Tuesday, October 04, 2022

'महानगर के जुगनू': माया नगरी के युवा कलाकारों की दास्तान


कोरोना महामारी ने प्रदर्शनकारी कला को किस रूप में प्रभावित किया, इसका लेखा-जोखा आने वाले समय में होगा, लेकिन उस दौर को पीछे छोड़ते हुए एक बार फिर से दर्शकों से जुड़ने, मुखामुखम संवाद को लेकर नाट्यकर्मियों में जबरदस्त उत्साह है.

दो साल बाद दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में नाट्य समारोह (23 सितंबर-2 अक्टूबर) का आयोजन किया गया. रंगमंच की दुनिया के कई जाने-पहचाने नाम इस समारोह का हिस्सा थे. खास तौर पर युवा रंगकर्मी और लेखक अमितोश नागपाल के निर्देशन में महानगर के जुगनूनाटक का मंचन इस समारोह की एक उपलब्धि कही जाएगी. हालांकि, चर्चित नाट्य निर्देशक अतुल कुमार के निर्देशन में आईननाटक का भी मंचन हुआ. इस नाटक से भी एक लेखक के तौर पर अमितोश जुड़े हुए थे. प्रसंगवश, दोनों की जोड़ी पिया बहरूपियानाटक (शेक्सपीयर के टवेल्थ नाइटका अनुवाद) से सुर्खियां बटोर चुकी हैं और देश-विदेश में इसके कई शो हो चुके हैं. नौटंकी शैली में गीत-संगीत का इस्तेमाल इस नाटक को लोक मन से जोड़ता है.

बहरहाल, ‘महानगर के जुगनूनाटक में एक लेखक, निर्देशक और अभिनेता के तौर पर अमितोश नागपाल की केंद्रीय भूमिका थी. दिल्ली के रंगमंच पर आम तौर पर क्लासिक या मोहन राकेश, गिरीश कर्नाड, स्वदेश दीपक के लिखे आधुनिक नाटक का ही मंचन दिखता रहा है. हिंदी में नए नाट्य लेखन का सर्वथा अभाव रहा है. महानगर के जुगनूएक ऐसा गीति नाटक है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए.

इस नाटक की कहानी मुंबई में स्थित है. पर ये जुगनू कौन हैं? मुंबई में अपने सपनों को सच करने गए युवा कलाकार, लेखक, संगीतकार ही वे जुगनू है जो माया नगरी में टिमटिमाते रहते हैं. इन्हें चांद की तलाश है. पर चांद-सितारे बनने की हसरत कितनों की पूरी होती है?

एनएसडी से प्रशिक्षित अमितोश खुद मुंबई की फिल्मी दुनिया से जुड़े हैं, सो उस दुनिया के रस्मो-रिवाज, दांव-पेच, संघर्ष, आशा-निराशा से बखूबी परिचित है. क्या यह नाटक आत्मकथात्मक है? हां, पर यह महज एक कलाकार की कथा नहीं है. नाटक मुंबई के आराम नगरमें रहने वाले कुछ कलाकारों के इर्द-गिर्द है. उनकी जिंदगी कैसी है? क्या सपने हैं? और संघर्ष कैसा है. सामाजिक-आर्थिक यथार्थ नाटक की संरचना का हिस्सा हैं.

इस नाटक में एक संवाद, ‘अपने मन की कब करोगे यार’, गीत की शक्ल में आता है. आज के युवाओं के मन की यह बात है. यह सवाल महज रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े युवाओं से ही नहीं है, बल्कि बाजार के अंधी दौड़ में शामिल हर युवा इससे जूझ रहा है. इस नाटक में बड़े सपनों के बीच, ‘रेंट कौन भरेगा, तेरा बापजैसा व्यंग्यात्मक, मारक टिप्पणी भी है.

नाटक के एक दृश्य में जब लेखक अपनी स्टोरी प्रोड्यूसर को पिच करता है तब उससे लोकल को ग्लोबल से जोड़ने की सलाह दी जाती है’, जिस पर लेखक टिप्पणी करता है कि वह तो मंडी हाउससे बाहर ही कभी नहीं गया!

लेखक, जुगनू (अमितोश), अपनी रचना को बड़े परदे पर देखना चाहता है. वह अपने नाटक के लिए किरदारों को रचता है. उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आते हैं. वह जीवन (गिरिजा गोडबोले) और सपना (सखी गोखले) के बीच झूलता है. उसे अपने आदर्श और यथार्थ के बीच चुनाव करना है. यह किसी भी कलाकार के लिए सच है, पर चुनना आसान कभी नहीं रहा. क्या यही हमने गुरुदत्त के प्यासामें नहीं देखा था? क्या साहिर ने नहीं लिखा-ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है? इस आत्मसंघर्ष में जुगनू की जिंदगी गुजर रही है. वह टूटता, गिरता है पर हौसले नहीं हारता.

इस नाटक में जो विषय उठाए गए हैं वह भले ही पुराने हैं, पर जिस तरह के रंग कौशल से इसे प्रस्तुत किया गया है वह मनोरंजक है. गीत-संगीत की प्रस्तुति संवाद को आगे बढ़ाने में सहायक है. असल में, इस नाटक में जो ऊर्जा है वह अलग से नोट की जाने वाली है.

