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Tuesday, January 11, 2022

पुस्तक मेले की यादें यानी किताबों से बातें


दिल्ली में होने वाले विश्व पुस्तक मेले की प्रतीक्षा पुस्तक प्रेमी साल भर करते हैं. इसे इसी महीने आठ जनवरी से सोलह जनवरी के बीच होना था. पर पिछले दिनों कोरोना के बढ़ते मामले को देखते हुए इसे स्थगित कर दिया गया. पिछले साल भी इसे ऑनलाइन (वर्चुअल) ही मनाया गया था. कोरोना महामारी के दौरान दो सालों में किताबों की खरीद-फरोख्त, प्रकाशकों-लेखकों से मेल-मिलाप आभासी ही रहा, ऐसे में इस वर्ष के दिल्ली पुस्तक मेले का छोटे-बड़े प्रकाशक, लेखक-पाठक, छात्र-अध्यापक बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.

वर्ष 1972 में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत की गई और इस वर्ष स्वर्ण जयंती मनाने की तैयारी थी. वर्ष 1988 में दिल्ली शीर्षक से लिखी एक कविता में मंगलेश डबराल ने हताशा भरे स्वर में लिखा था- सड़कों पर बसों में बैठकघरों में इतनी बड़ी भीड़ में कोई नहीं कहता आज मुझे निराला की कुछ पंक्तियाँ याद आईँ. कोई नहीं कहता मैंने नागार्जुन को पढ़ा. कोई नहीं कहता किस तरह मरे मुक्तिबोध.’ दिल्ली भले ही राजनीतिक सरगर्मियों का केंद्र होसत्ता की उठा-पटक सुर्खियों में रहे, पिछले दशकों में साहित्य-संस्कृति की नगरी के रूप में इसकी प्रतिष्ठा रही  है. वर्तमान में यह साहित्यकारों, संस्कृति कर्मियों का गढ़ है.

किताब के प्रति प्रेम, पठन-पाठन की संस्कृति भले ही कोलकाता जैसी यहाँ नहीं दिखे, पर देश के विश्वविद्यालयों के मौजूद होने से एक अकादमिक माहौल यहाँ हमेशा दिखता रहा है. ऐसे में पुस्तक मेला किताबों के प्रति आम लोगों के प्रेम को दर्शाता है. पिछले वर्षों में बच्चों के लिए लगने वाले स्टॉलों पर भी खूब भीड़ दिखाई देती रही है. स्कूल जाने वाले बच्चे अपने माता-पिता के साथ यहाँ दिखते हैं. प्रसंगवश दिल्ली में स्थित चिल्ड्रेन बुक ट्रस्टजैसी जगह देश में बेहद कम हैजहाँ के पुस्तकालय में केवल बच्चों के लिए किताबें मौजूद हों. कुछ व्यक्तिगत प्रयासों को छोड़ दें तो पूरे देश में बच्चों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय का सर्वथा अभाव दिखता है. यहाँ तक कि बड़ों के लिए जो पुस्तकालय हैंवहाँ भी बच्चों के लिए किताबों का कोई कोना ढूंढ़ने पर ही मिल पाता है. इस बार के मेले में बच्चों के लिए लिखने वालों का एक कोना भी पुस्तक मेले के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) ने प्रस्तावित किया था.

इसी तरह हिंदी के बुक स्टॉलों पर भी अंग्रेजी के मुकाबले पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. जहाँ वर्तमान समय में शहर में पुस्तक संस्कृति और मध्यवर्ग के जीवन में किताबों की अहमियत घटती दिख रही है वहीं हर साल पुस्तक मेले के आंकडें कुछ अलग ही तस्वीर बयां करते हैं. किताबों के पढ़नेखरीदने और लोगों में बांटने का एक अलग समाजशास्त्र होता है. यह सच है कि जिस अनुपात में लोगों के पास पैसा बढ़ा हैपढ़ने की फुर्सत उतनी ही कम हुई है. पर पुस्तक मेले मे आने जाने वालों लोगों को देख कर निसंस्देह कहा जा सकता है कि एक नया पाठक और नव शिक्षित वर्ग उभरा हैजिसमें पढ़ने की भरपूर ललक है.

