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Wednesday, September 16, 2020

हाशिए पर सरोकार: टीवी वायरस

करीब अठारह साल पहले जब मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, तब कहा जा रहा था कि टेलीविजन मीडिया अभी शैशव अवस्था में है. यह संक्रमण काल है और कुछ वर्षों में ठीक हो जाएगा. लेकिन पिछले कई सालों की प्रवृत्ति पर गौर करें तो यही लगता है कि यह संक्रमण फैलता ही गया. पहले मुख्य रूप से हिंदी के समाचार चैनल इससे ग्रसित थे, अब अंग्रेजी के चैनलों में भी वायरस का प्रकोप बढ़ गया दिखता है. अंग्रेजी और हिंदी के चैनल एक खंडित लोकका निर्माण करते रहे हैं. उनके दर्शक वर्ग भी अलग रहे हैं. पर अब यह विभाजक रेखा तेजी से मिटती हुई दिख रही है.

लेकिन अखबारों की दुनिया में अब भी कई बार ऐसा कुछ दिख जाता है, जिससे सीमित  पैमाने पर ही सही कुछ बचे होने की उम्मीद हो जाती है.

पिछले दिनों एक अखबार ने अपने मुख्य पृष्ठ पर एक तस्वीर प्रकाशित किया और शीर्षक दिया- टीवायरस. यह तस्वीर टेलीविजन समाचार चैनलों के हाल के उस रवैये पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है, जिस पर काफी सवाल उठे है. इसके अलावा भी सरोकार के बचे होने के उदाहरण देखे गए और पत्रकारिता की दुनिया के भीतर से टीवी मीडिया के इस चेहरे,लोगों की निजता में जबरन घुसने की कोशिश पर चिंता जाहिर की गई. 

दरअसल, यह ‘वायरसजब से न्यूज चैनलों ने चौबीस घंटे का प्रसारण शुरु किया तब से मौजूद है और अभी तक इसका कोई इलाजउपलब्ध नहीं है. हालांकि दर्शकों में अब तक इसका सामना करने की सलाहियत विकसित हो जानी चाहिए थी (हर्ड इम्यूनिटी’)! गौरतलब है कि भारत में उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप पिछले दो दशक में निजी टेलीविजन समाचार चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ है, पर संवाद एकतरफा ही रहे. कह सकते हैं कि सोशल मीडिया या अखबार से इतर यह इस माध्यम की विशेषता है.  

असल में टेलीविजन मीडिया उद्योग में दर्शकों की उपस्थिति, उनकी केंद्रीय भूमिका को लेकर हमारे यहाँ कोई खास शोध नहीं है. कुछ छिटपुट शोध पत्र मौजूद हैं जो दर्शकों को केंद्र में रख टेलीविजन को परखने की कोशिश करता है. पर ये चौबीस घंटे समाचार चैनलों को अपनी जद में नहीं लेता, दूरदर्शन, सीरियलों के इर्द-गिर्द ही है. मीडिया शोध में इस बात का उल्लेख बार-बार होता है कि दर्शक किसी भी संदेश को अपने तयी देखता-परखता है, वह महज एक उपभोक्ता नहीं है. उनके पास संदेश और संवाद को नकारने की भी सहूलियत रहती है.  

मीडिया आलोचक रेमंड विलियम्स ने टेलीविजन माध्यम को तकनीक और विशिष्ट सांस्कृतिक रूप में परखा है.  चूँकि यह एक दृश्य माध्यम है इस लिहाज से टीवी पर प्रसारित होने वाली खबरों से दर्शकों के बीच सहभागिता, घटनास्थल पर होने का बोध होता है.  इन खबरों के साथ विज्ञापन भी लिपटा हुआ दर्शकों तक चला जाता है, जो इन कार्यक्रमों के लागत और चैनलों के मुनाफा का प्रमुख जरिया है. 

उदारीकरण के बाद खुली अर्थव्यस्था में मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम है. उसकी एक स्वायत्त संस्कृति भले हो पर अब वह कारपोरेट जगत का हिस्सा है. जब भी हम मीडिया की कार्यशैली की विवेचना करेंगे तो हमें पूंजीवाद और मीडिया के रिश्तों की भी पड़ताल करनी होगी. निस्संदेह, हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार हुआ है, लेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही टीवी मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है. ऐसे में लोक हित के विषय हाशिए पर ही रहते हैं.

