पचासी वर्षीय मराठी के चर्चित नाटककार महेश एलकुंचवार ने विजय तेंदुलकर (1928-2008) और सतीश आलेकर के साथ मिलकर मराठी रंगकर्म को नई रंगभाषा और मुहावरे दिए हैं. यदि इन तीनों नाटककारों की तुलना पारसी रंगमंच के राधेश्याम कथावाचक, नारायण प्रसाद बेताब और आगा हश्र कश्मीरी से की जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इन नाटककारों ने पारंपरिक, महाकाव्य को आधार बना कर किए जाने वाले म्यूजिकल नाटकों से अलग सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से मराठी रंगकर्म को जोड़ा. जिसका असर भारतीय रंगमंच पर गहरा पड़ा.
Sunday, June 01, 2025
महेश एलकुंचवार की रंग यात्रा
पचासी वर्षीय मराठी के चर्चित नाटककार महेश एलकुंचवार ने विजय तेंदुलकर (1928-2008) और सतीश आलेकर के साथ मिलकर मराठी रंगकर्म को नई रंगभाषा और मुहावरे दिए हैं. यदि इन तीनों नाटककारों की तुलना पारसी रंगमंच के राधेश्याम कथावाचक, नारायण प्रसाद बेताब और आगा हश्र कश्मीरी से की जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इन नाटककारों ने पारंपरिक, महाकाव्य को आधार बना कर किए जाने वाले म्यूजिकल नाटकों से अलग सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से मराठी रंगकर्म को जोड़ा. जिसका असर भारतीय रंगमंच पर गहरा पड़ा.
Sunday, October 10, 2021
मन समंदर में उठती लहरें: कासव
(न्यूज 18 हिंदी के लिए)
Monday, May 17, 2021
द डिसाइपल: शास्त्रीय संगीत की बंदिशें
यह फिल्म शास्त्रीय संगीत के
बहाने कला की दुनिया में जो आत्म-संघर्ष है उसे रेखांकित करती है. सवाल है
कि इस फिल्म में ऐसा क्या है, जो इस फिल्म को विशिष्ट बनाता है. असल में, सहजता और साधरणता ही इस फिल्म की विशिष्टता है. फिल्म में कोई ड्रामा या
कहानी के स्तर पर कोई अनायास मोड़ नहीं है. फिल्म एक लय में चलती है, जिसे खूबसूरती से सिनेमैटोग्राफर माइकल सोबोचेंस्की ने कैद किया है. फिल्म
में ख्याल गायकी की कुछ प्रस्तुतियों को भी रखा गया है. एक कलाकार के आत्म-संशय और
आत्म-बोध को शरद के किरदार के रूप में आदित्य मोदक ने बेहतरीन ढंग से निभाया है.
वे खुद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित कलाकार हैं.
जैसा कि ‘द डिसाइपल’ नाम से स्पष्ट है, इस फिल्म में गुरु-शिष्य के
संबंध पर जोर है. शरद के गुरु (अरुण द्रविड़) अपनी संगीत साधना में रत रहते हैं.
वे ‘म्यूजिक कंसर्ट’ और
दुनिया जिसे ‘लोकप्रिय’ मानती
है, उससे दूर हैं. उनके अंदर अपने गुरु माई (सुमित्रा भावे)
की सीख हमेशा रहती है कि शास्त्रीय संगीत वर्षों की साधना और त्याग का फल है. और वही सीख शरद की चेतना का भी निर्माण करती है. पर इस
साधना में शरद के अंदर संशय और कुंठा का भाव जन्म लेता है.
फिल्म निर्माण की दृष्टि से यह
फिल्म तम्हाणे की पिछली चर्चित फिल्म ‘कोर्ट’ से कमतर नहीं है, हालांकि जब बात सामाजिक यथार्थ के निरूपण की हो तब ‘कोर्ट’ निस्संदेह उनकी उत्कृष्ट फिल्म थी. इस
फिल्म में गुरु-शिष्य परंपरा में जो अंतर्विरोध और विडंबना है उसे निर्देशक नहीं
छूता है. शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में भक्ति-भाव के आवरण में जो बंदिशें हैं,
उस पर यहाँ जोर नहीं है. गुरु के पाँव छूने और निस्वार्थ भाव से
सेवा करने में पीछे जो प्रवृत्ति है उसे खंगालने की जरूरत थी.
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की
परंपरा के केंद्र में सामंती और ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति रही है. एक जातिगत और
वर्गवादी दबदबा भी इसमें हमेशा रहा है. मशहूर शास्त्रीय संगीतकार और रेमन
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टीएम कृष्णा कर्नाटक संगीत में सामाजिक विस्तार और
समरसता की वकालत करते हैं, ताकि शास्त्रीय संगीत में वर्ग और जाति के वर्चस्व को तोड़ा जा सके.
समकालीन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी यह ज़रूरत है. यदि इस फिल्म में गुरु-शिष्य
परंपरा के बहाने इन बिंदुओं पर भी कैमरा की नजर जाती, तो
फिल्म हमारे समय के यथार्थ के ज्यादा करीब हो सकती थी.
(प्रभात खबर, 16.05.21)
Monday, April 27, 2015
निहत्थे और निरपराध का डर
इन्हीं दिनों दिल्ली के ‘फैंसी मॉल’ के चुनिंदा सिनेमा घरों में चैतन्य तम्हाणे निर्देशित राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ दिखाई जा रही है. फिल्म की कहानी मुंबई के एक गटर में एक सफाई कर्मचारी की मौत की ख़बर से शुरु होती है. पुलिस का मानना है कि सफाई कर्मचारी को एक दलित कवि-कार्यकर्ता, नारायण कांबले, के क्रांतिकारी गीत से उकसावा मिला था और यह एक आत्महत्या का मामला है. कवि-कार्यकर्ता के ऊपर मुकदमा चलता है, उसे दोषी पाया जाता है और गिरफ्तार कर लिया जाता है. और हम कोर्ट में दी गई दलील और बहस-मुबाहिसे के एक अंतहीन प्रक्रिया से रू-ब-रू होते हैं. गरीब, मज़लूम जनता के प्रतिनिधि दलित कवि-कार्यकर्ता की आवाज़, सफाई कर्मचारी के हक, समाज के हाशिए पर रहने वाले समूहों के जीने के अधिकार और न्याय के सवाल पृष्ठभूमि में ही रह जाते हैं.




