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Sunday, May 14, 2023

एक प्रतिबद्ध,प्रयोगधर्मी फिल्मकार की जन्मशती: मृणाल सेन का सिनेमा

 


दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार मृणाल सेन (1923-2018का आज (14 मई) सौवां जन्मदिन है. पिछले दिनों इंडिया हैबिटेट सेंटर के फिल्म समारोह में मृणाल सेन रेट्रोस्पेक्टिव’ के तहत उनकी तीन फिल्में-एक दिन प्रतिदिनएक दिन अचानक और खंडहर दिखाई गई. 

दो साल पहले एक इंटरव्यू के दौरान जब मैंने मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन से उनकी पसंदीदा फिल्मों के बारे में पूछा था तब उन्होंने सत्यजीत रे की 'अपू त्रयी', 'अपराजितोके साथ मृणाल सेन की 'एक दिन प्रतिदिनऔर ऋत्विक घटक की 'मेघे ढाका ताराका जिक्र किया था. मृणाल सेन बांग्ला सिनेमा के अद्वितीय चितेरे सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक के समकालीन थे. ऋत्विक घटक की नागरिक’ (1952) और सत्यजीत रे की पाथेर पंचाली’ (1955) फिल्म के आस-पास मृणाल सेन अपनी फिल्म रात भोर’ (1956) लेकर आते हैंलेकिन जहां सत्यजीत रे को दुनियाभर में पहली फिल्म के साथ ही एक पहचान मिल गयीवहीं मृणाल सेन को लंबा इंतजार करना पड़ा था.

वर्ष 1969 में आयी हिंदी फिल्म भुवन शोम’ ने भारतीय सिनेमा में सेन को स्थापित कर दिया. विषय-वस्तु और प्रस्तुति में नवीनता लेकर आई यह फिल्म हिंदी में ‘उसकी रोटी (मणि कौल)’ और ‘सारा आकाश (बासु चटर्जी)’ के साथ समांतर सिनेमा (न्यू वेव) का सूत्रपात करने वाली फिल्म साबित हुई. सेन ने न सिर्फ बांग्ला और हिंदी बल्कि ओड़िया (माटिर मानिष) और तेलुगू में भी फिल्म बनाई. प्रेमचंद की चर्चित कहानी कफन पर आधारित तेलुगू फिल्म ओका उरी कथा’ (1977) हमें गहरे उद्वेलित करती है. इस फिल्म का पात्र वेंकैया कहता है कि यदि हम काम नहीं करेंतो भूखे रहेंगेवैसे ही जैसे बेहद कम पगार पर काम करनेवाला मजदूर भूखा रहता है. तो फिर काम क्यों करना?’ उन्होंने बंटे हुए समाज में श्रम के सवाल को केंद्र में रखा है.  भूख और मानवता के लोप को निर्ममता के साथ दर्शाया है.

मृणाल सेन राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध फिल्मकार थे. पचास साल के अपने फिल्मी जीवन में उन्होंने 28 फीचर फिल्में बनाई. उनकी सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों वाली फिल्मों में मानवतानैतिकता और सत्य की तलाश मुखर होकर सामने आती है.

एक दिन प्रतिदिन (1979)’ उनकी सिनेमा यात्रा में एक अहम मोड़ लेकर आया. इससे पहले वे नक्सलबाड़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि में कोलकाता को केंद्र में रखकर इंटरव्यू’ (1971), ‘कलकत्ता 1971’ (1972) और पदातिक’ (1973) नाम से फिल्म त्रयी बना चुके थेजो उस दौर की हिंसक राजनीतियुवाओं के सपने और हताशा को परदे पर चित्रित करती है. साथ ही उनकी फिल्में गरीबीसामाजिक न्यायसत्ता के दमन और भूख के सवालों को हमारे सामने रखती हैं. इन फिल्मों में दर्शकों से निर्देशक का सीधा संवाद है. यहाँ मृणाल सेन ब्रेख्तियन तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. वे चाहते थे कि उनकी फिल्में देखकर दर्शक उद्वेलित हों.

सेन कभी मार्क्सवादी पार्टी के सदस्य नहीं रहे. हांऋत्विक घटक की तरह ही इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के साथ उनका जुड़ाव रहा था.

