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Sunday, December 11, 2022

टेलीविजन न्यूज चैनल के सितारे: रवीश कुमार का इस्तीफा


हिंदुस्तान में टेलीविजन न्यूज चैनल के 'स्टार एंकर' फिल्म सितारे से कम लोकप्रिय नहीं हैं. असल में, टीवी के पास महज एक परदा है जिसके मार्फत पिछले दो दशक से ये एंकर रोज हमारे ड्राइंग रूम में हाजिर होते रहे हैं. टेलीविजन के एंकरों की एक खास शैली होती है, जो उन्हें विशिष्ट बनाती है. रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित टेलीविजन के चर्चित पत्रकार-एंकर रवीश कुमार जमीनी और लोक से जुड़े मुद्दों को सहज ढंग से चुटीले अंदाज में पेश करते रहे हैं. सत्ता से ईमानदारी से सवाल पूछना भी इसमें शामिल है. पिछले दिनों देश के एक प्रमुख समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया से उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इस चैनल से वे करीब पच्चीस वर्षों से जुड़े थे. इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर रवीश के प्रति लोगों का प्रेम उमड़ पड़ा. साथ ही मीडिया और पूंजी के गठजोड़ को लेकर भी आलोचना हुई. यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि भले एक एंकर की भूमिका समाचार चैनल में प्रमुख हो, पर जहाँ ‘स्टार वैल्यू’ से उनका कद बढ़ा वहीं टीवी समाचार उद्योग की निर्भरता भी इन पर बढ़ती चली गई. टीआरपी के पीछे आज जो भागदौड़ दिखती है वह भी इसी से जुड़ी हुई है. एनडीटीवी के पूर्व रिपोर्टर संदीप भूषण ने अपनी किताब ‘द इंडियन न्यूजरूम’ में एनडीटीवी के हवाले से स्टार एंकरों के बारे में विस्तार से लिखा है कि किस तरह इनकी वजह से टीवी उद्योग में आज रिपोर्टर की भूमिका सिमट कर रह गई है. किताब में एनडीटीवी की आलोचना भी शामिल है.

जब हम बीस साल पहले पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे थे तब टीवी पत्रकार बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई का जोर था. पिछले दशक में अर्णब गोस्वामी, रवीश कुमार चर्चा में रहे. रवीश अपनी रिपोर्टिंग के लिए जाने गए, लेकिन बाद में वे प्राइम टाइम में ही सिमट कर रह गए. निस्संदेह रिपोर्टर की छवि का उन्हें प्राइम टाइम में लाभ हुआ. वर्ष 2014 में सत्ता बदलने के बाद भी रवीश सत्ता से बेलाग सच कहने के साहस के साथ खड़े रहे. यह हिंदी पत्रकारिता की एक उपलब्धि रही, रवीश उसके अगुआ है.

सोशल मीडिया के कोलाहल के बीच एक बात दबी रह गई, जिसका जिक्र जरूरी है. टेलीविजन मीडिया बड़ी पूंजी की मांग करता है. शुरुआती दौर से मीडिया पूंजीवाद का उपक्रम रहा है. मीडिया पर नजर रखने वाले जानते थे कि एनडीटीवी देर-सबेर कर्ज के बोझ से डूबेगी ही, हालांकि पारदर्शिता की बात करने वाले मीडिया की अर्थव्यवस्था की जानकारी लोगों के सामने कम ही आ पाती है.

मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैक्लुहान ने लिखा है कि ‘माध्यम ही संदेश’ है. पिछले दिनों देश के कई प्रमुख टेलीविजन एंकर टीवी उद्योग से अलग होकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म (यूट्यूब चैनल) पर दिखाई देने लगे हैं. करण थापर, बरखा दत्त, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अजीत अंजुम, आरफा खानम शेरवानी, अभिसार शर्मा आदि की लिस्ट में एक नाम और जुड़ गया है, रवीश का. आने वाले समय में यह नया माध्यम लोकतंत्र के लिए क्या संदेश लेकर आता है, यह देखना रोचक होगा.

