Tuesday, May 02, 2023

इरफान की आखिरी फिल्म ‘द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियंस’

 


‘द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियंस’ चर्चित अभिनेता इरफान की आखिरी फिल्म है, जो उनके गुजरने बाद सिनेमाघरों में रिलीज हुई है. अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फिल्म निर्देशक और लेखक अनूप सिंह इससे पहले उनके साथ ‘किस्सा’ फिल्म बना चुके थे, जिसकी काफी चर्चा भी हुई. अपने मित्र और अभिनेता को केंद्र में रखते हुए अनूप सिंह ने पिछले साल ‘इरफान: डॉयलाग्स विद द विंड’ किताब भी लिखी है जो स्मृतियों से लिखा एक शोक गीत है. हालांकि, यह फिल्म वर्ष 2017 में ही लोकार्नो फिल्म समारोह में दिखाई जा चुकी है.

‘द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियंस’ के सहारे इरफान की अदाकारी को उनके प्रशंसक एक बार फिर से याद कर रहे हैं. प्रसंगवश, 29 अप्रैल को इरफान की तीसरी पुण्यतिथि थी. सिनेमा निर्देशक का माध्यम है, जिसे वह बिंबों और ध्वनि के सहारे दर्शकों के लिए प्रस्तुत करता है, पर एक दर्शक अभिनय, गीत-संगीत, परिवेश आदि के साथ समग्रता में इसे ग्रहण करता है. सिनेमा का सौंदर्य भी इसी समग्रता में ही निहित है.

इस फिल्म की कहानी एक दंतकथा के सहारे बुनी गई है, जिसके केंद्र में बिच्छुओं के डंक को अपने गीत के सहारे दूर करने वाली दादी जुबैदा (वहीदा रहमान) और उसकी खूबसूरत पोती नूरन (गोलशिफतेह फरहानी) है. उनके जीवन में गीत है, वहीं रेगिस्तान में ऊंटों का व्यापारी आदम (इरफान) के जीवन में न सुर है, न संगीत! आदम की नजर नूरन पर टिकी है. वह किसी भी सूरत में उसे पाना चाहता है.

नूरन के मन में भी आदम के प्रति एक आकर्षण है लेकिन उसे पाने की चाहत आदम को हिंसा की तरफ मोड़ती है. नूरन से जीवन छीन जाता है. संगीत छूट जाता है. क्या आदम को नूरन मिलती है? फिल्म ‘प्रेम की पीर’ को सूफियाने ढंग से, धोरों के बीच गीत के सहारे आगे ले जाती है. इसकी भाव-भूमि हालांकि सामंती नहीं, हमारा आधुनिक समाज है. यहां हिंसा है, छल-प्रपंच है. आधुनिक समय में भी स्त्री को लेकर सामंती दृष्टि कायम है.

फिल्म रेगिस्तान (जैसलमेर) में अवस्थित है और भाषा राजस्थानी है. इसी भूमि पर मध्यकाल में सामंती समाज को लक्षित कर भक्ति कवयित्री मीरा ने लिखा था:

लोक-लाज कुल कानि जगत की दई बहाय जस पानी

अपने घर का परदा कर ले मैं अबला बौरानी.

अंत में, नूरन मीरा की तरह घर-परिवार, आदम को छोड़ देती है. अपने ‘स्व’ की तलाश में निकल पड़ती है, गाती है- ‘आओ सखी, आओ मन…’

इस फिल्म में जिस तरह से प्रकाश का संयोजन दिन और रात के दृश्यांकन में किया गया है वह भारतीय सिनेमा में विरल है. यह गम और खुशी, राग और द्वेष और जीवन को दो पाटों को भी खूबसूरती से अभिव्यक्त करता है.

