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Saturday, March 04, 2023

वयस्कों के लिए ही नहीं, बच्चों के लिए भी है पुस्तक मेला पर बाल साहित्य है कहाँ ?


दिल्ली में लगा विश्व पुस्तक मेला इस हफ्ते में समाप्त हो जाएगा. तीन साल बाद लगे इस मेले का इंतजार प्रकाशक, लेखक और पुस्तक प्रेमी शिद्दत से कर रहे थे.

इंटरनेट क्रांति ने पिछले दो दशक में हमारे पढ़ने-लिखने, प्रकाशन और ज्ञान उत्पादन के तरीकों को काफी प्रभावित है. मध्यमवर्ग के पास किताब पढ़ने के लिए समय की कमी हुई है, साथ ही पाठकों का समय ऑनलाइन सर्फिंग, वीडियो देखने, ऑडियो सुनने में जाया होता है. यह समय पुस्तक संस्कृति के लिए चुनौती का है, लेकिन तकनीक ने संभावनाओं का विस्तार भी किया है. किताबों के किंडल, ई बुक, ऑडियो संस्करण आने लगे हैं. प्रकाशकों के लिए सोशल मीडिया किताबों के प्रचार-प्रसार का एक अच्छा मंच बन कर उभरा है. साथ ही यहाँ पुस्तक प्रेमी किताबों की समीक्षा और टीका-टिप्पणी करते रहते हैं.

हिंदी क्षेत्र में जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर सुधरा है, नए पाठक वर्ग भी उभरे हैं जिनमें पढ़ने की खूब ललक है. आर्थिक विकास से मध्यवर्ग की आमदनी में बढ़ोतरी भी हुई. यह अलग बात है कि कोरोना महामारी ने अर्थव्यवस्था को झटका दिया जिससे मध्य और निम्न मध्यवर्ग खूब प्रभावित हुआ. इसका असर इस साल पुस्तक मेले में भी दिखा. पुस्तक मेले में शनिवार-रविवार के दिन चहल-पहल थी, पर बाकी दिनों में रौनक नहीं दिखा. हिंदी के कुछ प्रकाशकों ने पाठकों की अरुचि को कोरोना से जोड़ कर देखा, जिसने किताब पढ़ने की संस्कृति को प्रभावित किया है.

बहरहाल, किताब पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति की शुरुआत बचपन से होती है. इंटरनेट, मोबाइल के दौर में बच्चों को किस तरह से किताब पढ़ने की तरफ मोड़े यह एक चुनौती है. पर क्या हिंदी के प्रकाशक की चिंता में पाठकों का यह वर्ग हैअंग्रेजी या बांग्ला में जिस तरह से बाल साहित्य दिखाई देता है, वैसा हिंदी में नहीं दिखता. ऐसा क्यों हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान के स्टॉल पर बच्चों के लिए कुछ भी दिखाई नहीं देता.

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में अठारह साल से कम उम्र के करीब सैंतालीस करोड़ बच्चे हैं. जाहिर है, एक बहुत बड़ा बाजार है जो प्रकाशकों के इंतजार में है. ऐसा नहीं हिंदी में बच्चों के लिए किताबें नहीं छपती है. नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) से कम कीमत पर विभिन्न विषयों पर किताबें दिखती रही हैं. साथ ही नेहरू बाल पुस्तकालय के तहत भी एनबीटी ने खूब किताबें छापी हैं. पर बच्चों की किताबों में चित्रों, रेखांकन पर जोर होना चाहिए, जिसका अभाव यहाँ हैं. साथ ही नए विषयों को समाहित करने, प्रकाशन मे प्रयोग करने की कोशिश भी यहाँ नहीं दिखती है. फिर भी मेले में एनबीटी के स्टॉल पर भीड़ दिखाई दे रही थी. पर यहां बच्चे कम और उनके अभिभावक ज्यादा थे.

हाल में एकलव्यइकताराकथाप्रथम जैसी संस्थाओं में हिंदी में रचनात्मक और सुरुचिपूर्ण किताबें छापी हैं. इन किताबों की कीमत भी ठीक-ठाक है. अच्छी बात यह है कि इकतारा ट्रस्ट से प्रकाशित किताबों में चर्चित साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल, अरुण कमल, स्वयं प्रकाश, प्रियंवद आदि का लिखा बाल साहित्य दिखाई देता है.