Friday, April 15, 2022

टीआरपी के चक्र में टीवी


बीस साल पहले इसी महीने हम
  भारतीय जनसंचार संस्थानदिल्ली से पत्रकारिता में प्रशिक्षण लेकर निकले थे. उन्हीं दिनों बाजार में कई नए निजी टेलीविजन समाचार चैनलों के आने की संभावना थीकुछ ने चौबीसों घंटे अपना प्रसारण शुरू कर दिया था. नौकरी को लेकर हम उत्साहित थेपर हम युवा साथियों के मन में टेलीविजन चैनलों की विषय-वस्तुमनोरंजनयुद्धोन्मादआक्रामकता आदि को लेकर अच्छे भाव नहीं थे. अमेरिका में हुए 9/11 आतंकी हमले,  भारतीय संसद पर हमला और गोधरा-गुजरात दंगों की घटना हमारे शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए चुनौती लेकर आया था. उसी दौर में इस्लामिक आतंकवाद’ जैसे शब्द भारतीय मीडिया में प्रचलन में आए थे और एक समुदाय विशेष की स्टीरियोटाइप छवि टीवी पर दिखाई जा रही थी. बीस साल के बाद भी हमारे भाव बदले नहीं हैंफर्क इतना है कि हमें उस वक्त कहा जाता था कि अभी संक्रमण काल (transition period)’ है जो कुछ महीनों में ठीक हो जाएगाजबकि अब कहते हैं कि टेलीविजन चैनलों के लिए यह संकट काल है. अनायस नहीं कि पिछले कुछ वर्षों से देश के चर्चित पत्रकार-एंकररवीश कुमारदर्शकों से टेलीविजन चैनल नहीं देखने की बार-बार अपील करते हैं!

ऐसा नहीं कि दस साल पहले कोई अच्छी स्थिति थी. वर्ष 2013 में वरिष्ठ पत्रकार-एंकर करण थापर ने एक आयोजन में कहा था: “टीवी चैनल दरअसलटीआरपी की दौड़ में लगे हैं. बीबीसी स्वायत्त है. वह विज्ञापन के लिए नहीं भागता. अगर आप ‘न्यूज वैल्यू’ से अलग होते हैं तो आपकी गुणवत्ता पर असर पड़ता है और यह पत्रकारिता नहीं है.” पिछले दिनों टीआरपी घोटाले की मीडिया में खूब चर्चा हुई थी. सबकी खबर लेने और सबको खबर देने वाले, सत्य तक पहुँचने की बात करने वाले, लोकतंत्र का खुद को प्रहरी मानने वाले पत्रकार खुद खबर बन गए थे. ऐसे में लोगों के मन में टीआरपी को लेकर सहज जिज्ञासा थी कि टीआरपी का इतिहास क्या हैयह कैसे तय होती हैटीआरपी से कैसे पत्रकारिता प्रभावित होती है? आदि.  वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मुकेश कुमार की हाल ही में प्रकाशित किताब टीआरपीमीडिया मंडी का महामंत्र’ में इन्हीं सवालों का सहजता से जवाब दिया गया है. समकालीन भारतीय समाज और मध्यवर्ग के जीवन में मीडिया की केंद्रीयता हैपर मीडिया के विभिन्न आयामोंविमर्श को लेकर शोधपरक पुस्तकों का सर्वथा अभाव है. यह किताब इस कमी को पूरा करती है.

गौरतलब है कि मुकेश कुमार ने टीआरपी को लेकर पीएचडी शोध कार्य किया है. इसी विषय पर वर्ष 2015 में ‘टीआरपीटीवी न्यूज और बाजार’ (वाणी प्रकाशन) नाम से एक किताब उन्होंने लिखी थी और इन्हीं सवालों को टटोला था. ‘टीआरपीमीडिया मंडी का महामंत्र’ (राजकमल प्रकाशन) टीआरपी घोटाले के संदर्भ में इन्हीं मुद्दों की नए सिरे से पड़ताल करती है.  जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस किताब में विज्ञापन (32 हजार करोड़) और टेलीविजन रेटिंग पॉइंट के आपसी रिश्ते को विश्लेषित किया गया है. टीवी समाचार उद्योग में काम करने के अपने अनुभव के आधार पर लिखते हैं- न्यूज चैनलों में टीआरपी खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं मानी जाती है.” वे इस किताब में टीआरपी को बाजार का औजारहथियार कहते हैं. उनके विश्लेषण के केंद्र में मुख्यत: हिंदी के समाचार चैनल ही हैं.

