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Sunday, November 14, 2021

एक बीता-रीता सा कैफे

पिछले दिनों एक मित्र के साथ कनॉट प्लेस गया. दीवाली के दौरान जो भीड़ होनी चाहिए वह गायब थी. कुछ रीता-रीता सा माहौल था. खरीदारों को देख कर ऐसा लगता था कि जैसे कि वह कह रहे हों-बाजार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ.

कुछ दुकानें भले बंद दिख रही थी, पर अधिकांश खुली थी. मैं करीब दो साल बाद वहाँ गया था. ऐसा नहीं कि इस बीच मैं बाजार नहीं गया पर सच पूछिए तो कोरोना के दौरान ऑनलाइन खरीदारी की आदत सी हो गई. घर के नजदीक मॉल जाना ज्यादा आसान लगा. यह अनायास नहीं है कि इन दिनों एक विज्ञापन में छोटे-छोटे, आस-पड़ोस के दुकानदारों से इस दीवाली खरीदारी की अपील करते हुए एक चर्चित अभिनेता दिख रहे हैं.

करीब पच्चीस साल से दिल्ली में हूँ. कॉलेज के दिनों से ही कनॉट प्लेस में खूब तफरीह किया है, लेकिन उस दिन ऐसा लग रहा था कि हम सैलानी बन कर वहाँ घूम रहे हैं. कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली में होकर भी दिल्ली में  नहीं होने का ख्याल अधिकांश लोगों  के मन में रहा. अभी भी ऐसा लग रहा है कि लोगों में सुरक्षा को लेकर एक भय है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में कोरोना महामारी अब एंडेमिक फेज’ की तरफ बढ़ने लगी है. पिछले दिनों दिल्ली में बच्चों के लिए भी स्कूल खोल दिए गए हैं. एक मित्र से जब इसे लेकर बातचीत हो रही थी तब वह सशंकित दिख रही थी. लगभग दो साल बाद स्कूल में खुद को पाकर बच्चों के मन में किस तरह के भाव उठेंगे यह जानना रोचक होगा.

बहरहाल, उस दिन हमने  कनॉट प्लेस स्थित बड़े ब्रांड के चर्चित कॉफी हाउसों को छोड़, दशकों पुराने मद्रास कॉफी हाउस की ओर रुख किया. इन वर्षों में दिल्ली में बड़े-बड़े मॉल आए, आधुनिक साज-सज्जा से लैस कॉफी हाउस शहर के कोने-कोने में उभरे पर नामी रेस्तरां के बीच मद्रास कैफे अपनी ठसक के साथ आज भी मौजूद है. गौरतलब है कि दक्षिण भारत में जैसा कॉफी पीने का रिवाज रहा हैवैसा उत्तर भारत में नहीं. वैसे तो 17वीं सदी में ही कॉफी अपने हमसफर चाय के साथ भारत में दस्तक दे चुका था. 19वीं सदी के आखिर में दक्षिण भारत में इसकी खपत बढ़नी शुरू हुई. इससे पहले यह यूरोपीय लोगों का ही पेय था और 20वीं सदी के आते- आते यह दक्षिण भारतीय मध्यवर्ग का पसंदीदा पेय बन गया. हालांकिउदारीकरण के बाद उत्तर भारत में भी कॉफी की खपत ने जोर पकड़ा है. खासकर महानगरों के युवाओंकामकाजी लोगों में कॉफी पीना सांस्कृतिक दस्तूर में शामिल हो गया है.

पश्चिमी देशों में कॉफी पीने की संस्कृति आज भी कायम है और इसके ऐतिहासिक कारण है. अखबारोंपत्र-पत्रिकाओं की तरह ही सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्फीयर) में इन कॉफी हाउस की महत्वपूर्ण भूमिका है. लोकतंत्र में ये राज्य और नागरिक समाज के बीच एक पुल की भूमिका निभाते रहे हैं. भारत के विभिन्न शहरों में स्थित कॉफी हाउस में भी राजनीतिकों से लेकर साहित्यकारों और पत्रकारों के बीच बहस-मुबाहिसों के कई किस्से हैं.

जाहिर है वर्ष 1935 में  खुले इस औपनिवेशिक काल के कैफे के साथ कई किस्से जुड़े हैं. बिना किसी तड़क-भड़क और दिखावे के किफायती दाम पर कॉफी पीने और इडली-सांभर, मसाला-डोसा खाने का यहाँ अपना मजा है. बीते जमाने का स्वाद इससे लिपटा चला आता है. इसे शंघाई रेस्तरां के रूप में शुरु किया गया जो ब्रितानी सैनिकों का अड्डा था. ऐसा लगता है कि विदेशी सैलानियो के लिए यह अभी भी पसंदीदा जगह है.  कैफे के गेट के पास चिपके सैकड़ों छोटे-छोटे चिठ्ठे इस बात को बयां करते हैं कि क्यों तमाम कॉफी हाउस के मुकाबले पुराने फर्नीचर और मद्धिम रोशनी में डूबा यह बीता-रीता सा कैफे उनकी पसंद में शामिल है. उस दिन कैफे में भीड़ नहीं थी. कुछ युवतियाँ वहाँ सेल्फी लेती हुई दिख रही थी. बाहर की दुनिया से बेखबर ऐसा लग रहा था कि समय यहाँ ठहर गया है.

