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Wednesday, March 02, 2022

एक निर्देशक की यादों में इरफान


इरफान (1967-2020) हमारे समय के एक बेहतरीन अभिनेता थे. उनके प्रशंसक पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. हाल ही में फिल्म निर्देशक अनूप सिंह की लिखी किताब ‘इरफान: डॉयलाग्स विद द विंड’ प्रकाशित हुई है. यह किताब एक शोक गीत है, पर इसमें जीवन का राग है. अनूप सिंह ने ‘किस्सा’ (द टेल ऑफ ए लोनली घोस्ट, 2013) और ‘द सांग ऑफ स्कॉर्पियंस’ (2017) फिल्म में इरफान के साथ काम किया था. अनूप सिंह ने किताब की शुरुआत में लिखा है कि फरवरी 16, 2018 को उन्हें इरफान का एक मैसेज मिला: ‘बात हो सकती है? कुछ अजब ही सफर की तैयारी शुरु हो गई है. आपको बताना चाह रहा था.’  इरफान अभी सफर में थे. उन्हें एक लंबी दूरी तय करनी थी. सिनेमा जगत को उनसे काफी उम्मीदें थी, लेकिन कैंसर की वजह से यह सफर थम गया. उनकी अभिनय यात्रा अचानक रुक गई.

अपने मित्र और अभिनेता को केंद्र में रखते हुए यह किताब स्मृतियों के सहारे लिखी गई है. उन स्मृतियों के सहारे जो इरफान के गुजरने के बाद बवंडर की तरह अनूप सिंह के मन पर छाई रही. इस किताब के माध्यम से अनूप सिंह ने एक अभिनेता की तैयारी, कार्यशैली और क्राफ्ट को हमारे सामने रखा है. इस अर्थ में यह किताब महज संस्मरण नहीं है. इस किताब से इरफान का व्यक्तित्व हमारे सामने आता है. साथ ही एक अभिनेता और निर्देशक के आपसी रिश्ते, एक-दूसरे के प्रति आदर और कला के प्रति दीवानगी से भी हम रू-ब-रू होते हैं.

उल्लेखनीय है कि जहाँ इरफान ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से अभिनय में प्रशिक्षण प्राप्त किया था, वहीं अनूप सिंह पुणे स्थित भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान से प्रशिक्षित हैं और स्विट्जरलैंड में रहते हैं. वे मणि कौल और कुमार शहानी की परंपरा के फिल्म निर्देशक हैं. प्रसंगवश, उन्होंने कौल और शहानी के गुरु ऋत्विक घटक के ऊपर ‘एकटि नदीर नाम’ (द नेम ऑफ ए रिवर) फिल्म का निर्माण किया है, जिसे वर्ष 2006 में ओसियान फिल्म समारोह में ‘ऋत्विक घटक रेट्रोस्पेक्टिव’ में दिखाया गया था. यह फिल्म घटक को समर्पित है.

दृश्यात्मक शैली में पूरी किताब लिखी गई है और भाषा काव्यात्मक है. यह ऐसी भाषा है जो विछोह से उपजती है. इस किताब का आधा हिस्सा ‘किस्सा’ फिल्म निर्माण-निर्देशन के इर्द-गिर्द है और कुछ हिस्सों में ‘द सांग ऑफ स्कॉर्पियंस’ की चर्चा है. ‘किस्सा ‘काफी चर्चित रही है इसे पुरस्कार भी मिले. देश विभाजन की त्रासदी और उससे उपजी पीड़ा की पृष्ठभूमि में रची गई यह कहानी एक भूत के माध्यम से कही गई है. यथार्थ और कल्पना के बीच यह फिल्म झूलती रहती है. साथ ही इस फिल्म में एक स्त्री की परवरिश एक पुरुष के रूप में है. इरफान ने अंबर सिंह का किरदार निभाया है. फिल्म के रिहर्सल के दौरान एक वाकया को याद करते हुए अनूप सिंह लिखते हैं कि किस तरह इरफान ने उन्हें वॉन गॉग की एक पेंटिंग ‘ग्रूव ऑफ ऑलिव ट्रीज,’ जो उन्होंने भेजी थी, का जिक्र करते हुए कहा था-‘ मैं इन्हीं ऑलिव वृक्षों में से एक होना चाह रहा था.’  अनूप सिंह लिखते हैं कि इस तस्वीर में प्रकृति (नेचर) और प्रारब्ध (डेस्टिनी) के विरुद्ध विद्रोह है.  इरफान इस फिल्म में  भाव-भंगिमा के सहारे अंबर सिंह की पीड़ा को सामने लाने में सफल हैं. इस किताब की भूमिका लिखते हुए अमिताभ बच्चन ने भी नोट किया है कि किस तरह ‘पीकू’ फिल्म के एक दृश्य में इरफान महज आंखों की अपनी एक भंगिमा से संवादों के पूरे  पैराग्राफ को अभिव्यक्त करने में सफल रहे. इरफान एक अभिनेता के रूप में अपने समय और स्थान के प्रति हमेशा सजग रहते थे.