सवाल है कि इन बीस वर्षों में हिंदी के टेलीविजन समाचार चैनल की प्रमुख प्रवृत्ति क्या रहीजनसंचार के प्रमुख माध्यम होने के नाते क्या इनके सरोकार जन से जुड़ेक्या सूचनाओंविमर्शों के मार्फत इन्होंने जन को सशक्त किया ताकि लोकतंत्र में एक सजग नागरिक की भूमिका निभाने में इन्हें सहूलियत होउदारीकरण (1991), निजीकरण, भूमंडलीकरण के बाद खुली अर्थव्यवस्था में मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम है. उसकी एक स्वायत्त संस्कृति भले हो पर वह शुरु से ही कारपोरेट जगत का हिस्सा रहा है. जब भी हम मीडिया की कार्यशैली की विवेचना करेंगे तो हमें पूंजीवाद और मीडिया के रिश्तों की भी पड़ताल करनी होगी. निस्संदेहहाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार हुआ हैलेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही टीवी मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है. ऐसे में लोक हित के विषय हाशिए पर ही रहते हैं. मुकेश कुमार लिखते हैं: “वास्तव में बाजारटीआरपी और पत्रकारिता के बीच का असली खेल शुरु हुआ चौबीस घंटे के न्यूज चैनलों के आने के बाद. सन 2000 के आसपास यह दौर शुरु हुआ. वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों में लगे करीब 44 हजार मीटर के जरिए रेटिंग के क्षेत्र में एक बड़ा नाम बार्क (Broadcast Audience Research Council) नामक संस्था  टीआरपी देने का काम कर रही है. इस सैंपल को आधार बना कर वह करीब 85 करोड़ दर्शकों (20 करोड़ टीवी-घर) तक पहुँचने, उनके पसंद-नापसंद को जानने का यह दावा करती है और इसी आधार पर चैनलों के बीच विज्ञापनों का बंटवारा होता है. हालांकि टीआरपी घोटाले से पहले और घोटाले के बाद, सैंपल साइज, बार्क की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं. घोटाले की जाँच के दौरान बार्क के पूर्व सीइओ, पार्थो दासगुप्ता की गिरफ्तारी हुई. पुलिस के मुताबिक दासगुप्ता ने माना था कि रिपब्लिक टीवी के संपादक-एंकर अर्णब गोस्वामी ने रेटिंग बढ़वाने के लिए उन्हें लाखों रुपए रिश्वत दिए. इस किताब में लेखक ने बार्क की रेटिंग प्रणाली पर वाजिब सवाल उठाया है.


यह नोट करना समीचीन है कि भारत में चौबीसों घंटे चलने वाले इन समाचार चैनलों के प्रति मीडिया विमर्शकारों में दुचित्तापन है. टेलीविजन की वजह से खबरों की पहुँच गाँव-कस्बोंझुग्गी-झोपड़ियों तक हुई. पब्लिक स्फीयर का विस्तार हुआसाथ ही एक नेटवर्क का निर्माण भी. जो केंद्र से दूर थे वे नजदीक आए. इसने भारतीय लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत किया है. वहीं समाचार की एक ऐसी समझ इसने विकसित की जहाँ मनोरंजन पर जोर रहा है. लेखक इस किताब में टेलीविजन चैनलों की ताकत पर अपनी नजर नहीं डालते हैं. टेलीविजन दृश्य-श्रव्य माध्यम हैजो तस्वीरों-आवाजों के माध्यम से संदेश को दर्शकों तक पहुँचाती है. टेलीविजन के संदेशों को ग्रहण करने के लिए साक्षर या पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं है. जाहिर है भारत जैसे देश में जहाँ आज भी करोड़ों लोग निरक्षर हैंटेलीविजन अखबारों का पूरक बन कर उभरा है. लेकिन यदि मीडिया को पहले ही मंडी मान कर आप विश्लेषण करेंगे तो निष्कर्ष पूर्व-निर्धारित ही होंगे! रेमंड विलियम्स ने अपनी चर्चित किताब टेलीविजन में टेलीविजन को तकनीकी और विशिष्ट सांस्कृतिक रूप में देखा-परखा है. टेलीविजन चैनलों की जो स्थिति है, उसका जिस तरह से पिछले दो दशकों में विकास हुआ है क्या वह हमारे उपभोक्तावादी समाज पर भी एक टिप्पणी नहीं है? विश्लेषकों का मानना है कि  पूंजीवादी व्यवस्था के केंद्र में उपभोग की संस्कृति है. हमारे यहाँ दर्शकों की पसंद, इच्छा को लेकर अकादमिक शोध की पहल नहीं दिखती. ऐसे में इस निष्कर्ष तक पहुँचना कि ये महाझूठ है कि दर्शकों के पास विकल्प हैं मगर वे उनका इस्तेमाल नहीं करते’ सरलीकरण ही कहा जाएगा. मीडिया का विकास सामाजिक-सांस्कृतिक विकास से अलहदा नहीं होता. हिंदुत्ववादी प्रवृत्तियों के उभार का सारा दोष हम मीडिया के मत्थे मढ़ कर छुट्टी नहीं पा सकते.

