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Sunday, October 05, 2025

हमारे समय का दस्तावेज है ‘होमबाउंड’

कोरोना महामारी के दौरान टेलीविजन के एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा कि हम उम्मीद करें कि कोई साहित्यकार हमारे समय की त्रासदी को शब्द देगा. साहित्य शब्दों के जरिए मानवीय भावों- प्रेम, हिंसा, सुख-दुख, पीड़ा और त्रासदियों को वाणी देता रहा है, वहीं सिनेमा बिंब (इमेज) और ध्वनि के माध्यम से. आगे बढ़ कर साहित्य और सिनेमा दोनों ही सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना का सशक्त माध्यम भी है.

वर्ष 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें टेलीविजन और सोशल मीडिया के मार्फत सामने आईं, वे महाकाव्यात्मक पीड़ा लिए हुए थी. मानवीय जिजीविषा, करुणा, संघर्ष, सामूहिकता और मानवीय सहयोग की तस्वीरों ने ‘देखने’ के हमारे नजरिए को बदल कर रख दिया.

पिछले दिनों नीरज घेवन के निर्देशन में रिलीज हुई फिल्म ‘होमबाउंड’ इन्हीं प्रवासी मजदूरों को केंद्र में रख कर हमारे समय, समाज और राजनीति को टटोलने की कोशिश करती है. भारत की ओर से इस फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार के भेजा गया है. लेखक-पत्रकार बशारत पीर के न्यूयॉर्क टाइम्स (2020) में छपे लेख ‘टेकिंग अमृत होम’ को यह फिल्म आधार बनाती है.

भारतीय समाज के हाशिए पर रहने वाले परिवारों, दो युवा चंदन (विशाल जेठवा) और शोएब (ईशान खट्टर) के सपनों, आकांक्षा और सामाजिक यथार्थ से संघर्ष को बिना किसी सजावट और बनावट के हम इस फिल्म में देखते हैं. मुख्यधारा की सिनेमा के परंपरागत मानकों के सहारे हम इन फिल्मों का रसास्वादन नहीं कर सकते. निर्देशक की कोई मंशा भी ऐसी नहीं कि वे मुख्यधारा की फिल्मों की लीक पर चले. हालांकि जाह्नवी कपूर सुधा के किरदार में मिसफिट लगती है. फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में किसी भी तरह का कोई योगदान इस किरदार का नहीं है.

बहरहाल, बचपन के दिनों के मित्र चंदन और शोएब को सामाजिक अस्वीकृति हर मोर्चे पर मिलती है. यह अस्वीकृति उनके सामाजिक पहचान से जुड़ी है. इन्हें लगता है कि सामाजिक स्वीकृति सत्ता (पुलिस) का हिस्सा बनने के बाद मिलेगी, पर क्या वह आसान है? जाति और संप्रदाय के साथ हो रहे भेदभाव से लिपटा हुआ सवाल बेरोजगारी का भी है.

पिछले पच्चीस साल में आर्थिक उदारीकरण का लाभ मुख्य रूप से मध्यवर्ग को मिला है, समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों के हिस्से, कुछ अपवाद को छोड़ कर, वंचना ही मिली है.

सरकारी मशीनरी का हिस्सा बनने की कोशिश नाकाम होते देख चंदन और शोएब सूरत के कपड़े मिल में मजदूरी करने पहुंचते हैं, लेकिन जब कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन होता है वे वापस घर लौटने को मजबूर होते हैं. पर क्या वे घर पहुंच पाते हैं? घर एक रूपक है यहाँ जिसका वितान समाज और राष्ट्र तक है. घर से समाज और फिर देश में दलित और मुस्लिम समुदाय की (अनु) उपस्थिति का सवाल भी है. जवाब क्षितिज पर दिखता नहीं, मौन का साम्राज्य फैला है.

जहाँ साहित्य में दलित विमर्श है, वहीं मुख्यधारा की फिल्मों में यह आज भी गायब है. इस फिल्म में दो युवाओं के बीच निश्छल प्रेम, सहयोग को बेहद मार्मिकता से रचा गया है. दस साल पहले आई घेवन की फिल्म ‘मसान’ एक अपवाद है, हालांकि यह फिल्म मसान की ऊंचाई को छू नहीं पाई है. कहीं-कहीं संवाद सहज नहीं हैं. सिनेमा की हिंदी (संवाद) और समाज में बरती जाने वाली हिंदी में इतना अंतर क्यों?

इससे पहले अनुभव सिन्हा ने ‘आर्टिकिल 15’ फिल्म में समाज और सत्ता से दलितों के चुभते सवाल पूछे थे. इस फिल्म में बिंबों का बेहद खूबसूरत इस्तेमाल किया गया था, लेकिन ‘होमबाउंड’ में ऐसे दृश्यों का सर्वथा अभाव है जो दर्शकों की स्मृति का हिस्सा बन कर लंबे समय तक रह सके. इस अर्थ में यह फिल्म एक काल खंड का महज दस्तावेज बन कर रह जाती है. मूल स्वर फिल्म का राजनीतिक है, पर कहीं भी सीधे-सीधे राजनीतिक टीका-टिप्पणी नहीं सुनाई पड़ती है. ऐसा क्यों? 

Sunday, April 21, 2024

पॉप संगीत का चमकीला सितारा

 


हिंदी सिनेमा के इस सदी में व्यावसायिक और समांतर की रेखा धुंधली हुई है.  विशाल भारद्वाज,   अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली, हंसल मेहता जैसे फिल्मकार इसके अगुआ हैं. पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई अली की फिल्म  अमर सिंह चमकीलाविषय, शिल्प और फिल्म निर्माण की दृष्टि से व्यावसायिक और समांतर सिनेमा के बीच एक पुल की तरह है. आश्चर्य नहीं है कि समांतर सिनेमा के पुरोधा मणि कौल इम्तियाज अली की तारीफ करते थे.

बहरहाल, हिंदी सिनेमा में पंजाब का दलित समाज विरले दिखता है, जबकि पंजाब मूल के फिल्मकारों का शुरू से ही दबदबा रहा है. ऐसा क्यों? अमर सिंह चमकीला की पहचान एक ऐसे लोकप्रिय पंजाबी गायक की थी, जो दलित परिवार में जन्म लेने के बावजूद अपनी प्रतिभा और संघर्ष के बूते पिछली सदी के 80 के दशक में लोगों के दिलों पर राज करते थे. यही दौर था जब पंजाब में चरमपंथियों के आतंक के साये में लोग जी रह रहे थे. इसी दौर में देश में कैसेट कल्चरके मार्फत पॉप संगीत का उभार तेजी से हो रहा था. प्रसंगवश, चर्चित गायक गुरदास मान चमकीला के समकालीन रहे.

जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह फिल्म अमर सिंह चमकीला (1960-1988) का जीवनवृत्त है जिसे अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने अपने अभिनय और गायन से जीवंत कर दिया है. उन्हें परिणीति चोपड़ा (अमरजोत कौर की भूमिका में) का भरपूर सहयोग मिला है. निर्देशक ने संवेदनशीलता के साथ चमकीला के जीवन संघर्ष और दुखद अंत को दर्शकों के सामने लाया है. फिल्म में जिस तेजी से दृश्यों को संयोजित किया गया है वह खटकता है. बार-बार विंडो में चमकीला-अमरजोत की पुरानी तस्वीरों (फुटेज) को दिखाया गया है, जिसे संपादित जा सकता था.

पंजाबी लोक गायन में सुरिंदर कौर, असा सिंह मस्ताना, लाल चंद यमला जाट की गायकी को लोग आज भी याद करते हैं. 80 के दशक में चमकीला की चमक ने सबको पीछे छोड़ दिया. असल में, पॉप संगीत अपने भड़कीले बोल और तेज संगीत की वजह से लोगों से जल्दी जुड़ते हैं. शादी-विवाह के अखाड़े में चमकीला की खूब मांग हो रही थी, उसके कैसेट बाजार में ब्लैकमें बिकते थे. 

सफलता के साथ उसे कई मोर्चों पर लड़ना पड़ा था.  अमरजोत कौर से उसकी दूसरी शादी जहाँ कथित उच्च जाति के लोगों को खटक रही थी, वहीं समकालीन गायकों की ईर्ष्या-द्वेष भी उसे झेलना पड़ रहा था. साथ ही चरमपंथियों, धार्मिक संगठनों के निशाने पर भी वह था. चमकीला और अमरजोत की हत्या कर दी गई.

