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Sunday, March 12, 2023

ऑस्कर में भारत की दावेदारी, कितनी उम्मीद


सिनेमा जगत में ऑस्कर वाली शाम को लेकर एक बार फिर से हलचल है. 
रविवार (भारत में सोमवार की सुबह) को लॉस एंजेलिस में 95वें ऑस्कर पुरस्कारों की घोषणा होगी.

कयास लगाए जा रहे हैं कि विज्ञान आधारित फंतासी को लेकर मानवीय रिश्तों के इर्द-गिर्द बनी एबसर्ड कॉमेडी ड्रामा एवरीथिंग एवरीव्हेर आल एट वंस को बेस्ट फिल्म का पुरस्कार मिलेगा  या ट्रेजिक कॉमेडी द बंशीज ऑफ इनिशरिन को? ‘द बंशीज ऑफ इनिशरिन में जिस तरह से कहानी बुनी गई है  वह देखने वालों को आकर्षित करती है. इस फिल्म में रचनात्मकता को लेकर जो आत्महंता आस्था दिखाई देती है, अचंभित भी करता है. इस फिल्म में कलाकारों के अभिनय की उत्कृष्टता विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिन्हें विभिन्न वर्गों में नामांकन मिला है.  इस फिल्म के निर्देशक मार्टिन मेकडनाह को भी बेस्ट डाइरेक्टर के लिए नामित किया गया है. वहीं एवरीथिंग एवरीव्हेर आल एट वंस’ को सबसे ज्यादा विभिन्न श्रेणियों में नामित किया गया है. इस फिल्म के निर्देशक डैनियल क्वान और डैनियल शाइनर्ट के साथ फिल्म की अभिनेत्री मिशेल योह की चर्चा है. योह को बेस्ट एक्ट्रेस के लिए नॉमिनेशन मिला है. उल्लेखनीय है कि मलेशिया मूल की चर्चित अभिनेत्री योह पहली एशियाई अभिनेत्री है जिसे ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया है.

ऑस्कर पुरस्कारों पर बहुलता की अनदेखी करने और नस्लवाद का आरोप दशकों से लगता रहा है. पिछले वर्षों में सदस्यों में स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की भागेदारी बढ़ी है फिर भी इनमें अधिकांश श्वेत पुरुष ही है. क्या योह इतिहास रचने में कामयाब होगी? प्रसंगवश, उन्हें इस साल बेस्ट एक्ट्रेस के लिए गोल्डन ग्लोब पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है.

साल भर से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी युद्ध विरोधी फिल्म ऑल क्वाइट ऑन द वेस्टर्न फ्रंट की भी दावेदारी है. सवाल है कि क्या हम प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध से कोई सबक सीख पाए हैंयह फिल्म 'बेस्ट पिक्चर' और 'बेस्ट इंटरनेशनल फीचर' दोनों ही श्रेणी में नॉमिनेटेड है. दिग्गज निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की आत्मकथात्मक फिल्म द फेबलमैन्स की भी चर्चा है.

भारत में लोगों की दिलचस्पी के केंद्र में एसएस राजामौली की फिल्म आरआरआर’ का गाना नाटू-नाटू’  है जिसे म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की श्रेणी में नामित किया गया है. इसे बेस्ट पिक्चर के अंतिम दस में नामांकन नहीं मिल पाया था, हालांकि देश-विदेश में इसे काफी सराहना मिली है.

फीचर फिल्मों से अलग भारत की दो डॉक्यूमेंट्री फिल्में ऑल दैट ब्रीद्स’ और द एलीफेंट व्हिस्परर्सभी अंतिम पाँच में शामिल है. उम्मीद है कि डॉक्यूमेंट्री की श्रेणी में भारत को इस बार ऑस्कर मिलेगा. आश्चर्य है कि शौनक सेन निर्देशित डॉक्यूमेंट्री ऑल दैट ब्रीद्स को भारत में अभी तक रिलीज नहीं किया गया है, लेकिन दुनिया भर के फिल्म समारोहों में इसने खूब सुर्खियां बटोरी है. पिछले साल इस डॉक्यूमेंट्री को कान में बेस्ट डॉक्यूमेंट्री के लिए गोल्डेन आई’ पुरस्कार और सनडांस फिल्म समारोह में विश्व सिनेमा वृत्तचित्र श्रेणी में ग्रांड ज्यूरी पुरस्कार मिल चुका है. इस फिल्म में जिस तरह से बिंब और ध्वनि का इस्तेमाल किया गया है वहाँ फीचर और डॉक्यूमेंट्री को लेकर श्रेणीगत विभाजन मिट जाता है.

