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Saturday, November 09, 2024

इंटरव्यू: ‘मुझे ऐसा सिनेमा पसंद है जो सोचने पर मजबूर कर दे’

 मूर्धन्य कलाकार मोहन अगाशे की शख्सियत के कई पहलू हैं। एक अभिनेता के बतौर उन्होंने समानांतर सिनेमा के कई प्रतिष्ठित निर्देशकों के साथ काम किया। घासीराम कोतवाल (1972) नाटक में अपनी भूमिका के लिए वे खास तौर से जाने जाते हैं। वे मनोचिकित्सक भी हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर उन्होंने कई फिल्में बनाई हैं। वे भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान (एफटीआइआइ) के निदेशक भी रह चुके हैं। उनके जीवन और काम के बारे में हाल ही में अरविंद दास ने उनसे बातचीत की। संपादित अंशः

 आपकी रंगमंचीय यात्रा से बात शुरू करते हैं। रंगमंच पर अभिनय का अपना पहला अनुभव आपको याद है?

मेरे लिए अभिनय बच्चों के खेल जैसा था। जैसे हम सभी तीन, चार या पांच साल की उम्र में कुछ हरकतें करते हैं। जैसे, हम सब नकल मारते हैं, चाहे शिक्षकों की नकल हो, पिता की हो या किसी और की। यह सम्प्रेेषण का एक माध्यम होता है। बेशक यह पेशेवर नहीं होता। अभिनय मेरे स्वभाव में है। खुद के और दुनिया के बारे में जानने का यह एक कुदरती तरीका है। जिस स्कूल में मैं पढ़ा वहां कुछ शिक्षक नाटक करने में अच्‍छे थे। मैं भी खुशकिस्मत रहा क्योंकि उसी दौरान सई परांजपे और अरुण जोगलेकर ने पुणे में बाल रंगमंच की शुरुआत की थी। वे पुणे आकाशवाणी पर हर रविवार प्रसारित होने वाले बालोद्यान नाम के एक कार्यक्रम के लिए बच्चे तलाश रहे थे। यह पचास के दशक के अंत और साठ के दशक के आरंभ की बात है। उससे पहले मैंने रवींद्रनाथ ठाकुर की जन्मशती पर डाकघर नाम के एक नाटक में एक बीमार बच्चे अमल का किरदार निभाया था। दुनिया से उसका संवाद का माध्यम केवल एक खिड़की थी, जहां खड़ा होकर वह दोस्त बनाता था।

डाकघर आकाशवाणी के लिए था?

नहीं, वह तो पुणे में सार्वजनिक मंचन के लिए था। मैं ‘महाराष्ट्र कालोपासक’ नाम की एक रंगमंडली से जुड़ा हुआ था। यह उसका नाटक था। महाराष्ट्र में छोटे-छोटे रंगमंडलों की मजबूत परंपरा रही है। जैसे, विजय मेहता ने ‘रंगायन’ नाम की मंडली से शुरुआत की थी। सत्यदेव दुबे का भी एक थिएटर यूनिट था। भालबा केलकर का ‘प्रोग्रेसिव ड्रामैटिक एसोसिएशन’ था। उस समय मैं अपनी रंगमंडली के अलावा रविवार को बालोद्यान में भी जाता था। उसमें गोपीनाथ तलवार, सई परांजपे और नेमिनाथ नाम के एक और सज्जन थे। मैंने सई के नाटक निरुपमा आणि परिरानी में अभिनय किया था। बाद में उस पर एक फिल्म भी बनी थी। विनय काले ने सई की स्क्रिप्ट पर 1961 में फिल्म बनाई, जिसमें मैंने पिनोकियो का रोल किया। वह मेरी पहली फिल्म थी।

मोहन अगाशे

मतलब आप पहले अभिनेता बने, फिर डॉक्टर और फिर एफटीआइआइ निदेशक?

अभिनेता बनने वाला कोई भी व्यक्ति शुरुआत बचपन से ही करता है। हो सकता है कि वह रंगमंच पर न हो और अपने घर में ही अभिनय कर रहा हो।

आप जुलाई 1947 में जन्मे थे, यानी आजाद भारत। अपनी जिंदगी और भारत के जीवन की यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

आजकल हर चीज को बौद्धिकता में लपेटने का चलन बन चुका है। मेडिकल कॉलेज पहुंचने तक मैं विश्लेषण नहीं करता था, बस काम करता था। मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो बहुत बौद्धिक होते हैं। मुझे लगता है जिंदगी को जब आप पीछे मुड़कर देखने लग जाते हैं तो वह बूढ़े होने का पहला लक्षण होता है।  

मेडिकल की पढ़ाई के साथ रंगमंच को आपने कैसे साधे रखा?