हास्य-व्यंग्य, मिमिक की शैली में लिखा यह नाटक युवा दर्शकों को लक्षित है. अमितोश की तरह महादेव लखावत एनएसडी से प्रशिक्षित कलाकार हैं. इस नाटक में भले ही वे केंद्र में नहीं है, पर उनका किरदार छाप छोड़ता है. खास कर जब वे एक कॉल सेंटर में काम करने के दौरान अपने स्वके क्षरण और अस्तित्व की लड़ाई लड़ते दिखते हैं.

गीत-संगीत में लोक शैली, हिप हॉप से लेकर पापुलर बॉलीवुड फिल्मों का असर हैं, वहीं शिव कुमार बटालवी के गीत- माए नी माए मैं इक शिकरा यार बणाया और बाउल गीत का इस्तेमाल नाटक की मार्मिकता को बढ़ाता है. एनएसडी से प्रशिक्षित कलाकारों के साथ सखी, गिरिजा गोडबोले जैसे कलाकार टीवी-फिल्मी दुनिया से खुद जुड़े हैं. कुल मिलाकर समकालीन माया नगरी में बाहर से आए युवाओं के सपने और संघर्ष के दृश्य को रचने में यह नाटक सफल है.

अंत में, फिल्म जगत में जो भाई-भतीजावाद (नेपोटिज्म) पर इन दिनों बहस चल रही है, उसे भी यह नाटक अपनी जद में लेता है. इससे पहले इतने स्पष्ट शब्दों में क्या किसी नाटक में हमने नेपोटिज्म पर बात देखी-सुनी थी?

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, October 02, 2022

किताबों के हवाले से गाँधी


जहाँ महात्मा गाँधी के विचार सौ से ज्यादा खंडो में ‘संपूर्ण गाँधी वांग्मय’ में संग्रहित है, वहीं उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पहलुओं पर पिछले सौ वर्षों में हजारों किताबें, लेख, शोध पत्र आदि छप चुके हैं. आश्चर्य नहीं कि 21वीं सदी में उनके विचारों की पड़ताल और आलोचना जारी है. इस लेख में हम कुछ किताबों की चर्चा कर रहे हैं, जो पिछले दशकों में प्रकाशित हुए है. ये किताबें महात्मा गाँधी की जीवन यात्रा, उनके विविध रूप और विचारों को विभिन्न दृष्टिकोण से पाठकों के सामने लाने में सफल हैं.

यह उचित है कि महात्मा गाँधी के ऊपर लिखी किताबों की शुरुआत उनकी आत्मकथा, सत्य के प्रयोग, से होनी चाहिए. यह आत्मकथा पहले ‘नवजीवन’ में और फिर ‘यंग इंडिया’ पत्रिका में वर्ष 1925 से 1929 के बीच प्रकाशित हुई. मूल रूप में गाँधी ने इसे गुजराती में लिखा जो आज विभिन्न भाषाओं में सहजता से उपलब्ध है और ‘क्लासिक’ का दर्जा पा चुका है. लेखक-अनुवादक त्रिदीप सुहृद ने विस्तृत भूमिका के साथ इस आत्मकथा के ‘आलोचनात्मक संस्करण’ (2018) को प्रस्तुत किया है, जिसे देखा जाना चाहिए.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने पिछले दशक में महात्मा गाँधी की दो खंडों में जीवनी लिखी है, जो ‘गाँधी बिफोर इंडिया’ और ‘गाँधी: द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड (1914-1948)’ के नाम से प्रकाशित हुई है. पहले खंड में गाँधी के ‘महात्मा’ बनने की यात्रा को विस्तार से विभिन्न कालखंडो के माध्यम से परोसा गया है. दूसरा खंड दक्षिण अफ्रीका से भारत वापसी, स्वतंत्रता संग्राम में केंद्रीय भूमिका से लेकर समकालीन नेताओं, सहयोगियों के साथ वाद-विवाद-संवाद को समेटे है. यहाँ गाँधी के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं से हमारा साक्षात्कार होता है. सहज शैली और अद्यतन शोध सामग्री के इस्तेमाल से जीवनी मुकम्मल बन पड़ी है. मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी जीवनी हिंदी अनुवाद में भी उपलब्ध है.

गाँधी एक कुशल वक्ता और संचारक थे, लेकिन उनके पत्रकार रूप की चर्चा छूट जाती है. दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास (1893-1914) के दौरान उन्होंने बहुभाषी पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ (1903) के साथ जुड़ कर अपने विचारों की धार को तेज किया, जो बाद के सत्याग्रह और पत्रकारीय कर्म में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ था. दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह की लड़ाई, भारतीयों के अस्मिता संघर्ष में इस पत्र की केंद्रीय भूमिका थी. उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि ‘इंडियन ओपिनियन’ के बिना सत्याग्रह असंभव होता.

