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Tuesday, August 15, 2023

पीढ़ियों के साथ सिनेमा का सफर


सिनेमा के बिना आधुनिक भारत की कल्पना नहीं की जा सकती है. सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का यह अभिन्न हिस्सा है. हाल में रिलीज हुई करण जौहर की फिल्म रॉकी और रानी की प्रेम कहानी में किरदार फिल्मी गानों के सहारे ही स्मृतियों और सपनों को जीते हैं. जीवन भी तो स्मृतियों, इच्छाओं और सपनों का ही पुंज है.

याद कीजिए हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पंचलाइट में भी गोधन मुनरी को देखकर सलीमा का गाना गाता है- हम तुमसे मोहब्बत करके सलम..’.  सिनेमा विभिन्न कलाओं-साहित्यसंगीतअभिनयनृत्यपेंटिगस्थापत्य को खुद में समाहित किए हुए है. जनसंचार का माध्यम होने के नाते और पॉपुलर संस्कृति का अंग होने से सिनेमा का प्रभाव एक बहुत बड़े समुदाय पर पड़ता है. जाहिर है, आजाद भारत में बॉलीवुड ने देश को एक सूत्र में बांधे रखने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है.

आजादी के तुरंत बाद सरकार ने भी देश में सिनेमा के प्रचार-प्रसार में रुचि ली. आज देश में हिंदीमराठी, बांग्लातमिलतेलुगूमलयालमअसमियाभोजपुरीमैथिलीमणिपुरी समेत लगभग पचास भाषाओं में फिल्म का निर्माण होता है. आश्चर्य नहीं कि आज दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्म का उत्पादन भारत में ही होता हैलेकिन जहाँ बॉलीवुड की फिल्मों की चर्चा होती हैअन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में समीक्षकों की नजर से ओझल ही रहती हैं.

भले बॉलीवुड के केंद्र में कारोबारमनोरंजन और स्टार’ का तत्व होलेकिन ऐसा नहीं कि पिछले सत्तर सालों में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से इसने नजरें चुराई हैं. इन दशकों में सामाजिक प्रवृत्तियों को सिनेमा ने परदे पर चित्रित किया. खासकरपिछले दशकों में भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद तकनीक और बदलते बाजार ने इसे नए विषय-वस्तुओं को टटोलनेसंवेदनशीलता से प्रस्तुत करने और प्रयोग करने को प्रेरित किया है.

पिछली सदी के पचास और साठ के दशक की रोमांटिक फिल्मों में आधुनिकता के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के सपनों की अभिव्यक्ति मिलती है. पचास-साठ के दशक की फिल्मों मसलन आवारादो बीघा जमीननया दौरमदर इंडियाप्यासा, मुगले आजमसाहब बीवी और गुलाम, गाइड आदि ने हिंदी सिनेमा को एक मजबूत आधार दिया. इस दशक की फिल्मों पर नेहरू के विचारों की स्पष्ट छाप है. दिलीप कुमार इसके प्रतिनिधि स्टार-अभिनेता के तौर पर उभरते हैं. हालांकि राज कपूरदेवानंदगुरुदत्त जैसे अभिनेताओं की एक विशिष्ट पहचान थी.

पचास के दशक में पाथेर पांचाली के साथ सत्यजीत रे का आविर्भाव होता हैजिनकी फिल्मों के बारे में चर्चित जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने कहा था- 'सत्यजीत रे की फिल्मों को जिसने नहीं देखामानो वह दुनिया में बिना सूरज या चाँद देखे रह रहा है'. आजादी के बाद करवट बदलते देशपरंपरा और आधुनिकता के बीच की कश्मकश इन फिल्मों में मिलती है. रे के समकालीन रहे ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों का मुहावरा और सौंदर्यबोध रे से साफ अलग था. जहाँ घटक की फिल्में मेलोड्रामा से लिपटी थी वहीं सेन की फिल्मों के राजनीतिक तेवरप्रयोगशीलता ने आने वाली पीढ़ी के फिल्मकारों को खूब प्रभावित किया. सेन का सौंदर्य बोध रे से अलहदा था. वे कलात्मकता के पीछे कभी नहीं भागे. रे की गीतात्मक मानवता’ भी उन्हें बहुत रास नहीं आती थीसाथ ही ऋत्विक घटक के मेलोड्रामा से भी उनकी दूरी थी

साठ के दशक में पुणे में फिल्म संस्थान की स्थापना हुई जहाँ से अडूर गोपालकृष्णनमणि कौलकुमार शहानीकेतन मेहता, सईद मिर्जाजानू बरुआगिरीश कसरावल्लीजॉन अब्राहम जैसे फिल्मकार निकले जिन्होंने विभिन्न भाषाओं में सिनेमा को मनोरंजन से अलग एक कला माध्यम के रूप में स्थापित किया.

सत्तर के दशक में सिनेमा नक्सलबाड़ी आंदोलन’ की पृष्ठभूमि से होते हुए युवाओं के मोहभंगआक्रोश और भ्रष्टाचार को अभिव्यक्त करता है. जंजीरदीवार जैसे फिल्मों के साथ अमिताभ बच्चन इस दशक के प्रतिनिधि बन कर उभरे. हालांकि सत्तर-अस्सी के दशक में देश-दुनिया में भारतीय समांतर सिनेमा की भी धूम रही. आक्रोशअर्धसत्य, जाने भी दो यारोमंडी जैसी फिल्मों की चर्चा हुई. असल मेंभारतीय सिनेमा में शुरुआत से ही पॉपुलर’ के साथ-साथ पैरेलल’ की धारा बह रही थीपर इन दशकों में पुणे फिल्म संस्थान (एफटीआईआई) से प्रशिक्षित युवा निर्देशकोंतकनीशियनों के साथ-साथ नसीरुद्दीन शाहओम पुरीशबाना आज़मीस्मिता पाटिल जैसे कलाकार उभरे. सिनेमा सामाजिक यथार्थ को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने लगा. सिनेमा साहित्य के करीब हुआ. मणि कौलकुमार शहानीअडूर गोपालकृष्णन की फिल्में इसका उदाहरण हैंजहाँ निर्देशक की एक विशेष दृष्टि दिखाई देती है. हम कह सकते हैं कि समांतर सिनेमा का सफर 21वीं सदी में भी जारी हैभले स्वरूप में अंतर हो. अनूप सिंहगुरविंदर सिंहअमित दत्ता जैसे अवांगार्द फिल्मकार इसी श्रेणी में आते हैं.

