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Saturday, June 29, 2019

फिल्मों में तकनीकी दखल ज्यादा हो गया है: कुमार शहानी


वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म उसकी रोटीऔर मृणाल सेन की भुवन सोमने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया। कुमार शहानी इस धारा के एक प्रतिनिधि फिल्मकार हैं। उनकी माया दर्पण’, ‘तरंग’, ‘ख्याल गाथा’, ‘कस्बा’, ‘चार अध्यायआदि फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। समांतर सिनेमा के इस आधी सदी के सफर पर अरविंद दास ने हाल ही में कुमार शहानी से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

न्यू वेव सिनेमा को पचास साल हो गए। मेनस्ट्रीम सिनेमा के बरक्स समांतर सिनेमा की इस यात्रा को आप किस रूप में देखते हैं?

हम पूंजीवादी व्यवस्था में रहते हैं जिसमें कारोबार मुख्य होता है, हम इसे चाहें या ना चाहें। मेनस्ट्रीम फिल्में लाभ से संचालित होती हैं, बिना इसके उनका खर्च नहीं निकल सकता। उनका कला से कोई ताल्लुक नहीं होता। इस लिहाज से हमें मेनस्ट्रीम और कला सिनेमा की तुलना नहीं करनी चाहिए।

कला सिनेमा के निर्माण में एफटीआईआई की क्या भूमिका रही?

मैं, मणि कौल और केके महाजन एफटीआईआई में थे। कुछ समय पहले ही पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट की शुरुआत हुई थी। 70 और 80 के दशक में जब हम न्यू वेव सिनेमा बना रहे थे तब न्यू यॉर्क टाइम्स, ला मोंद (पेरिस) जैसे अखबारों में एफटीआईआई की खूब चर्चा होती थी। वे मानते थे कि हम कुछ अच्छा काम कर रहे हैं। इससे एफटीआईआई की एक अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी।

एफटीआईआई में फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक आपके गुरु थे, आपकी फिल्मों पर उनका कैसा असर रहा?

फिल्मों के प्रति उनकी जो निष्ठा थी, उस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। चार अध्यायटैगोर का आखिरी उपन्यास है जिसमें उन्होंने स्वानुभूति और आत्मनिर्णय पर जोर दिया है। आध्यात्मिक भाव के साथ राजनीतिक हिंसा का सामंजस्य बहुत मुश्किल होता है। जब आप मेरी यह फिल्म देखेंगे तो ऋत्विक दा आपको भरपूर नजर आएंगे।

आपकी फिल्मों को लेकर एपिक फॉर्मकी चर्चा होती है। क्या ऋत्विक घटक इस फॉर्म के पीछे रहे?

ऋत्विक दा ने ही इस एपिक फॉर्म से हमारा परिचय करवाया था। ब्रेख्त के नाटकों का अनुवाद उन्होंने किया है। कॉकेशियन चॉक सर्किलका उन्होंने उसी वक्त अनुवाद किया, जब हम इंस्टीट्यूट में उनके शिष्य थे। बांग्लादेश में एपिक थिएटर पर काफी काम किया गया है। वे वहीं के थे। वे विभाजन की संतान थे और मैं भी हूं।


मैं सौभाग्यशाली था कि ब्रेसां और ऋत्विक घटक जैसे गुरुओं ने मेरा लालन-पालन किया। वर्ष 1967 में मैंने फ्रांस में एक गधे को केंद्र में रख कर बनाई गई उनकी फिल्म बलथाजारदेखी थी और खूब पसंद की। मोक्ष और निर्वाण उनकी फिल्मों में जिस रूप में दिखता है, उस तरफ मैं अपने वाम विचारों के बावजूद काफी आकर्षित था। जब मैं टैगोर की रचनाओं और घटक दा की फिल्मों की ओर देखता हूं तो पाता हूं कि उनमें जो आध्यात्मिक ऊर्जा है उसका कोई सानी नहीं। इन सबसे मैंने यही चीजें विरासत में पाई हैं।

आप लोगों ने हिंदी की नई कहानी को अपनी फिल्मों के लिए चुना, पर उसका ट्रीटमेंट अलग दिखता है। जैसे निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पणमें सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता जबकि आपकी फिल्म में यह स्पष्ट है...