इतिहासकार इसाबेल हॉफ्मायर की किताब ‘गाँधीज प्रिंटिंग प्रेस: एक्सपेरिमेंट इन स्लो रीडिंग’ (2013) में इस बात की विस्तार से चर्चा है कि ‘इंडियन ओपिनियन’ के प्रकाशन के दौरान किस तरह गाँधी ने खबरों के उत्पादन, प्रसारण और पढ़ने के तरीकों के लिए धीमी गति की पत्रकारिता पर जोर दिया. वे अपने लेखों में पाठकों को समाचार पत्र पढ़ने की गति धीमी रखने और पाठ को बार-बार पढ़ने को कहते थे. पाठकों के मनन और चिंतन उनकी चिंता के केंद्र में था. यह सब गाँधीजी के सत्याग्रही तेवर को दिखाता है. वे हर पाठक में एक सत्याग्रही की संभावना देखते थे. उल्लेखनीय है कि गाँधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ के गुजराती के पाठकों के लिए ही पैफलेंट के रूप में ‘हिंद स्वराज’ की रचना की थी, जहाँ पाठक और संपादक के बीच संवाद प्रमुख है.

हिंदी में मौलिक रूप से गाँधी को लेकर गंभीर विचार-विमर्श कम ही नजर आता है, पर ऐसा भी नहीं कि साहित्य लिखा ही नहीं गया. इस क्रम में इतिहासकार सुधीर चंद्र की किताब ‘गाँधी एक असंभव संभावना (2011)’ पढ़ी जानी चाहिए. इस किताब में सुधीर चंद्र गाँधी के सचिव प्यारेलाल के हवाले से इस सवाल को उठाते हैं कि ‘कहाँ हो सकते हैं गाँधी आज के जमाने में?’ यह किताब गाँधी के अंतिम दिनों के बारे में है, साथ ही हमारे दौर के बारे में भी है. गाँधी ने एक बार कहा था कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है. लेखक-कलाकार जेसन क्वीन ने ‘गाँधी-मेरा जीवन ही मेरा संदेश’ (2014) नाम से रोचक चित्र कथा लिखी है. गाँधी के जीवन और कर्म को अशोक चक्रधर ने खूबसूरत ढंग हिंदी में रूपांतरित किया है.

आखिर में, अकादमिक दुनिया में गाँधी के विचारों को प्रसिद्ध इतिहासकार, समाजशास्त्री, पर्यावरणविद्, स्त्री विमर्शकार और दलित चिंतकों ने देखा-परखा है. इस लिहाज से ए रघुरामाराजू संपादित ‘डिबेटिंग गाँधी: ए रीडर' (2006), एक महत्वपूर्ण संकलन है.

Sunday, September 25, 2022

नब्बे साल के शेखर जोशी


नई कहानी आंदोलन के प्रमुख रचनाकार शेखर जोशी ने पिछले दिनों जीवन के नब्बे वर्ष पूरे किए. पिछली सदी के पचास-साठ के दशक में अमरकांत-मार्कण्डेय-शेखर जोशी (इलाहाबाद की त्रयी) उसी तरह चर्चा में रही, जिस तरह राजेंद्र यादव-कमलेश्वर-मोहन राकेश की तिकड़ी. नई कहानी के अधिकांश रचनाकार अब हमारी स्मृतियों में हैं. शेखर जोशी उम्र के इस पड़ाव पर भी रचनाकर्म में लिप्त हैं.