नब्बे के दशक में उदारीकरण और भूमंडलीकरण के बाद देश में जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए उसे शाहरुखसलमानआमिर खानअक्षय कुमारअजय देवगन की फिल्मों ने पिछले तीन दशकों में प्रमुखता से स्वर दिया हैं. यकीननबॉलीवुड मनोरंजन के साथ-साथ समाज को देखने की एक दृष्टि भी देता है.

कोई भी कला समकालीन समय और समाज से कटी नहीं होती है. हिंदी सिनेमा में भी आज राष्ट्रवादी भावनाएं खूब सुनाई दे रही है. आजादी के तुरंत बाद बनी फिल्मों में भी राष्ट्रवाद का स्वर थाहालांकि तब के दौर का राष्ट्रवाद और आज के दौर में जिस रूप में हम राष्ट्रवादी विमर्शों को देखते-सुनते हैं उसके स्वरूप में पर्याप्त अंतर है. यह एक अलग विमर्श का विषय है.

तकनीक क्रांति के इस दौर में मनोरंजन की दुनिया में सामग्री के उत्पादन और उपभोग के तरीकों में काफी बदलाव आया है. एक आंकड़ा के मुताबिक भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म का बाजार सब्सक्रिप्शन सहित करीब दस हजार करोड़ रुपए का हैजो इस दशक के खत्म होते-होते तीस हजार करोड़ तक पहुँच जाएगा. बॉलीवुड और सिनेमाघरों को ओटीटी प्लेटफॉर्म से चुनौती मिल रही है. साथ ही संभावनाओं के द्वार भी खुले हैं. यहाँ नए विषयों के चित्रण के साथ प्रयोग की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं. न सिर्फ दर्शक बल्कि बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक और कलाकारों की नज़र भी इस बढ़ते हुए बाजार पर टिकी है. 

पिछले दशक में भारत आर्थिक रूप से दुनिया में शक्ति का एक केंद्र बन कर उभरा हैलेकिन जब हम सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पॉवर) की बात करते हैं सिनेमा ही नज़र आता है. यह भारतीय सिनेमा की सफलता है.

Friday, December 30, 2022

वर्षांत 2022: दक्षिण भाषाई फिल्मों के दबदबे में रहा बॉलीवुड


साल के आखिर में खबर आई कि ऑस्कर पुरस्कार के लिए पान नलिन की गुजराती फिल्म 'छेल्लो शो' (आखिरी शो) को शॉर्टलिस्ट किया गया है. भारत की ओर से यह फिल्म ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी’ के लिए आधिकारिक रूप से भेजी गई थी. साथ ही बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाने वाली एसएस राजामौली की ‘आरआरआर’ (तेलुगु) के गाने ‘नाटू-नाटू’ को भी ‘म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की कैटेगरी में शॉर्टलिस्ट किया गया.