निर्मल असल में एक लिरिकल राइटर थे। हालांकि निर्मल एक जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर थे, पर जब प्राग पर सोवियत यूनियन ने कब्जा किया तब वे संदेहशील हो उठे। मैंने माया दर्पणमें सामंतवादी उत्पीड़न दिखाने की कोशिश की है। इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्पीड़न को तोड़ने की कोशिश की है। उस डांस में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ है। यह काली के रंग में भी है।

इस फिल्म के अंत को लेकर निर्मल वर्मा की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें पसंद नहीं था। कुछ युवा लेखकों ने उनसे कहा कि वे गलत हैं और उन्हें फिल्म फिर से देखनी चाहिए। निर्मल ने अनेक बार यह फिल्म देखी, पर उन्हें पसंद नहीं आई। (हंसते हुए) यह काफी अजीब था।

भूमंडलीकरण के साथ नई तकनीक ने नए युवा फिल्मकारों को प्रयोग करने का काफी मौका दिया है। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

थोड़ा-बहुत काम तो हो रहा है, लेकिन बलथाजारऔर मेघे ढाका ताराकी ऊंचाई तक पहुंचने में उन्हें वक्त लगेगा। एक बड़ी समस्या यह है कि तकनीक का दखल मानवीय हस्तक्षेप से कहीं ज्यादा है। युवा फिल्मकारों में सत्य और सुंदर की तलाश है, पर वे निराश हैं क्योंकि उनके पास अवसर नहीं है, कोई उनको महत्व नहीं दे रहा।

(नवभारत टाइम्स, 29 जून 2019 को प्रकाशित)

Thursday, June 18, 2015

‘युद्धिष्ठिर’ को लेकर एफटीआईआई में महाभारत

देश के प्रतिष्ठित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर पिछले एक हफ्ते से मीडिया और कला जगत में घमासान मचा है. संस्थान के छात्रों ने इस नियुक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और वे हड़ताल कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने अपने एक कार्यकर्ता गजेंद्र चौहान को चेयरमैन बनाया है. चौहान ने टेलीविजन सीरियल महाभारत में युद्धिष्ठिर की भूमिका निभाई थी और उनके नाम कुछ बेनाम सी फिल्में और सीरियल भी हैं!  ख़बरों के मुताबिक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, जिससे यह संस्थान संबद्ध है, के सामने श्याम बेनेगल, गुलजार और अडूर गोपालकृष्णन जैसे फिल्मकार के भी नाम थे पर उसने गजेंद्र चौहान पर अपनी मुहर लगाई. ज़ाहिर है नियुक्ति में राष्ट्रवादी विचारधारा को तरजीह दी गई. कला, सौंदर्य बोध और एफटीआईआई के इतिहास और भारतीय फिल्म के इतिहास में इसकी महती भूमिका को नज़रअंदाज किया गया.

भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के बाद देश में अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों पर बिठा रही है ताकि देश में हिंदूत्ववादी सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित हो सके. भारत जैसे बहुलतावादी समाज और संस्कृति के लिए यह खतरे की घंटी है. गजेंद्र चौहान की नियुक्ति को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

गौरतलब है कि इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वाई सुदर्शन राव को इंडियन कौंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) का मुखिया नियुक्ति किया. एक अजाने से इतिहासकार की नियुक्ति पर देश के जाने माने इतिहासकार हतप्रभ थे. राव का मानना है कि भारतीय इतिहास की सारी समझ वेद और महाभारत में हैं! इसी तरह गुजरात के एक कारोबारी और प्रधानमंत्री के करीबी जफर सरेशवाला को मौलाना आजाद नेशनल यूनिवर्सिटी का कुलपति बनाया गया.  इन नियुक्तियों को लेकर अखबारों और सोशल मीडिया में भले ही छिटपुट विरोध दर्ज हुए हो, पर कोई व्यापक आंदोलन नहीं हुआ. इस बार एफटीआईआई में हुई इस नियुक्ति के विरोध की आवाज़ मुंबई से लेकर कोलकाता और दिल्ली तक सुनाई दे रही है.

पुणे स्थित फिल्म संस्थान की आबोहवा में रचनात्मकता और अराजकता साथ-साथ चलती रही है. यदि आप इस संस्थान में कदम रखें तो सिनेमा ऑर नथिंग’, ‘सिनेमा इज ट्रुथजैसे नारे (ग्रैफिटी) दीवारों में अंकित दिखेंगे. घटक, हिचकॉक और जॉन अब्राहम की तस्वीरें यहाँ-वहाँ उकेरी हुई मिलेगी. विजडम ट्री के आप-पास देर रात तक बहस करते छात्र और बीयर की टूटी बोतलें मिलेंगी. संस्थान के छात्रों-अध्यापकों के लिए सिनेमा एक जुनून से कम नहीं. और इसी जुनून की वजह से सरकार के इस फैसले के खिलाफ फिल्म इज ए बैटलग्राउंड’, ‘स्ट्राइक डॉउन फासिज्मसे नारों के साथ छात्र सड़क पर उतरे हैं.


