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Monday, October 16, 2017

विद्यापति का प्रासंगिक होना

मेरी मां हमारे बचपन में हमेशा एक गीत गाती थीं, ‘पिया मोरा बालक हम तरुणी गे…’. विद्यापति के लिखे इस गीत का अर्थ मुझे काफी बाद में समझ में आया, जब मैं कुछ बड़ा हुआ और पढ़ने-लिखने लगा. इस गीत की अगली पंक्ति है, ‘कोन तप चूकलहूं भेलहूं जननी गे.हे विधाता, तपस्या में कौन-सी चूक हो गई कि स्त्री होकर जन्म लेना पड़ा. विद्यापति की यह पूरी कविता बेमेल विवाह के विद्रूप को तत्कालीन सामाजिक विडंबनाओं के साथ उजागर करती है. ध्यान रखिए कि मैथिली के कवि और संस्कृत के विद्वान विद्यापति यह बात चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में कह रहे थे यानी अब से छह-सात सौ साल पहले. बाद में जाकर तुलसीदास ने लिखा, ‘कत विधि सृजी नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं.औपनिवेशिक विमर्शकारों की नजर से देशज आधुनिकताका यह स्वर हमेशा चूक जाता रहा है. देशी, लोक भाषाओं में स्त्रियों की वेदना, पीड़ा और आकांक्षा का इस कदर चित्रण करने वाले उस दौर में गिने-चुने स्वर सुनाई पड़ते हैं.
बहरहाल, वैसे तो पूरे भारतीय समाज में आज भी स्त्री होकरजन्म लेना किसी पीड़ा से कम नहीं, मगर मैथिल समाज के लिए विद्यापति के शब्द आज भी उतने ही सच हैं जितने छह-सात सौ वर्ष पहले थे. इसी तरह हिंदी और मैथिली के कवि नागार्जुन ने पिछली सदी में मैथिल स्त्रियों की सामाजिक दशा और पराधीनता को चित्रित करने के लिए एक रूपक बांधा था. तालाब की मछलियां. मैथिल स्त्रियां तालाब की मछलियां हंै जिनका काम लोगों (पुरुषों) की उदर-पिपासा शांत करना है.कहने वाले कहेंगे, ऐसा नहीं है. चीजें बदली हैं. लड़कियां भी खूब पढ़-लिख कर आगे बढ़ रही हैं. बिलकुल बढ़ रही है, देश-विदेश घूम रही हैं. मगर देखिए कि बहुसंख्यक स्त्रियों के लिए आसपास कितने ऐसे साधन या माध्यम हैं जहां उनकी भावनाओं, विचारों और स्वातंत्र्यबोध का सम्मान होता है? खासकर जब बात शादी की होती है, तब यह बोध और भी गहरे उजागर होता है. ज्यादातर मामलों में शादी अरेंजही होती है, जिसमें लड़कियों की सहमति-असहमति का कोई मोल नहीं होता.
अब भी पुरुष ही लड़कियों को देखते हैं; यह देखना ही अपने आप में बुरा है, मैं मिलनाशब्द का इस्तेमाल पसंद करता हूं? क्यों भाई? आपको भी कोई देख सकता है? ऐसा क्या है आप में? कुछ लाख कमा रहे हैं, बस, है पुरुषार्थ आप में, जो मां-बाप की किसी बात को नकार सकें? अपनी कह सकें? दहेज को अस्वीकार करने का है आप में सामर्थ्य?कुछ दिन पहले मूल रूप सेमिथिला की रहने वाली, दिल्ली से पढ़ी-लिखी एक लड़की की शादी की बातचीत हैदराबाद में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे एक लड़के से चली. लड़के के माता-पिता और खुद लड़के ने लड़की से मिलने की इच्छा जाहिर की. और बातचीत के बाद रिंग सेरेमनी वगैरह हो गई. इस रिंग सेरेमनी के दो महीने के बाद एक दिन उस लड़के ने लड़की से कहा कि वह शादी नहीं कर सकता क्योंकि वह शादी के लिए इच्छुक नहीं है. उसकी जबरदस्ती शादी करवाई जा रही है. वह दबाव में आकर मिलने आया था, वगैरह-वगैरह. फिर कहा कि उसका किसी लड़की के साथ दो साल अफेयर रहा, वह उस मोह से उबर नहीं पाया है. इस पर लड़की ने कहा, ठीक है. और शादी की बातचीत टूट गई. पर सवाल है कि क्या एक जवान, नौकरीपेशा युवक दुधमुंहा बच्चा है, कहां गई उसकी रीढ़? कहां गया उसका पुरुषार्थ?

