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Wednesday, February 21, 2024

मीडिया का लोकतंत्र: समीक्षा


 लोकसभा चुनाव के महज कुछ हफ्ते शेष बचे हैं. वर्तमान शासन के दस साल बाद भी विपक्षी पार्टियों के लिए चुनावी रणनीति का कोई ऐसा सिरा दिखाई नहीं दे रहा जिससे कहा जा सके कि मुकाबला दिलचस्प होगा. क्या यह चुनाव बिना किसी चुनौती के संपन्न होगाविपक्षी पार्टी पर भारतीय जनता पार्टी ने मनोवैज्ञानिक बढ़त बना ली है. आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री कहते फिर रहे हैं कि आएगा तो मोदी ही!

प्रधानमंत्री की छवि एक ब्रांड (मोदी है तो मुमकिन हैमोदी की गारंटी आदि) के रूप में इन वर्षों में पुख्ता हुई है. प्रधानमंत्री के इस कल्ट’ को कारोबारी मीडिया भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. जो प्रधानमंत्री की राजनीति और विचारधारा के आलोचक हैं, वे भी उनकी लोकप्रियता से इंकार नहीं करते. उनकी लोकप्रियता का बड़ा हिस्सा उदारीकरण के साथ हिंदुत्व की जो बयार बही उससे जुड़ता है. भाषाई मीडियाजिसका अप्रत्याशित विकास इन्हीं दशकों में हुआ हैसमाज में आए बदलाव को आत्मसात करता हुआ आगे बढ़ा है. इसी सिलसिले में एक नेटवर्क का विस्तार भी हुआ हैदूर दराज के गाँव-कस्बों तक मीडिया (मुख्यधारा और सोशल) की पहुँच बढ़ी है. विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी मीडिया के माध्यम से मोदी की लोकलुभावन अपील को अपने तयी देखते-परखते हैं, चुनाव में वोट करते हैं.

चूँकि मीडिया एक पूंजीवादी उपक्रम है (प्रिंट पूंजीवाद)इसलिए मुनाफे की संस्कृति से ही इसका संचालन होता हैलोकहित हाशिए पर ही रहते आए हैं. वैसे प्रकाशन व्यवसाय भी कोई अपवाद नहीं है,  यहाँ भी लेखकों की ब्रांडिंग पर जोर रहता है. उनकी छवि भुनाने की कोशिश होती है. हाल के वर्षों में हिंदी लोकवृत्त में यह प्रवृत्ति बढ़ी है.

बहरहालराम मंदिर निर्माण के बाद हिंदुत्व और विकास की जुगलबंदी का शोर और बढ़ा है. इस शोर के बीच रोजगारबढ़ती असमानताअल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना और संस्थानों के लगातार कमजोर होने की चर्चा सुनाई नहीं देती. स्वतंत्र मीडिया और स्वतंत्रचेता मीडियाकर्मियों पर जो दबिश बढ़ी हैउसके बारे में खुल कर बोलने में आम नागरिकों में हिचक है. सोशल मीडिया में भी एक तरह का सेल्फ-सेंसरशिप है. ऐसे में, मुख्यधारा का मीडिया सरकार के एजेंडे को ही अपना एजेंडा मान कर आगे बढ़ रहा है. हाल के दिनों में अडानी समूह के मीडिया क्षेत्र में बढ़त को हम उनके कारोबारी हित के नजरिए से देख-परख सकते हैं.

वैसे दिल्ली में आने से पहले ही मोदी की ब्रांडिंग शुरू हो गई थीजिसे मीडिया का भरपूर सहयोग मिला था. वर्ष 2012 में चर्चित अमेरिकी पत्रिका टाइम के कवर पृष्ठ पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर छपी थी. साथ ही इंडिया टुडेकारवां और आउटलुक पत्रिकाओं के कवर पर भी नरेंद्र मोदी छाए हुए रहे.  इंडिया टुडे में जहाँ एक ओपिनियन पोल के हवाले से प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को लोगों की पहली पसंद बतायावहीं कारवां और आउटलुक पत्रिका ने मोदी की छवि को लेकर कुछ तल्ख सवाल किए थे. मोदी को लेकर मीडिया के अंदर दो ध्रुव थे. बाद के वर्षों में यह दूरी और बढ़ती गई. हिंदी टेलीविजन मीडिया के हवाले से बात करें तो रवीश कुमार और सुधीर चौधरी इस ध्रुव के ओर छोर कहे जा सकते हैं.

उदारीकरण के बाद भारतीय राष्ट्र-राज्य का चरित्र बदला. कॉरपोरेटमीडिया और राजनीतिक दलों में हर तरफ जोर प्रबंधन पर बढ़ा. मीडिया में जहाँ ब्रांड मैनेजर की अहमियत संपादकों से ज्यादा बढ़ी वहींराजसत्ता में मीडिया मैनेजरों की घुसपैठ किसी भी सक्षम नौकरशाहों से कम नहीं है. समयांतर पत्रिका (मई, 2012) के लिए मोदी और मीडिया’ लेख में मैंने लिखा था:

कोई भी पाठक यदि सरसरी तौर पर भी टाइम के लेख को पढ़े तो उसे समझने में यह देर नहीं लगेगी कि यह एक महज पीआर (जनसंपर्क) का काम है जिसे नरेंद्र मोदी के मीडिया मैनेजरों ने बखूबी अंजाम दिया है.”  

