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Wednesday, November 12, 2025

The Children of Ritwik Ghatak


During the Osian’s Cinefan Film Festival in Delhi in 2006, a special highlight was the screening of films paying tribute to the great Indian filmmaker Ritwik Ghatak and Hong Kong’s Stanley Kwan. Along with seven of Ghatak’s films, Anup Singh’s Ekti Nadir Naam (The Name of a River) — dedicated to Ghatak — was also screened.

Ghatak’s favourite pupil and renowned filmmaker Mani Kaul was the creative director of the festival. During the event, I had a long conversation with Kaul. He told me, “Even today, I continue to learn from Ritwik-da’s films. He helped me move beyond the neo-realist tradition.” He further added, “Critics often dismissed his work as melodramatic. But Ghatak used melodrama only to transcend it. People of his time failed to understand him.”
Ghatak profoundly influenced an entire generation of Indian filmmakers during his tenure as Professor and Vice Principal at the Film and Television Institute of India (FTII), Pune, from 1963 to 1965. The noted filmmaker and theorist Kumar Shahani was another of his favourite students at FTII. Shahani acknowledged that it was Ghatak who first introduced him to the idea of the epic form.
Char Adhyay, Shahani's’s last film, based on Rabindranath Tagore’s novel, explores self-determination and violence in pre-independent India. Shahani told me, “You will find Ritwik da a lot in this movie.”
In the 1970s and 1980s, filmmakers such as Mani Kaul, Kumar Shahani, Adoor Gopalakrishnan, Jahnu Barua, Saeed Mirza, Kundan Shah emerged across India as an alternative to mainstream cinema. All of them were deeply influenced by the humanism and radical vision of Ghatak.
It is often said that genius carries within it a streak of chaos. Ritwik Ghatak was one such genius. When he passed away on February 6, 1976, he was only 51. His works, Ajantrik, Meghe Dhaka Tara, Komal Gandhar, Subarnarekha, and Titash Ekti Nadir Naam remain timeless treasures of Indian cinema.
Born in Rajshahi, now in Bangladesh, Ghatak personally endured the trauma of Partition and his films stand as testaments to displacement and refugee life. The famine and partition of Bengal left an indelible mark on his mind and consciousness. The pain of exile lies at the heart of his cinema; an experience he lived by himself.
In Subarnarekha, the story begins with the tragedy of Partition. Early in the film, a character remarks, “Who here isn’t a refugee?” Ghatak gives the question of exile a new dimension. It is not merely about physical displacement, it is about a deeper search for belonging.
In today’s global village, as the distances of time and space grow ever smaller, our search for identity only intensifies. Ghatak’s films thus remain profoundly relevant and close to our time and society.
At the beginning of his creative journey, Ghatak was associated with the Indian People’s Theatre Association (IPTA). In 1948, he began his acting career in the celebrated play Nabanna by Bijon Bhattacharya and Shambhu Mitra.
During the Osian’s Festival, renowned Malayalam filmmaker Adoor Gopalakrishnan was a jury member. I met him at Siri Fort Auditorium and we sat together for a brief discussion. We spoke about Ghatak. Although Adoor said he was not as close to Ghatak as Mani Kaul or Kumar Shahani, he remembered his teacher with deep respect and noted that Ghatak’s IPTA background and his artistic use of music were central to his cinematic vision.
Few years ago, in an interview with me, Anup Singh, the director of Ekti Nadir Naam, spoke about the epic traditions reflected in Ghatak’s cinema. He told me, “Too often, we are ready to judge a person by their name, or by what he or she wears. We accept what we are told about others as true — the cinema of Ritwik Ghatak questions such unexamined and easy attempts to understand our life.”
A true master lives on through the work of his worthy disciples and this could not be truer in the case of Ritwik Ghatak, whose influence continues to shape Indian cinema decades after his passing.
The birth anniversary of Ritwik Ghatak is a moment to reflect upon his films and the rich legacy he left behind.