नए वर्ष में ऑस्कर पुरस्कार का परिणाम चाहे जो हो, तय है कि वर्ष 2022 में भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्मों का दबदबा रहा. एक आंकड़ा के मुताबिक कोरोना महामारी के दो साल के बाद भारतीय सिनेमा ने बॉक्स ऑफिस पर करीब 11 हजार करोड़ का कारोबार किया. यहाँ भी हिंदी फिल्मों पर दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों की बढ़त दिखी. न सिर्फ ‘आरआरआर’ बल्कि कन्नड़ भाषा में बनी ‘केजीएफ 2’ और ‘कांतारा’ ने भी सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. मणि रत्नम की ‘पोन्नियन सेल्वन (पीएस-1)’ (तमिल) के प्रति भी लोगों में उत्सुकता रही. इन फिल्मों की विषय-वस्तु और परदे पर फिल्मांकन में पर्याप्त भिन्नता है.
‘छेल्लो शो’ सौराष्ट्र के एक बच्चे की सिनेमा के प्रति दुर्निवार आकर्षण को केंद्र में रखती है. यह एक आत्मकथात्मक फिल्म है, वहीं ‘कांतारा’ एक ऐसी दंत कथा है जिसमें दक्षिण कर्नाटक के तटीय इलाकों की स्थानीय लोक-संस्कृति, परंपरा, आस्था-विश्वास, रीति-रिवाज, धार्मिक मान्यताओं और मिथक को कहानी के साथ खूबसूरती से पिरोया गया है. आरआरआर (आजादी के आंदोलन) और पीएस-1 (चोल राजवंश) इतिहास को कथा का आधार बनाती है. ‘एक्शन ड्रामा’ इन फिल्मों के केंद्र में है. बड़े बजट की इन फिल्मों में ताम-झाम, रंग-रभस, भव्यता को जिस कौशल से बुना गया वह दर्शकों को सिनेमाहॉल में खींच लाने में कामयाब रहा. देश की बदलती सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति, संचार के साधनों का विस्तार, वितरण की रणनीति का भी इन फिल्मों की सफलता में योगदान रहा है. बॉलीवुड की पापुलर फिल्मों के फ्रेमवर्क में ही ये सारी फिल्में आती है. यहाँ विचार-विमर्श के बदले तकनीक हावी है. प्रसंगवश, कन्नड़ में समांतर सिनेमा का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है, जिसकी आज चर्चा नहीं होती.
बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्ववादी राजनीति की चहलकदमी इन फिल्मों में दिखाई दी. इस प्रसंग में बॉक्स ऑफिस पर खूब सफल रही विवेक अग्निहोत्री निर्देशित ‘ द कश्मीर फाइल्स’ की चर्चा जरूरी है. भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल (आईएफएफआई) के ज्यूरी प्रमुख, चर्चित फिल्मकार नादव लैपिड के द्वारा इस फिल्म को ‘अश्लील और प्रोपेगेंडा’ बताने से काफी विवाद हुआ, लेकिन फिल्म देखने वाले किसी भी सहृदय दर्शक और समीक्षक से यह बात छिपी नहीं थी कि फिल्मकार की मंशा सिनेमा के माध्यम से सत्य तलाशने की नहीं थी. एक बातचीत में चर्चित फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने मुझे कहा था कि ‘एक फिल्मकार के रूप में इतिहास के प्रति आपकी एक जिम्मेदारी होती है. जिस फिल्म में जितना प्रोपगेंडा होगा, उसका महत्व उतना ही कम होगा. फिल्म का इस्तेमाल प्रोपगेंडा के लिए भी होता है, पर ऐतिहासिक फिल्मों को बनाते हुए वस्तुनिष्ठता का ध्यान रखना जरूरी है. बिना वस्तुनिष्ठता के यह प्रोपगेंडा हो जाती है.’ दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में (करीब दो हजार) हिंदुस्तान में बनती है और इसे सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पावर) के रूप में स्वीकार किया जाता है. लोकतांत्रिक भारत की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ भी चाहे-अनचाहे फिल्मों में अभिव्यक्ति होती हैं.
बहरहाल, हिंदी फिल्मों की बात करें तो बड़े-बड़े स्टार भी कोई खास करिश्मा नहीं दिखा पाए. रणबीर कपूर की ‘शमशेरा’, अक्षय कुमार की ‘रक्षाबंधन’ और ‘सम्राट पृथ्वीराज’, रणवीर सिंह की ‘जयेशभाई जोरदार’ और ‘सर्कस’, कंगना रनौत की ‘धाकड़’ आदि फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने में असफल रही. आर्थिक बदहाली भी एक कारण है. ऐसे में बॉलीवुड पर काफी दबाव रहा. जाहिर है बॉलीवुड को नए विचारों, कहानियों की सख्त जरूरत है, जो दर्शकों के बदलते मिजाज के साथ तालमेल बना कर चल सके, पर डर है कि कहीं यह रास्ता दक्षिण भारतीय फिल्मों की ओर न ले जाए! पिछले दो दशक में हिंदी सिनेमा ने पापुलर और पैरलल के बीच का एक रास्ता अख्तियार कर कई बेहतरीन फिल्में दी और सही मायनों में आगे की दिशा का निर्धारण यहीं से होगा, न की घिसी-पिटी मसाला फिल्मों से.
बॉलीवुड के प्रमुख निर्देशक संजय लीला भंसाली ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ लेकर आए. एक ‘सेक्स वर्कर’ की भूमिका में आलिया भट्ट ने अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया. इसी क्रम में आमिर खान की ‘लाल सिंह चढ्ढा’ और रणबीर कपूर की ‘ब्रह्माशस्त्र’ की चर्चा जरूरी है, जिसने ठीक-ठाक व्यवसाय भले किया हो कुछ नया गढ़ने में नाकाम रही. सिनेमा निर्माण की दृष्टि से नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई ‘डार्लिंग्स (डार्क कॉमेडी, निर्देशक जसमीत के रीन)’ और ‘मोनिका ओ माय डार्लिंग (मर्डर मिस्ट्री, निर्देशक वासन बाला)’ बेहतरीन थी जिसकी चर्चा कम हुई. इन दोनों फिल्मों के निर्देशक और अभिनेता (आलिया भट्ट, विजय वर्मा, शेफाली शाह, राजकुमार राव) से नए साल में भी काफी उम्मीद रहेगी.
हिंदी फिल्मों के प्रति एक खास तबके में नकारात्मक भाव भी दिखाई दिया. मनोरंजन के साथ कोई दर्शक किस रूप में सिनेमा को ग्रहण करता है वह उसकी रूचि और सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है. एक खास विचारधारा के तहत सिनेमा को देखने-परखने पर रसास्वादन में बाधा पहुँचती है. आए दिन हिंदी फिल्मों को लेकर सोशल मीडिया पर ‘बॉयकॉट’ की ध्वनि सुनाई देती है वह कला और सिनेमा व्यवसाय दोनों के लिए चिंताजनक है. भूलना नहीं चाहिए कि सिनेमा उद्योग लाखों लोगों के लिए रोजगार का जरिया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है.
पापुलर से अलग पिछले कुछ सालों में जिन फिल्मों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पसंद किया गया उनमें स्वतंत्र फिल्मकारों की फिल्में ही रही. बजट के अभाव में इस प्रयोगधर्मी फिल्मों का प्रचार नहीं हो पाता, न हीं सिनेमाघरों में ये फिल्में रिलीज हो पाती है. ओटीटी प्लेटफॉर्म और फिल्म समारोह इनके लिए मुफीद हैं. कान फिल्म समारोह में भारत को ‘कंट्री ऑफ ऑनर’ के रूप में शामिल किया गया था. समारोह के फिल्म बाजार में ‘गामक घर’ फिल्म से चर्चित हुए अचल मिश्र की मैथिली फिल्म ‘धुइन (धुंध)’ दिखाई गई.
जहाँ ‘गामक घर’ में निर्देशक का पैतृक घर था, वहीं यह पूरी फिल्म दरभंगा में अवस्थित है. दरभंगा को मिथिला का सांस्कृतिक केंद्र कहा जाता है, पर कलाकारों की बदहाली, बेरोजगारी इस सिनेमा में मुखर है. ‘गामक घर’ की तरह ही इस फिल्म के सिनेमैटोग्राफी में एक सादगी है, जो ईरानी सिनेमा की याद दिलाता है. इन फिल्मों की सफलता ने मैथिली सिनेमा में एक युग की शुरुआत की है. इसी क्रम में प्रतीक शर्मा की ‘लोट्स ब्लूमस’ ने आईएफएफआई में शामिल होकर सुर्खियां बटोरी. अंत में, ऑस्कर में दो डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘ऑल दैट ब्रिद्स (शौनक सेन)’ और द एलीफेंट व्हिस्परर्स' (कार्तिकी गोंसाल्वेस) भी शॉर्टलिस्ट हुई है. आने वाले साल में फीचर के अलावे वृत्तचित्र पर भी लोगों की नजर रहेगी.

Sunday, October 30, 2022

बॉलीवुड के 'आइकन' अमिताभ बच्चन


हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसे अभिनेता कम ही हुए हैं, जिन्हें अस्सी साल की उम्र में केंद्रीय भूमिका मिलती रही हो. फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की नई फिल्म ‘गुडबाय’ कुछ दिन पहले आई है. विकास बहल निर्देशित इस ‘ट्रेजीकॉमेडी’ में एक भी ऐसा दृश्य नहीं है, जिसमें वे नहीं हो. यह मनोरंजक फिल्म पारिवारिक रिश्तों को समेटे है. फिल्म में नीना गुप्ता, रश्मिका मंदाना, आशीष विद्यार्थी, सुनील ग्रोवर की भी प्रमुख भूमिका है, लेकिन परिवार के मुखिया अमिताभ बच्चन की चिर-परिचित आवाज सब पर भारी है.