एफटीआईआई
ऋत्विक घटक, अडूर गोपालकृष्णन, मणि कौल, कुमार साहनी, सईद मिर्जा, जानू बरुआ, गिरिश कसारावली, जॉन अब्राहम, कमल स्वरूप, प्रकाश झा, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, संतोष शिवन, रेसुल पोकुट्टी, राजकुमार हिरानी....और युवा फिल्मकारों में अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, उमेश कुलकर्णी जैसे नाम इस संस्थान से जुड़े रहे हैं. छात्रों का कहना है कि एफटीआईआई के चैयरमैन रह चुके श्याम बेनेगल, मृणाल  सेन, अडूर गोपालकृष्णन, यू आर अनंतमूर्ति, गिरिश कर्नाड, सईद मिर्जा जैसों की तुलना में गजेंद्र चौहान का फिल्मों से परिचय, अनुभव और सिनेमाई समझ संदिग्ध है. वे इसे केंद्र सरकार के एक गहरे साजिश के रूप में देखते हैं. उनका कहना है कि सरकार अपनी सांस्कृतिक समझ हम पर थोपना चाहती हैं, जो कि फिल्म संस्थान की बनावट और बुनावट के विपरीत है.


असल में पिछले कुछ वर्षों से एफटीआईआई के निजीकरण को लेकर सरकार योजना बनाती रही है पर छात्रों के विरोध के कारण इसे स्थगित करना पड़ा है. बॉलीवुड की मायावी चमक से दूर एफटीआईआई पिछले साठ वर्षों से सिनेमा के अर्थ और इसकी अर्थच्छवियों से छात्रों को रू-ब-रू करवाता रहा है. इसने देश-विदेश में भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दी है. आजाद भारत में ऐसे शैक्षणिक संस्थान गिनती के हैं जिनकी उत्कृष्ठता सर्वमान्य हो. एफटीआईआई को ऐसे चैयरमैन की जरूरत है जिनकी पहचान राजनीतिक विचारधारा विशेष से ना होकर सिनेमा से बनी हो!   


(जनसत्ता के समांतर स्तंभ में, 'मनमानी के पद' शीर्षक से 2 जुलाई 2015 को प्रकाशित)

Saturday, July 09, 2011

मणि कौल: परदे पर कविता

पिछले साल मानसून में मैं पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम की पढ़ाई कर रहा था. इस संस्थान ने पिछले साल ही अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे किए. एफटीआईआई की यात्रा और भारतीय सिनेमा में उसके योगदान को लेकर मैंने एक लेख लिखा था और इसी सिलसिले में मणि कौल को मैंने फोन किया था. उन्होंने कहा किमैं आ ही रहा हूँ वहीं बैठ कर बात कर लेंगे.

पाठ्यक्रम के आखिरी दिन मणि कौल ने अपना व्याख्यान दिया था. मैं उनके हंसमुख व्यक्तित्व और मजाकिया लहजे से परिचित था.ओसियानफिल्म समारोह के दौरान दिल्ली में उनसे गाहे-बगाहे मुलाकात हो जाती थी. बीते कुछ वर्षों से वे दिल्ली ही रह रहे थे और ओसियान से जुड़े थे.व्याख्यान के दौरान जब एप्रीसिएशन पाठयक्रम के संयोजक सुरेश छाबरिया ने उनका परिचय कराते हुए कहा कि मणि हमारे समय के सबसे बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं तो कई सहपाठियों ने विस्मय से उनकी ओर देखा था. हमारी पीढ़ी जिसने नब्बे के दौरान होश संभाला, मणि कौल और उनकी फिल्मों को नहीं जानती. लेकिन मणि कौल एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए. पढ़ाई के दौरान में हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म सिद्धेश्वरीदिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है. लेकिन सिद्देश्वरी देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.

दरअसल, मणि कौल खुद के बारे में बेहद मजाकिया लहजे में बात करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म की पहुँच को लेकर उन्होंने हमें एक वाकया सुनाया था. चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह? रोटी के ऊपर फिल्म! और वह भी उसकी रोटी?तुम मेरे साथ आ जाओ हम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ. उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं? मणि कौल को संगीत की गहरी समझ थी. उन्होंने डागर बंधुओं से विधिवत संगीत सीखा था और जिसकी परिणतिध्रुपद फिल्म में सामने आई. मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा हैं. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति खिलेगा तो देखेंगेको सिनेमाई भाषा में रच रहे थे.

वर्ष 1969 में महज 25 वर्ष की उम्र में मोहन राकेश की कहानीउसकी रोटीपर इसी नाम से फिल्म बना कर उन्होंने हिंदी फिल्मों कोपापुलर सिनेमासे बाहर निकाल करसमांतर सिनेमाका एक नया रास्ता दिखाया था. वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने बताया कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना थामैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.

घटक की तरह ही हम उनके योग्य शिष्य मणि कौल की फिल्मों को उनके जीते जी समझ नहीं पाए.

समांतर सिनेमा को दुरूह और अबूझ कह कर खारिज करने की कोशिश की जाती रही है. हालांकि उन्होंने कहा था किवर्तमान में जब अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली जैसे निर्देशक मुझे फोन कर के कहते हैं कि मेरी फिल्मों से उन्हें काफी सीख मिलती है तो काफी खुशी होती है.दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी फिल्मों में संवेदनशील, प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकारों की आवक बढ़ी है जो मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं.