Sunday, August 04, 2024

अधूरे अफसाने सी जिंदगी: गुरुदत्त


पिछले साल जब वहीदा रहमान को दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया गया तब मैंने उनसे बातचीत की थी. मैंने उनसे पूछा था कि ‘आप गुरुदत्त को कैसे याद करती हैं?’ उनका कहना था कि ‘मैं न्यूकमर थी उस वक्त. मुझे कुछ समझ नहीं थी. उन्होंने एक के बाद एक ऐसी क्लासिक पिक्चर बनाई, जिसका मैं हिस्सा बनी. पूरा क्रेडिट गुरुदत्त जी का है.’ प्रसंगवश, वर्ष 1955 में तेलुगु फिल्म ‘रोजुलू माराई’ के एक गाने में पहली बार वह नजर आई जो बेहद चर्चित हुई. उस गाने पर गुरुदत्त की नजर पड़ी और वे उन्हें मायानगरी (मुंबई) खींच लाए.

वहीदा रहमान की फिल्में, जिसे गुरुदत्त (1925-1964) ने निर्माण-निर्देशित किया, मसलन ‘प्यासा’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘कागज के फूल’ विश्व सिनेमा के इतिहास में क्लासिक का दर्जा रखती है. महज 39 वर्ष का जीवन ही गुरुदत्त को मिला. लेकिन करीब पंद्रह वर्ष के फिल्मी करियर में गुरुदत्त ने परदे पर एक कलाकार और निर्देशक के रूप में जो कुछ भी रचा उसने हिंदी सिनेमा के मुहावरे को बदल दिया. उनकी अधिकांश फिल्में कलात्मक और व्यावसायिक दोनों ही रूपों में सफल रही थी.

साथ ही उनकी बनाई फिल्मों में एक उत्तरोत्तर उठान दिखाई देता है. शुरुआत की फिल्म ‘बाजी’ (1951), जिसे उन्होंने बलराज साहनी के साथ मिल कर लिखा था, से लेकर ‘जाल’, ‘बाज’, ‘आर-पार’, ‘मिस्टेर मिसेज 55’ और ‘साहब बीवी और गुलाम’ तक के सफर में यह दिखाई देता है. उनकी आखिरी फिल्में एक कुशल रचनाकार के ‘स्व’ की खोज की तरफ जाती दिखाई देती है. एक कश्मकश है यहाँ, जो उनके निजी जीवन का भी प्रतिबिंब है. उनका जीवन एक अधूरे अफसाने की तरह रहा, जो हूक पैदा करता है.

गुरुदत्त के जन्मशती वर्ष में एक बार फिर से उनके योगदान की चर्चा अपेक्षित है. गुरुदत्त की फिल्में जितनी मेलोड्रामा के लिए याद रखने योग्य है, उतनी है बिंब के इस्तेमाल को लेकर. उनकी फिल्मों में विभिन्न शॉट्स का संयोजन एक लय की सृष्टि करता है. ‘कागज के फूल’ फिल्म में जिस तरह से कैमरा ने प्रकाश और छाया को कैद किया है, वह अविस्मरणीय है.

उनकी फिल्मों में गीत-संगीत का प्रयोग अलग से रेखांकित किया जाता रहा है. नसरीन मुन्नी कबीर ने ‘गुरुदत्त: ए लाइफ इन सिनेमा’ में ठीक ही लिखा है कि गानों को परदे पर उतारने में उन्हें महारत हासिल थी, जिससे उनके सहयोगी हमेशा प्रभावित होते थे. अपनी सभी फिल्मों में गुरुदत्त गीतों का इस्तेमाल संवाद के विस्तार के रूप में करते थे. 'मिस्टर एंड मिसेज 55' जैसी कॉमेडी हो या ‘प्यासा जैसी ट्रेजडी फिल्म, इनके गाने साठ-सत्तर साल बाद भी लोगों की जबान पर हैं.

