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Wednesday, February 21, 2024

मीडिया का लोकतंत्र: समीक्षा


 लोकसभा चुनाव के महज कुछ हफ्ते शेष बचे हैं. वर्तमान शासन के दस साल बाद भी विपक्षी पार्टियों के लिए चुनावी रणनीति का कोई ऐसा सिरा दिखाई नहीं दे रहा जिससे कहा जा सके कि मुकाबला दिलचस्प होगा. क्या यह चुनाव बिना किसी चुनौती के संपन्न होगाविपक्षी पार्टी पर भारतीय जनता पार्टी ने मनोवैज्ञानिक बढ़त बना ली है. आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री कहते फिर रहे हैं कि आएगा तो मोदी ही!

प्रधानमंत्री की छवि एक ब्रांड (मोदी है तो मुमकिन हैमोदी की गारंटी आदि) के रूप में इन वर्षों में पुख्ता हुई है. प्रधानमंत्री के इस कल्ट’ को कारोबारी मीडिया भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. जो प्रधानमंत्री की राजनीति और विचारधारा के आलोचक हैं, वे भी उनकी लोकप्रियता से इंकार नहीं करते. उनकी लोकप्रियता का बड़ा हिस्सा उदारीकरण के साथ हिंदुत्व की जो बयार बही उससे जुड़ता है. भाषाई मीडियाजिसका अप्रत्याशित विकास इन्हीं दशकों में हुआ हैसमाज में आए बदलाव को आत्मसात करता हुआ आगे बढ़ा है. इसी सिलसिले में एक नेटवर्क का विस्तार भी हुआ हैदूर दराज के गाँव-कस्बों तक मीडिया (मुख्यधारा और सोशल) की पहुँच बढ़ी है. विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी मीडिया के माध्यम से मोदी की लोकलुभावन अपील को अपने तयी देखते-परखते हैं, चुनाव में वोट करते हैं.

चूँकि मीडिया एक पूंजीवादी उपक्रम है (प्रिंट पूंजीवाद)इसलिए मुनाफे की संस्कृति से ही इसका संचालन होता हैलोकहित हाशिए पर ही रहते आए हैं. वैसे प्रकाशन व्यवसाय भी कोई अपवाद नहीं है,  यहाँ भी लेखकों की ब्रांडिंग पर जोर रहता है. उनकी छवि भुनाने की कोशिश होती है. हाल के वर्षों में हिंदी लोकवृत्त में यह प्रवृत्ति बढ़ी है.

बहरहालराम मंदिर निर्माण के बाद हिंदुत्व और विकास की जुगलबंदी का शोर और बढ़ा है. इस शोर के बीच रोजगारबढ़ती असमानताअल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना और संस्थानों के लगातार कमजोर होने की चर्चा सुनाई नहीं देती. स्वतंत्र मीडिया और स्वतंत्रचेता मीडियाकर्मियों पर जो दबिश बढ़ी हैउसके बारे में खुल कर बोलने में आम नागरिकों में हिचक है. सोशल मीडिया में भी एक तरह का सेल्फ-सेंसरशिप है. ऐसे में, मुख्यधारा का मीडिया सरकार के एजेंडे को ही अपना एजेंडा मान कर आगे बढ़ रहा है. हाल के दिनों में अडानी समूह के मीडिया क्षेत्र में बढ़त को हम उनके कारोबारी हित के नजरिए से देख-परख सकते हैं.

वैसे दिल्ली में आने से पहले ही मोदी की ब्रांडिंग शुरू हो गई थीजिसे मीडिया का भरपूर सहयोग मिला था. वर्ष 2012 में चर्चित अमेरिकी पत्रिका टाइम के कवर पृष्ठ पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर छपी थी. साथ ही इंडिया टुडेकारवां और आउटलुक पत्रिकाओं के कवर पर भी नरेंद्र मोदी छाए हुए रहे.  इंडिया टुडे में जहाँ एक ओपिनियन पोल के हवाले से प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को लोगों की पहली पसंद बतायावहीं कारवां और आउटलुक पत्रिका ने मोदी की छवि को लेकर कुछ तल्ख सवाल किए थे. मोदी को लेकर मीडिया के अंदर दो ध्रुव थे. बाद के वर्षों में यह दूरी और बढ़ती गई. हिंदी टेलीविजन मीडिया के हवाले से बात करें तो रवीश कुमार और सुधीर चौधरी इस ध्रुव के ओर छोर कहे जा सकते हैं.

उदारीकरण के बाद भारतीय राष्ट्र-राज्य का चरित्र बदला. कॉरपोरेटमीडिया और राजनीतिक दलों में हर तरफ जोर प्रबंधन पर बढ़ा. मीडिया में जहाँ ब्रांड मैनेजर की अहमियत संपादकों से ज्यादा बढ़ी वहींराजसत्ता में मीडिया मैनेजरों की घुसपैठ किसी भी सक्षम नौकरशाहों से कम नहीं है. समयांतर पत्रिका (मई, 2012) के लिए मोदी और मीडिया’ लेख में मैंने लिखा था:

कोई भी पाठक यदि सरसरी तौर पर भी टाइम के लेख को पढ़े तो उसे समझने में यह देर नहीं लगेगी कि यह एक महज पीआर (जनसंपर्क) का काम है जिसे नरेंद्र मोदी के मीडिया मैनेजरों ने बखूबी अंजाम दिया है.”  

