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Friday, June 26, 2026

समांतर की रोशनी में नया सिनेमा

 


दो तरह का सिनेमा है. एक जो पैररल स्ट्रीम है, वह सवाल खड़े करता है. वह फार्मूला नहीं है, वह धारा से अलग होता है. उसे कभी-कभी पता नहीं होता है कि कहां जा रहा है. कोई तयशुदा अंत नहीं होता उसका. फार्मूला सिनेमा में सब कुछ तय होता है. जैसे कि ‘लगान’ में अंत में छक्का लगेगा. हीरो जीत जाएगा...आसान है जिंदगी यहाँ, समांतर सिनेमा में कठिन है.

(सुधीर मिश्रा, लेखक के साथ बातचीत में)

 

पायल कपाड़िया की फिल्मऑल वी इमैजिन एज लाइट’  देखते हुए मैं जिस चीज से प्रभावित हुआ वह थी, फिल्म की भाषा. पिछले साल कान समारोह में इसे प्रतिष्ठितग्रां प्रीपुरस्कार से नवाजा गया. यह फिल्म मलयालम, मराठी और हिंदी  में जिस सहजता से आवाजाही करती है वह इसे अखिल भारतीय बनाता है. भारत जैसे बहुभाषी देश में पचास से ज्यादा भाषाओं में फिल्में बनती है, पर अधिकांश का फार्मूला एक जैसा है. ये फिल्में बॉलीवुड, टॉलीवुड, कॉलीवुड की फैक्ट्री से निकलती हैं.  मनोरंजन और स्टार तत्व इनके मूल में रहा है. आजाद भारत में हालांकि विभिन्न भाषाओं में ऐसी फिल्में भी गाहे-बगाहे बनती रही जो इसका अतिक्रमण कर सिनेमा के माध्यम की संभावनाओं का विस्तार करती है. साहित्य की तरह सिनेमा सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना का माध्यम है, इसे साबित करती है.

आधुनिक भारत में सिनेमा संस्कृति का विशिष्ट पहलू है. वर्ष 1946 में जब कान फिल्म समारोह की शुरुआत हुई, उसी वर्ष भारतीय फिल्मों की कान यात्राशुरु हो गई थी. कान में उस साल चेतन आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म नीचा नगरको प्रतिष्ठित पाम डी ओरपुरस्कार दिया गया था. वर्तमान में इस फिल्म को कोई याद नहीं करता. सिनेमा के इतिहासकारों की नजर से भी यह वर्षों ओझल ही रहा है. जबकि वर्ष 1946 में ही रिलीज हुई ख्वाजा अहमद अब्बास की बंगाल के अकाल पर बनी फिल्म धरती के लालऔरनीचा नगरने भारतीय सिनेमा में एक ऐसी नव-यथार्थवादी धारा की शुरुआत की जिसकी धमक देश-दुनिया में सुनी गई. बाद में जाकर विमल राय नेदो बीघा जमीन’ (1953) में और सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली’ (1955) में सामाजिक यथार्थ को संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया. उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों ने भी कान समारोह में सुर्खियाँ बटोरी थी.

नीचा नगरके निर्माण के प्रसंग का जिक्र बलराज साहनी ने मेरी फिल्मी आत्मकथामें विस्तार से किया है. उन्होंने चेतन आनंद को उद्धृत करते हुए लिखा है कि चेतन ने उनसे कहा था-इस समय आजाद प्रोड्यूसर अस्तित्व में आया है. इस अस्थिर सी परिस्थिति की आशावादी संभावनाएँ भी हैं. इस समय अच्छे सुशिक्षित और प्रगतिशील लोग अगर हिम्मत करें तो फिल्म-इंडस्ट्री को पहले से अधिक यथार्थवादी मोड़ दे सकते हैं.नीचा नगरऔरधरती के लालइंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) की विचारधारा से प्रभावित थी. धरती के लाल का निर्माण इप्टा ने ही किया था, जिसमें बलराज साहनी की भी भूमिका थी. धरती के लाल की तरह ही नीचा नगर फिल्म में भी संगीत सितार वादक रवि शंकर ने दिया था, जो इप्टा से जुड़े थे.

बकौल बलराज साहनी, चेतन आनंद नीचा नगर के माध्यम से आर्थिक वर्गों की मुठभेड़ की कहानी कहना चाहते थे'.  आजादी के बाद हिंदी सिनेमा उद्योग में सामाजिक यथार्थ की इस धारा पर बड़ी पूंजी हावी रही. साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में बलराज साहनी जैसे अदाकारों परस्टारभारी पड़े, चेतन आनंद जैसे निर्देशक हाशिए पर चले गए.नीचा नगरऔरधरती के लाल जैसी फिल्मों की धारासमांतर सिनेमाके रूप में हालांकि आज भी जारी है. उल्लेखनीय है कि कान फिल्म समारोह में भले हीनीचा नगरपुरस्कृत हुई, भारत में व्यावसायिक रूप से यह रिलीज नहीं हो पाई थी. फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था.

पिछली सदी के साठ के दशक के बाद देश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों, युवाओं में मोहभंग, आक्रोश और विश्व सिनेमा आंदोलन के असर से हिंद सिनेमा के युवा स्वरों ने ‘पापुलर’ से एक अलग रास्ता अख्तियार किया, जिसे आज हम ‘समांतर’ सिनेमा के नाम से जानते हैं. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को  ‘पापुलर के बरक्सअनपापुलर फिल्मकहते थे.

इनमें से ज्यादातर फिल्मकार, सिनेमैटोग्राफर फिल्म संस्थान, पुणे से प्रशिक्षित थे, जिन्हें सरकारी संस्था फिल्म वित्त निगम का सहयोग मिला. यहीं से फ्रेंच फिल्मकारों की तरह ही ‘ओतर’ यानी लेखक-निर्देशक की अवधारणा हिंदी और अन्य क्षेत्रीय सिनेमा में दिखाई दी. इनकी फिल्में कुछ नया रचने से प्रेरित रही. वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्मउसकी रोटी’, बासु चटर्जी कीसारा आकाशऔर मृणाल सेन कीभुवन सोमको समांतर सिनेमा की धारा शुरू करने का श्रेय दिया जाता है....