इन वर्षों मीडिया के चरित्र में जो बदलाव हुए हैं, नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग में जो इसकी भूमिका रही हैसोशल मीडिया का जो उभार हुआ है उसका एक लेखा-जोखा पिछले दिनों लेखक विनीत कुमार की प्रकाशित किताब- मीडिया का लोकतंत्र में दिखाई देता है.

जैसा कि शीर्षक और अध्यायों से स्पष्ट है इस किताब में मीडिया और लोकतंत्र बीज शब्द हैं. किसी भी लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी को केंद्रीयता प्राप्त है. इसकी रक्षा का भार नागरिक समाजमीडियान्यायालय और राजनीतिक दलों पर है. मीडिया चूँकि लोकतंत्र में आम जनता की आँख और कान की तरह होते हैंजाहिर है उससे अपेक्षा रहती है कि वह सबकी खबर ले. सबको खबर दे. सवाल है कि क्या मोदी के शासन काल में मीडिया जनता के प्रतिनिधि के रूप में सत्ता के सामने सच कहने में सफल रही? इसका जवाब नकारात्मक ही है. मीडिया की आवाज दबी रही. स्वर हकलाने का ही रहा. आज जोर सेल्फी पत्रकारिता पर है. प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी, संपर्क साध कर पत्रकार-संपादक खुद को धन्य महसूस करते फिरते हैं. कारोबारी मीडिया का जोर सत्ता के साथ सांठगांठ करने पर बढ़ा है. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण अखबार और टेलीविजन चैनलों के स्पेशल इवेंट’ हैंजहाँ मंच पर मालिक और संपादक सत्ता’ पर काबिज लोगों के साथ नज़र आते हैं.

यह किताब मीडिया का लोकतंत्रबरास्ते पीआर एजेंसी’, मीडिया नैरेटिवफ़ेक बनाम फैक्ट’, मीडिया राष्ट्रवादअलविदा लोकतंत्र!’ और न्यू मीडियाडेटा पैक का लोकतंत्र जैसे अध्यायों में विभक्त है. इस किताब की भूमिका में विनीत लिखते हैं:

साल 2014 के बाद मीडिया का चरित्र पूरी तरह बदल गया है और अब तक सत्ता से विवेकपूर्ण असहमति को पत्रकारिता माना जाता रहा हैयह क्रम उलटकर सत्ता के साथ होना ही पत्रकारिता हैऐसा कहने से यह किताब रोकती है.” हालांकि इस किताब में जो विवरणउदाहरणसंदर्भ और ब्यौरे हैं, वह लोकवृत्त में पहले से मौजूद हैं. मीडिया के रवैये को लेकर मीडिया के अंदर ही टीका-टिप्पणी और किताबें लिखी जाती रही है. लेखक इस बात को स्वीकार करते हुए लिखते हैं:

आप जब इसके पन्ने-दर-पन्ने पलटते हुए संदर्भों से गुजरेंगे तो संभव है कि लगेगा इसमें नया क्यायह तो हमें पहले से पता है...”. लेखक की पक्षधरता स्पष्ट है. हिंदुत्ववादी राजनीति और सत्ता के विरोध में वह खड़ा है. लेकिन देश की विशाल आबादी (खास कर उत्तर और पश्चिम भारत) तक मोदी की पहुँच के कारणों पर इसमें विचार नहीं किया गया हैन हीं मीडिया के उपभोक्ताओंनागरिकों की सोच को ही शामिल किया गया है. इस लिहाज से यह एक किताब भी एक इको चैंबर की तरह है, जहाँ हम (लिबरल) सिर्फ अपनी आवाज ही सुनते हैं.

मीडिया के पाठकोंदर्शकों की पसंद को लेकर अकादमिक दुनिया में शोध की पहल नहीं दिखती. विनीत मीडिया शोध और अध्ययन से जुड़े रहे हैंउनसे अपेक्षा थी कि वे दर्शकों की पसंदइच्छा को लेकर इस किताब में चर्चा करते ताकि मोदी की लोकप्रियता के कारणों की एक झलक हमें मिलती. महज उदाहरणोंकिताब के संदर्भों के आधार पर मीडिया के बदलते चरित्र-- जहां जनसंपर्क (पीआर) की भूमिका बढ़ती चली गई है-- की मुकम्मल तस्वीर सामने नहीं आती. हांकिताब में वर्ष 2013 में उत्तरकाशी-केदारनाथ में आई तबाही और मोदी को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया में जो झूठी खबर छपी- मोदी इन रैम्बो एक्टसेव्स 15000’ , को एक केस स्टडी के रूप में विस्तार से विश्लेषण किया गया हैविनीत बताते हैं कि किस तरह एक ही मीडिया संस्थान के दो उपक्रम (प्लेटफॉर्म) अलग-अलग तरीके से खबरों को प्रस्तुत करते हैं और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे को काटते भी चलते हैं! हालांकि यहाँ पर यह नोट करना जरूरी है कि टाइम्स ग्रुप के लिए इस तरह की खबर सिर्फ पीआर का मसला नहीं रहा है.