इन वर्षों मीडिया के चरित्र में जो बदलाव हुए हैं, नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग में जो इसकी भूमिका रही हैसोशल मीडिया का जो उभार हुआ है उसका एक लेखा-जोखा पिछले दिनों लेखक विनीत कुमार की प्रकाशित किताब- मीडिया का लोकतंत्र में दिखाई देता है.

जैसा कि शीर्षक और अध्यायों से स्पष्ट है इस किताब में मीडिया और लोकतंत्र बीज शब्द हैं. किसी भी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी को केंद्रीयता प्राप्त है. इसकी रक्षा का भार नागरिक समाजमीडियान्यायालय और राजनीतिक दलों पर है. मीडिया चूँकि लोकतंत्र में आम जनता की आँख और कान की तरह होते हैंजाहिर है उससे अपेक्षा रहती है कि वह सबकी खबर ले. सबको खबर दे. सवाल है कि क्या मोदी के शासन काल में मीडिया जनता के प्रतिनिधि के रूप में सत्ता के सामने सच कहने में सफल रही? इसका जवाब नकारात्मक ही है. मीडिया की आवाज दबी रही. स्वर हकलाने का ही रहा. आज जोर सेल्फी पत्रकारिता पर है. प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी, संपर्क साध कर पत्रकार-संपादक खुद को धन्य महसूस करते फिरते हैं. कारोबारी मीडिया का जोर सत्ता के साथ सांठगांठ करने पर बढ़ा है. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण अखबार और टेलीविजन चैनलों के स्पेशल इवेंट’ हैंजहाँ मंच पर मालिक और संपादक सत्ता’ पर काबिज लोगों के साथ नज़र आते हैं.

यह किताब मीडिया का लोकतंत्रबरास्ते पीआर एजेंसी’, मीडिया नैरेटिवफ़ेक बनाम फैक्ट’, मीडिया राष्ट्रवादअलविदा लोकतंत्र!’ और न्यू मीडियाडेटा पैक का लोकतंत्र जैसे अध्यायों में विभक्त है. इस किताब की भूमिका में विनीत लिखते हैं:

साल 2014 के बाद मीडिया का चरित्र पूरी तरह बदल गया है और अब तक सत्ता से विवेकपूर्ण असहमति को पत्रकारिता माना जाता रहा हैयह क्रम उलटकर सत्ता के साथ होना ही पत्रकारिता हैऐसा कहने से यह किताब रोकती है.” हालांकि इस किताब में जो विवरणउदाहरणसंदर्भ और ब्यौरे हैं, वह लोकवृत्त में पहले से मौजूद हैं. मीडिया के रवैये को लेकर मीडिया के अंदर ही टीका-टिप्पणी और किताबें लिखी जाती रही है. लेखक इस बात को स्वीकार करते हुए लिखते हैं:

आप जब इसके पन्ने-दर-पन्ने पलटते हुए संदर्भों से गुजरेंगे तो संभव है कि लगेगा इसमें नया क्यायह तो हमें पहले से पता है...”. लेखक की पक्षधरता स्पष्ट है. हिंदुत्ववादी राजनीति और सत्ता के विरोध में वह खड़ा है. लेकिन देश की विशाल आबादी (खास कर उत्तर और पश्चिम भारत) तक मोदी की पहुँच के कारणों पर इसमें विचार नहीं किया गया हैन हीं मीडिया के उपभोक्ताओंनागरिकों की सोच को ही शामिल किया गया है. इस लिहाज से यह एक किताब भी एक इको चैंबर की तरह है, जहाँ हम (लिबरल) सिर्फ अपनी आवाज ही सुनते हैं.

मीडिया के पाठकोंदर्शकों की पसंद को लेकर अकादमिक दुनिया में शोध की पहल नहीं दिखती. विनीत मीडिया शोध और अध्ययन से जुड़े रहे हैंउनसे अपेक्षा थी कि वे दर्शकों की पसंदइच्छा को लेकर इस किताब में चर्चा करते ताकि मोदी की लोकप्रियता के कारणों की एक झलक हमें मिलती. महज उदाहरणोंकिताब के संदर्भों के आधार पर मीडिया के बदलते चरित्र-- जहां जनसंपर्क (पीआर) की भूमिका बढ़ती चली गई है-- की मुकम्मल तस्वीर सामने नहीं आती. हांकिताब में वर्ष 2013 में उत्तरकाशी-केदारनाथ में आई तबाही और मोदी को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया में जो झूठी खबर छपी- मोदी इन रैम्बो एक्टसेव्स 15000’ , को एक केस स्टडी के रूप में विस्तार से विश्लेषण किया गया हैविनीत बताते हैं कि किस तरह एक ही मीडिया संस्थान के दो उपक्रम (प्लेटफॉर्म) अलग-अलग तरीके से खबरों को प्रस्तुत करते हैं और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे को काटते भी चलते हैं! हालांकि यहाँ पर यह नोट करना जरूरी है कि टाइम्स ग्रुप के लिए इस तरह की खबर सिर्फ पीआर का मसला नहीं रहा है.