(ISSN: 2231-6329, July-Sep 2025, Page 64-71)

Thursday, May 07, 2026

मलयालम सिनेमा का नया स्वर: टिकट टू करेला

 


बीस साल पहले दिल्ली में ओसियान फिल्म समारोह के दौरान, सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में हिंदी के आलोचक और मेरे शिक्षक (गाइड) वीर भारत तलवार ने लगभग धकेलते हुए मुझे कहा कि देखो, अडूर गोपालकृष्णन वहाँ बैठे हैं, जाओ बात करो!

मैं उनके पास जाकर बैठ गया. लौटा तो मैंने सर से कहा कि उनसे एफटीआईआई, ऋत्विक घटक की बातें की और क्या बातें करता, उनकी फिल्में ही नहीं देखी है. सर ने कहा, ठीक कहते हो बिना फिल्म देखे क्या बात करते. खैर, बाद में मैंने उनकी फिल्में देखी और लंबी बातचीत की जो प्रकाशित भी हुई.

दो दशक पहले तक बिना सब-टाइटल के हिंदी के इतर फिल्में देखना बहुत मुश्किल था. फिल्म-समारोह में कभी-कभार फिल्में देखने को मिल जाती थी. साथ ही भारतीय सिने जगत में बॉलीवुड इतना हावी रहा है कि क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की चर्चा भी नहीं होती. बांग्ला फिल्में और खास कर सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक या मृणाल सेन जैसे फिल्मकार अपवाद रहे हैं.

पिछले दिनों द हिंदूअखबार से जुड़े पत्रकार एस आर प्रवीण की किताब टिकट टू केरला (द स्टोरी ऑफ मलयालम सिनेमा) प्रकाशित हुई जो केरल से बाहर रहने वाले, अन्य भाषाई दर्शकों को संबोधित है. यह किताब पाठकों को मलयालम सिनेमा के संवृद्ध इतिहास, परंपरा और वर्तमान फिल्मों से परिचय कराती है.

कोरोना महामारी के दौरान, ओटीटी प्लेटफॉर्म के माध्यम से मलयालम में रिलीज हुई 'जलीकट्टू ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, ‘जोजी’, ‘आरकारियम’, ‘मालिक’ आदि मलयालम फिल्मों की खूब चर्चा हुई. लॉकडाउन के बीच मध्यवर्गीय दर्शकों ने इन फिल्मों को हाथों-हाथ लिया. ‘जोजी’ और ‘आरकारियम’ फिल्म में तो ‘लॉकडाउन’ और ‘मास्क’ के रूपक का कथ्य में खूबसूरती से निरूपण भी हुआ है.  प्रवीण इन फिल्मों को न्यू वेबकहते हैं. इसी क्रम में हाल के वर्षों में काथल, आतम, उलोझक्कू जैसी फिल्मों ने खूब सुर्खियां बटोरी.

पिछले एक दशक में बनी मलयालम फिल्मों को देखकर हम कह सकते हैं कि मलयालम सिनेमा में यह एक नए युग की शुरुआत है जहाँ पॉपुलर और समांतर की रेखा मिट रही है. कम लागत से बनने वाली इन फिल्मों में नई विषय-वस्तु  और सहज अभिनय पर जोर है. यही कारण है कि फहाद फासिल जैसे कुशल अभिनेता (कुंबलंगी नाइट्स, जोजी, मालिक) की हिंदी दर्शकों के बीच भी खूब प्रशंसा हुई.

सत्तर-अस्सी के दशक में समांतर सिनेमा की धारा को मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, के जी जार्ज, जी अरविंदन, शाजी करुण ने संवृद्ध किया था. उनकी फिल्मों ने मलयालम सिनेमा को देश-दुनिया में स्थापित किया, पर उसके बाद ऐसा लगा कि कथ्य और शैली में मलयालम सिनेमा पिछड़ गई.

प्रवीण लिखते हैं कि सदी के पहले दशक के आखिरी वर्षों में मलयालम मुख्यधारा की फिल्मों में बदलाव की शुरुआत होती है. दर्शकों को सिनेमाघरों में कुछ भी सार्थक देखने को नहीं मिल रहा था और वे थिएटर से मुंह मोड़ रहे थे. लेखक अंजलि मेनन की चर्चित फिल्म 'बैंगलोर डेज' (2008) और अलफोंस पुथरेन की प्रेमम (2015) फिल्म की खास तौर पर चर्चा करते हैं. सांई पल्लवी ने प्रेमम फिल्म से सिने जगत में प्रवेश किया.

हाल के वर्षों में रिलीज हुई मलयालम फिल्में केरल के समाज में रची-बसी है. इन फिल्मों में जाति, लिंग का सवाल और राजनीतिक स्वर भी मुखर रूप से व्यक्त हुआ है, जो बॉलीवुड में इन दिनों मुश्किल से सुनाई पड़ता है.

जियो बेबी की ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ जब रिलीज हुई तब हिंदी क्षेत्र में सोशल मीडिया पर इस फिल्म को लेकर काफी बहस हुई थी. ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ की शुरुआत ‘द ग्रेट इंडियन ड्रामा’ यानी शादी से होती है. इस फिल्म के केंद्र में एक शादी-शुदा जोड़ा है. घर-परिवार के सदस्यों के रिश्ते, धर्मसत्ता, पितृसत्ता और खासकर स्त्रियों के साथ मध्यवर्गीय परिवार में जो लैंगिक भेदभाव है उसे रसोईघर के माध्यम से खूबसूरती से निरूपित किया गया है. फिल्म में अपनी इच्छाओं, डांस के प्रति अपने लगाव को दबा कर अदाकार निमिषा सजयन सुबह-दोपहर-शाम घर के पुरुषों की ‘क्षुधा’ शांत करने की फिक्र में रहती है, पर उसकी फिक्र किसे है! पुरुष भोजनभट्ट हैं. अखबार पढ़ने में, योग करने में मशगूल हैं, वहीं स्त्री नमक-तेल-हल्दी की चिंता में आकंठ डूबी हुई है.

