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Wednesday, October 18, 2023

वहीदा रहमान: सिनेमा के सौंदर्य का सम्मान


वहीदा रहमान को सिनेमा में योगदान के लिए इस वर्ष का प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया गया है. भले वर्ष 1969 में देविका रानी से इस पुरस्कार की शुरुआत हुईलेकिन लगभग पचास सालों के इतिहास में महज छह अभिनेत्रियों को ही इस पुरस्कार से नवाजा गया है.

 वर्ष 1955 में तेलुगू फिल्म रोजुलू माराई’ के एक गाने में वहीदा रहमान पहली बार पर्दे पर दिखी. उस गाने पर फिल्मकार गुरुदत्त की नजर पड़ी और वे उन्हें मायानगरी (मुंबई) खींच लाए. वर्ष 195में ‘सीआईडी’ फिल्म से शुरू हुआ उनका सफर जारी है. उन्होंने अब तक करीब 90 फिल्मों में काम किया है. 

उम्र के 85 वर्ष पूरी कर चुकी वहीदा इस साल प्रयोगधर्मी निर्देशक अनूप सिंह की फिल्म द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियंस में नज़र आई थीं. उनकी कई ऐसी फिल्में हैंजिन पर हिंदी सिनेमा को नाज है. पिछली सदी के पचास-साठ के दशक में आईं प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चाँद’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘गाइड’, ‘तीसरी कसम’, ‘खामोशी फिल्में आज क्लासिक मानी जाती है और रोजी’, ‘हीराबाई’, ‘गुलाबो’, ‘शांति’ राधा’ जैसे किरदार आज भी याद किए जाते हैं.

वैसे तो अपने फिल्मी करियर में उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में देवानंद के साथ कीजिनकी जन्मशती मनाई जा रही है, पर शुरुआती दौर की फिल्मों की सफलता का श्रेय वे गुरुदत्त को देती हैं. अपनी सिनेमाई यात्रा के बारे में वे कहती हैं: “मेरा करियर शुरु से ही बहुत अच्छा रहा. मुझे कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा और सब कुछ अच्छा होता गया. ऊपर वाले की बहुत दया थी.”  

वहीदा रहमान के करियर में विजय आनंद (गोल्डी) निर्देशित ‘गाइड’ (1965) का स्थान सबसे ऊपर है.. राजू (देवानंद) और रोजी (वहीदा रहमान) के बीच प्रेम संबंध को यह फिल्म जिस अंदाज और फलसफे से प्रस्तुत करती हैवह इसे समकालीन बनाता हैयह फिल्म मशहूर लेखक आर के नारायण के इसी नाम से लिखे उपन्यास पर आधारित है.

आज 21वीं सदी के भारत में स्त्रियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में पिछली सदी के पचास-साठ के दशक की अपेक्षा बहुत परिवर्तन हुए हैं. सिनेमा भी इस बदलाव को अंगीकार कर रहा हैलेकिन साठ के दशक में एक विवाहित स्त्री के अन्य पुरुष के साथ संबंध को पर्दे पर दिखाना सिनेमा की परंपरा के विपरीत था. 'गाइड' में एक विवाहित स्त्री एक पुरुष के साथ लिव-इन में रहती है, जो  अपनी पहचान और स्वतंत्रता को लेकर काफी सचेत है. वहीदा स्वीकार करती हैं कि रोजी का किरदार उनके व्यक्तित्व के करीब है. वे कहती हैं कि रोजी को पता है कि वह क्या चाहती है और स्पष्ट बोलती है.

प्रसंगवश, ‘गाइड उपन्यास पर मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे भी फिल्म बनाना चाह रहे थे. जब वहीदा बांग्ला फिल्म ‘अभीजान (1962)’ में उनके साथ काम कर रही थीं तब उन्होंने इस बात की चर्चा की थी. पर बाद में फिल्म बनाने के अधिकार देवानंद ने खरीद लिए थे और यह फिल्म नवकेतन’ के बैनर तले बनी. वे कहती हैं कि ‘ऐसा लगता है कि रोजी मेरे लिए ही लिखी गई थी. सत्यजीत बनाएँ या देवानंद,  करना मुझे ही था. गाइड की तरह ही फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर बनी तीसरी कसम (1966) भी हीरामन (राजकपूर) और हीराबाई (वहीदा) की असफल प्रेम कहानी हैजिसकी चर्चा आज भी होती है.