कुछ महीने पहले उनका कविता संग्रह ‘पार्वती’ प्रकाशित हुआ था. पचास के दशक के मध्य के इलाहाबाद प्रवास को याद करते हुए उन्होंने लिखा है, ‘यह समय इलाहाबाद का साहित्यिक दृष्टि से स्वर्णिम कालखंड था.’ इस कविता संग्रह के अलावे ‘न रोको उन्हें, शुभा’ भी प्रकाशित है. ‘पार्वती’ संग्रह में धानरोपाई, विश्वकर्मा पूजा से लेकर निराला, नागार्जुन जैसे कवियों की यादें हैं. साथ ही संग्रह में कवि के बचपन की स्मृतियाँ भी हैं.
पिछले साल उन्होंने अपने बचपन, आस-पड़ोस के समाज को ‘मेरा ओलियागांव’ किताब में दर्ज किया. इस किताब में कुमाऊँ पहाड़ियों के गाँव में बीता लेखक का बचपन है, विछोह है. बचपन से लिपटा हुआ औपनिवेशिक भारत का समाज चला आता है. स्मृतियों में अकेला खड़ा सुंदर देवदारु, कांफल का पेड़ है, बुरुंश के फूल हैं. पूजा-पाठ और तीज-त्यौहार हैं. लोक मन में व्याप्त अंधविश्वास और सामाजिक विभेद भी.
शेखर जोशी की कहानी ‘कोसी का घटवार’ 'परिंदे' (निर्मल वर्मा) और 'रसप्रिया' (फणीश्वर नाथ रेणु) के साथ हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानियों में गिनी जाती हैं. लछमा और गुंसाई हिंदी साहित्य के अविस्मरणीय चरित्र हैं.
‘मेरा ओलियागांव’ में वे अपनी पहली कहानी ‘राजे खत्म हो गए’ और ‘कोसी के घटवार’ के उत्स की चर्चा करते हैं. वे लिखते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के समय उन्होंने फौजी वर्दियों में रणबांकुरों को जाते देखा था और उन्हें विदा करने आए लोगों का रुदन सुना था. ‘राजे खत्म हो गए’ एक फौजी की बूढ़ी मां पर लिखी कहानी है. साथ ही वे लिखते हैं कि ‘कोसी का घटवार’ के नायक ‘गुंसाई’ का चरित्र इन्हीं फौजियों से प्रेरित रहा हो.
पचास-साठ साल पहले लिखी ‘दाज्यू’, ‘बदबू’, ‘नौरंगी बीमार है’ आदि कहानियां आज भी अपनी संवेदना, जन-जीवन से जुड़ाव, प्रगतिशील मूल्यों और भाषा-शिल्प की वजह से चर्चा में रहती हैं और मर्म को छूती है. उनकी कहानियों में कारखाना मजदूरों, निम्न वर्ग के जीवन और संघर्ष का जो चित्रण है वह हिंदी साहित्य में दुर्लभ है. शेखर जोशी ने कारखानों के मजदूरों के जीवन को बहुत नजदीक से देखा, जो उनकी रचनात्मकता का सहारा पा कर जीवंत हो उठा.
‘बदबू’ कहानी में एक प्रसंग है, जिसमें वे लिखते हैं: 'साथी कामगरों के चेहरों पर असहनीय कष्टों और दैन्य की एक गहरी छाप थी, जो आपस की बातचीत या हँसी-मजाक के क्षणों में भी स्पष्ट झलक पड़ती थी.’ इस कहानी में कारखाने के मजदूर अपने हाथों में लगे कालिख को मिट्टी के तेल और साबुन से छुड़ाते हैं, पर गंध नहीं जाती. धीरे-धीरे उन्हें इसकी आदत पड़ जाती है. पर इस कहानी का अंत बहुत सारे सवाल और संभावनाएँ पाठकों के मन में छोड़ जाता है. उनकी कई कहानियों का मंचन भी हुआ, साथ ही ‘कोसी का घटवार’ और ‘दाज्यू’ पर फिल्में भी बनी है.

Friday, September 23, 2022

समांतर सिनेमा के दौर में व्यावसायिक रूप से सफल फिल्में

पंद्रह साल पहले मैं हिंदी में समांतर सिनेमा के प्रेणता, फिल्म निर्देशक, मणि कौल से उनकी फिल्मों के बारे में बात कर रहा था.  उन्होंने बातचीत के बीच बेतकल्लुफी से मुझसे कहा था- मुझसे ज्यादा एक्सट्रीम में बहुत कम लोग गए. जितनी फिल्में बनाई, सारी फ्लॉप!यह बात मेरे मन में अटक गई. मणि कौल की फिल्मों की चर्चा देश-विदेश के सिनेमा प्रेमियों के बीच आज भी होती है, पर पिछली सदी के 70-80 के दशक में जब वे फिल्में बना रहे थे, तब उनकी फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हुई. 

21वीं सदी में अनुराग कश्यप, हंसल मेहता, दिवाकर बनर्जी जैसे निर्देशकों के यहाँ व्यावसायिक और कला फिल्मों के बीच की रेखा धुंधली हुई है. आज विभिन्न भारतीय भाषाओं के कई फिल्म निर्देशकों की फिल्मों पर मणि कौल का असर है. ओटीटी प्लेटफॉर्म और इंटरनेट पर उनकी फिल्में (आषाढ़ का एक दिन, दुविधा आदि) खूब देखी जा रही हैं. उस दौर में ये फिल्में फिल्म समारोहों में तो दिखाई गई, लेकिन आम दर्शक इसे नसीब नहीं हुए.

वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म उसकी रोटी’, बासु चटर्जी की सारा आकाशऔर मृणाल सेन की भुवन सोमने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को अनपापुलर फिल्मकहते थे. इस धारा की फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को कई बेहतरीन अभिनेता दिए.

मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा से ही बड़ी पूंजी की मांग करता है और वितरक प्रयोगशील सिनेमा पर हाथ डालने से कतराते रहते हैं. वर्ष 1969 में ही फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन’ (फिल्म वित्त निगम) ने प्रतिभावान और संभावनाशील फिल्मकारों की ऑफ बीटफिल्मों को कर्ज देकर सहायता पहुँचाने का निर्देश जारी किया था. इसका लाभ मणि कौल, मृणाल सेन, बासु चटर्जी जैसे निर्देशक उठाने में सफल रहे. इसी दौर में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं मसलन, मलयालम, बांगला, कन्नड़ आदि में भी कई बेहतरीन फिल्मकार उभरे जिनकी फिल्में दर्शकों के सामने एक अलग भाषा और सौंदर्यबोध लेकर आई.

समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए 70 और 80 का दशक मुफीद रहा. पर ऐसा भी नहीं कि इस दौर की सारी फिल्में दर्शकों से दूररही. इस दौर में कई ऐसी फिल्में बनी जो कलात्मक और व्यावसायिक दोनों ही कसौटियों पर सफल कही गई.