इस पर काफी चर्चा हो चुकी है कि हिंदी समाचार चैनलों की एक प्रमुख प्रवृत्ति स्टूडियो में होने वाले बहस-मुबाहिसा हैजिसका एक सेट पैटर्न है. एंकर और प्रोड्यूसर का ध्यान ऐसे मुद्दों पर बहस करवाना होता है जिससे कि स्टूडियो में एक नाटकीयता का संचार हो. इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होताबल्कि उनके चित-वृत्तियों के निम्नतम भावों को जागृत करना होता है. ऐसे में एंकरों-प्रोड्यूसरों की तलाश उन मुद्दों की तरफ ज्यादा रहती है जिसमें सनसनी का भाव हो. मुकेश कुमार ठीक ही इसे नोट करते हुए अपनी किताब में लिखते हैं: टीआरपी के चक्कर में ही बहस पर आधारित कार्यक्रमों में चीख-चिल्लाहटलड़ाई-झगड़ेगाली-गलौज यहाँ तक की मारपीट आवश्यक तत्त्व बन गएक्योंकि एक अनपढ़ देश में ऐसी चीजों की दर्शक संख्या अधिक होती है.”  यदि हम मान लें कि हिंदी के दर्शक अनपढ़ हैंपर अंग्रेजी के दर्शक तो पढ़े-लिखे माने जाते हैंफिर क्यों अंग्रेजी चैनलों के न्यूज रूम में भी आज वही चीख-चिल्लाहट सुनाई पड़ती है? क्यों अंग्रेजी के तथाकथित पढ़े-लिखे एंकर-पत्रकार अपने चैनलों पर ऐसी बहस करते हैं जो सौहार्द की जगह वैमनस्य को बढ़ावा देता हैजिसका तथ्य और सत्य से कोई नाता नहीं रहताक्यों ट्विटर पर सांप्रदायिक टीका-टिप्पणी वे करते दिखते हैं? क्या अंग्रेजी के समाचार चैनल हिंदुत्व के मुद्दे पर हिंदी चैनलों की राह पर नहीं हैक्या उग्र राष्ट्रवाद का स्वरूप अंग्रेजी और हिंदी के चैनलों में कमोबेश एक जैसा नहीं हैआज क्या दोनों के बीच एक खंडित लोक (split public) का स्वरूप वही है जिसकी चर्चा पिछली सदी में 90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन के संदर्भ में अरविंद राजगोपाल अपनी किताब में करते हैं. मुझे लगता है कि यह विभाजक रेखा धुंधली हुई हैसत्ता के करीब पहुँचने की ललक में अंग्रेजी के तथाकथित पढ़े-लिखे एंकर-पत्रकार ज्यादा महीन ढंग से काम करते हैं.  एनडीटीवी ने पूर्व पत्रकार संदीप भूषण ने द इंडियन न्यूजरूम (2019) में इसकी पड़ताल की है.