कर्नाटक के मंगलौर में जन्मे गुरुदत्त का बचपन कोलकाता में बीता था. सत्तरह वर्ष की उम्र में वे प्रसिद्ध नृत्यकार उदय शंकर की संस्था ‘इंडिया कल्चर सेंटर’(अल्मोड़ा) से जुड़े थे. वर्ष 1944 में, दो वर्ष बाद, वे पूना पहुँचे जहाँ वे विश्राम बेडेकर निर्देशित फिल्म ‘लाखारानी (1945)’ में सहायक निर्देशक और एक किरदार की छोटी सी भूमिका में दिखे. यहीं से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई, जो मंजिल तक पहुँचे बिना खत्म हुई.

Friday, September 24, 2021

सद्गति के चालीस साल: परदे पर साहित्य

ओम पुरी (सद्गति)

सत्यजीत रे ने हिंदी में दो फिल्मों का निर्देशन किया है. दोनों ही प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित हैं. सच तो यह है कि बांग्ला में भी सत्यजीत रे की अधिकांश फिल्में साहित्यिक कृतियों पर ही आधारित रही हैं. उनके जन्मशती वर्ष में जहाँ अपू त्रयी (पाथेर पांचाली, अपराजिता, अपूर संसार)’, ‘चारुलता’, ‘शतरंज के खिलाड़ीआदि फिल्मों की चर्चा होती है, वहीं सद्गति फिल्म की चर्चा छूट जाती है. इसकी क्या वजह है?

हर उत्कृष्ट कला की तरह ही सत्यजीत रे की फिल्में समय से साथ नए अर्थ लेकर हमारे सामने उद्धाटित होती है. हाल के वर्षों में हिंदी साहित्य और सिनेमा में जाति का सवाल मुखर रूप से अभिव्यक्त हुआ है, ऐसे में सद्गति की प्रासांगिकता बढ़ जाती है. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता (रे ने चिदानंद दास गुप्ता के साथ मिलकर वर्ष 1947 में कलकत्ता फिल्म सोसाइटी की स्थापना की थी) ने इस फिल्म के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा है कि सद्गति राय की सर्वाधिक आक्रोशपूर्ण फिल्म है जिसमें से हिमशीतल उच्छवास की गुनगुनाहट उभरती रहती है.रे की फिल्मों में उद्धाटित मानवीयता, काव्यात्मक संवेदनशीलता को समीक्षक रेखांकित करते रहे हैं. सद्गतिमें भी यह स्पष्ट है. पर जो चीज इस फिल्म को विशिष्ट बनाती है वह है साहित्य का सिनेमा में सहज रूपांतरण. जिस भाषा में प्रेमचंद ने लिखा था उसे बिंबों के माध्यम से रे ने परदे पर उतारा है, लेकिन दुखी (ओम पुरी) की आँखों में जो आक्रोश दिखता है, लकड़ी चीरते हुए जो उसकी कुल्हाड़ी चलती है वह हमारी चेतना पर ज्यादा चोट करती है.

यह कहानी अछूत दुखी (ओम पुरी) और ब्राह्मण घासीराम (मोहन आगाशे) के इर्द-गिर्द घूमती है. दुखी और घासीराम के माध्यम से भारतीय समाज में जो जाति भेद है, इसके साथ-साथ लिपटी हुई जो अमानवीयता है उसे प्रेमचंद ने निर्दयता से निरूपित किया है. इस कहानी का कालखंड आजादी से पहले का भारत है, जहां जातिवाद सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति का एक अंग था. रे ने जब वर्ष 1981 में इसे निर्देशित किया तब भी जातिवाद का यथार्थ समाज में मौजूद था और आज भी है!