कोरोना काल में सबसे ज्यादा मार छोटे दुकानदारों पर पड़ी है. खास कर रेस्तरां और होटल उद्योग इससे खूब प्रभावित हुए. ऐसे में समय के थपेड़ों को झेल कर खड़ा मद्रास कैफे जैसी दुकानों का हमारे बीच होना सुकून देता है. ऐसा लगता है कि सब कुछ खोने के बाद भी बहुत कुछ बचा रह जाता है!

(न्यूज 18 हिंदी के लिए, 8 नवंबर 2021)


Saturday, May 08, 2021

बहुत कठिन समय है साथी

पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान टेलीविजन के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि हम उम्मीद करें कि कोई साहित्यकार हमारे समय की त्रासदी को शब्द देगा.  साहित्य शब्दों के जरिए मानवीय भावों, प्रेमहिंसा, सुख-दुखपीड़ात्रासदियों को वाणी देता रहा है. यही वजह है कि कोरोना महामारी के दौरान अल्बैर कामू के चर्चित उपन्यास-प्लेगकी बार-बार चर्चा होती रही है. लोग इस महामारी को ‘प्लेग’ के मार्फत समझने की कोशिश करते दिखे. प्रसंगवशइस उपन्यास में एक पात्र रेमंड रैंबर्ट पत्रकार के रूप में मौजूद हैं!

साहित्य भोगे हुए जीवन को रचता हैपर वह जीवन नहीं है. और कोई भी कहानी जीवन से बढ़ कर नहीं हो सकती है. हालांकि कोरोना महामारी के दौरान खबरनवीस अपनी जान पर खेल कर भी खबर दे रहे हैंहमें इस आपदा की कहानियों से रू-ब-रू करवा रहे हैं. महामारी से लड़ने में जनसंचार की अहमियत और केंद्रीयता को सब स्वीकार करते हैं. सही सूचनाएँ जहाँ आम लोगों की दुश्चिंताएँ कम करती हैंवहीं दुष्प्रचार लोगों की परेशानियाँ बढ़ाने का कारण बनते हैं. जनसंचार के माध्यमों का इस्तेमाल जिस रूप में कोरोना महामारी के दौर में हो रहा है उसका सम्यक अध्ययन अभी बाकी है.

बहरहाल, ऐसा लगता है समकालीन घटनाक्रम को संवेदनशील ढंग से सामने रखने के लिए साहित्य पर्याप्त नहीं होता. आधुनिक समय में इसके लिए मीडिया माकूल है. यहाँ पर यह जोड़ना उचित है कि पारंपरिक मीडिया के अलावे सोशल मीडिया की भी इसमें प्रमुख भूमिका है. सूचना क्रांति के बाद मीडिया के अभूतपूर्व प्रसार ने छोटे शहरोंकस्बों और गाँवों को भी केंद्र से जोड़ दिया है. आज हम सब एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हैं. साथ ही तकनीकी ने देश और काल के फासले को कम कर दिया है. यही वजह है कि दिल्ली में बैठा हुआ कोई शख्स दरभंगा में किसी जरूरतमंद को मदद पहुँचा पा रहा है. दिल्ली में बैठा हुआ कोई पत्रकार अमेरिका या लंदन में बैठे महामारी और लोक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बिना किसी दिक्कत के सलाह-मशविरा करने में कामयाब हैं. इस आपदा ने संपूर्ण मानवता को जिस तरह प्रभावित किया है और संचार तकनीकी का इस्तेमाल कर जिस रूप में इससे लड़ा जा रहा हैमीडिया गुरु मार्शल मैक्लूहन की ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा प्रासंगिक हो उठती है. इस महामारी में मानवीय त्रासदी को हम-सब एक-साथ देख रहे हैंभोग रहे हैं. एक अनिश्चितता और भय सब तरफ व्याप्त है. पर जैसा कि वीरेन डंगवाल ने लिखा हैहर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है/ हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है.

कोराना महामारी की विचलित करने वाले दृश्य (तस्वीरें) हमारी संवेदना को झकझोरने में, उद्वेलित करने में प्रभावी हैं. सड़कों परअस्पतालों मेंघरों में बेबसी की तस्वीरें मुख्यधारा और सोशल मीडिया के हवाले से हमारी चेतना का अंग बनी है और हम एक-दूसरे के दुख और शोक में शरीक हैं.