अमिताभ बच्चन पचास साल से ज्यादा समय से बॉलीवुड में सक्रिय हैं. हमारी पीढ़ी ने पिछली सदी में 70 के दशक के अमिताभ को परदे पर नहीं देखा. हमने जब होश संभाला तब तक ‘दीवार’, ‘जंजीर’, ‘शोले’ आदि फिल्में हिंदी सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गई थी. अस्सी के दशक के आखिर में, बिहार के एक छोटे कस्बे में जब दस-बारह साल की उम्र में अमिताभ को ‘शहंशाह’, ‘तूफान’, ‘जादूगर’ में देखा, तब उनका ‘स्टारडम’ ढलान पर था और फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट रही थी. ‘मैं आजाद हूं’ (1989) फिल्म में मसीहाई अंदाज में वे दिखते हैं. ऐसा लगने लगा था कि इस दशक के अमिताभ की आभा क्षीण हो गई.
सत्तर के दशक में अमिताभ ने ‘एंग्री यंग मैन’ की छवि में आम आदमी के असंतोष, क्षोभ, हताशा, सपने और मोहभंग को स्वर दिया. ‘दीवार’ (1975) फिल्म का विजय व्यवस्था से विद्रोह करता हुआ, हाशिये पर पड़ा एक आम आदमी है. देश के सामाजिक-राजनीतिक हालात के साथ ही इसमें लेखक सलीम-जावेद की जोड़ी की भी प्रमुख भूमिका रही. अस्सी के दशक में इसे हम समांतर सिनेमा की धारा में ओम पुरी अभिनीत ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’ जैसी फिल्मों में देखते हैं, जहाँ व्यवस्था से विद्रोह मुखर है.
हमारी पीढ़ी के लिए 90 के दशक में शाहरुख-आमिर-सलमान खान ही बॉलीवुड के हीरो रहे, हालांकि अमिताभ ‘अग्निपथ’, ‘अजूबा’, ‘मेजर साहब’ जैसी फिल्मों के माध्यम से मौजूद थे. सही मायनों में 21वीं सदी में ‘कौन बनेगा करोड़पति’ शो में कंप्यूटर जी’ से संवाद करते जब वे रुपहले परदे से उतर कर ड्राइंग रूम में पहुंचे तब उनसे हमारा परिचय हुआ. प्रसंगवश, ‘गुडबाय’ फिल्म में अमिताभ बच्चन एक जगह इस शो के इर्द-गिर्द एक चुटकुले का जिक्र भी करते हैं!
भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद आई संचार क्रांति ने सिनेमा की विषय-वस्तु को भी गहरे प्रभावित किया. सिनेमा ने सामाजिक बदलावों को अंगीकार किया है. मनोरंजन के साथ समाज को देखने का निर्देशक-लेखक का नजरिया बदला है. जाहिर है, ऐसे में अमिताभ के लिए लेखक ने नए किरदार गढ़े. ‘सरकार’, ‘चीनी कम’, ‘पा’,’ पीकू’, ‘पिंक’, ‘गुलाबो सिताबो’, ‘झुंड’ आदि फिल्में इसका उदाहरण है. इन फिल्मों में अमिताभ अपने ‘स्टार’ छवि से अलग होकर एक किरदार के रूप में हमसे जुड़ते हैं.
पचास साल तक लगातार लोगों का मनोरंजन करना आसान नहीं है. इस मायने में वे बॉलीवुड के 'आइकन' है, जिन्होंने दो पीढ़ी के दर्शकों और कलाकारों को प्रभावित किया है. हालांकि यहाँ पर यह जोड़ना उचित होगा कि यदि वे एक कलाकार के रूप में राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर गाहे-बगाहे अपनी आवाज बुलंद करते तब वे हमारे समय के और करीब होते.

Saturday, August 20, 2022

आजाद भारत में बॉलीवुड का सफर

युवा अर्थशास्त्री श्रयना भट्टाचार्य ने हाल में ही प्रकाशित किताब डिस्परेटली सीकिंग शाहरुखमें उदारीकरण के बाद भारतीय महिलाओं की जिंदगी, संघर्ष और ख्वाबों का लेखा-जोखा बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया है. खास बात यह है कि इस किताब में देश के विभिन्न भागों और वर्गों की महिलाओं की जिंदगी में साझेदारी फिल्म अभिनेता शाहरुख खान को लेकर बनती है, जो उनकी फैंटेसीऔर आजादीको पंख देता है.

इस बात पर शायद ही किसी को असहमति हो कि आजाद भारत में बॉलीवुड ने देश को एक सूत्र में बांधे रखने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है. भले बॉलीवुड के केंद्र में मनोरंजन और स्टारका तत्व हो, पर ऐसा नहीं कि आजादी के 75 वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से इसने नजरें चुराई हैं. खासकर, पिछले दशकों में तकनीक और बदलते बाजार ने इसे नए विषय-वस्तुओं को टटोलने, संवेदनशीलता के प्रस्तुत करने और प्रयोग करने को प्रेरित किया है-स्त्री स्वतंत्रता का सवाल हो या समलैंगिकता का!

आधुनिक समय में सिनेमा हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है. किसी भी कला से ज्यादा सिनेमा का प्रभाव एक बहुत बड़े समुदाय पर पड़ता है. आजादी के तुरंत बाद से सरकार ने देश में सिनेमा के प्रचार-प्रसार में रुचि ली. वर्ष 1949 में सिनेमा उद्योग की वस्तुस्थिति की समीक्षा के लिए फिल्म इंक्वायरी कमेटीका गठन किया गया था. इस समिति ने सिनेमा के विकास के लिए सुझाव दिए थे. इसी के सुझाव के आधार पर फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन’, जो बाद में नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशनके नाम से जाना गया, का गठन 1960 में किया गया. साथ ही सिनेमा के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए पुणे में फिल्म संस्थान (1960) की स्थापना हुई. क्या यह आश्चर्य नहीं कि बॉलीवुड की मुख्यधारा धारा से इतर भारत में जो समांतर सिनेमा (न्यू वेब सिनेमा) की शुरुआत हुई उसमें इन सरकारी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है!

तत्कालीन पीएम नेहरू देश-दुनिया के सामने सिनेमा के माध्यम से एक स्वतंत्र राष्ट्र की ऐसी छवि प्रस्तुत करना चाह रहे थे जो किसी महाशक्ति के दबदबे में नहीं है. वर्ष 1952 में देश के चार महानगरों में किए गए पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहके आयोजन को हम इस कड़ी के रूप में देख-परख सकते हैं. साथ ही देश के फिल्मकारों और सिनेमा प्रेमियों को विश्व सिनेमा की कला से परिचय और विचार-विमर्श का एक मंच उपलब्ध कराना भी उद्देश्य था. वे सिनेमा के कूटनीतिक महत्व से परिचित थे. तभी से सांस्कृतिक शिष्टमंडलों में बॉलीवुड के कलाकारों को शामिल किया जाता रहा है.

पचास और साठ के दशक की रोमांटिक फिल्मों में आधुनिकता के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के सपनों की अभिव्यक्ति मिलती है. फिल्मों पर नेहरू के विचारों की स्पष्ट छाप है. दिलीप कुमार इसके प्रतिनिधि स्टार-अभिनेता के तौर पर उभरते हैं. हालांकि राज कपूर, देवानंद, गुरुदत्त जैसे अभिनेताओं की एक विशिष्ट पहचान थी.

