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Monday, June 07, 2021

लोकतंत्र में सरकार और मीडिया के आपसी रिश्ते

आर्टिकल 14 वेबसाइट के एक डेटाबेस के मुताबिक वर्ष 2010 से 2020 तक करीब 10938 लोगों पर राजद्रोह के आरोप लगे उनमें जो 65 प्रतिशत मामले वर्ष 2014 के बाद प्रकाश में आए हैं. जिन 405 लोगों पर वर्ष 2014 के बाद केस दर्ज हुए उन पर सरकार और राजनेताओं की आलोचना’ की वजह से राजद्रोह का आरोप था.

ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर राजद्रोह का मामला सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए जो टिप्पणी की है वह महत्वपूर्ण है. अपने यूट्यूब चैनल में पिछले साल कोरोना महामारी के दौरान मोदी सरकार पर किए गए कुछ टिप्पणियों के लिए शिमलाहिमाचल प्रदेश में उनके खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज किया गया था. उन्होंने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. मीडियाकर्मियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बोलने की आजादी पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि हर पत्रकार को केदारनाथ सिंह फैसले के तहत सरंक्षण मिला है.’  भारतीय दंड विधान (आईपीसी) में शामिल देशद्रोह की धारा के तहत केस दर्ज करने के बढ़ते मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इसी हफ्ते सोमवार को कहा था कि ‘राजद्रोह की सीमा को परिभाषित करने का समय आ गया है. उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश के दो तेलुगु चैनलों के खिलाफ राजद्रोह को लेकर दंडात्मक कार्रवाई करने पर रोक लगा दी थी. इन चैनलों पर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के बागी सांसद के रघु राम कृष्ण राजू के आपत्तिजनक भाषण का प्रसारण करने का आरोप था.

चर्चित केदारनाथ सिंह फैसले (1962) के तहत सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया था कि लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलने के लिए सरकार की आलोचना बेहद जरूरी है. अदालत ने कहा था कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर  टिप्पणी करने से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता. साथ ही जब तक हिंसा फैलाने की मंशा या हिंसा बढ़ाने का तत्व मौजूद नहीं हो वक्तव्य को राजद्रोह नहीं माना जा सकता. हालांकि इस फैसले के बाद भी विभिन्न सरकारों के द्वारा पत्रकारोंएक्टिविस्टों पर राजद्रोह के मुकदमे दर्ज होते रहे हैं. असल में आजादी के बाद ब्रिटिश राज के दौर में बने इस कानून की प्राथमिकता खत्म हो जानी चाहिए थी. महात्मा गाँधी ने नागरिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाले कानूनों में आईपीसी के 124 ए को ‘राजकुमार’ (प्रिंस) कहा था. भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए के मुताबिक जब कोई व्यक्ति बोले गए या लिखित शब्दोंसंकेतों या दृश्य प्रस्तुति द्वारा या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति किसी तरह से घृणा या अवमानना या उत्तेजित करने का प्रयास करता हैअसंतोष (Disaffection) उत्पन्न करता है या करने का प्रयत्न करेगा वह राजद्रोह का आरोपी है.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 में नेटवर्क 18 को दिए एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा थामीडिया अपना काम करता है वह करता रहे और मेरा यह स्पष्ट मत है कि सरकारों कीसरकार के काम-काज का कठोर से कठोर एनालिसिस  होना चाहिए क्रिटिसिज्म होना चाहिएवरना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता है.

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका वॉचडॉग (पहरुए) की है. पर हाल के वर्षों में सरकार की आलोचना को बर्दाश्त न करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. और यह सोशल मीडिया पर भी खूब दिखाई देता है. सरकार के समर्थक और ट्रोल उस पत्रकार या संस्थान के पीछे पड़ जाते हैं जो सरकार की आलोचना करते हैं. कई बार यह धमकी या प्रताड़ना की शक्ल में सामने आता है. ऐसा नहीं है कि यह प्रवृत्ति महज भारत की है. हाल ही में पाकिस्तान में भी प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले बढ़े हैं. पर वहाँ यह दबाव सेना और आईएसआई जैसी संस्थाओं के कारण ज्यादा है. जाहिर है सरकार की मिली-भगत भी इसमें है.