बहरहाल, यदि हम सत्यजीत रे की अन्य चर्चित फिल्म शतरंज के खिलाड़ीके फिल्म रूपांतरण से सद्गतिकी तुलना करें तो पाते हैं कि सद्गतिमें रे ने कहानी में उस तरह से फेर-बदल नहीं किया है जैसा कि शतरंज के खिलाड़ीमें दिखता है. यहाँ पर इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि कुँवर नारायण जैसे लेखक प्रेमचंद की कहानी शतरंज की खिलाड़ीके साथ फेर-बदल और ग्लैमरसे खुश नहीं थे और उन्होंने दबी जुबान में इसकी आलोचना की थी. सत्यजीत रे ने हालांकि अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचालीमें भी विभूति भूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास को परदे के लिए संगठित कर दिया और कुछ ऐसे दृश्य रचे जो उपन्यास में मौजूद नहीं हैं. यहाँ गालिब याद आते हैं: क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब/ आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की.

शतरंज के खिलाड़ी में ब्रिटिश राज और लखनऊ के नवाबी संस्कृति के विघटन का चित्रण है. यहाँ विलासिता और अपसंस्कृति है. सुरेश जिंदल ने इस फिल्म को प्रोडयूस किया था और रे की यह काफी महंगी फीचर फिल्म रही है. उसके उलट सद्गतिभारत की पहली टेलीफिल्म है, जिसे दूरदर्शन ने प्रोडूयस किया था. यह महज 52 मिनट की फिल्म है. चर्चित अभिनेता मोहन आगाशे कयास लगाते हैं कि संभव है कि इस वजह से भी सद्गति की चर्चा उस रूप में नहीं हुई जिसकी अपेक्षा थी. पर आज यह फिल्म यूट्यूब पर सहज उपलब्ध है.

इस फिल्म का जो अंत है वह कहानी से अलग है. साथ ही फिल्म में कहानी से अलग प्रतीकात्मक रूप में रावण की मूर्ति (बिंब) मौजूद है जिसका इस्तेमाल फिल्म में नहीं होता है. इस संबंध में मोहन आगाशे ने मुझे कहा- असल में इस फिल्म का अंत चिलचिलाती धूप में होना था और रावण को जलना था, लेकिन मौसम बदल गया और बारिश आ गई थी. माणिक दा (सत्यजीत रे) ने फिल्म के अंत को प्रकृति के साथ जोड़ दिया. जब आप फिल्म का अंत देखेंगे तो महसूस करेंगे कि बारिश के दौरान  दलदल में दुखी के लाश को घसीटते घासीराम और रोती हुए स्त्री का दृश्य ऐसा है जैसे कि प्रकृति कुपित हो.याद कीजिए कि पाथेर पांचाली में भी रे ने प्रकृति का कलात्मक इस्तेमाल किया है, जो कि दर्शकों पर एक अलग छाप छोड़ता है.  रे फिल्म निर्माण के दौरान हर पक्ष-पटकथा, संवाद, कैमरा आदि को लेकर बहुत ही सजग रहते थे और सब कुछ पहले से निर्धारित रहता था. इस फिल्म का अंत एक तरह से उनकी फिल्म निर्माण की शैली का अपवाद कहा जाएगा.

इस फिल्म के अंत में जो सिनेमाई बिंब रे ने रचा है उसे एक बार फिर से देखते हुए जाति, दलितों के संघर्ष और सामाजिक न्याय के सवाल को मुखर रूप से रचने वाली अनुभव सिन्हा निर्देशित फिल्म आर्टिकल 15की याद आती है. इस फिल्म में भी बारिश के जो दृश्य हैं वे जाति की अमानवीयता को तीखे ढंग से हमारे सामने लाती है और पीड़ा को घनीभूत करती है. इस अर्थ में आर्टिकल 15’ ‘सद्गतिका विस्तार है.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए, 23.09.21)