जीवन में और हत्या के बाद भी जिस वजह से उसकी आलोचना होती रही वह अश्लील, द्विअर्थी गाने थे, जो स्त्री विरोधी थे. इस तरह के गानों के पक्ष में चमकीला की अपनी दलीलें थी. बाजार की मांग और आपूर्ति के सिद्धांत के तहत उसका कहना था कि लोग यही चाहते हैं!

गीत-संगीत या कोई भी कला यदि अपने समय की उपज होती है तो समाज को परिष्कृत भी करती है. वह मूल्य निरपेक्ष नहीं हो सकती. निर्देशक ने फिल्म में अश्लीलताको लेकर एक विमर्श रचा है, जो दर्शकों को उकसाता है, पर कोई जवाब नहीं देता. जवाब दर्शकों को ही देना है.

Sunday, September 10, 2023

सरहद पार की दो फिल्में

 


पिछले दिनों एक पाकिस्तानी फिल्म जिंदगी तमाशा को लेकर सोशल मीडिया पर टीका-टिप्पणी दिखी. यूँ तो चार साल पहले ही फिल्म समारोहों में इसे दिखाई गई थीलेकिन सेंसरशिप के कारण इसका प्रदर्शन अटक गया. आखिरकार निर्देशक सरमद खूसट ने यूट्यूब पर रिलीज कर दिया है. इस फिल्म के केंद्र एक अधेड़ पुरुष (राहत) हैं. एक दोस्त के बेटे की शादी के अवसर पर वे एक पुराने गाने पर डांस करते हैंजो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है. घर-परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्तेसामाजिक संबंध इससे किस तरह प्रभावित होते हैंइसे निर्देशक ने बेहद सधे ढंग से फिल्म में दिखाया है. साथ ही राहत के बहाने पाकिस्तानी खुफिया समाज की झलकियाँ यहाँ दिखाई देती है. यहाँ निजताइच्छा-आकांक्षास्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं है.

इसी तरह जॉयलैंड’ को पिछले साल95वें ऑस्कर पुरस्कार में, ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म’ के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था. यह फिल्म ऑस्कर जीतने में सफल नहीं हुईपर प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में इसे ‘उन सर्टेन रिगार्ड’ में प्रदर्शित किया गया जहाँ ज्यूरी पुरस्कार मिला था. विभिन्न फिल्म समारोहों में जॉयलैंड’ ने सुर्खियाँ बटोरी लेकिन आम भारतीय दर्शकों के लिए यह फिल्म उपलब्ध नहीं थी. पिछले दिनों अमेजन प्राइम (ओटीटी) पर इसे रिलीज किया गया. युवा निर्देशक सैम सादिक की यह पहली फिल्म हैजहाँ वे संभावनाओं से भरे नज़र आते हैं.

भले ही यह दोनों फिल्में पाकिस्तान में रची-बसी हैलेकिन कहानी भारतीय दर्शकों के लिए जानी-पहचानी है. जिंदगी तमाशा की तरह ही जॉयलेंड के केंद्र में लाहौर में रहने वाला एक परिवार है. इस परिवार का मुखिया एक विधुर है जिसके दो बेटे और बहुएँ हैं. परिवार को एक पोते की लालसा है. बड़ी बहु की तीन बेटियाँ हैं. छोटा बेटा (हैदर) जो बेरोजगार है उसकी नौकरी एक ‘इरॉटिक थिएटर कंपनी’ में लग जाती है. वहाँ वह एक ट्रांसजेंडर डांसर (बीबा) का सहयोगी डांसर होता है. धीरे-धीरे वह उसकी तरफ आकर्षित होता है. घर में छोटे बेटे की बहु (मुमताज) की नौकरी छुड़वा दी जाती है. घुटन और इच्छाओं के दमन से उसका व्यक्तित्व खंडित हो जाता है.

यह फिल्म भी घर-परिवार के इर्द-गिर्द हैपर किरदारों की इच्छा-आकांक्षा से लिपट कर लैंगिक राजनीतिस्वतंत्रता और पहचान का सवाल उभर कर  सामने आता है. चाहे वह घर का मुखिया होउसका बेटा होबहु हो या थिएटर कंपनी की डांसर बीबा. फिल्म में एक संवाद है-मोहब्बत का अंजाम मौत है!’. सामंती परिवेश में प्रेम एक दुरूह व्यापार हैबेहद संवेदनशीलता के साथ निर्देशक ने इसे फिल्म में दिखाया है.

ट्रांसजेंडर की पहचान और अधिकार को लेकर मीडिया में बहस होने लगी है. सिनेमा भी इससे अछूता नहीं है. फिल्म में अलीना खान ने ट्रांसजेंडर डांसरबीबाकी भूमिका विश्वसनीय ढंग से निभाई है. फिल्म में कोई विलेन नहीं है. पितृसत्ता यहाँ प्रतिपक्ष की भूमिका में है. सवाल बहुत सारे हैंजवाब कोई नहीं. यहाँ किसी तरह का उपदेश या प्रवचन नहीं है. कलाकारों का अभिनय बेहद प्रशंसनीय है. ये फिल्में विषय-वस्तु का जितनी कुशलता से निर्वाह करती हैउसी कुशलता से परिवेशभावनाओं और तनाव को भी उकेरती है. 


Sunday, July 23, 2023

जीवन रचती फिल्म ‘द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’


द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग मिलान कुंदेरा (1923-2023) की सबसे चर्चित कृति रही है. पिछले हफ्ते पेरिस में हुई उनकी मृत्यु की खबर दुनिया भर में सुर्खियों में रही. उनके साहित्य पर टीका-टिप्पणी हुई लेकिन इस बहुचर्चित उपन्यास पर इसी नाम से बनी फिल्म की चर्चा उपेक्षित रही.

वर्ष 1984 में द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग प्रकाशित होने के दो साल बाद ही फिल्म बननी शुरू हुई और वर्ष 1988 में अमेरिकी फिल्मकार फिलिप कॉफमैन के निर्देशन में रिलीज हुई थी. निस्संदेह कुंदेरा का यह उपन्यास पिछली सदी के विश्व साहित्य का गौरव है. यह उपन्यास दर्शन, इतिहास, राजनीति, मानवीय संबंधों, द्वंदो, कमजोरियों को 1968 में प्राग स्प्रिंग (चेकोस्लोवाकिया) की पृष्ठभूमि में रचता है. अधिनायकवादी सत्ता के दुरुपयोग को जिस शिल्प में सहजता से कुंदेरा इस उपन्यास के पाठकों को परोसते हैं वह अदभुत है. अंग्रेजी अनुवाद में इसे पढ़ने पर मन में हमेशा यह बोध बना रहा कि मूल चेक में पढ़ने पर इसका आस्वाद कैसा होगा?  उल्लेखनीय है कि अपने देश चेक गणराज्य से निर्वासित होकर वे वर्ष 1975 से फ्रांस में रह रहे थे. बाद में उन्होंने फ्रेंच में भी लिखना शुरु कर दिया था.

बहरहाल, उपन्यास के मुख्य चरित्र टॉमास, तेरेजा, सबीना, फ्रांज और एक कुत्ता हैं. खुद उपन्यासकार इस उपन्यास में मौजूद है और बार-बार पाठकों से रू-ब-रू होता रहता है. इस बहुस्तरीय किताब के कई अंश को फिल्म निर्देशक ने नहीं छुआ है. मसलन फिल्म में उपन्यासकार नहीं दिखता है. फिर भी उपन्यास के मूल कथ्य स्क्रीनप्ले में सुरक्षित रखा गया है.

उपन्यास से अलग एक यह फिल्म एक स्वतंत्र विधा के रूप में हमें प्रभावित करती है. कई दृश्य, किरदारों के अभिनय और संगीत जेहन में टंगे रह जाते हैं.

टॉमास जो कि एक कुशल सर्जन है, प्राग में रहता है. उसके कई स्त्रियों से संबंध है. एक मुलाकात के दौरान वह तेरेजा के संपर्क में आता है फिर दोनों शादी कर लेते हैं. हालांकि फिर भी टॉमास के संबंध अन्य स्त्रियों से जारी रहते हैं. सबीना एक ऐसी स्वतंत्रचेता पेंटर है जिसके साथ भी टॉमास के सेक्स संबंध हैं. सबीना की सहायता से तेरेजा की नौकरी एक फोटोग्राफर के रूप में लग जाती है. बाद में वर्ष 1968 में जब साम्यवादी सोवियत संघ की सेना टैंकों के साथ प्राग पर धावा बोलती है तब हम उसी के कैमरे की आँखों से लोमहर्षक दृश्य देखते हैं. फिल्मकार ने दस्तावेजी फुटेज के साथ बेहद खूबसूरती से टैंको के ईद-गिर्द लोगों के विरोध प्रदर्शन को चित्रित किया है. प्राग के निवासी अपने घर-बार छोड़ कर दूसरे देशों में रिफ्यूजी बनने को मजबूर हैं. फिल्म में आए घर, मानवीय अस्तित्व, स्वतंत्रता का सवाल मौजू है.