हिंदी सिनेमा में कहानीगीत-संगीत की केंद्रीय भूमिका रही है. ‘मेलोड्रामा अभिनेता-अभिनेत्री सहारे ही पर्दे पर मूर्त होता है. उनके माध्यम से ही पर सिनेमा देखते-परखते हैं. ऐसे में इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि ‘गाइड’  और तीसरी कसम’ फिल्म का सौंदर्य रोजी’ और ‘हीराबाई’ के इर्द-गिर्द है. फिल्म का गीत-संगीत जिस किरदार से जुड़ा है वह एक नर्तकी है. खुद वहीदा भरतनाट्यम में प्रशिक्षित हैं. जब मैंने उनसे पूछा कि किस तरह उन्होंने एक साथ रोजी और हीराबाई के किरदार के लिए खुद को तैयार कियातो उन्होंने कहा कि एक आर्टिस्ट के रूप में हमें समझना पड़ता है कि हीराबाई गाँव की नौटंकी करती है. उसका डांस करने का अंदाज अलग है. यह क्लासिकल नहीं है. वहीं रोजी प्रोफेशनल स्टेज डांसर है.’ सिनेमा में आने से पहले वे मंच पर अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन करती थीं. वहीदा अपने वालिद के कहे इस बात को याद करती हैं कि हुनर नहीं खराब होता हैआदमी खराब होता है. आप जिस तरह पेश आते हैं उस तरह प्रोफेशन का नाम होता है.

वहीदा ने अपनी प्रतिभा के बूते देश-विदेश में खुद का और हिंदी सिनेमा का नाम रोशन किया.  अभी तक हम अभिनेताओं के नजरिए से ही हिंदी फिल्मों को परखते रहे हैंवहीदा रहमान के किरदारोंभाव-अभिनय की रोशनी में उनकी फिल्मों को देखना-परखना सिनेमा के पारखियों और प्रेमियों के लिए आज भी रोचक है. 

Monday, October 09, 2023

वहीदा रहमान के साथ अरविंद दास की बातचीत

 


सुप्रसिद्ध अभिनेत्री वहीदा रहमान को भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है.  85 वर्ष की वहीदा रहमान वर्ष 1955 में तेलुगू फिल्म रोजुलू माराई’ के एक गाने में पहली बार नजर आई जो बेहद चर्चित हुई. उस गाने पर फिल्मकार गुरुदत्त की नजर पड़ी और वे उन्हें मायानगरी (मुंबई) खींच लाए. वर्ष 1956 में सीआईडी’ फिल्म से शुरू हुआ सफर आज भी जारी है और उन्होंने करीब 90 फिल्मों में काम किया है. अरविंद दास ने पिछले दिनों वहीदा रहमान से बातचीत की. उनसे हुई बातचीत का एक संपादित अंश प्रस्तुत है:

अरविंद दासवहीदा जीबहुत बधाई आपको. क्या दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिलने में देर हुई?

वहीदा रहमानदेखिएजो जिस वक्त होना होता है वही होता है. आगे हो जाता है तो कहते हैं कि बहुत जल्दी मिल गयाअगर बाद में मिले तो कहते हैं देर हो गया. मैं समझती हूँ कि ऐसी कोई बात नहीं.

अरविंद दासपर क्या यह सच नहीं है कि देविका रानी से फाल्के पुरस्कार की शुरुआत हुई और अब तक  गिनी चुनी महिला कलाकारों को ही पचास सालों में यह पुरस्कार मिला हैजबकि सिनेमा में उनका योगदान पुरुषों से कम नहीं है...