Sunday, May 17, 2020

सूरज सा चमकता सत्यजीत रे का सिनेमा

बांग्ला सिनेमा के चार प्रमुख स्तंभों सत्यजीत रे (1921-1992), मृणाल सेन, तपन सिन्हा और ऋत्विक घटक की फिल्मों की तुलना होती रही है. पर, निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि सत्यजीत रे पहले ऐसे फिल्म निर्देशक थे जिन्होंने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पटल पर स्थापित किया. वर्ष 1992 में विश्व सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनकी फिल्मों के बारे में अकीरा कुरोसावा ने कहा था- 'सत्यजीत रे की फिल्मों को जिसने नहीं देखा, मानो वह दुनिया में बिना सूरज या चाँद देखे रह रहा है'.
अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली (1955) के साथ उन्होंने विश्व सिनेमा को एक नया मुहावरा और शैली दी. इस फिल्म में यथार्थ में लिपटी एक काव्यात्मक मानवीय दृष्टि और गहन संवेदना को सबने सराहा था. सत्यजीत रे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जिनकी अभिरूचि और गति पेंटिंग, संगीत, साहित्य आदि में थी. पाथेर पांचाली के साथ अपराजितो और अपूर संसार फिल्मों ने इसे बखूबी साबित किया. हालांकि पाथेर पांचाली जैसी सराहना और सफलता इन दो फिल्मों को नहीं मिली, लेकिन फिल्म समारोहों में इसे हाथों-हाथ लिया गया. आजादी के बाद करवट बदलते देश, परंपरा और आधुनिकता के बीच की कश्मकश इन फिल्मों में मिलती है. अपू त्रयी का पार्श्व संगीत महान सितार वादक रविशंकर ने दिया था.
समय के साथ सत्यजीत रे की फिल्मों के आस्वादन में बदलाव आता रहा है. समांतर सिनेमा के दौर में एफटीआईआई से निकले युवा निर्देशकों ने भी उनके फिल्म निर्माण और राजनीति की खूब आलोचना की थी. वे ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों से ज्यादा प्रभावित थे. हालांकि सत्यजीत रे ने भी उन्हें नहीं बख्शा था.
पचास-साठ साल के बाद आज भी ‘जलसाघर’ या ‘चारुलता’ जैसी फिल्में दर्शकों और सिने-समीक्षकों को एक साथ उद्वेलित करती है. उनकी अधिकांश फिल्में चर्चित साहित्यक कृति पर आधारित रही है, लेकिन जब हम इसे परदे पर देखते हैं तब एक नया दृश्य-श्रव्य अनुभव से भर उठते हैं. हिंदी में बनी उनकी दो फिल्मों ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और ‘सद्गति’ का जिक्र प्रासांगिक है. दोनों ही प्रेमचंद की प्रसिद्ध रचना है पर रे के हाथों ये कहानी अलग अर्थ और व्यंजना लेकर परदे पर आई. साहित्य और सिनेमाई रिश्ते को लेकर बहस होती रही है, पर जैसा कि गालिब ने कहा है- क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब/आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की.
पिछले हफ्ते भारत सरकार के ‘फिलम्स डिवीजन’ ने सत्यजीत रे की डॉक्यूमेंट्री फिल्मों और उन पर बनी फिल्मों के ऑनलाइन प्रसारण कर विधिवत सत्यजीत रे जन्मशती वर्ष की शुरुआत की. रे ने फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल को एक इंटरव्यू में कहा था (सत्यजीत रे नाम से इस डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन बेनेगल ने किया था) कि उन्होंने विषयगत दुहराव अपने फिल्मी कैरियर में नहीं किया. ‘घरे बायरे (1983)’ फिल्म के सेट पर काम में निमग्न रे को दिखाती यह डॉक्यूमेट्री उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को दर्शकों के सामने लेकर आती है. साथ ही हम सत्यजीत राय की रचना प्रक्रिया और संघर्ष से भी रू-ब-रू होते हैं.
बच्चों के लिए उन्होंने पचास साल पहले ‘गोपी गाइन बाघा बाइन’ फिल्म निर्देशित किया था जो फैंटेसी और संगीत के लिए आज भी याद की जाती है. यह कहानी बच्चों की पत्रिका संदेश में छपी थी, जिसे उनके दादा ने लिखा था. वे इस पत्रिका के संपादक भी थे. बाद में सत्यजीत रे ने इसे पुर्नप्रकाशित और संपादित किया. वे सिनेमा के गंभीर अध्येता भी थे. सिनेमा पर लिखे उनके लेखों का संग्रह-‘अवर फिल्मस, देयर फिल्मस’ नाम से चर्चित है.

