्री अपनी प्रतिभा और ठसक के बूते दिलों पर राज कर रही थी और आर्थिक रूप से बेहद सफल थी. गौहर की कहानी में तवायफों की आपबीती और जगबीती दोनों एक-दूसरे से गुंफित है.

जिस तरह से सभागार भरा हुआ थाकहा जा सकता है कि यदि विषय-वस्तु और प्रस्तुतीकरण में नवीनता हो तो नाटकों के लिए दर्शकों की कमी नहीं है. पिछले दिनों अतुल कुमार के बहुचर्चित नाटक पिया बहरूपिया के मंचन के समय में भी मैंने यह नोटिस किया था. बहरहालचर्चित नाट्य संस्था प्राइमटाइम थिएटर कंपनी ने इसका मंचन किया था. निर्देशन लिलिट दुबे का था और कहानी विक्रम संपत की किताब माय नेम इज गौहर जान पर आधारित हैजिसका नाट्य रूपांतरण महेश दत्तानी ने किया था.

पिछले दशक में यूट्यूब पर गौहर जान की बहुत सारी रिकार्डिग उपलब्ध हुए हैंजिसे सुन कर उनकी गायकी का एक अंदाज लगाया जा सकता है. रिकार्डिंग के अंत में वह कहना नहीं भूलती थी-माय नेम इज गौहर जान. उस समय कृति की चोरी होने का डर था. उस दौर में गायिकाओं और गायकों के अंदर नई तकनीक का भी भय था कि कहीं वह उनकी गायकी या आवाज को प्रभावित न करे. उस वक्त गौहर जान ग्रामोफोन कंपनी के लिए गीत रिकॉर्ड किए. वर्ष 1902 में उन्होंने ही रिकार्डिंग की पहल की थी और लगभग छह सौ गीत रिकॉर्ड किए थे.

मंच पर गौहर की भूमिका में अभिनेत्री गिरिजा ओक गोडबोले थीं. पिता और ग्रामोफोन कंपनी के गाइसबर्ग की भूमिका में चर्चित रंगकर्मी डेंजिल स्मिथ बेहद प्रभावी थे.

गिरिजा पिछले साल महानगर के जुगनू नाटक में भी दिखीं थी. चूँकि इस नाटक में गीत-संगीत का स्थान प्रमुख है, गिरिजा अपने गायन से असर छोड़ती है. हालांकि ऐसा महसूस होता रहा कि कुछ गाने और भी प्रस्तुत किए जाते तो बेहतर होता. नीना कुलकर्णी मलका जान की भूमिका में थी. मलका खुद एक ख्यातनाम ठुमरी गायिका थी और वाजिद अली शाह के दरबार में उनकी काफी प्रतिष्ठा थी. गौहर को संगीत विरासत में मिला था. गौहर एक साथ कई भाषाओं में गाने की क्षमता रखती थी.

तवायफों के बारे में आज भी कई तरह की समाज में भ्रांतियां हैं. उन्हें वेश्या समझा जाता हैजबकि ऐसा नहीं है. तवायफों के कोठे पर सुगम संगीत की शैलियों का विस्तार हुआ. यह नाटक गौहर जान के जीवन के माध्यम से कई भ्रांतियों को तोड़ती है. एक सफल गायिका होने के बावजूद गौहर जान को एक जीवनसाथी ढूंढ़ने पर भी नहीं मिला. प्रेम प्रसंग दुखांत ही रहे. गौहर के माध्यम से यह नाटक उस दौर के समाज पर भी एक टिप्पणी है. अकबर इलाहाबादी ने इसे ही ध्यान में रखकर गौहर के लिए लिखा था:

आज अकबर कौन है दुनिया में गौहर के सिवा

सबकुछ खुदा ने दे रखा है एक शौहर के सिवा.