वहीदा रहमानऐसी बात नहीं है. देखिए एक तो मैं एक्सपेक्ट नहीं कर रही थी और यह अचानक हुआ. तो मैंने कहा कि ठीक है- दैट्स ऑल. ऐसी कोई बात नहीं कि आगेपीछे...विवाद शुरु करने की क्या जरूरत है.

अरविंद दासइस साल मैंने आपकी फिल्म द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियंस देखीजिसे अनूप सिंह ने निर्देशित किया. फिल्म में इरफानजो अब नहीं रहेऔर इरानी मूल की फ्रेंच अदाकारा गोलशिफतेह फरहानी भी थी. कैसा अनुभव रहा.

वहीदा रहमान:  मेरी अब तक की आखिरी फिल्म है ये. इरफान के साथ कोई दृश्य इसमें नहीं है. छोटा सा गेस्ट रोल थाइस फिल्म में. अनूप सिंह की मैंने ‘किस्सा’ देखी थीजो मुझे बहुत अच्छी लगी थीतो यह फिल्म मैंने कर ली. अच्छा अनुभव रहा और क्या कहूँ.

अरविंद दास:  सीआईडी (1956) से अब तक लगभग पैंसठ-सत्तर साल का सिनेमाई सफर कैसा रहा है? कैसे मुड़ कर आप अपने करियर को देखती हैं.

वहीदा रहमान:   मेरी सिनेमाई यात्रा बहुत ही अच्छी रही. क्या कहूँमेरा करियर शुरु से ही बहुत अच्छा रहा. मुझे कोई संघर्ष नहीं करना पड़ा और सब कुछ होता गया. ऊपर वाले की बहुत दया थीसब कुछ अच्छाअच्छा ही होता गया.

अरविंद दास:   देवानंद की जन्मशती मनाई जा रही हैजिनके साथ आपने सबसे ज्यादा फिल्में की. कैसे को-स्टार थे वे?  आप उन्हें डिसेंट फ्लर्ट कहती थीं.

वहीदा रहमान:   सीआईडी में मैंने पहली बार साथ में काम किया. उन्होंने कहा कि आप मुझे सिर्फ देव कहोगी. मैंने कहा कि ऐसे कैसे मैं कह सकती हूँदेव साहब. मैंने कहा कि आप मेरे से बड़े है. बड़े स्टार हैं आप और यह मेरी पहली पिक्चर है. उन्होंने कहा कि नहींकोई मिस्टर या साहब नहीं. सिर्फ देव कहो. उन्होंने कहा कि यदि यह तकल्लुफ होती हैतो मैं काम नहीं कर सकता..हमें एक-दूसरे का दोस्त होना चाहिए. काम में मदद करनी चाहिए. तो मैंने कहा कि ठीक है. सिर्फ वहीं थे जिन्हें मैं सिर्फ देव कहती थीनहीं तो राज जी (राज कपूर)दिलीप साहब (दिलीप कुमार)सुनील जी (सुनील दत्त) वगैरह वगैरह... तो एक कंफर्ट लेवल था उनके साथ. हम एक-दूसरे को समझते थे कि कोई प्रॉब्लम हो तो कैसे सुलझाए. वे इतने फ्रेंडलीप्यार से मिलते थे कि कभी नहीं लगा कि फ्लर्ट कर रहे हैं. वे फ्लर्ट नहीं थेइसलिए मैं उन्हें डिसेंट फ्लर्ट कहती थी (हंसती हैं).

अरविंद दास:   आपकी फिल्मोग्राफी में एक से बढ़कर एक फिल्म हैपर गाइड का नाम सबसे ऊपर आता है. कैसे आपने इस फिल्म में रोजी के किरदार के लिए खुद को तैयार किया?

वहीदा रहमान:   देव जी ने आर के नारायण की किताब भेजी पढ़ने के लिए. इसके बाद उन्होंने स्क्रिप्ट बनाई पर्ल एस बक के साथ मिल कर तो वो भेजा. फिर डायरेक्टर्स को लेकर काफी अदलाव-बदलाव हुआ. आखिर में विजय आनंद आए जिनके साथ काम करके काफी अच्छा लगा. उनके साथ मैंने काला बाजार की थी.  देव और गोल्डी (विजय आनंद) से सेट पर मिलना जुलना होता थावे दोस्त थे. मुझे काफी खुशी हुई कि गोल्डी इसे निर्देशित कर रहे थे.