वर्तमान में जब एक बार फिर से रूसी सेना यूक्रेन में है, द अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग फिल्म प्रासंगिक है.

उपन्यास की तरह ही फिल्म में टॉमास, तेरेजा, सबीना देश छोड़ कर स्विट्जरलैंड चले जाते हैं. यहाँ पर सबीना की मुलाकात प्रोफेसर और बुद्धिजीवी फ्रांज से होती है. तेरेजा स्विट्जरलैंड को स्वीकार नहीं कर पाती है और प्राग लौट आती है. टॉमास को एहसास होता है कि वह तेरेजा के बिना नहीं रह सकता है और फिर पीछे-पीछे प्राग लौट आता है. लेकिन उसके संबंध अन्य स्त्रियों के साथ जारी रहते हैं. टॉमास (डेनियल डे लिविस) और तेरेजा (जूलियेट बिनोचे) के बीच संबंधों के तनाव को बेहद खूबसूरती से फिल्म सामने लाती है.

 

सोवियत सेना के वर्चस्व के बाद लेखकों, बुद्धिजीवियों, राजनयिकों, पेशवर डॉक्टरों को नौकरी गंवानी पड़ी थी. टॉमास को भी खिड़कियों के साफ-सफाई का काम करना पड़ता है. तेरेजा और टॉमास शहर छोड़ कर गाँव का रूख करते हैं. उधर सबीना फ्रांज को छोड़ कर अमेरिका चली जाती है. अंत में, सबीना को, उपन्यास के तरह ही, एक पत्र के माध्यम से एक वाहन दुर्घटना में तेरेजा और टॉमास के मौत की खबर मिलती है. फिल्म का आखिरी दृश्य उस वाहन में टॉमास और तेरेजा की हंसी और बारिश के दृश्य के साथ रास्ते पर खत्म होती है.

मिलान कुंदेरा हालांकि इस फिल्म से खुश नहीं थे. वे अपवाद नहीं हैं. आम तौर पर साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों से उसके रचनाकार खुश नहीं रहते हैं. पर यदि हम ग्रैबिएल गार्सिया मार्केज़ या सलमान रुश्दी के उपन्यासों पर बनी फिल्मों से इस फिल्म की तुलना करें तो निस्संदेह यह फिल्म उपन्यास की देह और आत्मा को परदे पर साकार करने में सफल रही है.   फिल्म और उपन्यास का फलसफा एक है: हम जीवन एक ही बार जीते हैं, जिसकी तुलना न हम पिछले जीवन से कर सकते हैं न ही इसे आने वाले जीवन में बेहतर बना सकते हैं’. 

Tuesday, July 11, 2023

सुधीर मिश्रा: सवाल पूछना सिनेमा की भूमिका है, जरूरी नहीं है कि वह राजनीतिक हो


समांतर सिनेमा आंदोलन से निकले फिल्मकार और लेखक सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘अफवाह’ इन दिनों चर्चा में है. ‘ये वो मंजिल तो नहीं’, ‘धारावी’, ‘इस रात की सुबह नहीं’, ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ आदि उनकी चर्चित फिल्में है जिन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. मिश्रा ने फिल्मी करियर के चालीस साल पूरे किए हैं. हाल ही में अरविंद दास ने उनसे बातचीत की. प्रस्तुत है संपादित अंश:

# अफवाह इन दिनों नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है और चर्चा में है. क्या कारण रहे कि यह फिल्म ढंग से सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हो पाई?
सुधीर मिश्रा: आजकल माहौल ही ऐसा है. और वैसे भी फिल्म थोड़ी आड़ी-टेढ़ी है. मैंने कुछ अफवाहें भी सुनी है इस फिल्म को लेकर कि यह कैसे हुआ. लेकिन अफवाहों पर यकीन नहीं करना चाहिए.
# क्या इसके राजनीतिक कारण हैं? क्योंकि फिल्म बिना नाम लिए राजनीतिक पार्टियों के अफवाह फैलाने की प्रवृत्तियों पर टिप्पणी करती है? यह दिखाती है कि किस तरह राजनीतिक पार्टियां फायदे के लिए अफवाह को वायरल करती हैं..
सुधीर मिश्रा: एक संदर्भ में न्यूयॉर्क टाइम्स से लेकर सब मुझसे कह रहे थे कि ऐसी फिल्में नहीं बन सकती अब. क्योंकि आप लोग डरे हुए हैं. मैं हमेशा जवाब देता था कि यदि मैं डर गया तो फिर यंग लोग क्या करेंगे. मैंने एक फिल्म बनाई जो मैं बनाना चाहता था. हर कोई अपने समय को थोड़ा जानता है. मैं कोई ‘नाइव’ तो हूँ नहीं. मैं अपने मुल्क को, दुनिया को, राजनीतिक पार्टियों को समझता हूँ. मैंने अपने को रोका नहीं. कई क्रिटिक कहते हैं कि मेरी यह सबसे डायरेक्ट फिल्म है. मैं अपने वक्त में थोड़ा सा दखल देना चाह रहा था. यह हमारा काम है न. जैसा भी हुआ, कम से कम यह फिल्म आई और नेटफ्लिक्स पर देखी जा रही है. मुझे निराशा हुई है उन लोगों से, जो सेक्युलर कहते हैं खुद को. आप इस फिल्म को ले जाइए लोगों के बीच. इसका इस्तेमाल कीजिए और मुझे कुछ नहीं चाहिए.
# शुरू से ही आपकी फिल्मों के केंद्र में राजनीति रही है. क्या राजनीतिक फिल्म बनाना मुश्किल रहा है?
सुधीर मिश्रा: मुश्किल तो होता है. देखिए, फार्मूला से अलग, लीक से हट कर फिल्म और वह राजनीतिक हो तो बनानी और थोड़ी मुश्किल होती है. वह आपकी जद्दोजहद तो है. देखिए अगली फिल्म कितनी मुश्किल बनती है, लेकिन में तो बनाऊँगा. कोई जरूरी नहीं है अफवाह की तरह डायरेक्ट हो. एक मामले में यह स्ट्रेट फिल्म है. देखिए एक तरफ रहाब की जर्नी है जो झूठ बोलता था और बबल में रहता था और उससे निकलता है. उसी बबल ने आखिर में उसका रास्ता बंद कर दिया है. चंदन जो लिंचर था, वहीं विक्टिम भी है. एक तरह से चंदन ही फिल्म है. नुआंस कहीं फिल्म में है तो वो है.
# ‘जाने भी यारो (1983)’ फिल्म से एक लेखक के रूप में आपने फिल्मी करियर की शुरुआत की. इस फिल्म में जिस तरह का ह्यूमर है, कहानी है वह हिंदी सिनेमा में विरले मिलता है. आज के दौर में जिस तरह के संवाद इस फिल्म में आए हैं, मसलन महाभारत प्रसंग को लेकर, क्या मुमकिन है?
सुधीर मिश्रा: आखिर का जो महाभारत का सीन है पता नहीं आज लिखना कितना मुमकिन है. उसमें जो ह्यूमर है वह एक तरह से महाभारत को श्रद्धांजलि है. बेवकूफ ही होगा जो इसको नीचा दिखाएगा.
# धृतराष्ट्र का जो अंधापन है वह तो समय से परे है. उसका फिल्म में पूछना कि-यह क्या हो रहा है? मानीखेज है.
सुधीर मिश्रा: बिलकुल. उससे बड़ा तो हमारे यहाँ लिखा नहीं गया कुछ.
# ‘अफवाह’ पर फिर से लौटते हैं. आपने कहा कि चंदन की कहानी है, पर फिल्म में समांतर कहानी लिट-फेस्ट की भी है.
सुधीर मिश्रा: लिट फेस्ट सिर्फ लिट-फेस्ट नहीं है. वह मेटाफर है हम सबका. हम सबने तो दरवाजे बंद कर दिए हैं न. हम जैसे लोग ही तो हैं. मैं भी तो था वहाँ. मैं भी रहाब ही हूँ.
# आपकी फिल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ मैंने एक बार फिर से देखी. इस फिल्म को रिलीज हुए बीस साल हो गए. मेरी समझ में, पिछली सदी के सत्तर के दशक के नक्सलबाड़ी आंदोलन के सपने और हताशा को इससे बेतहर ढंग से हिंदी में दिखाने वाली कोई फिल्म नहीं है. इस फिल्म की रचनात्मक प्रक्रिया के बारे में मैं आपसे जानना चाहता हूँ.
यार, मैं बताऊँ आपको मैं उस कंट्रोल में नहीं हूँ. कोई चीज उभरती रहती है दिमाग में. यदि आप सुनें ज्यादा तो क्या उभर रहा है आपके दिमाग में... थोड़ा चिंतन करें तो एक कहानी बनती है. इस फिल्म को लिखने में पाँच-छह साल मुझे लगे. पहले कहानी एक नक्सल और एक लड़के की थी, जो कॉलेज में पढ़ता था और पुलिस वाले का... फिर मुझे लगा कि बहुत टिपिकल हो रही है. फिर धीरे से कहाँ से विक्रम मल्होत्रा उभरा. विक्रम एक ऐसा लड़का है जिससे हम कॉलेज मे दूर रहते हैं. उसे दूर रहने के लिए कहते हैं. जो कुछ बनने आया था, फिक्सर है. गीता और सिद्धार्थ हम जैसे लोग हैं. खास कर कोई मुझसे पूछता है कि फिल्म में आप कौन हैं, तो मैं कहता हूँ-गीता. मेरे ख्याल से फिल्म अभी तक जिंदा इसलिए है क्योंकि विक्रम का भी नजरिया है उसमें. जिंदगी आइडियोलॉजी से आगे कहाँ फिसल जाती है, कहाँ एस्केप करती है इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. यह जो अनप्रेडिक्लटेबिलिटी है, वह इसलिए हैं कि मैं एक गणित के प्रोफेसर का बेटा हूँ. कोई धार्मिक माहौल में पैदा हुआ होगा, कोई साहित्य के माहौल में. मैं प्रोबेबिलिटी के माहौल में पैदा हुआ. कुछ भी निश्चित नहीं है. कुछ ज्यादा मुमकिन है, कुछ कम.
# आपने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत समांतर सिनेमा के दौर में की. किस रूप में समांतर सिनेमा को आप देखते हैं.
समांतर सिनेमा का नाम बड़ा अच्छा नाम है. अभी भी होना चाहिए. दो तरह का सिनेमा है. एक जो पैररल स्ट्रीम है वह सवाल खड़े करता है. वह फार्मूला नहीं है, वह धारा से अलग होता है. उसे कभी-कभी पता नहीं होता है कि कहां जा रहा है. कोई तयशुदा अंत नहीं होता उसका. फार्मूला सिनेमा में सब कुछ तय होता है. जैसे कि ‘लगान’ में अंत में छक्का लगेगा. हीरो जीत जाएगा...आसान है जिंदगी यहाँ, समांतर सिनेमा में कठिन है.
# समांतर सिनेमा के दौर में जो फिल्मकार थे उनमें कला माध्यम से दुनिया देखने का या कह लें बदलने का एक नजरिया था. क्या वह सपना आज बिखर गया है?
एक तरह से बिखर रहा है. देखिए वह इतिहास का जो मोड़ था उसमें जो होना था वही मुमकिन हुआ. मैं तो मानता हूँ कि इतिहास जो है, मार्क्स-लेनिन भी कहते थे कि टू स्टेप फार्वड फोर स्टेप्स बैक. आपस में द्वंद की प्रक्रिया में आगे-पीछे होते हुए कुछ हो रहा है. क्या हो रहा है यह इस वक्त हमारी समझ में नहीं आ रहा है. हम पूंजीवाद से अलग समाज में रहे हैं. जो एक तरह का सामंतवाद है जहाँ चालीस लोग या दो सौ लोग शासन कर रहे हैं दुनिया में. जहाँ सबके हाथों से बहुत कुछ फिसल गया है. यह कहना कि क्या होगा बहुत कठिन है. आदर्शवाद अगर आज के बच्चों या युवाओं के मन में नहीं है तो इसके जिम्मेदार तो हम भी हैं न. हमको देख रहे हैं वो और कह रहे हैं कि इनकी लफ्फाजी से क्या हुआ.
# ऐसे में आज सिनेमा की क्या भूमिका रह गई है?
सवाल पूछना सिनेमा की भूमिका है. जरूरी नहीं है कि घोर राजनीतिक सवाल हो. अलग-अलग किस्म के सवाल हो सकते हैं. सिनेमा हवाओं में सवालों को उछालेगी. कुछ सोचेगी. दूसरे नजरिए को पकड़ने की कोशिश करेगी. अंदाजे-बयां जो होगा वह नया होगा. उससे भी नयी चीजें निकलती है न. कहते हैं कि गालिब का है अंदाजे बयां और.
# नए फिल्मकारों से क्या उम्मीद है आपको. क्या कुछ नया बनेगा तकनीक क्रांति के इस दौर में?
नया आएगा मेरे ख्याल से. अनुराग (कश्यप) खैर अब तो बहुत सीनियर हो गया. वह मुझे हमेशा बहुत इंस्पायर करता है-- फार्मूला से हट कर सवाल पूछता हुआ. बहुत सारी चीजों को न कहता हुआ, राह बनाता हुआ. उसके असिस्टेंट भी अब निर्देशक हो गए. बहुत सारे लोग हैं जैसे कि अभिषेक चौबे है, अमित मसूरकर है. अनुभव सिन्हा, हंसल मेहता, विक्रमादित्य मोटवानी है. सुदीप शर्मा है जिन्होंने पाताल लोक लिखा है. मुझे राजू हिरानी और सुभाष कपूर से भी काफी उम्मीद है. मुख्यधारा भी यदि थोड़ा स्वस्थ हो तो वह भी समाज में असर करता है न.
# अभी आप किस परियोजना पर काम कर रहे हैं?
अभी मैं जेपी आंदोलन को लेकर सीरीज पर काम कर रहा हूँ. और हां, जाने भी दो यारो के बाद एक कॉमेडी लिखने की कोशिश कर रहा हूँ.



Sunday, May 22, 2022

कान फिल्म समारोह में 'प्रतिद्वंदी'


कान फिल्म समारोह के 75वीं वर्षगांठ पर सत्यजीत रे की चर्चित फिल्म ‘प्रतिद्वंदी’ विशेष रूप से दिखाई जा रही है. वर्ष 1970 में रिलीज हुई इस फिल्म को रे की फिल्मी यात्रा में एक अलग मुकाम हासिल है. उनकी शुरुआती फिल्में पाथेर पांचाली, अपराजितो, जलसाघर, चारुलता आदि अपनी प्रगीतात्मकता और मानवीय संवेदनाओं के चित्रण के कारण सराही गई, पर बाद के दशक में समकालीन भावबोध से दूर और अराजनीतिक होने का उन पर आरोप लगा. इस फिल्म से वे अपने आलोचकों को जवाब देते प्रतीत होते हैं. यह फिल्म समकालीन वास्तविकता से सीधे मुठभेड़ करती है. सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में धृतमन चटर्जी की प्रमुख भूमिका है. अपनी पहली फिल्म में वे एक मंजे कलाकार के रूप में सामने आते हैं.

‘प्रतिद्वंदी’ कलकत्ता (कोलकाता) में अवस्थित है. फिल्म का नायक सिद्धार्थ (धृतमन चटर्जी) एक शिक्षित बेरोजगार युवक है जिसे नौकरी की तलाश है, लेकिन वाम विचारधारा के कारण उसे बार-बार असफलता हाथ लगती है. देश-काल के बदलते यथार्थ की वजह से उसका व्यक्तित्व अशांत और अस्थिर है. ध्यान रहे कि आजादी के ‘बीस साल बाद’ नेहरू युगीन सपने विखंडित होने लगे थे. युवाओं में बेरोजगारी के कारण आक्रोश बढ़ता जा रहा था. दुनिया भर में राजनीतिक सत्ता के खिलाफ युवा संघर्ष कर रहे थे. भारत में इसकी परिणति नक्सलबाड़ी आंदोलन में दिखी थी, जिसका केंद्र कोलकाता था. फिल्म के एक चर्चित दृश्य में इंटरव्यू के दौरान सिद्धार्थ वियतनाम युद्ध में आम लोगों के संघर्ष, प्रतिरोध और साहस को पिछले दशक (साठ) की सबसे महत्वपूर्ण घटना कहता है.

