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Friday, February 04, 2022

मैथिली साहित्य की विशिष्ट रचनाकार लिली रे (1933-2022)


मैथिली साहित्य की अप्रतिम रचनाकार लिली रे का गुरुवार (3 फरवरी) को दिल्ली में निधन हो गया. वे पिछले कुछ वर्षों से पार्किंसन बीमारी से पीड़ित थी. मैथिली साहित्य में एक वर्ग विशेष के पुरुष रचनाकारों का वर्चस्व रहा है. लिली रे ने अपने लेखन से उस वर्चस्व को चुनौती दी, जिसकी अनुगूँज अखिल भारतीय स्तर पर सुनी गई. पर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आधुनिक मैथिली साहित्यकार हरिमोहन झा, नागार्जुन और राजकमल चौधरी आदि के रचनाकर्म पर जिस तरह विचार-विमर्श हुआ है, जिस रूप में साहित्य की समीक्षा हुई उस रूप में लिली रे के कथा-साहित्य की नहीं हुई. एक तरह से उनकी उपेक्षा हुई. जबकि मैथिली साहित्य में उन्हें मरीचिकाउपन्यास के लिए वर्ष 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बाद में नीरजा रेणु, उषा किरण खान और शेफालिका वर्मा को भी मैथिली में साहित्य अकादमी मिला.

मधुबनी जिले में  26 जवरी 1933 को एक संपन्न परिवार में उनका जन्म  हुआ और घर पर ही शिक्षा-दीक्षा हुई. जैसा कि उस समय प्रचलन था उनकी शादी महज बारह वर्ष की आयु में पूर्णिया जिले में हो गई, पर उनमें पढ़ने-लिखने की उत्कट आकांक्षा थी. उन्होंने अपनी आत्मकथा-समय के घड़ैतमें लिखा है: "सबसँ पहिने हमर रचना सब वैदेही मे कल्पनाशरणक नाम सँ बहराइत छल. वैदेही क सम्पादक छलाह-श्री कृष्णकांत मिश्र, लालबाग, दरभंगा. प्रथम रचनाक शीर्षक छल-रोगिणी. सब रचना संभवत: 1954 सँ 1958 केर बीच छपल छल. तदुपरांत, 1978 सँ लिली रेक नाम सँ लिखए लगलहुँ. (सबसे पहले मेरी रचना सब वैदेही (पत्रिका) में कल्पना शरण के नाम से छपी. वैदेही के संपादक थे श्री कृष्णकांत मिश्र, लालबाग, दरभंगा. पहली रचना का शीर्षक था-रोगिणी. सब रचना संभवत: 1954 से 1958 के बीच छपी. उसके बाद वर्ष 1978 से लिली रे नाम से लिखने लगी.

पहली रचना रोगिणी’ (1955) और रंगीन परदा’ (1956) से ही लिली रे का मैथिली साहित्य में विशिष्ट स्वर सुनाई देने लगा था. मैथिली स्त्री लेखन में ऐसी परंपरा नहीं थी. रंगीन परदामें मिथिला के सामंती समाज का पाखंड मालती और मोहन के बीच विवाहेतर संबंध के माध्यम से व्यक्त हुआ. इस कहानी में दामाद और सास के बीच जो शारीरिक संबंध दिखाया गया है उससे मिथिला के साहित्यक दुनिया में अश्लीलता को लेकर बहस छिड़ गई. लेकिन  राजकमल चौधरी जैसे साहित्यकार से लिली रे को प्रशंसा के पत्र भी मिले थे. उनके कथा साहित्य की स्त्रियाँ अपनी स्वतंत्रता के प्रति सचेष्ट है. रोगिणीकी गर्भवती विधवा रेनू आत्महत्या के बदले जीवन को चुनती है.

लिली रे के उपन्यास (पटाक्षेप) और कहानियों (बिल टेलर की डायरी) को हिंदी में अनुवाद करने वाली मैथिली लेखिका विभा रानी ने ठीक ही लिखा है कि लिली रे की कहानियों में स्थानीय मिथिला के साथ-साथ देश भर मुखरित है, जो कथा संसार की सार्वभौमिकता का व्यापक फलक है. दिल्ली से लेकर दार्जिलिंग व सिक्किम तक तथा मजदूर से लेकर राजदूत तक तथा देशी से लेकर विदेशी तक- सभी इनकी कथाओं के पात्र व कैनवास में फैले हुए हैं.लिली रे का ज्यादातर जीवन मिथिला के परिवेश से बाहर बीता. इस लिहाज से लिली रे का अनुभव संसार व्यापक है जो उनकी कथा साहित्य के विषय वस्तु के चयन में दिखता है. जहाँ दो खंडों में फैले मिरीचिकाउपन्यास में जमींदारी, सामंतवाद और उसके ढहते अवशेष के साथ जीवन का चित्रण है वहीं पटाक्षेप (1979) उपन्यास के मूल में नक्सलबाड़ी आंदोलन है.