लेकिन आज जब कुछ लोग डेल्ही बेली और उसमें प्रयुक्त भौंडेपन और गालियों को ही सिनेमा की भाषा मानने पर जोर दे रहे हैं, ऐसे में मणि कौल की फिल्मों की पहचान कैसे होगी?

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 9 जुलाई 2011 को प्रकाशित. चित्र में एफटीआईआई-एनएफएआई में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम, 2010 के दौरान व्याख्यान देते मणि कौल)

Wednesday, July 14, 2010

फिल्मी जुनून के पचास साल




पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीच्यूट ने भारतीय सिनेमा को कई बेहतरीन कलाकार और फिल्मकार दिए. समांतर सिनेमा का तो जैसे वह सूत्रधार ही रहा है. तकनीक के क्षेत्र में भी इसका योगदान कम नहीं. पचास साल पूरा करने पर इस संस्थान के सफरनामे का जायजा ले रहे हैं अरविंद दास. (जनसत्ता रविवारी, 4 जुलाई 2010)
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) की फिजा में मानसून की पहली बौछार की खुशबू है. पुणे स्थित इस कैंपस के अंदर पुराने बरगद और आम के पेड़ों की हरियाली लौट आई है. किंवदंती बन चुके आम के पेड़ बोधवृक्ष पर बैठी कोयल की बोली एक अलग राग छेड़ती है. इस राग में कई धुन और कई किस्से हैं. सामने प्रभात स्टूडियो से बीच-बीच में, कैमरा! एक्शन! कट! की आवाज मेरे कानों में आती रहती है. इन वादी और प्रतिवादी स्वरों में एक अजीब आकर्षण है.

मेरा मन कई वर्ष पहले की ओर लौट चला है. उस साल गाँव में नाटक नहीं खेला गया था. पुस्तकालय के आहते में बड़े परदे पर एक फिल्म दिखाई गई थी. मैंने भी वह फ़िल्म देखी थी. फ़िल्म का नाम और कथानक याद नहीं, लेकिन उस फ़िल्म में टेढ़-मेढ़े रास्तों से घने जंगलों में भागते घोड़े मेरे सपनों में अब भी दौड़ते हैं. घोड़ों की टाप मेरे कानों में अब भी सुनाई पड़ती है.
समकालीन समय और समाज में शायद ही ऐसा कोई हो जो कभी न कभी सिनेमा के इस जादुई सम्मोहन की गिरफ्त में नहीं आया हो. सिनेमा आधुनिक कला का सबसे बड़ा तिलिस्म है, लेकिन इस विधा को लेकर जो जुनून और दीवानगी भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में दिखती है वह और कहीं नहीं. एफटीआईआई की दीवारों पर बने चित्रों, पोस्टरों और नारों से यह बात बखूबी झलकती है. फिल्म के अलावे कुछ भी नहीं,एफटीआईआई में महज एक नारा नहीं है, बल्कि यहाँ के छात्रों-शिक्षकों का जीवन बन चुका है. पिछले पचास साल में हिंदुस्तानी समाज और सिनेमा ने बहुत कुछ बदलाव देखा, लेकिन ऐसा लगता है कि इस कैंपस में आकर समय स्टिल फोटोग्राफ -सा ठहर गया है.

पंडित नेहरू के ख्वाबों की ताबीर इस संस्थान को तत्कालीन सोवियत संघ की राजधानी मास्को स्थित सरगी ग्रासीमोव फिल्म संस्थान की तर्ज पर भारत सरकार ने वर्ष 1960 में जब स्थापित किया तो उसका मूल उद्देश्य भारतीय सिनेमा उद्योग को दक्ष कलाकार और तकनीशियन मुहैया कराना था. वर्ष 1961 से फिल्म शिक्षण-प्रशिक्षण की विधिवत पढ़ाई यहाँ शुरू हुई तो संस्थान अपने उद्देश्य से कहीं आगे जाकर भारतीय सिनेमा जगत का एक अलग अर्थ और भाषा गढ़ने लगा, जो कमोबेश आज भी कायम है. असल में इस संस्थान को रचनात्मक ऊर्जा थाती में मिली, जिसका भरपूर इस्तेमाल यहाँ के छात्रों ने किया.

अमृत मंथन, संत तुकाराम, मानुष जैसी बेहद चर्चित फिल्में देने वाले प्रभात स्टूडियो का बन-बनाया लोकेशन, आधुनिक साज-सज्जा वाला ध्वनि उपकरण, संपादन की तकनीक वगैरह संस्थान को विरासत में मिली. वर्ष 1953 में जब प्रभात स्टूडियो बंद हुआ तो भारत सरकार ने इसे खरीद लिया और फिल्म संस्थान के रूप में तब्दील करने का निश्चय किया. पुराने छात्रों ने अपनी फिल्में प्रभात स्टूडियो में मौजूद इन्हीं तकनीक और लोकेशन के सहारे बनाई.

