दो तरह का सिनेमा है. एक जो पैररल स्ट्रीम है, वह सवाल खड़े करता है. वह फार्मूला नहीं है, वह धारा से अलग होता है. उसे कभी-कभी पता नहीं होता है कि कहां जा रहा है. कोई तयशुदा अंत नहीं होता उसका. फार्मूला सिनेमा में सब कुछ तय होता है. जैसे कि ‘लगान’ में अंत में छक्का लगेगा. हीरो जीत जाएगा...आसान है जिंदगी यहाँ, समांतर सिनेमा में कठिन है.
(सुधीर मिश्रा, लेखक के साथ बातचीत में)
पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ऑल वी इमैजिन एज लाइट’ देखते हुए मैं जिस चीज से प्रभावित हुआ वह थी, फिल्म की भाषा. पिछले साल कान समारोह में इसे प्रतिष्ठित ‘ग्रां प्री’ पुरस्कार से नवाजा गया. यह फिल्म मलयालम, मराठी और हिंदी में जिस सहजता से आवाजाही करती है वह इसे अखिल भारतीय बनाता है. भारत जैसे बहुभाषी देश में पचास से ज्यादा भाषाओं में फिल्में बनती है, पर अधिकांश का फार्मूला एक जैसा है. ये फिल्में बॉलीवुड, टॉलीवुड, कॉलीवुड की फैक्ट्री से निकलती हैं. मनोरंजन और स्टार तत्व इनके मूल में रहा है. आजाद भारत में हालांकि विभिन्न भाषाओं में ऐसी फिल्में भी गाहे-बगाहे बनती रही जो इसका अतिक्रमण कर सिनेमा के माध्यम की संभावनाओं का विस्तार करती है. साहित्य की तरह सिनेमा सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना का माध्यम है, इसे साबित करती है.
आधुनिक भारत में सिनेमा संस्कृति का विशिष्ट पहलू है. वर्ष 1946 में जब कान फिल्म समारोह की शुरुआत हुई, उसी वर्ष भारतीय फिल्मों की ‘कान यात्रा’ शुरु हो गई थी. कान में उस साल चेतन आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म ‘नीचा नगर’ को प्रतिष्ठित ‘पाम डी ओर’ पुरस्कार दिया गया था. वर्तमान में इस फिल्म को कोई याद नहीं करता. सिनेमा के इतिहासकारों की नजर से भी यह वर्षों ओझल ही रहा है. जबकि वर्ष 1946 में ही रिलीज हुई ख्वाजा अहमद अब्बास की बंगाल के अकाल पर बनी फिल्म ‘धरती के लाल’ और ‘नीचा नगर’ ने भारतीय सिनेमा में एक ऐसी नव-यथार्थवादी धारा की शुरुआत की जिसकी धमक देश-दुनिया में सुनी गई. बाद में जाकर विमल राय ने ‘दो बीघा जमीन’ (1953) में और सत्यजीत रे ने ‘पाथेर पांचाली’ (1955) में सामाजिक यथार्थ को संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया. उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों ने भी कान समारोह में सुर्खियाँ बटोरी थी.
‘नीचा नगर’ के निर्माण के प्रसंग का जिक्र बलराज साहनी ने ‘मेरी फिल्मी आत्मकथा’ में विस्तार से किया है. उन्होंने चेतन आनंद को उद्धृत करते हुए लिखा है कि चेतन ने उनसे कहा था- “इस समय आजाद प्रोड्यूसर अस्तित्व में आया है. इस अस्थिर सी परिस्थिति की आशावादी संभावनाएँ भी हैं. इस समय अच्छे सुशिक्षित और प्रगतिशील लोग अगर हिम्मत करें तो फिल्म-इंडस्ट्री को पहले से अधिक यथार्थवादी मोड़ दे सकते हैं.” ‘नीचा नगर’ और ‘धरती के लाल’ इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) की विचारधारा से प्रभावित थी. ‘धरती के लाल’ का निर्माण ‘इप्टा’ ने ही किया था, जिसमें बलराज साहनी की भी भूमिका थी. ‘धरती के लाल’ की तरह ही ‘नीचा नगर’ फिल्म में भी संगीत सितार वादक ‘रवि शंकर’ ने दिया था, जो इप्टा से जुड़े थे.
बकौल बलराज साहनी, चेतन आनंद ‘नीचा नगर के माध्यम से आर्थिक वर्गों की मुठभेड़ की कहानी कहना चाहते थे'. आजादी के बाद हिंदी सिनेमा उद्योग में सामाजिक यथार्थ की इस धारा पर बड़ी पूंजी हावी रही. साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में बलराज साहनी जैसे अदाकारों पर ‘स्टार’ भारी पड़े, चेतन आनंद जैसे निर्देशक हाशिए पर चले गए. ‘नीचा नगर’ और ‘धरती के लाल’ जैसी फिल्मों की धारा ‘समांतर सिनेमा’ के रूप में हालांकि आज भी जारी है. उल्लेखनीय है कि कान फिल्म समारोह में भले ही ‘नीचा नगर’ पुरस्कृत हुई, भारत में व्यावसायिक रूप से यह रिलीज नहीं हो पाई थी. फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था.
पिछली सदी के साठ के दशक के बाद देश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों, युवाओं में मोहभंग, आक्रोश और विश्व सिनेमा आंदोलन के असर से हिंद सिनेमा के युवा स्वरों ने ‘पापुलर’ से एक अलग रास्ता अख्तियार किया, जिसे आज हम ‘समांतर’ सिनेमा के नाम से जानते हैं. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को ‘पापुलर’ के बरक्स ‘अनपापुलर फिल्म’ कहते थे.
इनमें से ज्यादातर फिल्मकार, सिनेमैटोग्राफर फिल्म संस्थान, पुणे से प्रशिक्षित थे, जिन्हें सरकारी संस्था फिल्म वित्त निगम का सहयोग मिला. यहीं से फ्रेंच फिल्मकारों की तरह ही ‘ओतर’ यानी लेखक-निर्देशक की अवधारणा हिंदी और अन्य क्षेत्रीय सिनेमा में दिखाई दी. इनकी फिल्में कुछ नया रचने से प्रेरित रही. वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म ‘उसकी रोटी’, बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ और मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ को समांतर सिनेमा की धारा शुरू करने का श्रेय दिया जाता है....
(ISSN: 2231-6329, July-Sep 2025, Page 64-71)


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