सामंती समाज में कला के कद्रदान तो मिल जाते थे, पर एक तवायफ के लिए ऐसा प्रेमी जो जीवनसाथी बन सके बेहद दुष्कर था. संबंधों में इन स्त्रियों के लिए शोषण के सिवाय कुछ नहीं था. गौहर के जीवन के ऐसे प्रसंगों को कुशलता से मंच पर लाया गया . निर्देशक और नाटककार ने अपनी कल्पना से भी दृश्य रचे हैं. बनारस के रईस छगन और गौहर के प्रेम प्रसंग के संदर्भ में यह खास कर उल्लेखनीय है. दरभंगा राज की वह दरबारी गायिका थीं जहाँ से उनकी संगीत यात्रा (1887) शुरू हुई और अंतिम समय में मैसूर पैलेस की गायिका रही. वर्ष 1930 में मैसूर में ही उनका निधन हो गया. 

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में घरानों की बहुत अहमियत है. पर जैसा कि संपत ने लिखा है गौहर और उनकी तरह की अन्य महिला संगीतकारों ने महसूस किया कि संगीत को इन तंग नजरिएएक भू-भाग और शैलियों में बांध कर नहीं रखा जा सकता है. आपसी मिलन और शैलियों के मेलजोल से खुद की एक शैली विकसित की जा सकती है. गौहर की संगीत यात्रा इसका उदाहरण है. उन्हें सफलता भी इन्हीं रास्तों पर चल कर मिली थी और अपने संघर्ष से संगीतकारों के लिए आगे की राह भी बनाई. 

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Tuesday, October 04, 2022

'महानगर के जुगनू': माया नगरी के युवा कलाकारों की दास्तान


कोरोना महामारी ने प्रदर्शनकारी कला को किस रूप में प्रभावित किया, इसका लेखा-जोखा आने वाले समय में होगा, लेकिन उस दौर को पीछे छोड़ते हुए एक बार फिर से दर्शकों से जुड़ने, मुखामुखम संवाद को लेकर नाट्यकर्मियों में जबरदस्त उत्साह है.

दो साल बाद दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में नाट्य समारोह (23 सितंबर-2 अक्टूबर) का आयोजन किया गया. रंगमंच की दुनिया के कई जाने-पहचाने नाम इस समारोह का हिस्सा थे. खास तौर पर युवा रंगकर्मी और लेखक अमितोश नागपाल के निर्देशन में महानगर के जुगनूनाटक का मंचन इस समारोह की एक उपलब्धि कही जाएगी. हालांकि, चर्चित नाट्य निर्देशक अतुल कुमार के निर्देशन में आईननाटक का भी मंचन हुआ. इस नाटक से भी एक लेखक के तौर पर अमितोश जुड़े हुए थे. प्रसंगवश, दोनों की जोड़ी पिया बहरूपियानाटक (शेक्सपीयर के टवेल्थ नाइटका अनुवाद) से सुर्खियां बटोर चुकी हैं और देश-विदेश में इसके कई शो हो चुके हैं. नौटंकी शैली में गीत-संगीत का इस्तेमाल इस नाटक को लोक मन से जोड़ता है.

बहरहाल, ‘महानगर के जुगनूनाटक में एक लेखक, निर्देशक और अभिनेता के तौर पर अमितोश नागपाल की केंद्रीय भूमिका थी. दिल्ली के रंगमंच पर आम तौर पर क्लासिक या मोहन राकेश, गिरीश कर्नाड, स्वदेश दीपक के लिखे आधुनिक नाटक का ही मंचन दिखता रहा है. हिंदी में नए नाट्य लेखन का सर्वथा अभाव रहा है. महानगर के जुगनूएक ऐसा गीति नाटक है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए.

इस नाटक की कहानी मुंबई में स्थित है. पर ये जुगनू कौन हैं? मुंबई में अपने सपनों को सच करने गए युवा कलाकार, लेखक, संगीतकार ही वे जुगनू है जो माया नगरी में टिमटिमाते रहते हैं. इन्हें चांद की तलाश है. पर चांद-सितारे बनने की हसरत कितनों की पूरी होती है?