प्रसंगवश, वर्ष 1960 के दशक में उनका लेखन मंद रहा, लेकिन फिर पटाक्षेप’ (मिथिला मिहिर पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशन) से लेखन ने जोर पकड़ा. मेरी जानकारी में नक्सलबाड़ी आंदोलन को केंद्र में रखकर मैथिली में शायद ही कोई और उपन्यास लिखा गया है. बांग्ला की चर्चित रचनाकार महाश्वेता देवी ने भी हजार चौरासी की मांउपन्यास लिखा, बाद में इसको आधार बनाकर इसी नाम से गोविंद निहलानी ने फिल्म भी बनायी. पटाक्षेपमें बिहार के पूर्णिया इलाके में दिलीप, अनिल, सुजीत जैसे पात्रों की मौजूदगी, संघर्ष और सशस्त्र क्रांति के लिए किसानों-मजदूरों को तैयार करने की कार्रवाई पढ़ने पर यह समझना मुश्किल नहीं होता कि यह रबिंद्र रे और उनके साथियों की कहानी है. रबिंद्र लिली रे के पुत्र थे जिनका वर्ष 2019 में निधन हो गया. अपनी आत्मकथा में भी लिली रे नक्सलबाड़ी आंदोलन में पुत्र रबिंद्र रे (लल्लू) के भाग लेने का जिक्र करती हैं कि किस तरह लल्लू हताश होकर आंदोलन से लौट आए और फिर अकादमिक दुनिया से जुड़े.

इस उपन्यास का एक पात्र सुजीत कहता है- हमारी पार्टी का लक्ष्य है- शोषण का अंत. श्रमिक वर्ग को उसका हक दिलाना.मानवीय मूल्यों को चित्रित करने वाला यह उपन्यास आत्मपरक नहीं है. सहज भाषा में, बिना दर्शन बघारे लिली रे ने सधे ढंग से वर्णनात्मक शैली में उस दौर को संवेदनशीलता के साथ पटाक्षेपमें समेटा है. उनकी यथार्थवादी दृष्टि प्रभावित करती है. लिली रे के निधन के साथ ही मैथिली साहित्य के एक युग का भी पटाक्षेप हो गया.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Tuesday, February 19, 2019

उतरे करने को उदधि-पार


पिछले दिनों देश के प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्समें समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे रबिंद्र रे (1948-2019) के गुजरने की खबर आयी. विश्व पुस्तक मेले में मैं मैथिली की सुपरिचित कथाकार लिली रे के उपन्यास पटाक्षेपका मैथिली संस्करण ढूंढ़ रहा था.

मेरी जानकारी में नक्सलबाड़ी आंदोलन को केंद्र में रखकर मैथिली में शायद ही कोई और उपन्यास लिखा गया है. बांग्ला की चर्चित रचनाकार महाश्वेता देवी ने भी हजार चौरासी की मांउपन्यास लिखा, बाद में इसको आधार बनाकर इसी नाम से गोविंद निहलानी ने फिल्म भी बनायी.

उपन्यास पटाक्षेपमें बिहार के पूर्णिया इलाके में दिलीप, अनिल, सुजीत जैसे पात्रों की मौजूदगी, संघर्ष और सशस्त्र क्रांति के लिए किसानों-मजदूरों को तैयार करने की कार्रवाई पढ़ने पर यह समझना मुश्किल नहीं होता कि यह रबिंद्र रे और उनके साथियों की कहानी है.

पात्र सुजीत कहता है- हमारी पार्टी का लक्ष्य है- शोषण का अंत. श्रमिक वर्ग को उसका हक दिलाना.उल्लेखनीय है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लिली रे रबिंद्र रे की मां हैं, पर मानवीय मूल्यों को चित्रित करनेवाला यह उपन्यास आत्मपरक नहीं है.

नयी पीढ़ी के लिए शायद यह कल्पना करना मुश्किल हो कि पिछली सदी के 60 के दशक के आखिरी और 70 के दशक के आरंभिक वर्षों में शहरी, संभ्रांत कॉलेज के युवा-छात्रों ने किसानों-आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने, उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित करने के लिए अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी और गांव-देहातों में रहने लगे. उन्होंने समतामूलक समाज का सपना देखा.

इनमें से कुछ खेत रहे और कुछ मुख्यधारा में लौट आये. हालांकि, बाद में रबिंद्र रे इस विचारधारा से न सिर्फ दूरी बना ली, बल्कि अपनी किताब द नक्सलाइट्स एंड देयर ऑडियोलॉजीमें लिखा- नक्सलाइट की अस्तित्ववादी विचारधारा मूल रूप से नाइलिस्ट है- जो आश्वस्त रहता है कि वह सब कुछ है और कुछ भी नहीं है.

सेंट स्टीफेंस कॉलेज के दिनों के उनके मित्र और नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौर में भूमिगत रहनेवाले प्रोफेसर दिलीप सिमियन ने रबिंद्र रे को याद करते हुए लिखा है कि भूमिगत रहने के दौरान में एक बार मैं साल 1971 में पूर्णिया में उससे मिला था.

सफेद गंजी, नीले रंग की लुंगी और घनी, लटकती मूंछ में पूर्णिया बस स्टैंड पर लल्लू (रबिंद्र रे का पुकारू नाम) उत्तरी बिहार का किसान लग रहा था.
युवा हमेशा स्वप्नदर्शी होता है और विद्रोही भी. लेकिन, रबिंद्र की पीढ़ी के सपने हमारी पीढ़ी से अलग थे. उस दौर में दुनियाभर में सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ युवा-छात्रों का गुस्सा चरम पर था.

फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों में सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे और भारत में नक्सलबाड़ी आंदोलन में युवा-छात्रों ने भागेदारी की थी. नागार्जुन ने लिखा है- जो छोटी-सी नैया लेकर/ उतरे करने को उदधि-पार/ मन की मन में ही रही, स्वयं/ हो गये उसी में निराकार!/ उनको प्रणाम!

(प्रभात खबर, 19 फरवरी 2019 को प्रकाशित)