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Saturday, August 20, 2022

आजाद भारत में बॉलीवुड का सफर

युवा अर्थशास्त्री श्रयना भट्टाचार्य ने हाल में ही प्रकाशित किताब डिस्परेटली सीकिंग शाहरुखमें उदारीकरण के बाद भारतीय महिलाओं की जिंदगी, संघर्ष और ख्वाबों का लेखा-जोखा बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया है. खास बात यह है कि इस किताब में देश के विभिन्न भागों और वर्गों की महिलाओं की जिंदगी में साझेदारी फिल्म अभिनेता शाहरुख खान को लेकर बनती है, जो उनकी फैंटेसीऔर आजादीको पंख देता है.

इस बात पर शायद ही किसी को असहमति हो कि आजाद भारत में बॉलीवुड ने देश को एक सूत्र में बांधे रखने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है. भले बॉलीवुड के केंद्र में मनोरंजन और स्टारका तत्व हो, पर ऐसा नहीं कि आजादी के 75 वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से इसने नजरें चुराई हैं. खासकर, पिछले दशकों में तकनीक और बदलते बाजार ने इसे नए विषय-वस्तुओं को टटोलने, संवेदनशीलता के प्रस्तुत करने और प्रयोग करने को प्रेरित किया है-स्त्री स्वतंत्रता का सवाल हो या समलैंगिकता का!

आधुनिक समय में सिनेमा हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है. किसी भी कला से ज्यादा सिनेमा का प्रभाव एक बहुत बड़े समुदाय पर पड़ता है. आजादी के तुरंत बाद से सरकार ने देश में सिनेमा के प्रचार-प्रसार में रुचि ली. वर्ष 1949 में सिनेमा उद्योग की वस्तुस्थिति की समीक्षा के लिए फिल्म इंक्वायरी कमेटीका गठन किया गया था. इस समिति ने सिनेमा के विकास के लिए सुझाव दिए थे. इसी के सुझाव के आधार पर फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन’, जो बाद में नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशनके नाम से जाना गया, का गठन 1960 में किया गया. साथ ही सिनेमा के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए पुणे में फिल्म संस्थान (1960) की स्थापना हुई. क्या यह आश्चर्य नहीं कि बॉलीवुड की मुख्यधारा धारा से इतर भारत में जो समांतर सिनेमा (न्यू वेब सिनेमा) की शुरुआत हुई उसमें इन सरकारी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है!

तत्कालीन पीएम नेहरू देश-दुनिया के सामने सिनेमा के माध्यम से एक स्वतंत्र राष्ट्र की ऐसी छवि प्रस्तुत करना चाह रहे थे जो किसी महाशक्ति के दबदबे में नहीं है. वर्ष 1952 में देश के चार महानगरों में किए गए पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहके आयोजन को हम इस कड़ी के रूप में देख-परख सकते हैं. साथ ही देश के फिल्मकारों और सिनेमा प्रेमियों को विश्व सिनेमा की कला से परिचय और विचार-विमर्श का एक मंच उपलब्ध कराना भी उद्देश्य था. वे सिनेमा के कूटनीतिक महत्व से परिचित थे. तभी से सांस्कृतिक शिष्टमंडलों में बॉलीवुड के कलाकारों को शामिल किया जाता रहा है.

पचास और साठ के दशक की रोमांटिक फिल्मों में आधुनिकता के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के सपनों की अभिव्यक्ति मिलती है. फिल्मों पर नेहरू के विचारों की स्पष्ट छाप है. दिलीप कुमार इसके प्रतिनिधि स्टार-अभिनेता के तौर पर उभरते हैं. हालांकि राज कपूर, देवानंद, गुरुदत्त जैसे अभिनेताओं की एक विशिष्ट पहचान थी.