मिथिला में पोथी-पतरा-पाग पर काफी जोर रहा है. पतरा और पाग से लोग अब भी चिपके हैं, पर पोथी को डबरा-चहबच्चा में डाल दिया है. प्रसंगवश विद्यापति ने संस्कृत में पुरुषपरीक्षानाम से एक किताब लिखी थी (इसका मैथिली और अंग्रेजी अनुवाद भी मौजूद है). इसमें चौवालीस कहानियों के माध्यम से एक आदर्श पुरुष के गुणों को पेश किया गया है. पौरुष या पुरुषार्थ पर संस्कृत में यह अपने ढंग की अनूठी किताब है. विद्यापति के दौर की राजनीतिक व्यवस्था के पितृसतात्मक पहलू को यह किताब सधे ढंग से उजागर करती है. आज स्त्री विमर्श के दौर में यह किताब काफी मौजूं है.विद्यापति शौर्य, विवेक, उत्साह, प्रतिभा, मेधा और विद्या के परिप्रेक्ष्य में पुरुष की कसौटी करते हैं. हमारे दौर में मध्यवर्ग के लिए पुरुषार्थ की कसौटी सिर्फ पैसा है. बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल करें तो पैकेज. पूंजीवादी समाज में आधुनिकता का यह बोध दरअसल एक छलावा है, जो ऊपरी चमक-दमक के बावजूद अंदर से खोखला है. इस आधुनिकता में नैतिकता और आचार-व्यवहार के लिए कोई जगह नहीं हैं और न ही पैसे से संचालित यह आधुनिकता-बोध न्याय (विद्यापति के शब्द नय) की ही सीख देता है. जब तक पुरुषों में न्याय-बोध नहीं आएगा, स्त्रियां पिसती रहेंगी और दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से विद्यापति का कहा प्रासंगिक बना रहेगा.

(जनसत्ता के 'दुनिया मेरे आगे' कॉलम में 16 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित)

Thursday, January 03, 2013

उदास मौसम के खिलाफ


मुनीरका के बस स्टैंड पर हमने कई दफे बसों का इंतजार किया है, बरसों तक. जेएनयू में पढ़ने-पढ़ानेवालों के लिए यह बस स्टैंड रात-देर रात जैसे एक उम्मीद का प्रतीक  रहा है. वह रात पारा मेडिकल की उस छात्रा के लिए भी उम्मीदों से भरी रही होगी, जब वह अपने मित्र के साथ घर जाने के लिए वहाँ बस का इंतजार कर रही थी... 

वहाँ से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर जेएनयू है. कैंपस के अंदर स्त्रियों की आजादी और उनके संघर्ष के नारे हमेशा से बुलंद रहे हैं. लेकिन एक लंबे अरसे के बाद कैंपस के बाहर सड़कों पर छात्र इस लड़ाई को लेकर उतरे. धीरे-धीरे दिल्ली और फिर मीडिया के मार्फत पूरे देश में यह लड़ाई फैली. भारत में सौ वर्ष से भी ज्यादा पुराने स्त्री संघर्ष का इतिहास देश की राजनीतिक, सामाजिक, मजदूर और दलित आंदोलनों से जुड़ा रहा है और उससे जीवन शक्ति पाता रहा है. शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि एक छात्रा के साथ चलती बस में हुए जघन्य बलात्कार के खिलाफ रोष और आंदोलन में छात्रों ने अग्रणी भूमिका निभाई. बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के उन्होंने अपनी आवाज देश और देश के बाहर पहुँचाई. 

निस्संदेह मेनस्ट्रीम और न्यू मीडिया की इसमें भूमिका रेखांकित करने योग्य हैं. ऐसा नहीं है कि मीडिया में इससे पहले स्त्री विषयक खबरें नहीं होती थी. होती थीं, लेकिन उनमें एक किस्म की उदासीनता रहती थी. ज्यादातर खबरें खानापूर्ति के नाम पर ही अखबारों में या टेलीविजन चैनलों पर दिखाई जाती थी. लेकिन इस बार मीडिया ने कुछ अतिरेक को छोड़ कर संयम का परिचय दिया. इसे लगातार सुर्खियों में बनाए रखा और आलाकमानों से जवाब-तलब किया.

इन दिनों मुझे बार-बार एक वॉल पोस्टर की याद आती रही जो जेएनयू में पढ़ने के दौरान अक्सर देखा करता था: "अंधेरे कमरों और बंद दरवाजों के बाहर सड़क परजुलूस में और युद्ध में तुम्हारे होने के दिन आ गए हैं…"


बहरहाल, जेएनयू के छात्र और शिक्षक संघ ने मिल कर बलात्कारियों को सजा दिलाने और स्त्रियों के खिलाफ हिंसा के विरोध में  जाते साल की आखिरी रात एक जुलूस और विरोध कार्यक्रम का आह्वान किया था.

जेएनयू में मेरे गुरु प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने नव वर्ष की पूर्व संध्या हमें खाने पर बुलाया था. पर दिन में उन्होंने फोन कर कहा कि 'मिठाई  या फल कुछ भी  लेके मत आना. हम बैठ कर बातें करेंगे और घर में जो भी चावल-दाल बना है, खाएँगें.