बीस साल पहले जब मैं टाइम्स ग्रुप के अखबार नवभारत टाइम्स पर शोध कर रहा थाइस तरह की खबर पेड न्यूज’ की शक्ल में आने लगी थी. वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में यह खुल कर सामने आ गया था. चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों से मोटी रकम लेकर पैकेज’ के तहत टाइम्स ग्रुप ने मीडिया नेट कंपनी (2003) और प्राइवेट ट्रीटीज (2005) की शुरुआत कर दी थी. इसका विस्तार से उल्लेख मैंने अपनी किताब हिंदी में समाचार (2013)’ और शोध आलेख राइटिंग खुश खबरहिंदी न्यूज़ पेपर्स इन नियो लिबरल ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी इंडिया’ (2021) में किया है. आश्चर्य है कि विनीत अपने लेख में कहीं भी इस पहलू का जिक्र नहीं करतेजबकी इस अध्याय में विनीत विज्ञापन गुरु (अबकी बार, मोदी सरकार’ वाले) पीयूष पांडे की आत्मकथात्मक किताब पांडेमोनियमपीयूष पांडे ऑन एडवरटाइजिंग (2015) को लेकर अनावश्यक रूप से करीब दस पेज खर्च करते हैं. इसी तरह कई ऐसी किताबों से उदाहरण हैं जिसे संक्षेप में दिया जा सकता था. वैसे यह पूरी किताब ही सेड/शी सेड (किसने क्या कहा) की शैली में ही लिखी गई है, जहाँ पर अद्यतन किताबों के संदर्भ और विवरण तो मिलते हैं पर लेखकीय विश्लेषण का अभाव दिखता है. मीडिया की रिपोर्टिंग में ऐसी छूट की गुंजाइश तो है, पर जब आप शोध/आलोचना कर रहे हैं तो लेखक से अपेक्षा रहती है कि उसकी दृष्टि और तैयारी से पाठक रू-ब-रू होगा.  ऐसे में पूरी किताब में लेखक कहीं पीछे छूट जाता है और अन्य' हावी हो जाते हैं. पाठकों के लिए यह उलझन पैदा करता है. पठनीयता भी प्रभावित होती है. किताब में जिन लेखकों को उद्धृत किया गया, अधिकांश के साथ कोई खंडन-मंडन नहीं है, न ही लेखक की तरफ से सवाल हीं उछाला गया है. एक किताब सारे सवालों का जवाब भले न दे, पाठकों के मन में बीजारोपण तो कर ही सकती है!

इस शताब्दी के दूसरे दशक में जहाँ इंटरनेट के मार्फत आभासी दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय लोकवृत्त के निर्माण की संभावना बनी, वहीं सूचनाओं के आल-जाल में तथ्य और सत्य के बीच की रेखा धुंधली हो गई. यथार्थ और आभासी के बीच फेक न्यूज का ऐसा तंत्र खड़ा हुआ जिसे सत्ता का सहयोग हासिल है. यह अमेरिका से लेकर भारत जैसे लोकतंत्र के लिए चुनौती का विषय बना है. पिछले दिनों अभिनेत्री पूनम पांडेय की मौत की खबर  फेक न्यूज बन कर आई जिसे बीबीसी जैसी संस्थाओं ने भी बिना किसी जांच-परख के स्वीकार कर लिया था.

विनीत अपने लेख मीडिया नैरेटिवफेक बनाम फैक्ट’ में इस मुद्दे से विमर्श रचते हैं. कोरोना के दौरान जिस तरह से मुस्लिम समुदाय के खिलाफ फेक न्यूज टीवी चैनलों पर फैलाया गया विनीत उसे विश्लेषण की जद में लेते हैं. वे आजतक के कार्यक्रम में दिखाए कोई झुठला नहीं पाएगा राम मंदिर का इतिहासजाने कितना अहम है टाइम कैप्सूल (राम मंदिर के नीचे रखा जाएगा टाइम कैप्सूलदेखें क्या है तैयारीकार्यक्रम की पड़ताल करते हैं. विनीत लिखते हैं:

आजतक की दर्जनों फुटेज देखने के बाद भी एक भी ऐसी तस्वीर नहीं मिली जिससे कि राम जन्मभूमि परिसर में टाइम कैप्सूल डाले जाने संबंधी तैयारी की पुष्टि हो सके. यह स्थिति जी न्यूजरिपब्लिक भारतटाइम्स नाउसभी चैनलों के साथ रही.”

