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Sunday, September 14, 2025

इतिहास के पन्नों में 'उदंत मार्त्तंड'


पिछले दो सौ वर्षों में हिंदी पत्रकारिता अनेक पड़ावों से गुजर कर यहां तक पहुँची है. जाहिर है उसके स्वरूप और अंतर्वस्तु में काफी परिवर्तन हुए हैं. कहा जा सकता है कि 21वीं सदी में ‘हिंदी पत्रकारिता के ठाठ’ अंग्रेजी के मुकाबले मजबूत हुए है और वह पिछलग्गू नहीं रही. जहां अंग्रेजी के पाठकों की संख्या स्थिर बनी है, वहीं डिजिटल मीडिया के दौर में भी हिंदी समाचार पत्रों के  पाठक बढ़े हैं. साथ ही विज्ञापन का लाभ उसे काफी मिल रहा है. वर्तमान में पत्रकारिता का अधिकांश बाजारोन्मुखी है. 

बहरहाल, हिंदी के पहले प्रकाशित पत्र का स्वरूप कैसा था उसे देखना रोचक है.  अंग्रेजी में प्रकाशित ‘कैलकटा एडवटाइजर’ (1780) के प्रकाश ने 46 वर्ष बाद जब जुगल किशोर शुक्ल ने जब हिंदी को पहला साप्ताहिक समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ दिया तब एक प्राशकीय विज्ञप्ति ‘इस कागज के प्रकाशक का इश्तिहार’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुई,  जिसके तहत लिखा था, “यह उदंत मार्तंड पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया, पर अँगरेजी ओ पारसी ओ बंगले में जो समाचार का कागज छपता है, उसका सुख उन बोलियों के जान्ने ओर पढ़ने वालों को ही होता है.”

कलकत्ते से प्रकाशित उदंत मार्त्तंड में देश-विदेश,  गाँव-शहर,  हाट-बाजार संबंधी सूचनाएँ, अफसरों की नियुक्तियाँ, इश्तहार, समाचार आदि प्रकाशित होती थीं. उदंत मार्त्तंड की खड़ी बोली शैली में लिखी हिंदी पर मध्यदेशीय भाषा का प्रभाव दिखता है. 30 मई 1926 को छपे पहले अंक में गवर्नर-जनरल बहादुर का सभावर्णन प्रकाशित हुआ था.

कुल 79 अंकों के प्रकाशन के बाद जब 4 दिसंबर 1827 को शुक्ल ने इसे सरकारी सहायता के अभाव और पाठकों के कमी के कारण बंद किया, तब बहुत व्यथित होकर उन्होंने अंतिम अंक के संपादकीय में लिखा: “आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त/अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अस्त”

हालांकि शुक्ल के ऊपर एक अन्य प्रकाशक ने मानहानि का मुकदमा दर्ज किया था, जो इसके बंद होने के तात्कालिक कारण थे. 

उदंत मार्त्तंड की भाषा की परख यदि हम आज के पैमाने पर करें तो निस्संदेह उसमें व्याकरण, शब्द विन्यास, वाक्य संरचना की काफी त्रुटियाँ मिलती हैं. उसमें तोपें दगियाँ, हाजरी खाई, शोभनागार होके जैसे प्रयोग मिलते हैं. साथ ही आवेगा, जावेगा, देवेगा, होय, तोय का इस्तेमाल भी मिलता है। सेवाय, ऊसने, खलीती, मरती समय, खिलअतें, परंत, भेंट भवाई, सभों जैसे शब्द भी हैं जिसका ठीक-ठीक अर्थ लगाने में आज के दौर में हिंदी पढ़ने-समझने वालों को परेशानी होगी. फिर भी उदंत मार्तंड में खड़ी बोली हिंदी के आरंभिक रूप की झलक मिलती है, जिसका विकास आगे जाकर हुआ.

अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने उदंत मार्त्तंड की भाषा के प्रसंग में लिखा है: “जहाँ तक उदंत मार्त्तंड की भाषा का प्रश्न है, वह उस समय लिखी जाने वाली भाषा से हीन नहीं है. उसके संपादक बहुभाषाज्ञ थे...उदंत मार्तंड हिंदी का पहला समाचार पत्र होने पर भी भाषा और विचारों की दृष्टि से सुसंपादित पत्र था. ”

शुक्ल उत्तर प्रदेश के कानपुर से थे, जिन्होंने कलकत्ता को अपना कर्मभूमि बनाया था. खुद वे ब्रजभाषा, संस्कृत, खड़ी बोली, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी भाषा के जानकार थे. इसका असर उदंत मार्तंड की भाषा पर भी दिखता है. 