सत्तर-अस्सी के दशक में अमिताभ बच्चन की सिनेमा-यात्रा देश में नक्सलबाड़ी आंदोलनकी पृष्ठभूमि से होते हुए युवाओं के मोहभंग, आक्रोश और भ्रष्टाचार को अभिव्यक्त करता है. हालांकि इसी दशक में देश-दुनिया में भारतीय समांतर सिनेमा की धूम रही. बॉलीवुड में शुरुआत से ही पॉपुलरके साथ-साथ गाहे-बगाहे पैरेललकी धारा बह रही थी, पर इन दशकों में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षित युवा निर्देशकों, तकनीशियनों के साथ-साथ नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आज़मी, स्मिता पाटील जैसे कलाकार उभरे. सिनेमा सामाजिक यथार्थ को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने लगा. हम कह सकते हैं कि समांतर सिनेमा का सफर 21वीं सदी में भी जारी है, भले स्वरूप में अंतर हो.

नब्बे के दशक में उदारीकरण (1991) और भूमंडलीकरण के बाद देश में जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए उसे शाहरुख, सलमान, आमिर खान, अक्षय कुमार, अजय देवगन की फिल्मों ने पिछले तीन दशकों में प्रमुखता से स्वर दिया हैं. अमिताभ बच्चन भी नए रूप में मौजूद हैं. यकीनन, बॉलीवुड मनोरंजन के साथ-साथ समाज को देखने की एक दृष्टि भी देता है.

कोई भी कला समकालीन समय और समाज से कटी नहीं होती है. हिंदी सिनेमा में भी आज राष्ट्रवादी भावनाएं खूब सुनाई दे रही है. आजादी के तुरंत बाद बनी फिल्मों में भी राष्ट्रवाद का स्वर था, हालांकि तब के दौर का राष्ट्रवाद और आज के दौर में जिस रूप में हम राष्ट्रवादी विमर्शों को देखते-सुनते हैं उसके स्वरूप में पर्याप्त अंतर है. यह एक अलग विमर्श का विषय है.

उदारीकरण के बाद भारत आर्थिक रूप से दुनिया में शक्ति का एक केंद्र बन कर उभरा है, लेकिन जब हम सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पॉवर) की बात करते हैं तब बॉलीवुड ही जेहन में आता है. आजाद भारत में यह बॉलीवुड के सफर की सफलता है.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Wednesday, October 28, 2020

सिनेमा हॉल खुले, पर दर्शक कहां हैं


करीब सात महीने के बाद देश में सिनेमाघर खुले हैं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ‘वीरानी सी वीरानी’ है. बॉक्स ऑफिस के लिहाज से दो प्रमुख राज्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु में सिनेमाघर अभी भी नहीं खुले हैं.


दिल्ली-एनसीआर के सिनेमाघरों में ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ और नए ‘गाइडलाइंस’ का पालन किया जा रहा है, पर दर्शक नज़र नहीं आ रहे. पीवीआर जैसे मल्टीप्लेक्स दर्शकों के लिए तरह-तरह के ऑफर लेकर आए हैं. यहाँ तक कि आप चाहें तो पूरा हॉल बुक करवा कर ‘प्राइवेट व्यूइंग’ का लुत्फ उठा सकते हैं.

मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में पुरानी फिल्में मसलन ‘कबीर सिंह’, ‘पैरासाइट’ आदि ही दिखाई जा रही हैं, नई फिल्मों को लेकर निर्माताओं और वितरकों के बीच कोई योजना नहीं दिखती है. कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन से पहले मैंने ये फिल्में देखी थी. सवाल है कि नई फिल्में यदि रिलीज नहीं होंगी तो कोई दर्शक सिनेमाघर क्यों जाएगा? असल में दर्शकों के बीच अनिश्चितता की वजह से निर्माता-वितरक भी बड़ी फिल्मों को रिलीज कर कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहते. ऐसा नहीं है कि लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे. पिछले दिनों जब मैं दिल्ली के एक मॉल में गया, जहाँ कई मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर भी स्थित हैं, तब वहां भीड़ कम थी. हालांकि ‘फूड प्लाजा’ में लोग खा-पी रहे थे, खरीददारी भी कर रहे थे. पर सिनेमाघरों के बाहर कोई गहमागहमी नहीं थी.

दशहरा, दीवाली, ईद, क्रिसमस बड़े स्टारों की फिल्मों के रिलीज के लिए मुफीद माना जाता रहा है. ईद के दौरान सलमान खान की फिल्मों को लेकर उनके फैन्स में हमेशा एक दीवानगी रहती है. आश्चर्य नहीं कि सलमान खान की आने वाली एक फिल्म का नाम ‘कभी ईद, कभी दीवाली’ है. फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी ने पिछले साल प्रकाशित हुई अपनी किताब ‘रील इंडिया’ में सलमान खान के एक फैन के हवाले से लिखा है- ‘उनकी फिल्में ईद पर थिएटर में आती है. रमजान के दौरान लंबे रोजा के बाद यह महाभोज की तरह आता है.’ भारत में सबसे ज्यादा फिल्में बनती हैं और मनोरंजन के लिए सिनेमा हर आयुवर्ग के दर्शकों को लुभाता रहा है.

हर स्टार के अपने ‘फैन्स’ हैं. सिनेमा के कारोबार से जुड़े लोगों को इन्हीं फैन्स से उम्मीदें है कि वे फिर से सिनेमाघरों में लौटेंगे. पर सलमान, शाहरूख या आमिर खान की किसी फिल्म के रिलीज होने को लेकर कोई चर्चा नहीं है. प्रसंगवश, 25 साल पहले शाहरुख खान और काजोल की बहुचर्चित फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ दीवाली के आस-पास ही रिलीज हुई थी.

बॉलीवुड को एक ‘ब्लॉकबस्टर’ फिल्म का बेसब्री से इंतजार है. अक्षय कुमार की एक्शन फिल्म ‘सूर्यवंशी’ और भारतीय क्रिकेट टीम के विश्व कप की रोमाचंक जीत पर आधारित रणवीर सिंह की फिल्म ‘83’ दशहरा-दीवाली के दौरान रिलीज करने की बात की जा रही थी, पर त्योहारों के इस मौसम में इन फिल्मों के रिलीज होने को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है. जबकि अक्षय कुमार की ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ ऑनलाइन प्लेटफार्म पर अगले महीने रिलीज हो रही है. सिनेमाघरों के बंद होने से इंटरनेट के माध्यम से ‘ओवर द टॉप’ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को फायदा पहुँचा, वहीं सिनेमाघरों से जुडे लोगों के रोजगार और व्यवसाय को भारी नुकसान हुआ है. लॉकडाउन के दौरान कारोबार के जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं उसमें सिनेमा उद्योग भी शामिल है.

