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Sunday, May 17, 2026

‘क्राउड सोर्सिंग’ के तहत बनी पहली फिल्म मंथन

 


समांतर सिनेमा के दौर के फिल्मकारों से श्याम बेनेगल की फिल्में काफी अलग रही. इन फिल्मों की विशिष्ट पहचान है. मुख्यधारा से अलग, समीक्षकों ने उनकी फिल्मों को मध्यमार्गी कहा. उनकी फिल्में आर्थिक रूप से भी सफल रही. पचास साल पहले रिलीज हुई फिल्म मंथनइसका श्रेष्ठ उदाहरण है. यह फिल्म आज भी प्रासंगिक बनी हुई है, जिसमें भारतीय ग्रामीण समाज में जातिगत विभेद उभर कर सामने आता है. साथ ही सत्तर के दशक के भारतीय समाज की आलोचना भी दिखाई देती है कि किस तरह गाँव की सामाजिक संरचना को बाहरीलोग अपने नजरिए से देखते हैं और बदलाव लाने की कोशिश करते है.

बहरहाल, एक बातचीत में श्याम बेनेगल ने मुझे कहा था: हर फिल्म एक सीखने की प्रक्रिया होती है, फिल्म बनाना अपने आसपास, अपने लोगों, अपने देश को बेहतर समझने की प्रक्रिया है, यह खुद को शिक्षित करने का एक तरीका है.’ यह फिल्म दिखाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और परिवर्तन का औजार बन सकता है.

समांतर सिनेमा के फिल्मकार हमेशा फिल्म बनाने कि लिए वित्तीय संकट से जूझते रहे. उन्हें वित्त निगम से काफी सहायता मिला रहा पर श्याम बेनेगल ने फिल्म बनाने के लिए फिल्म वित्त निगम से ऋण नहीं लिया था. उनकी पहली फिल्म 'अंकुर (1974)' और दूसरी फिल्म 'निशांत (1975)' को ‘ब्लेज एडवरटाइजिंग’ ने वित्तीय सहायता दी थी, जबकि तीसरी फिल्म 'मंथन (1976)' गुजरात के दुग्ध सहकारी संस्था के सदस्यों की सहायता से बनी. यह तीनों ही फिल्में व्यावसायिक रूप ले सफल रही. व्यावसायिक रूप से बेनेगल की फिल्मों की तुलना मलयालम फिल्म के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन से की जा सकती है, जिनकी अधिकांश फिल्में ‘बाक्स ऑफिस’ पर भी सफल रही.

मंथन फिल्म का निर्माण गुजरात के पांच लाख डेयरी किसानों ने किया था. एक तरह से क्राउड सोर्सिंग के तहत बनी हिंदुस्तान की यह पहली फिल्म है. यह फिल्म डेयरी सहकारी आंदोलन के इर्द-गिर्द रची गई है. भारत में दुग्ध क्रांति के जनक रहे डॉक्टर वर्गीज कुरियन इस फिल्म निर्माण के पीछे थे.

इस फिल्म में गिरीश कर्नाड, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे, कुलभूषण खरबंदा, अनंत नाग जैसे कलाकारों को एक साथ परदे पर देखना सुखद है. इन कलाकारों की अदाकारी और गोविंद निहलानी के कुशल फिल्मांकन की वजह से करीब पचास साल बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती. असल में बेनेगल की फिल्में पीढ़ियों से संवाद करती है, नए अर्थ के साथ उद्घाटित होती है.

वर्ष  1977 में फिल्म को बेस्ट फिल्म और बेस्ट स्क्रीनप्ले (विजय तेंदुलकर) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इस फिल्म के नेगेटिव क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिसे फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशनने निर्देशक के साथ मिल कर संरक्षित किया और फिर 2024 में कान फिल्म समारोह में क्लासिक खंड में इसका प्रदर्शन किया गया. बाद में इसे देश के चुनिंदा सिनेमाघरों में भी रिलीज किया गया था,

बेनेगल की फिल्मों में वस्तुनिष्ठता पर काफी जोर रहता था, जो इस फिल्म में भी दिखाई देती है. यहाँ कोरी भावुकता नहीं है, कोई काल्पनिकता नहीं है. सादगी के साथ अपने समय और समाज के साथ जुड़ाव फिल्म की विशेषता है.

Tuesday, April 01, 2025

बिना वस्तुनिष्ठता के फिल्म प्रोपेगेंडा बन जाती है


भारत और बांग्लादेश के सरकार के सहयोग से बनी 'बंगबंधु'  शेख मुजीबुर्रहमान पर आधारित बायोपिक ‘मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ के निर्माण के दौरान (2022) और रिलीज होने के बाद (2023) अरविंद दास ने श्याम बेनेगल से लंबी बातचीत की थी। यह उनकी आखिरी फिल्म थीजिसे भारत और बांग्लादेश में फिल्माया गया था। यह बातचीत अंग्रेजी में हुई थी प्रस्तुत है अनूदित संपादित अंश:


आप पचास साल से फिल्में बना रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी आप हर दिन ऑफिस जाते हैं। क्योंआपको क्या प्रेरित करता है?

श्याम बेनेगल: यह काम है। काम मुझे आगे बढ़ाता है। इस समय मैं शेख मुजीबुर्रहमान पर एक बड़ी फिल्म पूरी कर रहा हूं। यह एक बायोपिक है।

आपने पहले महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस पर फिल्में बनाई हैं। शेख मुजीबुर्रहमान पर बनी यह फिल्म कितनी अलग है?