स्कूल की पढ़ाई के बाद प्री-मेडिकल तक मैंने अभिनय जारी रखा। मेडिकल कॉलेज के पहले साल में मेरी मुलाकात रंगमंच की प्रसिद्ध हस्ती जब्बार पटेल से हुई। फिर पढ़ाई की तरह रंगमंच भी मेरे लिए एक गंभीर काम बन गया। अपने पूरे मेडिकल करियर के दौरान मैंने अभि‍नय किया, यहां तक कि छोटे से रंगमंडल ‘प्रोग्रेसिव ड्रामैटिक एसोसिएशन’ में जुड़ गया। मनोचिकित्सा और रंगमंच/सिनेमा मेरी जिंदगी की दो समांतर धाराएं रही हैं।

श्याम बेनेगल की निशांत (1975) के साथ समानांतर सिनेमा में आपकी शुरुआत कैसे हुई?

उन्होंने घासीराम कोतवाल में मेरा काम देखा था। मैंने नाना का किरदार निभाया था। मैंने 1972 से 1992 तक बीस साल यह किरदार निभाया। घासीराम मेरे लिए अभिनय का स्कूल जैसा था। इसी के सहारे मैं देश भर में और विदेश गया। मेरी दुनिया का विस्तार हुआ। 1975 तक तो यह नाटक भारतीय रंगमंच में मील का पत्थर बन चुका था। इसे 20 से ज्यादा रंग महोत्सवों में आमंत्रित किया जा चुका था और हमने 12 रंग महोत्सवों में कुल 61 प्रदर्शन किए। फिल्म या रंगमंच के क्षेत्र में शायद कोई नहीं होगा जिसने घासीराम न देखा हो।

हाल ही में मैंने सिनेमाघर में मंथन (1976) देखी, जब उसका रिस्टोर्ड संस्करण रिलीज हुआ था। इस फिल्म में आपको डॉक्टर के किरदार में देखकर मैं चौंक गया था।

बेनेगल के साथ समानांतर सिनेमा में मेरी शुरुआत हुई। फिर मैं उसका हिस्सा बन गया। मनोचिकित्सा से प्रेम के चलते मैं मुंबई नहीं गया। मैं साल में एकाध फिल्म ही करता था। मैंने गोविंद निहलानी, जब्बार पटेल, गौतम घोष की फिल्मों और सत्यजित रे की सद्गति (1981) में काम किया। यह इत्तेफाक ही था कि प्रेमचंद की कहानी सद्गति में ब्राह्मण का नाम घासीराम था। हो सकता है कहानी पढ़ते वक्त‍ उनके दिमाग में घासीराम का मेरा किरदार रहा हो।

सत्यजित रे के साथ संबंध कैसा था?

वे महान थे, इस पर मैं किसी से बहस नहीं करना चाहूंगा। सद्गति केवल 52 मिनट की फिल्म है, लेकिन उसमें काम करते हुए मुझे समझ आया कि सत्यजित रे क्या हैं और वे जो हैं, तो क्यों हैं। वे दूसरों से मीलों आगे क्यों हैं। फिल्म संस्था‍न में कई लोग होंगे जो रे को महान नहीं मानते थे। वे मणि कौल को महान मानते हैं। यह उनकी सीमित सोच है। मैंने मणि की फिल्म‍ घासीराम कोतवाल (1976) में भी काम किया है। वह फिल्म तीन दिन भी नहीं चली थी। ऐसे फिल्मकार इस बात की चिंता नहीं करते थे कि लोग उनकी फिल्मों को पसंद करेंगे या नहीं। मणि या कुमार शाहनी की फिल्मों के किरदार मनुष्यों की तरह बात नहीं करते, किसी सामान की तरह बात करते हैं।

लेकिन मणि कौल की आषाढ़ का एक दिन (1971) और दुविधा (1973) की तो बहुत सराहना हुई थी?

आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश के नाटक पर आधारित है। मणि ने तो बस उनके लिखे को दृश्य-श्रव्य माध्यम में रूपांतरित कर दिया था। इसलिए लेखक को भी उसका काफी श्रेय जाता है। दुविधा मुझे अच्छी लगी थी। मणि जैसी फिल्में बनाना चाहते थे, वैसी बनाते थे। उन्हें किसी और चीज से कोई मतलब नहीं था। घासीराम कोतवाल में उन्होंने नाटक के आधार पर विजय तेंडुलकर से पटकथा लिखवाई थी। वह नाटक से एकदम अलहदा थी। उसमें बस नाटक के अंश इस्तेमाल किए गए थे। उसका आपको कोई अर्थ समझ आए, तो मुझे ईमानदारी से बताइएगा। डॉ. (श्रीराम) लागू ने उसके बारे में एक बार कहा था, ‘‘मैंने जीवन में नहीं सोचा था कि कभी कोई मराठी फिल्म मुझे समझ नहीं आएगी। घासीराम ऐसी फिल्म है, जो मुझे समझ ही नहीं आई।’’                    

आपने प्रकाश झा की फिल्मों में भी काम किया है। उसका अनुभव कैसा था?

उन्होंने सामाजिक रूप से प्रासंगिक फिल्में बनाई हैं। बिहार की पृष्ठभूमि पर उन्होंने तीन फिल्में बनाईं, मृत्युदंड (1997), गंगाजल (2003) और अपहरण (2005)। ये सब फिल्में वर्तमान हालात से जुड़ती हैं। इसलिए मुझे काम करने में मजा आया। आपको पता है कि उनकी राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली फिल्म दामुल (1985) को किसी ने पूछा तक नहीं था। उस फिल्म को दर्शक तक नसीब नहीं हुए थे। उसे किसी ने देखा भी नहीं था। तब प्रकाश झा हताश होकर बिहार लौट गए थे, लेकिन जब वे वापस आए तब उन्होंने संकल्प लिया कि मैं अब अपनी कहानी बॉलीवुड की भाषा में कहूंगा। पिछली गलती से उन्होंने सबक सीखा, फिर दोबारा लौट कर मृत्युदंड बनाई। 

आपने मुख्यधारा की बॉलीवुड फिल्मों  में भी काम किया, जैसे त्रिमूर्ति (1995), रंग दे बसंती (2005)?

मैं फिल्मों में फर्क नहीं बरतता। मैं बस इतना जानता हूं कि एक समानांतर सिनेमा होता है और दूसरा लोकप्रिय सिनेमा। मैं ऐसे सिनेमा का आदमी हूं जो मनोरंजन के पार जाता हो। हाल ही में मैंने लापता लेडीज (2024) देखी। इसके बाद बधाई हो (2019) देखी। दोनों ही बेहतरीन फिल्में हैं। अब तो बाहुबली (2015) जैसी फिल्मों का बॉलीवुड में जलवा हो रहा है।  

ओटीटी के उभार को आप कैसे देख रहे हैं, जहां फिल्मकारों की नई फसल आ रही है?

एक मायने में ओटीटी अच्छा है, लेकिन शुरू में जब वह आया था, तो केवल प्रतिभाशाली फिल्मकारों की फिल्में ही खरीदता था। या उनसे ही फिल्में बनवाता था। अब उसने अपना कंटेंट बनाना बंद कर दिया है। इसलिए फिल्मकार यहां अब अपने मन के हिसाब से फिल्में नहीं बना पा रहे हैं।

मराठी सिनेमा में आपने देवराय (2004), अस्तु (2013), कासव (2017) में काम किया है। ये सब फिल्में मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित हैं। इनके बारे में कुछ बता सकते हैं?

इन फिल्मों में मैंने केवल काम ही नहीं किया था बल्कि इन फिल्मों का निर्माण भी किया था। मैं निजी तौर पर ऐसा सिनेमा पसंद करता हूं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दे। मैं ऐसे ही सिनेमा का मुरीद हूं। यदि फिल्में सोचने पर मजबूर न कर पाएं, तो फिर उनके होने का फायदा ही क्या। ये फिल्में सुमित्रा भावे बनाई थीं। वे फिल्मकार नहीं थीं, वे समाज वैज्ञानिक थीं। उन्हें जब समझ आया कि किताबों से ज्यादा ताकवर माध्यम सिनेमा है, तो उन्होंने फिल्म बनाना सीखा। वे ऐसी फिल्में बनाती थीं, जो किसी भी दर्शक को सोचने पर मजबूर कर दे। सुमित्रा भावे, डेविड धवन या सुभाष घई जैसी फिल्में नहीं बनाती थीं। यही वजह थी कि मैंने सोचा इन फिल्मों के माध्यम से मैं आम आबादी और स्वास्थ्य विज्ञानियों तक मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता फैला सकूंगा। मानसिक बीमारी, मनोचिकित्सा जैसी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता है। ऐसे विषयों का लोकप्रिय फिल्मों में मजाक बनाया जाता है। इस विषय पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि एक फिल्म आई थी तारे जमीं पर (2007), यह हर मायने में बहुत अलग फिल्म थी।    