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Saturday, July 27, 2019

धीमी पत्रकारिता के प्रयोग: महात्मा गाँधी


समकालीन मीडिया परिदृश्य पर सोशल मीडिया और टेलीविजन हावी हैं. सूचना क्रांति से लैस इन माध्यमों में खबरों के उत्पादन और प्रसारण की हमेशा हड़बड़ाहट रहती है. ‘ब्रेकिंग न्यूज’, ‘फास्ट न्यूज’ पर जोर रहता है. हालांकि मीडिया विमर्शकारों के बीच समाचार पत्र जैसे पारंपरिक माध्यम की अहमियत फिर से बढ़ी है. ऐसे में 150वें जयंती वर्ष में महात्मा गाँधी की पत्रकारिता और उनके मूल्यों को याद करना जरूरी लगता है. वे राजनेता, विचारक के साथ-साथ एक कुशल पत्रकार भी थे. जब वे बैरिस्टर की पढ़ाई करने लंदन गए तब कानून के एक छात्र के रूप में पत्रकारिता से उनका मुखामुखम हुआ. साथ ही वर्ष 1890 में ‘द वेजिटेरियन’ में छह लेखों की एक श्रृंखला से उनके पत्रकारिता कर्म की शुरुआत हुई. इन लेखों में उनके एक सजग आलोचक रूप के दर्शन होते हैं. बाद में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गाँधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से जो भूमिका निभाई, भारतीय जनमानस और पत्रकारों को जिस रूप में उद्वेलित किया वह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास की एक धरोहर है. गाँधीजी के सत्य और अहिंसा के विचारों की गहरी छाप हिंदी अखबारों पर खास तौर पर पड़ी. उस दौर में हिंदी के अधिकांश पत्रकार-संपादक स्वतंत्रता सेनानी भी थे.

जहाँ गाँधी जी के द्वारा संपादित पत्रों- यंग इंडिया, नवजीवन, हरिजन आदि की चर्चा होती है, वहीं इंडियन ओपिनियन पत्र के साथ उनके जुड़ाव हमारे विचार-विमर्श में शामिल नहीं हो पाता, कहीं ना कहीं छूट जाता है. असल में, दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास (1893-1914) के दौरान गाँधी जी ने इंडियन ओपिनियन के साथ जुड़ कर अपने विचारों की धार को तेज किया, जो बाद के उनके सत्याग्रह और पत्रकारीय कर्म में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ था. गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में इस पत्र के बारे में लिखा है: “मनसुखलाल नाजर इसके संपादक बने. पर संपादन का सच्चा बोझ तो मुझ पर ही पड़ा.” दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह की लड़ाई, भारतीयों के अस्मिता संघर्ष में इस पत्र की केंद्रीय भूमिका थी. उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि इंडियन ओपिनियन के बिना सत्याग्रह असंभव होता.

वर्ष 1903में इंडियन प्रिंटिंग प्रेस से निकलने वाला यह एक बहुभाषी पत्र था. अंग्रेजी के अलावे गुजराती में यह पत्र प्रकाशित होता था. साथ ही कुछ समय तक यह तमिल और हिंदी में भी छपा. इतिहासकार उमा धुपेलिया मिस्त्री ने नोट किया है कि ‘ इस पत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब गाँधी ने वर्ष 1904 में इसे डरबन से 24 किलोमीटर दूर फीनिक्स के सौ एकड़ फॉर्म में पुर्नस्थापित किया. यह गाँधी पर लियो टॉलस्टाय और जॉन रस्किन का प्रभाव दिखलाता है...इंडियन ओपनियन का इतिहास फीनिक्स आश्रम से साथ अंतर्गुंफित है.” यह विचार प्रधान साप्ताहिक समाचार पत्र भारत, अफ्रीका और ब्रिटेन में मौजूद पाठकों को लक्षित था. पत्र का मुख्य लक्ष्य पाठकों में चेतना का विकास और नैतिक बल विकसित करना था. इसके लिए गाँधीजी इंडियन ओपिनियन में सदूर देशों के पत्रों से संकलित सार संग्रह को प्रकाशित किया करते थे. पत्र की भाषा उन्होंने सहज और सरल रखी. विचारों और खबरों के संप्रेषण और संपादन के लिए जो तरीका उन्होंने अपनाया वह साम्राज्यवाद विरोधी और मशीनी दखल से जिरह करता हुआ नजर आता है.