पुस्तक मेले में उन लेखकों से अनायास मिलना हो जाता है, जिन्हें आप किताबों में पढ़ते रहे हों. करीब दो दशक पहले हिंदी के चर्चित कवि केदारनाथ सिंह मेले में मिलेमैंने पूछा कि आपने लिखा है कि 'यह जानते हुए भी कि लिखने से कुछ नहीं होगामैं लिखना चाहता हूँ'. ऐसा क्यों लिखा है आपनेकेदारजी ने मुस्कुराते हुए,  आत्मीयता से कहा था यहाँ क्या बोलूंघर आइए, वहीं बैठ कर बात करेंगे.’  मेले के दौरान नवोदित, उभरते हुए रचनाकारों को भी सहज मंच मिल जाता है.  इसी तरह वर्ष 2017 में मंगलेश डबराल की प्रतिनिधि कविताएँ का संकलन मेले के आखिरी दिन मुझे राजकमल प्रकाशन के बुक स्टॉल पर दिखी. मैंने एक प्रति ली और हॉल के बाहर कुछ मित्रों के संग बैठे मंगलेश डबराल को दिखाया था. उन्होंने खुद भी सधप्रकाशित किताब की यह प्रति नहीं देखी थी. इस किताब पर प्रेम से मेरे लिए उन्होंने शुभकामनाएँ अपनी सुंदर लिखावट में दर्ज की. अब बस इन दिवंगत कवियों की यादें हैं.

कोरोना के दौरान पठन-पाठन की संस्कृति खूब प्रभावित हुई जिसका लेखा-जोखा मुश्किल है. महानगरों में स्थित कई किताबघर बंद हुए. ऐसे में पुस्तक मेला पढ़ने-लिखने वालों के लिए रोशनदान की तरह है. उम्मीद की जानी चाहिए कि कोरोना की तीसरी लहर जैसे ही कम होगी एक बार फिर से पुस्तक प्रेमी किताबों से बातें करने’ के लिए मेले में मिलेंगे.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Thursday, September 02, 2021

सिनेमा संस्कृति की बदलती तस्वीर


मुंबई भले ही मायानगरी हो, सिनेमा की संस्कृति दिल्ली में फली-फूली. आम दर्शकों के अलावे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कई नेता सिनेमाप्रेमी हुए हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूलालकृष्ण आडवाणी से लेकर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक. पिछले दिनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमाहॉल के आधुनिक साज-सज्जा और तकनीक से लैसनवीन रूप का उद्घाटन किया तो उन्होंने शिद्दत से सिनेमा के प्रति अपने प्रेम को याद किया. प्रिया में ही बैल बॉटम’ फिल्म के ट्रेलर के लांच के अवसर पर अभिनेता अक्षय कुमार ने उन दिनों को याद किया जब ब्लैक में टिकट लेकर उन्होंने दिल्ली के अम्बा सिनेमाहॉल में अमर अकबर एंथोनी’ देखी थी. किसी भी शहर की संस्कृति को सिनेमा के रास्ते भी हम देख-परख सकते हैं.  दिल्ली में कई पुराने सिनेमाघर आज बंद हो गए हैंपर उन सिनेमाघरों की स्मृति लोगों के जेहन में है. मिनरवा, फिल्मिस्तान, कमल, पारस, सावित्री कुछ ऐसे ही नाम हैं. किसी भी शहर के लिए सिनेमाघर लैंडमार्क की हैसियत रखते हैं. सिनेमाघरों की रोशनी से शहर के कोने प्रकाशित होते रहे हैं.

यूँ तो किसी भी सिनेमा हॉल के नवीनीकरण की घटना सामान्य ही कही जाएगीलेकिन दिल्ली की सिनेमा संस्कृति में प्रिया सिनेमाहॉल खास महत्व रखता है. कोरोना महामारी से पहले ही इसे नए रूप में लाने की तैयारी शुरु हुई थी. महामारी के दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेनसिंग की वजह से करीब दो साल के बाद इसे आम दर्शकों के लिए फिर से खोला गया है.

प्रसंगवश, महामारी के दूसरी लहर के बाद बैल बॉटम’ बॉलीवुड की पहली बड़े बजट की फिल्म है जिसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया है. हालांकि सिनेमाघरों में अभी भी पचास प्रतिशत सीट ही दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं. ऐसे में डिस्टेनसिंग का पालन करते हुए परिवार या दोस्तों के साथ सिनेमा देखने का लुत्फ नहीं उठाया जा सकता है. जाहिर है, कोरोना महामारी के दौरान ओटीटी प्लेटफार्म ने मध्यवर्गीय दर्शकों के सिनेमा देखने की संस्कृति को काफी बदल दिया है. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान जोर देकर कहा कि अभी लोग लैपटॉपटीवीमोबाइल पर सिनेमा देख रहे हैंपर सिनेमा को वापस हॉल में आना ही होगा. यह एक सामूहिक अनुभव है. छोटे परदे पर आप दृश्यध्वनि की बारीकियों से वंचित हो जाते हैं. घर में बहुत तरह के व्यवधान भी मौजूद रहते हैं. महीनों बाद जब हम सिनेमाहॉल (पीवीआर प्रिया XL) में पहुँचे तो इसे बखूबी महसूस किया. हालांकि यह नोट करना उचित होगा कि अक्षय कुमार अभिनीत बैल बॉटम’ हाल ही में ओटीटी पर रिलीज हुई मलयालम फिल्मों के टक्कर की नहीं कही जा सकती. कोरोना महामारी के दौरान इस फिल्म की शूटिंग हुई थी जिसका दबाव इस फिल्म के निर्माण-निर्देशन में है.