बीस साल पहले जब मैं टाइम्स ग्रुप के अखबार नवभारत टाइम्स पर शोध कर रहा थाइस तरह की खबर पेड न्यूज’ की शक्ल में आने लगी थी. वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में यह खुल कर सामने आ गया था. चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों से मोटी रकम लेकर पैकेज’ के तहत टाइम्स ग्रुप ने मीडिया नेट कंपनी (2003) और प्राइवेट ट्रीटीज (2005) की शुरुआत कर दी थी. इसका विस्तार से उल्लेख मैंने अपनी किताब हिंदी में समाचार (2013)’ और शोध आलेख राइटिंग खुश खबरहिंदी न्यूज़ पेपर्स इन नियो लिबरल ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी इंडिया’ (2021) में किया है. आश्चर्य है कि विनीत अपने लेख में कहीं भी इस पहलू का जिक्र नहीं करतेजबकी इस अध्याय में विनीत विज्ञापन गुरु (अबकी बार, मोदी सरकार’ वाले) पीयूष पांडे की आत्मकथात्मक किताब पांडेमोनियमपीयूष पांडे ऑन एडवरटाइजिंग (2015) को लेकर अनावश्यक रूप से करीब दस पेज खर्च करते हैं. इसी तरह कई ऐसी किताबों से उदाहरण हैं जिसे संक्षेप में दिया जा सकता था. वैसे यह पूरी किताब ही सेड/शी सेड (किसने क्या कहा) की शैली में ही लिखी गई है, जहाँ पर अद्यतन किताबों के संदर्भ और विवरण तो मिलते हैं पर लेखकीय विश्लेषण का अभाव दिखता है. मीडिया की रिपोर्टिंग में ऐसी छूट की गुंजाइश तो है, पर जब आप शोध/आलोचना कर रहे हैं तो लेखक से अपेक्षा रहती है कि उसकी दृष्टि और तैयारी से पाठक रू-ब-रू होगा.  ऐसे में पूरी किताब में लेखक कहीं पीछे छूट जाता है और अन्य' हावी हो जाते हैं. पाठकों के लिए यह उलझन पैदा करता है. पठनीयता भी प्रभावित होती है. किताब में जिन लेखकों को उद्धृत किया गया, अधिकांश के साथ कोई खंडन-मंडन नहीं है, न ही लेखक की तरफ से सवाल हीं उछाला गया है. एक किताब सारे सवालों का जवाब भले न दे, पाठकों के मन में बीजारोपण तो कर ही सकती है!

इस शताब्दी के दूसरे दशक में जहाँ इंटरनेट के मार्फत आभासी दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय लोकवृत्त के निर्माण की संभावना बनी, वहीं सूचनाओं के आल-जाल में तथ्य और सत्य के बीच की रेखा धुंधली हो गई. यथार्थ और आभासी के बीच फेक न्यूज का ऐसा तंत्र खड़ा हुआ जिसे सत्ता का सहयोग हासिल है. यह अमेरिका से लेकर भारत जैसे लोकतंत्र के लिए चुनौती का विषय बना है. पिछले दिनों अभिनेत्री पूनम पांडेय की मौत की खबर  फेक न्यूज बन कर आई जिसे बीबीसी जैसी संस्थाओं ने भी बिना किसी जांच-परख के स्वीकार कर लिया था.

विनीत अपने लेख मीडिया नैरेटिवफेक बनाम फैक्ट’ में इस मुद्दे से विमर्श रचते हैं. कोरोना के दौरान जिस तरह से मुस्लिम समुदाय के खिलाफ फेक न्यूज टीवी चैनलों पर फैलाया गया विनीत उसे विश्लेषण की जद में लेते हैं. वे आजतक के कार्यक्रम में दिखाए कोई झुठला नहीं पाएगा राम मंदिर का इतिहासजाने कितना अहम है टाइम कैप्सूल (राम मंदिर के नीचे रखा जाएगा टाइम कैप्सूलदेखें क्या है तैयारीकार्यक्रम की पड़ताल करते हैं. विनीत लिखते हैं:

आजतक की दर्जनों फुटेज देखने के बाद भी एक भी ऐसी तस्वीर नहीं मिली जिससे कि राम जन्मभूमि परिसर में टाइम कैप्सूल डाले जाने संबंधी तैयारी की पुष्टि हो सके. यह स्थिति जी न्यूजरिपब्लिक भारतटाइम्स नाउसभी चैनलों के साथ रही.”

हालांकि इस अध्याय में भाषाई वर्चस्व के बीच हिंग्लिश की शरणस्थली की चर्चा करना विषय-वस्तु के साथ मेल नहीं खाता है. उसके लिए एक अलग स्वतंत्र अध्याय की गुंजाइश थी. खुद लेखक ने लिखा है कि वे इस विषय पर अन्यत्र लिख चुके हैं.

उल्लेखनीय है कि राममंदिर के उद्घाटन समारोह में जैसा कि उम्मीद थीटेलीविजन चैनलों में राम राज्य’ का बोलबाला रहा. उससे पहले ही इंडिया टुडे टीवी चैनल पर राम आएँगे’, टीवी 9 पर मंदिर वहीं बनाएँगे और एनडीटीवी पर राम रिटर्न्स’ जैसे कार्यक्रम दिखाए जा रहे थे. ऐसा नहीं है कि पहली बार टीवी ने भावनात्मक मुद्दे को लेकर बिना किसी आलोचनात्मक विवेक के कार्यक्रम, बहस आदि किए हो. मोदी के शासनकाल में टीवी में राष्ट्रवाद के ऊपर बहस-मुबाहिसा का जोर बढ़ा है, जहाँ पर समावेशीसामासिक संस्कृति की बात नहीं होती. असल मेंहिंदी समाचार चैनल अपने शुरुआत से ही विचार-विमर्श की जगह सनसनी को अपने केंद्र में रखा. आज उग्र राष्ट्रवाद हिंदुत्व का आवरण ओढ़ कर हमारे सामने है. जैसा कि कुंवर नारायण ने अपनी कविता (अयोध्या, 1992) में लिखा है:

हे राम,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकाव्य!