श्याम बेनेगल: यह एक ऐतिहासिक बायोपिक हैठीक वैसे ही जैसे 'द मेकिंग ऑफ द महात्मा' या 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फॉरगॉटन हीरो'। यह हमारे उपमहाद्वीप के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति की कहानी है। शेख मुजीब ने एक नया राष्ट्र—बांग्लादेश—की स्थापना की। उनकी कहानी बहुत रोचक है और वे स्वयं भी एक अद्भुत व्यक्तित्व थे। वे किसी समृद्ध परिवार से नहीं थे। उनका बैकग्राउंड नेहरू या गांधी जैसा नहीं था। नेहरू प्रसिद्ध वकील के बेटे थेगांधी भी एक प्रभावशाली परिवार से आते थे।  सौराष्ट्र के दीवान परिवार से उनका ताल्लुक था। ज्यादातर राजनीतिक व्यक्ति इसी तरह की पृष्ठभूमि से थेलेकिन शेख मुजीब एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार से थे। उनकी पृष्ठभूमि नेहरू या गांधी के जैसी नहीं थी। वे एक कामकाजी शख्स थे। उदाहरण स्वरूप नेहरू एक ऐसी पृष्ठभूमि से आते थे यदि वे सोचते तो उन्हें कोई काम करने की जरूरत नहीं थी. उनके पिता की एक सामाजिक हैसियत थी और बहुत पैसा था। शेख मुजीब के पास बहुत जमीन जायदाद या जमींदारी नहीं थी।

गांधी या सुभाष से अलग बांग्लादेश के जनक पर बायोपिक बनाना कितना चुनौतीपूर्ण था?

श्याम बेनेगल: ओहवास्तव में यह दूसरी फिल्मों की तुलना में आसान था। मुजीब की बेटी शेख हसीना ( जो उस वक्त बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थी)से मेरी मुलाकात हुई। मैंने उनके परिवारविशेष रूप से उनके पितामाता और भाइयों के बारे में सुनाजिनकी हत्या कर दी गई थी। यह फिल्म उनके बारे में हैजिससे हमें उनके राजनीतिक और पारिवारिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर मिला। हमें उनके निजी संबंधों और भूमिकाओं के माध्यम से जानने का मौका मिलाजो बाहरी लोग शायद नहीं जान पाते।

यह फिल्म एक संयुक्त परियोजना हैक्या आप इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?

श्याम बेनेगल: हांयह भारत और बांग्लादेश सरकारों के बीच एक सहयोगी प्रयास है। हाल ही में बांग्लादेश की 50वीं वर्षगांठ और शेख मुजीब की 100वीं जयंती मनाई गई थी। जब हमने फिल्म बनानी शुरू कीतब तक काफी देर हो चुकी थीइसलिए यह उन समारोहों का हिस्सा नहीं बन पाई।

 क्या इस परियोजना को लेकर आप पर किसी प्रकार का दबाव था?

श्याम बेनेगल: बिल्कुल नहीं। वास्तव मेंमुझे यह निर्देश दिया गया था कि आप इस फ़िल्म को अपने दृष्टिकोण और सोच के अनुसार बनाएं। मुझसे कहा गया कि मुझे फिल्म उसी तरह बनाना चाहिए जैसे कोई पात्र [सामान्य रूप से] विकसित होता है। सौभाग्य सेहमारे पास इसे बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध थी। मुजीब ने बार-बार जेल की सजाओं और कैद के दौरान डायरी में कई नोट्स लिखे थे। वे जवाहरलाल नेहरू की तरह साहित्यिक अभिरुचि रखते थेजिन्होंने जेल में रहते हुए तीन पुस्तकें लिखी थीं।

प्रसिद्ध मलयालम फ़िल्म निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने एक बार मुझसे कहा था कि वे हिंदी फ़िल्म का निर्देशन नहीं कर सकतेक्योंकि वे भाषा नहीं समझते और अभिनेताओं का निर्देशन करना उनके लिए कठिन होगा। आपने हमेशा हिंदी/हिंदुस्तानी में फ़िल्में बनाई हैंलेकिन "मुजीब: द मेकिंग ऑफ़ ए नेशन" मूल रूप से बांग्ला में है। क्या आपको अभिनेताओं के निर्देशन में कठिनाई हुई?

श्याम बेनेगल: नहींबिल्कुल नहीं। अलग-अलग लोगों की सोच अलग होती है। मैं बांग्ला नहीं जानतालेकिन मेरे पास बेहतरीन भाषा सलाहकार थे। भारतीय भाषाओं की तरहबांग्ला में भी स्थानीय मुहावरे होते हैं। उदाहरण के लिएपश्चिम बंगाल के बंगाली लोगों की भाषा बांग्लादेश के बंगालियों से अलग हो सकती है। यही बात हिंदी पर भी लागू होती है। एक मुहावरा है कोस-कोस पर बदले पानीचार कोस पर वाणी'। जैसे हैदराबाद में बोली जाने वाली दक्खिनी हिंदी अलग होती है। लोग कहते हैं 'हुसैन सागर का पानी पीता है'। हैदराबाद की दक्खिनी मैसूर से अलग है।

भले ही यह फ़िल्म मुजीबुर्रहमान के संघर्ष और एक राष्ट्र के जन्म की कहानी कहती हैइसका संगीत और गीत विशेष रूप से प्रभावशाली हैं। फिल्म देखते हुए मुझे आपकी म्यूजिकल फिल्में जैसेसरदारी बेगम (1996) और जुबैदा (2001) की याद आता रही इस फ़िल्म के गीतों के बारे में बताइए।

श्याम बेनेगल फ़िल्म में तीन गीत हैं। पहला गीत एक ग्रामीण भटियाली गीत "अबूझ माझी" हैजो बंगाल की समृद्ध भूमि की सुंदरता को दर्शाता है। दूसरा गीत "की की जिनीष एनेछो दुलाल" हैजो शादी का गीत है। और तीसरा गीत एक मर्सिया है—जब कोई महान व्यक्ति गुजर जाता हैतो शोकगीत के रूप में इसे गाया जाता है। यह गीत मुजीब के लिए हैजिसमें सवाल किया गया है—'आप कहां चले गए?'