इस महामारी में पिछले साल लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें मीडिया के माध्यम से आईंवे महाकाव्यात्मक पीड़ा लिए हुए थी. इन तस्वीरों ने देखने के हमारे नजरिए को बदल कर रख दिया. यह पीड़ा के साथ-साथ मानवीय जिजीविषाकरुणा और संघर्ष की तस्वीरें भी थी. साथ ही सामूहिकता और मानवीय सहयोग की सहज तस्वीरें हम इस आपदा में देख रहे हैं. मीडिया इन दृश्यों के माध्यम से पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ रहा है.

कोरोना महामारी के दूसरे वेव में जब प्रतिदिन संक्रमित लोगों की संख्या चार लाख के करीब है और हताहतों की संख्या चार हजारकई पेशेवर पत्रकार भी इससे संक्रमित हो रहे हैं. एक आंकड़ा के मुताबिक पूरे देश में कोराना महामारी से अब तक करीब सौ पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है. कई पत्रकार आज इस वायरस से संक्रमित हैं. पेशे के प्रति अपनी दीवानगी में कुछ पत्रकार इस हालत में भी लोगों के लिए हरसंभव सहायता करते दिखे हैं. सत्ता को कटघरे में खड़े करने में नाकामी और सरकार से सही समय पर सवाल नहीं पूछने की वजह से मीडिया की आलोचना अपनी जगह सही हैपर निस्संदेह जब भविष्य में पत्रकारिता और इस महामारी का इतिहास लिखा जाएगा इसे भी नोट किया जाएगा.

इन सबके बीच देर से ही सही उत्तर प्रदेशबिहारपंजाबपश्चिम बंगाल जैसे अनेक राज्यों ने पत्रकारों को भी महामारी से लड़ने में फ्रंटलाइन वर्कर्स माना है. इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए.

(नेटवर्क 18 हिंदी वेबसाइट पर प्रकाशित)

Wednesday, October 28, 2020

सिनेमा हॉल खुले, पर दर्शक कहां हैं


करीब सात महीने के बाद देश में सिनेमाघर खुले हैं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ‘वीरानी सी वीरानी’ है. बॉक्स ऑफिस के लिहाज से दो प्रमुख राज्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु में सिनेमाघर अभी भी नहीं खुले हैं.


दिल्ली-एनसीआर के सिनेमाघरों में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ और नए ‘गाइडलाइंस’ का पालन किया जा रहा है, पर दर्शक नज़र नहीं आ रहे. पीवीआर जैसे मल्टीप्लेक्स दर्शकों के लिए तरह-तरह के ऑफर लेकर आए हैं. यहाँ तक कि आप चाहें तो पूरा हॉल बुक करवा कर ‘प्राइवेट व्यूइंग’ का लुत्फ उठा सकते हैं.

मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में पुरानी फिल्में मसलन ‘कबीर सिंह’, ‘पैरासाइट’ आदि ही दिखाई जा रही हैं, नई फिल्मों को लेकर निर्माताओं और वितरकों के बीच कोई योजना नहीं दिखती है. कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन से पहले मैंने ये फिल्में देखी थी. सवाल है कि नई फिल्में यदि रिलीज नहीं होंगी तो कोई दर्शक सिनेमाघर क्यों जाएगा? असल में दर्शकों के बीच अनिश्चितता की वजह से निर्माता-वितरक भी बड़ी फिल्मों को रिलीज कर कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते. ऐसा नहीं है कि लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे. पिछले दिनों जब मैं दिल्ली के एक मॉल में गया, जहाँ कई मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर भी स्थित हैं, तब वहां भीड़ कम थी. हालांकि ‘फूड प्लाजा’ में लोग खा-पी रहे थे, खरीददारी भी कर रहे थे. पर सिनेमाघरों के बाहर कोई गहमागहमी नहीं थी.

दशहरा, दीवाली, ईद, क्रिसमस बड़े स्टारों की फिल्मों के रिलीज के लिए मुफीद माना जाता रहा है. ईद के दौरान सलमान खान की फिल्मों को लेकर उनके फैन्स में हमेशा एक दीवानगी रहती है. आश्चर्य नहीं कि सलमान खान की आने वाली एक फिल्म का नाम ‘कभी ईद, कभी दीवाली’ है. फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी ने पिछले साल प्रकाशित हुई अपनी किताब ‘रील इंडिया’ में सलमान खान के एक फैन के हवाले से लिखा है- ‘उनकी फिल्में ईद पर थिएटर में आती है. रमजान के दौरान लंबे रोजा के बाद यह महाभोज की तरह आता है.’ भारत में सबसे ज्यादा फिल्में बनती हैं और मनोरंजन के लिए सिनेमा हर आयुवर्ग के दर्शकों को लुभाता रहा है.