हालांकि इस अध्याय में भाषाई वर्चस्व के बीच हिंग्लिश की शरणस्थली की चर्चा करना विषय-वस्तु के साथ मेल नहीं खाता है. उसके लिए एक अलग स्वतंत्र अध्याय की गुंजाइश थी. खुद लेखक ने लिखा है कि वे इस विषय पर अन्यत्र लिख चुके हैं.

उल्लेखनीय है कि राममंदिर के उद्घाटन समारोह में जैसा कि उम्मीद थीटेलीविजन चैनलों में राम राज्य’ का बोलबाला रहा. उससे पहले ही इंडिया टुडे टीवी चैनल पर राम आएँगे’, टीवी 9 पर मंदिर वहीं बनाएँगे और एनडीटीवी पर राम रिटर्न्स’ जैसे कार्यक्रम दिखाए जा रहे थे. ऐसा नहीं है कि पहली बार टीवी ने भावनात्मक मुद्दे को लेकर बिना किसी आलोचनात्मक विवेक के कार्यक्रम, बहस आदि किए हो. मोदी के शासनकाल में टीवी में राष्ट्रवाद के ऊपर बहस-मुबाहिसा का जोर बढ़ा है, जहाँ पर समावेशीसामासिक संस्कृति की बात नहीं होती. असल मेंहिंदी समाचार चैनल अपने शुरुआत से ही विचार-विमर्श की जगह सनसनी को अपने केंद्र में रखा. आज उग्र राष्ट्रवाद हिंदुत्व का आवरण ओढ़ कर हमारे सामने है. जैसा कि कुंवर नारायण ने अपनी कविता (अयोध्या, 1992) में लिखा है:

हे राम,

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकाव्य!

तुम्हारे बस की नहीं

उस अविवेक पर विजय

जिसके दस बीस नहीं

अब लाखों सर-लाखों हाथ हैं.

यह लाखों सर और लाखों हाथ समकालीन भारतीय मीडिया के हैं. राष्ट्रीय मीडिया सत्ता के साथ हैजिससे नागरिक समाज और विपक्ष को लड़ना है. पर कैसेक्या लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया विपक्ष के लिए एक कारगर हथियार साबित होगाइस किताब का आखिरी अध्याय न्यू मीडियाडेटा पैक का लोकतंत्र’ खबरों और विभिन्न लेखकों की किताबों (राहुल रौशन, अंकित लाल, स्वाति चतुर्वेदी, रोहित चोपड़ा, सिरिल और परंजय गुहा ठाकुरता आदि)  के हवाले से इन्हीं मुद्दों को अपने घेरे में लेता है.

आखिर मेंलेखक ने किताब में नोट किया है कि "कारोबारी मीडिया के लिए लोकतंत्र नागरिकों की हिस्सेदारी से चलनेवाली एक सतत प्रक्रिया न होकरएक प्रबंधन है जिसे कि वो अपने ऑक्सीजन प्रदाता के अनुरूप फेरबदल कर सकते हैं." पर क्या हमारा मीडिया हमारे लोकतंत्र से अलग है? ‘मीडिया का लोकतंत्र में मीडिया की आलोचना तो है पर इस बुनियादी सवाल पर चुप्पी है. जब संकट लोकतंत्र पर हो तब समकालीन मीडिया की कोई भी आलोचना उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण के बाद समाजराजनीति और पूंजीवाद (खुफिया पूंजीवाद) में आए बदलावों के परिप्रेक्ष्य में ही किया जा सकता हैजिसका इस किताब में नितांत अभाव है. 

(प्रभात खबर, 25.02.24)

Wednesday, March 02, 2022

एक निर्देशक की यादों में इरफान


इरफान (1967-2020) हमारे समय के एक बेहतरीन अभिनेता थे. उनके प्रशंसक पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. हाल ही में फिल्म निर्देशक अनूप सिंह की लिखी किताब ‘इरफान: डॉयलाग्स विद द विंड’ प्रकाशित हुई है. यह किताब एक शोक गीत है, पर इसमें जीवन का राग है. अनूप सिंह ने ‘किस्सा’ (द टेल ऑफ ए लोनली घोस्ट, 2013) और ‘द सांग ऑफ स्कॉर्पियंस’ (2017) फिल्म में इरफान के साथ काम किया था. अनूप सिंह ने किताब की शुरुआत में लिखा है कि फरवरी 16, 2018 को उन्हें इरफान का एक मैसेज मिला: ‘बात हो सकती है? कुछ अजब ही सफर की तैयारी शुरु हो गई है. आपको बताना चाह रहा था.’  इरफान अभी सफर में थे. उन्हें एक लंबी दूरी तय करनी थी. सिनेमा जगत को उनसे काफी उम्मीदें थी, लेकिन कैंसर की वजह से यह सफर थम गया. उनकी अभिनय यात्रा अचानक रुक गई.