(प्रभात खबर 25 अक्टूबर 2020)

Sunday, September 13, 2020

एक एक्टिविस्ट एक्टर के सत्तर साल: शबाना आजमी


शबाना आजमी के 'अपरूप रूप' हैं. इस हफ्ते वे जीवन के 70 वर्ष पूरे कर रही हैं. पिछले चार दशकों में सिनेमा के परदे पर, रंगमंच पर, सड़कों पर या संसद में कहाँ उनका रूप सबसे ज्यादा उज्जवल रहा है, कहना बेहद मुश्किल है. एक किस्सा है कि वर्ष 1986 में मृणाल सेन की फिल्म 'जेनेसिस' को प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में दिखाया जा रहा था. इस समारोह में शबाना को भाग लेना था, पर वे कान नहीं जाकर बंबई में झुग्गी-झोपड़ी तोड़े जाने के विरोध में बीच सड़क पर भूख हड़ताल के लिए बैठ गईं. पाँच दिन बाद जमीन झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को वापस दे दिया गया. 

असल में, शबाना आजमी फिल्मों को सामाजिक बदलाव का औजार मानती है. यह सीख उन्हें विरासत में मिली. जहाँ पिता कैफी आजमी एक प्रगतिशील शायर थे, वहीं माता शौकत आजमी खुद थिएटर की मशहूर अदाकार रही थीं. दोनों ही 'इप्टा' से जुड़े थे.

वर्ष 1974 में श्याम बेनेगल की फिल्म ‘अंकुर’ से जो फिल्मी यात्रा शबाना की शुरु हुई, वह आज भी जारी है. यूं तो सत्यजीत रे (शतरंज के खिलाड़ी), मृणाल सेन (खंडहर, एक दिन अचानक), गौतम घोष (पार) जैसे निर्देशकों के साथ शबाना ने फिल्में की पर सबसे ज्यादा मकबूलियत उन्हें फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल के साथ काम करके मिली. 70 के दशक में हिंदी फिल्मों में समांतर सिनेमा की जो धारा विकसित हुई उसमें बेनेगल और शबाना की जोड़ी अगल से रेखांकित करने योग्य है. सामाजिक-राजनीतिक सवालों को उठाती उनकी फिल्में- अंकुर, निशांत, जुनून, मंडी आदि, हिंदी सिनेमा की थाती हैं. ये फिल्में मध्यमार्गी थी जिसे मनोरंजन से परहेज नहीं था. उन्हें आम दर्शकों की सराहाना भी मिली और बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी भी. 

पहली ही फिल्म 'अंकुर' में शबाना को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा गया. बाद में 'अर्थ', 'खंडहर', 'पार' और 'गॉडमदर' फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के चार और पुरस्कार उनके हिस्से आए. मुख्यधारा और समांतर दोनों तरह की फिल्मों के विभिन्न किरदारों को उन्होंने अपने सहज अभिनय से जीवंत बना दिया है. 

समलैंगिक संबंधों को उघेरती दीपा मेहता की फिल्म 'फायर' (1996) को कुछ राजनीतिक विरोध झेलना पड़ा, पर उन्होंने हार नहीं मानी. बाद में इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई पुरस्कारों से नवाजा गया. श्याम बेनेगल कहते हैं कि ‘शबाना किरदार को अंगीकार कर अपना बना लेती है. आत्मसात कर लेती है. यह उनकी विशिष्टता है.’ वे शबाना के ‘ट्रेंड एक्टर’ होने पर जोर देते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में वे सांप्रदायिकता के खिलाफ और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में मुखर रही है.

बहरहाल, शबाना आजमी का जो रूप मेरे मन में वर्षों से बैठा है वह उनका रंगमंचीय अवतार है. फिरोज अब्बास खान निर्देशित 'तुम्हारी अमृता' नाटक के माध्यम से बीस वर्षों से भी अधिक समय तक दर्शकों से वे रू-ब-रू रही हैं. इस नाटक में अमृता और जुल्फी के बीच प्रेम प्रसंग को खतों के माध्यम से संवेदनशील और मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है. 

कम लोग जानते हैं कि पुणे स्थित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में अभिनय का कोर्स करने से पहले उन्होंने फारुख शेख के साथ सेंट जेवियर कॉलेज, मुंबई में हिंदी नाट्य मंच की स्थापना की थी. शबाना आजमी 'एक्टिविस्ट एक्टर' हैं. उनकी बहुमुखी प्रतिभा का मूल्यांकन अभी होना बाकी है.

(प्रभात खबर, 13.09.2020)

Monday, August 31, 2020

सहिष्णुता और स्वतंत्रता का सवाल: मी रक़्सम


इस महीने के आसिफ निर्देशित ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म ने अपने प्रदर्शन के साठ साल पूरे किए. ऐतिहासिकता के आवरण में ‘मुगल-ए-आजम’ सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता और अकबर की छवि में नेहरू युगीन धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को सामने लेकर आया. इस फिल्म में अनारकली अकबर के दरबार में जन्माष्टमी के अवसर पर कथक प्रस्तुत करती है-‘मोहे पनघट पर नंदलाल छेड़ गयो रे’. हाल ही में जी5 ऑनलाइन वेबसाइट पर रिलीज हुई फिल्म ‘मी रक्सम’ देखते हुए इस फिल्म के दृश्य और नृत्य की छवियाँ मेरे मन में उमड़ती-घुमड़ती रही.