 "की की जिनीष एनेछो दुलाल"  के बारे में थोड़ा विस्तार से बात करते हैं। यह गीत बांग्ला और हिंदी संस्करणों में अलग है। बांग्ला संस्करण में सीता के सिंदूर और सामासिक संस्कृति की गूंज सुनाई देती है।

श्याम बेनेगल: यह दुल्हन के लिए गाया जाने वाला गीत है। दूल्हा शादी के लिए सिंदूर लाता हैजिसे दुल्हन की मांग में लगाया जाता है। यह एक पारंपरिक गीत हैजो विवाह समारोह से पहले गाया जाता है। हमने इसे हिंदी संस्करण में थोड़ा बदलालेकिन बांग्ला संस्करण में यह पारंपरिक रूप में ही रखा गया। यह बंगाल की परंपरा का हिस्सा है।

बांग्लादेश में इस फ़िल्म को कैसी प्रतिक्रिया मिली?

श्याम बेनेगलफ़िल्म बेहद सफल हो रही है। यह पूरे बांग्लादेश में 170 सिनेमाघरों में प्रदर्शित की गई। चूंकि बांग्लादेश में सिनेमाघरों की संख्या कम हैइसलिए इसे स्कूल हॉल में भी दिखाया जा रहा है। सरकार नए सिनेमाघर बना रही हैऔर यह फ़िल्म जबरदस्त हिट हो चुकी है।


फ़िल्म देखते समय मुझे लगा कि मुजीब के व्यक्तित्व में कोई विरोधाभास या द्वंद्व नहीं दिखाया गया है। वे एक पारिवारिक व्यक्ति के रूप में उभरते हैं…

श्याम बेनेगल: अधिकांश प्रमुख राजनेताओं के विपरीतमुजीबुर्रहमान का पारिवारिक जीवन खुशहाल था। उदाहरण के लिएनेहरू ने बहुत कम उम्र में अपनी पत्नी को खो दियाऔर वे अधिकतर समय जेल में रहेइसलिए उन्हें अपने परिवार के साथ ज्यादा समय नहीं मिला। गांधी पर भी अपने परिवार की उपेक्षा का आरोप लगाया गया था। उनके सबसे बड़े बेटे ने उनसे यह बात खुलकर कही थी। अधिकांश महान लोगजो किसी उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होते हैंअपने पारिवारिक जीवन से कट जाते हैं। लेकिन मुजीबुर्रहमान का मामला अलग था। वे अपनी पत्नी के बहुत करीब थे और एक सुखी पारिवारिक जीवन जीते थेभले ही वे कई बार जेल गए होंनेहरू और गांधी की तरह।

साथ ही फ़िल्म में मुजीब के राजनीतिक जीवन की कोई आलोचना नहीं की गई हैजबकि उनकी हत्या से पहले उन्होंने समस्त शक्तियां अपने हाथों में ले ली थीं।

श्याम बेनेगल हर नायक में एक tragic flaw (त्रासद दोष) होता है। शेक्सपियर के नाटकों में भी यही तत्व देखने को मिलता है। मुजीब के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब आप सत्ता में होते हैंतो यह आपको जनता से दूर कर सकती है। जब आपको अपनी जान का खतरा महसूस होता हैतो आप खुद को घेरे में ले लेते हैं। यह आपकी जनता की वास्तविक भावनाओं को समझने की क्षमता को कमजोर कर सकता है। आपके आसपास के लोग भी ऐसी बातें कहने से बचते हैंजिससे आप नाराज़ हो सकते हैं। यह बहुत सामान्य बात हैऔर ऐसा हर बड़े नेता के साथ होता है।

सत्तर के दशक में आपने 'अंकुर', 'निशांत', 'मंथनजैसी फिल्में बनाईफिर 'मम्मो', 'सरदारी बेगम', 'जुबैदाजैसी फिल्में आईं। आपने बायोपिक भी निर्देशित की हैं। इस विविधता का आपके लिए क्या अर्थ है?

श्याम बेनेगल: हर फिल्म एक सीखने की प्रक्रिया होती है। फिल्म बनाना अपने आसपासअपने लोगोंअपने देश को बेहतर समझने की प्रक्रिया है। यह खुद को शिक्षित करने का एक तरीका है।

आपकी कई फिल्में सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रही हैं। आपने एक बार कहा था कि सिनेमा समाज को बदल नहीं सकतालेकिन यह बदलाव का माध्यम जरूर बन सकता है। क्या आप अब भी ऐसा मानते हैं?

श्याम बेनेगल: बिल्कुल! फिल्में आपको एक दृष्टिकोण देती हैं। सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं हैयह आपको अपने इतिहासअपने समाज और अपने परिवेश को समझने में मदद करता है।

आप संसद सदस्य भी रहे हैं। आज समाज में हिंसा और संघर्ष बढ़ रहे हैं। सिनेमा की भूमिका पर आप क्या सोचते हैंउदाहरण के लिएहाल ही में आई फिल्म 'द कश्मीर फाइल्सकाफी विवादित रही...