तुम्हारे बस की नहीं

उस अविवेक पर विजय

जिसके दस बीस नहीं

अब लाखों सर-लाखों हाथ हैं.

यह लाखों सर और लाखों हाथ समकालीन भारतीय मीडिया के हैं. राष्ट्रीय मीडिया सत्ता के साथ हैजिससे नागरिक समाज और विपक्ष को लड़ना है. पर कैसेक्या लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया विपक्ष के लिए एक कारगर हथियार साबित होगाइस किताब का आखिरी अध्याय न्यू मीडियाडेटा पैक का लोकतंत्र’ खबरों और विभिन्न लेखकों की किताबों (राहुल रौशन, अंकित लाल, स्वाति चतुर्वेदी, रोहित चोपड़ा, सिरिल और परंजय गुहा ठाकुरता आदि)  के हवाले से इन्हीं मुद्दों को अपने घेरे में लेता है.

आखिर मेंलेखक ने किताब में नोट किया है कि "कारोबारी मीडिया के लिए लोकतंत्र नागरिकों की हिस्सेदारी से चलनेवाली एक सतत प्रक्रिया न होकरएक प्रबंधन है जिसे कि वो अपने ऑक्सीजन प्रदाता के अनुरूप फेरबदल कर सकते हैं." पर क्या हमारा मीडिया हमारे लोकतंत्र से अलग है? ‘मीडिया का लोकतंत्र में मीडिया की आलोचना तो है पर इस बुनियादी सवाल पर चुप्पी है. जब संकट लोकतंत्र पर हो तब समकालीन मीडिया की कोई भी आलोचना उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण के बाद समाजराजनीति और पूंजीवाद (खुफिया पूंजीवाद) में आए बदलावों के परिप्रेक्ष्य में ही किया जा सकता हैजिसका इस किताब में नितांत अभाव है. 

(प्रभात खबर, 25.02.24)

Monday, February 14, 2022

'खबर लहरिया’ की खबर बरास्ते ‘राइटिंग विद फायर’


वर्ष 2004 में
खबर लहरियापाक्षिक अखबार को जब चमेली देवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, तब वरिष्ठ पत्रकार बी जी वर्गिस ने इससे जुड़े पत्रकारों को बेयरफुट पत्रकार्सकहा था. चीन के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य संबंधी सुविधा पहुँचाने के उद्देश्य से पिछली सदी के 60 के दशक में माओ ने हजारों लोगों को प्राथमिक मेडिकल ट्रेनिंग देकर भेजा था जिन्हें बेयरफुट डॉक्टर्सकहा गया.

पिछले दिनों जब रिंटू थॉमस और सुष्मित घोष की डॉक्यूमेंट्री 'राइटिंग विद फायर' को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फीचर वर्ग में ऑस्कर के लिए मनोनीत किया गया तो यह बात जेहन में आती रही. असल में इस डॉक्यूमेंट्री के केंद्र में खबर लहरियासे जुड़े बेयरफुट पत्रकार ही हैं, जो पिछले बीस वर्षों से बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों की खबर लेती रही हैं और उन्हें आस-पास से लेकर दुनिया-जहान की खबरें देती रही हैं. ये खबरनवीस सिर्फ महिलाएं हैं. पिछले दो दशक में मीडिया क्षेत्र में आए अभूतपूर्व बदलाव के बाद भी न्यूजरूम में आज भी महिलाओं की उपस्थिति बेहद कम है, ऐसे में खबर लहरियाकी मीडिया जगत में उपस्थिति प्रेरणादायक है.

वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में सात महिलाओं ने आठ पेज के इस अखबार की शुरुआत की थी, बाद में बांदा से भी इसे प्रकाशित किया गया. अखबार में रिपोर्टिंग, संपादन से लेकर उत्पादन, वितरण में इनकी भूमिका थी, जिन्हें ग्रामीण इलाकों में वितरित किया जाता था. इसमें जिन महिलाओं की भागीदारी थी वह हाशिए के समाज से आती थी. हालांकि इस अखबार के बीज बांदा जिले से 90 के दशक में निकलने वाले अखबार महिला डाकिया’ (1993-2000) में छिपे थे. महिला डाकियाके उत्पादन, वितरण आदि में भी ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी थी. खबर लहरियाकी तरह ही महिला डाकियाकी भाषा बुंदेली और हिंदी मिश्रित थी. महिला डाकियामहज एक प्रायोगिक अखबारथा. सामाजिक कार्यकर्ता फराह नकवी ने अपनी किताब वेव्स इन द हिंटरलैंड (द जर्नी ऑफ ए न्यूजपेपर)में लिखा है: दोनों ही प्रकाशन के पीछे यह विचार था कि ग्रामीण महिला जिनकी शिक्षा बहुत अधिक नहीं है, वे खबरों के उत्पादन से जुड़े’. खबर लहरिया को निरंतरगैर सरकारी संगठन का सहयोग मिला. 90 के दशक के मध्य में फराह नकवी निरंतरसे जुड़ी थी.