विनोद कुमार शुक्ल को पिछले दिनों साहित्य में योगदान के लिए पेन/नाबाकोव पुरस्कार मिला जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय जगत में है. वे पहले भारतीय एशियाई मूल के लेखक हैं जिन्हें पचास हजार डॉलर का यह सम्मान मिला है. जहाँ उनके लिखे नौकर की कमीज’ और  दीवार में एक खिड़की रहती थीखिलेगा तो देखेंगे’ जैसे उपन्यास, 'महाविद्यालयऔर 'पेड़ पर कमरा जैसे कहानी संग्रह, लगभग जय हिंद’, ‘सब कुछ बचा रहेगा जैसे कविता संग्रह की चर्चा हो रही है वहीं पिछले एक दशक में उन्होंने जो बाल साहित्य लिखा है उसकी चर्चा नहीं होती. मेले में इकतारा के स्टॉल पर बच्चों के लिए उनका लिखा एक चुप्पी जगह, ‘तीसरा दोस्त’ गोदाम, , एक कहानी, ‘घोड़ा और अन्य कहानियाँ तथा बना बनाया देखा आकाशबनता कहां दिखा आकाश’ (कविता संग्रह) आदि दिखाई दिया.

यह पूछने पर कि उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने कैसे बाल साहित्य लिखने की सोचा, शुक्ल ने एक बातचीत में मुझसे कहा: “बच्चों के बारे में मैं लिखता नहीं थापर साइकिल पत्रिका (इकतारा) के संपादक सुशील शुक्ल ने मुझे बच्चों के बारे में लिखने को कहा. मैंने कभी बच्चों के लिए लिखा नहीं था. मैंने अपने लेखन में कभी नहीं सोचा कि इसका पाठक कौन होगा. मैंने कहा कि अब मुझे सोच करके लिखना पड़ेगा कि मेरे पाठक बच्चे हैं. कितनी उम्र के बच्चे पढ़ेंगे और कैसे पढ़ेंगे. फिर उन्होंने कहा कि किसी भी विषय पर लिखिए-हाथी परघोड़े परचींटी परमछली पर.”  इसके बाद उन्होंने बच्चों की पत्रिका प्लूटो, साइकिल आदि के लिए लिखना शुरु किया. 86 वर्षीय शुक्ल इन दिनों बच्चों के लिए ही लिख रहे हैं. बाल साहित्य के लिए यह आश्वस्तिकारक और अन्य रचनाकारों के लिए प्रेरणादायक है.

हर बड़े रचनाकार के दिल में एक बच्चा छिपा बैठा रहता है. दिक्कत यह है कि हिंदी के प्रकाशक उन्हें टटोलने की जहमत नहीं उठाते हैं, उन्हें रचने के लिए प्रेरित नहीं करते. पुस्तक मेला वयस्कों का ही नहीं, बच्चों का भी है. भविष्य में पुस्तक संस्कृति कौन सा रूप लेगी आज के बच्चे ही इसके जिम्मेदार होंगे. 

Tuesday, January 11, 2022

पुस्तक मेले की यादें यानी किताबों से बातें


दिल्ली में होने वाले विश्व पुस्तक मेले की प्रतीक्षा पुस्तक प्रेमी साल भर करते हैं. इसे इसी महीने आठ जनवरी से सोलह जनवरी के बीच होना था. पर पिछले दिनों कोरोना के बढ़ते मामले को देखते हुए इसे स्थगित कर दिया गया. पिछले साल भी इसे ऑनलाइन (वर्चुअल) ही मनाया गया था. कोरोना महामारी के दौरान दो सालों में किताबों की खरीद-फरोख्त, प्रकाशकों-लेखकों से मेल-मिलाप आभासी ही रहा, ऐसे में इस वर्ष के दिल्ली पुस्तक मेले का छोटे-बड़े प्रकाशक, लेखक-पाठक, छात्र-अध्यापक बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.

वर्ष 1972 में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत की गई और इस वर्ष स्वर्ण जयंती मनाने की तैयारी थी. वर्ष 1988 में दिल्ली शीर्षक से लिखी एक कविता में मंगलेश डबराल ने हताशा भरे स्वर में लिखा था- सड़कों पर बसों में बैठकघरों में इतनी बड़ी भीड़ में कोई नहीं कहता आज मुझे निराला की कुछ पंक्तियाँ याद आईँ. कोई नहीं कहता मैंने नागार्जुन को पढ़ा. कोई नहीं कहता किस तरह मरे मुक्तिबोध.’ दिल्ली भले ही राजनीतिक सरगर्मियों का केंद्र होसत्ता की उठा-पटक सुर्खियों में रहे, पिछले दशकों में साहित्य-संस्कृति की नगरी के रूप में इसकी प्रतिष्ठा रही  है. वर्तमान में यह साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों का गढ़ है.