श्याम बेनेगल: यही समस्या है। फिल्मों का लोगों के सोचने के तरीके पर बहुत प्रभाव पड़ता है। मैंने 'द कश्मीर फाइल्स' नहीं देखीलेकिन मैंने इसके बारे में सुना है। जब आप फिल्म बनाते हैंतो आपकी एक ज़िम्मेदारी इतिहास के प्रति भी होती है। जितना अधिक प्रोपेगेंडा आपकी फिल्म में होगाउसका उतना ही कम महत्व होगा। तथ्य यह है कि आप फिल्मों को प्रोपेगेंडा के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैंलेकिन जब आप इतिहास पर आधारित फीचर फिल्म बनाते हैंतो उसमें वस्तुनिष्ठता होनी चाहिए। बिना वस्तुनिष्ठता के फिल्म प्रोपेगेंडा बन जाती है।

आपने समानांतर सिनेमा के माध्यम से कई अच्छे कलाकारों को बॉलीवुड में लाने में मदद की। शबाना आज़मी ने कहा था कि आप 'अनिच्छुक गुरु' (Reluctant Guru) थे! ऐसा क्यों?

श्याम बेनेगल: शबाना एक प्रशिक्षित अभिनेत्री थीं। मुझे खुशी होती है कि वे ऐसा सोचती हैंलेकिन वास्तव मेंउन्हें उनके अभिनय कौशल और सही अवसरों के कारण सफलता मिली।  उस वक्त ऐसे किरदार थे जिसके लिए मैंने उन्हें उपयुक्त पाया। 'अंकुर''निशांत''मंडी' जैसी फिल्मों में उन्होंने शानदार अभिनय किया और सुर्खियां बटोरी। यह उनकी नैसर्गिक प्रतिभा थी। जो भी किरदार उन्होंने परदे पर निभाईउसे अपना बना लिया।

आज के सिनेमा के बारे में आप क्या सोचते हैं?.

श्याम बेनेगल: सिनेमा बहुत बदल गया है। पहले लोग थिएटर में फिल्में देखने जाते थे, आज जरूरी नहीं कि आप सिनेमा देखने थिएटर में ही जाएं। ऐसा इसलिए कि पूरा पैटर्न बदल गया है। टेलीविजन के फैलाव से ज्यादातर लोग अब टीवी पर ही फिल्म देखते हैं। और ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने से सिनेमा की जगह एक वैकल्पिक मंच ने ले ली है। आपको विभिन्न दृष्टिकोणों के अनुसार समायोजन करना पड़ता है। जब आप कोई फ़िल्म बनाते हैंतो आप उसे बड़े पर्दे पर सिनेमा हॉल में देखना चाहते हैं। लेकिन आज बहुत कम फ़िल्में सिनेमा हॉल में देखी जाती हैं। संभवतः आप इसे टेलीविजन पर देखेंगे। इससे फिल्म निर्माण के तरीके भी बदल रहे हैं।

तो आपको क्या लगता हैसिनेमा का भविष्य क्या होगा?

श्याम बेनेगल: सिनेमा का भविष्य हैलेकिन यह वही नहीं होगा जैसा हमने सोचा था। तकनीक और इतिहास दोनों मिलकर सिनेमा को आकार देते हैं। सिनेमा का रूप भी स्वयं बदल जाता है। जिस तरह से हम फिल्में देखते हैंवह भी तय करेगा कि भविष्य में फिल्में कैसे बनाई जाएंगी।

(हंस, अप्रैस 2025, पेज 97-99)

Wednesday, December 25, 2024

सिनेमा को‌ सामाजिक बदलाव का बड़ा माध्यम मानते थे बेनेगल


श्याम बेनेगल (1934-2024): स्मृति शेष


समांतर सिनेमा आंदोलन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर श्याम बेनेगल की ख्याति एक फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और वृत्तचित्र निर्माता के रूप में पूरी दुनिया में थी. पचास वर्षों की अपनी फिल्मी यात्रा में वे जीवनपर्यंत फिल्म निर्माण में सक्रिय रहे.

भारत और बांग्लादेश के सरकार के सहयोग से बनी उनकी आखिरी फिल्म ‘मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ के निर्माण के दौरान और रिलीज होने के बाद मैंने उनसे लंबी बातचीत की थी. जीवन से भरपूर वे एक कुशल शिक्षक की तरह थे, जिनसे आप सहजता से कोई भी सवाल पूछ सकते हैं. वर्ष 2006 में मैंने उनके साथ ऑस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में मीडिया के ऊपर हुए एक सेमिनार में भाग लिया था. इस सेमिनार में उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में विभाजन के चित्रण पर व्याख्यान दिया था.

वे सिनेमा को सामाजिक बदलाव का एक सशक्त माध्यम मानते थे. उन्होंने मुझसे एक बातचीत के दौरान कहा था: 'मेरे लिए प्रत्येक फिल्म का निर्माण सीखने की एक सतत प्रक्रिया है. फिल्म निर्माण के माध्यम से आप अपने आस-पड़ोस, लोगों और देश में बारे में जानते-समझते हैं. फिल्म बनाते हुए आप खुद को शिक्षित करते हैं.' इस वर्ष प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में उनकी चर्चित फिल्म ‘मंथन’ (1976) को क्लासिक खंड में दिखाया गया. बाद में जब देश के चुनिंदा सिनेमा घरों में बड़े परदे पर एक बार फिर से इसे रिलीज किया गया, तब दर्शकों का उत्साह देखते बना. सिनेमा में योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित बेनेगल की फिल्में पीढ़ियों को आपस में जोड़ती और उनसे संवाद करती है. डेयरी सहकारी आंदोलन के इर्द-गिर्द रची गई इस फिल्म में भारतीय ग्रामीण समाज में जातिगत विभेद उभर कर सामने आता है.