इस फिल्म को देखते हुए मुझे हिंदी के कवि रघुवीर सहाय की कविता ‘पढ़िए गीता’ की याद आती रही: पढ़िए गीता/ बनिए सीता/ फिर इन सब में लगा पलीता/किसी मूर्ख की हो परिणीता/निज घर-बार बसाइए/ होंय कँटीली/आँखें गीली/लकड़ी सीली, तबियत ढीली/घर की सबसे बड़ी पतीली/ भरकर भात पसाइए. हालांकि फिल्म में निमिषा सजयन ने जिस किरदार को निभाया है वह न गीता पढ़ती है, न सीता ही बनती है. एक विद्रोही चेतना से वह लैस है. यह चेतना फिल्म के आखिर में दिखाई पड़ती है जिसे एक ‘डांस स्वीकेंस’ के माध्यम से निर्देशक ने फिल्माया है. एक तरह से यह फिल्म भारतीय समाज में व्याप्त सामंती प्रवृत्तियों का नकार है. यह फिल्म भले ही मलयाली समाज में रची-बसी हो पर अपनी व्याप्ति में अखिल भारतीय है और यही वजह है कि निर्देशक ने पात्रों को कोई नाम नहीं दिया है.

फिल्म के रिलीज होने के बाद मैंने जियो बेबी से बातचीत में पूछा था कि द ग्रेट इंडियन किचन’ बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया? उन्होंने कहा था असल में शादी के बाद मेरे मन में अपनी पत्नी के साथ किचन में काम करने ख्याल आया. तब मैंने अपनी माँ, बहन और बीवी के बारे में सोचा. मेरे लिए किचन एक जेल की तरह रहा. फिर मुझे अपनी स्वतंत्रता का अहसास हुआ. साथ ही मेरे मन में सवाल उठे कि हम तो पुरुष हैं, लेकिन स्त्रियों की आजादी का क्या? मैंने निश्चय किया कि किचन जो स्त्रियों के लिए एक बेड़ी है उसे लेकर मुझे फिल्म बनानी है.

हालिया मलयालम न्यू वेब एक परंपरा का विकास है, जिसके जड़े गहरी है. उल्लेखनीय है कि के जी जार्ज की ‘अदामिंते वारियेल्लू’ का प्रभाव द ग्रेट इंडियन किचन पर दिखाई देता है. लेखक ने 1970 के दशक के न्यू वेब से जुड़े प्रमुख फिल्मकारों अडूर गोपालकृष्णन, जी अरविंदन, जॉन अब्राहम, शाजी करुण का उल्लेख किया है. इस क्रम में अडूर के साथ एक लंबी बातचीत भी किताब में शामिल है.

उल्लेखनीय है कि अडूर की फिल्म स्वयंवरम’ (1972) से मलयालम सिनेमा में समांतर सिनेमा की धारा की शुरुआत मानी जाती है. इस फिल्म के बारे में टिप्पणी करते हुए फिल्म समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता (सीइंग इज विलिविंग: 248)  ने लिखा है- “स्वंयवरम में जो नवाचार के दर्शन हुए उसने केरला और उसके सिनेमा जगत को चकित कर दिया था.” इस फिल्म में मनोरंजन प्रधान व्यावसायिक सिनेमा के फार्मूले को धता बताते हुए कोई नाच-गाना नहीं था. पूरी फिल्म को वास्तविक लोकेशन पर ही शूट किया गया था. यह फिल्म दो युवा प्रेमी विश्वनाथ और सीता के माध्यम से समाज और व्यक्ति के बीच संघर्ष और स्वाधीनता के सवाल को चित्रित करती है. इसे फिल्म को ऑपरेटिव, चित्रलेखा ने प्रोड्यूस किया था. किताब में प्रवीण ने चित्रलेखा फिल्म सोसाइटी (जिसके निर्माण में एफटीआईआई से निकले युवा फिल्मकारों का भूमिका रही) के माध्यम से केरल में सिनेमाई संस्कृति के निर्माण को अलग से रेखांकित किया है. लेखक ने अडूर के हवाले से लिखा है कि हमने तीन सूत्री योजना बनाई जिसके तहत केरल में फिल्म सोसाइटी आंदोलन  को शुरू करने, सिनेमा पर उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित करने और गुणवत्ता से संपन्न फिल्मों का निर्माण शामिल था.

यहां पर यह नोट करना उचित होगा कि अडूर ने अपने पूरे फिल्मी करियर के दौरान कमर्शियल फिल्मों के दायरे से बाहर रहे. सिनेमा निर्माण के व्यावसायिक दायरे से बाहर रहने के कारण उन्होंने पूरे करियर में महज बारह फिल्में ही निर्देशित किया है. गौरतलब है कि अडूर विषय-वस्तु के लिहाज से किसी फिल्म में खुद को दोहराया नहीं. उनकी फिल्मी यात्रा को देखने पर यह स्पष्ट है. जहाँ ‘एलिप्पथाएम’ में आजादी के बाद के सामंती समाज और घुटन का चित्रण है वहीं ‘मुखामुखम’ में एक मार्क्सवादी राजनीतिक कार्यकर्ता फिल्म के केंद्र में है. ‘अनंतरम’ में एक फिल्मकार की रचना प्रक्रिया से हम रू-ब-रू होते हैं, जहां यथार्थ और कल्पना में सहज आवाजाही है. यहाँ रचनाकार के सामने शाश्वत सवाल है कि हम रचें कैसे? वहीं ‘मतिलुकल’ में ‘स्वयंवरम’ की तरह स्वतंत्रता एवँ मुक्ति का प्रश्न प्रमुखता से उभरा है, हालांकि फिल्म निर्माण की दृष्टि से अनंतरम के करीब है. ‘कथापुरुषन’ में आत्मकथात्मक स्वर है, इस फिल्म में सामंती हदबंदियों को तोड़ा गया है. फिल्म की शूटिंग भी उन्होंने अपने पुश्तैनी घर में ही की. अडूर का सिनेमा आजादी के बाद परंपरा और आधुनिकता के कशमकश को, केरल की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को, बदलती हुई राजनीति के परिप्रेक्ष्य में निरूपित करता है. यहां विभिन्न स्तरों पर विस्थापन और अस्मिता की खोज मौजूद है.