वर्ष 2013 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से छपी, इतिहासकार इसाबेल हॉफ्मायर की किताब ‘गाँधीज प्रिंटिंग प्रेस: एक्सपेरिमेंट इन स्लो रीडिंग’ में इस बात की विस्तार से चर्चा है कि किस तरह गाँधी ने खबरों के उत्पादन, प्रसारण और पढ़ने के तरीकों के लिए धीमी गति की पत्रकारिता पर जोर दिया. वे अपने लेखों में पाठकों को समाचारपत्र पढ़ने की गति धीमी रखने और पाठ को बार-बार पढ़ने को कहते थे. पाठकों के मनन और चिंतन उनकी चिंता के केंद्र में था. यह सब गाँधीजी के सत्याग्रही तेवर को दिखाता है. वे हर पाठक में एक सत्याग्रही की संभावना देखते थे. उल्लेखनीय है कि गाँधी ने इंडियन ओपिनियन के गुजराती के पाठकों के लिए ही पैफलेंट के रूप में हिंद स्वराज की रचना की थी, जहाँ पाठक और संपादक के बीच संवाद प्रमुख है.

सवाल है कि गाँधी जी की धीमी पत्रकारिता के प्रयोग को हम किस रूप में देखें. सोशल मीडिया और न्यूज चैनल आज भी सच दिखाने, सच के साथ खड़े होने, सत्ता से सच बोलने की बात करते हैं. जाहिर है उनका आग्रह भी सत्य के साथ ही है, पर गाँधी के सत्याग्रह के ये कितने करीब कहे जा सकते हैं? ‘फेक न्यूज’ के इस दौर में मुख्यधारा की पत्रकारिता की जवाबदेही राष्ट्र-राज्य और नागरिक समाज के प्रति पहले से कहीं ज्यादा है. पर क्या तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर उनका जोर है? गाँधीजी ने ऐसी पत्रकारिता की परिकल्पना की थी जो राज्य और बाजार के दवाब से मुक्त हो. सवाल यह भी है कि आज का पाठक/दर्शक खुद को पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य कहाँ खड़ा पाता है?

(जनसत्ता, 27 जुलाई 2019)

Wednesday, January 02, 2019

हिंदी समाचारपत्रों की ऑनलाइन दुनिया


पिछले दशक में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों में अखबारों के प्रसार और पाठकों की संख्या में कमी देखी गई।  भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के प्रसार के बावजूद अखबार के पाठक 2006-16 के दौरान बढ़े हैं, उनका प्रसार बढ़ा है। ख़ास तौर पर भारतीय भाषाओं, हिंदी के अखबारों के प्रसार और पाठकों की संख्या में वृद्धि हुई है।[i]  इन्हीं वर्षों में अन्य भारतीय भाषाओं के मुकाबले इंटरनेट पर हिंदी सामग्री के उत्पादक और उपभोक्ता (प्रोज्यूमर) की मौजूदगी भी कई गुणा बढ़ी है और अंग्रेजी का वर्चस्व टूटा है। गूगल और केपीएमजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2021 तक हिंदी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा करीब 20 करोड़ हो जाएगी, जो भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों का कुल 38 प्रतिशत होगा। वर्तमान में भारत में हिंदी में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 6 करोड़ से कुछ लाख ज्यादा है।[ii]

21वीं सदी के दूसरे दशक में, ‘डिजिटल डिवाइड’ के बावजूद, हिंदी अखबारों के न्यूज रूम में ‘इंटरनेट फर्स्ट’, ‘डिजिटल फर्स्ट’ जैसे नारे सुनाई पड़ने लगे हैं। मीडिया संस्थानों के मालिक, ब्रांड मैनेजर और संपादक पत्रकारिता का भविष्य ऑनलाइन, डिजिटल पत्रकारिता को ही मान रहे हैं। यहाँ तक कि अब हिंदी मुख्यधारा के अखबारों का जोर वेबसाइटों पर सामग्री उपलब्ध करवाने पर ज्यादा है। जाहिर है ऑनलाइन खबरों का बाजार बढ़ा है। साथ ही इस बीच इंटरनेट पर खबरों की तलाश, उसमें दिलचस्पी हिंदी के उपभोक्ताओं में बढ़ी है। 