श्याम बेनेगल की फिल्मों का दायरा काफी व्यापक और विविध रहा. उनकी फिल्में ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को समग्रता में समेटती है. आश्चर्य नहीं कि दूरदर्शन के लिए उन्होंने नेहरू की किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ को निर्देशित किया था, जो काफी चर्चित रही थी.

बेनेगल की फिल्मी यात्रा के कई चरण रहे. पिछली सदी के 70 के दशक में ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘भूमिका’ जैसी फिल्में जहाँ सामाजिक यथार्थ और स्त्रियों की स्वतंत्रता के सवाल को समेटती है, वहीं ‘मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’, ‘जुबैदा’ जैसी फिल्में मुस्लिम स्त्रियों के जीवन को केंद्र में रखती है. इस बीच उन्होंने जुनून, त्रिकाल जैसी फिल्म भी बनाई जो इतिहास को टटोलती है. फिर बाद में वे ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’, ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस: द फॉरगॉटेन हीरो’ जैसी ऐतिहासिक जीवनीपरक फिल्मों की ओर मुड़े, जिनमें उन्हें महारत हासिल रही. ‘मुजीब’ फिल्म इसी कड़ी में उनकी आखिरी फिल्म रही.

वे जोर देते हुए कहते थे कि ऐतिहासिक विषयों पर आधारित फिल्मों में एक निश्चित मात्रा में वस्तुनिष्ठता का होना जरूरी है. साथ ही वे फिल्मकारों की इतिहास के प्रति जिम्मेदारी पर जोर देते हुए आगाह करते थे कि ‘बिना वस्तुनिष्ठता के फिल्म ‘प्रोपगेंडा’ बन जाती है’. उनका यह कथन वर्तमान समय में राष्ट्रवादी विचारधारा की आड़ में बनने वाली प्रोपेगेंडा फिल्मों के लिए एक सीख की तरह है.

एनएसडी, एफटीआईआई से प्रशिक्षित नए अभिनेताओं के लिए उनकी फिल्मों ने एक ऐसा स्पेस मुहैया कराया जहाँ उन्हें प्रतिभा दिखाना का भरपूर मौका मिला. उल्लेखनीय है कि बेनेगल की पहली फिल्म ‘अंकुर (1974) से ही शबाना आजमी ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा था. ‘मंडी’ फिल्म फिल्म में शबाना आजमी, स्मिता पाटील, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर, नीना गुप्ता, इला अरुण, अमरीश पुरी, कुलभूषण खरबंदा जैसे कलाकारों को परदे पर एक साथ दिखना किसी आश्चर्य से कम नहीं!

चिदानंद दासगुप्त ने अपने एक लेख में लिखा है: “बेनेगल की ज्यादातर फिल्में एक वस्तुनिष्ठ सत्य सामने लेकर आती है-एक ऐतिहासिक तथ्य, एक दी गई स्थिति, चरित्र या एक वर्ग- जिसे एक व्यवस्था, अनुशासन, क्राफ्ट्समैनशिप से लगभग करीब से रचने की सिनेमा कोशिश करता है. निजी भावपूर्ण फिल्में बनाना उनकी विशेषता नहीं है. इस मायने में वे ऋत्विक घटक से साफ विपरीत हैं, जो बेहद भावपूर्ण थे. इसी के करीब मृणाल सेन हैं, जिनके लिए वस्तुनिष्ठता का कोई मतलब नहीं है. तार्किकता बेनेगल के फिल्म निर्माण को संचालित करती है, जिससे उनकी काल्पनिकता या भावनाएँ मुक्त होने की कभी-कभार ही कोशिश करती है.” बेनेगल की अधिकांश फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल रही. इस मायने में उनकी तुलना मलयालम फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन से ही की जा सकती है, जिनकी कला से सृंवृद्ध फिल्में ‘बाक्स ऑफिस’ पर भी सफल रही. फिल्म निर्माण का उनका तरीका और सौंदर्यबोध समांतर सिनेमा के अन्य चर्चित फिल्मकार मणि कौल, कुमार शहानी आदि से साफ अलग रहा.

नई सदी में तकनीक क्रांति से सिनेमा निर्माण और दृश्य संस्कृति में काफी बदलाव आया है. सिनेमा का क्या भविष्य है, यह पूछने पर बेनेगल ने मुझे कहा था कि सिनेमा का भविष्य तो है, पर आवश्यक नहीं कि हमने जैसा सोचा था वैसा ही हो!’ उन्होंने कहा था कि ‘सिनेमा को गढ़ने में इतिहास और तकनीक दोनों की ही भूमिका होती है. आप किस तरह सिनेमा देखते हैं, वह भी सिनेमा का भविष्य तय करेगा.’ आने वाले समय में सिनेमा चाहे जो रूप अख्तियार करे पर इसमें कोई शक नहीं कि जब तक सिनेमा है, उनकी फिल्में इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन कर हमारे बीच हमेशा मौजूद रहेगी.