जब आदम अपनी पहली शादी से जन्मी बच्ची को बुआ के पास छोड़ कर घर लौटता है और नूरन को वहां नहीं पाता है, तब कैमरा जिस तरह से ‘विरह से भरे घर-आंगन कोने’ को दिखाता है वहां किसी संवाद की जरूरत नहीं पड़ती. इसी तरह का एक दृश्य नूरन के आंगन का भी है, जब वह जुबैदा को नहीं पाती है. रेगिस्तान की उदासी यहां व्याप्त है. असल में, पूरी फिल्म में रेगिस्तान का अस्तित्व मानव-जीवन से गुंफित है.

पूरी फिल्म के संवाद में एक लय है. दु:ख में भी यहां रागात्मकता है. नूरन  के ‘गान’ में एक टीस है, जो मानवता को पुकारती हुई प्रतीत होती है. चर्चित संगीतकार मदन गोपाल सिंह का लिखा गाना प्रेम और वेदना को स्वर देने में सफल है. यही बात फिल्म की संगीतकार बीट्राइस थिरिएट के बारे में भी कही जा सकती है. खास कर यह गाना सुनना आह्लादकारी है:

लाडो रानी, म्हारी तो बिजुरिया रे घन घन

तू ही तो री गुड़िया, तू घर बाहर अंगना

तू ही तो बहार बगिया, फूली री बन बन बन.

अनूप सिंह एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार हैं जिनकी फिल्में ऋत्विक घटक, मणि कौल, कुमार शहानी की परंपरा से जुड़ती है. उनकी फिल्मों में भूगोल और लैंडस्केप का काफी महत्व है. स्थान विशेष की बोली-वाणी, भेष-भूषा उनकी फिल्मों (एकटी नदिर नाम, किस्सा) के साथ गुंथे चले जाते हैं. पिछले साल इस फिल्म के बारे में बातचीत करते हुए उन्होंने मुझसे कहा था:

“रेगिस्तान में जहर और बाम दोनों होते हैं. हम रेगिस्तान को कैसे देखना चुनते हैं, शायद यह हमें बताता है कि हम खुद को कैसे देखते हैं. हम क्या देखना चुनते हैं- बिच्छू या गीत?”

अनूप सिंह के इस वक्तव्य के सहारे यदि हम आदम के चरित्र को देखे तब स्पष्ट हो पाता है कि क्यों अंत में आदम के प्रति भी दर्शकों के मन में कोई विद्वेष नहीं रह पाता. फिल्म देखते हुए मुझे राजस्थानी प्रेम कथा ढोला-मारू की याद आती रही. यह फिल्म जीवन का गीत है, जो लोक, आख्यान समेटे है. आज जब इरफान हमारे बीच नहीं हैं, इस फिल्म से बेहतर श्रद्धांजलि नहीं हो सकती.

Friday, April 21, 2023

जुबली वेब सीरीज: बीते दौर की खुशबू और अशोक कुमार

 


हाल ही में  विभिन्न ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई वेब सीरीज ने सिने जगत को कुछ बेहतरीन कलाकार दिए हैं. बात ‘पाताल लोक’ की हो या ‘क्लास’ की. इसी कड़ी में फिल्म निर्देशक विक्रमादित्य मोटवानी की वेब सीरीज 'जुबली' (अमेजन प्राइम) का नाम जुड़ गया है. इस सीरीज में अपारशक्ति खुराना, वामिका गब्बी, सिद्धांत गुप्ता जैसे युवा कलाकारों की खूब तारीफ हो रही है.

देश की आजादी-बंटवारे के समय और उसके तुरंत बाद पचास के दशक में बाम्बे की मायानगरी में जो चहल-पहल थी, ईर्ष्या-द्वेष था, सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति थी उसे नॉस्टेलजिया और ड्रामा के सहारे इस सीरीज में बुना गया है. मोटवानी और अतुल सभरवाल के लिखे इस सीरीज में यथार्थ और फैंटेसी के बीच आवाजाही है. सीरीज के केंद्र में फिल्म स्टूडियो और उससे जुड़े कलाकारों की जिंदगी है, राग-रंग है.

