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Saturday, March 13, 2021

मीडिया का मानचित्र


पिछले दशकों में सूचना की नयी तकनीकी से लैस भाषाई मीडिया, खास कर हिंदी अखबार, टेलीविजन, ऑनलाइन वेबसाइट ने शहरी केंद्रों से परे दूर-दराज के इलाकों तक नेटवर्क का अप्रत्याशित विस्तार किया है। निस्संदेह, सार्वजनिक दुनिया में मास मीडिया ने बहस-मुबाहिसा को गति दी है और लोकतांत्रिक समाज का सपना भी बुना है। लेकिन सच यह भी इन्हीं वर्षों में फेक न्यूजऔर दुष्प्रचार का एक ऐसा तंत्र खड़ा हुआ है, जिसकी चपेट में डिजिटल मीडिया के साथ-साथ अखबार और टेलीविजन भी आ गए, जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन कर उपस्थित हैं।

समकालीन मीडिया परिदृश्य पर सोशल मीडिया और टेलीविजन हावी हैं, हालांकि कोरोना महामारी के बीच समाचार पत्र जैसे पारंपरिक माध्यम की अहमियत फिर से बढ़ी है। पर सवाल है कि इक्कीसवीं सदी में हिंदी के अखबारों की प्रमुख प्रवृत्तियाँ क्या हैं? क्या ऑनलाइन वेबसाइट अखबारों के पूरक बन कर उभरी हैं या ये टीवी समाचार चैनलों के करीब हैं? समाचार चैनल सच दिखाने और  सत्ता से सच बोलने की हमेशा बात करते हैं। उग्र राष्ट्रवाद के इस दौर में क्या तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर इनका जोर है?  क्या इनकी जवाबदेही नागरिक समाज के प्रति है? सवाल यह भी है कि आज का पाठक/दर्शक खुद को मीडिया के पूरे परिदृश्य में कहाँ खड़ा पाता है

शोध और न्यूज रूम के अपने अनुभवों के आधार पर लेखक ने इस किताब में समकालीन हिंदी मीडिया के सरोकारों और संस्कृतियों का भाषा और कथ्य के मार्फत आलोचनात्मक विवेचन और विश्लेषण किया है। 

समकालीन समाज और मीडिया में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह एक जरूरी किताब है।

प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, ISBN: 978-81-951105-1-3 (PB)

कीमत: 250 रुपए

अमेजन लिंक: https://www.amazon.in/dp/B0919XNV1F?ref=myi_title_dp


(किताब 25 मार्च, 2021 के करीब प्रकाशित होगी)

Thursday, November 08, 2018

बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स

मेरी किताब बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स' की प्री बुकिंग हो रही है।  अमेज़न से आप ख़रीद सकते हैं। किताब अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से छपी है।

https://www.amazon.in/dp/B07K3CDC5J

किताब के बारे में: 


यह किताब वैचारिक लेखन में बहुआयामी है। लेखक की संवेदनशील दृष्टि, विषय-वस्तु का दायरा, मार्मिक अंदाज़ और सहज भाषा एक अलग आस्वाद लिए है जिसे लेखन की किसी एक विधा में अंटाया नहीं जा सकता।

संकलित लेखों में निजीपन, व्यक्ति विशेष, लोक-शहर के प्रति अनुराग एकाधिक बार है। लंदन, पेरिस, वियना, शंघाई, कोलंबो, दिल्ली, बंगलुरु, पुणे, श्रीनगर के साथ-साथ मैकलोडगंज, मगध, मिथिला व बेलारही, तिलोनिया, तरौनी जैसे गाँव भी हैं। जेएनयू और जिगन विश्वविद्यालय भी है। ग्लोबलऔर लोकलकी इस घुमक्कड़ी में जहाँ कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही। समंदर की आवाज़ के साथ-साथ डबरा, चहबच्चा की अनुगूंज भी है। होटल-रेस्तरां के साथ-साथ ढाबा भी।

इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज़ है। उदारीकरण के बाद अख़बार के पन्नों पर फैली ख़ुश ख़बरहै। न्यूज़रूम नेशनलिज्मकी आहट भी। बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का शोक गीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की ख़ुशबू एक तरफ़ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ़।

उदास गिरगिट से बात करता हुआ एक विद्रोही कवि है। हाथ पकड़ कर सिखाने वाला एक कबीरा पत्रकार है। स्वभाव के विपरीत नहीं जाने की सलाह देने वाला एक फक्कड़ फ़िल्मकार भी। एक तरफ़ नॉस्टेल्जिया, स्मृति और विस्मृति के गह्वर हैं, दूसरी तरफ़ वर्तमान का यथार्थ है और भविष्य के रोशनदान भी।

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में, 21वीं सदी के दो दशकों के बीच, लिखे गए इन लेखों में एक पत्रकार और शोधार्थी का साझा अनुभव है। वादी स्वर एक ब्लॉगर का है। शैली-मैंऔर टोका-टोकीकी है।

किताब अंश: 

https://satyagrah.scroll.in/article/122229/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-writer-arvind-das

https://www.thelallantop.com/bherant/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-by-arvind-das/

https://www.jankipul.com/2018/11/special-write-up-on-baba-nagarjun.html