कंप्यूटर, स्मार्ट फोन, इंटरनेट (टूजी, थ्री जी, फोर जी) और सस्ते डाटा पैक की दूर-दराज इलाकों तक पहुँच ने मीडिया के बाजार में खबरों के परोसने, उसके उत्पादन और उपभोग की प्रक्रिया को खासा प्रभावित किया है। अखबारों और इंटरनेट पर प्रस्तुत समाचार के बीच एक नए संबंध बन कर उभरे हैं। सोशल मीडिया के फैलने के बाद खबरों के प्रसारण का तरीका भी बदला है। पर इस बदलाव की दशा और दिशा क्या रही है? क्या हिंदी के अखबार, इंटरनेट पर मौजूद वेबसाइटों के पूरक बन कर उभरे हैं? या इंटरनेट पर जो खबरों का बाजार है उसका संचालन एक अलग पाठक वर्ग को ध्यान में रख कर किया जा रहा है? हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में बहस-मुबाहिसे के मंच के रूप में इन वेबसाइटों की क्या पहचान है? इस लेख में हिंदी अखबारों के ऑनलाइन वेबसाइटों के काम-काज के तरीकों के लेखा-जोखा के आधार पर इन सवालों का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की गई है।

हिंदी में ऑन लाइन पत्रकारिता:पब्लिक स्फीयर का विस्तार

हिंदी में ऑन लाइन पत्रकारिता की शुरुआत 20वीं सदी के आखिरी सालों में ‘नेट जाल डॉट कॉम’, वेब दुनिया वेबसाइट वगैरह से  होती है। वर्ष 2000 में ऑनलाइन दुनिया में ‘बबल बर्स्ट’ (इंटरनेट डॉट कॉम से जुड़ी कई कंपनियों के स्टॉक लुढक गए, इंटरनेट पर कारोबार करने वाली कई कंपनियाँ बंद हो गई) किया तो छह-सात महीने के लिए ऑन लाइन पत्रकारिता प्रभावित रही थी। हालांकि उस दौरान अखबारों की खबरों, विचारों-विश्लेषणों को ऑनलाइन पर कट-पेस्ट कर ज्यों का त्यों डाल दिया जाता था। वेबसाइट 24 घंटे तक अपडेट भी नहीं होते थे। उस दौर की ऑनलाइन पत्रकारिता के प्रसंग में इतिहासकार और मीडिया विमर्शकार रविकांत (2003: 200) ने ठीक ही नोट किया है: उम्र का एक घिसा-पिटा मुहावरा लें तो नेट के सूचना महामार्ग पर हिंदी अभी उंगली पकड़ कर चलना सीख रही है। हालाँकि सारे प्रमुख अखबारों ने खुद को वेब पर डाल दिया है, लेकिन नेट संस्करण प्रिंट की प्रतिलिपि लगते हैं, जो डिजिटल तकनीक की क्षमताओँ के दोहन की अच्छी मिसाल नहीं है।”[iii] असल में उस दौर में हिंदी अखबारों में डेस्क पर जो संपादक काम कर रहे थे उन्हें ही ऑनलाइन संस्करण के काम की देख-रेख में लगा दिया गया था। उस वक्त तकनीक ज्ञान पर संस्थानों का जोर नहीं था, हालांकि वर्तमान में तकनीक के क्षेत्र में हो रहे बदलाव की अद्यतन जानकारी बेहद जरूरी है। हिंदी के वेबसाइट मल्टी मीडिया का प्लेटफार्म बन कर उभरे हैं। 

हिंदी अखबारों में दैनिक भाष्कर, दैनिक जागरण और नवभारत टाइम्स (नभाटा) हिंदी में समाचार के अग्रणी वेबसाइट हैं। इसके बाद हिंदुस्तान, राजस्थान पत्रिका, जनसत्ता वगैरह का नंबर आता है। नवभारत टाइम्स ऑन लाइन वेबसाइट से वर्ष 2007 से जुड़े डिप्टी एडिटर प्रभाष झा कहते हैं: “यहाँ ज्वाइन करने से पहले हिंदी अखबारों के लिए पाँच साल काम किया था। चूंकि जो काम ऑनलाइन पर करना था वह डेस्क से ही जुड़ा हुआ था सो कोई परेशानी नहीं हुई। पहले संस्थान में जो कोई अनुभवी होते थे, उन्हें इस काम पर लगा दिया जाता था। तकनीक ज्ञान पर जोर नहीं था, पर अब स्थिति बदली है। वीडियो- ऑडियो संपादन, शूटिंग वैगरह की जानकारी जरूरी है।”[iv] 