पुणे शहर ने आपकी रचनात्मक यात्रा को कैसे प्रभावित किया है?

मैं पुणे में रहता हूं और मेरे लिए आज का पुणे वही पुणे है, जो मेरे बचपन में होता था। बाकी किसी भी तरह के पुणे को मैं न मानता हूं न जानता हूं। विस्तार ले रहा, मॉडर्न हो रहा पुणे मेरे पुणे का सांस्कृतिक हिस्सा नहीं है। यहां मैं 74 साल से ज्यादा समय से रह रहा हूं। अब यह महानगर बन चुका है। आप यहां अब मराठी बोलेंगे तो लोग आपको हैरत से देखेंगे। पुणे की पहचान जा चुकी है। एक बार मैं पुणे का मृत्यु प्रमाण पत्र मांगने के लिए नगर निगम के दफ्तर चला गया था।

(अरविंद दास डीवाय पाटील इंटरनेशनल युनिवर्सिटी, पुणे में स्कूल ऑफ मीडिया ऐंड जर्नलिज्म के निदेशक और प्रोफेसर हैं) (आउटलुक 11 नवंबर 2024 अंक में प्रकाशित)

Monday, October 07, 2024

अदाकारी मेरा स्वभाव है: मोहन अगाशे

मैंने मोहन अगाशे से कहा कि आप में बहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा’ हैजो एक साथ कई चीजों को छू सकती है. फिर मैंने उनसे पूछा कि मराठी भाषा में भी कोई शब्द तो होगा इसके लिए. उन्होंने कहा कि अष्टपैलू’ – जो एक साथ आठ चीजों को करने में माहिर हो. पर दो घंटे तक विभिन्न विषयों पर उनसे हुई बातचीत में वे खुद के लिए इस विशेषण का इस्तेमाल से मना करते रहे. वे कहते रहे कि मैं एक साधारण मनुष्य हूं. 

अभिनय प्रतिभा की वजह से पद्मश्रीसंगीत नाटक अकादमी समेत अनेक
पुरस्कारों से देश-विदेश में सम्मानित अगाशे रंगकर्मी
हिंदी-मराठी सिनेमा के अदाकारमराठी फिल्मों के प्रोड्यूसरमनोचिकित्सक और दृश्य-श्रव्य माध्यम के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने वाले एक्टिविस्ट हैं.

पिछले महीने जब मैं पुणे आया उनसे फोन और मैसेज के जरिए टच में था. इससे पहले दिल्ली से मैंने उनसे फोन पर दो-चार बार बातचीत और इंटरव्यू किया था.

वर्ष 1947 में जन्मे अगाशे इन दिनों थोड़े से अस्वस्थ रहते हैं. फिर भी उन्होंने दो अक्टूबर को दोपहर एक बजे शहर के पुराने हिस्से में मिलने के लिए कहा. मैं साढ़े बारह बजे उनके घर पहुँच गया. असल में, उनके अपार्टमेंट के गेट से अंदर होते ही मैं मकान की तलाश कर रहा था कि एक दरवाजा खुला दिखा और वे दिखे. मैं उनके घर में दाखिल हो गया. वे फोन पर किसी से बातचीत कर रहे थे. मैंने माफी मांगते हुए कहा कि मैं पहले तो नहीं आ गया, उन्होंने कहा हां, फिर कहा कि मुझे यह बातचीत खत्म कर लेने दीजिए.