भारत में चौबीसों घंटे चलने वाले इन समाचार चैनलों के प्रति मीडिया विमर्शकारों में दुचित्तापन है. खबरों की पहुँच गाँव-कस्बों तक हुई, एक नेटवर्क विकसित हुआ. इसने भारतीय लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत किया है. वहीं समाचार की एक ऐसी समझ इसने विकसित की जहाँ मनोरंजन पर जोर रहा है. 21वीं सदी का पहला दशक भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के विस्तार का दशक भले रहा है. पर इसके साथ ही इसी दशक में चैनलों की वैधता और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे थे. जैसा कि आज तक न्यूज चैनल के न्यूज डायरेक्टर क़मर वहीद नक़वी ने वर्ष 2007 में लिखा था लोग आलोचना बहुत करते हैं कि न्यूज़ चैनल दिन भर कचरा परोसते रहते हैं, लेकिन सच यह है कि लोग कचरा ही देखना चाहते हैं.' सवाल दर्शकों का भी है, जिस पर हम आम तौर पर चर्चा नहीं करते.

हिंदी समाचार चैनलों की एक प्रमुख प्रवृत्ति स्टूडियो में होने वाले बहस-मुबाहिसा है, जिसका एक सेट पैटर्न है. एंकर और प्रोड्यूसर का ध्यान ऐसे मुद्दों पर बहस करवाना होता है जिससे कि स्टूडियो में एक नाटकीयता का संचार हो. इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होता, बल्कि उनके चित-वृत्तियों के निम्नतम भावों को जागृत करना होता है. 

ऐसे में एंकरों-प्रोड्यूसरों की तलाश उन मुद्दों की तरफ ज्यादा रहती है जिसमें सनसनी का भाव हो. मीडिया आलोचक प्रोफेसर निल पोस्टमैन ने अमेरीकी टेलीविजन के प्रसंग में कहा था कि- सीरियस टेलीविजन अपने आप में विरोधाभास पद है और टेलीविजन सिर्फ एक जबान में लगातार बोलता है-मनोरंजन की जबान.’  यह शायद हमारे समाचार चैनलों के लिए भी सच है.  पोस्टमैन के मुताबिक एक न्यूज शो, सीधे शब्दों में, मनोरंजन का एक प्रारूप है न कि शिक्षा, गहन विवेचन या विरेचन का.

(जनसत्ता, 16.09.2020)