वर्ष 2004 में विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर, पीयूष मिश्रा जैसे मंजे कलाकारों के साथ काम करते हुए ‘मकबूल’ के किरदार को उन्होंने जिस सहज अंदाज में जिया है, वह अविस्मरणीय है. आश्चर्य नहीं कि अपने श्रद्धांजलि लेख में नसीरुद्दीन शाह ने लिखा था कि ‘इरफान ऐसे अभिनेता हैं जिनसे मुझे इर्ष्या होती थी’.  इरफान ने अभिनय की ऊंचाई हासिल करने के लिए काफी मेहनत की जिसकी चर्चा नहीं होती. जाहिर है, जयपुर से दिल्ली और फिर बॉलीवुड-हॉलीवुड की उनकी यात्रा संघर्षपूर्ण थी. एक बार वे बोरिया-बिस्तर समेट कर जयपुर लौटने की तैयारी कर चुके थे. फिल्म निर्माण बड़ी पूंजी आधारित है, इसे वे बखूबी जानते थे पर कला के प्रति उनमें दीवानगी थी. ‘किस्सा’ के निर्माण के दौरान उन्होंने अनूप सिंह से कहा था- ‘अनूप साहब, प्रोड्यूसर तो फाइनली फिल्म बेचेगा. लेकिन जो लोग हैं वो तो आपकी फिल्म देखेंगे. आप बस अपनी फिल्म बनाइए.’ उनके जीवन और कला के बीच कोई फांक नहीं था.

किताब के आखिर में जो अस्पताल का दृश्य है, मौत से पहले की बातचीत है, वह बेहद मार्मिक है. एक कलाकार विभिन्न किरदारों को जीते हुए फिल्मों में, नाटकों में कई बार मरता है पर वास्तविक जीवन में मौत को सब झूठलाते हैं. इरफान अनूप सिंह से पूछते हैं:  मैं कहां मरूंगा?  दर्द के अलावे मेरे साथ कौन होगा?’ बिस्तर पर लेटे इरफान के साथ अनूप सिंह की गुफ्तगू है: ‘हम जो साथ मिल कर फिल्म बनाने वाले हैं उनमें एक-दो में मैं मरता हूँ, नहीं? ये पोस्चर अच्छा है, नहीं? आप कैमरा कहां लगाएँगे? साहिर लुधियानवी ने ठीक ही लिखा है: ‘मौत कितनी भी संगदिल हो, मगर जिंदगी से तो मेहरबां होगी’. इस किताब को पढ़ते यह अहसास हमेशा बना रहता है.


(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Saturday, July 09, 2011

मणि कौल: परदे पर कविता

पिछले साल मानसून में मैं पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम की पढ़ाई कर रहा था. इस संस्थान ने पिछले साल ही अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे किए. एफटीआईआई की यात्रा और भारतीय सिनेमा में उसके योगदान को लेकर मैंने एक लेख लिखा था और इसी सिलसिले में मणि कौल को मैंने फोन किया था. उन्होंने कहा किमैं आ ही रहा हूँ वहीं बैठ कर बात कर लेंगे.

पाठ्यक्रम के आखिरी दिन मणि कौल ने अपना व्याख्यान दिया था. मैं उनके हंसमुख व्यक्तित्व और मजाकिया लहजे से परिचित था.ओसियानफिल्म समारोह के दौरान दिल्ली में उनसे गाहे-बगाहे मुलाकात हो जाती थी. बीते कुछ वर्षों से वे दिल्ली ही रह रहे थे और ओसियान से जुड़े थे.व्याख्यान के दौरान जब एप्रीसिएशन पाठयक्रम के संयोजक सुरेश छाबरिया ने उनका परिचय कराते हुए कहा कि मणि हमारे समय के सबसे बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं तो कई सहपाठियों ने विस्मय से उनकी ओर देखा था. हमारी पीढ़ी जिसने नब्बे के दौरान होश संभाला, मणि कौल और उनकी फिल्मों को नहीं जानती. लेकिन मणि कौल एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए. पढ़ाई के दौरान में हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म सिद्धेश्वरीदिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है. लेकिन सिद्देश्वरी देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.

दरअसल, मणि कौल खुद के बारे में बेहद मजाकिया लहजे में बात करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म की पहुँच को लेकर उन्होंने हमें एक वाकया सुनाया था. चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह? रोटी के ऊपर फिल्म! और वह भी उसकी रोटी?तुम मेरे साथ आ जाओ हम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ. उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं? मणि कौल को संगीत की गहरी समझ थी. उन्होंने डागर बंधुओं से विधिवत संगीत सीखा था और जिसकी परिणतिध्रुपद फिल्म में सामने आई. मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा हैं. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति खिलेगा तो देखेंगेको सिनेमाई भाषा में रच रहे थे.

वर्ष 1969 में महज 25 वर्ष की उम्र में मोहन राकेश की कहानीउसकी रोटीपर इसी नाम से फिल्म बना कर उन्होंने हिंदी फिल्मों कोपापुलर सिनेमासे बाहर निकाल करसमांतर सिनेमाका एक नया रास्ता दिखाया था. वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने बताया कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना थामैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.

घटक की तरह ही हम उनके योग्य शिष्य मणि कौल की फिल्मों को उनके जीते जी समझ नहीं पाए.

समांतर सिनेमा को दुरूह और अबूझ कह कर खारिज करने की कोशिश की जाती रही है. हालांकि उन्होंने कहा था किवर्तमान में जब अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली जैसे निर्देशक मुझे फोन कर के कहते हैं कि मेरी फिल्मों से उन्हें काफी सीख मिलती है तो काफी खुशी होती है.दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी फिल्मों में संवेदनशील, प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकारों की आवक बढ़ी है जो मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं.

लेकिन आज जब कुछ लोग डेल्ही बेली और उसमें प्रयुक्त भौंडेपन और गालियों को ही सिनेमा की भाषा मानने पर जोर दे रहे हैं, ऐसे में मणि कौल की फिल्मों की पहचान कैसे होगी?

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 9 जुलाई 2011 को प्रकाशित. चित्र में एफटीआईआई-एनएफएआई में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम, 2010 के दौरान व्याख्यान देते मणि कौल)