फोन स्पीकर पर था और मैं बातचीत सुन रहा था. दूसरी तरफ एक भद्र महिला उनसे बुर्जुगों के लिए दिल्ली में एक एक्टिंग वर्कशॉप के सिलसिले में बात कर रही थी. बातचीत के बीच-बीच में वे मुझे देखते हुए आंख मारते हुए मुस्कुरा भी देते थे. खैर बातचीत जब खत्म हुई तब उन्होंने मुझे मेल का प्रिंट आउट पढ़ने के लिए दिया जो उस महिला ने उन्हें भेजा था. फिर टिप्पणी की: बुर्जुगों के लिए ‘मैथड एक्टिंग’ का वर्कशॉप, समझ में नहीं आता!

उन्होंने कहा कि मैंने कभी कोई एक्टिंग कोर्स नहीं किया. हां, जैसा कि बचपन में होता है हम सब कभी अपने शिक्षक या पिता की मिमिक्री करते हैं. मैं भी करता था, जब चार-पाँच साल का था. यह संप्रेषण का एक माध्यम था.

अभिनय मेरे स्वभाव में है. मेरे लिए खुद और दुनिया को जानने का एक तरीका रहा है. और यह अवचेतन के तहत होता है. जिस स्कूल में मैं गया वहाँ पर कुछ शिक्षक ऐसे थे जो रंगकर्म में अच्छे थे और छात्रों को नाटक के लिए प्रोत्साहित करते थे. हर साल स्कूल के नाटक के लिए वे छात्रों का चयन करते थे. उसी समय सई परांजपे और अरुण जोगेलकर ने बच्चों के लिए थिएटर की शुरुआत की जहाँ वे बालोदयान’ के लिए टैलेंट हंट’ करते थे. यह कार्यक्रम ऑल इंडिया रेडियो, पुणे के लिए होता था. लेकिन बालोदयान’ से पहले मैंने रवींद्र जन्मशती (1961) के अवसर पर उनके नाटक ‘डाकघर’ में अमल की भूमिका की थी. अमल, एक ऐसा बच्चा है जो मरणांतक रोग से पीड़ित है. वह कहीं बाहर नहीं जाता, बस खिड़की के पास जाकर दोस्त बनाता है.

क्या यह ऑल इंडिया रेडियो के लिए आपने किया?

नहीं, देखिए महाराष्ट्र में एमेच्योर थिएटर की परंपरा रही है. विजया मेहता ने रंगायन की शुरुआत की, सत्यदेब दुबे ने थिएटर ग्रुप की. भालवा ने प्रोग्रेसिव थिएटर एसोसिएशन की शुरुआत की. यह महाराष्ट्र कलोपासक के तत्वावधान में हुआ था और साधारण जनता के लिए था. इसी दौर में मैं बालोदयान में भी भाग लेता था.

इसी बीच उनकी 'हेल्प' आ गई और मराठी में उन्होंने कहा कि दो-तीन दिन से फ्रिज से निकाल कर खाना खाता रहा हूँ.

वे अकेले रहते हैं और शादी नहीं की है. ड्राइंग रुम के बीच में एक बड़ा सा मेज, उस पर दवा के कुछ डिब्बे, एक टिफिन का डब्बा, कुछ किताबें और तीन मोबाइल फोन. कुर्सियां और दो-तीन अलमारी. बेहद साधारण घर, अतिरिक्त सुरुचि की कोई गुंजाइश नहीं.

बातचीत जारी रखते हुए उन्होंने बताया कि सई परांजपे, गोपीनाथ तळवलकर और नेमिनाथ बालोद्यान से जुड़े थे. नेमिनाथ मिमिक्री में पारंगत थे और मैंने उनसे ही मिमिक्री सीखा. काफी अह्लादकारी था यह. मैंने सई के नाटक निरुपमा आनी परीरानी’ में काम किया जिस पर विनय काले ने बाद में फिल्म (1961) बनाई और मैंने उसमें पिनाचियो की भूमिका निभाई. एक तरह से यह मेरी पहली फिल्म थी. मैं सई की तीन-चार नाटक में काम किया.

तो आप पहले एक्टर बने, फिर डॉक्टर और बाद में फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे के डायरेक्टर?

अगाशेमैं कहना ये चाह रहा था कि जो कोई भी अदाकार बनता है बाद के जीवन मेंअसल में उसकी शुरुआत बचपन में ही हो जाती है. जरूरी नहीं कि स्टेज पर हो, घर ही उसके लिए स्टेज होता है.