110 वर्षों की यात्रा में हिंदी सिनेमा ने कई मुकाम हासिल किए हैं, लेकिन पिछली सदी के 30 और 40 के दशक के चर्चित न्यू थिएटर्स, प्रभात स्टूडियो, बाम्बे स्टूडियो के योगदान की आज कोई चर्चा नहीं होती. जबकि कुंदन लाल सहगल, देविका रानी, अशोक कुमार, दिलीप कुमार जैसे फिल्मी हस्ती इन्हीं स्टूडियो की देन हैं, जिनके बिना हिंदी सिनेमा के इतिहास की कल्पना नहीं की जा सकती.

‘जुबली’ में श्रीकांत राय (प्रसेनजीत चटर्जी) क्या ‘बॉम्बे टॉकीज’ के मालिक, दूरदर्शी फिल्मकार हिमांशु राय हैं? क्या उनकी पत्नी सुमित्रा कुमारी (अदिति राव हैदरी) देविका रानी हैं?  दर्शक उस दौर में मौजूद रहे कलाकारों की छाप सीरीज के किरदारों में ढूंढ़ते हैं. दस एपिसोड के इस सीरीज में मेरी निगाह हालांकि जिस पर टिकी रही, वह है बिनोद उर्फ मदन कुमार बने अपारशक्ति खुराना. मदन कुमार को किस्मत ने सितारा बना दिया है, जिनके नाम पर फिल्में बिकती हैं!

जब भी हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की बात होती है दिलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद की तिकड़ी का जिक्र किया जाता है. एक नाम इसमें हमेशा छूट जाता रहा है, अशोक कुमार का. अपारशक्ति खुराना (मदन कुमार/बिनोद) के किरदार में अशोक कुमार की छाप स्पष्ट दिखाई देती है. यह उनकी जीवनी को पढ़ कर स्पष्ट है. बहरहाल, अशोक कुमार (1911-2001) एक ‘रिलक्टेंट एक्टर’ (अनिच्छुक कलाकार) थे, जिनकी उपस्थिति हिंदी सिने जगत में करीब सात दशक तक रही और करीब 350 फिल्मों का उनका सफर रहा. कम लोग जानते हैं कि दिलीप कुमार, देवानंद, मधुबाला जैसे फिल्मी सितारे, मंटो जैसे लेखक और विमल राय जैसे निर्देशक को फिल्मी दुनिया से जोड़ने में उनकी अहम भूमिका रही. फिल्मों में योगदान के लिए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

‘जुबली’ में हम देखते हैं कि बिनोद एक तकनीक सहायक से सफल स्टार तक की यात्रा करता है, उसी तरह अशोक कुमार की भी कहानी है. वे हिमांशु राय के स्टूडियो (1934) में तकनीक सहायक बन कर आये थे. जब 'बाम्बे टॉकीज' की फिल्म 'जवानी की हवा' के अभिनेता नजमुल हसन और देविका रानी के प्रेम संबंधों की भनक हिमांशु राय को लगी, तब उन्होंने हसन की जगह अशोक कुमार को अगली फिल्म ‘जीवन नैया’ (1936) में लेने का निर्णय किया. फिर बॉम्बे टॉकीज की ‘जीवन नैया’, ‘अछूत कन्या’,  ‘किस्मत’,  ‘महल’ जैसी सफल फिल्मों में अशोक कुमार ने  काम किया. और हसन?  वे एक गुमनाम जिंदगी बसर करते हुए लाहौर में वर्ष 1980 में गुजर गए. बाद में हिमांशु राय की वर्ष 1940 में मौत के बाद देविका रानी (1908-1994) ने रूसी पेंटर स्वेतोस्लाव रोरिक से शादी कर फिल्मी दुनिया से दूर चली गई. वर्ष 1969 में जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार की स्थापना की गई तब पहली विजेता देविका रानी ही बनी.