21वीं सदी का दूसरा दशक दुनिया भर में मीडिया के लिए संभावनाओं और चुनौतियों से भरा रहा है. खबर लहरियाका प्रिंट अंक बंद हो गया और वर्ष 2016 से यह डिजिटल अवतार में आ गया. हालांकि, ऑनलाइन आ जाने से भी उसका उद्देश्य वही है जो वर्ष 2002 में था. पहले अंक में अखबार ने लिखा था-सुनौ..सुनौ..सुनौ हम खबर लहरिया नाम का हमार आपन अखबार शुरु कीन है. या चित्रकूट जिला का हमार आपन अखबार आये. जेहिमा इलाका की सच्ची घटना, किस्सा, कहानी, चुटकुला, योजनाएं, घरेलू इलाज, देश-विदेश के बातै रहा करी.  हालांकि वर्तमान में इन्हें दिल्ली स्थित कार्यालय से संपादन में सहयोग मिलता है. इनकी रिपोर्टिंग टीम में करीब 20 सदस्य हैं जो दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखती हैं. राइटिंग विद फायरमें अखबार से डिजिटल तक के सफर की कहानी ही है. अभी इस डॉक्यूमेंट्री को पब्लिक के लिए रिलीज नहीं किया गया है.

मेनस्ट्रीम मीडिया के बरक्स इंटरनेट जनित डिजिटल मीडिया और मोबाइल फोन ने पब्लिक स्फीयरमें बहस-मुबाहिसा को एक गति दी है और एक नए लोकतांत्रिक समाज का सपना भी बुना है. भारतीय गाँव, उसकी बोली-बानी, बदलते जीवन यथार्थ और उसकी समस्याओं को एक जगह समेटने के उद्देश्य से  पी साईंनाथ की पहल से पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया’ (PARI) नामक एक वेबसाइट की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई. इसे उन्होंने हमारे समय का एक जर्नल और साथ ही अभिलेखागार कहा. इस वेबसाइट पर विचरने वाले एक साथ विषय वस्तु के उपभोक्ता और उत्पादक दोनों हो सकते हैं. ऐसे ही कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उभरे हैं जहाँ पर गाँव-कस्बों की खबर मिल जाती हैं. फिर भी खबर लहरिया जैसे मीडिया की अहमियत कम नहीं होती.

राइटिंग विद फायरके ऑस्कर के लिए मनोनीत होने से खबर लहरियाटीम में नई ऊर्जा का संचार हुआ है. उनसे बात करने पर उनकी खुशी और उत्साह का पता चलता है. खबर लहरियाकी संपादक कविता देवी ने अपनी खुशी को सोशल मीडिया पर शेयर भी किया. उन्होंने डॉक्यूमेंट्री निर्देशकों को बधाई देते हुए लिखा कि हमें गर्व है कि फिल्म के जरिए हमारे 20 साल की ग्रामीण रिपोर्टिंग और मेहनत को बहुत सराहना और प्यार मिल रहा है जो हमारे हौसले को बुलंद करता है.उम्मीद की जानी चाहिए  राइटिंग विद फायरसे खबर लहरियाकी खबर दूर तक पहुँचेगी और वैकल्पिक मीडिया मजबूत होगा.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, September 12, 2021

बीस साल बाद: 9/11

ग्यारह सितंबर को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर के टॉवरों पर आंतकी हमले की 20वीं बरसी मनाई गई. फिर से टेलीविजन चैनलों पर अगवा किए यात्री विमानों के टकराने से ढहते टॉवरों के दृश्य दिखाए गए. टेलीविजन के इतिहास में इस तरह के हृदय विदारक दृश्य कम ही मिलते हैं. मेरा मन बीस साल पहले लौट गया. वर्ष 2001 में एक महीने पहले ही हम पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेने भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली गए थे.  यह दृश्य ऐसा था जैसे कि स्वप्न में कोई हॉलीवुड का सिनेमा चल रहा हो. प्रसंगवश इसी दौर में भारत में चौबसी घंटे टेलीविजन चैनलों ने अपना प्रसारण शुरु किया था. आने वाले दिनों में बार-बार ये दृश्य दिखाए जाते रहे. टीवी स्टूडियो में बहस-मुहाबिसा के नए दौर की यह शुरुआत थी.

इस हमले के बाद इकॉनामिस्ट पत्रिका ने ध्वस्त टॉवरो से बने अपन कवर पेज के नीचे लिखा था- द डे द वर्ल्ड चेंज्ड. निस्संदेह, इस घटना ने पिछले बीस सालों में दुनिया को काफी बदल दिया. हालांकि इस पर कम ही बात की जाती है कि किस तरह इस घटना ने मीडिया और खास कर टेलीविजन समाचार की संस्कृति को बदला.