इस किताब को प्रवीण ने विभिन्न निर्देशकों, सिनेमेटोग्राफरों और सिने जगत से जुड़े अन्य लेखक-कलाकारों से बातचीत के बाद तैयार की है. किताब के बीच-बीच में लंबे इंटरव्यू दिए गए हैं जो कई बार पाठकों के लिए पढ़ने के प्रवाह के दौरान बाधा बन कर आता है. साथ ही किताब में रेफरेंस लिस्टका न होना खटकता है.

चूंकि किताब का लेखक एक पत्रकार है इस लिहाज से इसमें हाल में मलयालम सिनेमा जगत में स्त्री कलाकारों के शोषण, भेदभाव पर जो बहस हुई उस पर टिपप्णी भी शामिल है. वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव (डब्लूसीसी) के दखल से बनी जस्टिस हेमा कमिटी के रिपोर्ट की विस्तार से चर्चा है.

फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के स्नातक, अन्नायूम रसूलम (2013) फिल्म से चर्चा में आए राजीव रवि (गैंग्स ऑफ वासेपुर के सिनेमैटोग्राफर) पुणे के दिनों को याद करते हुए एक जगह कहते हैं कि ऋत्विक घटक की मेघे ढाका तारा के आखिरी हिस्से को वे खूब देखते थे. रोने के लिए वे इसे देखा करते थे! प्रसंगवश, अडूर भी बातचीत में मेघे ढाका तारा को खूब शिद्दत से याद करते हैं. फिल्म संस्थान में घटक उनके गुरु रहे. मलयालम सिनेमा के प्रगतिशील इतिहास के निर्माण में फिल्म संस्थान पुणे की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

मलयालम सिनेमा की शुरुआत वर्ष 1930 में बनी विगाथाकुमारन फिल्म से होती है जिसे जे सी डेनियल ने निर्देशित किया था. करीब सौ साल के इतिहास की यात्रा को लेखक ने इस किताब में समेटा है. शैली कहानी कहने की है. पर यहां विश्लेषण और आलोचनात्मक दृष्टि का अभाव है.

अंत में, मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल को पिछले दिनों सिनेमा में योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, वहीं ममूटी को पद्म भूषण दिया गया. जब मैंने जियो बेबी से मोहन लाल के अवदान के बार में पूछा तब उनका कहना था, ‘यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मैं मोहनलाल के अभिनय करियर के दौरान जीवित हूँ.  उनके कुछ अभिनय, उनकी हंसी, और सिनेमा से बाहर की गई कुछ बातें—इन सबने मुझे एक निर्देशक और इंसान के रूप में गहराई से प्रभावित किया है. मोहनलाल एक चमत्कार हैं—ऐसा चमत्कार जो कभी-कभी ही होता है.’ वहीं ममूटी के अभिनय की विशेषता यह है कि फिल्मी दुनिया के दोनों पाटों-देसी और मार्गी, उन्होंने एक साथ साधा है. एक तरफ व्यावसायिक सिनेमा में स्टार की हैसियत से उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, वहीं दूसरी तरफ सधे, भाव-पूर्ण अभिनय से उन्होंने कला फिल्मों में अपनी काबिलियत को साबित किया. ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘महायानम’ और ‘किंग’ जैसी फिल्मों के साथ ‘मेला’, ‘यवनिका’, ‘अनंतरम’, ‘विधेयन’ और ‘मतिलुकल’ जैसी कलात्मक फिल्में भी उनके खाते में है. यहां नोट करना उचित होगा कि प्रयोग करने, नए निर्देशकों के साथ काम करने में उन्हें गुरेज नहीं है. किताब में संक्षेप में मलयालम सिनेमा के इन प्रसिद्ध कलाकारों के बार में भी जानकारी दी गई है.

(समालोचन के लिए)

Sunday, October 26, 2025

एक मुकम्मल हास्य अभिनेता थे असरानी (1941-2025)

कभी-कभी किसी कलाकार या रचनाकार के व्यक्तित्व पर उनकी कोई एक कृति इतनी हावी हो जाती है कि सारा मूल्यांकन उसी के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाता है. मशहूर अभिनेता असरानी के साथ यही हुआ. जयपुर में जन्मे असरानी ने अपने पचास साल के करियर में 350 से ज्यादा फिल्में की और विभिन्न तरह के किरदार निभाए पर शोले के जेलर’ का किरदार उनसे जीवनपर्यंत चिपका रहा. वे आम लोगों की निगाह में अंग्रेजों के जमाने के जेलर रहे.  पर क्या उसी दौर में बनी फिल्में मसलन,  अभिमान, चुपके-चुपके, छोटी सी बात,  बावर्ची, नमक हराम आदि में उनके किरदारों को भुलाया जा सकता है?

उनके निधन के बाद भी मुख्यधारा और सोशल मीडिया में शोले फिल्म की यही क्लिप वायरल रही. पिछले दिनों शोले फिल्म के पचास साल पूरे होने पर जब उन्होंने मीडिया से बातचीत की तो उन्होंने इस बात की रेखांकित किया वे पुणे फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के एक प्रशिक्षित अभिनेता रहे. जयपुर से स्नातक की परीक्षा पास कर उन्होंने पिछली सदी के साठ के शुरुआत वर्ष में एक्टिंग का प्रशिक्षण लिया था. इससे पहले से वे ऑल इंडिया रेडियो में बतौर वॉइस आर्टिस्ट से रूप से जुड़े थे.

बीबीसी से पिछले दिनों हुई बातचीत में उन्होंने कहा था कि फ़िल्म इंस्टीट्यूट पहुंचने के बाद पता चला कि एक्टिंग के पीछे मेथड होते हैं. ये प्रोफ़ेशन किसी साइंस की तरह है. आपको लैब में जाना पड़ेगाएक्सपेरिमेंट्स करने पड़ेंगे." मशहूर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी साथ उनकी जोड़ी चर्चित रही और उन्होंने से उन्हें एक्टिंग में प्रशिक्षण लेने की सलाह दी थी. मुखर्जी की मध्यमार्गी फिल्मों ने असरानी को चरित्र अभिनेता के रूप में उभरने का मौका दिया. मध्यवर्ग को संबोधित करती ये फिल्में पचास वर्ष बाद भी विभिन्न उम्र से दर्शकों का मनोरंजन करती है.

उन्होंने कहा था कि उन्हें समझ आया कि एक्टिंग में आउटर मेक-अप के अलावा इनर मेक-अप भी बहुत ज़रूरी है.