बहरहालउदारीकरण-भूमंडलीकरण के कारण पिछले सदी के नब्बे के दशक में समाज में आए बदलावों के साथ ही महानगरों में सिनेमा देखेने की संस्कृति भी प्रभावित हुई. सिंग्ल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले लिया और सिंग्ल स्क्रीन थिएटर धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए. आज देश में करीब तीन हजार स्क्रीन मल्टीप्लेक्स में उपलब्ध हैं. प्रिया सिनेमा के मालिक अजय बिजली ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोडशो के साथ साझेदारी में प्रिया विलेज रोडशो लिमिटेड (1995)जिसे पीवीआर से नाम से हम जानते हैंशुरु किया.  इस साझेदारी को वे प्रिया के साथ ही आरंभ करना चाह रहे थेइसलिए इसे पीवीआर नाम दिया गया, पर दक्षिण दिल्ली में स्थित अनुपम सिनेमाघर को मल्टीप्लेक्स में बदल कर वर्ष 1997 में इसकी विधिवत शुरुआत हुईप्रिया भी वर्ष 2000 में पीवीआर प्रिया में तब्दील हुआ. इसे आज भी सिंग्ल स्क्रीन ही रखा गया है.

जेएनयू के बेहद करीब होने की वजह से  कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के मिलने-जुलनेडेटिंग का प्रिया सिनेमा एक प्रमुख अड्डा था. बदलती दिल्ली की एक छवि यहाँ आने पर मिल जाती थी. 70 के दशक में शुरु हुए इस सिनेमा हॉल के बारे में सिनेमा समीक्षक जिया उस सलाम ने दिल्लीफोर शोज में लिखा है, वर्षों तक प्रिया धनी-मनी सिनेमा प्रेमियोंमहिलाओं और पुरुषों के लिए ऐसी जगह रहा जिनके लिए सिनेमा का मतलब हॉलीवुड की ताजातरीन फिल्में थी. कभी-कभी यहां मध्यमार्गी हिंदी फिल्में भी दिखाई जाती थीपर व्यावसायिक मसाला फिल्मों से निश्चित दूरी रही. हालांकि बाद के दशक में ही बॉलीवुड की फिल्मों पर यहाँ जोर बढ़ा. इसी बीच समाज में नव मध्यमवर्ग का उभार भी हुआजिसे हम बॉलीवुड की फिल्मों की विषय-वस्तु में भी देखते हैं. प्रसंगवश, पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की आवक से नए तरह की सिनेमा के बनने और प्रसारण का रास्ता भी निकला है. कम बजट की ऑफ बीट फिल्मेंजो बॉलीवुड के स्टारों की लकदक से दूर हैं, आसानी से यहाँ दिखाई जाने लगी है.

यह तय है कि आने वाले समय में बॉलीवुड को ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मोंवेबसीरिजों से चुनौती का सामना करना पड़ेगा. सवाल है कि सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींच लाने के लिए क्या बॉलीवुड तैयार है? सवाल यह भी है कि सिनेमाघरों तक जाने के लिए युवा दर्शक तैयार हैं या सिनेमाहॉल आने वाले समय में नॉस्टेलजिया का हिस्सा बन कर रह जाएगी?

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Sunday, February 28, 2021

कामगारों के दुख की ध्वनियाँ- ‘ईब आले ऊ’


कई फिल्म समारोहों में दिखाए जाने के बाद प्रतीक वत्स के निर्देशन में बनी फिल्म ईब आले ऊ को पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज किया गया है. एक लंबे अरसे के बाद हिंदी में कोई ऐसी फिल्म बनी है जिसमें रोजगार का सवाल, समाज में वर्गीय विभाजन और समकालीन राजनीति पर एक तीखी टिप्पणी है. हालांकि इसे ऐसे बिंबों और ध्वनियों के माध्यम से कहा गया है जिसका विश्लेषण शब्दों में मुश्किल है.

आम तौर पर हम सिनेमा में ध्वनि के इस्तेमाल पर गौर नहीं करते हैं. इस फिल्म के नाम में तीन ध्वनियाँ हैं. ईब-बंदर के लिए, आले-लंगूर के लिए और ऊ-मनुष्य के लिए. विभिन्न प्रकार के ध्वनियों को जिस कुशलता से इस फिल्म में समाहित किया गया है वह इसे विशिष्ट बनाता है. इस फिल्म का कथानक दिल्ली के रायसीना हिल के आस-पास बुना गया है. यहाँ पर सरकारी दफ्तर हैं, राजपथ पर गणतंत्र दिवस का परेड होता है. लेकिन यहाँ बंदरों का वर्चस्व है और उनका आतंक एक सच्चाई. रायसीना हिल सत्ता का प्रतीक भी है. सत्ता को बंदरों के आतंक से बचाए रखने के लिए कुछ लोगों को बकायदा नौकरी पर रखा जाता है, जो बंदरों को भगाने में माहिर होते हैं. एक बेहतर जिंदगी की तलाश में दिल्ली आए ग्यारहवीं पास अंजनी को इस नौकरी पर उसके जीजा रखबा देते हैं. खुद जीजा और अंजनी की बहन की आर्थिक स्थिति दयनीय है और वे झुग्गी झोपड़ी में रह कर किसी तरह जीवन बसर कर रहे हैं.