Sunday, June 16, 2024

कान फिल्म समारोह में 'मंथन'

 


इस बार प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में पायल कपाड़िया की फिल्म ऑल वी इमेजिन एज लाइट को ग्रां प्री पुरस्कार हासिल हुआ. फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), पुणे की छात्र रही कपाड़िया को मिला यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है. इससे पहले उनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'ए नाइट ऑफ नोइंग नथिंग' (2021) को भी कान में पुरस्कृत किया जा चुका है. हालांकि अभी तक भारत में इसे रिलीज नहीं किया गया है. पुरस्कार मिलने के बाद कपाड़िया ने स्वतंत्र फिल्मकारों को फंडिंग और वितरण को लेकर होने वाली परेशानी का जिक्र किया.

इस समारोह में श्याम बेनेगल की चर्चित फिल्म मंथन (1976) को भी क्लासिक खंड में दिखाया गया. इस फिल्म को फिल्म हेरिटेज फाउण्डेशन’ ने निर्देशक के साथ मिल कर संरक्षित किया है.  देश के चुनिंदा सिनेमा घरों में बड़े परदे पर एक बार फिर से दर्शकों के लिए भी इसे रिलीज किया गया, जहाँ दर्शकों का उत्साह देखते बना.

दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित, 89 वर्षीय बेनेगल हिंदुस्तान के सबसे वृद्ध फिल्म निर्देशक हैं, जो आज भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. पिछले साल उनकी फिल्म मुजीब- -द मेकिंग ऑफ ए नेशन रिलीज हुई थी. इस फिल्म को लेकर हुई बातचीत के दौरान बेनेगल ने मुझसे कहा था- मेरे लिए प्रत्येक फिल्म का निर्माण सीखने की एक सतत प्रक्रिया है. फिल्म निर्माण के माध्यम से आप अपने आस-पड़ोसलोगों और देश में बारे में जानते-समझते हैं. फिल्म बनाते हुए आप खुद को शिक्षित करते हैं.

मंथन (1976) फिल्म का निर्माण गुजरात के पांच लाख डेयरी किसानों ने किया था. एक तरह से क्राउड सोर्सिंग के तहत बनी हिंदुस्तान की यह पहली फिल्म हैजो बॉक्स ऑफिस पर भी काफी सफल रही थी. यह फिल्म डेयरी सहकारी आंदोलन के इर्द-गिर्द रची गई है, जिसमें भारतीय ग्रामीण समाज में जातिगत विभेद भी उभर कर सामने आता है. भारत में दुग्ध क्रांति के जनक रहे डॉक्टर वर्गीज कुरियन इस फिल्म निर्माण के पीछे थे.

श्याम बेनेगल की फिल्मों का दायरा काफी व्यापक और विविध रहा है. सत्तर के दशक में अंकुरनिशांतमंथन जैसी फिल्में उन्होंने बनाईफिर बाद के दशक में मुस्लिम स्त्रियों को केंद्र में रख कर मम्मोसरदारी बेगम और जुबैदा फिल्में आई.  महात्मा गाँधी,  सुभाष चंद्र बोस, शेख मुजीबुर्रहमान को लेकर जीवनीपरक फिल्में भी उन्होंने निर्देशित की है.

समांतर सिनेमा के दौर के फिल्मकारों से उनकी फिल्में काफी अलग हैं. मुख्यधारा से अलगसमीक्षकों ने उनकी फिल्मों को मध्यमार्गी कहा है. उनकी फिल्में आर्थिक रूप से भी सफल रही. साथ ही उन्होंने बॉलीवुड को कई बेहतरीन अदाकार दिए हैं. एनएसडीएफटीआईआई से प्रशिक्षित नए अभिनेताओं के लिए उनकी फिल्मों ने एक ऐसा स्पेस मुहैया कराया जहाँ उन्हें प्रतिभा दिखाना का भरपूर मौका मिला. इस फिल्म में गिरीश कर्नाडनसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, स्मिता पाटिलमोहन अगाशेकुलभूषण खरबंदाअनंत नाग जैसे कलाकारों को एक साथ परदे पर देखना सुखद है. इन कलाकारों की अदाकारी और गोविंद निहलानी के कुशल फिल्मांकन की वजह से करीब पचास साल बाद भी यह फिल्म पुरानी नहीं लगती. असल में बेनेगल की फिल्में पीढ़ियों से संवाद करती है. 


Monday, October 30, 2023

बंगबंधु मुजीब के जीवन को रचती फिल्म

 


चर्चित फिल्मकार श्याम बेनेगल को ऐतिहासिक, जीवनीपरक विषयों के फिल्मांकन में महारत हासिल है. ‘द मेकिंग ऑफ महात्मा’ और ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ जैसी उनकी फिल्में तथा ‘भारत एक खोज’ सीरीज काफी सराही गई. इसी कड़ी में ‘मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ फिल्म है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ‘बंगबंधु’ के नाम से चर्चित, बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता, शेख मुजीबुर्रहमान (1920-1975) ‘मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ फिल्म के केंद्र में हैं.

इस फिल्म के संबंध में बात करते हुए बेनेगल ने मुझे कहा था कि ‘ऐतिहासिक विषयों पर आधारित फिल्मों में एक निश्चित मात्रा में वस्तुनिष्ठता का होना जरूरी है’. साथ ही उन्होंने फिल्मकारों की इतिहास के प्रति जिम्मेदारी पर जोर देते हुए आगाह किया था कि बिना वस्तुनिष्ठता के फिल्म ‘प्रोपगेंडा’ बन जाती है. इस लिहाज से यह फिल्म अपने विषय के साथ न्याय करती है. यह दर्शकों को मुजीब के स्कूल-कॉलेज के दिनों, नए पाकिस्तान में बांग्ला भाषा को लेकर हुए आंदोलन, अवामी लीग के गठन और बांग्लादेश राष्ट्र के निमार्ण में संघर्ष को घेरे में लेती है. इससे लिपट कर मुजीब का परिवार, बीवी-बच्चों के साथ उनके संबंध भी सामने आते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को आम लोगों के करीब लाता है. नए राष्ट्र बांग्लादेश के निर्माण (1971) में धार्मिक अस्मिता से अलग भाषाई अस्मिता सबसे महत्वपूर्ण अवयव रहा. नए राष्ट्र के लिए हुआ आंदोलन उर्दू राष्ट्रवाद के विरोध में था. असल में, धर्म से अलग भाषा की अस्मिता बांग्लादेश राष्ट्र के निर्माण के लिए शुरुआत से ही जुड़ गई थी.