 हिंदी के रचनाकार राजेंद्र यादव के उपन्यास सारा आकाशपर जब बासु चटर्जी ने पहली फिल्म बनाई, तो वह उनकी पहली व्यावसायिक रूप से सफल फिल्म भी साबित हुई. मध्यवर्गीय परिवार की इस यथार्थवादी कहानी को समीक्षकों के साथ-साथ दर्शकों ने भी खूब ने पसंद किया. इसी तरह उत्पल दत्त अभिनीत भुवन सोमभी सफल रही. इन फिल्मों की कलात्मक और व्यावसायिक सफलता ने हिंदी सिनेमा के निर्देशकों को प्रयोग करने, नए विषयों को टटोलने के लिए प्रोत्साहित किया.

 एफटीआईआई, पुणे से प्रशिक्षित होकर निकले हिंदी के फिल्मकार कुमार शहानी, केतन मेहता, अडूर गोपालकृष्णन (मलयालम), गिरीश कसरावल्ली (कन्नड़), जानू बरुआ (असमिया) और के के महाजन जैसे कैमरामैन ने भारतीय सिनेमा की इस धारा को समृद्ध किया. लेकिन कई ऐसे नाम  भी थे जो एफटीआईआई से बाहर थे, जैसे कि श्याम बेनेगल. उनकी फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल होने के साथ ही विभिन्न फिल्म समारोहों में पुरस्कृत भी हुई. श्याम बेनेगल ने फिल्म बनाने के लिए फिल्म वित्त निगम से ऋण नहीं लिया था. उनकी पहली फिल्म 'अंकुर (1974)' और दूसरी फिल्म 'निशांत (1975)' को ब्लेज एडवरटाइजिंगने वित्तीय सहायता दी थी, जबकि तीसरी फिल्म 'मंथन (1976)' गुजरात के दुग्ध सहकारी संस्था के सदस्यों की सहायता से बनी. यह तीनों ही फिल्में व्यावसायिक रूप ले सफल रही. व्यावसायिक रूप से बेनेगल की फिल्मों की तुलना मलयालम फिल्म के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन से की जा सकती है, जिनकी अधिकांश फिल्में बाक्स ऑफिसपर भी सफल रही. उनकी पहली फिल्म स्वयंवरम’ (1972) को चार राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुए. इसी तरह एलिप्पथाएम’, ‘अनंतरम’, ‘मुखामुखम’, ‘कथापुरुषनआदि  भी कलात्मक रूप से उत्कृष्ट और विचारोत्तेजक हैं, जिसे देश-विदेश में कई पुरस्कार मिले.

हिंदी सिनेमा की बात करें तो  देश विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी एम एस सथ्यू की 'गर्म हवा (1973)', गोविंद निहलानी की 'आक्रोश (1980)', 'अर्धसत्य (1983)' और केतन मेहता की 'मिर्च मसाला (1988)' भी व्यावसायिक रूप से सफल कही जाएँगी. इन यथार्थपरक फिल्मों में सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया गया.

आखिर में, कन्नड़ भाषा में समांतर सिनेमा का सूत्रपात करने वाली फिल्म 'संस्कार (निर्देशक, पट्टाभिराम रेड्डी, 1970)' के बारे में इस फिल्म के मुख्य अभिनेता गिरीश कर्नाड क्या कहते हैं, उस पर एक नजर डालते हैं. अपनी किताब दिस लाइफ एट प्लेमें उन्होंने लिखा है: 'पूरी फिल्म 95 हजार रुपए में बन गई थी. न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने अच्छा प्रदर्शन किया, बल्कि उस साल का बेस्ट फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार- स्वर्ण कमल, से भी नवाजा गया.

असल में, समांतर सिनेमा के दौर में महज कुछ हजार रुपए में फिल्में बन रही थी. इसमें 'स्टार' नहीं होते थे. कम बजट की इन फिल्मों का लागत कम होने की वजह से उसकी भरपाई हो जाती थी. साथ ही कई फिल्मों से मुनाफा भी हो जाता था.

समांतर सिनेमा को हम कलात्मक मूल्यों की वजह से ही देखते-परखते हैं. इन फिल्मों की व्यावसायिक सफलता हम आज की या उस दौर में बनी मुख्यधारा की फिल्मों से नहीं कर सकते.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Wednesday, September 14, 2022

प्रेमचंद के उपन्यास 'प्रेमाश्रम' के सौ साल

पिछले दिनों किसान आंदोलन के प्रसंग में प्रेमचंद के उपन्यासों को याद किया गया. खास कर प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि को केंद्र में रख कर किसानों के संघर्ष की चर्चा हुई.

प्रेमाश्रम प्रेमचंद का पहला उपन्यास है जिसमें वे किसानों की समस्या, शोषण और संघर्ष को हिंदी पाठकों के सामने लेकर आते हैं. इस लिहाज से प्रेमचंद के सभी उपन्यासों में इसकी अहमियत बढ़ जाती है. वर्ष 1922 में छपा यह उपन्यास सौ साल पूरे कर रहा है.