गालिब की दिल्ली में अंजनी वजीफाख्वार हुआ पर उसे शाह की दुआ नहीं मिलती. उसे महिंद्र का साथ मिलता है जो सात पुश्तों से ईब आले ऊ की ध्वनि निकाल कर बंदरों को भागता रहा है. महिंद्र के लिए यह ध्वनि निकालना जितना आसान है, अंजनी के लिए वह उतना ही मुश्किल साबित होता हैवह अंजनी से बंदरों की तरह सोचने की ताकिद करता है. अंजनी के लिए नौकरी निभाने और उसे बचाने की जद्दोजहद शुरू होती है. वह बार-बार अपने काम में उलझता जाता है. एक जगह वह कहता हैं- कहाँ नरक में लाके फंसा दिए हैं.’  दिल्ली में रहने वाले प्रवासी कामगारों को जिस अमानवीय परिस्थितियों में नौकरी करनी होती है वह हाशिए के समाज का ऐसा सच है जो सत्ता और सुविधाभोगी वर्ग की आँखों से ओझल ही रहता है.

यह फिल्म बिना किसी मेलोड्रामा के कामगारों के संघर्ष और जिजीविषा को हमारे सामने लेकर आती है. अंजनी के किरदार में शारदुल भारद्वाज का अभिनय दोष रहित है. एक बिहारी प्रवासी की भाषा, माधुर्य, भंगिमा और क्षोभ मिश्रित हताशा के भाव को उन्होंने बखूबी पकड़ा है. वहीं महिंद्र के किरदार में महिंद्र नाथ हैं जो निजी जीवन में बंदर पकड़ने का काम करते हैं. इस फिल्म में कैमरा बंदरों के करतूतों को सहजता से कैद करता है, जो हास्य का संचार करता है. सामाजिक यथार्थ को चित्रित करते हुए फिल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती है. बिंबों और रूपकों का इस्तेमाल कर यह फिल्म धार्मिक कट्टरता, राष्ट्रवाद और समकालीन राजनीति पर टिप्पणी करने से भी नहीं चूकती. अपनी पहली फिल्म में जिस विश्वास के साथ प्रतीक वत्स सामने आते हैं उनसे काफी उम्मीद बंधती है.


(प्रभात खबर, 28 फरवरी 2021)

Sunday, June 28, 2020

छोटी फिल्में, बातें बड़ी: अखोनी


बॉक्स ऑफिस के आंकड़ो का दबाव बॉलीवुड के फिल्मकारों को प्रयोग करने से हमेशा रोकता रहा है. अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक अपवाद हैं. ऐसे में ‘ओवर द टॉप’ वेबसाइट (नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉट स्टार आदि) प्रयोगशील फिल्मकारों के लिए एक उम्मीद बन कर उभरे हैं. सबटाइटल के माध्यम से दुनिया भर के दर्शकों तक एकसाथ फिल्मों की पहुँच ने फिल्मकारों को नए विषय-वस्तु को टटोलने की ओर प्रवृत्त किया है. पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई लेखक-निर्देशक निकोलस खारकोंगोर की ‘अखोनी’ ऐसी ही फिल्म है, जिसमें नस्लवाद जैसे संवेदनशील विषय को मनोरंजक अंदाज में चित्रित किया गया है.


यह फिल्म उत्तर-पूर्वी राज्यों के युवाओं और उनकी खान पान की संस्कृति के इर्द-गर्द घूमती है. फिल्म के केंद्र में ‘अखोनी’ (एक प्रकार का फरमेंटेड सोयाबीन जो उत्तर-पूर्वी राज्यों में पाया जाता है और खाने में जिसका प्रयोग किया जाता है) का तीव्र गंध है. आस्कर पुरस्कार से सम्मानित बहुचर्चित दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘पैरासाइट’ में गंध समाज में व्याप्त वर्ग विभेद को सामने लेकर आता है जबकि इस फिल्म में गंध के माध्यम से नस्लीय भेदभाव से हम रू-ब-रू होते हैं.