शुरूआती दिनों से ही इस संस्थान में रचनात्मक स्वतंत्रता ऐसी थी कि वह छात्रों को अलग रास्ता चुनने और अपनी पहचान खुद बनाने के लिए प्रेरित करती रही. दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन बताते हैं, कालेज के दिनों में मेरी अभिरुचि नाटकों में थी. मैंने फिल्म के बारे में कभी नहीं सोचा था. जब मैंने फिल्म संस्थान में वर्ष 1962 में दाखिला लिया वहाँ देश-विदेश की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को देख पाया. मुझे लगा कि यही मेरा क्षेत्र है जिसमें मैं खुद को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकता हूँ.

संस्थान को ऋत्विक घटक, भाष्कर चंद्रावरकर और सतीश बहादुर जैसे मंजे निर्देशक-अध्येता शुरूआती दौर में मिले. असमिया फिल्मों के चर्चित निर्देशक जानू बरुआ बताते हैं, मैं जिंदगी में पहली बार ऐसे आदमी (ऋत्विक घटक) से मिला जिसके लिए खाना-पीना, सोना, उठना-बैठना सब कुछ सिनेमा था. हमें प्रोफेसर सतीश बहादुर ने सिखाया कि सिनेमा मनोरंजन से आगे भी बहुत कुछ है. संस्थान में आने से पहले मैं फिल्म के बारे में कुछ भी नहीं जानता था.ऋत्विक घटक के बिना इस संस्थान के बारे में कोई भी बात अधूरी रहेगी. वर्षों बाद आज भी उनकी उपस्थिति कैंपस के अंदर महसूस की जा सकती है. वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक संस्थान में उप प्राचार्य के रूप में आए और उन्होंने भारतीय सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. 70 के दशक में व्यावसायिक फिल्मों से अलग समांतर सिनेमा की धारा को पुष्ट करने वाले डूर गोपालकृष्णन, मणि कौल, और कुमार साहनी खुद को ऋत्विक घटक की संतान कहलाने में फक्र महसूस करते हैं.

हते हैं प्रतिभाएँ अक्सर अराजकता लिए हुए होती है. ऋत्विक घटक एक ऐसी ही प्रतिभा थे. एक बार फिल्म निर्देशक सईद मिर्जा ने उनसे पूछा कि आपकी फिल्मों का प्रेरणास्रोत क्या है? उनका जवाब था, एक पॉकेट में शराब की बोतल दूसरे में बच्चों जैसी संवेदनशीलता. अराजकता उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा भले रही हो, पर उनकी फिल्मों और शिक्षण से वह कोसो दूर रही. फिल्म निर्देशक और अध्येता अरूण खोपकर ऋत्विक घटक के साथ बिताए रसरंजन की शामों को याद करते हुए कहते हैं, उपनिषद का एक मतलब गुरू के नजदीक या उसके पैरों के पास बैठना होता है. हमने बोधवृक्ष के नीचे ऋत्विक दा के साथ बैठकर दुनिया और सिनेमा के बारे में बहुत कुछ सीखा. वे उपनिषैदिक गुरू थे.मणि कौल कहते हैं, अब भी मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.वर्षों तक भारतीय फिल्म अध्येताओं और सिनेप्रेमियों की नज़र से ओझल रहने वाले भारतीय सिनेमा के इस मनीषी के सम्मान में स्वर्ण जयंती वर्ष में संस्थान ने उनके नाम पर एक अकादमिक पीठ स्थापित करने का निर्णय लिया है.

भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक विभाग के रूप में जब इस संस्थान को स्थापित किया गया तब शुरूआत में निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी, ऑडियोग्राफी और फिल्म संपादन में प्रशिक्षण दी जाती थी. स्थापना के दो वर्ष के बाद यहाँ पर अभिनय में प्रशिक्षण की भी शुरूआत हुई, लेकिन दूसरे विभागों के साथ सामंजस्य के अभाव में और आपसी विवाद के चलते इसे वर्ष 1976 में बंद कर दिया गया. तब तक जया भादुड़ी, शबाना आजमी, शत्रुघ्न सिन्हा, टाम अल्टर, नसीरूद्दीन शाह, ओमपुरी जैसे अभिनेताओं की एक पूरी खेप तैयार हो चुकी थी. जब वर्ष 1974 में दिल्ली के टेलीविजन प्रशिक्षण केंद्र को इस संस्थान से जोड़ दिया गया तब से यह संस्थान भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के नाम से जाना जाने लगा है. काफी लंबे समय तक टेलीविजन प्रशिक्षण के तहत मुख्य रूप से भारत सरकार के दूरदर्शन के अधिकारियों और कर्मचारियों को यहाँ पर प्रशिक्षित किया जाता रहा, लेकिन वर्ष 2003 से सामान्य छात्रों के लिए टेलीविजन के विभिन्न आयामों में एक वर्षीय पाठ्यक्रम की शुरूआत की गई. साथ ही समय के साथ हो रहे बदलाव की वजह से संस्थान में पटकथा लेखन और एनीमेशन में शिक्षण-प्रशिक्षण की भी शुरूआत की गई है. हालांकि नए पाठयक्रम और छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी से पूरी तरह से आवासीय इस कैंपस में मौजूद मूलभूत सुविधाओं पर दबाव बढ़ा है.