प्रसंगवश जुबली के गीत ‘उड़न खटोले’ सुनते हुए ‘अछूत कन्या’ फिल्म के गाने ‘मैं बन की चिड़िया’ गाने की याद आती है. अभिनय के अतिरिक्त जुबली सीरीज अपने प्रोडक्शन-डिजाइन की गुणवत्ता की वजह से भी याद रखी जाएगी. सीरीज देखते हुए गुजिश्ता दिनों की खुशबू महसूस होती है. साथ ही सिनेमा और व्यवसाय का द्वंद जो बाद के दशक में बॉलीवुड में देखने को मिला उसकी झलक भी मिलती है.

बहरहाल, पिछले वर्ष चर्चित पटकथा लेखक और निर्देशक नवेंदु घोष लिखित जीवनी ‘दादामुनी- द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ अशोक कुमार’ फिर से प्रकाशित हुई. इस किताब में घोष लिखते हैं कि अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के पहले ‘सुपर स्टार’ थे जिन्होंने स्टूडियो से निकल कर बॉलीवुड की सफल यात्रा की थी. अशोक कुमार ने खुद की एक अलहदा अभिनय शैली विकसित की थी और अपने पूरे फिल्मी करियर में वे प्रयोग करने ने नहीं झिझके.

किताब में अशोक कुमार एक जगह कहते हैं कि उनके निर्माण में बाम्बे टॉकीज की महत्वपूर्ण भूमिका रही. वे खास कर हिमांशु राय को क्रेडिट देना नहीं भूलते हैं. हम भले उस दौर के स्टूडियो और कलाकारों के आपसी रिश्तों को भूल गए, पर एक कलाकार ने नहीं भूला. ‘जुबली’ देखते हुए एक अभिनेता (स्टार) और फिल्म निर्माता (प्रोड्यूसर) के आपसी रिश्ते को भी हम बखूबी देखते-परखते हैं.

 

Tuesday, April 18, 2023

चंडी प्रसाद भट्ट से बातचीत: चिपको के पचास साल


यह चिपको आंदोलन की शुरुआत थी, जब 27 मार्च 1973 को अंगू के पेड़ों को काटने इलाहाबाद की सायमण्ड्स कंपनी के मजदूर उत्तराखंड के गोपेश्वर आए, तब चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा था: ‘उनसे कह दो कि हम उन्हें पेड़ काटने नहीं देंगे, जब उनके आरे पेड़ों पर चलेंगे, हम पेड़ों को अंगवाल्ठा डाल लेंगे, उन पर चिपक जाएँगे.’


चिपको आंदोलन के संगठन और नेतृत्व के लिए वर्ष 1982 में चंडी प्रसाद भट्ट को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया. आज उम्र के 88 वें पड़ाव पर वह पर्यावरण संरक्षण को लेकर सक्रिय हैं.

पर्यावरण की वर्तमान समस्या

आज समस्याएं और भी गंभीर हो रही है. बात पेड़ की ही नहीं, पानी की, जमीन की समस्या की भी है. अलग-अलग ढंग से संरक्षण की बात ऊपर ही ऊपर तो हो रही है, जमीनी स्तर पर जिस तरह काम होना चाहिए नहीं हो रहा.

चिपको आंदोलन की चेतना

जहाँ तक पेड़ों की बात है सरकार के कानूनों के कारण अभी काफी बचे हैं और कुछ लोगों की जागृति के कारण. मुख्य रूप से उत्तराखंड में महिला मंगल दलों के द्वारा अपने इलाकों में पेड़ों की निगरानी का कार्यक्रम चल रहा है. चिपको आंदोलन की जो मातृ संस्था है वह जंगलों में आग इत्यादि में जन चेतना जागृत करने का काम कर रही है.

जलवायु परिवर्तन

ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं ऐसा विषय विशेषज्ञ बताते हैं. और जैसा कि आपने सुना होगा 7 फरवरी 2021 को रेणी में कटान टूटा और उसके कारण ग्लेशियर भी टूटा. और नंदा देवी के मुहाने के स्फीयर पर एक बिजली का प्रोजेक्ट बनाया था, 13 मेगावाट का वह भी नष्ट हुआ. और एक बड़ी परियोजना थी तपोवन में वह भी नष्ट हुई. इसमें 205 आदमी की मौत हुई और कई लोग लापता हुए. इससे पहले वर्ष 2013 में केदारनाथ में त्रासदी आई.