उसी दौर में भारतीय सिनेमा में एक नई धारा (न्यू वेब) की शुरुआत हुई. फिल्मकार मृणाल सेन, फिल्म संस्थान, पुणे से शिक्षित मणि कौल, कुमार शहानी आदि इसके अगुआ थे. वर्ष 1970 में कन्नड़ में यू आर अनंतमूर्ति के चर्चित उपन्यास ‘संस्कार’ पर इसी नाम से फिल्म आई थी. मृणाल सेन की चर्चित कोलकता त्रयी (कलकत्ता 71 और पदातिक) की पहली फिल्म ‘इंटरव्यू’ भी उसी वर्ष रिलीज हुई थी. इस फिल्म में रे ने उन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है जिसमें मृणाल सेन सिद्धहस्त थे.

सिनेमा तकनीक आधारित कला है जो समय के साथ पुरानी पड़ जाती है. ‘प्रतिद्वंदी’ फिल्म अपनी विषय-वस्तु की वजह से पचास साल बाद भी मौजूं है, भले ही राजनीतिक परिप्रेक्ष्य बदल गया हो. बेरोजगारी की समस्या आज भी युवाओं को मथ रही है, जिसकी परिणति आए दिन सड़कों पर विरोध प्रदर्शन में दिखाई देती है. इस फिल्म के एक दृश्य में इंटरव्यू के लिए अनेक युवाओं के साथ अपनी बारी का इंतजार करता सिद्धार्थ अव्यवस्था, अमानवीय व्यवहार से आहत होकर साक्षात्कार कक्ष में घुस कर इसका प्रतिवाद करता है. वह मेज-कुर्सी पलट देता है. हालांकि मृणाल सेन की फिल्म (इंटरव्यू) से तुलना करते हुए समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता ने नोट किया है: “सेन के नायक की उद्धत भाव भंगिमाओं (चेष्टाओं) के मुकाबले सिद्धार्थ की पराजय में अधिक वास्तविकता और सार है.” इसी बात को 70 के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े रहे प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने एक बातचीत के दौरान मुझसे कहा था कि भले मृणाल सेन की फिल्में हमारी राजनीति के करीब थी, पर सत्यजीत रे की फिल्में कलात्मक रूप से उत्कृष्ट हैं.

(प्रभात खबर, 22.05.22)

Friday, April 29, 2022

मैथिली की पहली फिल्म ‘कन्यादान’


मैथिली के चर्चित लेखक हरिमोहन झा (1908-1984) के लिखे उपन्यास 'कन्यादान' (1933) में इस संवाद को पढ़ते ही ठिठक गया. सी सी मिश्रा और रेवती रमण के बीच यह संवाद है:

रे. रे: नाउ यू आर गोइंग टू सी हर विथ योर आईज

(आब त अहाँ स्वंय अपना आँखि सँ देखबाक हेतु चलिये रहल छी)

मि. मिश्रा: बट ह्वाट आइ वैल्यू मच मोर दैन ब्यूटी इज पर्सनल ग्रेस एंड चार्म. द सीक्रेट ऑफ अट्रैक्शन लाइज इन दी आर्ट ऑफ पोजिंग. यू हैव सीन द बिविचिंग पोजेज ऑफ दि फेमस सिनेमा स्टार लाइक देविका रानी. (“रूप से भी कहीं अधिक मैं लावण्य और लोच को समझता हूँ. आकर्षण की शक्ति तो भाव भंगिमा में भरी रहती है. सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री देविका रानी ऐसे नाज-नखरे दिखलाती है कि दिल पर जादू चल जाता है.”)

हरिमोहन झा मैथिली साहित्य में यह वर्ष 1933 में लिख रहे थे,  जब सिनेमा का प्रसार गाँव-कस्बों तक नहीं पहुँचा थापर मैथिली साहित्य में सिनेमा की आवाजाही हो रही थी. हरिमोहन झा एक ऐसे लेखक थे जिन्होंने आधुनिक मैथिली साहित्य को लोकप्रिय बनाया. ‘कन्यादान’ पुस्तक शिक्षित मैथिल परिवारों का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई. यह पुस्तक द्विरागमन’ समय मिथिला में स्त्रियों के साथ दिया जाने लगा. कहते हैं कि इस किताब को पढ़ने के लिए कई लोगों ने मैथिली सीखी. कन्यादान-द्विरागमन’ उपन्यास पर फणि मजूमदार के निर्देशन में वर्ष 1964-65 में फिल्म बनीजो वर्ष 1971 में कन्यादान नाम से रिलीज हुई. सिनेमा शुरुआती दौर से ही कला के अन्य रूपों को प्रभावित करता रहा है. साथ ही सौ वर्षों के इतिहास में सिनेमा का जादू क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्मों में हिंदी से कम नहीं हैपर बॉलीवुड के दबाव में अधिकांश की अनदेखी ही हुई.

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अचानक से आधी-अधूरी यह फिल्म दिखी. उत्साहवश जब मैंने यूट्यूब पर इस फिल्म को देखा तो निराशा हाथ लगी. ऐसा लगता है कि फिल्म मूल रूप में अपलोड नहीं की गई है. फिल्म का अंत भी वैसा नहीं हैजैसा कि लोग बताते रहे हैं. जब वर्ष 1971 में इसे रिलीज किया गया था तब दरभंगा-मधुबनी और पटना में लोगों ने देखा और सराहा था. उस पीढ़ी के लोगों के जेहन में यह फिल्म थीपर हमारी पीढ़ी के लिए महज यह एक सूचना भर रही. इस सिलसिले में जब मैंने पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय से कुछ वर्ष पहले संपर्क साधा तो उनका कहना था कि उनके डेटा बैंक में ऐसी कोई फिल्म नहीं है. मनोरंजन के साथ-साथ फिल्म का सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व होता है. भाषा के प्रसार के साथ ही सिनेमा समाज की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का भी एक माध्यम है. सिनेमा के खोने से आने वाली पीढ़ियां उन स्मृतियों से वंचित हो जाती है जिसे फिल्मकार ने सिनेमा में अभिव्यक्त किया था. इस फिल्म के मूल प्रिंट को खोज कर सरकार को इसके संग्रहण की व्यवस्था करनी चाहिए.  ‘कन्यादान’ फिल्म को मैथिली की पहली फिल्म होने का गौरव प्राप्त है.

हास्य-व्यंग्य के माध्यम से मिथिला का सामाजिक यथार्थ इस फिल्म (उपन्यास) में व्यक्त हुआ है. विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त एक युवकसी सी मिश्रा की शादी एक ग्रामीण अशिक्षित युवतीबुच्चीदाई से हो जाती है. स्त्री शिक्षा की अनदेखीबेमेल विवाह और दहेज की समस्या इसके मूल में है. फिल्म की पटकथा नवेंदु घोष और संवाद फणीश्वरनाथ ‘रेणु ने लिखे थे. फिल्म से जुड़े कलाकार गोपालचाँद उस्मानीलता सिन्हातरुण बोस आदि की मातृभाषा मैथिली नहीं थीपर मैथिली के रचनाकार चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’ की इस फिल्म में एक प्रमुख भूमिका थी. शूटिंग मुंबई और मिथिला में हुई थी और फिल्म में मैथिली और हिंदी का प्रयोग हैस्त्रियों के हास-परिहाससभागाछीशादी के दृश्य आदि में मिथिला का लोक उभर कर आया है. ‘जहिया से हरि गेलागोकुला बिसारी देला’ और ‘सखि हे हमर दुखक नहि ओर’ जैसे करुण गीत पचास साल बाद भी अह्लादित करते हैं और मिथिला की संस्कृति की झलक देते हैं. इस फिल्म के गीत-संगीत में चर्चित लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान था.

जैसा कि आम तौर पर साहित्यिक कृति पर आधारित फिल्मों के साथ होता रहा हैकिताब के लेखक निर्देशक के फिल्मांकन से कम ही संतुष्ट होते हैं. इसका एक कारण तो यह है कि साहित्यकार यह समझ नहीं पाते कि फिल्म में बिंब की भूमिका प्रमुख होती है. जिस रूप में साहित्यकार ने कथा को अपने लेखन में चित्रित किया हैउसी रूप में फिल्म में नहीं ढाला जा सकता है. मसलन ‘कन्यादान-द्विरागमन’ उपन्यास का देशकाल आजादी के पहले का समाज है (जहाँ ‘कन्यादान’ का रचनाकाल वर्ष 1933 का है वहीं ‘द्विरागमन’ वर्ष 1943 में लिखी गई थी)जबकि फिल्म लगभग तीस साल के बाद बनी है. हरिमोहन झा ने इस फिल्म के बारे में लिखा है- ‘चित्र जेहन हम चाहैत छलहूँ तेहन नहि बनि सकल (फिल्म हम जैसा चाहते थे वैसा नहीं बन सकी)’. बहरहालउन्हें इस बात की प्रसन्नता थी कि इस फिल्म ने मैथिली में सिनेमा बनाने का रास्ता दिखाया और ‘मधुश्रावणी’, ‘ललका पाग’, ‘ममता गाबय गीत’ जैसी फिल्में आगे जाकर बनी. 