फिल्म दक्षिणी दिल्ली के हुमायूंपुर इलाके में अवस्थित है जहाँ रंग और रूप के आधार पर ‘आत्म’ और ‘अन्य’ का विभेद स्पष्ट है. एक दोस्त की शादी के अवसर पर ‘अखोनी पोर्क’ व्यंजन की तैयारी और उसे पकाने के लिए एक ‘सुरक्षित जगह’ की तलाश की जद्दोजहद असल में दिल्ली जैसे महानगर में युवा प्रवासियों के लिए सपनों के ठौर की तलाश भी है. ‘अखोनी’ के गंध के साथ घर से बिछुड़ने की पीड़ा और स्मृतियों का दंश भी लिपटा हुआ चला आता है.

हिंदी फिल्मों में उत्तर-पूर्वी राज्यों की संस्कृति का चित्रण गायब है. अगर कोई किरदार नजर आता है, तो वह अमूमन स्टीरियोटाइप होता है. शिलांग में पले-बढ़े निकोलस खारकोंगोर इन राज्यों की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को चित्रित करने में सफल रहे हैं. फिल्म में एक दृश्य है जहाँ मित्र अपने परिचितों-संबंधियों से फोन पर जिस भाषा में बात करते हैं वह कमरे में मौजूद एक-दूसरे के लिए अबूझ है. सयानी गुप्ता और डॉली अहलूवालिया जैसे कलाकारों के साथ इस फिल्म में ज्यादातर किरदार उत्तर-पूर्वी राज्यों से ही हैं.

कोरोना महामारी के बीच रंग और रूप के आधार पर भेदभाव की प्रवृत्ति और बढ़ गई है. यह जहाँ भारतीय समाज मे व्याप्त पाखंड और पूर्वाग्रहों को हमारे सामने लेकर आता है, वहीं राज्यसत्ता पर भी सवाल खड़े करता है. हुमायूंपुर जैसे शहरीकृत गाँव (अर्बन विलेज) का चयन फिल्म की विषय वस्तु के हिसाब से सटीक है. यह इलाका उत्तर-पूर्वी राज्यों और अफ्रीकी नागरिकों के लिए सस्ता रिहाइश है जहां विभिन्न भाषाओं-संस्कृतियों के बीच खान-पान के अड्डों के माध्यम से आदान-प्रदान होता रहता है.

दिल्ली में अवस्थित होने के बावजूद इस फिल्म में ना तो लाल किला है, ना ही इंडिया गेट. कैमरा हुमायूंपुर और आस-पास की गलियों तक ही सीमित है जो सामाजिक यथार्थ के बेहद करीब है.

(प्रभात खबर, 28 जून 2020)

Monday, April 27, 2020

सिनेमाघर में बसे यादों के जुगनू


दुनिया भर में कोरोना वायरस की वजह से सिनेमाघरों पर ताले लगे हैं. सोशल डिस्टेनसिंगजैसे शब्द सिनमाघरों के भविष्य पर सवाल बन कर खड़े हैं. हालांकि चीन में करीब दो महीने बाद पाँच सौ सिनेमाघरों को फिर से खोला गया, पर दर्शकों के उत्साह नहीं दिखाने के बाद इन्हें फिर से बंद कर दिया गया.

लॉकडाउनके बीच सिनेमाप्रेमियों में सिनेमाघरों को लेकर एक तरह का नॉस्टेलजिया देखने को मिल रहा है. मुंबई भले ही बॉलीवुड का आंगन हो, सिनेमा की संस्कृति आजाद भारत में दिल्ली में फली-फूली. साल 1995 में जब मैं दिल्ली आया, वह हॉलीवुड का सौंवा साल था. यह साल भारतीय सिनेमा के प्रदर्शन, सिनेमा देखने-दिखाने की संस्कृति को बदल कर रख देने वाला साल भी है. इसी साल पीवीआर लिमिटेड (प्रिया विलेज रोड शो) अस्तित्व में आया. संयोगवश, दिल्ली में पहली फिल्म बेसिक इंस्टिंक्ट (माइकल डगल्स और शेरोन स्टोन अभिनीत)मैंने दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमामें ही देखी थी. 

उन दिनों के अखबारों में इस फिल्म की खूब चर्चा थी. इस फिल्म को सर्टिफिकेट दिया गया था और मैं तब अठारह साल का नहीं हुआ था. किसी तरह मान-मनुहार कर मैं सिनेमा हॉल में घुस गया था. बालकनी के बाहर हॉलीवुड के विभिन्न दशकों के फिल्मों के पोस्टर लगे थे, जो सिनेमा के सौ वर्षों की यात्रा को दिखाते थे.