उनकी ख्याति विजय तेंदुलकर के लिखे नाटक घासीराम कोतवाल’ से हुई. उन्होंने बीस वर्षों तक (1972-1992) देश-दुनिया में इस नाटक का मंचन किया. वे कहते हैं कि वर्ष 1975 के आते-आते यह नाटक भारतीय रंगकर्म में एक ‘माइलस्टोन बन चुका थाइस नाटक को बीस अंतरराष्ट्रीय नाटक समारोहों से निमंत्रण मिला था और उन्होंने 12 में भाग लियाजिसमें कुल 61 प्रदर्शन हुए थे.

मैंने उनसे कहा कि हमें घासीराम कोतवाल में आपको देखने का सौभाग्य नहीं मिला, लेकिन उन्हें (नाम लिखने से उन्होंने मना किया था) घासीराम में देखा है...मुझे बीच में टोकते हुए, अभिनय करते हुए कहा कि उनका अभिनय तो घटिया था, मेरे मित्र हैं फिर भी...

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि उस दौर में फिल्मी और रंगमंच की दुनिया का ऐसा कोई शख्स नहीं था जिसने यह नाटक नहीं देखा हो. और यही वजह रही कि श्याम बेनेगल जब निशांत’ (1975) लेकर आए तो बिना किसी स्क्रीन टेस्ट के अगाशे को अपनी फिल्म में लियाजबकि अगाशे अपनी तस्वीरोंरिपोर्टस आदि के साथ तैयार होकर उनसे मिलने गए थे. असल में निशांत का स्क्रिप्ट विजय तेंदुलकर ने लिखा था. फिर इसके बाद मंथन’ फिल्म में भी वे साथ रहे.

मैंने उन्हें बताया कि पिछले दिनों जब एक बार फिर से 'मंथनको संरक्षित कर सिनेमाघरों में रिलीज किया गया तब दर्शकों में काफी उत्साह था. प्रसंगवशइस फिल्म में अगाशे ने एक डॉक्टर के किरदार को परदे पर निभाया है.

अगाशे ने कहा कि चूंकि मनोचिकित्सा में मेरी काफी रुचि थी इसलिए मैं पुणे छोड़ कर बंबई नहीं गया और साल में एक-दो फिल्में करता रहा. बाद में समांतर सिनेमा के मणि कौलगोविंद निहलानीगौतम घोषप्रकाश झा जैसे निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया.

पर वे सत्यजीत रे के साथ अपने काम का खास तौर पर जिक्र करते हैं. वर्ष 1981 में बनी 'सद्गतिफिल्म और टीवी सीरीज में उन्होंने रे के साथ काम किया था. वे कहते हैंमैं सत्यजीत रे ऊपर कुछ भी बात करने का अधिकारी नहीं हूँ. वे मेरे लिए कद्दावर निर्देशककलाकार हैंजैसा कि वे सबके लिए हैं. उन्होंने मुझे एक पत्र लिख कर सद्गति फिल्म का हिस्सा बनने का निमंत्रण दिया थाजिसे मैंने बिना विलंब किए स्वीकार किया.

हालांकि अगाशे अपने करियर में समांतर के साथ मुख्यधारा की फिल्मों में भी काम करते रहे. वे कहते हैं कि मैं ऐसी फिल्मों में विश्वास करता हूँ जो मनोरंजन से आगे बढ़ कर आपको सोचने पर मजबूर करे. चर्चित फिल्मकार प्रकाश झा की बिहार की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों मसलनमृत्युदंडअपहरणगंगाजल में उन्हें दर्शकों ने खूब सराहा था. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि जब झा की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म दामूल’ को दर्शक नहीं मिले तब उन्होंने कहा कि मैं अपनी कहानी कहूंगा लेकिन उसकी भाषा बॉलीवुड की फिल्मों की होगी.

यह सत्तर-अस्सी के दशक में चले समांतर सिनेमा आंदोलन पर भी एक टिप्पणी है. मणि कौलकुमार शहानी जैसे प्रयोगशील फिल्मकारों की फिल्में भले फिल्म समारोहों में सराही गईंपर उन्हें दर्शक नहीं मिले.