सत्तर-अस्सी के दशक में अमिताभ बच्चन की सिनेमा-यात्रा देश में नक्सलबाड़ी आंदोलनकी पृष्ठभूमि से होते हुए युवाओं के मोहभंग, आक्रोश और भ्रष्टाचार को अभिव्यक्त करता है. हालांकि इसी दशक में देश-दुनिया में भारतीय समांतर सिनेमा की धूम रही. बॉलीवुड में शुरुआत से ही पॉपुलरके साथ-साथ गाहे-बगाहे पैरेललकी धारा बह रही थी, पर इन दशकों में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षित युवा निर्देशकों, तकनीशियनों के साथ-साथ नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आज़मी, स्मिता पाटील जैसे कलाकार उभरे. सिनेमा सामाजिक यथार्थ को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने लगा. हम कह सकते हैं कि समांतर सिनेमा का सफर 21वीं सदी में भी जारी है, भले स्वरूप में अंतर हो.

नब्बे के दशक में उदारीकरण (1991) और भूमंडलीकरण के बाद देश में जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए उसे शाहरुख, सलमान, आमिर खान, अक्षय कुमार, अजय देवगन की फिल्मों ने पिछले तीन दशकों में प्रमुखता से स्वर दिया हैं. अमिताभ बच्चन भी नए रूप में मौजूद हैं. यकीनन, बॉलीवुड मनोरंजन के साथ-साथ समाज को देखने की एक दृष्टि भी देता है.

कोई भी कला समकालीन समय और समाज से कटी नहीं होती है. हिंदी सिनेमा में भी आज राष्ट्रवादी भावनाएं खूब सुनाई दे रही है. आजादी के तुरंत बाद बनी फिल्मों में भी राष्ट्रवाद का स्वर था, हालांकि तब के दौर का राष्ट्रवाद और आज के दौर में जिस रूप में हम राष्ट्रवादी विमर्शों को देखते-सुनते हैं उसके स्वरूप में पर्याप्त अंतर है. यह एक अलग विमर्श का विषय है.

उदारीकरण के बाद भारत आर्थिक रूप से दुनिया में शक्ति का एक केंद्र बन कर उभरा है, लेकिन जब हम सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पॉवर) की बात करते हैं तब बॉलीवुड ही जेहन में आता है. आजाद भारत में यह बॉलीवुड के सफर की सफलता है.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Friday, June 14, 2013

मेहनतकशों का शहर


जिगन को 'मुफस्सिल' तो नहीं कहेंगे पर बर्लिन, बोन, कोलोन की तुलना में यह शहर अपनी शान में छोटा है.  और जैसा कि हर छोटे शहरों या मुफस्सिल में रहने वालों के साथ होता है, वे आस-पास के शहरों की ओर हसरत और कुछ ईर्ष्या से देखते रहते हैं.

तीन वर्ष पहले जब कुछ महीने के लिए आया था तो लोगों को आश्चर्य लगता था कि दिल्ली जैसे विशाल महानगर का आदमी इस छोटे शहर में कैसे खुश रह रहा है. तब रोमानिया मूल की जर्मनी में पली-बढ़ी योआना पूछती थी दिल्ली से कैसे यहाँ! यह शहर तो नहीं जँच रहा होगा ! मैं कहता था- अरे! इसलिए तो जँच रहा है! योआना दिल्ली, कोलकाता देख आई है.

द्वितीय विश्वयुद्ध के करीब 70 वर्षों के बाद युद्ध की पीड़ा से जर्मनी उबर भले गया हो, उसके भूत ने अभी भी पीछा नहीं छोड़ा है. कल जब हम कुछ प्रोफेसर के साथ रात का खाना खा रहे थे तब एक प्रोफेसर ने हँसते हुए पूछा- अच्छा बताइए, एक तो जर्मनी युद्ध के लिए प्रसिद्ध रहा है और दूसरा किस चीज से उसकी खासियत झलकती है. किसी ने कहा, समय की पाबंदी, किसी ने कहा, दक्षता और किसी ने कहा बीयर! पर हँसते हुए फिर उन्होनें ही जवाब दिया- 'गलत, हम युद्ध हारने के लिए भी प्रसिद्ध है!'