आज किसी शहर की संस्कृति को हम सिनेमाघरों के रास्ते भी परख सकते हैं. सिनेमा के इतिहास को पत्रकार और समीक्षक जिया उस सलाम ने अपनी किताब देल्ही 4 शोज: टाकिज ऑफ यस्टरइयरमें सिनेमाघरों के माध्यम से बखूबी समेटा है. उन्होंने लिखा है कि प्रिया और उसके साथ चाणक्य और अर्चना 80 के दशक के मध्य तक अंग्रेजी फिल्में दिखाने के लिए मशहूर थे, जबकि शीला, ओडियन और रिवोली हिंदी सिनेमा दिखाने की ओर पूरी तरह कदम बढ़ा चुके थे. कभी-कभार हॉलीवुड की फिल्मों के लिए एक खिड़की इन्होंने खुली छोड़ रखी थी.’ 

हालांकि 90 के दशक में यहाँ भी हिंदी फिल्में दिखाने का चलन जोर पकड़ा, पर हॉलीवुड की फिल्में भी नियमित रूप से दिखाई जाती रही. सही मायनों में मेरे जैसे सिनेमाप्रेमी के लिए सिनेमाघर फिल्म एप्रिशिएशनका एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है. मल्टीप्लेक्स के दौर में जवान हो रही पीढ़ी और लॉकडाउन के बीच ओवर द टॉपस्ट्रीमिंग वेबसाइट (नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉट स्टार आदि)पर सिनेमा का लुत्फ लेने वाले सिनेमाप्रेमियों को बालकनी, रियर और स्टॉल जैसे शब्दों के अर्थ ढूंढ़ने के लिए शब्दकोश का शायद सहारा लेना पड़े.

प्रसंगवश, 1918-20 में जब स्पेनिश फ्लूवायरस दुनिया में फैली थी, तब भी सिनेमाघरों को बंद किया गया था, पर उस वक्त ऐसे एकमुश्त ताले नहीं लगे थे. उस वक्त भारत जैसे देश में सिनेमा की संस्कृति ठीक से विकसित भी नहीं हुई थी. बाद में टेलीविजन के आने से फिल्म संस्कृति पर ग्रहण लगता दिखा था, पर सिनेमाघर टिके रहे. ज्यादातर सिनेमाघर सिंग्ल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स में तब्दील हुए. मॉल की संस्कृति, सिनेमा की संस्कृति से जुड़ती गई. उम्मीद करें कि जब कोरोना का कोहरा छटेगा अंधेरे बंद कमरों में चमकते जुगनूओॆ का जादू लोगों को फिर से सिनेमाघर खींच लाने में कामयाब होंगे. सिनेमा से बड़ा मनोरंजन का कोई जरिया भी तो नहीं!

(प्रभात खबर, 26 अप्रैल 2020)

Saturday, February 01, 2020

शाहीन बाग़ की औरतें


मशहूर शायर निदा फाजली का एक शेर है-हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना. ठीक इसी तरह एक शहर में कई शहर बसते हैं और कई बार शहर हमारे सामने ऐसी रूप में उपस्थित होता है, जिसे देख कर हम खुद चकित हो उठते हैं. दिल्ली में भले ही मैं वर्षों से रह रहा हूँ पर निश्चित तौर पर नहीं कह सकता कि मैं शहर को ठीक से जानता हूँ.

पिछले दिनों दक्षिण दिल्ली में स्थित शाहीन बाग इलाका गया तो कुछ ऐसा ही एहसास हुआ. शाहीन बाग में सैकड़ों महिलाएं नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का विरोध करने के लिए पिछले डेढ़ महीने से प्रदर्शन कर रही है. उल्लेखनीय है कि नागरिकता संशोधन कानून के तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है. सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता बार बार यह कह रहे हैं कि इस कानून से किसी भी भारतीय की नागरिकता नहीं जाएगी, वहीं प्रदर्शनकारियों का कहना है कि धर्म आधारित नागरिकता का यह प्रावधान विभेदकारी और संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.

देश में स्त्रियों के संघर्ष का सौ साल से पुराना इतिहास रहा है. कई राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में स्त्रियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है और नेतृत्व प्रदान किया है. इस विरोध प्रदर्शन को इसी कड़ी में देखा जा सकता है. हालांकि यह प्रदर्शन कई मायनों में देश में पहले हुए विरोध प्रदर्शनों से अलग है. हाल के दशकों में ऐसा प्रदर्शन देश में नहीं देखा गया है जो आइडिया ऑफ इंडियाकी भावना को शब्द और कर्म के जरिए मूर्त करता हो. छिटपुट हुए हिंसा को छोड़ दिया जाए तो सीएए के खिलाफ ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे हैं. असल में स्वत: स्फूर्त यह प्रदर्शन गाँधी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा से प्रेरित है. इसके पीछे कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं है. इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन से प्रेरित हो कर दिल्ली में अन्य जगहों और देश के अन्य शहरों-कोलकाता, मुंबई, बैंग्लौर, पटना, गया आदि में भी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. गाँधी, नेहरू, आंबेडकर की तस्वीरें बैनरों और पोस्टरों में हर कहीं नजर आती है. इंकलाबी गीत और नारे देशप्रेम से लबरेज हैं. जहाँ राजनीति की भाषा में एक कटुता है वहीं पोस्टरों और गीतों की भाषा एक नई रचनात्मकता लिए हुए हैं जिसे सोशल और पापुलर मीडिया में नोटिस किया जा सकता है.