अरविंद दास:   एक जगह आपने कहा है कि सत्यजीत रे गाइड को लेकर फिल्म बनाना चाह रहे थेजब आप उनके साथ 'अभिजान (1962)फिल्म कर रही थी?

वहीदा रहमान:   करेक्टकरेक्ट. मैं तो भूल ही गई थी. अच्छा आपने याद दिलाया.

अरविंद दास:   यदि रे ने इसे बनाई होती तो कैसी फिल्म वो होतीकिस तरह पर्दे पर उभर कर आती...?

वहीदा रहमान:   मुझे नहीं पताक्योंकि उनका फिल्म बनाने का तरीकानजरिया हिंदी फिल्मों से बिलकुल अलग था. देखिएमैं मानती हूँ कि जो होना होता है वही होता है. जिसके नसीब में जो लिखा होता है वही होता है. जब मैं अभिजान कर रही थी तब मिस्टर रे ने कहा कि वहीदा जब वापस बंबई जाओगी तो ये किताब (गाइड) लेकर पढ़ना. मैं फिल्म बनाने की सोच रहा हूँ. मैंने कहाग्रेट. फिर कहने लगे कि इसमें डांसिंग रोल है. मैंने कहावंडरफुल. मैं बंबई आईभूल गई. वो भी भूल गए. फिर दो-तीन साल के बादवर्ष 1964 में गाइड बननी शुरु हुई तो मैंने कहा कि लोरोजी मेरे लिए ही लिखी गई थी. सत्यजीत बनाएया देवानंद बनाएं मुझे ही करना था.

अरविंद दास:   उसी दौर में तीसरी कसम’ (1966) फिल्म में भी आप काम कर रही थी. एक तरफ गाइड में शास्त्रीयता लिए हुए पिया तोसे नैना लागे रे पर डांस कर रही थीतो दूसरी तरफ तीसरी कसम में पान खाए सैंया हमारो पर नौटंकी शैली में डांस कर रही थी . कैसे आपने एक साथ शास्त्रीय और लोक को साधा?

वहीदा रहमान:   देखिएएक आर्टिस्ट के रूप में हमें समझना पड़ता है कि हीराबाई गाँव की नौटंकी करती है. उसका डांस करने का अंदाज अलग है. यह क्लासिकल नहीं है. वहीं गाइड में रोजी क्लासिकल डांसर है. वो प्रोफेशनल स्टेज डांसर है. हीराबाई नौटंकी भी स्टेज पर करती हैपर उसका तरीकारवैया अलग है. ये हमें समझना पड़ता है.

अरविंद दास:   गाइड के गीत-संगीत के बारे में आप कुछ हमसे शेयर करना चाहें...

वहीदा रहमान:   देव का सेंस ऑफ म्यूजिक बहुत अच्छा था. उनका और एसडी बर्मन के बीच बहुत अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. कई बार वो दादा को कहते थे कि मजा नहीं आया इस गाने में. तो बर्मन दा कहते थेकि क्या बात करता है. तब देव कहते थे कि नहींदादा नहीं अच्छा लगाआप दूसरा बनाओ... बहुत अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी दोनों में.

अरविंद दास:   उम्र के इस पड़ाव पर क्या आप अपने बचपन को याद करती हैंकोई स्मृति जो आप साझा करना चाहें?

वहीदा रहमान:   बचपन कीओह माय गॉड. (हंसते हुए) अभी कुछ याद नहीं आ रहा...बचपन बहुत अच्छा था. मां-बाप के साथ हम बहुत खुश रहते थे. पिकनिक पर जाते थे. जब मैं भरतनाट्यम डांस करना चाहती थीतो मेरे वालिद साहब के दोस्त-रिश्तेदार मना कर रहे थे. जिस पर उन्होंने कहा कि हुनर नहीं खराब होता हैआदमी खराब होता है. आप जिस तरह पेश आते हैं उस तरह प्रोफेशन का नाम होता है. यह बात मुझे बहुत पसंद आई.