प्रेमाश्रम के ऊपर शोध करने वाले हिंदी के आलोचक प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने लिखा है: “ 1917 से 1920 के बीच लिखे गए किसान साहित्य में प्रेमाश्रम’ अकेली कृति थी जिसमें किसानों के वर्ग संघर्ष को चित्रित किया गया था. जमींदारी प्रथा के खिलाफ किसानों के संघर्ष को चित्रित करने वाले प्रेमचंद हिंदी के पहले लेखक और 1917-20 के जमाने के एकमात्र लेखक थे.” कोई भी रचनाकार अपने समय की हलचलों से अछूता नहीं रहता. साथ ही वह अपने समय और समाज के प्रति उत्तरदायित्व होता है. 

प्रेमचंद के इस उपन्यास में समकालीन औपनिवेशिक-सामंती समाज, अवध के क्षेत्र में बाद में फैले किसान आंदोलन और असहयोग आंदोलन की अनुगूंज है. हालांकि इस उपन्यास में यथार्थवाद पर उनका आदर्शवाद हावी है, पर जमींदारी के खत्म होने को लेकर उनके मन में कोई संशय नहीं है.

इस उपन्यास की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है:

संध्या हो गयी है. दिन-भर के थके-माँदे बैल खेतों से आ गये हैं. घरों से धुएँ के काले बादल उठने लगे. लखनपुर में आज परगने के हाकिम की पड़ताल थी. गाँव के नेतागण दिन-भर उनके घोड़े के पीछे-पीछे दौड़ते रहे थे. इस समय वह अलाव के पास बैठे हुए नारियल पी रहे हैं और हाकिमों के चरित्र पर अपना-अपना मत प्रकट कर रहे हैं. लखनपुर बनारस नगर से बारह मील पर उत्तर की ओर एक बड़ा गाँव है. यहाँ अधिकांश कुर्मी और ठाकुरों की बस्ती है, दो-चार घर अन्य जातियों के भी हैं.

इस उपन्यास में पात्रों की भरमार है. मनोहर, बलराज जैसे किसानों के साथ प्रेमशंकर, ज्ञानशंकर जैसे जमींदार मौजूद हैं. इसके अलावे गायत्री, गौंस खां, कादिर जैसे पात्र भी हैं. लखनपुर गाँव के किसान प्रेमाश्रम के नायक हैं और खलनायक जमींदार वर्ग है. इस गाँव के किसान बेगार, लगान,बेदखली के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं.

औपनिवेशिक भारत में जमींदार और किसान के बीच एक तीसरे वर्ग महाजन वर्ग का तेजी से विकास हुआ. किसान इस कुचक्र में पिस रहा था. इसका निरूपण प्रेमचंद ने अपने बाद के उपन्यास गोदान में कुशलता से किया है.

प्रेमचंद स्वाधीनता आंदोलन के दौरान किसानों के सवाल, उनके संगठन की ताकत को अपने उपन्यास के केंद्र में रख रहे थे, जो आजादी के बाद भी हिंदी के रचनाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा. हिंदी के कई रचनाकार प्रेमचंद की परंपरा से जुड़े रहे.

प्रसंगवश, कवि नागार्जुन को प्रेमचंद की परंपरा का उपन्यासकार कहा जाता है. गोदान के प्रकाशन के बाद हिंदी उपन्यास की धारा ग्राम-जीवन से विमुख होकर शहर और अंतर्मन के गुह्य गह्वर में चक्कर काटने लगी थी. नागार्जुन अपने पहले उपन्यास रतिनाथ की चाची (1948) के द्वारा भारतीय ग्रामीण-जीवन के सच को फिर से पकड़ते हैं. नागार्जुन के उपन्यास 'बलचनमा', 'बाबा बटेसरनाथ' और फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आँचल' जैसे उपन्यास के प्रकाशन से प्रेमचंद की परंपरा पुष्ट हुई. यह परंपरा समाज और राजनीति को किसानों की दृष्टि से देखने की है.

जाहिर है प्रेमचंद और उनके बाद के रचनाकारों की चेतना में फर्क नजर आता है, जो समय और स्थान के अंतर के कारण स्पष्ट है. पर उनकी चिंता किसानों की स्वाधीनता की ही है. स्वाधीनता के लिए संघर्ष की चेतना नागार्जुन, रेणु जैसे रचनाकारों के यहाँ सबसे तीव्र है. हालांकि यहाँ प्रेमचंद की तुलना में अधिक स्थानीयता है. जहाँ प्रेमचंद उत्तर-प्रदेश के अवध-बनारस क्षेत्र के किसानों की कथा के माध्यम से किसानों के संघर्ष की चेतना को अभिव्यक्त किया है वहीं नागार्जुन और रेणु के यहाँ मिथिलांचल के किसानों, खेतिहर मजदूरों की कथा है. यहाँ लोक जीवन और लोक चेतना ज्यादा मुखर है.

आज भी देश की जनसंख्या का करीब साठ प्रतिशत आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं. किसानों की समस्या भूमंडलीकरण के बाद उदारीकरण और बाजारवादी व्यवस्था से बिगड़ी है. ऐसे में हमारे समय में प्रेमाश्रम एक नया अर्थ लेकर प्रस्तुत होता है. सौ साल के बाद भी इस उपन्यास की प्रासंगिकता बनी हुई है.