एक दिन प्रतिदिन में मार्क्सवादी राजनीति से इतर एक युवती को वे केंद्र में रखते हैंजो सात लोगों के परिवार का भरण-पोषण करती है. एक रात जब वह दफ्तर से घर नहीं लौटती है तब (उसकी बहन को छोड़) आस-पड़ोस से लेकर घर-परिवार के लोग भी उसे संदेह की नज़र से देखते हैं. उसके संबंधों को लेकर टीका-टिप्पणी करते हैं. कुशलक्षेम की चिंता कोई नहीं करताएक स्त्री की स्वतंत्रताअस्तित्व का सवाल हमें गहरे मथती है. इस फिल्म के निर्माण की पद्धति पहले से भिन्न है. कथा संरचना में एक प्रवाह में है. यहाँ कोई फ्रीज शॉट या एनिमेशन नहीं दिखता है. 

इस फिल्म में जिस तरह से उन्होंने हवेली के स्पेस’ को फिल्माया है वह अद्भुत है. साथ ही क्लोज अप के माध्यम से वे पात्रों की भाव-भंगिमाअंतर्मन की बुनावट को कुशलता से सामने लाते हैं. कैमरा की गति इस फिल्म को एक लय में रचती है. साथ ही पूरे फिल्म में दर्शक की उत्सुकता यह जानने में रहती है कि आखिरकार वह स्त्री रात भर रही कहांइस संदर्भ में चर्चित फिल्म समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता ने सेन के हवाले से लिखा है कि इस फिल्म को देखने के बाद सत्यजीत रे उन्हें फोन कर पूछा कि रात भर लड़की कहाँ थीसेन का जवाब था‘ मुझे नहीं पताजिस पर रे ने कहातुम डायरेक्टर होजानना तुम्हारा व्यापार है.’ चिदानंद टिप्पणी करते हैं कि यह कहानी उन दो निर्देशकों के बीच जो अंतर है उसे किसी भी चीज से ज्यादा स्पष्ट रूप से हमारे सामने रखती है. सेन का सौंदर्य बोध रे से अलहदा था. वे कलात्मकता के पीछे कभी नहीं भागे. रे की गीतात्मक मानवता’ भी उन्हें बहुत रास नहीं आती थी. साथ ही ऋत्विक घटक के मेलोड्रामा से भी उनकी दूरी थी.

एक दिन अचानक, ‘खारिज’ फिल्म में 'एक दिन प्रतिदिनही तरह ही अनुपस्थिति के सहारे उपस्थिति का वृत्तांत जिस कौशल से सेन ने रचा हैवह भारतीय सिनेमा में दुर्लभ है. यहाँ व्यक्ति के अंतर्जगत और बहिर्जगत के साथ मध्यवर्ग की नैतिकताचिंता और पाखंड को हम देखते हैं. 

मृणाल सेन ने सिनेमा माध्यम को लेकर जितने प्रयोग किए, कथा कहने की जो प्रविधि अपनाई वह अद्वितीय है. यही वजह है कि तकनीक क्रांति के इस दौर में उनकी फिल्में युवा फिल्मकारों को अपने करीब लगती है. 

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए) 

Thursday, April 13, 2023

कुमार गंधर्व के कबीर: सुनो भई साधो


नाद के सौंदर्य को शब्द में कोई कैसे लिखे?  कोई पत्ता डाल से गिरा और उससे जो ध्वनि उत्पन्न हुई, उस अनुभूति को बयान करने के लिए क्या कवि होना जरूरी है? संभवत: हां. पर कवि के लिखे शब्द का अर्थ कई बार पढ़ कर नहीं, सुन कर ही स्पष्ट हो पाता है. पर यदि यह नाद अनहद हो तब? यह ख्याल कुमार गंधर्व (1924-1992) के कबीर को सुन कर बार-बार मन में आता है. कबीर की कविता में व्यक्त अनाहत नाद (अनहद नाद)’ कुमार के आहत नाद’ में आकर स्वर पाता है.

जब मैं कुमार गंधर्व को गाते सुनता हूँ-  उड़ जायेगा हंस अकेलाजग दर्शन का मेला/ जैसे पात गिरे तरुवर केमिलना बहुत दुहेला’, तब लगता है कि शायद कबीर को कुमार गंधर्व का इंतजार था. कबीर को कुमार करीब चार सौ साल के बाद स्वर दे रहे थे. संभव है कि हमारे चारो ओर यह नाद पहले से व्याप्त थाआधुनिक तकनीक ने कुमार गंधर्व के माध्यम से हम तक पहुँचाने में सहायता की. कहा गया है-नाद को न भेद पायोजो पायो सकल जगत में वही गुणी कहायो. कुमार गुणी गायक थे.