नवभारत टाइम्स वेबसाइट के लिए अलग से रिपोर्टस की टीम नहीं है। अखबार के रिपोर्टर ही वेबसाइट के लिए सामग्री मुहैया कराते हैं। वेबसाइट के लिए अलग से डेस्क है, जहाँ वेबसाइट के लिए 65 पत्रकार काम करते हैं, वहीं अखबार के लिए 150-175। यही बात हिंदी के सभी अखबारों के लिए सच हैं। राजस्थान पत्रिका के दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख मुकेश केजरीवाल कहते हैं कि “भले ही हमारे पास अलग से ऑनलाइन के लिए रिपोर्टर्स नहीं हो, पर अब हमारे रिपोर्टर्स चाहते हैं कि उनकी स्टोरी जल्दी से जल्दी ऑन लाइन पब्लिश हो जाए। इससे उनकी पहुँच ग्लोबल हो जाती है। और शब्द सीमा का भी कोई झंझट उनके सामने नहीं रहता।”[v] इंटरनेट पर भले ही किसी कहानी को कहने के लिए कोई शब्द सीमा नहीं हो, पर ऑनलाइन वेबसाइट पर काम करने के अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि कम शब्दों में, पाठकों को जानकारी मुहैया कराने पर संपादकों का जोर रहता है। माना जाता कि पाठक कई बार सिर्फ खबरों की हेडलाइन पढ़ कर निकल जाते हैं, कहानी (स्टोरी) के अंदर जाने की जहमत भी नहीं मोल लेते। इस लिहाज से टीजर, ग्राफिक्स, फोटो, विडियो के सहारे कहानी कहने पर यहाँ जोर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, विजुअल सामग्री परोसने पर इन वेबसाइटों का ध्यान लगा रहता है। ऐसा भी नहीं है कि शोधपरक, विश्लेषात्मक कहानी, खबरें आदि ऑनलाइन नहीं पढ़ी जाती है। जैसे-जैसे नए पाठक वर्ग ऑनलाइन दुनिया से जुड़ रहे हैं, उनकी रूचि, प्राथमिकताओं में भी बदलाव देखा जा रहा है।

सही मायनों में हिंदी अखबारों के वेबसाइट 2010 के बाद अपनी अलग पहचान लेकर आए। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष 3 जी सेवा ने इंटरनेट, मोबाइल के प्रसार को एक गति दी।[vi] इसी दौरान अरब देशों में जो आंदोलन हुए जिसमें ऑन लाइन की बड़ी भूमिका थी। वर्ष 2011 में भारत में भ्रष्टाचार के विरोध में हुए अन्ना आँदोलन के कारण लोगों की रूचि राजनीति में बढ़ी, फिर 2012 में बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में हुए निर्भया आंदोलन ने पूरे देश को उद्वेलित किया। इन आंदोलनों में सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर आदि) का भी खूब इस्तेमाल हुआ। लोकतंत्र में राजनीतिक भागेदारी और राजनीतिक दलों के संचार में मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है। वर्ष 2014 में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार की अघोषित नीति मेनस्ट्रीम (प्रिंट और टेलीविजन) के बदले न्यू मीडिया को तरजीह देने की है। ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया की दुनिया में सबसे ज्यादा सक्रिय रहने वाले नेताओं में से एक है। ट्विटर पर उनके 43.4  मिलियन और फेसबुक पर 43.2  मिलियन फॉलोअर हैं।[vii] इस सबने ऑन लाइन वेबसाइटों के प्रति लोगों को आकर्षित किया। सोशल मीडिया के माध्यम से इन वेबसाइटों पर पाठकों की आवाजाही भी बढ़ी।