हर स्टार के अपने ‘फैन्स’ हैं. सिनेमा के कारोबार से जुड़े लोगों को इन्हीं फैन्स से उम्मीदें है कि वे फिर से सिनेमाघरों में लौटेंगे. पर सलमान, शाहरूख या आमिर खान की किसी फिल्म के रिलीज होने को लेकर कोई चर्चा नहीं है. प्रसंगवश, 25 साल पहले शाहरुख खान और काजोल की बहुचर्चित फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ दीवाली के आस-पास ही रिलीज हुई थी.

बॉलीवुड को एक ‘ब्लॉकबस्टर’ फिल्म का बेसब्री से इंतजार है. अक्षय कुमार की एक्शन फिल्म ‘सूर्यवंशी’ और भारतीय क्रिकेट टीम के विश्व कप की रोमाचंक जीत पर आधारित रणवीर सिंह की फिल्म ‘83’ दशहरा-दीवाली के दौरान रिलीज करने की बात की जा रही थी, पर त्योहारों के इस मौसम में इन फिल्मों के रिलीज होने को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है. जबकि अक्षय कुमार की ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ ऑनलाइन प्लेटफार्म पर अगले महीने रिलीज हो रही है. सिनेमाघरों के बंद होने से इंटरनेट के माध्यम से ‘ओवर द टॉप’ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को फायदा पहुँचा, वहीं सिनेमाघरों से जुडे लोगों के रोजगार और व्यवसाय को भारी नुकसान हुआ है. लॉकडाउन के दौरान कारोबार के जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं उसमें सिनेमा उद्योग भी शामिल है.

(प्रभात खबर 25 अक्टूबर 2020)

Tuesday, June 09, 2020

संघर्ष की छवियाँ


आधुनिक हिंदी साहित्य में शुरुआती दिनों से ही किसानों, कामगारों और मजदूरों की संघर्षमयी छवि दिखाई देती रही है. प्रेमचंद, निराला, नागार्जुन का साहित्य इसके दृष्टांत हैं. पर कुछ कहानियों के लिए साहित्य पर्याप्त नहीं होते. समकालीन समय में फोटोग्राफी इसके लिए माकूल है. तस्वीरें ना सिर्फ हमारे समय को ‘रिकार्ड’ कर रही होती हैं, बल्कि यह ऐतिहासिक साक्ष्य भी बन कर हमारे सामने आती है.


इसलिए मीडिया में इस बात का उल्लेख बार-बार होता है कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है. दक्षिण अफ्रीकी फोटो पत्रकार केविन कार्टर की वर्ष 1993 में सूडान में भूखमरी से जूझते एक बच्चे और गिद्ध की फोटो की चर्चा आज भी होती है. इस फोटो के लिए उन्हें बहुचर्चित पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. हाल ही में जब सुप्रीम कोर्ट में प्रवासी मजदूरों के मामले में सुनवाई हुई तो उस फोटो का गलत ढंग से जिक्र किया. हालांकि बाद में इसकी तीखी आलोचना भी हुई.

सच यह है कि कोरोना महामारी के दौरान पिछले कुछ महीने में प्रवासी मजदूरों की जो तस्वीरें मीडिया के माध्यम से आईं, वे महाकाव्यात्मक पीड़ा लिए हुए है. इन तस्वीरों ने देखने के हमारे नजरिए को बदल कर रख दिया है. ये आम छवियाँ नहीं है, जिसे चौबीस घंटे टीवी चैनल और सर्वव्यापी मोबाइल फोन के दौर में हम देखते रहते हैं. यह पीड़ा के साथ-साथ मानवीय जिजीविषा, करुणा और संघर्ष की तस्वीरें भी हैं. ये राष्ट्र-राज्य के निर्माण में हाशिए पर रहने वाले मजदूरों की भूमिका और राष्ट्र-राज्य की जिम्मेदारी को भी अपने जद में समेटे हुए है.

कुछ दृश्य राष्ट्र की सामूहिक चेतना में लंबे समय के लिए अंकित हो जाते हैं. देश विभाजन, महात्मा गाँधी की हत्या, भोपाल गैस कांड की तस्वीरें आदि इसी श्रेणी में आती हैं. पर हाल में महानगरों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों के जिस हृदय विदारक दृश्य को दुनिया ने देखा है, उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. रोजी-रोटी औऱ सिर छिपाने के ठौर छिन जाने के बाद माथे पर गठरी और गोद में बच्चों को लिए सड़कों पर भूखे-प्यासे पैदल चलते इन्हें दुनिया ने देखा. दिल्ली, मुंबई, सूरत से बिहार, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, तेलंगाना में स्थित अपने गाँव-घरों को पहुँचने को बेसब्र, ट्रकों में लदे, साइकिल-ऑटो से हजारों मीलों की दूरी तय करते कामगारों या मजदूरों की तस्वीरें आने वाले समय में हमें उद्वेलित करती रहेंगी. पर क्या यह सच नहीं है कि शहरी समाज के हाशिए पर रहने वाले ये कामगार, मजदूर हमारे बीच रह कर भी हमारी आँखो से ओझल थे? यदा-कदा किसी हादसे की खबर के साथ ही वे हमसे रू-ब-रू होते थे.