किसी भी लोकतंत्र में सरकार और मीडिया के आपसी रिश्ते प्रतिद्वंदी की नहीं होनी चाहिए. मीडिया सरकार के काम-कामनीतियों और संदेश को नागरिकों तक लेकर जाती है. भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद मीडिया के मार्फत सार्वजनिक बहस-मुबाहिसावाद-विवाद-संवाद की संभावना बढ़ी है. हालांकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दशक में फेक न्यूजमनगढंत खबरों से बहस-मुबाहिसा का जो दायरा फैला है उसे संकुचित करने की कोशिश भी हुई है.

जहाँ विकसित देशों में प्रिंट मीडिया में वृद्धि ढलान पर है वहीं भारत के भाषाई प्रेस में वृद्दि देखी गई है. सैकड़ों टेलीविजन चैनल और ऑनलाइन वेबसाइट उभरे हैं. इसने देशज राजनीति (वर्नाकुलर पॉलिटिक्स) को सुदृढ़ किया है मीडिया के इस पक्ष की चर्चा कम की जाती है. साथ ही मीडिया ने राजनीतिक संचारचुनावों के दौरान राजनीतिक लामबंदी  और राजनेताओं के छवि निर्माण में पिछले दो दशकों में टेलीविजन और ऑनलाइन ने एक बड़ी भूमिका अदा की है. 

(नेटवर्क न्यूज18 हिंदी में प्रकाशित, 6 जून 2021)

 

Monday, July 24, 2017

कुलपति जी, आपका टैंक एक मजबूत वाहन है लेकिन...