युरगेन हैबरमास (1989) ने पब्लिक स्फीयर की अवधारणा के प्रसंग में नागरिकों के परस्पर तथा शासक के साथ तर्क और उस पर आधारित खुलापन, विचारों के आदान-प्रदान के जिस क्षेत्र की बात की है, उसमें मीडिया (पत्र-पत्रिका ) और अब न्यू मीडिया का विशेष महत्व है। वे मानते हैं कि आधुनिक यूरोप के आरंभिक दौर में पत्र-पत्रिकाओं के प्रसार ने निरंकुश सत्ता से उदार लोकतांत्रिक समाज की यात्रा में अति महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी तथा मीडिया के माध्यम से आलोचनात्मक लोक विचारों की अभिव्यक्ति आधुनिक लोकतांत्रिक जीवन का अनिवार्य पहलू था।[viii] यह सच है कि भारतीय अर्थव्यस्था में उदारीकरण (1991), निजीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप आए भूमंडलीकरण के दौर में इंटरनेट, मोबाइल फोन जैसी नई तकनीक के माध्यम से हिंदी अखबारों की पहुँच डायसपोरा (विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के लोग) तक हुई है। जहाँ अखबार के पहुँच की एक सीमा होती है, वहीं इंटरनेट इन बाध्यताओँ से मुक्त है। और इस तरह वेबसाइटों पर मौजूद हिंदी अखबारों ने हिंदी की सार्वजनिक दुनिया (पब्लिक स्फीयर) का विस्तार किया है। 

रॉबिन जैफ्री और अस्सा डोरोन (2013:13-14) ने भारत में सेल फोन के विस्तार से संबंधित अपने अध्ययन में लिखा है: 21वीं सदी में भी सत्ता की संरचना-लिंग, जाति, वर्ग और परिवार- लोगों की कल्पना की क्षमता या खुद को इन संरचनाओं से हट कर अभिव्यक्त करने की राह में रुकावट बन कर खड़े हैं। यहीं पर मोबाइल फोन के माध्यम से नए संबंधों की गुंजाइश महत्वपूर्ण हो जाती। नए औजार के माध्यम से समाज में जो सत्ता संरचनाएँ जड़ जमा कर बैठी है उससे अलग एक राह की संभावना निकल आती है।”[ix] पर सवाल है कि इस संभावना और इंटरनेट के विस्तार के बाद बने पब्लिक स्फीयर का स्वरूप क्या है? 

ऑनलाइन सामग्री और उपभोक्तावाद: डिजिटल फर्स्ट

उदारीकरण के बाद हिंदी अखबारों में बड़ी पूंजी का प्रवेश बढ़ता गया। अखबार एक ‘प्रोडक्ट’ बन गए। अखबारों में संपादकों की जगह ब्रांड मैनेजरों की भूमिका बढ़ती गई। हिंदी अखबारों का मुख्य ध्येय विज्ञापनदाताओँ को आकर्षित करना हो गया। भूमंडलीकरण के बाद समाज में बढी उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों को अखबारों ने भुनाना शुरु किया। हिंदी के अखबारों का मुख्य लक्ष्य उभरते हुए नव मध्यवर्ग पाठकों को सामग्री देना हो गया। वर्तमान में उनके सरोकार बहुसंख्यक हिंदी समाज, हाशिए पर रहने वाले लोग, जिनके पास क्रय शक्ति नहीं है, से नहीं जुड़े हैं। यह सच है कि हिंदी के ऑनलाइन न्यूज वेबसाइट के पाठक और अखबारों के पाठक वर्ग अलग-अलग हैं। जहाँ हिंदी के अखबारों के पाठक सभी उम्र के लोग होते हैं, वहीं वेबसाइट के पाठक अधिकांश युवा वर्ग है। फलत: वेबसाइटों पर जो सामग्री होती है वह प्रिंट संस्करण से अलग होती है। यहाँ क्लिकबेट (हेडिंग में भड़काऊ शब्दों का इस्तेमाल ताकि अधिकाधिक हिट मिले) और सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर आदि) पर खबरों के शेयर करने की योग्यता (शेयरेबलिटी) पर ज्यादा जोर रहता है। यहाँ अखबारों की तरह सब्सक्रीप्शन या स्थानीय हॉकर/स्टैंड से अखबार खरीदने की बात नहीं है। इस बात उल्लेख जरूरी है कि हिंदी में पेड वेबसाइटों का चलन नहीं है, अखबारों के सारे वेबासइट फ्री हैं। साथ ही, चूंकि स्मार्टफोन के उपभोक्ता युवा हैं, तो इन वर्षों में इन उपभोक्ताओं को ध्यान में रख कर सामग्री परोसने का चलन जोर पकड़ा है। इन वेबसाइटों का टारगेट आडिएंश शहरी मध्यम वर्ग हैं। यह बात महज भारतीय ऑनलाइन न्यूज वेबसाइट तक ही सीमित नहीं है बल्कि बीबीसी (ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन), जिसकी भारत में काफी प्रतिष्ठा रही है, वहाँ भी देखने को मिलता है।

