शाम
हो रही है और थोड़ी बूंदा
बांदी भी. समंदर के किनारे करीब
डेढ़ किलोमीटर में फैले, साफ-सुथरे गॉल फेस पर प्रेमी जोड़े दुनिया से बेखबर छाता हाथ में लिए खुद में मशगूल हैं. ज़मीज़ा कहती है कि समंदर की लहरें आपको अपनी ओर खींचती है. वे कराची की हैं और लहरों से उनका पुराना वास्ता है. मैं उनकी बातों पर यकीन करता हूँ. मुझे
करुत्तम्मा और परीकुट्टी की
याद हो आई.
स्कूल
के दिनों में जब पहली बार तकषी
शिवशंकर पिल्लई का कालजयी
उपन्यास चेम्मीन (मछुआरे) पढ़ा था तब मन समंदर देखने को
मचल उठा था.
करुत्तम्मा
और परीकुट्टी का रोमांस हमें
अपना लग रहा था. तब पढ़ कर खूब रोया था.
मछुआरे
और उनके जीवन को तो हमने देखा
था, पर समंदर और उसकी आबो-हवा
से हम अपरिचित रहे.
उत्तरी
बिहार के हमारे आँगन में नदी
बहती थी.
कमला-बलान,
कोसी,
गंडक,
गंगा
का पानी पीते और संग खेलते हम
बड़े हुए पर समंदर हमारे सपनों
में पलता रहा.
कोलंबो
के जिस गॉल फेस होटलमें मैं
रुका हूँ वह एक ऐतिहासिक धरोहर है.
करीब 150 साल पुराना.
कभी
चेखव,
यूरी
गैगरिन,
नेहरु
जैसे लोग यहाँ रुके थे...आज की रात मैं भी यहीं हूँ,
लेकिन
इतिहास हमें कहां याद रखेगा!
बहरहाल,
इस
होटल का बरामदा सीधे लगभग समंदर
में जाके खुलता है.
बस
दस फर्लांग की दूरी पर समंदर का अपार साम्राज्य.
मछलियों
की गंध और लहरें मुझे छूती
निकल जाती है.
यूँ
तो मैं मछली नहीं खाता पर बचपन
से ही मछली की गंध अच्छी लगती
रही है. घर में यात्रा से पहले मछली देखना शुभ माना जाता था.
सामने
ठेले पर तला हुआ झींगा (फ्राइड प्रॉन) बेचने
वाला वृद्ध मुंह बिचका कर इस
बारिश को कोस रहा है.
अब
बारिश तेज हो रही है.
मेरे
पास छाता नहीं है, इसलिए बारिश से
बचने के लिए मैं किसी तरह उस
ठेले की आड़ में खड़ा हो गया.
बूढ़े व्यक्ति ने ठेले के ऊपर लगे पन्नी को
और खोल दिया है.उसकी
भाषा मैं नहीं समझ पता, न वह
मेरी. मैंने बस मुस्कुरा दिया.
अभी
मानसून नहीं आया है, पर लोग
कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन
का ये असर है.
पिछले
दो-तीन
दिनों से यहाँ काफी बारिश हो
रही है.
रात
ढल गई है. पर बारिश से समंदर की नींद में कोई खलल नहीं पड़ता. दरअसल उसे नींद आती ही कहां है! कभी
खरगोश के शावक की तरह कोई झक सफेद
गुच्छा मेरी ओर लंबी छलाँगे
लगाता दिखता है, तो कभी बूढ़ी
दादी की तरह किसी बच्चे पर
कुपित.
बाहर कोलंबों की सड़कों पर कार, बसों, और टुक टुक की हल्की शोर के बीच एक ठहराव है. लोगों के मुस्कुराते चेहरे पर विषाद झलकता है. उत्तरी श्रीलंका में एलटीटीई के साथ संघर्ष को खत्म हुए तीन वर्ष हो गए पर कोलंबों की फिजा में उदासी अब भी छाई है. लोग युद्ध के बारे में बात नहीं करना चाहते. शहर की सड़कों पर शांति भले दिखे पर समंदर की लहरों में शोर है. मेरी
खिड़की से भी समंदर झांक रहा है.लहरों
की झंझावात और चीख मुझे सुनाई दे रही
है. मैंने एसी बंद कर दिया है, खिड़की खुली
छोड़ दी है और सोने की कोशिश कर रहा हूँ.
'नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है...' केदारनाथ अग्रवाल ने ऐसा लिखा है. शायद केन नदी के बारे में. यदि वे केन के बारे में ऐसा नहीं लिखते, तो मैं सेन के बारे में यह कहता.
सेन नदी के तट पर घूमते हुए मेरे मन में लगातार यह पंक्ति गूँजती रही. पेरिस में कहीं भी चले जाएँ आप घूम-फिर कर उसी के पास आने का जी चाहता है. सेन ढीठ है. वह आपका रास्ता नहीं छोड़ती...
वह आपसे लिपटना चाहती है. लिपटती है. वह आपको चूमना चाहती है. चूमती है. आप उसके कोमल और नरम हाथों की गरमाहट महसूस करते हैं.
कल कल करती हुई वह बात-बेबात हँसती रहती है...और जब आप उससे नाराज़ होने का अभिनय करते हैं, वह और हँसती चली जाती है....एक और चुंबन. उसकी साँसों की ऊष्णता आपमें गुदगुदी भरती है...
उसकी आँखों की कोर में जाड़े की सुबह का उजास और गर्मी की शाम की सुरमई चमक एक साथ डोलती है.
आप उसे फिर-फिर छूना चाहते हैं...और बलखाती, इठलाती-इतराती वो गई.प्रेम में पगी लड़की की तरह उसका अनायास जाना भी सायास है.
सेन के दोनों छोरों पर पर्यटकों से बेखबर, प्रेमी जोड़ेएक नई दुनिया बुनने में लगे हुए हैं. उनकी आँखों में वासंती हवा का रोमांच है.
सेन चिरयौवना है. उसकी वजह से पेरिस की फिजा में रोमांस है. आप कवि हों, ना हों, सेन आपमें जीवन के प्रति राग पैदा करती है.
सेन के भूरे पानी में नात्रेदाम की मीनारें स्वप्न चित्र की तरह झिलमिलाती हुई धीरे-धीरे बिखर रही है.वासंती शाम पर रात का झीना चादर फैलने लगा है. रंगीन रोशनियों में नहाया एफिल टावर का बुर्ज बाएँ तट पर खड़ा है. उसकी परछाँई से सेन अमलतास के फूलों की तरह खिल उठी है.
पर्यटकों के झुंड नौकाओं की ओर सैर के लिए बढ़ रहे है. इस रात को मैं अपनी आँखों में भर ले रहा हूँ. यह रात डेन्यूब और राइन नदी के तट पर टहलते हुए बिताए रात से बिलकुल अलहदा है.
हमारे बचपन में समुद्र नहीं था लेकिन हम सौभाग्यशाली थे. हमें कमला और बलान दो नदियों का स्नेह एक साथ मिला.
सेन नदी के तट पर बैठे हुए मुझे दिल्ली की याद आने लगी. जेएनयू के सारे हॉस्टलों के नाम नदियों के नाम पर हैं... यमुना, कावेरी, ब्रह्मपुत्र...जेएनयू के अंदर जो एक ज़िद है, एक ढीठपन है, गर्वीली ग़रीबी है, कहीं इस वजह से तो नहीं.
कहते हैं दिल्ली भी यमुना के तट पर बसी है और कभी यमुना अपनी उद्दाम संगीत से दिल्ली को आलोड़ित करती थी.
वर्ष 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान देश-विदेश के लाखों सैलानी दिल्ली आएँगे. यमुना के तट पर बसी दिल्ली शहर को वे ढूँढ़ेगे. वे यमुना ढूँढ़ेगे...
( जनसत्ता , 15 मई 2010में प्रकाशित. चित्र में, सेन नदी, पेरिस)