आर्मी टैंक, बख्तरबंद गाड़ियों की ज़रूरत युद्धभूमियों में होती है. एक विश्वविद्यालय में उसकी क्या जरूरत?
पर देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश कुमार की माने तो उन्हें कैंपस में एक टैंक चाहिए. ताकि जवानों की शहादत छात्रों के मन में हमेशा बनी रहे. और उन्होंने भारत सरकार के मंत्रियों से सेना के टैंक दिलवाने की गुज़ारिश की है. ये मंत्री रविवार को कारगिल विजय दिवस मनाने जेएनयू में मौजूद थे.
भले ही जेएनयू की स्थापना के 47 वर्ष से ऊपर हो गए हो कुछ साल पहले तक जेएनयू ‘दिल्ली में होकर भी दिल्ली से अलहदा’ था. विश्वविद्यालय की चर्चा पठन-पाठन और छात्र राजनीति की सरगर्मियों के संदर्भ में होती थी, लेकिन पिछले तीन वर्षों से जबसे केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ जेएनयू की चर्चा अध्ययन-अध्यापन के प्रसंग में कम देशप्रेम, राजद्रोह की वजह से ज्यादा हो रही है. इसमें मीडिया के एक हिस्से की भी बड़ी भूमिका रही है.
पिछले साल फरवरी में जब जेएनयू के अंदर तथाकथित कुछ लोगों ने देश के खिलाफ नारे लगाए तब पहली बार प्रशासन की तरफ से छात्रों को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने के लिए टैंक की मांग उठी थी.
यह किसी से छिपा नहीं है कि मौजूदा सरकार और संघ से जुड़े कुछ लोगों की आँखों में जेएनयू एक किरकिरी की तरह है.
फरवरी 2016 की घटना से पहले संघ का मुखपत्र ‘पांचजन्य’ अपनी कवर स्टोरी में जेएनयू को ‘दरार का गढ़’ कह चुका था. वह कैंपस को हिंदू विरोधी, देश विरोधी करार दिया था. पर इस घटना के करीब डेढ़ साल बाद भी पुलिस आरोपियों के खिलाफ़ अभी तक चार्जशीट फाइल नहीं कर सकी है और दोषियों को पकड़ नहीं पाई है. हालांकि इस घटना के तुरंत बाद राजद्रोह (Sedition) के आरोप में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और दो अन्य छात्रों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था, फिलहाल वे जमानत पर हैं.
फरवरी की घटना के बाद जेएनयू के छात्रों-प्रोफेसरों ने खुले मंच पर राष्ट्रवाद की अवधारणाओं पर एक लेक्चर सिरीज का आयोजन किया था जो यू ट्यूब जैसे सोशल मीडिया पर मौजूद है और अब एक मुकम्मल किताब की शक्ल में है (What the Nation Really Needs to Know: The JNU Nationalism Lectures). इस तरह का रचनात्मक हस्तक्षेप जेएनयू को विशिष्ट बनाता रहा है.
सवाल है कि जेएनयू जैसी स्वायत्त संस्थान में, जिसकी प्रतिष्ठा देश-विदेश में है, एक वीसी को राष्ट्रवाद की शिक्षा देने के लिए टैंक जैसे प्रतीकों के इस्तेमाल की जरूरत क्यों पड़ी? जाहिर है, देश में राष्ट्रवाद, देशभक्ति, राजद्रोह के इर्द-गिर्द जिस तरह का विमर्श इन दिनों चलाया जा रहा है. जगदीश कुमार जैसे वीसी चाहे-अनचाहे एक मोहरे के रूप में नज़र आते हैं.
जेएनयू एक उच्च अध्ययन संस्थान का केंद्र है जहाँ ज्ञान के उत्पादन पर हमेशा जोर रहा है. सवाल करने और सत्य की खोज की प्रवृत्ति को हमेशा बढ़ावा दिया जाता रहा है.
प्रतिरोध की संस्कृति और समाज के हाशिए के लोगों के प्रति संवदेनशीलता जेएनयू की पहचान रही है. पुराने छात्र याद करते हैं कि किस तरह जेएनयू के पहले वीसी जी पार्थसारथी और रेक्टर मूनिस रज़ा ने जेएनयू में वाद-विवाद की संस्कृति के निर्माण में एक बड़ी भूमिका निभाई थी.
और इस वजह से वाम रुझानों की बावजूद जेएनयू एक लोकतांत्रिक स्पेस के रूप में उभरा जहाँ विभिन्न मत, विचारधारा के लोगों के लिए हमेशा जगह रही है. लेकिन ऐसा लगता है कि केंद्र में भाजपा सरकार इसे एक ख़ास विचारधारा के रंग में रंगना चाहती है जो किसी भी विश्वविद्यालय के लिए सही नहीं है. सच तो यह है कि इस तरह की सोच विश्वविद्यालय की अवधारणा पर ही सवालिया निशान लगाती है.
कल दिन में मैं एक प्रोफेसर से मिलने जेएनयू गया था. लाइब्रेरी के पीछे, गोपालन कैंटिन के पास एक किताब गाड़ी दिखी. मन ख़ुश हो गया.
मन में सोचा कि वीसी जगदीश कुमार के प्रस्तावित टैंक, बख्तरबंद पर ये गाड़ी जब तक जेएनयू में घूमती रहेगी भारी पड़ेगी. जैसा कि ब्रेख्त ने लिखा है: जनरल, तुम्हारा टैंक एक मजबूत वाहन है/ वह मटियामेट कर डालता है जंगल को/ और रौंद डालता है सैकड़ों आदमियों को/ लेकिन उसमें एक नुक्स है/ उसे एक ड्राइवर चाहिए.../जनरल आदमी बहुत उपयोगी होता है/ वह उड़ सकता है/ और हत्या भी कर सकता है/ लेकिन उसमें एक नुक्स है/ वह सोच सकता है.
वीसी जगदीश कुमार इस ‘सोच’ पर ताला लगाना चाहते हैं!
(राजस्थान पत्रिका वेबसाइट पर प्रकाशित, 24 जुलाई 2017)