आतंकी हमलों में करीब तीन हजार लोगों की मौत हुई थी. अमेरिकी समाज में देशभक्ति का ज्वार इस तरह फैला कि मीडिया में तथ्य और सत्य की जगह भावनाओं पर जोर बढ़ा. राज्य सत्ता ने मीडिया पर नकेल कसने शुरु किए. इस बीच बाजार और इंटरनेट के घोड़े पर सवाल भूमंडलीकरण का रथ भी उतरा. भारतीय मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा. पत्रकारिता की शब्दावली में कई नए शब्द जुड़े. वॉर ऑन टेरर’ (आतंक के खिलाफ लडाई) और इस्लामिक टेररिज्म (इस्लामिक आतंकवाद) जैसे शब्द पर्यायवाची बन गए. मीडिया में इस्लाम को हिंसा के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा. मुसलमानों की स्टरियोटाइप छवियों के साथ गुड मुस्लिम, बैड मुस्लिम जैसे खांचे बना कर टीवी स्टूडियो बहस किए जाने लगे. दूसरे शब्दों में, राजनीतिक लड़ाई सांस्कृतिक हथियारों से लड़ी जाने लगी. मीडिया जाने-अनजाने इसमें सहयोग देने लगा, बिना यह पूछे कि आतंकवाद के पीछे क्या राजनीति हैं. शीत युद्ध और सभ्यताओं के संघर्ष के अख्यान की इसमें क्या भूमिका रही है? बाद के सालों में टीवी चैनलों पर राष्ट्रवाद की जो बहस चली उसमें मुसलमानों को अन्य के रूप में देखने पर जोर रहा.

बहरहाल, जैसे-जैसे अफगानिस्तान, इराक में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध फैलता गया, पश्चिमी देशों के कई मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता संदिग्ध होती गई.  सैन्य इकाइयों से जुड़े पत्रकारों- एंबेडेड जर्नलिस्ट, की संख्या बढ़ती गई, ऐसे में उनकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगे. यहाँ तक कि इराक युद्ध (2003) के दौरान बीबीसी ने जिस तरह से युद्ध को कवर किया, प्रोपगैंडा (वेपन ऑफ मास डिस्ट्रकशन-सामूहिक विनाश के हथियार) में भाग लिया उसकी काफी आलोचना हुई. इसी बीच संचार की तकनीकी, इंटरनेट और सोशल मीडिया के उभार से आतंकी समूहों ने भी समाचार संस्थानों का इस्तेमाल शुरु किया. यह प्रवृति बाद के वर्षों में बढ़ती गई.

अफगानिस्तान युद्ध के दौरान कवरेज को लेकर सीएनएन और बीबीसी से इतर अल-जजीरा समाचार चैनल खास तौर से उल्लेखनीय है. हग माइल्स ने अपनी किताब अल जजीरा: हाउ अरब टीवी न्यूज चैलेंज्ड द वर्ल्ड में  सितंबर 11 शीर्षक अध्याय में लिखा है: अमेरिकी प्रशासन की नजर में  9/11 का मुख्य आरोपी ओसामा बिन लादेन था. अल जजीरा को ओसामा बिन लादेन का एक फैक्स 16 सितंबर को मिला जिसमें उसने कहा था कि वह अफगानिस्तान में है और सत्ताधारी तालिबान के कानूनों का पालन करेगा. हालांकि उसने अमेरिका में हमले से इंकार किया था. इस तरह के फैक्स अल-जजीरा को बाद के दिनों में भी मिलते रहे. 20 सितंबर को अल-जजीरा ने ओसामा बिन लादेन के वर्ष 1998 में दिए एक इंटरव्यू को फिर से प्रसारित किया था. काबुल पर जब अक्टूबर में अमेरिका ने हमला किया अल जजीरा ने फिर से ओसामा बिन लादेन का एक टेप किया हुआ भाषण प्रसारित किया जिसमें उसने अमेरिका में हुए हमले की जिम्मेदारी नहीं ली थी, पर जिन आतंकवादियों ने इसे अंजाम दिया था उसे अपना सहयोग देने की बात की थी. शुरुआत में अल-जजीरा की आलोचना और भर्त्सना हुई पर पश्चिमी देशों के मीडिया संस्थानों ने बाद में अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान इस चैनल के फुटेज का इस्तेमाल अपने कार्यक्रम में किया. अल-जजीरा की ख्याति बढ़ती चली गई. यहाँ यह नोट करना उचित होगा कि बीस साल चले इस युद्ध में हजारों आम नागरिकों, सैनिकों की मौत के साथ-साथ 72 पत्रकारों ने अपनी जान गवाँई.

बीस साल बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैनिक अफगानिस्तान छोड़ कर जा चुके हैं. तालिबान फिर से सत्ता में हैं. पिछले महीने काबुल हवाई अड्डे पर हुए आत्मघाती बम विस्फोट में सैकड़ों लोगों की जान गई. टेलीविजन चैनलों पर विमर्शकारों के बीच तालिबान 1.0 और तालिबान 2.0 की बहस जारी है. आतंकवाद देश-दुनिया से खत्म नहीं हुआ है. अल कायदा ने अपने रूप बदल लिए हैं. आने वाले सालों में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मीडिया की क्या भूमिका होगी, यह देखना रोचक होगा.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Monday, June 07, 2021

लोकतंत्र में सरकार और मीडिया के आपसी रिश्ते

आर्टिकल 14 वेबसाइट के एक डेटाबेस के मुताबिक वर्ष 2010 से 2020 तक करीब 10938 लोगों पर राजद्रोह के आरोप लगे उनमें जो 65 प्रतिशत मामले वर्ष 2014 के बाद प्रकाश में आए हैं. जिन 405 लोगों पर वर्ष 2014 के बाद केस दर्ज हुए उन पर सरकार और राजनेताओं की आलोचना’ की वजह से राजद्रोह का आरोप था.

ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर राजद्रोह का मामला सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए जो टिप्पणी की है वह महत्वपूर्ण है. अपने यूट्यूब चैनल में पिछले साल कोरोना महामारी के दौरान मोदी सरकार पर किए गए कुछ टिप्पणियों के लिए शिमलाहिमाचल प्रदेश में उनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज किया गया था. उन्होंने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. मीडियाकर्मियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बोलने की आजादी पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि हर पत्रकार को केदारनाथ सिंह फैसले के तहत सरंक्षण मिला है.’  भारतीय दंड विधान (आईपीसी) में शामिल देशद्रोह की धारा के तहत केस दर्ज करने के बढ़ते मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इसी हफ्ते सोमवार को कहा था कि ‘राजद्रोह की सीमा को परिभाषित करने का समय आ गया है. उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश के दो तेलुगु चैनलों के खिलाफ राजद्रोह को लेकर दंडात्मक कार्रवाई करने पर रोक लगा दी थी. इन चैनलों पर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के बागी सांसद के रघु राम कृष्ण राजू के आपत्तिजनक भाषण का प्रसारण करने का आरोप था.

चर्चित केदारनाथ सिंह फैसले (1962) के तहत सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया था कि लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलने के लिए सरकार की आलोचना बेहद जरूरी है. अदालत ने कहा था कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर  टिप्पणी करने से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता. साथ ही जब तक हिंसा फैलाने की मंशा या हिंसा बढ़ाने का तत्व मौजूद नहीं हो वक्तव्य को राजद्रोह नहीं माना जा सकता. हालांकि इस फैसले के बाद भी विभिन्न सरकारों के द्वारा पत्रकारोंएक्टिविस्टों पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज होते रहे हैं. असल में आजादी के बाद ब्रिटिश राज के दौर में बने इस कानून की प्राथमिकता खत्म हो जानी चाहिए थी. महात्मा गाँधी ने नागरिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाले कानूनों में आईपीसी के 124 ए को ‘राजकुमार’ (प्रिंस) कहा था. भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए के मुताबिक जब कोई व्यक्ति बोले गए या लिखित शब्दोंसंकेतों या दृश्य प्रस्तुति द्वारा या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति किसी तरह से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने का प्रयास करता हैअसंतोष (Disaffection) उत्पन्न करता है या करने का प्रयत्न करेगा वह राजद्रोह का आरोपी है.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 में नेटवर्क 18 को दिए एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा थामीडिया अपना काम करता है वह करता रहे और मेरा यह स्पष्ट मत है कि सरकारों कीसरकार के काम-काज का कठोर से कठोर एनालिसिस  होना चाहिए क्रिटिसिज्म होना चाहिएवरना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता है.

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका वॉचडॉग (पहरुए) की है. पर हाल के वर्षों में सरकार की आलोचना को बर्दाश्त न करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. और यह सोशल मीडिया पर भी खूब दिखाई देता है. सरकार के समर्थक और ट्रोल उस पत्रकार या संस्थान के पीछे पड़ जाते हैं जो सरकार की आलोचना करते हैं. कई बार यह धमकी या प्रताड़ना की शक्ल में सामने आता है. ऐसा नहीं है कि यह प्रवृत्ति महज भारत की है. हाल ही में पाकिस्तान में भी प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले बढ़े हैं. पर वहाँ यह दबाव सेना और आईएसआई जैसी संस्थाओं के कारण ज्यादा है. जाहिर है सरकार की मिली-भगत भी इसमें है.

किसी भी लोकतंत्र में सरकार और मीडिया के आपसी रिश्ते प्रतिद्वंदी की नहीं होनी चाहिए. मीडिया सरकार के काम-कामनीतियों और संदेश को नागरिकों तक लेकर जाती है. भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद मीडिया के मार्फत सार्वजनिक बहस-मुबाहिसावाद-विवाद-संवाद की संभावना बढ़ी है. हालांकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दशक में फेक न्यूजमनगढंत खबरों से बहस-मुबाहिसा का जो दायरा फैला है उसे संकुचित करने की कोशिश भी हुई है.

जहाँ विकसित देशों में प्रिंट मीडिया में वृद्धि ढलान पर है वहीं भारत के भाषाई प्रेस में वृद्दि देखी गई है. सैकड़ों टेलीविजन चैनल और ऑनलाइन वेबसाइट उभरे हैं. इसने देशज राजनीति (वर्नाकुलर पॉलिटिक्स) को सुदृढ़ किया है मीडिया के इस पक्ष की चर्चा कम की जाती है. साथ ही मीडिया ने राजनीतिक संचारचुनावों के दौरान राजनीतिक लामबंदी  और राजनेताओं के छवि निर्माण में पिछले दो दशकों में टेलीविजन और ऑनलाइन ने एक बड़ी भूमिका अदा की है. 