देश के अर्थशास्त्री जहाँ मजदूरों के लिए शहरों में बेहतर सुविधा बहाल करने की बात कर रहे हैं, ताकि फिर से उन्हें वापस बुलाया जा सके, वहीं लोक कल्याणकारी राज्य की दुहाई देने वाले राजनेताओं के पास कोई मुकम्मल जवाब नहीं है. एक बात तय है कि विकास के दावे और जीडीपी के आँकड़ों के बीच बेबसी की ये यथार्थ तस्वीरें हमारी सामूहिक विफलता की इबारत लिख गया है. साथ ही उदारीकरण के बाद नई आर्थिक व्यवस्था पर भी यह सवाल खड़े कर गया है. अर्थशास्त्रियों ने इस बात को लगातार रेखांकित किया है कि उदारीकरण के साथ समाज में आर्थिक विषमता की खाई और भी गहरी हुई है.

किसी भी तरफ हम नज़र दौड़ा लें, यह खाई और ज्यादा साफ दिखने लगी है और सत्ता का व्यवहार भी समर्थ वर्गों के प्रति ज्यादा नरम दिखने लगा है. हालांकि यह कोई नई बात नहीं है कि सत्ता समर्थ तबकों के हित में बिना किसी संकोच के काम करती है. लेकिन सत्ता के शासन के दायरे में खुद को नागरिक मानने वाले लोगों के भीतर अपनी नजर डालने की उम्मीद हो आती है तो यह भी गलत नहीं है. लेकिन सत्ता का रुख और व्यवहार ही तय करता है कि किसी समाज में शासितों की स्थिति मानवीय होगी या नहीं!

कवि केदारनाथ अग्रवाल ने बंगाल में अकाल के दौरान लाखों लोगों की विवशता और लाचारी को देखते हुए लिखा था: 'बाप बेटा बेचता है, भूख से बेहाल होकर/ धर्म, धीरज प्राण खोकर/ हो रही अनरीति बर्बर, राष्ट्र सारा देखता है.' वह औपनिवेशिक भारत के दौर की बात थी, जिसमें भूख से और राजनैतिक अक्षमता की वजह से लाखों लोगों की मौत हुई थी. पर आजाद भारत में कामगारों, मजदूरों की छवियाँ राष्ट्र और दुनिया के सामने हमारी बेबसी और विषमता को दिखाती है. गुरुग्राम से साइकिल पर एक दुर्घटना में घायल अपने पिता को दरभंगा लाने वाली ज्योति की बात हो या सूरत से ट्रक पर अपने घर को लौट रहे बीमार अमृत को सहारा देने वाले याकूब की. उल्लेखनीय है कि अमृत की बीच रास्ते में मौत हो गई. अमृत की तरह ही इस दुस्साहसिक यात्रा को कई मजदूर पूरा नहीं कर पाए.

इन कामगार और मजदूरों की आँखों में व्यवस्था से विद्रोह के भाव नहीं थे, एक विवशता और लाचारी थी. वे वहीं लौट जाना चाहते थे जहाँ की मिट्टी ने उन्हें बनाया है. सोशल मीडिया में वायरल हुई एक तस्वीर में केरल के एर्नाकुलम से राँची स्पेशल ट्रेन से उतरे कुछ कामगार, मजदूरों ने सबसे पहले जमीन को माथे से लगाया. इस मर्मभेदी दृश्य की शब्दों में व्याख्या संभव नहीं है.

(जनसत्ता, 9 मई 2020)

Thursday, May 07, 2020

इंफोडेमिक से लड़ाई: कोरोना महामारी


कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम को लेकर दुनिया भर में युद्ध स्तर पर कोशिश की जा रही है. इस वायरस के वैक्सीन की खोज भी जारी है. हालांकि  'लॉकडाउनके  बीच समाज में सूचनाओं का जाल भी चारों ओर फैला हुआ है. सही सूचनाएँ जहाँ आम लोगों की दुश्चिंताएँ कम करती हैंवहीं इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से फैलने वाले दुष्प्रचार लोगों की परेशानियाँ बढ़ाने का कारण बनते हैं. इस महामारी से बचाव के लिए जहाँ विशेषज्ञों की टीम के माध्यम से सही सूचनाएँ लोगों तक पहुँचती है, वहीं बेबुनियाद और अवैज्ञानिक समाधान से भी सूचना संसार अंटा पड़ा है. साथ ही, हाल ही में जिस तरह से लॉकडाउन के बीच कई जगहों पर प्रवासी कामगारों की भीड़ उमड़ीवह चिंताजनक है. इसी तरह से दुष्प्रचारफेक न्यूज की वजह से लोगों में समान खरीद कर घरों में जमा करने की होड़ भी दिखी. सामाजिक सौहार्द के बदले इस महामारी को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश भी मीडिया के कुछ हिस्से में देखने को मिला है.