(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Tuesday, August 30, 2022

दिल्ली क्राइम सीजन 2: इच्छा-आकांक्षा में लिपटी हिंसा


पिछले दशकों में भारत में सामाजिक-आर्थिक स्तर पर काफी बदलाव देखने को मिला है. इसके साथ ही समाज में आर्थिक विषमता भी बढ़ी है. अर्थशास्त्री इस ओर इशारा करते रहे हैं कि जहाँ जिनके पास धन है वे और धनवान हुए हैं, जबकि गरीब और गरीबइच्छा और आकांक्षा की पूर्ति के लिए संघर्ष के साथ-साथ हिंसा का हथियार भी समाज में लोगों के हिस्से आया. गरीबी में निहित असहायता और आक्रोश की तरफ पॉपुलर मीडिया का कम ही ध्यान जाता है. सवाल है कि क्या धनाढ्यों के ऊपर होने वाली हिंसा के पीछे समाज के हाशिए पर रहे लोग जिम्मेदार हैंक्यों हमेशा शक की सुई उन पर जा टिकती है, जिसे ऐतिहासिक रूप से समाज में हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया गया?

वेब सीरीज दिल्ली क्राइम का दूसरा सीजन नेटफ्लिक्स पर इन दिनों स्ट्रीम हो रहा है, जो इन्हीं सवालों को अपने घेेरे में लेता है. वर्ष 2019 में रिची मेहता निर्देशित इस सीरीज के पहले सीजन की काफी चर्चा हुई थी. इसे बेस्ट ड्रामा सीरीज’ में प्रतिष्ठित एमी पुरस्कार से नवाजा गया था. जाहिर है दूसरे सीजन को लेकर काफी अपेक्षा थी. यह सीजन पहले की तरह ही संवेदनशीलता के साथ, दिल्ली को केंद्र में रखते हुए, समाज में अपराध और पुलिस की कार्रवाई को हमारे सामने लाती है. तनुज चोपड़ा इस सीजन के निर्देशक हैं.

यह सीरीज हिंसा के प्रति हमारे समाज में जो स्टीरियोटाइप है, उस पर सवाल खड़े करती है. मीडिया भी यहाँ कटघरे में खड़ा दिखता है. साथ ही यह सीरीज समाज में व्याप्त हिंसा के तत्वों की पड़ताल भी करती है, हालांकि इसे विस्तार नहीं दिया गया है. पर बिना कुछ कहे सीरीज में जो फुटपाथ-गलियों के दृश्य हैं, वे सामाजिक विभेद को सामने लाने में सफल हैं.

जहाँ दिल्ली में वर्ष 2012 में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना (निर्भया कांड) पर पहला सीजन आधारित थावहीं दूसरे भाग में दक्षिणी दिल्ली के पॉश कॉलोनी में बूढ़ों के साथ होने वाली हिंसा को आधार बनाया गया है. 90 के दशक में भी दिल्ली में बुर्जुगों की नृशंस हत्या का मामला सामने आया था, जिसके पीछे कच्छा-बनियान’ गैंग का हाथ था. हर एपिसोड में अपराध के लिए जो तौर तरीके अपनाए गए हैं वे एक जैसे हैं.

दिल्ली महानगर में कई नगर हैं. आप भले दशकों से इस शहर में रह रहे हो, पर जरूरी नहीं कि अपने वर्गीय-जातीय पूर्वग्रह को छोड़ कर, आस-पड़ोस से इतर दिल्ली को जानते हों. पाँच एपिसोड का यह सीरीज हिंसा, अपराधियों तक पुलिस के पहुंचने की कोशिश के साथ-साथ समाज में आर्थिक विभेदअपराधियों के प्रति एक वर्ग के नजरिए को भी सामने लाता है. सीरीज के मुख्य कलाकार शेफाली शाहरसिका दुग्गल,  आदिल हुसैनराजेश तैलंग आदि की प्रमुख भूमिका इस सीरीज में भी है. तिलोत्तमा शोम के साथ कुछ और नए किरदार भी इसमें जुड़े हैं. चूँकि पहले सीजन में डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी (शेफाली शाह) और उनकी टीम से हम परिचित रहे हैं, इसलिए सीरीज बिना किसी भूमिका के शुरू होती है. संपादन काफी चुस्त रखा गया है. कैमरा दिल्ली की सड़कोंगलियों को यथार्थपूर्ण ढंग से फिल्माने में सफल है. हालांकि यह सीरीज भावनात्मक रूप से पहले सीरीज की तरह बांध कर नहीं रख पाती. यह भी सच है कि निर्भया कांड की भयावहता झकझोरने वाली थीअपराधियों तक पुलिस की पहुँच की कहानी में एक नाटकीयता थी, दर्शकों के लिए एक तरह का कैथारसिस (विरेचन) था. इस कारण पहले सीरीज से तुलना करने पर यह कमतर ठहरती है. हालांकि शेफाली शाह पहली सीरीज की तरह ही अपनी भूमिका में अत्यंत प्रभावी है. इस सीरीज में उनकी बेटी को परिवार से दूर रखा गया है.

