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Tuesday, March 01, 2016

सरकार का नहीं, सस्ती सिगेरट का साथ

हिंदुस्तान टाइम्स में एक ख़बर पढ़ी कि उमर खालिद ने हिरासत में पुलिस से सिगरेट और अख़बारों की मांग की. पता नहीं इस ख़बर में कितनी सच्चाई है, पर मुझे हिंदी के चर्चित कवि आलोकधन्वा की कविता की पंक्तियाँ याद हो आई:
'सरकार ने नहीं--इस देश की सबसे
सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया'

आलोकधन्वा ने जब 1972 में इन पंक्तियों को लिखा, वह दौर अलग था. आजादी के बाद जवान हुई उस पीढ़ी के कुछ सपने थे. युवाओं मेंराज्य और सत्ता के प्रति आक्रोश था. समाज के प्रति एक प्रतिबद्धता थी. खुद आलोकधन्वा नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े हुए थे.

सपने तो उदारवाद के दौर में पली-बढ़ी हमारी पीढ़ी के भी हैं, समझदारी भी है, पर प्रतिबद्धता खो गई है. हम सब अपनी दुनिया, ईएमआई की किस्तों और शबो रोज़ हो रहे तमाशे में उलझे हुए हैं.

बहरहाल, उमर का साथ सरकार तो नहीं ही दे रही है, उसे सिगेरट भी मयस्सर नहीं!  जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया, उमर खालिद और अन्य छात्रों पर देशद्रोह का आरोप है. वे पुलिस हिरासत में हैं. 

60 के दशक के आखिरी सालों में जब जेएनयू की स्थापना हुई थी, तब पेरिस और यूरोप के अन्य देशों के विश्वविद्यालय के युवा छात्र राज्य और सरकार की नीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. वियतनाम के खिलाफ अमेरिकी सरकार के युद्ध के विरोध में छात्र सड़कों पर थे. एक तरह से जेएनयू की जन्मकुंडली में संघर्ष, समाज के हाशिए के प्रति एक न्यूनतम सरोकार और सक्रियता लिखी हुई थी. इन वर्षों में जेएनयू के छात्रों ने कैंपस के अंदर और बाहर इस परंपरा को एक हद तक निभाया भी है.

शुक्रवार को संसद में हुए बहस के दौरान जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष सीताराम येचुरी और देवी प्रसाद त्रिपाठी ने बखूबी याद किया कि किस तरह आपातकाल के दौरान जेएनयू का छात्रसंघ भूमिगत रहते हुए भी इंदिरा गाँधी की दमनकारी नीतियों और सत्ता के बरक्स प्रतिरोध का एक प्रमुख केंद्र बना रहा. छात्रसंघ अध्यक्ष त्रिपाठी समेत कई छात्र मीसा के तहत गिरफ्तार किए गए थे.

प्रसंगवश, वर्ष 2012 में निर्भया के बलात्कारियों के खिलाफ कैंपस के बाहर सड़कों पर जेएनयू के छात्र इस लड़ाई को लेकर उतरे. धीरे-धीरे दिल्ली और फिर मीडिया के मार्फत पूरे देश में यह लड़ाई फैली. शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि एक जघन्य बलात्कार के खिलाफ रोष और आंदोलन में छात्रों ने अग्रणी भूमिका निभाई. बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के उन्होंने अपनी आवाज़ देश और देश के बाहर पहुँचाई थी.


जेएनयू देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से एक है. नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रीडेशन कौंसिल (NACC) ने इसे देश के विश्वविदयालयों में सबसे उत्कृष्ट ग्रेड से नवाजा है.

हालांकि, इन दिनों कैंपस में लगे तथाकथित देश विरोधी नारों की वजह से जेएनयू चर्चा में है. चारो तरफ सत्य और अर्ध सत्य से भरी जानकारियाँ फैली हुई है. यह महज सोशल नेटवर्किंग साइट पर ही नहीं है, बल्कि कई ज्ञानी, बुद्धिजीवी, नेता भी इस तरह के कुप्रचार में सलंग्न है.