(प्रभात खबर, 17.05.2020)

Saturday, August 07, 2010

नागार्जुन: सच का साहस

दरभंगा जिले में सकरी के ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए जैसे ही हम नागार्जुन के गाँव तरौनी की ओर बढ़ते हैं, मिट्टी और कंक्रीट की पगडंडियों के दोनों ओर आषाढ़ के इस महीने में खेतिहर किसान धान की रोपनी करने में जुटे मिलते हैं. आम के बगीचे में बंबईआम तो नहीं दिखता पर कलकतियाऔर सरहीकी भीनी सुगंध नथुनों में भर जाती है. कीचड़ में गाय-भैंस और सूअर एक साथ लोटते दिख जाते हैं. तालाब के महार पर कनेल और मौलसिरी के फूल खिले हैं...हालांकि यायावर नागार्जुन तरौनी में कभी जतन से टिके नहीं, पर तरौनी उनसे छूटा भी नहीं. तरह-तरह से वे तरौनी को अपनी कविताओं में लाते हैं और याद करते हैं. लोक नागार्जुन के मन के हमेशा करीब रहा. लोक जीवन, लोक संस्कृति उनकी कविता की प्राण वायु है. लोक की छोटी-छोटी घटनाएँ उनके काव्य के लिए बड़ी वस्तु है. नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता, ‘अकाल और उसके बादमें प्रयुक्तत बिंबों, प्रतीकों पर यदि हम गौर करें तो आठ पंक्तियों की इस कविता पर हमें अलग से टिप्पणी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व में कोई फांक नहीं है. उनका कृतित्व उनके जीवन के घोल से बना है. यह घलुए में मिली हुई वस्तु नहीं है. नागार्जुन की रचना जीवन रस से सिक्त है जिसका उत्स है वह जीवन जिसे उन्होंने जिया. सहजता उनके जीवन और साहित्य का स्वाभाविक गुण है. इसमें कहीं कोई दुचित्तापन नहीं. लेकिन यह सहजता सरल सूत्र उलझाऊहै.

नागार्जुन कबीर के समान धर्मा हैं. नामवर सिंह ने उन्हें आधुनिक कबीर कहा है. सच कहने और गहने का साहस उन्हें दूसरों से अलगाता है. युवा कवि देवी प्रसाद मिश्र की एक पंक्ति का सहारा लेकर कहूँ तो उनमें सच को सच की तरह कहने और सच को सच की तरह सुनने का साहस था’. नागार्जुन दूसरों की जितनी निर्मम आलोचना करते हैं, खुद की कम नहीं. जो इतनी निर्ममता से लिख सकता है- कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप (कर्म का फल भोगे बूढ़े पिता)...तब आश्चर्य नहीं कि ...बेटे को तार दिया बोर दिया बाप को...सरीखी पंक्तियाँ उन्होंने कैसे लिखी होगी!

उनकी यथार्थदृष्टि उन्हें आधुनिक मन के करीब लाती है. यही यथार्थ दृष्टि उन्हें कबीर के करीब लाती है. यथार्थ कबीर के शब्दों का इस्तेमाल करें तो और कुछ नहीं-आँखिन देखीहै. नागार्जुन को भी इसी आँखिन देखी पर विश्वास है, भरोसा है. मैथिली में उनकी एक कविता है परम सत्यजिसमें वे पूछते हैं-सत्य क्या है? जवाब है-जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है. जीवन सत्य है. संघर्ष सत्य है. (हम, अहाँ, , , थिकहुँ सब गोट बड़का सत्य/ सत्य जीवन, सत्य थिक संघर्ष.)