लेकिन केवल उनका मन दुखी नहीं था. पूरी दिल्ली की सड़कों पर नए साल के स्वागत का रौनक इस बार गायब थी. लोग गमगीन थे.

रात में जब जुलूस के लिए हम निकले तो जेएनयू की सड़कों पर चलते लड़के-लड़कियों की हुजूम को देख तलवार जी ने रीना को सुनाते हुए कहा- आज की रात लड़कियाँ अपने मित्रों, प्रेमियों को लेकर सड़कों पर उतरी है. यह संदेशा देने के लिए कि ये सड़क, दुनिया हमारी है और हम बेखौफ घूमेंगे!

बलात्कार की इस घटना ने समाज और मीडिया को एक साथ उद्वेलित किया है. भूमंडलीकरण के बाद समाज में जहाँ स्त्रियों के प्रति हिंसा बढ़ रही है, वहीं समाज का एक तबका स्त्रियों की दशा के प्रति ज्यादा मुखर और संवेदनशील हो रहा है. इसमें मीडिया, अपने अधिकारों को लेकर सचेत युवा पीढ़ी और नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) की खास भूमिका है.

साल के आखिरी उस उदास, सर्द रात में मुनीरका के खुले पार्क में छात्रों, शिक्षकों, नाटयकर्मियों, सांस्कृतिककर्मियों और आस-पड़ोस के लोगों की भीड़ से एक सरगर्मी थी. टेलीविजन चैनलों के ओबी वैन खड़े थे. रिपोर्टर अपने कैमरामैन के साथ इधर-उधर घूम रहे थे. 
 
हम लड़ेंगे साथी इस उदास मौसम के खिलाफ! उस रात यह नारा हवा में तैर रहा था. पाश ने लिखा है: हम लड़ेंगे/ कि लड़ें बगैर कुछ नहीं मिलता/ हम लड़ेंगे/ कि अब तक लड़ें क्यों नहीं/ अपनी सजा कबूलने कि लिए/ लड़ते हुए जो मर गए/ उनकी याद जिंदा रखने के लिए. 

अरावली की पहाड़ियों पर दिवंगत छात्रा की याद में जलती मोमबती अंधेरे में एक रौशनदान की तरह दिख रही थी. यह नई सुबह का आगाज था.

(जनसत्ता में समांतर स्तंके तहत 5 जनवरी 2013 को प्रकाशित)

Tuesday, May 04, 2010

प्रेम में पड़ी उस स्त्री से अपना नाता था...


संत आ गया है. दरख़्तों ने यहाँ पर हरियाली ओढ़ ली है. चिड़ियों की गूफ़्तगू हर तरफ़ सुनाई दे रही है. मेरे आँगन में टलहती, गोरैया सी दिखती, उस चिड़िया का क्या नाम है ?


आस-पड़ोस में, घरों के सामने लाल-पीले ट्यूलिप खिले हुए हैं. हल्की सी ठंड है, वासंती हवा की मादकता लिए हुए. लेकिन मेरे मन में कोई उत्कंठा नहीं है. पिछले कुछ दिनों से उदास हूँ. मन बहुत खिन्न है. कई बातें, कई यादें मन में उमड-घुमड़ रही है.


भाई-बहनों में सबसे छोटा हूँ, लेकिन नवआंगंतुकों को नाम देने की जिम्मेदारी सबने मेरे ऊपर डाल रखी है.


चौदह साल का था जब घर में चचेरी बहन आई. शिप्रा, क्षिप्रा नदी के नाम पर उसका नाम रखा...नदी की तरह बहेगी, सोचा.


फिर भाई-बहनों के घरों में परियों ने जन्म लिया. नाम रखा..अभिधा, लिपि...नव्या.


अपनी बेटी के लिए भी मैंने एक नाम सोच रखा है


निरुपमा ने क्या नाम सोचा होगा अपनी बेटी के लिए?


बचपन में माँ विद्यापति के लिखे गीत गाती थी...कोन तप चुकलहुं भेलहुं जननी गे.. (तपस्या में कौन सी चूक हो गई विधाता, जो स्त्री होके जन्म लेना पड़ा).


माँ, स्त्रीत्व एक उत्सव है यहाँ


निरुपमा को मैं नहीं जानता था. लेकिन प्रेम में पड़ी उस स्त्री से अपना नाता था...निरुपमा मैं बहुत उदास हूँ.


(चित्र में निरुपमा पाठक, युवा पत्रकार जिसकी पिछले दिनों कथित तौर पर परिजनों ने हत्या कर दी, क्योंकि वह एक विजातीय लड़के से प्रेम कर रही थी और उसके गर्भ में एक बच्चा पल रहा था)