जिस दौर में ‘कन्यादान’ फिल्म बन रही थी उसी दौर में एक अन्य मैथिली फिल्म ‘नैहर भेल मोर सासुर’ भी बन रही थी जो ‘ममता गाबय गीत’ के नाम से काफी बाद में जाकर अस्सी के दशक के मध्य में रिलीज हुई. इस फिल्म के प्रिंट भी आज दुर्लभ हैं. भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में जब भी पुरोधाओं का जिक्र किया जाता हैतब दादा साहब फाल्के के साथ हीरा लाल सेनएसएन पाटनकर और मदन थिएटर्स की चर्चा होती है. मदन थिएटर्स के मालिक थे जेएफ मदन. एल्फिंस्टन बायस्कोप कंपनी इन्हीं की थी. पटना स्थित एलफिंस्टन थिएटर (1919), जो बाद में एलफिंस्टन सिनेमा हॉल के नाम से मशहूर हुआमें पिछली सदी के दूसरे-तीसरे दशक में मूक फिल्में दिखायी जाती थीं. आज भी यह सिनेमा हॉल नये रूप में मौजूद है. जाहिर हैबिहार में सिनेमा देखने की संस्कृति शुरुआती दौर से रही है. आजादी के बाद मैथिली-मगही-भोजपुरी में सिनेमा निर्माण भी हुआपर बाद में जहां तक सिनेमा के संरक्षण और पोषण का सवाल हैबिहार का वृहद समाज उदासीन ही रहा है.

जब भी बिहार के फिल्मों की बात होती हैभोजपुरी सिनेमा का ही जिक्र किया जाता है. मैथिली फिल्मों की चलते-चलते चर्चा कर दी जाती है. जबकि पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढैबो’ और ‘ममता गाबए गीत’ का रजिस्ट्रेशन ‘बाम्बे लैब’ में वर्ष 1963 में ही हुआ और फिल्म का निर्माण कार्य भी आस-पास ही शुरू किया गया था. इस फिल्म में निर्माताओं में शामिल रहे केदारनाथ चौधरी बातचीत के दौरान हताश स्वर में कहते हैं-भोजपुरी फिल्में कहां से कहां पहुँच गई और मैथिली फिल्में कहां रह गई!’ लेकिनयहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि भोजपुरी और मैथिली फिल्मों के अतिरिक्त साठ के दशक में फणी मजूमदार के निर्देशन में ही ‘भईया’ नाम से एक मगही फिल्म का भी निर्माण किया गया था. पचास-साठ साल के बाद भी मैथिली और मगही फिल्में विशिष्ट सिनेमाई भाषा और देस की तलाश में भटक रही है.

ममता गाबय गीत’ के निर्माण से जुड़े रहे केदार नाथ चौधरी इस फ़िल्म के मुहूर्त से जुड़े एक प्रंसग का उल्लेख करते हुए अपनी किताब ‘अबारा नहितन’ में लिखते हैं कि जब वे फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ से मिले (1964) तो उन्होंने मैथिली फ़िल्म के निर्माण की बात सुन कर भाव विह्वल होकर कहा था-अइ फिल्म केँ बन दिऔ. जे अहाँ मैथिली भाषाक दोसर फिल्म बनेबाक योजना बनायब त’ हमरा लग अबस्से आयब. राजकपूरक फिल्मक गीतकार शैलेंद्र हमर मित्र छथि (इस फ़िल्म को बनने दीजिए. यदि आप मैथिली भाषा में दूसरी फ़िल्म बनाने की योजना बनाए तो मेरे पास जरूर आइएगा. राजकपूर की फ़िल्मों के गीतकार शैलेंद्र मेरे मित्र हैं)’.  इस फ़िल्म के निर्माण के आस-पास ही रेणु की चर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ नाम से फ़िल्म बनी. इस फ़िल्म में मिथिला का लोक प्रमुखता से चित्रित है और फ़िल्म में एक जगह तो संवाद भी मैथिली में सुनाई पड़ता है. क्या ‘तीसरी कसम’ मैथिली में बन सकती थीकेदारनाथ चौधरी कहते हैं कि ‘निश्चित रूप से. यदि ‘तीसरी कसम’ फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्म का स्वरूप  बहुत अलग होता.’ यह सवाल भी सहज रूप से मन में उठता है कि यदि ‘विद्यापति’ (1937) फिल्म मैथिली में बनी होती तो मैथिली फिल्मों का इतिहास कैसा होता? कन्यादान’ फिल्म में रेणु की छाप फिल्म के संवाद में प्रमुखता से दिखती है. जैसा कि हमने नोट किया फिल्म में मैथिली के साथ-साथ हिंदी भाषा का भी प्रयोग है. जिसे फिल्म का एक पात्र झारखंडी सी सी मिश्रा के साथ बातचीत में ‘कचराही’ (कचहरी में जिस भाषा में गवाही दी जाती हो) बोली कहते हैं. ‘मारे गए गुलफाम में भी रेणु लिखते हैं: ‘कचराही बोली में दो-चार सवाल-जवाब चल सकता हैदिल-खोल गप तो गांव की बोली में ही की जा सकती है किसी से.

प्रसंगवश, नवेंदु घोष और रेणु की जोड़ी एक बार फिर से ‘मैला आँचल’ उपन्यास पर बनने वाली फिल्म ‘डागदर बाबू’ में साथ आई थी. मन में सहज रूप से यह सवाल उठता है कि नवेंदु घोषजिन्होंने ‘कन्यादान’ और ‘तीसरी कसम’ फिल्म की पटकथा लिखी थीके निर्देशन में बनने वाली इस फिल्म का क्या स्वरूप होताबिंबो और ध्वनियों के माध्यम से यह फिल्म मैला आँचल कृति को किस तरह नए आयाम में प्रस्तुत करती?70 के दशक के मध्य में यह फिल्म बननी शुरू हुई थीपर निर्माता और वितरक के बीच अनबन के चलते इसे अधबीच ही बंद करना पड़ा. उस दौर के लोग ‘डागदर बाबू’ की शूटिंग और फिल्म के पोस्टर को आज भी याद करते हैं. रेणु के पुत्र दक्षिणेश्वर प्रसाद राय कहते हैं कि फिल्म के 13 रील तैयार हो गए थे. वे बताते हैं कि ‘मायापुरी’ फिल्म पत्रिका में ‘आने वाली फिल्म’ के सेक्शन में इस फिल्म का पोस्टर भी जारी किया गया था. नवेंदु घोष के पुत्र और फिल्म निर्देशक शुभंकर घोष कहते हैं कि उस वक्त वे फिल्म संस्थानपुणे (एफटीआईआई) में छात्र थे और अपने पिता को असिस्ट करते थे. वे दुखी होकर कहते हैं, “बाम्बे लैब में इस फिल्म के निगेटिव को रखा गया था. 80 के दशक में बंबई में आई बाढ़ में वहाँ रखा निगेटिव खराब हो गया... अब कुछ नहीं बचा है.” शूटिंग के दिनों को याद करते हुए शुभंकर घोष नॉस्टैल्जिक हो जाते हैं. वे कहते हैं “काफी खूबसूरत कास्टिंग थी. धर्मेंद्रजया बच्चनउत्पल दत्तपद्मा खन्नाकाली बनर्जी इससे जुड़े थे. जब रेणु की जन्मभूमि फारबिसगंज में इसकी शूटिंग हो रही थी तब धर्मेंद्र-जया को देखने आने वालों का तांता लगा रहता था. कई लोग पेड़ पर चढ़े होते थे.’ फिल्म के प्रसंग में वे आर डी बर्मन के दिए संगीत का जिक्र खास तौर पर करते हैं. वे कहते हैं कि नंद कुमार मुंशी जो इस फिल्म के निर्माता एस.एच. मुंशी के पुत्र हैंकिसी तरह आरडी बर्मन के गीतों को संरक्षित करने में उनकी सहायता करें. घोष कहते हैं कि फिल्म में पंचम ने असाधारण संगीत दिया थाजो मुंशी परिवार के पास ही रह गया. कन्यादन के निर्माता भी एस.एच. मुंशी ही थे. संभव है कि कन्यादान फिल्म का प्रिंट मुंशी परिवार के पास हो. यदि ‘डागदर बाबू’ फिल्म बन के तैयार हो गई होती तो हिंदी सिनेमा की थाती होती. शुभंकर याद करते हुए बताते हैं कि उनके पिता नवेंदु घोष और रेणु अच्छे दोस्त थे. ‘मैला आंचल’ की पॉकेट बुक की प्रति हमेशा अपने पास रखते थे और वर्षों तक उन्होंने उसकी पटकथा पर काम किया था.