सवाल यह भी है क्या सनसनी इस माध्यम की विशेषता तो नहीं? टीवी के पास महज एक परदा है जहाँ पर उसे सब कुछ दिखाना होता हैइस मामले में वह अखबारों या मोबाइल तकनीकी (ऑनलाइन मीडिया) से अलग है. मीडिया आलोचक प्रोफेसर निल पोस्टमैन ने अमेरिकी टेलीविजन के प्रसंग में कहा था कि- सीरियस टेलीविजन अपने आप में विरोधाभास पद है और टेलीविजन सिर्फ एक जबान में लगातार बोलता है-मनोरंजन की जबान.’ क्या  यह हमारे समाचार चैनलों के सच लिए नहीं है?  पोस्टमैन के मुताबिक एक न्यूज शोसीधे शब्दों मेंमनोरंजन का एक प्रारूप है न कि शिक्षागहन विवेचन या विरेचन का. लेखक टीवी रेटिंग की नई प्रणाली की वकालत अपनी किताब में करते हैंपर क्या उससे समस्या का समाधान संभव है क्योंकि खुद लेखक ने लिखा है-कितनी भी निर्दोष रेटिंग प्रणाली क्यों न स्थापित कर दी जाए, कंटेंट उसके दुष्प्रभाव से बच नहीं सकता.” जाहिर है ऐसे में महज टीआरपी के कोण से हम टेलीविजन की संस्कृति का विश्लेषण नहीं कर सकते.

भारत में कारोबारी मीडिया और सत्ता के आपसी सांठगांठ पर कम बातचीत होती है, इस किताब में भी इस मुद्दे को महज छुआ गया है जिस पर विस्तृत शोध की अपेक्षा है. कुछ अपवादों को छोड़ कर आजाद भारत में सत्ता के इशारे पर मीडिया हमेशा काम करता रहा है. आपातकाल में अधिकांश मीडिया घराने ने घुटने टेक दिए थे. मुकेश कुमार ने एक जगह लिखा है कि पहला हमला बेशक बाजार का था जो टीआरपी के जरिए हुआमगर दूसरा आक्रमण राजनीति की ओर से हुआ है और इसकी शुरुआत छह साल पहले हुई है जो कि अभी जारी है.’ पर लेखक इसके विस्तार में नहीं जाते कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद मीडिया जगत में किस तरह से परिवर्तन आया है. एक रपट की तरह वे लिपिबद्ध करके छुटकारा पा लेते हैं, जबकि उनके पास पत्रकारिता का लंबा अनुभव है. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसे वे परख सकते थे. इसी लेख में वे नोट करते हैं कि हमारा मीडिया सवर्णवादी हैबहुसंख्यवादी है.’ क्या पिछले छह साल में ऐसा हुआ हैक्या इसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं जो भारत में टेलीविजन चैनलों के कर्ता-धर्ता रहे हैंलेखकजिन्हें कई चैनलों को शुरु करने का श्रेय हैंयदि अपने अनुभव के आधार पर इस संदर्भ में कुछ लिखते तो ज्यादा तथ्यपरक और प्रभावी होता- इथनोग्राफिक स्टडी की तरह. अंत मेंलेखक शोधार्थी रहे हैंऐसे में इस किताब में एक भी संदर्भनोटफुटनोट का उल्लेख नहीं होना खलता है. 

(समालोचन के लिए, आजकल पत्रिका, अगस्त, पेज 55-56)

 