हालांकि दिल्ली में होने वाले चुनाव के मद्देनजर शाहीन बाग को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों में टीका-टिप्पणी शुरु हो गई है. पर हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने सड़कों पर हो रहे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन में युवाओं की भागेदारी की प्रशंसा की. साथ ही उन्होंने कहा कि खास तौर पर जिस तरह से संविधान पर जोर और उसके प्रति आस्था व्यक्त की जा रही है वह सुकून देने वाला है.


यह प्रदर्शन लोकतंत्र और नागरिक समाज की मजबूती को दिखाता है. उस देर रात शाहीन बाग में अद्भुत नजारा था. मंच से संविधान की प्रस्तावना पढ़ने का आह्वान किया जा रहा था और सैकड़ों लोग प्रस्तावना में लिखे स्वतंत्रता, समता, बंधुता को दुहरा रहे थे. मुस्लिम बहुल इलाके में हो रहे इस प्रदर्शन में विभिन्न धर्मों के लोग मौजूद थे. कॉलेज जाने वाले युवाओं की उपस्थिति खास तौर पर रेखांकित करने वाली थी. पंडाल और गलियों में राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे थे. भारतीय संविधान के लागू होने के 70 वर्ष पूरे होने पर संवैधानिक मूल्यों में आस्था दिखाते हुए नागरिकता संशोधन कानून के विरोध का यह तरीका मानीखेज है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शिक्षक, एक मित्र ने टिप्पणी की- मुस्लिम महिलाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन से उनके निजी जीवन में भी बदलाव आएगा और राजनीतिक चेतना से संपन्न अगली पीढ़ी बदलाव का मशाल थामेगी.

शाहीन बाग के प्रदर्शन को लेकर मीडिया, खास कर टेलीविजन मीडिया में दो फांक है. पिछले वर्षों में टेलीविजन चैनलों का ध्यान ऐसे मुद्दों पर स्टूडियो में बहस करवाने पर ज्यादा रहता है जिसमें नाटकीयता और सनसनी का भाव हो. इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होता, बल्कि मनोरंजन पैदा करना होता है. एक आक्रमता दिखाई देती है, जो सार्थक बहस-मुबाहिसा के अनुकूल नहीं कही जा सकती. सच तो यह है कि टेलीविजन स्टूडियो से ज्यादा नागरिकता और संविधान के प्रावधानों पर बहस इन्हीं प्रदर्शन स्थलों, सड़कों पर हो रही है.

असल में, कुछेक अपवाद को छोड़ कर मीडिया में वर्षों से स्टिरियोटाइप छवि मुसलमानों की पहचान को लेकर परोसी जाती रही है, प्रोपेगंडा फैलाया जाता है. शाहीन बाग जैसी जगह उसके विपरीत एक अलग विमर्श को जन्म देता है जो लोकतांत्रिक मूल्यों और भारतीयता के पक्ष में है.

(जानकी पुल, 1 फरवरी 2020)

Tuesday, November 20, 2018

उम्मीद-ए-सहर की बात


दीवाली के हफ्ते भर पहले से पांच साल की कैथी कुछ पंक्तियां गुनगुना रही थी- चकरी, बम, हवाई इनसे बचना भाई/ दीवाली आयी, खुशियों की बहार है लायी. मैंने उससे पूछा कि कहां से सीखी? उसने कहा कि स्कूल में मैडम ने सिखाया. फिर उसने मुझे दीवाली में बम-पटाखों से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण, बड़े-बूढ़ो को आने वाली दिक्कतें और इसकी वजह से जानवरों के अंदर होने वाले भय के बारे में बताया. आश्चर्य हुआ मुझे कि उसने मुझसे ग्रीन पटाखों के बारे में बात की और कहा कि अगले साल से हम उसे जलायेंगे.

 उच्चतम न्यायालय ने इस साल दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की ब्रिकी और इस्तेमाल पर रोक लगा दिया था और सिर्फ ग्रीन पटाखे की इजाजत दी थी.

 साथ ही रात आठ से दस बजे के बीच ही पटाखे फोड़ने की समय सीमा तय कर दी थी. काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के नेशनल इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट की वैज्ञानिक डॉक्टर साधना रायलु से फोन पर जब मैंने पिछले दिनों बात की थी, तब उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वर्तमान में भारत में ग्रीन पटाखों का उत्पादन नहीं होता है.