असरानी हास्य अभिनेता के रूप में उभरे और अपनी छोटी-छोटी भूमिकाओं में जान डाल दी. यहाँ पर बावर्ची फिल्म में बाबू के उनके किरदार को याद करना रोचक है. वह संगीत प्रेमी है हिंदी फिल्मों में संगीत देना चाहता है. वह विदेशी संगीतकारों के खजाने को सुनता रहता है ताकि उसे प्रेऱणा मिलती रह!  यह उस दौर के नकलची फिल्म संगीतकारों पर एक टिप्पणी भी है.

उनकी कॉमिक टाइमिंग जबरदस्त थी. उनके हास्य-बोध में फूहड़ता नहीं दिखती बल्कि एक गहरे मानवीय दृष्टि से यह संचालित रही. आज की ताज़ा खबरके लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट कॉमेडियन अवॉर्ड था मिला थासहजता उनकी अदाकारी का हिस्सा रही.एक कुशल अभिनेता के साथ ही उन्होंने कुछ हिंदी और गुजराती फिल्मों का निर्देशन भी किया था.

जयपुर से शुरू हुई उनकी जीवन यात्रा मुंबई जाकर खत्म हुई, पर इस यात्रा में उन्होंने जो किरदार निभाए वह लोगों की यादों का हिस्सा बन गए. आज जब समाज और राजनीति में हास्यबोध कम हो रहा है, उनकी जरूरत ज्यादा महसूस की जा रही है. उनका हास्य सिर्फ हंसाने के लिए नहीं था. गहरे जा वह व्यंग्य की शक्ल अख्तियार कर लेता था जो हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति पर एक टिप्पणी होती थी.

Sunday, September 28, 2025

एक संपूर्ण अभिनेता मोहनलाल


मलयालम सिनेमा के चर्चित फिल्म निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन के बाद मोहनलाल को सिनेमा में योगदान के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

अरुंधती राय ने अपनी किताब मदर मेरी कम्स टू मी में सत्तर के दशक में तमिल और मलयालम फिल्मों का जिक्र करते हुए एक जगह लिखा है जहाँ तमिल फिल्में मायावी दुनिया की तरफ ले जाती थी, वहीं मलयालम फिल्मों का भाव बोध यथार्थ से जुड़ा होता था. 

मोहनलाल की विशेषता है कि वे 'समांतर और मुख्यधारा’ के बीच कुशलता से आवाजाही करते रहे हैं, उनकी स्वीकृति भी दोनों जगह रही है.  मोहनलाल की सिनेमाई यात्रा 1980 में आई फिल्म मंजिल विरिंज पूक्कल’ से शुरू हुई जहां वे विलेन के रूप में नजर आए. जब मैंने मलायलम के चर्चित युवा फिल्मकार जियो बेबी से बात की  तो उनका कहना थायह मेरे लिए सम्मान की बात है कि मैं मोहनलाल के अभिनय करियर के दौरान जीवित हूँ.  उनके कुछ अभिनयउनकी हंसीऔर सिनेमा से बाहर की गई कुछ बातें—इन सबने मुझे एक निर्देशक और इंसान के रूप में गहराई से प्रभावित किया हैमोहनलाल एक चमत्कार हैं—ऐसा चमत्कार जो कभी-कभी ही होता है.’

पिछले चार दशक से वे मलयालम सिनेमा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और तीन सौ से ज्यादा फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया है. मोहनलाल की तुलना मलयालम फिल्मों के ही सफल अभिनेता ममूटी से की जा सकती है जिनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रही हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी हुई.

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फिल्म किरिदम’ (1989) में एक सामान्य जिंदगी जी रहे युवा के किरदार को उन्होंने निभाया है, जिसकी ख्वाहिश सब इंस्पेक्टर बनने की है पर वह सामाजिक कुचक्र में फंसता चला जाता है जहाँ हिंसा का साम्राज्य है. मोहनलाल ने यथार्थपरक शैली में बिना किसी मेलोड्रामा के खूबसूरती से इस ट्रैजिक किरदार को अंगीकार किया है. इसी तरह शाजी करुण की पुरस्कृत फिल्म वानप्रस्थम (1999) में एक तिस्कृत बालक और पिता के रूप में मोहनलाल (कुंजिकुट्टन) ने जिस सहजता और मार्मिकता से किरदार को निभाया है वह सबके बस की बात नहीं थी. एक कलाकार की त्रासदी हमें मंथती रहती है.

यह फिल्म कथकली के एक कलाकार के बहाने आजाद भारत में कलाकारों की सामाजिक-आर्थिक स्थितिसामाजिक (अ)स्वीकृतितथाकथित निम्न जाति और उच्च जाति के बीच प्रेमयथार्थ और मिथक के सवालों को घेरे में लेती है.

सिनेमा के साथ ही उन्होंने रंगमंच पर भी अपनी प्रतिभा के जादू से लोगों को सम्मोहित किया है. वर्ष 2001 में दिल्ली में हुए कर्णभरम (के एन पणिक्कर) नाटक की चर्चा लोग आज भी करते हैं.  पिछले दिनों रोमांटिक कॉमेडी हृदयपूरवम में वे नज़र आए. जबकि इरुवरकालापानी, दृश्यम जैसी फिल्मों ने उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित किया. मोहनलाल एक संपूर्ण अभिनेता हैं, जिनके अभिनय के कई रंग रहे हैं. करुण, हास्य, रौद्र सब तरह के भाव इसमें समाहित हैं. मलयालम के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी उन्होंने अभिनय किया है, पर यह हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य है कि उनकी प्रतिभा का वह समुचित इस्तेमाल अभी तक नहीं कर पाया है.

Sunday, May 11, 2025

करुणा के चितेरे शाजी करुण


कुछ वर्ष पहले कन्नड़ सिनेमा के निर्देशक और समांतर सिनेमा के चर्चित फिल्मकार गिरीश कासारवल्ली से जब मैंने कान फिल्म समारोह में दिखाए जाने वाली फिल्मों के बाबत सवाल पूछा तब उन्होंने ‘पिरवी (द बर्थ 1989)’ फिल्म का नाम लिया था.