किताब के प्रति प्रेम, पठन-पाठन की संस्कृति भले ही कोलकाता जैसी यहाँ नहीं दिखे, पर देश के विश्वविद्यालयों के मौजूद होने से एक अकादमिक माहौल यहाँ हमेशा दिखता रहा है. ऐसे में पुस्तक मेला किताबों के प्रति आम लोगों के प्रेम को दर्शाता है. पिछले वर्षों में बच्चों के लिए लगने वाले स्टॉलों पर भी खूब भीड़ दिखाई देती रही है. स्कूल जाने वाले बच्चे अपने माता-पिता के साथ यहाँ दिखते हैं. प्रसंगवश दिल्ली में स्थित चिल्ड्रेन बुक ट्रस्टजैसी जगह देश में बेहद कम हैजहाँ के पुस्तकालय में केवल बच्चों के लिए किताबें मौजूद हों. कुछ व्यक्तिगत प्रयासों को छोड़ दें तो पूरे देश में बच्चों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय का सर्वथा अभाव दिखता है. यहाँ तक कि बड़ों के लिए जो पुस्तकालय हैंवहाँ भी बच्चों के लिए किताबों का कोई कोना ढूंढ़ने पर ही मिल पाता है. इस बार के मेले में बच्चों के लिए लिखने वालों का एक कोना भी पुस्तक मेले के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) ने प्रस्तावित किया था.

इसी तरह हिंदी के बुक स्टॉलों पर भी अंग्रेजी के मुकाबले पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. जहाँ वर्तमान समय में शहर में पुस्तक संस्कृति और मध्यवर्ग के जीवन में किताबों की अहमियत घटती दिख रही है वहीं हर साल पुस्तक मेले के आंकडें कुछ अलग ही तस्वीर बयां करते हैं. किताबों के पढ़नेखरीदने और लोगों में बांटने का एक अलग समाजशास्त्र होता है. यह सच है कि जिस अनुपात में लोगों के पास पैसा बढ़ा हैपढ़ने की फुर्सत उतनी ही कम हुई है. पर पुस्तक मेले मे आने जाने वालों लोगों को देख कर निसंस्देह कहा जा सकता है कि एक नया पाठक और नव शिक्षित वर्ग उभरा हैजिसमें पढ़ने की भरपूर ललक है.

पुस्तक मेले में उन लेखकों से अनायास मिलना हो जाता है, जिन्हें आप किताबों में पढ़ते रहे हों. करीब दो दशक पहले हिंदी के चर्चित कवि केदारनाथ सिंह मेले में मिलेमैंने पूछा कि आपने लिखा है कि 'यह जानते हुए भी कि लिखने से कुछ नहीं होगामैं लिखना चाहता हूँ'. ऐसा क्यों लिखा है आपनेकेदारजी ने मुस्कुराते हुए,  आत्मीयता से कहा था यहाँ क्या बोलूंघर आइए, वहीं बैठ कर बात करेंगे.’  मेले के दौरान नवोदित, उभरते हुए रचनाकारों को भी सहज मंच मिल जाता है.  इसी तरह वर्ष 2017 में मंगलेश डबराल की प्रतिनिधि कविताएँ का संकलन मेले के आखिरी दिन मुझे राजकमल प्रकाशन के बुक स्टॉल पर दिखी. मैंने एक प्रति ली और हॉल के बाहर कुछ मित्रों के संग बैठे मंगलेश डबराल को दिखाया था. उन्होंने खुद भी सधप्रकाशित किताब की यह प्रति नहीं देखी थी. इस किताब पर प्रेम से मेरे लिए उन्होंने शुभकामनाएँ अपनी सुंदर लिखावट में दर्ज की. अब बस इन दिवंगत कवियों की यादें हैं.

कोरोना के दौरान पठन-पाठन की संस्कृति खूब प्रभावित हुई जिसका लेखा-जोखा मुश्किल है. महानगरों में स्थित कई किताबघर बंद हुए. ऐसे में पुस्तक मेला पढ़ने-लिखने वालों के लिए रोशनदान की तरह है. उम्मीद की जानी चाहिए कि कोरोना की तीसरी लहर जैसे ही कम होगी एक बार फिर से पुस्तक प्रेमी किताबों से बातें करने’ के लिए मेले में मिलेंगे.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)