Sunday, October 16, 2016

अंग्रेजी टीवी न्यूज़ चैनल का हिंदीकरण

वर्ष 2001 में भारत के संसद भवन पर हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान सीमा रेखा पर दोनों देशों की सेनाओं का जमावड़ा था और युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. ‘आजतक’ जैसे चैनलों ने युद्ध का समां बाँधने और युयुत्सु मानसिकता तैयार करने में एक बड़ी भूमिका अदा की थी. उसी दौरान (2001-02) हम भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली में पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे थे. हमें तथ्य और सत्य के रिश्ते की बारीकियों को समझाया जा रहा था. सवाल करना, पूछना, कुरेदना, ख़बर की तह तक जाने की सीख दी जा रही थी. असहज तथ्यों को छुपाने की सत्ता की आदत, ख़बर निकालने के गुर, साथ ही सत्ता के साथ एक हाथ की दूरी बरतने की सलाह दी जा रही थी.
उस वक्त आज तक चैनल से जुड़े रहे दीपक चौरसिया व्याख्यान देने आए थे. बातों-बातों में उन्होंने हमसे पूछा कि- ‘आज तक की प्रसिद्धि क्यों इतनी है?’ मैंने कहा- ‘युद्ध हो ना हो, आप टैंक, मोर्टार स्टूडियो में तैनात रखते हैं और यह आम दर्शकों को लुभाता है. दर्शकों के अंदर की हिंसा को उद्वेलित करता है!’ चौरसिया साहब का चेहरा बुझ गया था. मेरे एक मित्र ने एक चिट बढ़ाई- भाई, आपको शायद नौकरी की जरुरत नहीं होगी, हमें है!
उस वक्त हमें लगता था और मीडिया के जानकार कहते थे कि टेलीविजन मीडिया अपने शैशव अवस्था में है. ये संक्रमण काल है, कुछ वर्षों में यह ठीक हो जाएगा. पंद्रह वर्ष बाद ऐसा लगता है कि हिंदी समाचार चैनलों के इस संक्रमण से अंग्रेजी के चैनल भी संक्रमित हो चुके हैं. अर्णव गोस्वामी और ‘टाइम्स नॉउ’ इसके अगुआ है. और इस बीच अर्णव के कई ‘क्लोन’ तैयार हो चुके हैं.
भारतीय भाषाई मीडिया पर राष्ट्रवादी भावनाओं को बेवजह उभारने का आरोप हमेशा लगता रहा है, जो एक हद तक सच भी है. पर मोदी सरकार के आने के बाद, ‘न्यूज नैशनलिज्म’ के इस दौर में, अंग्रेजी पत्रकारिता खास तौर से खबरिया चैनलों की भाषा और उनके तेवर देख कर लगता है कि अब सामग्री के उत्पादन और प्रसारण के स्तर पर ‘अंग्रेजी और वर्नाक्यूलर’ के बीच विभाजक रेखा मिट गई है. यह अंग्रेजी चैनलों का ‘हिंदीकरण’ है.
ऐसा नहीं है कि सत्ता या बाजार के दबाव मे खबरें अखबारों ना चैनलों से पहले नहीं गिराई जाती थी, पर हाल में जिस तरह से एनडीटीवी ने लचर तर्क देकर पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम के इंटरव्यू को प्रोमो दिखाने के बाद रोका है, वह स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है. गौरतलब है कि हमारी पीढ़ी हज़ार कमियों के बावजूद भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता में एनडीटीवी को एक मानक के रूप में देखते बड़ी हुई है. एक-दो अपवाद को छोड़ कर उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद जिस तरह से भारतीय मीडिया सेना और सत्ता से सवालों से परहेज करता रहा है, उससे लगता है कि आने वालों दिनों में पत्रकारिता सरकारी प्रेस रीलिजों के भरोसे ही चलेगी.
पाकिस्तान और सेना के मामले में भारतीय मीडिया राज्य और सत्ता के नज़रिए से ही ख़बरों को देखने और उन्हें विश्लेषित करने को अभिशप्त लगता है.
जाहिर है कि सीमा रेखा पर किसी चैनल का कैमरा नहीं लगा है और संघर्ष के वक्त पत्रकार वहाँ नहीं थे. खबरें ‘विश्वस्त सूत्रों’ से ही मिलती है, पर विश्लेषण करने, सवाल पूछने को तो हमारे स्वनामधन्य पत्रकार-संपादक स्वतंत्र हैं!
कुछ वर्ष पहले नोम चोमस्की ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि पाकिस्तानी मीडिया भारतीय मीडिया से ज्यादा स्वतंत्र है और उन पर सत्ता का दवाब अपेक्षाकृत कम है. संभव है इसमें हमें अतिरंजना लगे. पर सर्जिकल स्ट्राइक्स के बाद जिस तरह से पाकिस्तानी की मीडिया सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत दिखाई है, ये सच लगता है.
हाल ही में पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग होने और सेना और राजनेताओं के बीच उभरे मतभेद की खबर डॉन अख़बार के पत्रकार-विश्लेषक सिरिल अलमेइडा ने प्रकाशित की थी. इस पर पाकिस्तानी सरकार-सेना ने जो रुख अपनाया उसकी मजम्मत करने में वहाँ की अखबारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी. मसूद अजहर और हाफिज सईद के ऊपर ‘राष्ट्रीय हितों’ को ध्यान में रखते हुए कोई कार्रवाई नहीं करने पर सवाल उठाते हुए ‘द नेशन’ ने लिखा: सरकार और सेना के अलाकमान प्रेस को लेक्चर देने की कि वह किस तरह अपना काम करे, कैसे हिम्मत कर रहे हैं? एक प्रतिष्ठित रिपोर्टर के साथ अपराधी की तरह बर्ताव करने की वे हिम्मत कैसे कर रहे है? कैसे वे हिम्मत कर रहे हैं यह बताने का कि उनके पास एकाधिकार है, योग्यता है यह घोषणा करने का कि पाकिस्तान का ‘नेशनल इंटरेस्ट’ क्या है? 

क्या ऐसी किसी प्रतिक्रिया की उम्मीद आज हम भारतीय मीडिया से कर सकते हैं? गौरतलब है कि पिछले महीने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएनएन न्यूज 18 को दिए इंटरव्यू के दौरान कहा था: मीडिया अपना काम करता है, वह करता रहे. और मेरा यह स्पष्ट मत है कि सरकारों की, सरकार के काम-काज का कठोर से कठोर analysis होना चाहिए, criticism होना चाहिए, वरना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता है.
पर लोकतंत्र ठीक से चले इसकी फिक्र किसे है!