(नेटवर्क न्यूज18 हिंदी में प्रकाशित, 6 जून 2021)

 

Saturday, May 08, 2021

बहुत कठिन समय है साथी

पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान टेलीविजन के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि हम उम्मीद करें कि कोई साहित्यकार हमारे समय की त्रासदी को शब्द देगा.  साहित्य शब्दों के जरिए मानवीय भावों, प्रेमहिंसा, सुख-दुखपीड़ात्रासदियों को वाणी देता रहा है. यही वजह है कि कोरोना महामारी के दौरान अल्बैर कामू के चर्चित उपन्यास-प्लेगकी बार-बार चर्चा होती रही है. लोग इस महामारी को ‘प्लेग’ के मार्फत समझने की कोशिश करते दिखे. प्रसंगवशइस उपन्यास में एक पात्र रेमंड रैंबर्ट पत्रकार के रूप में मौजूद हैं!

साहित्य भोगे हुए जीवन को रचता हैपर वह जीवन नहीं है. और कोई भी कहानी जीवन से बढ़ कर नहीं हो सकती है. हालांकि कोरोना महामारी के दौरान खबरनवीस अपनी जान पर खेल कर भी खबर दे रहे हैंहमें इस आपदा की कहानियों से रू-ब-रू करवा रहे हैं. महामारी से लड़ने में जनसंचार की अहमियत और केंद्रीयता को सब स्वीकार करते हैं. सही सूचनाएँ जहाँ आम लोगों की दुश्चिंताएँ कम करती हैंवहीं दुष्प्रचार लोगों की परेशानियाँ बढ़ाने का कारण बनते हैं. जनसंचार के माध्यमों का इस्तेमाल जिस रूप में कोरोना महामारी के दौर में हो रहा है उसका सम्यक अध्ययन अभी बाकी है.

बहरहाल, ऐसा लगता है समकालीन घटनाक्रम को संवेदनशील ढंग से सामने रखने के लिए साहित्य पर्याप्त नहीं होता. आधुनिक समय में इसके लिए मीडिया माकूल है. यहाँ पर यह जोड़ना उचित है कि पारंपरिक मीडिया के अलावे सोशल मीडिया की भी इसमें प्रमुख भूमिका है. सूचना क्रांति के बाद मीडिया के अभूतपूर्व प्रसार ने छोटे शहरोंकस्बों और गाँवों को भी केंद्र से जोड़ दिया है. आज हम सब एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हैं. साथ ही तकनीकी ने देश और काल के फासले को कम कर दिया है. यही वजह है कि दिल्ली में बैठा हुआ कोई शख्स दरभंगा में किसी जरूरतमंद को मदद पहुँचा पा रहा है. दिल्ली में बैठा हुआ कोई पत्रकार अमेरिका या लंदन में बैठे महामारी और लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बिना किसी दिक्कत के सलाह-मशविरा करने में कामयाब हैं. इस आपदा ने संपूर्ण मानवता को जिस तरह प्रभावित किया है और संचार तकनीकी का इस्तेमाल कर जिस रूप में इससे लड़ा जा रहा हैमीडिया गुरु मार्शल मैक्लूहन की ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा प्रासंगिक हो उठती है. इस महामारी में मानवीय त्रासदी को हम-सब एक-साथ देख रहे हैंभोग रहे हैं. एक अनिश्चितता और भय सब तरफ व्याप्त है. पर जैसा कि वीरेन डंगवाल ने लिखा हैहर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है/ हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है.

कोराना महामारी की विचलित करने वाले दृश्य (तस्वीरें) हमारी संवेदना को झकझोरने में, उद्वेलित करने में प्रभावी हैं. सड़कों परअस्पतालों मेंघरों में बेबसी की तस्वीरें मुख्यधारा और सोशल मीडिया के हवाले से हमारी चेतना का अंग बनी है और हम एक-दूसरे के दुख और शोक में शरीक हैं.

इस महामारी में पिछले साल लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें मीडिया के माध्यम से आईंवे महाकाव्यात्मक पीड़ा लिए हुए थी. इन तस्वीरों ने देखने के हमारे नजरिए को बदल कर रख दिया. यह पीड़ा के साथ-साथ मानवीय जिजीविषाकरुणा और संघर्ष की तस्वीरें भी थी. साथ ही सामूहिकता और मानवीय सहयोग की सहज तस्वीरें हम इस आपदा में देख रहे हैं. मीडिया इन दृश्यों के माध्यम से पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ रहा है.

कोरोना महामारी के दूसरे वेव में जब प्रतिदिन संक्रमित लोगों की संख्या चार लाख के करीब है और हताहतों की संख्या चार हजारकई पेशेवर पत्रकार भी इससे संक्रमित हो रहे हैं. एक आंकड़ा के मुताबिक पूरे देश में कोराना महामारी से अब तक करीब सौ पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है. कई पत्रकार आज इस वायरस से संक्रमित हैं. पेशे के प्रति अपनी दीवानगी में कुछ पत्रकार इस हालत में भी लोगों के लिए हरसंभव सहायता करते दिखे हैं. सत्ता को कटघरे में खड़े करने में नाकामी और सरकार से सही समय पर सवाल नहीं पूछने की वजह से मीडिया की आलोचना अपनी जगह सही हैपर निस्संदेह जब भविष्य में पत्रकारिता और इस महामारी का इतिहास लिखा जाएगा इसे भी नोट किया जाएगा.

इन सबके बीच देर से ही सही उत्तर प्रदेशबिहारपंजाबपश्चिम बंगाल जैसे अनेक राज्यों ने पत्रकारों को भी महामारी से लड़ने में फ्रंटलाइन वर्कर्स माना है. इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए.

(नेटवर्क 18 हिंदी वेबसाइट पर प्रकाशित)