रेणु’ का जन्मशती वर्ष भी है. जहाँ साहित्यिक हलकों में रेणु और हरिमोहन झा के साहित्य की चर्चा आज भी होती हैवहीं ‘कन्यादान’ फिल्म की चर्चा कहीं नहीं होती. रेणु के योगदान का उल्लेख नहीं होता. इस फिल्म में विद्यापति के गीत के साथ ही प्रसिद्ध लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान है. एक साथ इतने सारे दिग्गज इस फिल्म से जुड़े रहे पर इस ऐतिहासिक फिल्म के संग्रहण में सरकार की कोई रुचि नहीं रही. साथ ही वृहद समाज भी उदासीन ही रहा

सिनेमा के वरिष्ठ अध्येता मनमोहन चड्ढा ने हाल में छपी अपनी किताब- ‘सिनेमा से संवाद’ में नोट किया है कि आधुनिक हिंदी भाषा-साहित्य और भारतीय सिनेमा का विकास लगभग साथ-साथ हुआ. उन्होंने सवाल उठाया है कि जहाँ साहित्य समीक्षा और आलोचना की एक सुदीर्घ परंपरा बन गई वहीं हिंदी में सिनेमा पर सुचिंतित विमर्श क्यों नहीं हो पायाक्यों हम सिनेमा के धरोहर को सहेजने को लेकर तत्पर नहीं हुएउल्लेखनीय है कि मूक फिल्मों के दौर में भारत में करीब तेरह सौ फिल्में बनींजिसमें से मुट्ठी भर फिल्में ही आज हमारे पास है. ‘नेशनल फिल्म आर्काइव’ के निदेशक रहे सुरेश छाबरिया भारत की मूक फिल्मों को ‘अ लॉस्ट सिनेमैटिक पैराडाइज’ कहते हैं. उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘लाइट ऑफ एशिया- इंडियन साइलेंट सिनेमा (1912-34)’ में भारत में बनी मूक फिल्मों का विस्तार से जिक्र किया है. बहरहालबॉलीवुड का ऐसा दबदबा रहा कि हिंदी भाषी दर्शकों के सरोकार क्षेत्रीय सिनेमा से नहीं जुड़े. हाल में मलयालमतमिल आदि भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की सफलता को छोड़ दें तो बहुत कम हिंदी भाषी सिनेमा प्रेमी और अध्येता क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में रुचि रखते हैं. 

कन्यादान’ फिल्म में मैथिली के रचनाकार चंद्रनाथ मिश्र ‘अमर’ की भी प्रमुख भूमिका थी. फिल्म निर्माण के दौरान मुंबई प्रवास को अपनी डायरी ‘कन्यादान फिल्मक नेपथ्य कथा’ में उन्होंने नोट किया है. वे लिखते हैं: ‘कन्यादान फिल्मक एक बड़का आकर्षण इ जे भारतक विभिन्न भाषा मैथिलीक आंगन में एकत्र भ गेल अछि. हिंदीउर्दूबंगलामराठीगुजरातीपंजाबीमगहीभोजपुरी आदिक कलिका सब जेना मैथिलीक एक सूत्र में गथा क माला बनि गेल हो (कन्यादान फिल्म का एक बड़ा आकर्षण यह है कि भारत की विभिन्न भाषा मैथिली के आंगन में एकत्र हुई है. हिंदीउर्दूबांग्लामराठीगुजरातीपंजाबीमगहीभोजपुरी आदि कलियाँ सब जैसे एक सूत्र मे गूँथ कर माला बन गई हो). मैथिली फिल्म ‘कन्यादान’ का महत्व इस बात में भी निहित है कि किस तरह देश के विविध भाषा-भाषी ने मैथिली में फिल्म संस्कृति की शुरुआत की थी. 

मराठीबांग्लाअसमियाभोजपुरी सहित भारत में करीब पचास भाषाओं में फिल्में बनती हैं. इन भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में देश के विभिन्न भागों के लोग एक-दूसरे से जुड़ते रहे हैंएक दूसरे की विविध भाषा-संस्कृति से परिचित होते रहते हैं. सही मायनों में हिंदी सिनेमा के विकास का रास्ता क्षेत्रीय सिनेमा से होकर ही जाता है. पिछले दिनों मैथिली में बनी अचल मिश्र की फिल्म ‘गामक घर’ (गाँव का घर) की खूब चर्चा हुईपर लोग मैथिली सिनेमा के इतिहास से अपरिचित ही रहे. यदि ‘कन्यादान’, ‘ममता गाबय गीत’ जैसी फिल्मों के धरोहर को सहेजने के प्रयास हुए होते तो शायद ऐसा नहीं होता.

 (हंस पत्रिका, अप्रैल 2022, 68-71, में प्रकाशित)

Sunday, February 27, 2022

धुंध में लिपटा वर्तमान और भविष्य


कला के अन्य रूपों की तरह सिनेमा सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना का एक माध्यम है. यह अलग बात है कि बॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों के केंद्र में मनोरंजन रहता है और आलोचना का तत्व कहीं हाशिए पर ही दिखता है. क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों- मलयालम, मराठी, असमिया आदि में सामाजिक यथार्थ के चित्रण में कुछ निर्देशकों के विशिष्ट स्वर जरूर सुनाई पड़ते रहे हैं. इसी कड़ी में 22वें मुंबई फिल्म समारोह में पिछले दिनों दिखाई गई मैथिली फिल्म ‘धुइन (धुंध)’ है. इसे अचल मिश्र ने निर्देशित किया है. इसी समारोह में वर्ष 2019 में इनकी बहुचर्चित मैथिली फिल्म ‘गामक घर (गाँव का घर)’ प्रदर्शित की गई थी. इस बार का समारोह ऑनलाइन आयोजित किया जा रहा है.
‘धुइन’ के केंद्र में 25 वर्षीय युवा पंकज है, जो दरभंगा में अपने माता-पिता के साथ रहता है. उसके सपने मुंबई की दुनिया में बसते हैं. वह दरभंगा से भागना चाहता है. वह कहता है-यहाँ से भागना है तो भागना है- पर पारिवारिक परिस्थिति अनुकूल नहीं है. पिता सेवानिवृत्त हैं, पर उन्हें नौकरी की तलाश है ताकि बुढ़ापा कट सके. पिता को पंकज की ‘नौटंकी’ (थिएटर से जुड़ाव) पसंद नहीं है. आज भी देश के बड़े हिस्से में सिनेमा-थिएटर के काम को घर-परिवार के लोग आवारगी ही समझते हैं! लोग उसे रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन करने की सलाह देते हैं. ध्यान रहे कि पिछले दिनों बिहार में युवा छात्रों ने रेलवे में भर्ती को लेकर ही उग्र आंदोलन किया था! पंकज के किरदार में अभिनव झा एक छोटे शहर के एक युवा कलाकार के अंतर्मन की उलझन को चित्रित करने में सफल हैं.
इस फिल्म में रेल का रूपक बार-बार आता है. फिल्म की शुरुआत ही दरभंगा रेलवे स्टेशन के बाहर एक नुक्कड़ नाटक से होती है. जब पंकज अपने मोबाइल पर ऑनलाइन एक्टिंग के गुर सीख रहा होता है, तब पृष्ठभूमि में रेलगाड़ी की आवाज सुनाई देती है. छोटे से घर के कोलाहल से दूर जब वह बाहर निकलता है तब भी रेलगाड़ी जा रही होती है. यह एक वास्तविकता है कि पिछले दशकों में बड़ी संख्या में बिहार के मध्यवर्गीय युवा नौकरी की तलाश में बाहर निकल गए. यह सिलसिला आज भी जारी है. एक धुंध है जिसमें उनका वर्तमान और भविष्य लिपटा पड़ा है. पर जैसा कि दुष्यंत कुमार कह गए हैं- ‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है/ ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.’
जहाँ ‘गामक घर’ में निर्देशक का पैतृक घर था, वहीं यह पूरी फिल्म दरभंगा में अवस्थित है. यहाँ हराही पोखर है, दरभंगा राज का किला है, हवाई अड्डा है. दरभंगा को मिथिला का सांस्कृतिक केंद्र कहा जाता है, पर कलाकारों की बदहाली इस सिनेमा में मुखर है. ‘गामक घर’ की तरह ही इस फिल्म के सिनेमैटोग्राफी में एक सादगी है, जो ईरानी सिनेमा की याद दिलाता है. अचल मिश्र स्वीकारते भी हैं कि उनके ऊपर ईरानी फिल्मकार अब्बास किरोस्तामी का प्रभाव है. इस फिल्म का एक दृश्य खास तौर से उल्लेखनीय है, जहाँ फिल्मों से जुड़े हुए बाहर से आए कुछ युवा पंकज के साथ किरोस्तामी की फिल्मों की चर्चा करते हैं और उसमें एक तरह से हीनता का बोध भरते हैं.