यह फिल्म भारत और बांग्लादेश के सरकार के सहयोग से बनी है, जिसमें दोनों देशों के कलाकारों का योगदान है. पचास साल पहले बनी ऋत्विक घटक की फिल्म ‘तिताश एकटि नदीर नाम’ (1973) अपवाद ही कही जाएगी, जो इस फिल्म की तरह ही भारत और बांग्लादेश सरकार के संयुक्त परियोजना का हिस्सा थी. वैसे भी हिंदुस्तान और बांग्लादेश की संस्कृति की भूमि एक ही है. अनायास नहीं कि फिल्म में रवींद्रनाथ टैगोर, काजी नजरुल इस्लाम की छवियाँ कई बार दिखाई देती है.

बहरहाल, यह फिल्म मुजीब को एक ऐसे नायक के रूप में परदे पर चित्रित करती है जिसके जीवन में कोई फांक या विरोधाभास नहीं था. उनके चरित्र में कोई द्वंद का न होना फिल्म को एकरस बनाती है, जिससे यह कहीं-कहीं बोझिल हो जाती है. हालांकि बेनेगल ने कहा था कि ‘शेख मुजीब की पृष्ठभूमि गाँधी या नेहरू की तरह नहीं थी. वे धनाढ्य या जमींदार नहीं थे. वे एक काम-काजी शख्स थे और मध्यवर्ग से ताल्लुक रखते थे.’ बांग्लादेश के कलाकार अरिफिन शुभो ने मुजीब के किरदार को बखूबी निभाया है. वे इस फिल्म की जान हैं. मध्यांतर के बाद फिल्म गति पकड़ती है, जब ‘मुक्तिवाहिनी’ योद्धाओ के संघर्ष से हम रू-ब-रू होते हैं. फिल्म में ऐतिहासिक वीडियो फुटेज और तस्वीरों का भी इस्तेमाल किया गया है. शेख मुजीब के भारतीय नेताओं, खासकर इंदिरा गाँधी के साथ मधुर संबंध थे.

मुजीब इस उपमहाद्वीप के एक बेहद खास शख्सियत थे. मुजीब ने एक नए राष्ट्र को जन्म दिया, लेकिन वर्ष 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों के साथ हत्या कर दी गई. यह फिल्म उनके जीवनवृत्त को संपूर्णता में भले समेटती है, लेकिन यहाँ उनके व्यक्तित्व की आलोचना का अभाव दिखाई देता है. स्वतंत्र बांग्लादेश में उनके शासन के प्रति नागरिक समाज की क्या राय थी? यह फिल्म इस सवाल का जवाब नहीं देती है.

अंत में, इस फिल्म में इस्तेमाल हुए गीत-संगीत की चर्चा जरूरी है. फिल्म का संगीत शांतनु मोइत्रा का है. खास कर रेणु (बेगम फजिलातुन्नेसा) की मुजीब के संग शादी के प्रसंग को लेकर जो लोक गीत का इस्तेमाल किया है वह बेहद खूबसूरत है. इस गीत में कहा गया है कि ‘सीता के लिए कागज पर लिख कर जो सिंदूर भेजा गया है वह सिंदूर लेकर बन्ना आएगा.’ मुस्लिम शादी-विवाह में हिंदू संस्कृति के इस प्रसंग को सुनकर आश्चर्य हो सकता है पर सच है कि सैकड़ों वर्षों से हिंदू-मुस्लिम बांग्लादेश में साथ रहते आए थे. वर्ष 1971 में आजादी के बाद चीजें बदली. प्रसंगवश, मिथिला में शादी के समय वर वालों की तरफ से वधू के लिए जिस कागज में भर कर सिंदूर भेजा जाता है वह मिथिला पेंटिंग (लिखिया) से सजा होता है. कहा जाता है कि सीता की शादी के समय ही राजा जनक ने मिथिला पेंटिंग अपने घर की दीवारों पर करवाई थी, जो परंपरा के रूप में आज भी कायम है. आज जब विभिन्न राष्ट्रों के बीच संघर्ष बढ़े हैं, सिनेमा के माध्यम से दो देशों की संस्कृतियाँ यदि करीब आती है तो इससे अच्छा क्या होगा!

Sunday, May 01, 2022

प्रत्येक फिल्म निर्माण सीखने की एक सतत प्रक्रिया: श्याम बेनेगल'

 



मशहूर फिल्म निर्देशकदादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित श्याम बेनेगल 87 वर्ष की उम्र में आज भी रचनात्मक रूप से सक्रिय हैं. फिलहाल वे अपनी नई फिल्म मुजीब-द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ के निर्माण में व्यस्त हैं. फिल्म इस साल सितंबर में रिलीज होगी. यह फिल्म बांग्लादेश के जनक और बंगबंधु’ के नाम से चर्चित शेख मुजीबुर्रहमान (1920-1975) के जीवन पर आधारित है. पिछले महीने बेनेगल ने इस फिल्म का पोस्टर रिलीज किया. लेखक-पत्रकार अरविंद दास ने उनसे बातचीत कीएक अंश प्रस्तुत है:

पहले आपने महात्मा गाँधीसुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू के ऊपर फिल्म और डॉक्यूमेंट्री बनाई हैयह फिल्म किस तरह अलग है?