Tuesday, August 27, 2019

खबरनवीस का सम्मान


इस साल एशिया के प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार पानेवालों में म्यांमार के पत्रकार स्वे विन और भारत के चर्चित टेलीविजन एंकर और पत्रकार रवीश कुमार शामिल हैं.
रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फाउंडेशन ने सच्चाई को बयान करने की ताकत और सामाजिक सरोकार से लैसपत्रकारिता के लिए स्वे विन को सम्मानित करने की घोषणा की, वहीं रवीश कुमार की पत्रकारिता को सत्य के प्रति निष्ठा रखते हुए बेजुबानों की आवाजबताया है. निस्संदेह मौजूदा दौर में रवीश भारतीय पत्रकारिता का एक विश्वसनीय चेहरा हैं. हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता में जहां मनोरंजन और सनसनी पर जोर है, वहां सत्य के प्रति निष्ठा बहुत पीछे छूट गया लगता है.
हालांकि, जब सुरेंद्र प्रताप सिंह ने 90 के दशक में हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को एक पेशेवर अंदाज दिया, तब टीवी समाचार के प्रति लोगों में आकर्षण बढ़ा था, पर बाद में बाजार, सत्ता और टीआरपी के दबाव में टेलीविजन ने खबरों की नयी परिभाषा गढ़ी, जहां तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर जोर नहीं रहा. आज टेलीविजन पत्रकारिता के ऊपर विश्वसनीयता का संकट है.
टेलीविजन के एंकरों की एक खास शैली होती है, जो उन्हें विशिष्ट बनाती है. भारतीय टेलीविजन पत्रकारों में रवीश जमीनी और लोक से जुड़े मुद्दों को सहज ढंग से चुटीले अंदाज में पेश करते हैं. सत्ता से ईमानदारी से सवाल पूछना भी इसमें शामिल है. वर्तमान में टीवी पत्रकारिता में स्टूडियो में होनेवाले बहस-मुबाहिसा और इंटरव्यू ज्यादा प्रमुख हो गया है. सत्ता पर काबिज सवालों से हमेशा बचते हैं और जवाब देने में आनाकानी करते हैं.
टेलीविजन के एक अन्य चर्चित पत्रकार करण थापर बीबीसी के महानिदेशक रह चुके जॉन बर्ट के हवाले से कहते हैं कि समसामयिक इंटरव्यू के दौरान चार तरह के उत्तर होते हैं- हां, , नहीं जानते और नहीं कह सकते. एक इंटरव्यूअर को तीसरे और चौथे विकल्प को हटा कर अपने गेस्ट को हां या न की तरफ मोड़ना होता है. खुद गेस्ट हां, या ना की दुविधा में रहते हैं और यह काम एक इंटरव्यूअर का है कि किस तरह वह गेस्ट के जवाब को लेकर सवाल करे.
वर्तमान दौर में टेलीविजन पत्रकारिता की सत्ता के साथ गलबहियां से खुद रवीश कुमार क्षुब्ध रहते हैं. विभिन्न मंचों पर उन्होंने इस बात को बार-बार जाहिर भी किया है. यहां तक कि पिछले दिनों उन्होंने लोगों से टेलीविजन न्यूज नहीं देखने की अपील तक कर डाली थी.
इक्कीसवीं सदी में टीवी भारतीय जनमानस और संस्कृति का एक अहम हिस्सा बनकर उभरा है. पिछले दो दशकों में भारतीय समाज और लोक मानस पर खबरिया चैनलों का प्रभाव किस रूप में पड़ा इसकी ठीक-ठीक विवेचना संभव नहीं. लेकिन, इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो कि कमियों के बावजूद भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के विस्तार में इन समाचार चैनलों की महती भूमिका है.
(प्रभात खबर, 27 अगस्त 2019)

Saturday, April 06, 2013

हिंदी में समाचार

अंतिका प्रकाशन, सजिल्द, मूल्य: 390 रुपए
ISBN Number: 9789381923573
किताब के बारे में
भूमंडलीकरण के साथ पनपे नव पूँजीवाद और हिंदी अखबारों के बीच संबंध काफी रोचक हैं। हिंदी अखबार जो अंग्रेजी अखबारों के पिछलग्गू बने हुए थे, अपनी निजी पहचान लेकर सामने आए। संचार क्रांति के दौर में इनके व्यावसायिक हितों के फलने-फूलने का खूब मौका मिला और आज ये ग्लोकल’  हैं।
उदारीकरण के बाद भारतीय राज्य और समाज के स्वरूप में आए परिवर्तनों के बरक्स भारतीय मीडिया ने भी खबरों के चयन, प्रस्तुतीकरण, प्रबंधन आदि में परिवर्तन किया। हिंदी अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखेगा कि खबरों के मानी, उसके उत्पादन के ढंग बदल गए हैं। अखबारों के माध्यम से बनने वाली हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में जहाँ राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व हावी है, वहीं भाषा, स्त्री और दलित विमर्श का एक नया रूप उभरा है। मिश्रित-अर्थव्यवस्था में जो मध्यवर्गीय इच्छा दबी हुई थी,  वह खुले बाजार में अखबारों के पन्नों पर खुल कर अभिव्यक्त हो रही है। खबरों के कारोबार में पेड न्यूजफाँस नजर आने लगी है। हिंदी पत्रकारिता की इन स्थितियों को यह शोधपरक किताब पहली बार सामग्री विश्लेषण और उदाहरणों के जरिये  निरूपित करती है।
वर्ष 1991 में उदारीकरण के रास्ते आए समकालीन भूमंडलीकरण ने हिंदी पत्रकारिता को किस रूप में प्रभावित किया? पिछले दो दशकों में भारतीय राज्य, समाज और भूमंडलीकरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के संबंध किस रूप में विकसित हुए?  शोध और पत्रकारिता के अपने साझे अनुभव का इस्तेमाल कर अत्यधिक परिश्रम से लेखक ने इसका विवेचन और विश्लेषण किया है।
हिंदी में समाचारके मार्फत हिंदी पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले तो इनमें आए बदलाव से जुड़ीं स्थितियों-परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ ही सकते हैं, हिंदी पत्रकारिता के छात्रों-शोधार्थियों के लिए भी यह एक अनिवार्य सी पुस्तक है।