अपने मित्र और अभिनेता को केंद्र में रखते हुए यह किताब स्मृतियों के सहारे लिखी गई है. उन स्मृतियों के सहारे जो इरफान के गुजरने के बाद बवंडर की तरह अनूप सिंह के मन पर छाई रही. इस किताब के माध्यम से अनूप सिंह ने एक अभिनेता की तैयारी, कार्यशैली और क्राफ्ट को हमारे सामने रखा है. इस अर्थ में यह किताब महज संस्मरण नहीं है. इस किताब से इरफान का व्यक्तित्व हमारे सामने आता है. साथ ही एक अभिनेता और निर्देशक के आपसी रिश्ते, एक-दूसरे के प्रति आदर और कला के प्रति दीवानगी से भी हम रू-ब-रू होते हैं.

उल्लेखनीय है कि जहाँ इरफान ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से अभिनय में प्रशिक्षण प्राप्त किया था, वहीं अनूप सिंह पुणे स्थित भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान से प्रशिक्षित हैं और स्विट्जरलैंड में रहते हैं. वे मणि कौल और कुमार शहानी की परंपरा के फिल्म निर्देशक हैं. प्रसंगवश, उन्होंने कौल और शहानी के गुरु ऋत्विक घटक के ऊपर ‘एकटि नदीर नाम’ (द नेम ऑफ ए रिवर) फिल्म का निर्माण किया है, जिसे वर्ष 2006 में ओसियान फिल्म समारोह में ‘ऋत्विक घटक रेट्रोस्पेक्टिव’ में दिखाया गया था. यह फिल्म घटक को समर्पित है.

दृश्यात्मक शैली में पूरी किताब लिखी गई है और भाषा काव्यात्मक है. यह ऐसी भाषा है जो विछोह से उपजती है. इस किताब का आधा हिस्सा ‘किस्सा’ फिल्म निर्माण-निर्देशन के इर्द-गिर्द है और कुछ हिस्सों में ‘द सांग ऑफ स्कॉर्पियंस’ की चर्चा है. ‘किस्सा ‘काफी चर्चित रही है इसे पुरस्कार भी मिले. देश विभाजन की त्रासदी और उससे उपजी पीड़ा की पृष्ठभूमि में रची गई यह कहानी एक भूत के माध्यम से कही गई है. यथार्थ और कल्पना के बीच यह फिल्म झूलती रहती है. साथ ही इस फिल्म में एक स्त्री की परवरिश एक पुरुष के रूप में है. इरफान ने अंबर सिंह का किरदार निभाया है. फिल्म के रिहर्सल के दौरान एक वाकया को याद करते हुए अनूप सिंह लिखते हैं कि किस तरह इरफान ने उन्हें वॉन गॉग की एक पेंटिंग ‘ग्रूव ऑफ ऑलिव ट्रीज,’ जो उन्होंने भेजी थी, का जिक्र करते हुए कहा था-‘ मैं इन्हीं ऑलिव वृक्षों में से एक होना चाह रहा था.’  अनूप सिंह लिखते हैं कि इस तस्वीर में प्रकृति (नेचर) और प्रारब्ध (डेस्टिनी) के विरुद्ध विद्रोह है.  इरफान इस फिल्म में  भाव-भंगिमा के सहारे अंबर सिंह की पीड़ा को सामने लाने में सफल हैं. इस किताब की भूमिका लिखते हुए अमिताभ बच्चन ने भी नोट किया है कि किस तरह ‘पीकू’ फिल्म के एक दृश्य में इरफान महज आंखों की अपनी एक भंगिमा से संवादों के पूरे  पैराग्राफ को अभिव्यक्त करने में सफल रहे. इरफान एक अभिनेता के रूप में अपने समय और स्थान के प्रति हमेशा सजग रहते थे.

वर्ष 2004 में विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ में नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर, पीयूष मिश्रा जैसे मंजे कलाकारों के साथ काम करते हुए ‘मकबूल’ के किरदार को उन्होंने जिस सहज अंदाज में जिया है, वह अविस्मरणीय है. आश्चर्य नहीं कि अपने श्रद्धांजलि लेख में नसीरुद्दीन शाह ने लिखा था कि ‘इरफान ऐसे अभिनेता हैं जिनसे मुझे इर्ष्या होती थी’.  इरफान ने अभिनय की ऊंचाई हासिल करने के लिए काफी मेहनत की जिसकी चर्चा नहीं होती. जाहिर है, जयपुर से दिल्ली और फिर बॉलीवुड-हॉलीवुड की उनकी यात्रा संघर्षपूर्ण थी. एक बार वे बोरिया-बिस्तर समेट कर जयपुर लौटने की तैयारी कर चुके थे. फिल्म निर्माण बड़ी पूंजी आधारित है, इसे वे बखूबी जानते थे पर कला के प्रति उनमें दीवानगी थी. ‘किस्सा’ के निर्माण के दौरान उन्होंने अनूप सिंह से कहा था- ‘अनूप साहब, प्रोड्यूसर तो फाइनली फिल्म बेचेगा. लेकिन जो लोग हैं वो तो आपकी फिल्म देखेंगे. आप बस अपनी फिल्म बनाइए.’ उनके जीवन और कला के बीच कोई फांक नहीं था.