वे बातचीत में मणि कौल की फिल्म घासीराम कोतवाल’, जिसमें वे एक किरदार थेकी अबूझ होने को लेकर आलोचना करते हैं. वे टिप्पणी करते हैं कि कौल और शहानी की फिल्मों में किरदार एक मानव के रूप में बात नहीं करतेवे महज ‘प्रॉप्स हैं वहां. हालांकि मणि कौल की फिल्म ‘दुविधा’ की वे तारीफ करते हैं. आषाढ़ का एक दिन फिल्म के लिए श्रेय वे लेखक मोहन राकेश को देते हैं यह कहते हुए कि मणि ने कहानी को हू-ब-हू परदे पर उतार दिया.

बातचीत के बाद उन्होंने मुझे घासीराम कोतवाल की एक डीवीडी देते हुए (मैंने उनसे खरीदा), कहा कि देख कर बताइएगा यदि कुछ समझ आए. तेंदुलकर ने नाटक को आधार बनाते हुए खूबसूरत स्क्रिप्ट लिखा था. मणि फिल्म में जब अंग्रेज भारत आए तब जमीन के माप के सवाल के इर्द-गिर्द सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों का विश्लेषण करना चाहते थे.

अगाशे ने फिल्म के बारे में एक वाकया सुनाते हुए कहा कि श्रीराम लागू ने फिल्म देखने के बाद एक वक्तव्य दिया थामैंने कभी नहीं सोचा था कि जीवन में ऐसा भी होगा कि मुझे कोई मराठी फिल्म समझ नहीं आएगी. घासीराम एक ऐसी फिल्म है जो मुझे समझ नहीं आई.’  



जब मैंने उनसे गिरीश कर्नाड से उनके संबंध के बारे में पूछा तब उन्होंने कहा कि वह मेरा दोस्त था, पर हमारे संबंध पेशेवर नहीं थे. उसने मुझे अपनी किसी फिल्म में नहीं लिया था. हां, वह जीनियस था, पर अच्छा एक्टर नहीं था. नाटक उसने लाजवाब लिखे हैं. आप देखिए कि मंथन में भी नसीर (नसीरुद्दीन शाह) उस पर भारी है.

जब बात वर्तमान बॉलीवुड फिल्मों की होने लगी तब वे ‘लापाता लेडीज’ और ‘बधाई हो’ जैसी फिल्मों की सराहना करने लगेपर ये जोड़ना नहीं भूले कि आज कल बॉलीवुड ‘बाहुबली’ फिल्म से ज्यादा प्रभावित हैं. ओटीटी उभार के सवाल पर वे कहते हैं कि पहले इन प्लेटफॉर्म ने प्रतिभाशाली फिल्मकारों को मौका जरूर दिया लेकिन अब वे खुद प्रोड्यूसर बन गए हैं!

मराठी फिल्म निर्माता सुमित्रा भावे के साथ उन्होंने अस्तु’, ‘देवराई’ और ‘कासव’ का निर्माण किया. मानसिक बीमारी को केंद्र में रख कर बनी इन फिल्मों में विभिन्न किरदारों में अगाशे खुद मौजूद हैं. वे कहते हैं कि पापुलर सिनेमा में मानसिक बीमारी और मनोचिकित्सा का मजाक बनाया जाता रहा है. साथ ही जोड़ते हैं कि तारे जमीन पर’ एक अलग फिल्म थी.

इस सवाल पर कि पुणे शहर उनकी रचनात्मक जिंदगी में किस रूप में मौजूद रहा हैवे वे निराश हो कर कहते हैं कि पुणे में अब संस्कृति नहीं बची हैकॉस्मोपोटिलन होकर उसने अपनी पहचान खो दी है. यदि आप मराठी में बात करेंगे तो लोग घूरते हैं. यह पूछने पर कि उन्हें थिएटर-सिनेमा के कलाकार या मनोचिकित्सक, किस रूप में ज्यादा खुशी मिलती है.

अगाशे: अभिनय और मनोचिकित्सा जीवन की दो धाराएँ रही हैं. 

वे दुहराते हुए कहते हैं कि अदाकारी मेरे स्वभाव का हिस्सा है.’

आखिर में मैंने फिर से अपनी वही बात दुहराते हुए कही कि आपने बहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा को जीवन में कैसे साधाफिर टका सा वही जवाब- मैं एक साधारण मनुष्य हूँ. फिर बात को बदलते हुए उन्होंने कहा कि जब आप मुड़ कर अपने जीवन को देखने लगते हैं तब समझ लीजिए बुढ़ापा आ गया है.

अगाशे सहज, जीवन से भरपूर, एक दिलचस्प व्यक्ति हैं.