लेखक परिचय:अरविंद दास
जन्म: 1978 में बेलारही, मधुबनी (बिहार) में।
  शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई, आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण और जेएनयू से हिंदी साहित्य और मीडिया में शोध।  भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स। नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज  से उर्दू में डिप्लोमा। जर्मनी के जिगन विश्वविद्यालय से पोस्ट डॉक्टरल शोध। पीएचडी के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप और पोस्ट डॉक्टरल शोध के लिए जर्मन रिसर्च फांउडेशन फेलोशिप। 
देश-विदेश में मीडिया को लेकर हुए सेमिनारों में शोध पत्रों की प्रस्तुति। भारतीय मीडिया के विभिन्न आयामों को लेकर जर्मनी के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान।  इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट के दक्षिण एशियाई देशों के पत्रकारों के लिए 2012 में 'न्यू मीडिया' को लेकर ट्रेनिंग और कोलंबो में हुए  वर्कशॉप में भागीदारी। 
   पत्रकारिता का ककहरा जनसत्ता से सीखा। बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहे। अलग अंदाज के ब्लॉगर। ब्लॉग लेखों का संकलन-'गुल,नज़ूरा और रामचंद पाकिस्तानी' शीघ्र प्रकाश्य। मिथिला कला को लेकर एक लघु पुस्तिका- गर्दिश में एक चित्र शैली प्रकाशित।
   फिलहाल पिछले दो वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी आईटीवी के सीनियर रिसर्चर। विशेष तौर पर सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित होने वाले चर्चित कार्यक्रम 'डेविल्स एडवोकेट' और 'लास्ट वर्ड' के शोध की जिम्मेदारी।

विषयक्रम


प्रस्तावना

अध्याय 1
भूमंडलीकरण की अवधारणा
         भूमंडलीकरण का परिप्रेक्ष्य
 भूमंडलीकरण और पत्रकारिता
अध्याय 2
अखबार का बदलता स्वरूप: पहला पन्ना
रूप-रेखा
             सुर्खियाँ एवं उनके विषय
 भाषा-शैली
विज्ञापन
अध्याय 3
सामग्री विश्लेषण I
 स्त्री
 धर्म
    अर्थतंत्र
अध्याय 4
सामग्री विश्लेषण II
   साहित्य
खेल
अध्याय 5
सामग्री विश्लेषण III
             किसान एवं मजदूर
               दलित एवं आदिवासी
अध्याय  6
प्रबंधन एवं संचालन
           प्रबंधन का ढाँचा
                               मालिक और संपादक: भूमिका एवं संबंध
                        पत्रकारों का चयन एवं नियुक्तियाँ

निष्कर्ष

 परिशिष्ट

(गीता बुक सेंटर, जेएनयू में उपलब्ध)
(अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-2648212 मोबाइल नं.9868 380797, 98718 56053, अरविंद दास, मोबाइल: 09990 306477)   