इस फिल्म के निर्देशक शाजी एन करुण (1952-2025) हैं, जिनका पिछले दिनों निधन हो गया. पुणे के फिल्म संस्थान से प्रशिक्षित करुण की फिल्मी यात्रा एक सिनेमैटोग्राफर के रूप में शुरू हुई और जी अरविंदन के वे प्रमुख सहयोगी रहे. उल्लेखनीय है कि मलयालम न्यू वेब फिल्मकारों में अडूर गोपालकृष्णन, जी अरविंदन, के जी जॉर्ज प्रमुख फिल्मकार रहे हैं.

समातंर सिनेमा के लिए 70 और 80 का दशक काफी मुफीद रहा था, जिसने विभिन्न भारतीय भाषाओं में हमें उत्कृष्ट फिल्में दिया. 80 के दशक के बाद यह धारा हालांकि कमजोर पड़ गई, पर कुछ फिल्मकारों की सिनेमा को एक कला माध्यम के रूप मे देखने-परखने की प्रतिबद्धता में कमी नहीं आई.

‘पिरवी’ फिल्म के साथ शाजी करुण ने एक निर्देशक के रूप में समांतर धारा के मलयालम चित्रपट पर सशक्त हस्तक्षेप किया था. पिछली सदी में आपातकाल के दौरान एक बेटे के कॉलेज हॉस्टल से लापता होने और एक पिता की अंतहीन प्रतीक्षा को जिस कलात्मक संवेदनशीलता से उन्होंने परदे पर चित्रित किया है वह मार्मिक है. केरल का मानसून इस फिल्म में मानो एक पिता (प्रेमजी) की वेदना का रूपक है. इस फिल्म को कई पुरस्कार मिले और कान समारोह के दौरान ‘कैमरा द ओर’ में फिल्म की खास तौर पर सराहना हुई थी. बिना किसी शोर के यह फिल्म मानवीय दुख और संत्रास को हमारे सामने लाती है और राजनीतिक-ऐतिहासिक विफलता को पूरी शिद्दत से रेखांकित करती है. पिता के किरदार में प्रेमजी की भावपूर्ण और ढूंढती आँखें फिल्म देखने वालों को देर तक कचोटती है.

पूरे करियर में हालांकि करुण ने बहुत कम फिल्में ही निर्देशित की, लेकिन ये फिल्में उन्हें विश्व सिनेमा के मंजे निर्देशकों की श्रेणी ला कर खड़ा करती हैं. कान फिल्म समारोह में उनकी दो अन्य फिल्में ‘सोहम (1994)’ और ‘वानप्रस्थम (1999)’ भी दिखाई गई थीं. प्रसंगवश, उनकी फिल्मोग्राफी में हिंदी में बनी ‘निषाद (2002)’ भी शामिल है.

स्थानीय भाषा और संस्कृति की भूमि पर खड़ी होकर उनकी फिल्में सही मायनों में भूमंडलीय है. बहरहाल, यहाँ पर हम अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित एक अन्य फिल्म ‘वानप्रस्थम’ की चर्चा करते हैं. यह फिल्म कथकली के एक कलाकार कुंजिकुट्टन के बहाने आजाद भारत में कलाकारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सामाजिक (अ)स्वीकृति, तथाकथित निम्न जाति और उच्च जाति के बीच प्रेम, यथार्थ और मिथक के बीच कुशलता से आवाजाही करती है.

इस फिल्म का मुख्य स्वर करुणा है. एक तिस्कृत बालक और पिता के रूप में मोहन लाल (कुंजिकुट्टन) ने जिस सहजता और मार्मिकता से किरदार को निभाया है वह सबके बस की बात नहीं थी. एक कलाकार की त्रासदी हमें मंथती रहती है. करुण की फिल्मों का कथा-वृत्तांत जहाँ बांध कर रखता है वही, ध्वनि, कैमरा, संपादन और संगीत अलग से उल्लेखनीय है. करुण की फिल्में विश्व सिनेमा की धरोहर है, तो इसका कारण यही है. 

Saturday, November 09, 2024

इंटरव्यू: ‘मुझे ऐसा सिनेमा पसंद है जो सोचने पर मजबूर कर दे’

 मूर्धन्य कलाकार मोहन अगाशे की शख्सियत के कई पहलू हैं। एक अभिनेता के बतौर उन्होंने समानांतर सिनेमा के कई प्रतिष्ठित निर्देशकों के साथ काम किया। घासीराम कोतवाल (1972) नाटक में अपनी भूमिका के लिए वे खास तौर से जाने जाते हैं। वे मनोचिकित्सक भी हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर उन्होंने कई फिल्में बनाई हैं। वे भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान (एफटीआइआइ) के निदेशक भी रह चुके हैं। उनके जीवन और काम के बारे में हाल ही में अरविंद दास ने उनसे बातचीत की। संपादित अंशः

 आपकी रंगमंचीय यात्रा से बात शुरू करते हैं। रंगमंच पर अभिनय का अपना पहला अनुभव आपको याद है?

मेरे लिए अभिनय बच्चों के खेल जैसा था। जैसे हम सभी तीन, चार या पांच साल की उम्र में कुछ हरकतें करते हैं। जैसे, हम सब नकल मारते हैं, चाहे शिक्षकों की नकल हो, पिता की हो या किसी और की। यह सम्प्रेेषण का एक माध्यम होता है। बेशक यह पेशेवर नहीं होता। अभिनय मेरे स्वभाव में है। खुद के और दुनिया के बारे में जानने का यह एक कुदरती तरीका है। जिस स्कूल में मैं पढ़ा वहां कुछ शिक्षक नाटक करने में अच्‍छे थे। मैं भी खुशकिस्मत रहा क्योंकि उसी दौरान सई परांजपे और अरुण जोगलेकर ने पुणे में बाल रंगमंच की शुरुआत की थी। वे पुणे आकाशवाणी पर हर रविवार प्रसारित होने वाले बालोद्यान नाम के एक कार्यक्रम के लिए बच्चे तलाश रहे थे। यह पचास के दशक के अंत और साठ के दशक के आरंभ की बात है। उससे पहले मैंने रवींद्रनाथ ठाकुर की जन्मशती पर डाकघर नाम के एक नाटक में एक बीमार बच्चे अमल का किरदार निभाया था। दुनिया से उसका संवाद का माध्यम केवल एक खिड़की थी, जहां खड़ा होकर वह दोस्त बनाता था।

डाकघर आकाशवाणी के लिए था?