‘मुगल-ए-आजम’ फिल्म को सिनेमा के अध्येताओं ने मुस्लिम संस्कृति के निरूपण के लिए भी अलग से रेखांकित किया है. मुस्लिम समाज और संस्कृति को प्रदर्शित करने वाली फिल्मों को सुविधा के लिए ‘मुस्लिम सोशल’ संज्ञा से नवाजा गया. जहाँ साठ-सत्तर के दशक में आई ‘मुगल-ए-आजम’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘मेरे महबूब’, ‘पाकीजा’ आदि फिल्मों में मुस्लिम प्रभुवर्गों की संस्कृति, राजा-नवाबों की जीवन शैली को परदे पर दिखाया गया, वहीं दूसरे छोर पर ‘गर्म हवा’, ‘बाजार’, ‘सलीम लंगड़े पर मत रो’, ‘नसीम’ आदि फिल्में हैं जिसमें मुस्लिम मध्यवर्ग की अस्मिता, समस्या, सांप्रदायिकता आदि का चित्रण है. उदारीकरण के बाद देश की बदलती सामाजिक परिस्थितियों और हिंदुत्ववादी राजनीति के उभार ने ‘मुस्लिम सोशल’ को बॉलीवुड में हाशिए पर धकेल दिया. मुस्लिम किरदार तो हिंदी फिल्मों में नज़र आते हैं, पर इन्हें ‘मुस्लिम सोशल’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
‘मी रक्सम’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें निम्नवर्गीय मुस्लिम परिवार के जीवन और संघर्ष का चित्रण है. इसे बाबा आजमी से निर्देशित किया है और शबाना आजमी ने प्रस्तुत किया है. बतौर निर्देशक यह उनकी पहली फिल्म है. इस फिल्म की कहानी स्कूल जाने वाली एक लड़की मरियम के अपने पिता के साथ रिश्ते और भरतनाट्यम नृत्य सीखने की जद्दोजहद के इर्द-गिर्द घूमती है. एक मुस्लिम लड़की के भरतनाट्यम सीखने को घर-परिवार और समाज के लोग ‘बुतपरस्ती’ और मजहब के खांचे में बांट कर देखते हैं. पर जैसा कि फिल्म में एक संवाद है- ‘सवाल डांस का नहीं है. सवाल जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का है.’
इस फिल्म में भी ‘सलीम’ का किरदार है, पर वह एक दर्जी है. अपनी बेटी के ख्वाबों को पूरा करने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ता और मजहब के नाम पर द्वेष फैलाने वालों के मंसूबे को सफल नहीं होने देता है. सलीम का किरदार गंगा-जमुनी तहजीब को मुखर रूप से व्यक्त करता है.
फिल्म आजमगढ़ जिले के मिजवां गाँव के आस-पास अवस्थित है. मिजवां के दृश्य मोहक हैं. यह कैफी आजमी की जन्मस्थली भी है. बकौल बाबा आजमी एक बार कैफी आजमी ने उनसे पूछा था कि ‘क्या तुम कोई फिल्म मिजवां में शूट कर सकते हो?’ एक तरह से यह फिल्म शबाना आजमी और बाबा आजमी का अपने पिता और मशहूर शायर के जीवन दर्शन के प्रति श्रद्धांजलि है.
धर्मनिरपेक्षता, इसके स्वरूप और राष्ट्र-राज्य के साथ संबंधो को लेकर इन दिनों विद्वानों के बीच काफी बहस हो रही है. इन बहसों के बीच यह फिल्म एक सार्थक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है. दानिश हुसैन और अदिति सुबेदी का अभिनय अत्यंत स्वाभाविक है. छोटी सी भूमिका में भी नसीरूद्दीन शाह प्रभावशाली हैं. खास कर पिता-पुत्री के आपसी संबंधों के दृश्य और संवाद मर्म को छूती है. हालांकि फिल्म कहीं-कहीं उसी स्टिरियोटाइप में उलझती हुई दिखती है, जिसकी फिल्म में आलोचना की गई है.

(प्रभात खबर, 30 अगस्त 2020)

Friday, July 03, 2020

उत्तर पूर्व के कलाकारों को भी जगह दे बॉलिवुड

नस्लवाद जैसे मुद्दे पर फिल्म बनाने का विचार आपके मन में कैसे आया?
असल में नस्लवाद को मैं खुद झेल चुका हूँ. यह ऐसा विषय है जो हमेशा मेरे दिमाग में रहा है. मैं करीब 25 सालों से नार्थ-ईस्ट बाहर हूँ, जिसमें से लंबा समय दिल्ली में गुजारा है. मैं बाहर रह रहे उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ होने वाले भेद-भाव के बारे में फिल्म बनाना चाहता था.
कोई व्यक्तिगत अनुभव जो आप हमसे शेयर करना चाहें...
बहुत सारे अनुभव हैं, लेकिन अभी जो तुरंत मेरे दिमाग में आ रहा है वो आपसे शेयर करुंगा. मैं हूमायूंपुर इलाके में रहता था जो अखोनी फिल्म की जगह भी है. 90 के दशक के आखिरी वर्षों की बात है मैं डियर पार्क में रोज दौड़ा करता था. कुछ लोग मुझे देख कर दलाई लामा, जैकी चान कहकर हमेशा चिल्लाया करते थे. एक दिन मैंने उनसे पूछा कि जैकी चान तो मैं समझ सकता हूँ, मैंने खुद उनकी कई फिल्में देखी हैं, पर दलाई लामा क्यों? अभी दिल्ली के लोगों में उत्तर-पूर्वी राज्यों के प्रति जागरुकता बढ़ी है, पर बीस साल पहले ऐसा नहीं था. इसमें इंटरनेट जैसी सूचना प्राद्योगिकी की काफी भूमिका है.
फिल्म के बारे में बात करें तो ‘अखोनी’ (सोयाबीन को फर्मेंट करके बना खाद्य पदार्थ) की गंध के माध्यम से आप नस्लीय भेदभाव को दिखाते हैं. यह विचार कैसे आया?
आप उत्तर-पूर्वी राज्यों से बाहर निकलते हैं तो पहली समस्या खाना पकाने और उसकी गंध को लेकर आती है. इसे सभी अनुभव करते हैं. जब मैंने इस कहानी को लिखना शुरु किया तबसे ही यह मेरे मन में सहज रूप में उपस्थित था. गंध सापेक्षिक होती है. जैसे कढ़ी हमारे लिए सामान्य है, पर 60-70 के दशक में इसकी तीव्र गंध की वजह से गोरे लोग लंदन में दक्षिए एशिया के लोगों को किराए पर घर देना पसंद नहीं करते थे. इसी तरह अखोनी अन्य लोगों के लिए तीव्र गंध लिए होता है, पर हमारे लिए सामान्य है.
अखोनी पहली ऐसी पहली फिल्म है जो उत्तर-पूर्वी राज्यों की भाषा, संस्कृति और उनके साथ होने वाले भेदभाव को विषय के रूप में चित्रित करती है. बॉलिवुड से यह विषय अब तक गायब क्यों चला आ रहा है?
हां, यह समस्या तो है जिसके बारे में बॉलिवुड में सोच-विचार नहीं किया जाता और बॉलीवुड को यह आरोप झेलना पड़ेगा. एक उदाहरण से में बात करना चाहूँगा. हॉलिवुड के बारे में बात करें तो 20-30 साल पहले तक वहां गोरे और अश्वेत लोग ही सिनेमा में दिखते थे. लेकिन आज बहुत सारे चीनी मूल के अमेरीकी, वियतनामी दिख जाएँगे. कास्टिंग डायरेक्टर को इस बारे में सोचना चाहिए. यदि फिल्म की कहानी किसी गांव पर केंद्रित हो तो समझ आता है, पर शहरी कहानी में उत्तर-पूर्वी राज्यों का रिप्रजेंटेशन होना चाहिए.
क्या नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉट स्टार जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के आने से कुछ बदलाव की संभावना आपको दिखती है?
हां, विविध विषयों के तरफ निर्देशकों का ध्यान अब जाने लगा है लेकिन इसके लिए शिद्दत से कोशिश करनी होगी. ओटीटी प्लेटफॉर्म निस्संदेह अच्छा है, नए विषयों के लिए. न सिर्फ उत्तर-पूर्वी लोग, बल्कि जो भी अल्पसंख्यक हैं, शारीरिक रूप से अक्षम हैं उन विषयों को भी हमें अपनाना चाहिए.
अखोनी में ज्यादातार कलाकार उत्तर-पूर्वी राज्यों से हैं. क्या आपको कास्टिंग में दिक्कत आई?
हां, कास्टिंग एक बड़ी समस्या मेरे लिए थी. क्योंकि आपको उत्तर-पूर्व के बहुत कम कलाकार मिलेंगे. अभिनय उनके लिए कोई करियर ऑप्शन नहीं है. फिल्म में आपको लिन लैश्राम और लानुकुम एओ दिखेंगे जो काफी प्रतिभाशाली हैं. एओ एनएसडी से प्रशिक्षित हैं. उनके जैसे कई कलाकार उत्तर-पूर्वी राज्यों से हैं पर काम के अभाव में वे कोई और रास्ता चुन लेते हैं. वे कहते हैं, काम ही नहीं है क्या करुँ.
फिल्म का गीत-संगीत काफी भावपूर्ण है. इस बारे में कुछ बताइए?
गीत-संगीत का कुछ हिस्सा मेघालय से है और कुछ मणिपुर से. एक गीत असम से भी मैंने लिया है. मैंने फिल्म में उत्तर-पूर्वी राज्यों की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का ख्याल रखा है. आप देखेंगे कि एक दृश्य में कमरे में बैठे लोग एक-दूसरे की भाषा नहीं समझते जबकि वे सब उत्तर-पूर्वी राज्यों से आते हैं. 