सरकार और उसकी मशीनरी, जिसमें कुछ मीडिया घराने भी हैं, इस आग को हवा देन में लगी है. गृहमंत्री एक फर्जी ट्विट के आधार परजेएनयू के छात्रों का संबंध आतंकवाद से जोड़ते हैं, देशद्रोही कहते हैं. शिक्षामंत्री झूठ का पुलिंदा संसद में लहराती है और भावुक होकरगलतबयानी करती हैं. प्रधानमंत्री रात में इस झूठी तकरीर को ट्विटर पर शेयर करते हैं. 'सत्यमेव जयते' लिखते हैं. यहाँ तथ्य और सत्यके बीच कोई संबंध नहीं होता. सरकार झूठ गढ़ती है. मीडिया उसका प्रसार करती है. भक्त वाह, वाह करते हैं!

युवा वर्ग हर दौर में स्वप्नजीवी होता है. उनके सपने होते हैं. समाज, व्यवस्था और खुद से लड़ने का जज्बा किसी से भी ज्यादा होता है. आदर्श और यर्थाथ के बीच लड़ाई भी इसी दौर में चलती रहती है. विश्वविद्यालय का कैंपस इन सपनों, संघर्षों और शिक्षा के लिए एक आदर्श भूमि होती है. जाहिर है, छात्रों को विश्वविदयालयों में सीखने (जिनमें उनकी मूर्खताएँ भी शामिल हैं), विचारों को एक सान देने, वाद-विवाद-संवाद की एक प्रक्रिया से गुज़रने का मौका मिलना ही चाहिए. बिना इसके विश्वविद्यालय ज्ञान सृजन का केंद्र बने नहीं रह सकते हैं. जेएनयू कैंपस विचारों के इस खुलेपन और लोकतांत्रिक स्पेस के कारण ही देश-दुनिया में अपनी पहचान बना पाया है.   

संभव है कि युवाओं के सपनों में कुछ भ्रांतियाँ भी हो. पर राज्य उस पर अपनी सारी शक्तियों के साथ दमन नहीं करता.  जेएनयू में लगे तथाकथित नारों (इसमें कुछ बाहरी लोग भी शामिल थे जिनकी शिनाख्त अभी तक नहीं हो पाई है) की निंदा कैंपस, कैंपस के बाहर और संसद में हुई. छात्रसंघ ने भी अगले दिन ही पर्चा निकाल खुद को इस कार्यक्रम से दूर कर इन नारों की भर्त्सना की थी.  हालांकि देश के सभी जाने माने न्यायविद इस बात पर एक मत हैं कि जेएनयू में लगाए गए तथाकथित नारे देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आते.


यहाँ पर इस वाकये का जिक्र जरूरी है, प्रसंग और वर्ष भले ही सुदूर इतिहास के हो.  वर्ष 1933 में ऑक्सफोर्ड यूनियन, अंडर ग्रेजुएट डिबेटिंग सोसाइटी,  ने एक प्रस्ताव पास किया कि ‘सदन किसी भी सूरत में राजा और देश के लिए लडाई नहीं लड़ेगा.’ इसी दौर में हिटलर की सत्ता उभार पर थी.  ब्रिटेन में सदन के इस प्रस्ताव की व्यापक आलोचना और अवहेलना हुई.  पर गौरतलब है कि जब 1939 में हिटलर ने ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध घोष किया तब इन्हीं छात्रों ने, जो इस वाद-विवाद में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था, देश के लिए प्राणों की आहूति भी दी थी!