ऑल दैट ब्रीद्स एक साथ कई विषयों को खुद में समेटे है. दिल्ली में प्रदूषण की समस्या इसके केंद्र में है, वहीं वजीराबाद में रहने वाले दो मुस्लिम भाई (सऊद और नदीम) और उसके सहयोगी (सलीक) के सहारे यह वृत्तचित्र आगे बढ़ती है. पिछले बीस साल से आसमान से गिरते चीलों और अन्य घायल पक्षियों की देखभाल वे करते रहे हैं.  पृष्ठभूमि में नागरिकता कानून (सीएए) और दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों की अनुगूंज भी सुनाई पड़ती है. यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म जितना मानवीय संबंधों को चित्रित करती है उतना ही पर्यावरण के साथ हमारे रिश्ते को भी. धर्म के नाम पर विभेद की राजनीति भी बहसतलब है. दिल्ली की प्रदूषित हवा’ में न सिर्फ चील बल्कि इंसान भी घुट रहे हैं. यह सब मानव निर्मित है.

कुल एक घंटे छत्तीस मिनट की इस वृत्तचित्र में इंसान और आस-पास के जीव-जंतुओं के बीच जो एक बिरादरी’ का भाव है वह देखने वालों के मन को छू जाता है. आत्म और अन्य का विभेद यहाँ मिट जाता है. फिल्म के शुरुआत में ही चूहेचीलमेंढककुत्तेबिल्लीसूअर दिखाई देते हैं. चील की निरीह आँखे हमसे संवाद करती हुई प्रतीत होती है.

इसी तरह कार्तिकी गोंसाल्वेस की द एलीफेंट व्हिस्परर्स’ के केंद्र में एक हाथी (रघु) है. इसके इर्द-गिर्द हाथियों की देखभाल करने वाले बोम्मन और बेली के बीच पनपते हुए रिश्ते को हम देखते हैं. असल में बेहद संवेदनशीलता के साथ चालीस मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री में इंसान और जानवर के बीच लगाव को दिखाया गया है. साथ ही नीलगिरी का मनमोहक सौंदर्य भी यहाँ लिपटा हुआ चला आता है.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Friday, January 13, 2023

‘गोल्डन ग्लोब’ में नाटू-नाटू की सफलता और विस्मृति में एम एम करीम

 


तेलुगू फिल्म ‘आरआरआर’ के गाने ‘नाटू-नाटू’ को सर्वश्रेष्ठ ‘ओरिजिनल सॉन्ग-मोशन पिक्चर’ श्रेणी में प्रतिष्ठित ‘गोल्डन ग्लोब’ पुरस्कार मिला है. ‘नाटू नाटू’ के संगीतकार एम. एम. कीरावानी हैं और इसे काल भैरव और राहुल सिप्लिगुंज ने स्वर दिया है. ‘बाहुबली’ फेम के एस एस राजामौली की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफलता के परचम फहराने के बाद पश्चिमी देशों के फिल्म समारोहों में अपनी दावेदारी पेश कर रही है. मार्च में होने वाले प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार समारोह के लिए भी ‘नाटू-नाटू’ को ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया है.

बॉलीवुड सहित दक्षिण भारतीय सिनेमा में ‘स्टार’ पर इतना जोर रहा है कि समीक्षक गीत-संगीत पर कम ही बात करते हैं, जबकि गीत-संगीत का फिल्मों में केंद्रीय महत्व रहा है. कई फिल्म तो बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के बाद भी सिर्फ गीत-संगीत की वजह से ही लोगों के जुबान पर दशकों बाद भी रहती आई है. खुद एम. एम. कीरावानी हिंदी प्रदेश के लिए अपरिचित नाम नहीं है. एम एम करीम नाम से उन्होंने पिछली सदी के नब्बे के दशक में कुछ हिंदी फिल्मों में बेहतरीन संगीत दिया है. ‘तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए (क्रिमनल)’, ‘चुप तुम रहो चुप हम रहें, खामोशी को खामोशी से ज़िंदगी को ज़िंदगी से बात करने दो (इस रात की सुबह नहीं)’, ‘जाने कितने दिनों के बाद गली में आज चांद निकला (जख्म)’ जैसे गीत आज भी लोगों को याद हैं, भले करीम को भूल गए! इस विस्मृति के क्या कारण हैं?