यदि इन अखबारों के ऑनलाइन सामग्री का अध्ययन करें तो खबरों के परोसने का रंग-ढंग हिंदी के खबरिया चैनलों से ही प्रेरित दिखते हैं, अखबारों से नहीं। टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार करण थापर कहते हैं कि “हमारे यहाँ करीब 400 खबरिया चैनल हैं, पर क्या कोई ऐसा चैनल है जिस पर हम भारतीय उसी तरह से गर्व कर सकें जैसा कि एक ब्रिटिश बीबीसी को लेकर या एक अमेरिकी सीएनएन को लेकर होता है।”[x] टेलीविजन के हिंदी खबरिया चैनलों पर जोर टीआरपी बटोरने और सनसनी फैलाने पर रहता है कि ना कि खबरों के प्रसार, विवेचन-विश्लेषण पर। ठीक इसी तरह हिंदी के वेबसाइटों पर बुलेटिन की तरह हेडलाइन, वीडियो और फोटो गैलरी देने पर जोर है, खबरों के विवेचन-विश्लेषण, इनवेस्टिगेशन पर कम। इस बात से इंकार नहीं कि नया माध्यम नए तरह के सामग्री के उत्पादन और प्रसार की अपेक्षा रखता है, पर विश्वसनीय खबरों को आम-फहम भाषा में लोगों तक पहुँचाना, सत्ता से सवाल करना और बहस-मुबाहिसे का एक मंच मुहैया करना, सच की तह तक पहुँचना इन वेबसाइटों के लिए भी उसी तरह मायने रखता है जितना अखबार या टीवी के लिए। अन्ना आंदोलन या निर्भया आंदोलन के दौरान राजनीतिक लामबंदी में इनकी भूमिका रेखांकित करने योग्य रही। पर इन अपवादों को छोड़ दें तो करीब दो दशकों की अपनी इस यात्रा  में हिंदी अखबारों की वेबसाइटों ने सार्वजनिक दुनिया (पब्लिक स्फीयर) का विस्तार भले किया हो, इसमें कोई गुणात्मक परिवर्तन या बदलाव करता हुआ नहीं दिखता। अपनी बात को और स्पष्ट रूप से रखने के लिए मैं यहाँ एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ। 

फरवरी 2018 में हिंदी सिनेमा की चर्चित कलाकार श्रीदेवी की मौत को जिस तरह सनसनीखेज भाषा में हिंदी अखबारों के वेबसाइटों ने कवर किया, कयास लगाए इस बात की ताकीद करते हैं। जनसत्ता ने अर्जुन कपूर के श्रीदेवी और उनकी बेटी से अलगाव को हेडलाइन बनाया तो नवभारत टाइम्स ने दुबई के होटल के श्रीदेवी और बोनी कपूर के आखिरी लम्हों के वीडियो को वेबसाइट पर लगाया। ऐसा लग रहा था कि श्रीदेवी की मौत की खबर को लोगों तक पहुँचाने से ज्यादा इनकी रूचि इसे ‘सेलिब्रेट’ करने में रही। कई हेडलाइंस तो स्त्री-विरोधी भी थे। दैनिक भाष्कर वेबसाइट का एक हेडलाइन कह रहा था: 50 पार भी नहीं ढली थी श्रीदेवी की खूबसूरती, इन एक्ट्रेसेस पर भी नहीं हुआ उम्र का असर।” यहाँ तक कि बीबीसी हिंदी ऑनलाइन वेबसाइट का रवैया भी वही था, जो टीवी चैनलों का रहा। 26 फरवरी 2018 को एक समय वेबसाइट के मेन पेज कम से कम श्रीदेवी से जुड़ी चौदह स्टोरी, रिपोर्ट, वीडियो, ब्लॉग आदि की शक्ल में थी। यह हिंदी ऑनलाइन मीडिया की दिशा और दशा का भी सूचक है। यहाँ खबरों का मतलब मनोरंजन है और मनोरंजन का मतलब बॉलीवुड। भूमंडलीकरण के बाद हिंदी के अखबारों में खुश खबर परोसने का चलन जोर पकड़ा है, हिंदी अखबारों के वेबसाइट भी इसे बढ़ावा दे रहे हैं।[xi] इस मायने अखबार और वेबसाइट एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। 