अरविंद दास:   बिछड़े सभी बारी बारी. गुरुदत्त बहुत जल्दी चले गए. कैसे आप उन्हें याद करती हैंगुरुदत्त के साथ बनी आपकी फिल्म प्यासासाहब बीवी और गुलामकागज के फूल आज क्लासिक मानी जाती है.

वहीदा रहमान:   मैं न्यूकमर थी उस वक्त. मुझे कुछ समझ नहीं थी. उन्होंने एक के बाद एक ऐसी पिक्चर क्लासिक बनाई. जिसका मैं हिस्सा बनी. पूरा क्रेडिट गुरुदत्त जी का है. मैं लकी थी.




(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए खास बातचीत, संवाद पथ, अक्टूबर-दिसंबर 2023, पेज 19-21)

Sunday, October 08, 2023

रोजी, हीराबाई और गुलाबो: वहीदा रहमान का भाव-अभिनय

 


पिछले दिनों सुप्रसिद्ध अभिनेत्री वहीदा रहमान को सिनेमा में योगदान के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई. भले वर्ष 1969 में हिंदी सिनेमा की फर्स्ट लेडी’ देविका रानी से इस पुरस्कार की शुरुआत हुई, लेकिन पचास सालों के इतिहास में महज पाँच अभिनेत्री को ही इस पुरस्कार से नवाजा गया है. ऐसा क्यों?

वर्ष 1955 में तेलुगु फिल्म रोजुलू माराई के एक गाने में वहीदा रहमान पहली बार नजर आई जो बेहद चर्चित हुई. उस गाने पर फिल्मकार गुरुदत्त की नजर पड़ी और वे उन्हें मायानगरी (मुंबई) खींच लाए. बाकी इतिहास है. वर्ष 1956 में सीआईडी फिल्म से शुरू हुआ सफर आज भी जारी है और उन्होंने करीब 90 फिल्मों में काम किया है. 

85 वर्ष की वहीदा रहमान इस साल प्रयोगधर्मी निर्देशक अनूप सिंह की फिल्म द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियंस में नज़र आई थी. इस फिल्म में वे बिच्छुओं के डंक को अपने गीत के सहारे दूर करने वाली जुबैदा की भूमिका में हैं. बहरहालजब से फाल्के पुरस्कार की घोषणा हुई  मीडिया में वहीदा रहमान की फिल्मों की चर्चा है. उनकी झोली में कई ऐसी फिल्में हैं, जिन पर हिंदी सिनेमा को नाज है. प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चाँद’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, गाइड’, ‘तीसरी कसमखामोशी आदि ऐसी ही फिल्में हैं.

26 सितंबर को देवानंद के सौ साल पूरे हुए, उसी दिन फाल्के पुरस्कार की घोषणा हुई थी. वहीदा रहमान ने कहा कि मुझे लगता है कि तोहफा उनको मिलना थामुझे मिल गया.’ प्रसंगवशअपने फिल्मी करियर में सबसे ज्यादा किसी एक अभिनेता के साथ उन्होंने फिल्म की है तो वह देवानंद हैं. देवानंद को वहीदा डिसेंट फ्लर्ट’ कहती हैं. देवानंद की जन्मशती के अवसर पर एक बार फिर से दर्शकों के लिए सिनेमाघरों में उनकी देवानंद-वहीदा की फिल्में देखने का मौका आया था.

पिछले दिनों मैं गाइड और तीसरी कसम फिल्म फिर से देख रहा था और सोच रहा था कि इन फिल्मों का सौंदर्य कहां निहित है? जाहिर है, किसी भी कलाकृति के एक बिंदु पर उंगली रख कर हम सौंदर्य की शिनाख्त नहीं कर सकते. कला का सौंदर्य संपूर्ण कृति में निहित होता है.