जोशीमठ की त्रासदी

जोशीमठ जो एक उभरता हुआ नगर है और शंकराचार्य का मठ है उस पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है. जोशी मठ में त्रासदी हो रही है, अभी तक लोगों का विस्थापन इत्यादि नहीं हो पाया. तो सवाल यह है कि जोशी मठ को कैसे बचाया जाए? जोशी मठ के साथ हमारी सीमांत की सुरक्षा भी जुड़ी हुई है. इस प्रकार की लापरवाहियाँ प्रत्यक्षतः जलवायु परिवर्तन के कारण देखने को मिल रही है.

आज भी कोई ऐसा संस्थान नहीं है जो त्रासदी के बारे में बता सके...केवल ग्लेशियर के पीछे जाने का सवाल नहीं है, ग्लेशियर पीछे जाने से हमारी ट्री लाइन पर क्या प्रभाव पर रहा है, हमारी खेती-बाड़ी पर, जीव जंतुओं पर क्या असर पर पड़ रहा है ये जानकारी नहीं हो पा रही है.

गंगा पर प्रभाव

गंगा, ब्रह्मपुत्र और इंडस पर जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव पर रहा है. इन तीनों नदियों का वाटर बजट 63 प्रतिशत है. अकेली गंगा का बेस लाइन 26 प्रतिशत के करीब है, हिमालय से लेकर गंगासागर तक. हिमालय में गड़बड़ी होगी तो पूरे बेसिन पर किसी न किसी रूप में दुष्प्रभाव पड़ेगा और ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे. अभी तो बाढ़ इत्यादि आएगी, एक समय ऐसा आएगा हमारी गंगा नदी बरसाती नदी की तरह हो जाएगी



Thursday, April 13, 2023

कुमार गंधर्व के कबीर: सुनो भई साधो


नाद के सौंदर्य को शब्द में कोई कैसे लिखे?  कोई पत्ता डाल से गिरा और उससे जो ध्वनि उत्पन्न हुई, उस अनुभूति को बयान करने के लिए क्या कवि होना जरूरी है? संभवत: हां. पर कवि के लिखे शब्द का अर्थ कई बार पढ़ कर नहीं, सुन कर ही स्पष्ट हो पाता है. पर यदि यह नाद अनहद हो तब? यह ख्याल कुमार गंधर्व (1924-1992) के कबीर को सुन कर बार-बार मन में आता है. कबीर की कविता में व्यक्त ‘अनाहत नाद (अनहद नाद)’ कुमार के ‘आहत नाद’ में आकर स्वर पाता है.

जब मैं कुमार गंधर्व को गाते सुनता हूँ- ‘ उड़ जायेगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला/ जैसे पात गिरे तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला’, तब लगता है कि शायद कबीर को कुमार गंधर्व का इंतजार था. कबीर को कुमार करीब चार सौ साल के बाद स्वर दे रहे थे. संभव है कि हमारे चारो ओर यह नाद पहले से व्याप्त था, आधुनिक तकनीक ने कुमार गंधर्व के माध्यम से हम तक पहुँचाने में सहायता की. कहा गया है-‘नाद को न भेद पायो, जो पायो सकल जगत में वही गुणी कहायो’. कुमार गुणी गायक थे.

कर्नाटक के धारवाड़ इलाके में आठ अप्रैल 1924 को जन्मे कुमार गंधर्व का नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था. उनमें नैसर्गिक प्रतिभा थी और दस-ग्यारह वर्ष की उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि फैल गई, वे कुमार गंधर्व कहलाए. प्रोफेसर बी आर देवधर उनके गुरु थे, जो अपने शिष्यों को एक अलग रास्ता अख्तियार करने को प्रेरित करते थे. कुमार गंधर्व की क्रांतिकारी चेतना का उत्स यहाँ ढूंढा जा सकता है.