वर्तमान में संस्थान सरकारी उपेक्षा का शिकार दिखता है. यह उपेक्षा छात्र-छात्राओं के लिए हॉस्टलों की कमी, विभन्न विभागों में शिक्षकों की कमी से लेकर फिल्म-टेलीविजन प्रशिक्षण के लिए जरूरी अति आधुनिक तकनीक की अनुपलब्धता में दिखती है. निर्देशन विभाग में महज एक शिक्षक स्थायी हैं. यही हाल कमोबेश, अभिनय और पटकथा लेखन विभाग का भी है. संस्थान के रजिस्टार के राजशेखरन कहते हैं, हर विभाग में शिक्षकों की कमी है. कोई क्यों आएगा यहाँ. कोई इनसेंटिव, सुविधा नहीं है. यहां पर कई शिक्षक लेक्चरर बन कर आए और लेक्चरर बन कर सेवानिवृत्त भी हुए. कई शिक्षकों ने इस संस्थान को छोड़ कर निजी संस्थान ज्वॉइन कर लिया है. आज जो शिक्षक हैं यहाँ वह अंतिम पीढ़ी के हैं जिन्हें संस्थान से जुड़ाव है. इसके बाद पता नहीं क्या होगा.

असल में इतने साल बाद भी यहाँ का प्रशासन एक सरकारी विभाग की तरह काम करता है. उदारीकरण के इस दौर में भी नौकरशाही रवैया बरकरार है. वर्षों से इस शिक्षण संस्थान के निदेशक के रूप में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही काम-काज संभाल रहे हैं. वर्ष 1971 में गठित खोसला समिति ने इस संस्थान को एक स्वायत्त संस्थान के रूप में पुनर्गिठत करने और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के साथ संबद्ध करने की मांग की थी लेकिन वह मांग अब तक पूरी नहीं हुई. अलबत्ता वर्ष 1974 में संस्थान को एक स्वायत्त सोसायटी के रूप में गठित किया गया. अब संस्थान से जुड़े सारे निर्णय गवर्निंग काउंसिल के सदस्य मिल कर करते हैं. वर्तमान में कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध लेखक यूआर अनंतमूर्ति इस कौंसिल के चेयरमैन है. निर्देशन के छात्र अमन वधान कहते हैं, एफटीटीआई के इतिहास में पहली बार छात्रों को बाहर किराए के मकान में रहना पड़ रहा है. डिप्लोमा फिल्म बनाने के लिए अपने घर से छात्रों को पैसा लगाना पड़ रहा है.

संस्थान के निदेशक पंकज राग मूलभूत सुविधाओं की कमी की बात स्वीकार करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि संस्थान को भूमंडीलय स्तर पर (ग्लोबल स्कूल) अपग्रेड किया जा रहा है जिसके तहत नए भवन, कक्ष बनाए जाएँगे. लेकिन छात्रों का कहना है सरकार का जोर संस्थान का निजीकरण करने पर है. अब तो प्रशासन ने सभी पाठ्यक्रमों की फीस में बढ़ोतरी कर दी है. अमन कहते हैं, ग्लोबल स्कूल में बिजनेस मीडिया, ब्राडकास्टिंग जर्नलिज्म, एडवरटाइजिंग की पढ़ाई होगी. यह संस्थान फिल्म-टेलीविजन में शिक्षण-प्रशिक्षण को लेकर जाना जाता है. मीडिया के लिए देश में दूसरे संस्थान हैं, फिर इसकी यहाँ क्या जरूरत है.

संस्थान के छात्र रहे युवा फिल्म निर्देशक गुरविंदर कहते हैं कि जो कुछ इस संस्थान ने दिया वह अब महज इतिहास बन कर रह गया है. पिछले दो दशक में संस्थान के प्रशिक्षण स्तर, छात्रों के चयन, डिप्लोमा फिल्मों के निर्माण सभी में गिरावट आई है. पहले संस्थान में छात्र बाहरी दुनिया से अनुभव लेकर आते थे. उनकी औसत उम्र 28-30 वर्ष होती थी. अब संस्थान का जोर कालेज से तुरंत निकले स्नातकों को नामांकन देने पर है. वे कहते हैं कि यदि यहाँ के छात्र कुछ अच्छा कर रहे हैं तो अपनी प्रतिभा के बूते, इसमें संस्थान का कोई योगदान नहीं है.

लंबे अरसे से संस्थान से जुड़े रहे प्रोफेसर सुरेश छाबरिया कहते हैं, उदारीकरण के बाद दुनिया काफी बदल गई है. कला और मौलिकता पर बाजार हावी है. ऐसे में खास कर निर्देशन के छात्रों को वर्तमान में काफी संघर्ष करना पड़ रहा है. हम अपने छात्रों से कहते हैं कि बाहर जाकर रोजी-रोटी के लिए कुछ भी कीजिए, लेकिन यहाँ पर एक कला के रूप में सिनेमा को अच्छी तरह से आत्मसात कर लीजिए.