आरआरआर एक ‘एक्शन ड्रामा’ फिल्म है जिसे इतिहास, मिथक के इर्द-गिर्द भव्य स्तर पर रचा गया है. जिस ताम-झाम और तकनीक (वीएफएक्स) कौशल का यह सहारा लेती है उसका इस्तेमाल हॉलीवुड वर्षों से करता रहा है. असल में आरआरआर फिल्म के वितरण और प्रचार-प्रसार ने इसे देश-विदेश के एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचाया है. पिछले दिनों लॉस एंजेलिस (अमेरिका) में प्रदर्शन के दौरान इस फिल्म के प्रति लोगों में जो उत्साह था वह सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी रही. पिछले दिनों जर्मनी के एक समाजशास्त्री, प्रोफेसर माइकल बौरमैन ने मुलाकात के दौरान जब आरआरआर के बारे में बातचीत की तो मुझे आश्चर्य हुआ था. हालांकि उनकी दिलचस्पी के केंद्र में फिल्म में जिस तरह से राष्ट्रवाद को परोसा गया है वह थी. इस फिल्म की राजनीति पर बात नहीं होती. फिल्म में अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई के दौरान जिस तरह धार्मिक मिथकों, प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है वह आलोचना से परे नहीं है.

बहरहाल, पिछली सदी में उदारीकरण-भूमंडलीकरण के बाद यह चिंता जताई जा रही थी कि हॉलीवुड, अमेरिकी पॉप म्यूजिक कहीं भारतीय समाज को अपने घेरे में न ले ले. अखबारों-पत्रिकाओं में एमटीवी, विसंस्कृतिकरण के खतरे के बारे में लेख लिखे जा रहे थे. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच में एक भारतीय फिल्म की मौजूदगी और पुरस्कृत होना उल्टी बयार को दिखाता है. भूमंडलीकरण भारतीय फिल्मों के लिए अवसर भी लेकर आया है जहाँ उसकी प्रतिस्पर्धा विश्व के बेहतरीन फिल्मकारों के साथ है.

यहां पर यह नोट करना उचित होगा कि कीरावानी की प्रतिस्पर्धा टेलर स्विफ्ट, रिहाना और लेडी गागा जैसे चर्चित संगीतकारों से थी. ऐसे में उनकी इस जीत को कम कर नहीं आंकना चाहिए. हालांकि संगीत के जानकारों का मानना है कि कीरावानी (करीम) का यह सर्वश्रेष्ठ नहीं है, न ही भारतीय सिने संगीत का सर्वश्रेष्ठ ही है.निस्संदेह एनटीआर जूनियर और राम-चरण ने नाटू-नाटू गाने में डांस के माध्यम से जो ऊर्जस्विता दिखाई है वह लोगों को लुभाता है. इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस गाने को फिल्म से अलग जीवन प्रदान किया है.

हिंदी के कवि और सिनेमा के गहरे जानकार विष्णु खरे ने एक जगह लिखा है: “1950-60 के बाद फिल्म संगीत ने भारतीय युवक-युवतियों की निम्न मध्यवर्गीय भावनाओं को जो अभिव्यक्ति दी है, वह विश्व के किसी भी लोकप्रिय संगीत में मिलना असंभव है.” हिंदी फिल्मों की ही बात करें तो कई ऐसे संगीत निर्देशक हुए हैं जिनके भावपूर्ण गीत-संगीत दशकों से लोगों के दिलों पर राज करती हैं और लोक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भारतीय फिल्म संगीतकारों को और बेहतरीन संगीत रचने को प्रेरित करेगा. साथ ही उम्मीद की जानी चाहिए कि बॉलीवुड कीरावानी (करीम) की प्रतिभा का समुचित इस्तेमाल कर पाएगा.