नहीं, वह तो पुणे में सार्वजनिक मंचन के लिए था। मैं ‘महाराष्ट्र कालोपासक’ नाम की एक रंगमंडली से जुड़ा हुआ था। यह उसका नाटक था। महाराष्ट्र में छोटे-छोटे रंगमंडलों की मजबूत परंपरा रही है। जैसे, विजय मेहता ने ‘रंगायन’ नाम की मंडली से शुरुआत की थी। सत्यदेव दुबे का भी एक थिएटर यूनिट था। भालबा केलकर का ‘प्रोग्रेसिव ड्रामैटिक एसोसिएशन’ था। उस समय मैं अपनी रंगमंडली के अलावा रविवार को बालोद्यान में भी जाता था। उसमें गोपीनाथ तलवार, सई परांजपे और नेमिनाथ नाम के एक और सज्जन थे। मैंने सई के नाटक निरुपमा आणि परिरानी में अभिनय किया था। बाद में उस पर एक फिल्म भी बनी थी। विनय काले ने सई की स्क्रिप्ट पर 1961 में फिल्म बनाई, जिसमें मैंने पिनोकियो का रोल किया। वह मेरी पहली फिल्म थी।

मोहन अगाशे

मतलब आप पहले अभिनेता बने, फिर डॉक्टर और फिर एफटीआइआइ निदेशक?

अभिनेता बनने वाला कोई भी व्यक्ति शुरुआत बचपन से ही करता है। हो सकता है कि वह रंगमंच पर न हो और अपने घर में ही अभिनय कर रहा हो।

आप जुलाई 1947 में जन्मे थे, यानी आजाद भारत। अपनी जिंदगी और भारत के जीवन की यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

आजकल हर चीज को बौद्धिकता में लपेटने का चलन बन चुका है। मेडिकल कॉलेज पहुंचने तक मैं विश्लेषण नहीं करता था, बस काम करता था। मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो बहुत बौद्धिक होते हैं। मुझे लगता है जिंदगी को जब आप पीछे मुड़कर देखने लग जाते हैं तो वह बूढ़े होने का पहला लक्षण होता है।  

मेडिकल की पढ़ाई के साथ रंगमंच को आपने कैसे साधे रखा?

स्कूल की पढ़ाई के बाद प्री-मेडिकल तक मैंने अभिनय जारी रखा। मेडिकल कॉलेज के पहले साल में मेरी मुलाकात रंगमंच की प्रसिद्ध हस्ती जब्बार पटेल से हुई। फिर पढ़ाई की तरह रंगमंच भी मेरे लिए एक गंभीर काम बन गया। अपने पूरे मेडिकल करियर के दौरान मैंने अभि‍नय किया, यहां तक कि छोटे से रंगमंडल ‘प्रोग्रेसिव ड्रामैटिक एसोसिएशन’ में जुड़ गया। मनोचिकित्सा और रंगमंच/सिनेमा मेरी जिंदगी की दो समांतर धाराएं रही हैं।

श्याम बेनेगल की निशांत (1975) के साथ समानांतर सिनेमा में आपकी शुरुआत कैसे हुई?

उन्होंने घासीराम कोतवाल में मेरा काम देखा था। मैंने नाना का किरदार निभाया था। मैंने 1972 से 1992 तक बीस साल यह किरदार निभाया। घासीराम मेरे लिए अभिनय का स्कूल जैसा था। इसी के सहारे मैं देश भर में और विदेश गया। मेरी दुनिया का विस्तार हुआ। 1975 तक तो यह नाटक भारतीय रंगमंच में मील का पत्थर बन चुका था। इसे 20 से ज्यादा रंग महोत्सवों में आमंत्रित किया जा चुका था और हमने 12 रंग महोत्सवों में कुल 61 प्रदर्शन किए। फिल्म या रंगमंच के क्षेत्र में शायद कोई नहीं होगा जिसने घासीराम न देखा हो।

हाल ही में मैंने सिनेमाघर में मंथन (1976) देखी, जब उसका रिस्टोर्ड संस्करण रिलीज हुआ था। इस फिल्म में आपको डॉक्टर के किरदार में देखकर मैं चौंक गया था।

बेनेगल के साथ समानांतर सिनेमा में मेरी शुरुआत हुई। फिर मैं उसका हिस्सा बन गया। मनोचिकित्सा से प्रेम के चलते मैं मुंबई नहीं गया। मैं साल में एकाध फिल्म ही करता था। मैंने गोविंद निहलानी, जब्बार पटेल, गौतम घोष की फिल्मों और सत्यजित रे की सद्गति (1981) में काम किया। यह इत्तेफाक ही था कि प्रेमचंद की कहानी सद्गति में ब्राह्मण का नाम घासीराम था। हो सकता है कहानी पढ़ते वक्त‍ उनके दिमाग में घासीराम का मेरा किरदार रहा हो।

सत्यजित रे के साथ संबंध कैसा था?

वे महान थे, इस पर मैं किसी से बहस नहीं करना चाहूंगा। सद्गति केवल 52 मिनट की फिल्म है, लेकिन उसमें काम करते हुए मुझे समझ आया कि सत्यजित रे क्या हैं और वे जो हैं, तो क्यों हैं। वे दूसरों से मीलों आगे क्यों हैं। फिल्म संस्था‍न में कई लोग होंगे जो रे को महान नहीं मानते थे। वे मणि कौल को महान मानते हैं। यह उनकी सीमित सोच है। मैंने मणि की फिल्म‍ घासीराम कोतवाल (1976) में भी काम किया है। वह फिल्म तीन दिन भी नहीं चली थी। ऐसे फिल्मकार इस बात की चिंता नहीं करते थे कि लोग उनकी फिल्मों को पसंद करेंगे या नहीं। मणि या कुमार शाहनी की फिल्मों के किरदार मनुष्यों की तरह बात नहीं करते, किसी सामान की तरह बात करते हैं।

लेकिन मणि कौल की आषाढ़ का एक दिन (1971) और दुविधा (1973) की तो बहुत सराहना हुई थी?

आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश के नाटक पर आधारित है। मणि ने तो बस उनके लिखे को दृश्य-श्रव्य माध्यम में रूपांतरित कर दिया था। इसलिए लेखक को भी उसका काफी श्रेय जाता है। दुविधा मुझे अच्छी लगी थी। मणि जैसी फिल्में बनाना चाहते थे, वैसी बनाते थे। उन्हें किसी और चीज से कोई मतलब नहीं था। घासीराम कोतवाल में उन्होंने नाटक के आधार पर विजय तेंडुलकर से पटकथा लिखवाई थी। वह नाटक से एकदम अलहदा थी। उसमें बस नाटक के अंश इस्तेमाल किए गए थे। उसका आपको कोई अर्थ समझ आए, तो मुझे ईमानदारी से बताइएगा। डॉ. (श्रीराम) लागू ने उसके बारे में एक बार कहा था, ‘‘मैंने जीवन में नहीं सोचा था कि कभी कोई मराठी फिल्म मुझे समझ नहीं आएगी। घासीराम ऐसी फिल्म है, जो मुझे समझ ही नहीं आई।’’                    

आपने प्रकाश झा की फिल्मों में भी काम किया है। उसका अनुभव कैसा था?

उन्होंने सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्में बनाई हैं। बिहार की पृष्ठभूमि पर उन्होंने तीन फिल्में बनाईं, मृत्युदंड (1997), गंगाजल (2003) और अपहरण (2005)। ये सब फिल्में वर्तमान हालात से जुड़ती हैं। इसलिए मुझे काम करने में मजा आया। आपको पता है कि उनकी राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली फिल्म दामुल (1985) को किसी ने पूछा तक नहीं था। उस फिल्म को दर्शक तक नसीब नहीं हुए थे। उसे किसी ने देखा भी नहीं था। तब प्रकाश झा हताश होकर बिहार लौट गए थे, लेकिन जब वे वापस आए तब उन्होंने संकल्प लिया कि मैं अब अपनी कहानी बॉलीवुड की भाषा में कहूंगा। पिछली गलती से उन्होंने सबक सीखा, फिर दोबारा लौट कर मृत्युदंड बनाई। 

आपने मुख्यधारा की बॉलीवुड फिल्मों  में भी काम किया, जैसे त्रिमूर्ति (1995), रंग दे बसंती (2005)?

मैं फिल्मों में फर्क नहीं बरतता। मैं बस इतना जानता हूं कि एक समानांतर सिनेमा होता है और दूसरा लोकप्रिय सिनेमा। मैं ऐसे सिनेमा का आदमी हूं जो मनोरंजन के पार जाता हो। हाल ही में मैंने लापता लेडीज (2024) देखी। इसके बाद बधाई हो (2019) देखी। दोनों ही बेहतरीन फिल्में हैं। अब तो बाहुबली (2015) जैसी फिल्मों का बॉलीवुड में जलवा हो रहा है।  

ओटीटी के उभार को आप कैसे देख रहे हैं, जहां फिल्मकारों की नई फसल आ रही है?

एक मायने में ओटीटी अच्छा है, लेकिन शुरू में जब वह आया था, तो केवल प्रतिभाशाली फिल्मकारों की फिल्में ही खरीदता था। या उनसे ही फिल्में बनवाता था। अब उसने अपना कंटेंट बनाना बंद कर दिया है। इसलिए फिल्मकार यहां अब अपने मन के हिसाब से फिल्में नहीं बना पा रहे हैं।

मराठी सिनेमा में आपने देवराय (2004), अस्तु (2013), कासव (2017) में काम किया है। ये सब फिल्में मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित हैं। इनके बारे में कुछ बता सकते हैं?

इन फिल्मों में मैंने केवल काम ही नहीं किया था बल्कि इन फिल्मों का निर्माण भी किया था। मैं निजी तौर पर ऐसा सिनेमा पसंद करता हूं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दे। मैं ऐसे ही सिनेमा का मुरीद हूं। यदि फिल्में सोचने पर मजबूर न कर पाएं, तो फिर उनके होने का फायदा ही क्या। ये फिल्में सुमित्रा भावे बनाई थीं। वे फिल्मकार नहीं थीं, वे समाज वैज्ञानिक थीं। उन्हें जब समझ आया कि किताबों से ज्यादा ताकवर माध्यम सिनेमा है, तो उन्होंने फिल्म बनाना सीखा। वे ऐसी फिल्में बनाती थीं, जो किसी भी दर्शक को सोचने पर मजबूर कर दे। सुमित्रा भावे, डेविड धवन या सुभाष घई जैसी फिल्में नहीं बनाती थीं। यही वजह थी कि मैंने सोचा इन फिल्मों के माध्यम से मैं आम आबादी और स्वास्थ्य विज्ञानियों तक मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता फैला सकूंगा। मानसिक बीमारी, मनोचिकित्सा जैसी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता है। ऐसे विषयों का लोकप्रिय फिल्मों में मजाक बनाया जाता है। इस विषय पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि एक फिल्म आई थी तारे जमीं पर (2007), यह हर मायने में बहुत अलग फिल्म थी।    

पुणे शहर ने आपकी रचनात्मक यात्रा को कैसे प्रभावित किया है?

मैं पुणे में रहता हूं और मेरे लिए आज का पुणे वही पुणे है, जो मेरे बचपन में होता था। बाकी किसी भी तरह के पुणे को मैं न मानता हूं न जानता हूं। विस्तार ले रहा, मॉडर्न हो रहा पुणे मेरे पुणे का सांस्कृतिक हिस्सा नहीं है। यहां मैं 74 साल से ज्यादा समय से रह रहा हूं। अब यह महानगर बन चुका है। आप यहां अब मराठी बोलेंगे तो लोग आपको हैरत से देखेंगे। पुणे की पहचान जा चुकी है। एक बार मैं पुणे का मृत्यु प्रमाण पत्र मांगने के लिए नगर निगम के दफ्तर चला गया था।

(अरविंद दास डीवाय पाटील इंटरनेशनल युनिवर्सिटी, पुणे में स्कूल ऑफ मीडिया ऐंड जर्नलिज्म के निदेशक और प्रोफेसर हैं) (आउटलुक 11 नवंबर 2024 अंक में प्रकाशित)