 इस दीवाली कैथी ने कोई भी पटाखा खरीदने की जिद नहीं की. पर दीवाली की रात ऐसा लगा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना जम कर हुई और लोगों ने मन से आतिशबाजी की. मीडिया में जो रिपोर्ट आयी, उसमें मास्क पहन कर लोग पटाखे जलाने में मशगूल दिखे. जाहिर है पहले से ही दिल्ली की प्रदूषित हवा, दीवाली की सुबह अवैध पटाखोंकी वजह से फैली गर्दो-गुबार से और भी प्रदूषित हुई.

 क्या पर्यावरण की चिंता सिर्फ न्यायालय की है? क्या इसमें नागरिकों और नागरिक समाज की कोई भूमिका नहीं है? स्पष्ट है कि न्यायालय की बात और आदेश का असर आम नागरिकों पर नहीं पड़ा और राजनीतिक पार्टियों में भी पर्यावरण के मुद्दों पर कोई आम सहमति नहीं दिखती. 

मैं कई ऐसे बुर्जुगों को जानता हूं जो दशकों से दिल्ली में रहते आए हैं, पर हाल के वर्षों में, दीवाली के दौरान, दिल्ली-एनसीआर छोड़ कर हफ्ते-दस दिन के लिए शहर से बाहर चले जाते हैं.  पर उनका क्या हाल है जो शहर छोड़ने में असमर्थ हैं? उन गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों की किसे चिंता है जो  प्रदूषण की मार झेल रहे हैं?

मुझे ऐसा लगा कि पांच साल की एक बच्ची जो बात आसानी से समझ सकती है, वह तथाकथित पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के पल्ले नहीं पड़ा. पर्यावरण उनकी चिंता का विषय है ही नहीं. खाओ, पीओ और ऐश करो को मंत्र की तरह दुहारने वाला और वर्तमान में जीने वाला यह वर्ग, भविष्य के प्रति न तो संवेदनशील है, न हीं समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार. फिर उम्मीद किस से है? मेरी समझ से उम्मीद स्कूली शिक्षा ले रहे इन्हीं बच्चों से है.

(प्रभात खबर, 20 नंवबर 2018 को प्रकाशित)

Thursday, November 08, 2018

बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स

मेरी किताब बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स' की प्री बुकिंग हो रही है।  अमेज़न से आप ख़रीद सकते हैं। किताब अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से छपी है।

https://www.amazon.in/dp/B07K3CDC5J

किताब के बारे में: 


यह किताब वैचारिक लेखन में बहुआयामी है। लेखक की संवेदनशील दृष्टि, विषय-वस्तु का दायरा, मार्मिक अंदाज़ और सहज भाषा एक अलग आस्वाद लिए है जिसे लेखन की किसी एक विधा में अंटाया नहीं जा सकता।

संकलित लेखों में निजीपन, व्यक्ति विशेष, लोक-शहर के प्रति अनुराग एकाधिक बार है। लंदन, पेरिस, वियना, शंघाई, कोलंबो, दिल्ली, बंगलुरु, पुणे, श्रीनगर के साथ-साथ मैकलोडगंज, मगध, मिथिला व बेलारही, तिलोनिया, तरौनी जैसे गाँव भी हैं। जेएनयू और जिगन विश्वविद्यालय भी है। ग्लोबलऔर लोकलकी इस घुमक्कड़ी में जहाँ कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही। समंदर की आवाज़ के साथ-साथ डबरा, चहबच्चा की अनुगूंज भी है। होटल-रेस्तरां के साथ-साथ ढाबा भी।

इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज़ है। उदारीकरण के बाद अख़बार के पन्नों पर फैली ख़ुश ख़बरहै। न्यूज़रूम नेशनलिज्मकी आहट भी। बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का शोक गीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की ख़ुशबू एक तरफ़ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ़।

उदास गिरगिट से बात करता हुआ एक विद्रोही कवि है। हाथ पकड़ कर सिखाने वाला एक कबीरा पत्रकार है। स्वभाव के विपरीत नहीं जाने की सलाह देने वाला एक फक्कड़ फ़िल्मकार भी। एक तरफ़ नॉस्टेल्जिया, स्मृति और विस्मृति के गह्वर हैं, दूसरी तरफ़ वर्तमान का यथार्थ है और भविष्य के रोशनदान भी।

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में, 21वीं सदी के दो दशकों के बीच, लिखे गए इन लेखों में एक पत्रकार और शोधार्थी का साझा अनुभव है। वादी स्वर एक ब्लॉगर का है। शैली-मैंऔर टोका-टोकीकी है।

किताब अंश: 

https://satyagrah.scroll.in/article/122229/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-writer-arvind-das

https://www.thelallantop.com/bherant/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-by-arvind-das/

https://www.jankipul.com/2018/11/special-write-up-on-baba-nagarjun.html