कोरोना महामारी के बीच इस तरह के दुष्प्रचार को इंफोडेमिक’ कहा जा रहा है. शब्दकोष में यह शब्द अभी जगह नहीं पा सका हैपर वर्ष 2002-3 में सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रोम (सार्स) वायरस के फैलने के दौरान पहली बार इस शब्द की चर्चा हुई थी.  शाब्दिक अर्थ में इसे सूचना महामारी’ कह सकते हैं- सूचनाओं की अधिकता जो दुष्प्रचारअफवाह की शक्ल लेती है. महामारी से लड़ने मेंसमाधान ढूंढ़ने में यह बाधा बन कर खड़ी हो जाती है.  लोगों में भय का संचार भी इससे होता है. मानवीय भय और असुरक्षा के बीच सही सूचनाएँ एकजुटता को बनाए रखती हैंजो इस महामारी से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने हाल में कहा कि हमारा साझा दुश्मन कोविड-19 हैलेकिन दुष्प्रचार के माध्यम से जो इंफोडेमिक’ फैला है वह भी दुश्मन है.’ इसी बात को डब्लूएचओ के महानिदेशक टेडरोस गेब्रेयसस ने भी कहा कि हम ना सिर्फ महामारी से लड़ रहे हैं बल्कि इंफोडेमिक से भी लड़ रहे हैं.’ असल में लोगों का विश्वास हासिल कर ही सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियाँ इस महामारी के रोकथाम का उपाय कर सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संबोधन में नागरिकों से सहयोग की बार-बार अपील की है.

समाज के विकास की अवस्था के साथ ही संचार की तकनीकी और माध्यम का भी विकास होता रहा है. औपनिवेशिक शासन के दौरान  रिसालेहरकारेडाकभाट आदि खबरोंसूचनाओं के प्रसार का माध्यम होते थे. फिर अखबारों की दुनिया से गुजरते हुए हमारा समाज रेडियो और टेलीविजन जैसे जनसंचार के माध्यम तक पहुँचा.  भूमंडलीकरण के साथ हम एक बड़े सूचना समाज का हिस्सा बन गए हैं. समकालीन समाज में सूचना और तकनीक हमारे जीवन का अंग है. इंटरनेट के माध्यम से फैली सोशल मीडिया हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है. पिछले दशक में जिस तेजी से सोशल मीडिया की पहुँच बढ़ी है वह अखबारटेलीविजन जैसे मीडिया के मुकाबले अप्रत्याशित कही जा सकती है.

प्रसंगवशइतिहासकार रंजीत गुहा ने एक अध्ययन में नोट किया है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान  किसान विद्रोहों और सिपाही विद्रोह को सत्ता सरकारी कागजातों में महामारी’ के रूप में देख रही थी. यहाँ महामारी सत्ता के नजरिए से एक अलग अर्थ की व्यंजना करती हैजिसमें किसानों की सामूहिक उद्यमों की नकार है. वे लिखते हैं कि इन विद्रोहों के प्रसार में अफवाहों की एक बड़ी भूमिका थी. उस समय में हमारे समाज में शिक्षा का प्रसार बेहद कम था और खबरों के प्रसार की गति बहुत ही धीमी थी. वर्तमान समय में इंटरनेट के माध्यम से पलक झपकते ही सूचनाएँ मीलों की दूरी तय कर लेती है. जाहिर है खबर की शक्ल में मनगढंत बातेंदुष्प्रचारअफवाह आदि समाज में पहले भी फैलते रहते थे. पर उनमें और आज जिसे हम फेक न्यूज समझते हैंबारीक फर्क है. 

ऐसी खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता ना हो फेक न्यूज कहलाता है. इस तरह की खबरों की मंशा सूचना या शिक्षा नहीं होता है बल्कि समाज में वैमनस्य फैलानालोगों को भड़काना होता है. लोगों के व्यावसायिक हित के साथ-साथ राजनीतिक हित भी इससे जुड़े होते हैं. समाज में तथ्यों के सत्यापन की संस्कृति का अभाव भी इसके लिए जिम्मेदार है.