हिंदी सिनेमा में कहानी, गीत-संगीत की केंद्रीय भूमिका रहती आई है. यह मेलोड्रामा अभिनेता-अभिनेत्री सहारे ही पर्दे पर मूर्त होता है. उनके माध्यम से ही पर सिनेमा देखते-परखते हैं. ऐसे में इस बात से शायद ही कोई इंकार करे कि गाइड’  और तीसरी कसम फिल्म का सौंदर्य रोजी और हीराबाई के इर्द-गिर्द है. फिल्म का गीत-संगीत जिस किरदार से जुड़ा है वह एक नर्तकी है. खुद वहीदा भरतनाट्यम में प्रशिक्षित हैं. सिनेमा में आने से पहले वे मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन करती थीं.

आज 21वीं सदी के भारत में स्त्रियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में पिछली सदी के पचास-साठ के दशक की अपेक्षा बहुत परिवर्तन हुए हैं. सिनेमा भी इस बदलाव को अंगीकार कर रहा है, लेकिन साठ के दशक में एक विवाहित स्त्री के अन्य पुरुष के साथ संबंध को पर्दे पर दिखाना परंपरा के विपरीत था. 'गाइड' फिल्म में एक विवाहिता स्त्री एक पुरुष के साथ लिव-इन रहती है. वह अपनी पहचान और स्वतंत्रता को लेकर काफी सचेत है.

फिल्मकार नसरीन मुन्नी कबीर ने बातचीत में जब रहमान से पूछा था कि हर किरदार में आपके व्यक्तित्व की झलक है पर कौन सा किरदार वहीदा के यथार्थ रूप के करीब है’? उन्होंने जवाब दिया कि शांति, गुलाबो और रोजी में मेरा थोड़ा अंश है, लेकिन मैं ज्यादातर रोजी की तरह हूँ. रोजी को पता है कि वह क्या चाहती है, साफ, स्पष्ट बोलती है. अपने विश्वास पर वह अडिग है.’ बहरहालरोजी के साथ-साथ हीराबाई (तीसरी कसम) की चर्चा भी लाजिमी है. तीसरी कसम फिल्म भी उस दौर में बन रही थी और वर्ष 1966 में रिलीज हुई. रोजी की तरह हीराबाई भी एक नर्तकी है. दोनों ही फिल्मों में गीत शैलेंद्र ने लिखे हैं, जो किरदारों के मनोभावों को बखूबी बयां करते हैं.

दोनों ही फिल्म असफल प्रेम कहानी है, हालांकि प्रेम के स्वरूप में काफी अंतर है.  राजू गाइड की भूमिका में देवानंद और हीरामान गाड़ीवान की भूमिका में राज कपूर निस्संदेह बेहद प्रभावी है, लेकिन वहीदा ने अपनी अदाकारी से रजत परदे पर रोजी और हीराबाई के किरदारों को अमर कर दिया.

एक तरफ आज फिर जीने की तमन्ना है गाने वाली रोजी है तो दूसरी तरफ मारे गए गुलफाम गाने वाली हीराबाई. पर सवाल है कि गुलफाम क्यों मारा गयाहीराबाई हीरामन से प्रेम करती हैपर निर्वाह करने को स्वतंत्र नहीं है. प्रेम की विवशताविछोह को वहीदा ने बेहद खूबसूरत ढंग से अभिव्यक्त किया है. यहाँ प्रेम का कोई भविष्य नहीं हैफिर भी प्रेम है. चूंकि विछोह को स्वीकार कर लियाइसलिए गुलफाम मारा गया.  

आखिर में, गुलाबो (प्यासा) के किरदार में जब वहीदा रहमान आती हैं तो वह ट्रेजडी के सभी गुणों को लिए हुए भी दुखांत नहीं है. यहाँ विजय (गुरुदत्त) का सहारा गुलाबो ही हैवहीदा रहमान के किरदारों, भाव-अभिनय की रोशनी में इन फिल्मों को फिर से देखना-परखना रोचक है. अभी तक हम अभिनेताओं के नजरिए से ही हिंदी फिल्मों को परखते रहे हैं!