Sunday, February 21, 2016

जेएनयू में बाल भी बांका न कर पाएगी शासन की बंदूक

 यह जेएनयू
नवल-नवेलियों का 
उन्मुक्त लीला-प्रांगण
यह जेएनयू
असल में कहा जाए तो कह ही  डालूँ
बड़ी अच्छी है यह जगह
बहुत ही अच्छी
और क्या कहूँ…
सोचता हूँ मैं भी ले लूँ दाखिला
‘टिब्बेटियन’ लेने पर क्यों कोई एतराज करेगा
डाक्टर विमला प्रसाद
डाक्टर नामवर…
डाक्टर मुजीब…
ये सब तो रिकमेंड करेंगे ही
तब नए सिरे से
उपनयन संस्कार होगा मेरा
छात्रावास में कमरा मिल ही जाएगा
वृत्ति की व्यवस्था तो होगी ही
शाबाश! बेटा अर्जुन नागा
सोचता ही जा रहा हूँ
आखिर क्या रखा है इसमें
दरअसल यह जगह है बड़ी शानदार
जे.एन.यू. जे.एन.यू. जे.एन.यू
जब मूल बांगला में बाबा नागार्जुन ने फरवरी 1978 में इस कविता को लिखा था तब आपातकाल की याद ताज़ा थी. एक तरह से यह जेएनयू के छात्रों के लिए उनकी तरफ से एक तोहफा था.
असल में, जेएनयू आपातकाल के दंश को झेल चुका था. पुलिस कई छात्रों को कैंपस से उठा ले गई थी. आपातकाल के दौरान जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष और वर्तमान में एनसीपी के सांसद देवी प्रसाद त्रिपाठी को मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया था.
फिर भी जेएनयू उस दौर में तानाशाही, अधिनायकवादी शासन के प्रतिरोध का केन्द्र बना रहा.
पिछले दिनों जेएनयू के वर्तमान छात्रसंघ के अध्यक्ष, सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ के नेता, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी और कैंपस में पुलिस की मौजूदगी ने जेएनयू के पुराने छात्रों और शिक्षकों को आपातकाल के दौर की याद दिला दी है. पिछले दिनों जब मैंने गंगा ढाबा पर दिल्ली पुलिस के कुछ जवानों को समोसे खाते और चाय पीते हुए देखा तो मेरे लिए यह आघात से कम नहीं था. इसी गंगा ढाबा के एक अंधेरे कोने में मैंने वर्षों रमाशंकर विद्रोही को अपनी ओजपूर्ण कविता गाते सुना है. मेधा पाटेकर को बहस करते देखा है. छात्रसंघ के प्रेसिडेंट डिबेट के दौरान झेलम लॉन से उमड़ती हुई भीड़ देखी है.

कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी और उन पर लगे देशद्रोह के आरोप से छात्रों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों में रोष है. पिछले दिनों से कैंपस के अंदर छात्रों और शिक्षकों का जिस तरह एकजुट होकर सरकार की इस कार्रवाई का शांतिपूर्ण विरोध हो रहा है वह जेएनयू के इतिहास में अभूतपूर्व है.
वर्षों से मीडिया में एक जुमला चलता रहा है कि जेएनयू वामपंथ का गढ़ है. यह सरासर झूठ है. जेएनयू किसी भी अन्य विश्वविद्यालय की तरह एक ऐसा लोकतांत्रिक स्पेस है जहाँ सभी विचारधारा, मत के लोग एक- साथ उठते-बैठते, पढ़ते-लिखते, बहस-मुबाहिसा करते रहते हैं. जहाँ विरोध, प्रतिरोध (dissent) को सामंती मानसिकता के तहत अन्य विश्वविदयालयों में तौहीन माना जाता है, वहीं जेएनयू को शुरु से स्वीकार्य है. मेरे गुरु पुरुषोत्तम अग्रवाल एक संस्मरण का जिक्र अक्सर करते रहते थे कि जब वे छात्र नेता थे तब अपने गुरु नामवर सिंह से उलझते रहते थे. पर उनसे पढ़ना और सीखना जारी रहा. इसी तरह हाल ही में रोमिला थापर ने एक इंटरव्यू में माना है कि कई बार छात्रों ने उनका घेराव किया पर पुलिस बुलाने की नौबत कभी नहीं आई. आपसी बातचीत से सारे मसले सुलझाए जाते रहे.
इंदिरा गाँधी जब 1980 के दौरान विश्वविद्यलय में आई तो उन्हें भी विरोध झेलना पड़ा था और मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री के रूप में कैंपस में आए तो उनका भी स्वागत विरोध से हुआ. लेकिन हिंसा कैंपस के लिए आज भी अनसुनी चीज है.
यहां का लोकतांत्रिक माहौल बनाने में वाद-विवाद और बहस-मुबाहिसों का बड़ा योगदान है. प्रश्न करने की प्रवृति और वाद-विवाद की संस्कृति यहाँ महज कक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देर तक होने वाली पब्लिक मीटिगों और ढाबा तक फैली हुई है.
छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के रिश्ते एक खुलेपने को दर्शाते हैं. इनके आवास को एक–दूसरे के करीब बनाया गया है ताकि एक स्वस्थ, सामुदायिक नाता विकसित हो.
छात्र संघ चुनाव के दौरान वामपंथी पार्टियों की बढ़त शुरू से रही है, पर फ्री थिंकर्स, समाजवादी, राष्ट्रवादी, संघियों की मौजूदगी भी यहाँ रही है. छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष आनंद कुमार ने एसएफआई के नेता प्रकाश करात को हराया था. वे उस वक्त समाजवादी विचारधारा से प्रेरित थे. बाद में एबीवीपी और एनएसयूआई के छात्र नेता भी छात्र संघ के अध्यक्ष बने. कम लोगों को पता है कि वर्षों से जेएनयू के अंदर संघ की शाखा लगती रही है, जिसमें संघ की विचारधारा को मानने वाले छात्र और शिक्षक हिस्सा लेते रहे हैं. पिछले 15 वर्षों से कैंपस के अंदर दुर्गापूजा धूमधाम से मनाई जाती रही है और पिछले कुछ साल में महिषासुर की भी पूजा शुरु हो गई है.
मीडिया, खास तौर से भाषाई और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जो राज्य-सत्ता की विचारधारा से पोषित रहा है और जिसे सत्ता से सवाल करने से परहेज रहा है, वह जेएनयू को एक ख़ास चश्मे से देखता रहा है. यह वही चश्मा है जो एक दौर में संघ के नेता प्रवीण तोगड़िया पहनते थे (आज कल चंदन मित्रा पहन रहे हैं). उन्होंने भी पिछले दशक में कई बार जेएनयू बंद करने के सपने देखे थे! पता नहीं आज कल वे किस जहां में हैं.

पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में प्रिंट मीडिया की बड़ी भूमिका रही है. वहीं फिलहाल भारत में कुछ खबरिया चैनल अंधराष्ट्रवाद को हवा दे रहा है. कोर्ट में कन्हैया की पेशी के समय जिस तरह से संघी गुंडों ने वकीलों के साथ मिल कर पत्रकारों, जेएनयू के शिक्षकों-छात्रोंको पीटा है, वह अंधराष्ट्रवाद की भयावह परिणति है.
बहरहाल, जेएनयू कोई टापू नहीं है. इसी देश, समाज का हिस्सा है. जाहिर है, उग्र विचार वाले, देश, राष्ट्र के मुद्दे पर लीक से हट कर सवाल करने वाले भी कुछ लोग हमेशा वहाँ मौजूद रहे हैं. विरोधियों के लिए, चाहे वे मुट्ठी भर ही क्यों नहीं हो, जेएनयू की परंपरा में हमेशा से जगह रही है. यदि बीजेपी-संघ के समर्थक एबीवीपी जैसे संगठन मोदी-शाह, प्रशासन के दम पर उन्हें चुप कराने पर आमादा हैं तो यह उनकी हार है. जेएनयू एक विचार है- लोकतांत्रिकता, स्वंतत्रता और बंधुत्व का.
असल में, मोदी सरकार अपने लगभग दो साल के कार्यकाल में सबसे कठिन घड़ी में है. रोहित वेमुला की दुखद मौत से पूरे देश के छात्रों में आक्रोश है. अर्थव्यस्था में उछाल के आंकड़ो (जीडीपी 7.6) पर पिंक पेपर में सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं. पठानकोट पर आंतकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ संबंध सुधार की कोशिशें सफल होती दिख नहीं रही. ओआरओपी को लेकर अभी तक सरकार अस्पष्ट है, फलत: सैनिकों में रोष है. जीएसटी बिल रुका पड़ा है, लेबर रिफार्म हो नहीं रहा. कारोबारी नाख़ुश हैं. राज्यों के साथ संबंध में केंद्र की नीति कैसी है, यह अरुणाचल प्रदेश के संकट से साफ ज़ाहिर है. ऐसे में सरकार और उनके मंत्री राष्ट्रवाद, देश भक्ति, देश द्रोह का आजमाया राग अलाप रहे हैं.
क्या ये अनायास है कि पहले संघ का मुख्यपत्र ‘पांचजन्य’अपनी कवर स्टोरी में जेएनयू को ‘दरार का गढ़’ कहता है. कैंपस को हिंदू विरोधी, देश विरोधी मानता है. पुलिस बिना किसी ठोस सबूत के कन्हैया कुमार को देशद्रोह के कानून में हिरासत में लेती है. जबकि फली नारीमन, सोली सोराबजी जैसे देश के जाने-माने न्यायविदों का मानना है कि देश के विरोध में महज लगाए गए नारे देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आते और उन पर देश द्रोह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
आश्चर्य है कि एक ‘फेक ट्वीट’ के आधार पर देश के गृहमंत्री कहते हैं कि जेएनयू में देश के ख़िलाफ हुई नारेबाजी और अफजल गुरू की बरसी पर सांस्कृतिक कार्यक्रम को पाकिस्तानी आतंकवादी हाफ़िज सईद का समर्थन है! मकबूल भट्ट, अफजल गुरु मामले पर राजनीति और देश को देशभक्ति और देशद्रोह के नाम पर लामबंद करना संघ और बीजेपी की चुनावी रणनीति के लिए भले मुफीद हो, स्वतंत्र चेता नागरिकों के लिए यह खतरे की घंटी है. यदि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में बहस-मुबाहिसा की संस्कृति पर हमला हो रहा है तो यकीन मानिए कि देश में विरोध-प्रतिरोध के ताने-बाने का शीराज़ा बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. देश की राजधानी के एक कोर्ट परिसर में पत्रकारों, शिक्षकों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर भारत माता की जय के नारे लगाते वकील और बीजेपी नेता के हमले होते रहे और पुलिस मुँह देखती रह जाए तो इसे हम एक शुरुआती झलक मान सकते हैं.
हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर जेएनयू तक संघ और उसके छात्र संगठन का modus oprendi एक जैसा है. पहले एबीवीपी किसी अन्य छात्र समूह के तय कार्यक्रम को वाइस चांसलर (जो संघ परिवार के नजदीक होते हैं) से रुकवाते हैं. छात्र समूहों में झड़प होती है.निठल्ला बैठा भाजपा का कोई सांसद पुलिस और शिक्षा मंत्री को शिकायत करता है. पुलिस निर्दोष को पकड़ती है. यह एक तरह से सरकार के हिटलरी फरमान को अमलीजामा पहनाने जैसा है.
नागार्जुन ने इसी तरह के माहौल को देख कर लिखा था:
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
बाल ना बांका कर सकी शासन की बंदूक

( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)