Wednesday, March 13, 2013

खबरों का खेल वाया नभाटा

अखबार एक प्रोडक्ट(उत्पाद) है, जिसे संपादक की कम, ब्रांड मैनेजर की ज्यादा जरूरत है’, इस बात की चर्चा अखबारों के दफ्तरों में 80 के दशक के उतरार्द्ध में शुरू हो गई थी. टाइम्स ग्रुप के अखबार इस ब्रांड विमर्शके अगुआ थे. वर्तमान में हिंदी के लगभग सभी अखबार किस तरह से बाजार के सुर में सुर मिलाकर अपना व्यवसायिक हित साध रहे हैं यह वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव और बाद के विधान सभा चुनावों में पत्रकारिता ने जो भूमिका निभाई उससे खुल कर सामने आ गया. प्रभाष जोशी ने इस सिलसिले में नोट किया था:“अखबारों ने बाकायदा पैकेज बनाए थे और रेट कार्ड छापे थे. पैकेज में चुनाव कवरेज के सभी क्षेत्र कवर किए गए थे. फोटू से लेकर इंटरव्यू और अपील तक की अलग-अलग साइज के अलग-अलग दाम तय किए थे. जिनने ये पैकेज खरीदे उन्हीं की खबरें छपीं. जिनने नहीं खरीदे वे अखबारों के पेजों से गायब रहे.
असल में जिसे 2009 में पेड न्यूज कहा गया और उसकी औपचारिक शुरुआत बैनेट कोलमन एंड कंपनी या टाइम्स ग्रुप, जिसके तहत नवभारत टाइम्स प्रकाशित होता है, ने 2003 में मीडिया नेट कंपनी बना कर कर दी थी. इसके तहत टाइम्स ग्रुप के अखबारों के परिशिष्टों (Supplement) में कोई व्यक्ति, संस्था, वस्तु या फिल्म का प्रमोशन खबर के रूप में पैसे देकर करवा सकता है. वर्ष 2005 में टाइम्स ग्रुप ने मीडिया नेट से आगे जा कर प्राइवेट ट्रीटीज- जिसे उन्होंने ब्रांड कैपिटल कहा- की शुरुआत की. इसके करार के तहत टाइम्स ग्रुप के अखबार कंपनियों के विज्ञापन की लागत के बदले उनसे इक्विटी लेता है. लगभग 500 कंपनियों के साथ बैनेट कोलमन कंपनी ने इस तरह का करार किया है. स्पष्टत: इस तरह का करार पाठकों के विश्वास के साथ धोखा है.
हाल ही में (2012) टाइम्स ग्रुप के मालिक ने प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका द न्यूयॉर्कर से बात करते हुए कहा हम खबरों का नहीं विज्ञापन का कारोबार करते हैं. हालांकि मीडियानेट को लेकर जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने मार्च 2003 में अखबार में खबर दी तब उसने इसे हिताहित का ध्यान रखने वाला, लेखा परीक्षक और प्रहरी की भूमिका में देखा था जो मीडिया की पीआर सेक्टर के साथ बढ़ते मेल जोल का नियमन करेगा. जाहिर है पेड न्यूज की परिघटना का जनक टाइम्स ग्रुप है और भूमंडलीकरण के दो दशकों के बाद इस कारोबारको लेकर अखबार को कोई मलाल नहीं!
 पिछले दो दिनों से नवभारत टाइम्स, दिल्ली ने पहले पन्ने पर हो गया NBT+’ नाम से खुद का एक विज्ञापन दे रहा है जिसमें लिखा है-अब आपको हर रोज अखबार लगेगा एनबीटी प्लस. यानी अब आपको अपने पसंदीदी सप्लिमेंट हैलो डेल्ही का पूरा मसाला चार बढ़े हुए पेजों के साथ मुख्य अखबार के पन्नों में ही मिल जाएगा.’ और फिर इस बदलाव पर पाठकों से राय मांगी गई है.
जब मैंने नवभारत टाइम्स फोन कर पूछा कि पहले तो सप्लिमेंट के नीचे ' एडवरटोरियल, इनटरटेनमेंट प्रमोशनल फीचर लिखा होता था, लेकिन आज के अखबार में ऐसा तो नहीं दिख रहा है, क्यों?' संपादकीय विभाग से जुड़े एक सज्जन ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर की और कहा कि इस बारे में पूछना पड़ेगा.
अगले लोकसभा चुनाव को साल भर भी नहीं बचे हैं, ऐसा लग रहा है कि अखबारों ने फिर से तैयारी शुरु कर दी है!
 ('हिंदी में समाचार' शीर्षक से लेखक की किताब अंतिका प्रकाशन से अप्रैल 2013 में आने वाली है)