कर्नाटक के धारवाड़ इलाके में आठ अप्रैल 1924 को जन्मे कुमार गंधर्व का नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था. उनमें नैसर्गिक प्रतिभा थी और दस-ग्यारह वर्ष की उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि फैल गई, वे कुमार गंधर्व कहलाए. प्रोफेसर बी आर देवधर उनके गुरु थे, जो अपने शिष्यों को एक अलग रास्ता अख्तियार करने को प्रेरित करते थे. कुमार गंधर्व की क्रांतिकारी चेतना का उत्स यहाँ ढूंढा जा सकता है.

कुमार गंधर्व का जन्मशती वर्ष चल रहा है. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इस गुणी गायक को एक बार फिर से याद किया जा रहा है. सच तो यह है कि वे संगीत प्रेमियों के मन से कभी गए ही नहीं. पिछले दशकों में यूट्यूब के माध्यम से उनकी ख्याल गायकी और भजन जन सुलभ हुए हैं.

भक्तिकालीन कवि कबीर अपनी विद्रोहीलोक-चेतना की वजह से पाँच सदी के बाद भी विभिन्न रूपों में लोक मन में व्याप्त हैं. यही कारण है युवाओं में भी उनके निर्गुण पदों की पैठ बढ़ी है. मधुप मुद्गल (कुमार गंधर्व के शिष्य) से लेकर प्रहलाद टिपाणिया और शबनम विरमानी के यहाँ कबीर कई रूप और स्वर में मौजूद हैं. अनायास नहीं कि युवा संगीतकारों के एक म्यूजिक बैंड का नाम कबीर कैफे है!

बहरहाल, कुमार शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य साधक थेपर थे लोक के करीब. कई जगह यह लिखा जा चुका है कि जब वर्ष 1948 में वे टीबी से पीड़ित होकर मालवा के देवास में स्वास्थ्य लाभ करने गए, तब वहाँ गाए जाने वाले लोक गायन से उन्होंने प्रेरणा ग्रहण की थी. वहाँ नाथपंथी जोगी कबीर के निर्गुण पदों को गाते थे. करीब छह वर्ष के बाद कबीर के चदरिया को उन्होंने अपने राग से एक बार फिर बुना. उनके रचे बंदिशों में शास्त्रीय और लोक रंग एक साथ मिलते हैं.

कुमार गंधर्व के गायन में जो स्वर का उठान है और शब्दों के बीच जो शून्यता है उसे सुनने का सुख अनिर्वचनीय है. कबीर के लेखन में रहस्यात्मकता हैवहीं शास्त्रीय संगीत में अमूर्तता है. कुमार गंधर्व का गायन इस रहस्यात्मकता और अमूर्तता को भेद कर आम लोगों के करीब लेकर आया.

शास्त्रीय संगीत के कई मर्मज्ञ गायन में शब्द के महत्व को नकारते रहे हैं. मुकुंद लाठ ने एक जगह लिखा है: “संगीत में शब्द का प्रयोग आवश्यक नहीं, अवान्तर है. शब्द वहाँ आगंतुक है, न भी आए तो संगीत संगीत रह जाता है.” इसके उलट कुमार गंधर्व के लिए गायन में शब्द की महत्ता हमेशा रही. यह सिर्फ कबीर के प्रसंग में ही नहीं बल्कि जब वे सूरदास (ऊधो अँखियाँ अति अनुरागी) या मीरां (पिया जी म्हारे नैना आगे रहियो जी जी जी) को गाते हैं उससे स्पष्ट है. निर्गुण गायन से अलग उनको सुनना भी उतना ही प्रीतकर है.

कुमार गंधर्व के गायन का आनंद लेने के लिए शास्त्रीय संगीत का मर्मज्ञ होना जरूरी नहीं है. मै संगीत का जानकार नहीं हूँ, पर एक श्रोता के रूप में ऐसा लगता है कि यदि आप रसिक हैं, यही काफी है. और यही कुमार गंधर्व का भारतीय संगीत में असाधारण योगदान है, वे शास्त्रीय संगीत को लोक तक लेकर गए.

लेख की शुरुआत मैंने नाद सौंदर्य से की थी, आखिर में फिर उसी नाद की बातजिसकी सार्थकता कुमार गंधर्व के यहाँ साफ सुनाई देती है:  

सुनता है गुरु ज्ञानी ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी

गगन में आवाज़ हो रही है झीनी झीनी, झीनी झीनी’.

 

Sunday, August 08, 2010

Remembering People's Poet Nagarjun



























Hindi and Maithili poet Baba Nagarjun was born on 25 June 1911. His birth centenary is being celebrated in 2010-2011. These pictures depict his parental home, a library (in his name) in his village Tarauni and nearby railway station Sakri in Darbhanga district of Bihar. In the last picture Blogger is sitting with Baba Nagarjun's youngest son Shyamakant Mishra.