नागार्जुन की एक आरंभिक कविता है- बादल को घिरते देखा है.देखा है, यह सुनी सुनाई बात नहीं है. अनुभव है मेरा. इस तरह का अनुभव उसे ही होता है जिसने अपने समय और समाज से साक्षात्कार किया हो. कबीर ने किया था और सैकड़ों वर्ष बाद आज भी वे लोक मन में जीवित हैं. कबीर ने इसे अनभै सांचाकहा. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मुताबिक यह अनुभव से उपजा और अनभय सत्य है.

कवि नागार्जुन में साहस है. सत्य का अनुभव है. सत्य के लिए वे न तो शास्त्र से डरते हैं, न लोक से. जिस प्रकार कबीर की रचना में भक्ति के तानेबाने से लोक का सच मुखरित हुआ है, उसी प्रकार नागार्जुन ने आधुनिक राजनीति के माध्यम से लोक की वेदना, लोक के संघर्ष, लोक-चेतना को स्वर दिया है. बात 1948 के तेलंगाना आंदोलन की हो, 70 के दशक के नक्सलबाड़ी जनान्दोलन की या 77 के बेलछी हत्याकांड की, नागार्जुन हर जगह मौजूद हैं. सच तो यह है कि नागार्जुन इस राजनीति के द्रष्टा ही नहीं बल्कि भोक्ता भी रहे हैं. स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनैतिक उतार-चढ़ाव, उठा-पठक, जोड़-तोड़ और जनचेतना का जीवंत दस्तावेज है उनका साहित्य. नागार्जुन के काव्य को आधार बना कर आजाद भारत में राजनीतिक चेतना का इतिहास लिखा जा सकता है.

असल में साधारणता नागार्जुन के काव्य की बड़ी विशेषता है. सिके हुए दो भुट्टेसामने आते ही उनकी तबीयत खिल उठती है. सात साल की बच्ची की गुलाबी चूड़ियाँउन्हें मोह जाती है. काले काले घन कुरंगउन्हें उल्लसित कर जाता है. उनके अंदर बैठा किसान मेघ के बजते ही नाच उठता है. नागार्जुन ही लिख सकते थे: पंक बना हरिचंदन मेघ बजे.

नागार्जुन जनकवि हैं. वे एक कविता में लिखते हैं: जनता मुझसे पूछ रही है/ क्या बतलाऊँ/ जनकवि हूँ मैं साफ कहूँगा/ क्यों हकलाऊँ. नागार्जुन में जनता का आत्मविश्वास बोलता है. नागार्जुन की प्रतिबद्धता है जन के प्रति और इसलिए विचारधारा उन्हें बांध नहीं सकी. न हीं उन्होनें कभी इसे बोझ बनने दिया. नागार्जुन प्रतिबद्ध लेखक हैं. प्रतिहिंसा उनका स्थायी भाव है. पर प्रतिबद्धता किसके लिए? प्रतिहिंसा किसके प्रति? उन्हीं के शब्दों में: बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त’, उनकी प्रतिबद्धता है. प्रतिहिंसा है उनके प्रति-लहू दूसरों का जो पिए जा रहे हैं.

नागार्जुन जीवन पर्यंत सत्ता और व्यवस्था के आलोचक रहे. जन्मशती वर्ष में यदि सत्ता प्रतिष्ठान उन्हें याद नहीं करें तो बात समझ में आती है, पर जिस जनको उन्होंने अपना पूरा जीवन दिया उसने उन्हें कैसे भूला दिया?

(दुनिया मेरे आगे, जनसत्ता, 7 अगस्त 2010 को प्रकाशित, चित्र : नागार्जुन के गाँव तरौनी में उनकी प्रतिमा)