एनएसडी से प्रशिक्षित अमितोश खुद मुंबई की फिल्मी दुनिया से जुड़े हैं, सो उस दुनिया के रस्मो-रिवाज, दांव-पेच, संघर्ष, आशा-निराशा से बखूबी परिचित है. क्या यह नाटक आत्मकथात्मक है? हां, पर यह महज एक कलाकार की कथा नहीं है. नाटक मुंबई के आराम नगरमें रहने वाले कुछ कलाकारों के इर्द-गिर्द है. उनकी जिंदगी कैसी है? क्या सपने हैं? और संघर्ष कैसा है. सामाजिक-आर्थिक यथार्थ नाटक की संरचना का हिस्सा हैं.

इस नाटक में एक संवाद, ‘अपने मन की कब करोगे यार’, गीत की शक्ल में आता है. आज के युवाओं के मन की यह बात है. यह सवाल महज रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े युवाओं से ही नहीं है, बल्कि बाजार के अंधी दौड़ में शामिल हर युवा इससे जूझ रहा है. इस नाटक में बड़े सपनों के बीच, ‘रेंट कौन भरेगा, तेरा बापजैसा व्यंग्यात्मक, मारक टिप्पणी भी है.

नाटक के एक दृश्य में जब लेखक अपनी स्टोरी प्रोड्यूसर को पिच करता है तब उससे लोकल को ग्लोबल से जोड़ने की सलाह दी जाती है’, जिस पर लेखक टिप्पणी करता है कि वह तो मंडी हाउससे बाहर ही कभी नहीं गया!

लेखक, जुगनू (अमितोश), अपनी रचना को बड़े परदे पर देखना चाहता है. वह अपने नाटक के लिए किरदारों को रचता है. उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आते हैं. वह जीवन (गिरिजा गोडबोले) और सपना (सखी गोखले) के बीच झूलता है. उसे अपने आदर्श और यथार्थ के बीच चुनाव करना है. यह किसी भी कलाकार के लिए सच है, पर चुनना आसान कभी नहीं रहा. क्या यही हमने गुरुदत्त के प्यासामें नहीं देखा था? क्या साहिर ने नहीं लिखा-ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है? इस आत्मसंघर्ष में जुगनू की जिंदगी गुजर रही है. वह टूटता, गिरता है पर हौसले नहीं हारता.

इस नाटक में जो विषय उठाए गए हैं वह भले ही पुराने हैं, पर जिस तरह के रंग कौशल से इसे प्रस्तुत किया गया है वह मनोरंजक है. गीत-संगीत की प्रस्तुति संवाद को आगे बढ़ाने में सहायक है. असल में, इस नाटक में जो ऊर्जा है वह अलग से नोट की जाने वाली है.

हास्य-व्यंग्य, मिमिक की शैली में लिखा यह नाटक युवा दर्शकों को लक्षित है. अमितोश की तरह महादेव लखावत एनएसडी से प्रशिक्षित कलाकार हैं. इस नाटक में भले ही वे केंद्र में नहीं है, पर उनका किरदार छाप छोड़ता है. खास कर जब वे एक कॉल सेंटर में काम करने के दौरान अपने स्वके क्षरण और अस्तित्व की लड़ाई लड़ते दिखते हैं.

गीत-संगीत में लोक शैली, हिप हॉप से लेकर पापुलर बॉलीवुड फिल्मों का असर हैं, वहीं शिव कुमार बटालवी के गीत- माए नी माए मैं इक शिकरा यार बणाया और बाउल गीत का इस्तेमाल नाटक की मार्मिकता को बढ़ाता है. एनएसडी से प्रशिक्षित कलाकारों के साथ सखी, गिरिजा गोडबोले जैसे कलाकार टीवी-फिल्मी दुनिया से खुद जुड़े हैं. कुल मिलाकर समकालीन माया नगरी में बाहर से आए युवाओं के सपने और संघर्ष के दृश्य को रचने में यह नाटक सफल है.

अंत में, फिल्म जगत में जो भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) पर इन दिनों बहस चल रही है, उसे भी यह नाटक अपनी जद में लेता है. इससे पहले इतने स्पष्ट शब्दों में क्या किसी नाटक में हमने नेपोटिज्म पर बात देखी-सुनी थी?

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)