कम संसाधनों के बीच पुलिस के ऊपर जो काम का दबाव है उसे नीति सिंह (रसिका दुग्गल) के पारिवारिक रिश्तों के माध्यम से दिखाया गया है. नीति सिंह अब शादी-शुदा है और वर्तिका की टीम का प्रमुख हिस्सा है पर अपने पेशे और परिवार के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश में उसकी जिंदगी बिखर रही है. एक कश्मकश है यहाँ. इस सीरीज में पुलिस पर मीडिया और राजनीतिक दबाव को भी दिखाया गया है.

मुख्य किरदारों के साथ ही छोटी-छोटी भूमिकाओं में आए हर कलाकारों ने अपनी छाप छोड़ी है. तिलोत्तमा शोम अपनी अदाकारी के लिए खास तौर से उल्लेखनीय है. उसका भावहीन चेहरा नैतिक-अनैतिक के द्वंद से परे है. जो अपने सपने को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है.

(नेटवर्क 18 हिंदी)

Sunday, August 28, 2022

बॉलीवुड में विचारों की कमी है


हिंदी के कवि  और राजनेता  श्रीकांत वर्मा ने राजनीतिक सत्ता को लक्ष्य करते हुए अपनी एक कविता में लिखा था कि कोसल में विचारों की कमी है. जिस तरह से बॉलीवुड की बड़े बजट की फिल्में इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर पिट रही है, ऐसा लगता है कि कोसल की तरह बॉलीवुड में भी विचारों की कमी है. आमिर खान की रिलीज हुई बहु प्रतीक्षित लाल सिंह चड्ढा भी इसी श्रेणी में शामिल है.

हॉलीवुड की चर्चित और पुरस्कृत फिल्म फॉरेस्ट गंप (1994) को भारतीय समाज और समय के अनुकूल बना कर लाल सिंह चड्ढा में प्रस्तुत किया गया है. एक तरफ यह फिल्म मानवीय भावनाओं, निश्छल प्रेम के फिल्मांकन की वजह से मर्म को छूती है, वहीं दूसरी तरफ पिछले पैंतालिस साल के सम-सामयिक घटनाक्रमों का महज एक 'कोलाज' बन कर रह गई है. फिल्म में आपातकाल, ऑपरेशन ब्लू स्टार, बाबरी मस्जिद विध्वंस, कारगिल युद्ध और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उभार आदि की झलक मिलती है, हालांकि वह फिल्म की कथा वस्तु में पैबंद की तरह जुड़ा है. साथ ही आमिर खान और करीना कपूर भी अपने अभिनय में कुछ नया आयाम लेकर प्रस्तुत नहीं होते.

उदारीकरण (1991) के बाद भारत आर्थिक रूप से दुनिया में शक्ति का एक केंद्र बन कर उभरा हैलेकिन जब हम सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पावर) की बात करते हैं तब बॉलीवुड ही जेहन में आता है. दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में भारत में ही बनती हैं, जिसमें हिंदी फिल्मों की एक बड़ी भूमिका है. ऐसे में बॉलीवुड पर छाया संकट चिंता का विषय है. पिछले तीस साल से आमिर खान, सलमान और शाहरुख खान जैसे सितारे बॉलीवुड के आकाश में छाए रहे हैं, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि इनके पास बतौर अभिनेता दर्शकों के लिए कुछ नया देने को रहा नहीं है. पिछले दिनों रिलीज हुई सलमान खान की फिल्में भी फ्लॉप हुई और शाहरुख खान भी जूझ रहे हैं.

बॉलीवुड से अलग हिंदी में पिछले कुछ सालों में जिन फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया वह स्वतंत्र फिल्मकारों की फिल्में ही रही, जहाँ सितारों पर जोर नहीं था. इन फिल्मों की कहानियाँ उनका सबसे मजबूत पक्ष रहा है. पर बॉलीवुड उद्योग का सारा दारोमदार बॉक्स ऑफिस की सफलता-असफलता पर टिका है, जिसके केंद्र में स्टार रहे हैं. बात सिर्फ आमिर, सलमान और शाहरुख खान की ही नहीं है. पिछले दिनों रिलीज हुई रणवीर सिंह की 83, रणवीर कपूर की शमशेरा, अक्षय कुमार की रक्षाबंधन, सम्राट पृथ्वीराज आदि फिल्में भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने में असफल रही.

असल में इंटरनेट पर देश-विदेश की बेहतरीन फिल्मों को देखने की सहूलियत इन दिनों दर्शकों को हो गई है. वे हमेशा विषय-वस्तु में नएपन की तलाश में रहते है. कोरोना महामारी के दौरान बॉलीवुड पर जो संकट के बादल छाए उससे उबरने की फिलहाल कोई सूरत नज़र नहीं आती. ऐसे में बॉलीवुड को नए विचारों, कहानियों की सख्त जरूरत है, जो दर्शकों के बदलते मिजाज के साथ तालमेल बना कर चल सके.