किताब के आखिर में जो अस्पताल का दृश्य है, मौत से पहले की बातचीत है, वह बेहद मार्मिक है. एक कलाकार विभिन्न किरदारों को जीते हुए फिल्मों में, नाटकों में कई बार मरता है पर वास्तविक जीवन में मौत को सब झूठलाते हैं. इरफान अनूप सिंह से पूछते हैं:  मैं कहां मरूंगा?  दर्द के अलावे मेरे साथ कौन होगा?’ बिस्तर पर लेटे इरफान के साथ अनूप सिंह की गुफ्तगू है: ‘हम जो साथ मिल कर फिल्म बनाने वाले हैं उनमें एक-दो में मैं मरता हूँ, नहीं? ये पोस्चर अच्छा है, नहीं? आप कैमरा कहां लगाएँगे? साहिर लुधियानवी ने ठीक ही लिखा है: ‘मौत कितनी भी संगदिल हो, मगर जिंदगी से तो मेहरबां होगी’. इस किताब को पढ़ते यह अहसास हमेशा बना रहता है.


(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Saturday, July 21, 2018

बच्चों का किताबी कोना

आधुनिक स्मार्ट फोन, लैपटॉप, टीवी और इंटरनेट के दौर में बीतता आज का बचपन हमारे बचपन से अलहदा है. हमारे बचपन में किताबें भले ही नहीं थी, लेकिन दादी-नानी की कहानियां थीं. तकनीक आज के बचपन पर हावी है. हालांकि तकनीक की मार्फत बच्चे कार्टून, वीडियो की शक्ल में किस्से-कहानियों से ही ज्यादा जुड़ते हैं, माध्यम का फर्क भले हो.
पर माध्यम के बदलने से हमारे वात्सल्य का स्वरूप, बच्चों के साथ रिश्ता भी बदल जाता है. सच तो यह है कि जब हम बच्चों को किस्से-कहानियाँ सुनाते हैं तब हम अपने बचपन में भी लौटते हैं. एक तरह से हमारे लिए यह विरेचन की अवस्था होती है. जैसे कि बच्चे बार-बार हमें याद दिलाते रहते हैं कि ‘वे अब बड़े हो गए है...!’ यह उनका ‘बड़प्पन’ है और साथ ही हमारे लिए ताकीद भी कि हम उनके बचपन के घरौंदे में घुसें तो इस बात खयाल रखें!
रोमानिया मूल की जर्मनी में रहने वाली मेरी एक दोस्त, अमेलिया बोनेआ, इन दिनों काफी उत्साहित हैं. साथ ही थोड़ी सी घबराई हुई भी हैं. उन्हें चिंता है कि वह बच्चों के बीच कैसे एक कहानी का पाठ कर पाएंगी. वे कहती हैं कि अपनी बेटी को पढ़ाना और बात है, पर बच्चों के बीच पाठ का उन्हें कोई अनुभव नहीं है. वे इतिहासकार हैं. हाल ही में उन्होंने बच्चों के लिए ‘टेलीग्राफ और जादुई आम’ के इर्द-गिर्द एक किताब लिखी हैं. वह अपने गृह प्रदेश सतु मारे में स्थित बच्चों के एक सार्वजनिक पुस्तकालय में इस किताब का पाठ करेंगी.
मुझे याद आया कि तीन साल पहले मैं अपनी नन्हीं-सी बेटी, कैथी, के लिए एक किताब, चूज डे, ख़रीद कर लाया था. कहानी में ‘चू पांडा’ अपने माँ-पिता के साथ पुस्तकालय, रेस्तरां और फिर सर्कस देखने जाता है और हर जगह उसे छींक आ जाती है. बेटी ने पूछा था कि पुस्तकालय क्या होता है! मैंने घर में रखी किताबों की रैक की ओर इशारा करके बताया कि पुस्तकालय में किताबें होती है पर सोचा कि उसे कोई पुस्तकालय घूमा लाऊं. मैंने आस-पास नज़र दौड़ाई पर मुझे बच्चों का कोई भी पुस्तकालय नजर नहीं आया. फिर मैं उसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पुस्तकालय में ले गया था.