 

यह भी एक ऐतिहासिक जीवनपरक फिल्म हैजैसा कि  द मेकिंग ऑफ महात्मा या नेताजी सुभाष चंद्र बोसद फॉरगॉटेन हीरो थी. मुजीब हमारे उपमहाद्वीप के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे. उन्होंने बांग्लादेश को जन्म दिया. उनकी कहानी बहुत रोचक है. खुद भी वे बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे. वे किसी धनाढ्य या जमींदार परिवार से ताल्लुक नहीं रखते थेजैसा कि उस दौर के ज्यादातर राजनीतिक नेता थे. वे मध्यवर्ग से आते थे और कामकाजी थे. उनकी पृष्ठभूमि नेहरू या गाँधी जी के जैसी नहीं थी.

 

यह फिल्म भारत और बांग्लादेश सरकार के सहयोग से बन रही है. इसके बारे में कुछ विस्तार से बताएँ?

 

हांयह भारत और बांग्लादेश सरकार के संयुक्त प्रयास का फल है. पिछले साल बांग्लादेश ने आजादी का 50वां और शेख मुजीब का 100वां सालगिरह मनाया था. जब हमने फिल्म पर काम करना शुरू किया तब देर हो चुकी थी और यह फिल्म समारोह का हिस्सा नहीं बन पाई. इस फिल्म के सारे कलाकार बांग्लादेश से हैं.

 

आपने पिछली सदी के सत्तर के दशक में अंकुरनिशांतमंथन जैसी फिल्में बनाईफिर बाद के दशक में मुस्लिम स्त्रियों को केंद्र में रख कर मम्मोसरदारी बेगम और जुबैदा फिल्में आई, जीवनीपरक फिल्में भी निर्देशित की. आपके लिए विविध विषयों को समेटती इस लंबी फिल्मी यात्रा के क्या मायने हैं?

मेरे लिए प्रत्येक फिल्म का निर्माण सीखने की एक सतत प्रक्रिया है. फिल्म निर्माण के माध्यम से आप अपने आस-पड़ोसलोगों और देश में बारे में जानते-समझते हैं. फिल्म बनाते हुए आप खुद को शिक्षित करते हैं.

आपकी कई फिल्में सामाजिक मुद्दों के इर्द-गिर्द है. एक बार आपने कहा था कि सिनेमा से समाज को हम बदल नहीं सकते पर वह बदलाव का एक जरिया हो सकता है. क्या अब भी आप ऐसा मानते हैं?

बिलकुललेकिन फिल्म आपको अंतर्दृष्टि भी देती है. आपको कुछ ज्यादा सीखने की जरूरत नहीं है. यह अंतर्दृष्टि न सिर्फ खुद के बारे में बल्कि वातावरणपृष्ठभूमि के बारे में भी मिलती है. साथ ही अपने देशइतिहास और भी बहुत सी चीजों के बारे में भी.

वर्तमान समय में सब तरफ हिंसा, संघर्ष दिखाई देता हैं. आप सांसद भी रहे हैं. समकालीन समाज में सिनेमा की क्या भूमिका देखते हैं? उदाहरण के लिए द कश्मीर फाइल्स फिल्म ने समाज को ध्रुवीकृत किया है

हांयह समस्या है. सिनेमा आपको प्रभावित करती है और दुनिया के प्रति आपके नजरिए को भी निर्धारित करती है. मैंने द कश्मीर फाइल्स नहीं देखी हैपर इसके बारे में सुना है. एक फिल्मकार के रूप में इतिहास के प्रति आपकी एक जिम्मेदारी होती है. जिस फिल्म में जितना प्रोपगेंडा होगा, उसका महत्व उतना ही कम होगा. फिल्म का इस्तेमाल प्रोपगेंडा के लिए भी होता है, पर ऐतिहासिक फिल्मों को बनाते हुए वस्तुनिष्ठता का ध्यान रखना जरूरी है. बिना वस्तुनिष्ठता के यह प्रोपगेंडा हो जाती है.

वर्तमान समय में सिनेमा की जो स्थिति है उसके बारे में आपका क्या कहना है?

सिनेमा काफी बदल गया है. फिल्म देखने के लिए आप जरूरी नहीं कि सिनेमाघर ही जाएँ. टीवी और ओटीटी प्लेटफार्म ने सिनेमा का एक विकल्प दिया है. ज्यादातर लोग टीवी पर ही फिल्में देखते हैं. इसने फिल्मकारों के सिनेमा बनाने के ढंग को प्रभावित किया है.

फिर सिनेमा का क्या भविष्य आप देखते हैं?

हम भविष्य की ओर नजर गड़ाए हुए हैं. मुझे नहीं पता कि सिनेमा का क्या भविष्य होगा. सिनेमा का भविष्य है, पर जरूरी नहीं कि यह उसी रूप में हो जैसा हमने सोचा था. सिनेमा को गढ़ने में इतिहास और तकनीक दोनों की ही भूमिका होती है. सिनेमा का रूप बदल जाता है. आप किस तरह सिनेमा देखते हैं, वह भी सिनेमा का भविष्य तय करेगा.