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में संस्थान के छात्रों ने फिल्म निर्देशन या अभिनय के क्षेत्र में भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नया आयाम नहीं जोड़ा है. वर्ष 2004 में अभिनय में प्रशिक्षण की फिर से भले ही शुरूआत हुई हो, यह पाठयक्रम अभी तक गति और लय नहीं पकड़ पाया है. हालांकि छात्रों का मानना है कि संस्थान में इस पाठयक्रम का होना जरूरी है. संस्थान की छात्र रह चुकी प्रसिद्ध अभिनेत्री शाबाना आजमी कहती हैं, मैं हमेशा मानती रही हूँ कि भले ही आपमें अभिनय की प्रतिभा हो, लेकिन उसे धार देने की जरूरत होती है. प्रशिक्षण संस्थान आपमें धार पैदा करता है. एफटीटीआई ने मेरे व्यक्तित्व को सवांरा.”

कैंपस से निकलने पर फिल्मी दुनिया में पूछ बढ़ जाती है, लेकिन लंबे संघर्ष करने के लिए सबको तैयार रहना पड़ता है. अभिनय-निर्देशन के क्षेत्र में यह बात ज्यादा सच है. हालांकि पिछले दशकों में टेलीविजन के क्षेत्र में काफी अवसर बढ़े है जिसका फायदा छात्रों को मिल भी रहा है. ध्वनी संयोजन, कैमरा और संपादन के क्षेत्र में भारतीय फिल्म और टेलीविजन उद्योग में शुरूआती दिनों से ही एफटीटीआई के छात्रों का बोलबाला रहा है.

जब रेसुल पोकुटी को स्लमडॉग मिलिनेयर में ध्वनी संयोजन के लिए वर्ष 2009 में ऑस्कर से नवाजा गया तब सबकी नजर एफटीआईआई की ओर गई. वे इस संस्थान के छात्र रह चुके हैं. रेसुल पोकुटी का नाम लेते ही संस्थान के शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों की आँखें खुशी और गर्व से चमक उठती हैं. भूमंडलीकरण के इस दौर में भारतीय फिल्में भारतीयता की एक पहचान बन चुकी है. देश-विदेश में इस पहचान को पुख्ता करने में निस्संदेह इस संस्थान की प्रमुख भूमिका रही है. लेकिन क्या इसका भी वही हश्र होगा जो आजाद भारत में अन्य शिक्षण संस्थानों का हुआ है?

कीमती संग्रह
सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सिनेमा को संरक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म संस्थान की स्थापना के कुछ ही वर्ष बाद 1964 में पुणे स्थित फिल्म संस्थान में ही राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना की गई. अपने आप में देश में यह एक मात्र ऐसा संस्थान है जो फिल्मो के संग्रहण, प्रसार और संरक्षण में जुटा है. वर्ष 1973 तक संग्रहालय का कार्यालय और भवन फिल्म संस्थान के कैंपस में ही था जहाँ पर फिल्मों के रख-रखाव के लिए अनुकूल सुविधा नहीं थी. फिल्मों को बेतरतीब ढंग से एक टीन शेड में, बिना किसी वैज्ञानिक सूझ-बूझ के रखा जाता था. लेकिन वर्ष 1991 से यह संस्थान एफटीआईआई से कुछ फर्लांग की दूरी पर एक अलग भवन में काम कर रहा है जहाँ पर भूमिगत वाल्ट का निर्माण कर देश-विदेश की पुरानी और नई फिल्मों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जा रहा है. साथ ही संग्रहालय भवन में फिल्मों के प्रदर्शन के लिए आधुनिक उपकरणों से सज्जित एक थिएटर है, जहाँ पर समय- समय पर एफटीआईआई के छात्रों के लिए फिल्मों का प्रदर्शन, फिल्म समारोह होता रहता है.अब तक संग्रहालय में देश-विदेश की क़रीब छह हज़ार पाँच सौ फिल्में संग्रहित हैं. इनमें फीचर, डॉक्यूमेंट्री और एनिमेशन फिल्में शामिल हैं.

भारत में हर साल करीब 1000 फिल्में बन रही है, इस लिहाज से यह संग्रहण बेहद कम है. संग्रहालय के निदेशक विजय जाधव कहते हैं, भारतीय फिल्म उद्योग से जिस तरह के सहयोग की अपेक्षा की जा रही है वह नहीं मिल रही है. अभी हमारा जोर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मों, सामाजिक मूल्यों, नैतिक विषयों को लेकर बनने वाली फिल्मों पर ज्यादा है. पिछले दो वर्षों से संग्रहालय में फिल्मों, पोस्टर, पैंफलेट को डिजिटल रूप में बदलने की प्रक्रिया शुरू की गई है.

