समांतर सिनेमा के दौर के फिल्मकारों से श्याम बेनेगल की फिल्में काफी अलग रही. इन फिल्मों की विशिष्ट पहचान है. मुख्यधारा से अलग, समीक्षकों ने उनकी फिल्मों को मध्यमार्गी कहा. उनकी फिल्में आर्थिक रूप से भी सफल रही. पचास साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘मंथन’ इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. यह फिल्म आज भी प्रासंगिक बनी हुई है, जिसमें भारतीय ग्रामीण समाज में जातिगत विभेद उभर कर सामने आता है. साथ ही सत्तर के दशक के भारतीय समाज की आलोचना भी दिखाई देती है कि किस तरह गाँव की सामाजिक संरचना को ‘बाहरी’ लोग अपने नजरिए से देखते हैं और बदलाव लाने की कोशिश करते है.
बहरहाल, एक बातचीत में श्याम बेनेगल ने मुझे कहा था: ‘हर फिल्म एक सीखने की प्रक्रिया होती है, फिल्म बनाना अपने आसपास, अपने लोगों, अपने देश को बेहतर समझने की प्रक्रिया है, यह खुद को शिक्षित करने का एक तरीका है.’ यह फिल्म दिखाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और परिवर्तन का औजार बन सकता है.
समांतर सिनेमा के फिल्मकार हमेशा फिल्म बनाने कि लिए वित्तीय संकट से जूझते रहे. उन्हें वित्त निगम से काफी सहायता मिला रहा पर श्याम बेनेगल ने फिल्म बनाने के लिए फिल्म वित्त निगम से ऋण नहीं लिया था. उनकी पहली फिल्म 'अंकुर (1974)' और दूसरी फिल्म 'निशांत (1975)' को ‘ब्लेज एडवरटाइजिंग’ ने वित्तीय सहायता दी थी, जबकि तीसरी फिल्म 'मंथन (1976)' गुजरात के दुग्ध सहकारी संस्था के सदस्यों की सहायता से बनी. यह तीनों ही फिल्में व्यावसायिक रूप ले सफल रही. व्यावसायिक रूप से बेनेगल की फिल्मों की तुलना मलयालम फिल्म के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन से की जा सकती है, जिनकी अधिकांश फिल्में ‘बाक्स ऑफिस’ पर भी सफल रही.
‘मंथन’ फिल्म का निर्माण गुजरात के पांच लाख डेयरी किसानों ने किया था. एक तरह से ‘क्राउड सोर्सिंग’ के तहत बनी हिंदुस्तान की यह पहली फिल्म है. यह फिल्म डेयरी सहकारी आंदोलन के इर्द-गिर्द रची गई है. भारत में दुग्ध क्रांति के जनक रहे डॉक्टर वर्गीज कुरियन इस फिल्म निर्माण के पीछे थे.
इस फिल्म में गिरीश कर्नाड, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे, कुलभूषण खरबंदा, अनंत नाग जैसे कलाकारों को एक साथ परदे पर देखना सुखद है. इन कलाकारों की अदाकारी और गोविंद निहलानी के कुशल फिल्मांकन की वजह से करीब पचास साल बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती. असल में बेनेगल की फिल्में पीढ़ियों से संवाद करती है, नए अर्थ के साथ उद्घाटित होती है.
वर्ष 1977 में फिल्म को बेस्ट फिल्म और बेस्ट स्क्रीनप्ले (विजय तेंदुलकर) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस फिल्म के नेगेटिव क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिसे ‘फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशन’ ने निर्देशक के साथ मिल कर संरक्षित किया और फिर 2024 में कान फिल्म समारोह में ‘क्लासिक खंड में इसका प्रदर्शन किया गया. बाद में इसे देश के चुनिंदा सिनेमाघरों में भी रिलीज किया गया था,
बेनेगल की फिल्मों में वस्तुनिष्ठता पर काफी जोर रहता था, जो इस फिल्म में भी दिखाई देती है. यहाँ कोरी भावुकता नहीं है, कोई काल्पनिकता नहीं है. सादगी के साथ अपने समय और समाज के साथ जुड़ाव फिल्म की विशेषता है.

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