बीबीसी हिंदी वेबसाइट ने संवाददाता के हवाले से एक और ख़बर चलाई थी-क्या श्रीदेवी को पहले से ख़तरा था?[xii] इस ख़बर के मुताबिक: श्रीदेवी की मौत के बाद अब उनके परिवार में भी हृदय रोग फ़ैमली हिस्ट्री का हिस्सा होगी। इसलिए उनकी दोनों बेटियां जाह्नवी और खुशी को ज़्यादा सजग रहने की ज़रूरत है।" हालांकि खबर को अपडेट करने के बाद इन पंक्तियों को हटा दिया गया लेकिन ऐसा लगता है कि खबरों का चुनाव ही नहीं, उसे बरतने की नीति, विश्वसनीयता का पैमाना भी बीबीसी के अंग्रेजी और हिंदी पाठकों के लिए अलग-अलग है। हिंदी की जो स्टोरी ऑनलाइन दी जाती है और यदि फिर उसमें फेर-बदल किया जाता है तो पाठकों को इस बात की जानकारी नहीं दी जाती जो कि बीबीसी के गाइडलांइस के विपरीत है। हिंदी के खबरिया वेबसाइट ‘सॉफ्ट पोर्न’ और ‘क्लिकबेट’ (पाठकों को आकर्षित करने के लिए भड़काऊ शब्दों का हेडलाइन में इस्तेमाल) की नीति पर चल रहे हैं।

श्रीदेवी की दुखद मौत बॉलीवुड और उनके फैन्स के लिए सदमे से कम नहीं था। उनकी मौत  होटल के बाथटब में दुर्घटनावश डूबने के कारण हुई, लेकिन टेलीविजन न्यूज चैनल ने जिस तरह से इस दुखद घटना को कवर किया उसकी ख़ूब आलोचना हुई। लोगों ने इसे ‘बाथटब जर्नलिज्म’ कहा। हालांकि इस तरह की सनसनी टीवी न्यूज ने पहली बार नहीं फैलाई थी। अब तो टीवी चैनल के कई वरिष्ठ एंकर भी टीवी न्यूज से दूर रहने की सलाह देने लगे हैं। पर जिस तरह से हिंदी ऑन लाइन न्यूज वेबसाइटों पर श्रीदेवी को लेकर खबर परोसी गई वह ऑनलाइन पत्रकारिता की दशा और दिशा का सूचक है। खबरें इनके लिए उपभोग की वस्तु हैं, ना की सूचना का साधन।

निष्कर्ष: भारत में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में पाँच हिंदी के अखबार हैं, जबकि अन्य स्थान मलयालम, तमिल और मराठी के अखबारों को प्राप्त है। द टाइम्स ऑफ इंडिया अंग्रेजी का एक मात्र अखबार है जिसकी पहुँच इस सूची में है। आने वाले निकट भविष्य में हिंदी क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार और आय में बढ़ोतरी से अखबारों का प्रसार बढ़ेगा, साथ ही इन अखबारों के वेबसाइटों की पहुँच भी छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में रहने वाले पाठकों तक बढ़ेगी। पिछले करीब दो दशक की हिंदी ऑनलाइन समाचार जगत को देखते हुए यह कहना उचित है कि हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार भले हुआ हो, उसमें गुणात्मक रूप से कोई बदलाव लाने ये वेबसाइट असफल रहे हैं।

(संवाद पथ, जुलाई-सितंबर 2018 प्रकाशित)


संदर्भ
[iii] रविकांत (2003), भविष्य का इतिहास, अभय कुमार दुबे (सं), ‘भारत का भूमंडलीकरण’ में संग्रहित, दिल्ली: वाणी प्रकाशन।
[iv] निजी इंटरव्यू: 17 फरवरी 2018 
[v] निजी इंटरव्यू: 18 फरवरी 2018
[vi] देखें, सुनेत्रा सेन नारायण और शालिनी नारायणन (2016), इंडिया कनेक्टेड, सेज पब्लिकेशंस: नयी दिल्ली।
[vii] https://www.livemint.com/Politics/d9msMK13chc6bwTFyWkMNO/PM-Narendra-Modi-is-world-No-3-on-Twitter-No1-on-Facebook.html
[viii]  युरगेन हैबरमास (1989), ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफारमेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर’, केंब्रिज: पॉलिटि प्रेस।
[ix] देखें, रॉबिन जैफ्री और अस्सा डोरोन (2013), ‘सेलफोन नेशन’, हैचेट इंडिया।
[x] निजी इंटरव्यू: 20 जुलाई 2018
[xi] देखें, अरविंद दास (2013), हिंदी में समाचार, अंतिका प्रकाशन:गाजियाबाद।