                                                         ( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)

Sunday, February 21, 2016

जेएनयू में बाल भी बांका न कर पाएगी शासन की बंदूक

 यह जेएनयू
नवल-नवेलियों का 
उन्मुक्त लीला-प्रांगण
यह जेएनयू
असल में कहा जाए तो कह ही  डालूँ
बड़ी अच्छी है यह जगह
बहुत ही अच्छी
और क्या कहूँ…
सोचता हूँ मैं भी ले लूँ दाखिला
‘टिब्बेटियन’ लेने पर क्यों कोई एतराज करेगा
डाक्टर विमला प्रसाद
डाक्टर नामवर…
डाक्टर मुजीब…
ये सब तो रिकमेंड करेंगे ही
तब नए सिरे से
उपनयन संस्कार होगा मेरा
छात्रावास में कमरा मिल ही जाएगा
वृत्ति की व्यवस्था तो होगी ही
शाबाश! बेटा अर्जुन नागा
सोचता ही जा रहा हूँ
आखिर क्या रखा है इसमें
दरअसल यह जगह है बड़ी शानदार
जे.एन.यू. जे.एन.यू. जे.एन.यू
जब मूल बांगला में बाबा नागार्जुन ने फरवरी 1978 में इस कविता को लिखा था तब आपातकाल की याद ताज़ा थी. एक तरह से यह जेएनयू के छात्रों के लिए उनकी तरफ से एक तोहफा था.
असल में, जेएनयू आपातकाल के दंश को झेल चुका था. पुलिस कई छात्रों को कैंपस से उठा ले गई थी. आपातकाल के दौरान जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष और वर्तमान में एनसीपी के सांसद देवी प्रसाद त्रिपाठी को मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया था.
फिर भी जेएनयू उस दौर में तानाशाही, अधिनायकवादी शासन के प्रतिरोध का केन्द्र बना रहा.
पिछले दिनों जेएनयू के वर्तमान छात्रसंघ के अध्यक्ष, सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ के नेता, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी और कैंपस में पुलिस की मौजूदगी ने जेएनयू के पुराने छात्रों और शिक्षकों को आपातकाल के दौर की याद दिला दी है. पिछले दिनों जब मैंने गंगा ढाबा पर दिल्ली पुलिस के कुछ जवानों को समोसे खाते और चाय पीते हुए देखा तो मेरे लिए यह आघात से कम नहीं था. इसी गंगा ढाबा के एक अंधेरे कोने में मैंने वर्षों रमाशंकर विद्रोही को अपनी ओजपूर्ण कविता गाते सुना है. मेधा पाटेकर को बहस करते देखा है. छात्रसंघ के प्रेसिडेंट डिबेट के दौरान झेलम लॉन से उमड़ती हुई भीड़ देखी है.

कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी और उन पर लगे देशद्रोह के आरोप से छात्रों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों में रोष है. पिछले दिनों से कैंपस के अंदर छात्रों और शिक्षकों का जिस तरह एकजुट होकर सरकार की इस कार्रवाई का शांतिपूर्ण विरोध हो रहा है वह जेएनयू के इतिहास में अभूतपूर्व है.
वर्षों से मीडिया में एक जुमला चलता रहा है कि जेएनयू वामपंथ का गढ़ है. यह सरासर झूठ है. जेएनयू किसी भी अन्य विश्वविद्यालय की तरह एक ऐसा लोकतांत्रिक स्पेस है जहाँ सभी विचारधारा, मत के लोग एक- साथ उठते-बैठते, पढ़ते-लिखते, बहस-मुबाहिसा करते रहते हैं. जहाँ विरोध, प्रतिरोध (dissent) को सामंती मानसिकता के तहत अन्य विश्वविदयालयों में तौहीन माना जाता है, वहीं जेएनयू को शुरु से स्वीकार्य है. मेरे गुरु पुरुषोत्तम अग्रवाल एक संस्मरण का जिक्र अक्सर करते रहते थे कि जब वे छात्र नेता थे तब अपने गुरु नामवर सिंह से उलझते रहते थे. पर उनसे पढ़ना और सीखना जारी रहा. इसी तरह हाल ही में रोमिला थापर ने एक इंटरव्यू में माना है कि कई बार छात्रों ने उनका घेराव किया पर पुलिस बुलाने की नौबत कभी नहीं आई. आपसी बातचीत से सारे मसले सुलझाए जाते रहे.
इंदिरा गाँधी जब 1980 के दौरान विश्वविद्यलय में आई तो उन्हें भी विरोध झेलना पड़ा था और मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री के रूप में कैंपस में आए तो उनका भी स्वागत विरोध से हुआ. लेकिन हिंसा कैंपस के लिए आज भी अनसुनी चीज है.
यहां का लोकतांत्रिक माहौल बनाने में वाद-विवाद और बहस-मुबाहिसों का बड़ा योगदान है. प्रश्न करने की प्रवृति और वाद-विवाद की संस्कृति यहाँ महज कक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देर तक होने वाली पब्लिक मीटिगों और ढाबा तक फैली हुई है.
छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के रिश्ते एक खुलेपने को दर्शाते हैं. इनके आवास को एक–दूसरे के करीब बनाया गया है ताकि एक स्वस्थ, सामुदायिक नाता विकसित हो.
छात्र संघ चुनाव के दौरान वामपंथी पार्टियों की बढ़त शुरू से रही है, पर फ्री थिंकर्स, समाजवादी, राष्ट्रवादी, संघियों की मौजूदगी भी यहाँ रही है. छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष आनंद कुमार ने एसएफआई के नेता प्रकाश करात को हराया था. वे उस वक्त समाजवादी विचारधारा से प्रेरित थे. बाद में एबीवीपी और एनएसयूआई के छात्र नेता भी छात्र संघ के अध्यक्ष बने. कम लोगों को पता है कि वर्षों से जेएनयू के अंदर संघ की शाखा लगती रही है, जिसमें संघ की विचारधारा को मानने वाले छात्र और शिक्षक हिस्सा लेते रहे हैं. पिछले 15 वर्षों से कैंपस के अंदर दुर्गापूजा धूमधाम से मनाई जाती रही है और पिछले कुछ साल में महिषासुर की भी पूजा शुरु हो गई है.
मीडिया, खास तौर से भाषाई और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जो राज्य-सत्ता की विचारधारा से पोषित रहा है और जिसे सत्ता से सवाल करने से परहेज रहा है, वह जेएनयू को एक ख़ास चश्मे से देखता रहा है. यह वही चश्मा है जो एक दौर में संघ के नेता प्रवीण तोगड़िया पहनते थे (आज कल चंदन मित्रा पहन रहे हैं). उन्होंने भी पिछले दशक में कई बार जेएनयू बंद करने के सपने देखे थे! पता नहीं आज कल वे किस जहां में हैं.

पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में प्रिंट मीडिया की बड़ी भूमिका रही है. वहीं फिलहाल भारत में कुछ खबरिया चैनल अंधराष्ट्रवाद को हवा दे रहा है. कोर्ट में कन्हैया की पेशी के समय जिस तरह से संघी गुंडों ने वकीलों के साथ मिल कर पत्रकारों, जेएनयू के शिक्षकों-छात्रोंको पीटा है, वह अंधराष्ट्रवाद की भयावह परिणति है.
बहरहाल, जेएनयू कोई टापू नहीं है. इसी देश, समाज का हिस्सा है. जाहिर है, उग्र विचार वाले, देश, राष्ट्र के मुद्दे पर लीक से हट कर सवाल करने वाले भी कुछ लोग हमेशा वहाँ मौजूद रहे हैं. विरोधियों के लिए, चाहे वे मुट्ठी भर ही क्यों नहीं हो, जेएनयू की परंपरा में हमेशा से जगह रही है. यदि बीजेपी-संघ के समर्थक एबीवीपी जैसे संगठन मोदी-शाह, प्रशासन के दम पर उन्हें चुप कराने पर आमादा हैं तो यह उनकी हार है. जेएनयू एक विचार है- लोकतांत्रिकता, स्वंतत्रता और बंधुत्व का.
असल में, मोदी सरकार अपने लगभग दो साल के कार्यकाल में सबसे कठिन घड़ी में है. रोहित वेमुला की दुखद मौत से पूरे देश के छात्रों में आक्रोश है. अर्थव्यस्था में उछाल के आंकड़ो (जीडीपी 7.6) पर पिंक पेपर में सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं. पठानकोट पर आंतकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार की कोशिशें सफल होती दिख नहीं रही. ओआरओपी को लेकर अभी तक सरकार अस्पष्ट है, फलत: सैनिकों में रोष है. जीएसटी बिल रुका पड़ा है, लेबर रिफार्म हो नहीं रहा. कारोबारी नाख़ुश हैं. राज्यों के साथ संबंध में केंद्र की नीति कैसी है, यह अरुणाचल प्रदेश के संकट से साफ ज़ाहिर है. ऐसे में सरकार और उनके मंत्री राष्ट्रवाद, देश भक्ति, देश द्रोह का आजमाया राग अलाप रहे हैं.
क्या ये अनायास है कि पहले संघ का मुख्यपत्र ‘पांचजन्य’अपनी कवर स्टोरी में जेएनयू को ‘दरार का गढ़’ कहता है. कैंपस को हिंदू विरोधी, देश विरोधी मानता है. पुलिस बिना किसी ठोस सबूत के कन्हैया कुमार को देशद्रोह के कानून में हिरासत में लेती है. जबकि फली नारीमन, सोली सोराबजी जैसे देश के जाने-माने न्यायविदों का मानना है कि देश के विरोध में महज लगाए गए नारे देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आते और उन पर देश द्रोह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
आश्चर्य है कि एक ‘फेक ट्वीट’ के आधार पर देश के गृहमंत्री कहते हैं कि जेएनयू में देश के ख़िलाफ हुई नारेबाजी और अफजल गुरू की बरसी पर सांस्कृतिक कार्यक्रम को पाकिस्तानी आतंकवादी हाफ़िज सईद का समर्थन है! मकबूल भट्ट, अफजल गुरु मामले पर राजनीति और देश को देशभक्ति और देशद्रोह के नाम पर लामबंद करना संघ और बीजेपी की चुनावी रणनीति के लिए भले मुफीद हो, स्वतंत्र चेता नागरिकों के लिए यह खतरे की घंटी है. यदि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में बहस-मुबाहिसा की संस्कृति पर हमला हो रहा है तो यकीन मानिए कि देश में विरोध-प्रतिरोध के ताने-बाने का शीराज़ा बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. देश की राजधानी के एक कोर्ट परिसर में पत्रकारों, शिक्षकों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर भारत माता की जय के नारे लगाते वकील और बीजेपी नेता के हमले होते रहे और पुलिस मुँह देखती रह जाए तो इसे हम एक शुरुआती झलक मान सकते हैं.
हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर जेएनयू तक संघ और उसके छात्र संगठन का modus oprendi एक जैसा है. पहले एबीवीपी किसी अन्य छात्र समूह के तय कार्यक्रम को वाइस चांसलर (जो संघ परिवार के नजदीक होते हैं) से रुकवाते हैं. छात्र समूहों में झड़प होती है.निठल्ला बैठा भाजपा का कोई सांसद पुलिस और शिक्षा मंत्री को शिकायत करता है. पुलिस निर्दोष को पकड़ती है. यह एक तरह से सरकार के हिटलरी फरमान को अमलीजामा पहनाने जैसा है.
नागार्जुन ने इसी तरह के माहौल को देख कर लिखा था:
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
बाल ना बांका कर सकी शासन की बंदूक

( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)