सच यह है कि  कोई भी तकनीक इस्तेमाल करने वालों पर निर्भर करती है. दुष्प्रचार फैलाने का जिम्मा भी उन्हीं लोगों पर हैजो तकनीक का इस्तेमाल संचार के लिए कर रहे हैं. 

इंफोडेमिक के लिए सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के सिर दोष मढ़ा जा रहा है. पर  लॉकडाउन’ के बीच घर से काम करने के दौरानस्कूली शिक्षा के लिए सूचना की नई तकनीक और सोशल मीडिया मुफीद साबित हो रहे हैं. साथ ही अखबार और टेलीविजन जैसे पारंपरिक जनसंचार के माध्यमों से जुड़े पत्रकार इंटरनेट के प्लेटफार्म का इस्तेमाल खबरों के संग्रहण और प्रसारण में कर रहे हैंजो एक हद तक दुष्प्रचार को रोकने में सहायक है.

(प्रभात खबर, 7 मई 2020)

Monday, April 27, 2020

सिनेमाघर में बसे यादों के जुगनू


दुनिया भर में कोरोना वायरस की वजह से सिनेमाघरों पर ताले लगे हैं. सोशल डिस्टेनसिंगजैसे शब्द सिनमाघरों के भविष्य पर सवाल बन कर खड़े हैं. हालांकि चीन में करीब दो महीने बाद पाँच सौ सिनेमाघरों को फिर से खोला गया, पर दर्शकों के उत्साह नहीं दिखाने के बाद इन्हें फिर से बंद कर दिया गया.

लॉकडाउनके बीच सिनेमाप्रेमियों में सिनेमाघरों को लेकर एक तरह का नॉस्टेलजिया देखने को मिल रहा है. मुंबई भले ही बॉलीवुड का आंगन हो, सिनेमा की संस्कृति आजाद भारत में दिल्ली में फली-फूली. साल 1995 में जब मैं दिल्ली आया, वह हॉलीवुड का सौंवा साल था. यह साल भारतीय सिनेमा के प्रदर्शन, सिनेमा देखने-दिखाने की संस्कृति को बदल कर रख देने वाला साल भी है. इसी साल पीवीआर लिमिटेड (प्रिया विलेज रोड शो) अस्तित्व में आया. संयोगवश, दिल्ली में पहली फिल्म बेसिक इंस्टिंक्ट (माइकल डगल्स और शेरोन स्टोन अभिनीत)मैंने दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमामें ही देखी थी. 

उन दिनों के अखबारों में इस फिल्म की खूब चर्चा थी. इस फिल्म को सर्टिफिकेट दिया गया था और मैं तब अठारह साल का नहीं हुआ था. किसी तरह मान-मनुहार कर मैं सिनेमा हॉल में घुस गया था. बालकनी के बाहर हॉलीवुड के विभिन्न दशकों के फिल्मों के पोस्टर लगे थे, जो सिनेमा के सौ वर्षों की यात्रा को दिखाते थे.

आज किसी शहर की संस्कृति को हम सिनेमाघरों के रास्ते भी परख सकते हैं. सिनेमा के इतिहास को पत्रकार और समीक्षक जिया उस सलाम ने अपनी किताब देल्ही 4 शोज: टाकिज ऑफ यस्टरइयरमें सिनेमाघरों के माध्यम से बखूबी समेटा है. उन्होंने लिखा है कि प्रिया और उसके साथ चाणक्य और अर्चना 80 के दशक के मध्य तक अंग्रेजी फिल्में दिखाने के लिए मशहूर थे, जबकि शीला, ओडियन और रिवोली हिंदी सिनेमा दिखाने की ओर पूरी तरह कदम बढ़ा चुके थे. कभी-कभार हॉलीवुड की फिल्मों के लिए एक खिड़की इन्होंने खुली छोड़ रखी थी.’ 

हालांकि 90 के दशक में यहाँ भी हिंदी फिल्में दिखाने का चलन जोर पकड़ा, पर हॉलीवुड की फिल्में भी नियमित रूप से दिखाई जाती रही. सही मायनों में मेरे जैसे सिनेमाप्रेमी के लिए सिनेमाघर फिल्म एप्रिशिएशनका एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है. मल्टीप्लेक्स के दौर में जवान हो रही पीढ़ी और लॉकडाउन के बीच ओवर द टॉपस्ट्रीमिंग वेबसाइट (नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉट स्टार आदि)पर सिनेमा का लुत्फ लेने वाले सिनेमाप्रेमियों को बालकनी, रियर और स्टॉल जैसे शब्दों के अर्थ ढूंढ़ने के लिए शब्दकोश का शायद सहारा लेना पड़े.