दिल्ली में स्थित ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ जैसी जगह देश में बेहद कम है, जहाँ के पुस्तकालय में केवल बच्चों के लिए किताबें मौजूद हों. इसे प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर ने 1957 में स्थापित किया था. कुछ व्यक्तिगत प्रयासों को छोड़ दें तो पूरे देश में बच्चों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय का सर्वथा अभाव दिखता है. यहाँ तक कि बड़ों के लिए जो पुस्तकालय हैं, वहाँ भी बच्चों के लिए किताबों का कोई कोना ढूंढ़ने पर ही मिल पाता है.
हाल के वर्षो में एकलव्य, कथा, प्रथम जैसी प्रकाशन संस्थाएँ बच्चों के लिए काफी अच्छी और रचनात्मक किताबें छाप रही है. दिल्ली में होने वाले विश्व पुस्तक मेले में इन प्रकाशनों के स्टॉल पर माँ-पिता के संग बच्चों की भीड़ दिखाई देती है. बच्चों और स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों के लिए यहाँ प्रवेश मुफ्त में होता है.
नेशनल बुक ट्र्स्ट (एनबीटी) भी बच्चों के लिए दशकों से कम कीमत में सचित्र किताबें छापता रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में गैर सरकारी संस्थानों से भी किताबें छप कर आ रही हैं. कुछ महीने पहले नेहरू बाल पुस्तकालय के तहत एनबीटी से छपी बच्चों की एक पारंपरिक कहानी- 'कछुआ और खरगोश', पर मेरी नजर पड़ी जिसे जाकिर हुसैन ने मूल उर्दू में लिखा था और अनुवाद खुशवंत सिंह ने किया था. इस किताब में चित्राकंन मकबूल फिदा हुसैन ने किए थे. तीन दिग्गजों का नाम एक साथ किताब के मुख्य पृष्ठ पर देखना मेरे लिए सुखद था. यह कहा जा सकता है कि बच्चों के लिए लिखी गई किताबें बड़ों को ध्यान में रख कर ही लिखी जाती हैं, क्योंकि पहला पाठक बच्चों के अभिभावक ही होते हैं. बहरहाल, एनबीटी के पास संसाधनों की कमी नहीं है. उसे बच्चों के मानस को प्रभावित करने वाली दृष्टि के साथ नए प्रयोग कर किताबें निकालनी चाहिए.
बच्चों के बीच काम करने वाली गैर स्वंयसेवी संगठन, प्रथम ने दो साल पहले बच्चों के लिए एक ऑनलाइन लाइब्रेरी- ‘स्टोरीवीवर’ शुरु की है. यहाँ कोई भी मुफ्त में विभिन्न भारतीय भाषाओं में बच्चों के लिए किताबें डाउनलोड कर सकता है, पढ़ सकता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में अठारह साल से कम उम्र के करीब 47 करोड़ बच्चे हैं. सफदर हाशमी ने बच्चों की एक कविता में लिखा है-‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं/ तुम्हारे पास रहना चाहती हैं.’ लेकिन सवाल है कि हमने क्या आसपड़ोस में इन बच्चों के लिए कोई ऐसी जगह बनाई है, जहाँ पर उनके लिए किताबें हो, उनका अपना एक कोना हो, जहाँ पर उनकी कल्पना उड़ान भर सके.
(दुनिया मेरे आगे कॉलम, जनसत्ता में 21 जुलाई 2018 को प्रकाशित)