(नवभारत टाइम्स, 3 जुलाई 2020)

Sunday, May 31, 2020

बेआवाज़ महफिल से गए गीतकार योगेश

हिंदी फिल्मों में  गीतों को एक अहम मुकाम हासिल है. पर क्या यही बात गीतकारों के बारे में कही जा सकती है? 70 के दशक के चर्चित गीतकार योगेश (1943-2020) भरी महफिल से चुपचाप उठ कर चले गए, बिना किसी आवाज के. सच तो यह है कि भले ही उनके गीत लोगों की जुबान पर रहेपर वे वर्षों पहले ही विस्मृति में धकेल दिए गए थे. उन्हें फिल्मी दुनिया में वह जगह हासिल नहीं हो सकीजिसके वे हकदार थे. 

'जिंदगी कैसे है पहेलीया 'कहीं दूर जब दिन ढल जाएजैसे गाने सुनते ही हमें सुपरहिट फिल्म 'आनंद' और सुपरस्टार राजेश खन्ना-अमिताभ बच्चन की याद आती है. जिंदगी के फलसफे को इन सीधे-सादे शब्दों में ढालने वाले योगेश ही थेजिनका पूरा नाम योगेश गौर था. सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में  तैयार हुए इन गीतों ने उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच मकबूलियत दी थी. असल में गीतकार शैलेंद्र के गुजरने के बाद एक जो खालीपन था उसे योगेश के भावपूर्ण गीतों से  भरने की एक उम्मीद जगी थी. उनके गीतों में शैलेंद्र की तरह ही आस-पास के जीवन के अनुभव व्यक्त हुए.  इसी दौर में निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी की फिल्में  शहरी मध्यवर्गीय जिंदगी के इर्द-गिर्द बुनी गई, जिसे योगेश के गीतों का भरपूर सहयोग मिला था. बात मिली फिल्म की हो रजनीगंधा की या छोटी सी बात की. योगेश के शब्दों ने उसमें जादू भर दिया था, जो सुनने वालों के दिलों को बेधता रहा. 'आए तुम याद मुझे' जैसे गाने में रोमांस और नॉस्टेलजिया एक साथ मिलता है. इसी तरह 'रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूँ ही जीवन मेंया 'कई बार यूँ ही देखा है जैसे गाने उस दौर के युवा प्रेमियों के जीवन दर्शनकश्मकश को बिना किसी बनावट के हमारे सामने लेकर आया. ये गाने वही लिख सकता है जिसने जीवन और उसकी पेचीदगियों को देखा और जिया हो. 

उल्लेखनीय है कि कि 'कई बार यूँ ही देखा हैगाने के लिए मुकेश को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. लता मंगेशकर ने भी योगेश के लिखे कई गानों को स्वर दिया था. उन्होंने श्रद्धांजलि देते हुए याद किया कि 'योगश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे.इसी स्वभाव के चलते 80 के दशक में जिस तरह की तड़क-भड़क हिंदी फिल्मों के गीत-संगीत के क्षेत्र में देखने को मिली वे खुद को अनफिट पाते रहे. हालांकि उस दौर में बॉलीवुड में जो गुटबाजी थी इसके भी वे शिकार हुए, पर उन्होंने कभी गिला-शिकवा व्यक्त नहीं किया. 

बाद के वर्षों में भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थे लेकिन उसमें 70 के दशक के योगेश की छाप नहीं दिखी. वर्ष 2017 में हरीश व्यास की फिल्म 'अंग्रेजी में कहते हैंके भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थेजो उनकी आखिरी फिल्म थी. उन्हें वर्ष 1962 में आई फिल्म सखी रॉबिन फिल्म के गाने- तुम जो आ जाओ तो प्यार आ जाएसे ब्रेक मिला थाजिसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुरे ने स्वर दिया.


पचपन साल के फिल्मी कैरियर में योगेश के लिखे गानों की फेहरिस्त भले ही उनके समकालीन गीतकारों जितनी लंबी नहीं होपर जो भी गीत उन्होंने लिखे वे धरोहर के रूप में हमारे पास हमेशा रहेंगे. जब भी सावन की फुहारें पडेंगी हम गुनगुना उठेंगे- रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन बिना यह महसूस किए कि इसे योगेश ने लिखा था


(प्रभात खबर, 31 मई 2020)