असल में करीब सात-आठ सौ साल पुराने इस शहर का अस्सी प्रतिशत हिस्सा द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नष्ट हो गया था. इसे इसलिए भी निशाना बनाया गया क्योंकि उत्तरी-राइन वेस्टफेलिया में पड़ने वाला उत्तरी-पश्चिमी यह क्षेत्र लौह-इस्पातों से भरा-पूरा था.  और मुख्यत:  कामगारों का शहर था. नष्ट नीड़ का निर्माण आप कितना भी कीजिए, पर क्या आप पुरानी रौनक को पा सकेंगे? फिर भी मेहनतकशों ने नए सिरे से इस शहर को बुना और आज जर्मनी के किसी भी अन्य शहर की तरह आज उतना ही जर्मन है. छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा, बीचों-बीच बहती जिग नदी ,  बारिश की फुहाड़ और केंद्र में जिगन विश्वविद्यालय. सत्तर के दशक में क्षेत्रीय विकास के लिए सरकार ने इसके केंद्र में विश्वविद्यालय की स्थापना की और आज यह मुख्य रूप से 'यूनिवर्सिटी टाउन' कहलाता है.  किसी भी विश्वविद्यालय में मौसम के बदलने के साथ प्रवासी पक्षियों की तरह विद्यार्थियों का आना-जाना लगा रहता है. लेकिन युवाओं की चहल-पहल, गहमागहमी बरकरार रहती है. भारत अभी युवाओं का देश है , इसके ठीक उलटा जर्मनी में उम्र के आखिरी चरण की ओर बढ़ते लोगों की जनसंख्या काफी अधिक है. और यह यहाँ के लोगों और जर्मनी के सरकार की मूल चिंता है. 

पिछली बार सर्दी से उकताए लोग वसंत के आने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे. पर जून महीने में चारों तरफ हरियाली वैसी है जैसे भारत में मानसून के समय होती. नौ साढ़े-नौ बजे अंधेरा होता है, ऐसा लगता है सूरज 'ओवर टाइम' कर रहा हो! 
योआना

भारत और जर्मनी में 'राजनीति, घर्म और मीडिया 'के संबंधों को लेकर यहाँ  एक सेमिनार का आयोजन है और इसी सिलसिले में हम कुछ भारतीय दोस्तों और प्रोफेसरों के साथ आए हैं.  शाम को हम योआना से मिले. योआना मल्टीनेशनल कंपनी के कर्मचारियों को अंग्रेजी पढ़ाने के बाद आई थी. वे कहती है कि भूमंडलीकरण के बाद ऐसे लोगों की माँग बढ़ी है जो अंग्रेजी जानते हो क्योंकि इन कंपनियों का कारोबार भारत और अमेरिका जैसे देशों के साथ है और अंग्रेजी की जरुरत होती है. पर यहाँ लोगों में अंग्रेजी नहीं जानने को लेकर झिझक या विनम्रता से उपजी एक स्वभाविक हया जो हमारे अंदर होती है वह भले हो ,पर शर्म नहीं है जैसा कि हममें आम तौर पर होती है. किताब की दुकानों पर जर्मन में ढेरों किताबें और किसी एक छोटे से खंड में अंग्रेजी की किताबें दिखती हैं. 

योआना शाहरुख खान की जबरदस्त फैन है. पिछली बार वो मुझे अपने घर 'ओम शांति ओम' दिखाने ले गई थी. मैंने पूछा कि क्या 'जब तक है जां', देख ली? उसने कहा अभी नहीं, हां, 'रा वन' देखी थी. मैंने पूछा कि क्या तुम्हारे माता-पिता भी हिंदी फिल्म देखते हैं? अपने हाथों को इस अंदाज में झटका कि क्या बात करते हो. पर साथ ही जोड़ा कि मेरी दादी जरुर देखती थी. रोमानिया में राज कपूर की आवारा और तीसरी कसम काफी चर्चित थी. मेरी दादी इन फिल्मों का जिक्र करती थी और आवारा मुझे भी पसंद है.


(जनसत्ता के समांतर स्तंभ में 22 जून 2013 को प्रकाशित)