Monday, August 17, 2015

किताबों का सिकुड़ता कोना

फैक्ट एंड फिक्शन के मालिक अजीत विक्रम सिंह
बीस बरस पहले जब मैं देश की राजधानी में आया था, तब दक्षिणी दिल्ली के वसंत लोक स्थित प्रिया सिनेमा हॉल के इर्द-गिर्द खूब चहलकदमी रहती थी. दिल्ली के धनाढ्य लोगों, कॉलेज-विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और सैलानियों के लिए तब यह एक आधुनिक, लोक-लुभावन अड्डा हुआ करता था. दिल्ली में पहली अंगरेजी फिल्म बेसिक इंस्टिंक्टमैंने प्रिया सिनेमा हॉल में ही देखी थी. पर प्रिया हॉल के ठीक सामने एक छोटे से शीशे के गेट के पीछे किताबों से सजी रैक पर नजर बाद में पड़ी.
मेरे कॉलेज और विश्वविद्यालय चूंकि दक्षिणी दिल्ली में ही थे तो इस किताब की दुकान से जल्दी ही राब्ता कायम हो गया. गेट के खुलते ही उससे लगी घंटी की टुन-टुन बजने की ध्वनि और किताबों की पहचानी-सी गंध अपनी ओर खींचती रहती.
इस छोटे पर बेहतरीन संग्रह से भरी किताब की दुकान को इसी महीने इसके मालिक ने हमेशा के लिए बंद करने का फैसला किया है. सही है कि दिल्ली में किताबों की और भी दुकानें हैं. लेकिन इस किताब की दुकान पर अकादमिक और लोकप्रिय साहित्य का जैसा संग्रह मिल पाता था, वह दुर्लभ था. पिछले दिनों पता चलने पर जब मैं अपना आखिरी सलाम कहने इस दुकान पर पहुंचा तो किताबों से हर समय भरी रहने वाली रैक खाली पड़ी थी. कुछ ग्राहक-पाठक दुकान के अंदर मौजूद थे.
मैंने जब दुकान के मालिक अजीत विक्रम सिंह की तस्वीर खींचने से पहले उनकी इजाजत मांगी तो उन्होंने हंस दिया. वहीं मौजूद एक युवा लेखिका ने कहा कि जल्दी से तस्वीर उतार लीजिए, आजकल ये कम ही हंसते हैं.अजीत विक्रम सिंह के चेहरे पर एक विषादपूर्ण हंसी फिर से उभर आई. उन्होंने कहा कि नहीं, अब स्थितप्रज्ञ हो चला हूं.हालांकि मुझे ऐसा लगा कि अपने प्रिय से बिछुड़ने के सदमे से वे उबरे नहीं हैं.
दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक अजीत विक्रमजी अपने पुस्तक प्रेम के कारण ही इस व्यवसाय में आए थे. लेकिन वे कहते हैं कि अब न उतने निष्ठावान पाठक रहे और न इतनी आमदनी होती है कि इस महंगी जगह का किराया भी चुका सकूं. फिर आस-पड़ोस में बड़े-बड़े मॉल बन जाने के बाद अब इस जगह के प्रति लोगों का आकर्षण भी पहले जैसा नहीं रहा.
मॉल में जो बड़े व्यवसायियों की दुकानें हैं, वहां किताबों की बिक्री हो या न हो, उन्हें बहुत फर्क नहीं पड़ता. लेकिन छोटे दुकानदारों के लिए यह संकट का समय है. पाठकों के लिए भी मॉल में वही किताबें बिखरी हुई मिलती हैं जो बाजार की मांग के अनुरूप हो. क्या यह अनायास है कि आज हमें अखबारों के पूरे पेज पर आने वाले नए उपन्यासों का विज्ञापन दिखता है!
सन 2008 में इसी तरह दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित किताब की चर्चित तीस वर्ष पुरानी दुकान बुकवर्मकी अकाल मौत हुई थी. जैसे छोटे शहरों और कस्बों की दुकानों से आपका एक निजी रिश्ता रहता है, उसी तरह ग्राहकों के साथ इन छोटी दुकानों का भी एक खास संबंध रहा है. बहरहाल, इन किताब की दुकानों का बंद होना हमारे समय में शहर की बदल रही पुस्तक संस्कृति और नए मध्यवर्ग के जीवन में किताबों की घटती अहमियत पर भी एक टिप्पणी है. किताबों के पढ़ने, खरीदने और लोगों में बांटने का एक अलग समाजशास्त्र होता है. सच तो यह है कि जिस अनुपात में लोगों के पास पैसा बढ़ा है, पढ़ने की फुर्सत उतनी ही कम हुई है. लोग हलकी-फुलकी वैसी किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं, जिन्हें मेट्रो या बसों की यात्रा के दौरान निबटाया जा सके.
ऐसा भी नहीं है कि किताबों की बिक्री नहीं होती है. दिल्ली में हर साल होने वाले पुस्तक मेले में किताबों की बिक्री इस बात की ताकीद करते हैं कि एक नया पाठक और नव शिक्षित वर्ग उभरा है, जिसमें पढ़ने की भरपूर ललक है. साथ ही, पिछले कुछ वर्षों में वेबसाइट के माध्यम से किताबों की खरीद-बिक्री का एक कारोबार फला-फूला है, जहां पुस्तक प्रेमियों को मूल्य में छूट पर किताबें मिल जाती हैं.

अजीत विक्रम कहते हैं कि इंटरनेट से तो मैं भी किताबें खरीदता हूं, पर आपको वहां यह सुख तो नहीं मिलता जो किताबों के रैक के बीच भटकते हुए अचानक से ऐसी किताब पाने से मिलता है, जिसे आप अर्से से ढूंढ़ रहे थे. या ऐसी किताब जो आपकी रुचि के अनुकूल न हो, पर पढ़ने के बाद आपके जीवन का वह हिस्सा बन जाती है!अब किताबों के इस कोने पर रुकना नहीं हो पाएगा, लेकिन यहां से गुजरते हुए इसकी याद जरूर आएगी.
(जनसत्ता के दुनिया मेरे आगे कॉलम में 18 अगस्त 2015 को प्रकाशित)

Sunday, May 17, 2009

Book on Iraq in the time of conflict

What happens when a government is overthrown? How is new governing body developed? Finally, which rights of the people need to be preserved in the process of state building? Dr. Zakia Afrin's book Tranasitional Authority in Iraq: Legitimacy, Governence and potential Contribution to the Progressive Development of International Law, addresses these issues in the case of post conflict Iraq's developing governing body. The analysis focuses on the composition, legal authority, and the effectiveness of the transitional powers in Iraq. A key point of focus is the development of the people's rights during new government's formation.

This well researched book is a good guidence for students of international law and relations, and a practical tool for the international practitioners and political leaders in the exercise of government authority.

Zakia, a dear friend from Bangladesh is an adjunct professor of Law at the Golden Gate University in San Francisco, USA. An alumuns of the Hague Academy of International law, she has an LLB from Dhaka University in Bangladesh, LLM and an SJD specialising in public internatonal law from Golden Gate Univeristy. She is cofounder of the Southern Governance Reporting Group, a think tank analyzing governance in developing countries in the fields of energy, enviornment, minitory issue and conflict resolution.