कुमार गंधर्व का जन्मशती वर्ष चल रहा है. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इस गुणी गायक को एक बार फिर से याद किया जा रहा है. सच तो यह है कि वे संगीत प्रेमियों के मन से कभी गए ही नहीं. पिछले दशकों में यूट्यूब के माध्यम से उनकी ख्याल गायकी और भजन जन सुलभ हुए हैं.

भक्तिकालीन कवि कबीर अपनी विद्रोही, लोक-चेतना की वजह से पाँच सदी के बाद भी विभिन्न रूपों में लोक मन में व्याप्त हैं. यही कारण है युवाओं में भी उनके निर्गुण पदों की पैठ बढ़ी है. मधुप मुद्गल (कुमार गंधर्व के शिष्य) से लेकर प्रहलाद टिपाणिया और शबनम विरमानी के यहाँ कबीर कई रूप और स्वर में मौजूद हैं. अनायास नहीं कि युवा संगीतकारों के एक म्यूजिक बैंड का नाम ‘कबीर कैफे’ है!

बहरहाल, कुमार शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य साधक थे, पर थे लोक के करीब. कई जगह यह लिखा जा चुका है कि जब वर्ष 1948 में वे टीबी से पीड़ित होकर मालवा के देवास में स्वास्थ्य लाभ करने गए, तब वहाँ गाए जाने वाले लोक गायन से उन्होंने प्रेरणा ग्रहण की थी. वहाँ नाथपंथी जोगी कबीर के निर्गुण पदों को गाते थे. करीब छह वर्ष के बाद ‘कबीर के चदरिया’ को उन्होंने अपने राग से एक बार फिर बुना. उनके रचे बंदिशों में शास्त्रीय और लोक रंग एक साथ मिलते हैं.

कुमार गंधर्व के गायन में जो स्वर का उठान है और शब्दों के बीच जो शून्यता है उसे सुनने का सुख अनिर्वचनीय है. कबीर के लेखन में रहस्यात्मकता है, वहीं शास्त्रीय संगीत में अमूर्तता है. कुमार गंधर्व का गायन इस रहस्यात्मकता और अमूर्तता को भेद कर आम लोगों के करीब लेकर आया.

शास्त्रीय संगीत के कई मर्मज्ञ गायन में शब्द के महत्व को नकारते रहे हैं. मुकुंद लाठ ने एक जगह लिखा है: “संगीत में शब्द का प्रयोग आवश्यक नहीं, अवान्तर है. शब्द वहाँ आगंतुक है, न भी आए तो संगीत संगीत रह जाता है.” इसके उलट कुमार गंधर्व के लिए गायन में शब्द की महत्ता हमेशा रही. यह सिर्फ कबीर के प्रसंग में ही नहीं बल्कि जब वे सूरदास (ऊधो अँखियाँ अति अनुरागी) या मीरां (पिया जी म्हारे नैना आगे रहियो जी जी जी) को गाते हैं उससे स्पष्ट है. निर्गुण गायन से अलग उनको सुनना भी उतना ही प्रीतकर है.

कुमार गंधर्व के गायन का आनंद लेने के लिए शास्त्रीय संगीत का मर्मज्ञ होना जरूरी नहीं है. मै संगीत का जानकार नहीं हूँ, पर एक श्रोता के रूप में ऐसा लगता है कि यदि आप रसिक हैं, यही काफी है. और यही कुमार गंधर्व का भारतीय संगीत में असाधारण योगदान है, वे शास्त्रीय संगीत को लोक तक लेकर गए.

लेख की शुरुआत मैंने नाद सौंदर्य से की थी, आखिर में फिर उसी नाद की बात, जिसकी सार्थकता कुमार गंधर्व के यहाँ साफ सुनाई देती है:  

‘सुनता है गुरु ज्ञानी ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी

गगन में आवाज़ हो रही है झीनी झीनी, झीनी झीनी’.