पिछले 35 साल से संग्रहालय एफटीआईआई के साथ मिलकर सिने प्रेमियों, पत्रकारों और फिल्म अध्येताओं के लिए हर साल मई-जून में एक महीने की अवधि का फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम का आयोजन पुणे स्थित एफटीटीआई कैंपस में करता रहा है. पाठयक्रम के संयोजक प्रोफेसर सुरेश छाबरिया कहते हैं, दुनिया में अपने आप में यह अनूठा कोर्स है जिसमें हम सिनेमा के इतिहास, सिनेमा के सिद्धांत, सिनेमा की भाषा और आधुनिक कला के एक माध्यम के रूप में इसके प्रभाव और कला के अन्य माध्यमों से सिनेमा के रिश्ते से प्रतिभागियों को अवगत कराते हैं. साथ ही देश-विदेश की दुर्लभ फिल्मों का प्रदर्शन और परिचर्चा इस पाठयक्रम का महत्वपूर्ण भाग है.

'आजादी और माहौल देते हैं'
एफटीआईआई की स्वर्ण जयंती किस रूप में मनाई जा रही है?
हमने मार्च में तीन दिनों का एक कार्यक्रम किया था जिसमें पहले बैच के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों का सम्मान किया गया. संस्थान से प्रकाशित होने वाली लेंस साइट पत्रिका के विशेष अंक का विमोचन किया गया. आगे कई योजनाएँ हैं. अगस्त महीने में हम सांप्रदायिकता के विरुद्ध सिनेमा विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन करेंगे, साथ ही कई अन्य विषयों पर भी संगोष्ठी की योजना है. सितंबर महीने में पहली बार अंतराष्ट्रीय छात्र फिल्म समारोह का आयोजन किया जाएगा साथ ही एफटीआईआई के इस ऐतिहासिक सफर पर एक किताब भी प्रकाशित की जाएगी.

पचास साल के इस सफर को आप किस रूप में देखते हैं?
इस संस्थान ने भारतीय सिनेमा जगत को समांतर सिनेमा की एक अलग धारा दी. यह एक बड़ा योगदान है. संस्थान ने भारतीय सिनेमा को अलग विधा दी जो व्यावसायिक नहीं थी. निर्देशन, अभिनय, संपादन, कैमरा, ध्वनी पाठ्यक्रम के छात्रों ने अपने ढंग से भारतीय फिल्म जगत को संमृद्ध किया है और लगातार कर रहे हैं. संस्थान के छात्र रहे रेसुल पोकुट्टी को जब पिछले वर्ष फिल्म स्लमडॉग मिलिनेयर में ध्वनी संयोजन के लिए ऑस्कर दिया गया तब हमारे लिए यह गौरव का क्षण था. वर्तमान में कला और व्यावसायिक फिल्मों का विभाजन खत्म हो चुका है. संस्थान के छात्र इस बदलते समय में अपना रचनात्मक योगदान दे रहे हैं.

एफटीआईआई का माहौल कैसा है?
एफटीआईआई की एक विशिष्ट संस्कृति है. यहाँ पर छात्रों को पूरी आजादी मिलती है, ताकि वे अपनी रचनात्मकता का बेहतरीन इस्तेमाल कर सकें. उन्हें अपनी पसंद की फिल्में बनाने के लिए अनूकूल माहौल मिलता है. इसे हम रचनात्मक स्वंतंत्रता कह सकते हैं. पिछले कुछ सालों में देश के सभी शिक्षण संस्थानों में छात्रों की रूचि पढ़ने में कम हुई है, यह बात इस संस्थान पर भी लागू होती है. हमारी कोशिश है कि छात्रों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए. फिल्मों से जुड़े विषयों पर शोध के लिए हम तीन छात्रवृत्ति इस वर्ष से दे रहे हैं. यह संस्थान के बाहर के शोधार्थी भी इसका लाभ उठा सकते हैं.

संस्थान मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है. ऐसे में इस संस्थान का विस्तार और पुनर्गठन कैसे होगा?
हमने इस संस्थान को एक डीम्ड विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दिलवाने के लिए आवेदन किया था जो स्वीकृत नहीं हुआ. हमारी कोशिश है कि यहाँ पर छात्रों को जो डिप्लोमा दी जा रही है उसे डिग्री के रूप में स्वीकार किया जाए. संस्थान को हम वैश्विक स्तर पर अपग्रेड कर रहे हैं और योजना आयोग से जिसकी स्वीकृति भी मिल चुकी है. इस योजना के तहत नए स्टूडियो, डिजीटल लैब, कक्षा भवन बनाए जाएँगे. इसमें समय लगेगा. निर्देशन पाठयक्रम में स्थायी शिक्षकों की कमी है, लेकिन गेस्ट फैकल्टी समय-समय पर संस्थान में आकर छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं.

(एफटीआईआई के निदेशक पंकज राग से बातचीत)