प्रसंगवश, 1918-20 में जब स्पेनिश फ्लूवायरस दुनिया में फैली थी, तब भी सिनेमाघरों को बंद किया गया था, पर उस वक्त ऐसे एकमुश्त ताले नहीं लगे थे. उस वक्त भारत जैसे देश में सिनेमा की संस्कृति ठीक से विकसित भी नहीं हुई थी. बाद में टेलीविजन के आने से फिल्म संस्कृति पर ग्रहण लगता दिखा था, पर सिनेमाघर टिके रहे. ज्यादातर सिनेमाघर सिंग्ल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स में तब्दील हुए. मॉल की संस्कृति, सिनेमा की संस्कृति से जुड़ती गई. उम्मीद करें कि जब कोरोना का कोहरा छटेगा अंधेरे बंद कमरों में चमकते जुगनूओॆ का जादू लोगों को फिर से सिनेमाघर खींच लाने में कामयाब होंगे. सिनेमा से बड़ा मनोरंजन का कोई जरिया भी तो नहीं!

(प्रभात खबर, 26 अप्रैल 2020)

Friday, April 10, 2020

टेलीविजन की वापसी


कोरोना वायरस की वजह से देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान लोग घरों में सिमटे हैं. समाचार पत्रों के वितरण-प्रकाशन, पठन-पाठन पर इसका प्रभाव पड़ा है. ऐसे में फिर से टेलीविजन घरों के केंद्र में आ गया. रामायण, महाभारत जैसे सिरीयलों के साथ-साथ एक बार फिर से समाचार चैनल प्रासंगिक हो उठे है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोरोना संकट के बीच राष्ट्र के नाम संदेश के लिए टेलीविजन का बखूबी सहारा लिया.

पिछले दो दशकों में उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप सेटेलाइट, निजी टेलीविजन समाचार चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ. जनसंचार, विचार-विमर्श, छवियों के निर्माण और संसदीय चुनावों के दौरान राजनीतिक लामबंदी में टेलीविजन समाचार चैनल एक प्रमुख माध्यम बनके उभरे हैं. चर्चित आलोचक रेमंड विलियम्स ने टेलीविजननाम से लिखी अपनी किताब में टेलीविजन माध्यम को तकनीक और विशिष्ट सांस्कृतिक रूप में परखा है. विजुअल माध्यम होने से टीवी के दर्शकों के बीच सहभागिता का सहज बोध होता है. हालांकि खबरों, विभिन्न कार्यक्रमों के साथ विज्ञापन भी लिपटा हुआ दर्शकों तक चला जाता है, जो इन कार्यक्रमों के लागत और चैनलों के मुनाफा का प्रमुख जरिया है.

उदारीकरण के बाद खुली अर्थव्यस्था में मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम है. उसकी एक स्वायत्त संस्कृति भले हो पर अब वह कारपोरेट जगत का हिस्सा है. समकालीन मीडिया की व्याख्या में इन रिश्तों की पड़ताल भी बेहद जरूरी है. निस्संदेह, हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार हुआ है, लेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य दर्शकों की संख्या को बढ़ाना, टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है. 21वीं सदी के दो दशक भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के विस्तार के रहे, पर इसके साथ ही इसी दशक में चैनलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे.

प्रसंगवश, 2008-09 में दुनिया भर में आए आर्थिक मंदी का असर भारतीय टेलीविजन उद्योग की सेहत पर पड़ा और चैनलों का जोर दूर-दराज की सुध लेने, खोजपरक कहानियों को ढूंढ़ने से ज्यादा टीवी स्टूडियो में होने वाले विचार-विमर्श और बहस की ओर तेजी से बढ़ा है. एंकर और प्रोड्यूसर का ध्यान ऐसे मुद्दों पर बहस करवाना होता है जिससे कि स्टूडियो में एक नाटकीयता का संचार हो. इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होता, बल्कि उनके चित-वृत्तियों के निम्नतम भावों को जागृत करना होता है. ऐसे में एंकरों-प्रोड्यूसरों की तलाश उन मुद्दों की तरफ ज्यादा रहती है जिसमें सनसनी भाव हो.

टेलीविजन न्यूज का दूसरा दशक पूरी तरह इन्हीं विमर्शों को समर्पित रहा. इन वर्षों में समाचार चैनलों में संवादताओं की भूमिका कम हुई, ‘कास्ट कटिंगपर जोर रहा. कोरोना संकट के बाद फिर से आर्थिक मंदी का असर समाचार चैनलों की सेहत पर पड़ेगा. ऐसे में सवाल है कि इस बीच जो दर्शकों में टीवी उद्योग ने अपनी पैठ बनाई है, क्या उसे बरकरार रख पाएगी. क्या खोई हुई विश्वसनीयता वह अर्जित कर पाएगी?

(प्रभात खबर, 10 अप्रैल 2020)