(प्रभात खबर, 27 फरवरी 2022)

Thursday, January 27, 2022

मैथिली सिनेमा के धरोहर की अनदेखी

फणि मजूमदार (साभार फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशन)


पिछले दिनों अचानक
से यूट्यूब पर मैथिली की पहली फिल्म कन्यादानदिखी. वर्ष 1965 में बनी यह फिल्म अप्राप्य थी. जब वर्ष 1971 में इसे रिलीज किया गया था तब दरभंगा-मधुबनी और पटना में लोगों ने देखा और सराहा था. उस पीढ़ी के लोगों के जेहन में यह फिल्म थी, पर हमारी पीढ़ी के लिए महज यह एक सूचना भर रही. इस सिलसिले में जब मैंने पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय से कुछ वर्ष पहले संपर्क साधा तो उनका कहना था कि उनके डेटा बैंक में ऐसी कोई फिल्म नहीं है. मनोरंजन के साथ-साथ फिल्म का सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व होता है. भाषा के प्रसार के साथ ही सिनेमा समाज की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का भी एक माध्यम है. सिनेमा के खोने से आने वाली पीढ़ियां उन स्मृतियों से वंचित हो जाती है जिसे फिल्मकार ने सिनेमा में अभिव्यक्त किया था.

उत्साहवश जब मैंने यूट्यूब पर इस फिल्म को देखा तो निराशा हाथ लगी. ऐसा लगता है कि फिल्म मूल रूप में अपलोड नहीं की गई है. फिल्म का अंत भी वैसा नहीं है, जैसा कि लोग बताते रहे हैं. फणि मजूमदार निर्देशित यह फिल्म मैथिली के चर्चित रचनाकार हरिमोहन झा के उपन्यास-कन्यादानपर आधारित है जिसमें बेमेल विवाह की समस्या को दिखाया गया है. एक उच्च शिक्षा प्राप्त पुरुष की एक अशिक्षित स्त्री से शादी हो जाती है. इससे उत्पन्न समस्या और मिथिला की सामाजिक कुरीतियों को फिल्म में हास्य-व्यंग्य के माध्यम से दर्शाया गया है. जिस दौर में कन्यादानफिल्म बन रही थी उसी दौर में एक अन्य मैथिली फिल्म नैहर भेल मोर सासुरभी बन रही थी जो ममता गाबय गीतके नाम से काफी बाद में जाकर अस्सी के दशक के मध्य में रिलीज हुई. इस फिल्म के प्रिंट भी आज दुर्लभ हैं.

कन्यादानफिल्म में मैथिली के साथ-साथ हिंदी भाषा का भी प्रयोग है. इस फिल्म में पटकथा नवेंदु घोष और संवाद हिंदी के चर्चित लेखक फणीश्वरनाथ रेणुने लिखा था. तीसरी कसमफिल्म में इससे पहले उन्होंने साथ काम किया था. इस फिल्म में विद्यापति के गीत के साथ ही प्रसिद्ध लोक गायिका विंध्यवासिनी देवी का भी योगदान है. एक साथ इतने सारे दिग्गज इस फिल्म से जुड़े रहे पर इस ऐतिहासिक फिल्म के संग्रहण में सरकार की कोई रुचि नहीं रही. साथ ही वृहद समाज भी उदासीन ही रहा! जहाँ साहित्यिक हलकों में रेणु और हरिमोहन झा के साहित्य की चर्चा आज भी होती है, वहीं कन्यादानफिल्म की चर्चा कहीं नहीं होती. प्रसंगवश यह रेणु की जन्मशती वर्ष भी है.

सिनेमा के वरिष्ठ अध्येता मनमोहन चड्ढा ने हाल में छपी अपनी किताब- सिनेमा से संवादमें ठीक ही नोट किया है कि आधुनिक हिंदी भाषा-साहित्य और भारतीय सिनेमा का विकास लगभग साथ-साथ हुआ. उन्होंने सवाल उठाया है कि जहाँ समीक्षा और आलोचना की एक सुदीर्घ परंपरा बन गई वहीं हिंदी में सिनेमा पर सुचिंतित विमर्श क्यों नहीं हो पाया? क्यों हम सिनेमा के धरोहर को सहेजने को लेकर तत्पर नहीं हुए? उल्लेखनीय है कि मूक फिल्मों के दौर में भारत में करीब तेरह सौ फिल्में बनीं, जिसमें से मुट्ठी भर फिल्में ही आज हमारे पास है. नेशनल फिल्म आर्काइवके निदेशक रहे सुरेश छाबरिया भारत की मूक फिल्मों को अ लॉस्ट सिनेमैटिक पैराडाइजकहते हैं. उन्होंने अपनी चर्चित किताब लाइट ऑफ एशिया- इंडियन साइलेंट सिनेमा (1912-34)’ में भारत में बनी मूक फिल्मों का विस्तार से जिक्र किया है. बहरहाल, बॉलीवुड का ऐसा दबदबा रहा कि हिंदी भाषी दर्शकों के सरोकार क्षेत्रीय सिनेमा से नहीं जुड़े. हाल में मलयालम, तमिल आदि भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की सफलता को छोड़ दें तो बहुत कम हिंदी भाषी सिनेमा प्रेमी और अध्येता क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में रुचि रखते हैं.

कन्यादानफिल्म में मैथिली के रचनाकार चंद्रनाथ मिश्र अमरकी भी प्रमुख भूमिका थी. फिल्म निर्माण के दौरान मुंबई प्रवास को अपनी डायरी कन्यादान फिल्मक नेपथ्य कथामें उन्होंने नोट किया है. वे लिखते हैं: कन्यादान फिल्मक एक बड़का आकर्षण इ जे भारतक विभिन्न भाषा मैथिलीक आंगन में एकत्र भ गेल अछि. हिंदी, उर्दू, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, मगही, भोजपुरी आदिक कलिका सब जेना मैथिलीक एक सूत्र में गथा क माला बनि गेल हो (कन्यादान फिल्म का एक बड़ा आकर्षण यह है कि भारत की विभिन्न भाषा मैथिली के आंगन में एकत्र हुई है. हिंदी, उर्दू, बांग्ला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, मगही, भोजपुरी आदि कलियाँ सब जैसे एक सूत्र मे गूँथ कर माला बन गई हो). मैथिली फिल्म कन्यादानका महत्व इस बात में भी निहित है कि किस तरह देश के विविध भाषा-भाषी ने मैथिली में फिल्म संस्कृति की शुरुआत की थी.

मराठी, बांग्ला, असमिया, भोजपुरी सहित भारत में करीब पचास भाषाओं में फिल्में बनती हैं. इन भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में देश के विभिन्न भागों के लोग एक-दूसरे से जुड़ते रहे हैं, एक दूसरे की विविध भाषा-संस्कृति से परिचित होते रहते हैं. सच तो यह है कि सही मायनों में हिंदी सिनेमा के विकास का रास्ता भी क्षेत्रीय सिनेमा से होकर ही जाता है. पिछले दिनों मैथिली में बनी अचल मिश्र की फिल्म गामक घरकी खूब चर्चा हुई, पर लोग मैथिली सिनेमा के इतिहास से अपरिचित ही रहे. यदि मैथिली सिनेमा के धरोहर को सहेजने के प्रयास हुए होते तो शायद ऐसा नहीं होता.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)