वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म ‘उसकी रोटी’, बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ और मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ ने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को ‘अनपापुलर फिल्म’[i] कहते हैं. जाहिर है, भारतीय सिनेमा और खास कर बॉलीवुड की मनोरंजन प्रधान फिल्मों, जिसमें नाच-गाने पर जोर रहता है और सितारों (‘स्टारों’) की केंद्रीयता रहती है, उससे अलगाने के लिए समीक्षक इस तरह की संज्ञा देते हैं. इसे कला सिनेमा भी कहा गया. मणि कौल (1942-2011), फिल्म संस्थान, पुणे के उनके समकालीन कुमार शहानी और कैमरामैन के के महाजन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में मनोरंजन से अलग सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया. इसके लिए हिंदी साहित्य (नयी कहानियों) की ओर उन्होंने रुख किया.
Saturday, September 04, 2021
समांतर सिनेमा और मणि कौल
Thursday, September 02, 2021
सिनेमा संस्कृति की बदलती तस्वीर
मुंबई भले ही मायानगरी हो, सिनेमा की संस्कृति दिल्ली में फली-फूली. आम दर्शकों के अलावे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कई नेता सिनेमाप्रेमी हुए हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक. पिछले दिनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमाहॉल के आधुनिक साज-सज्जा और तकनीक से लैस, नवीन रूप का उद्घाटन किया तो उन्होंने शिद्दत से सिनेमा के प्रति अपने प्रेम को याद किया. प्रिया में ही ‘बैल बॉटम’ फिल्म के ट्रेलर के लांच के अवसर पर अभिनेता अक्षय कुमार ने उन दिनों को याद किया जब ‘ब्लैक’ में टिकट लेकर उन्होंने दिल्ली के अम्बा सिनेमाहॉल में ‘अमर अकबर एंथोनी’ देखी थी. किसी भी शहर की संस्कृति को सिनेमा के रास्ते भी हम देख-परख सकते हैं. दिल्ली में कई पुराने सिनेमाघर आज बंद हो गए हैं, पर उन सिनेमाघरों की स्मृति लोगों के जेहन में है. मिनरवा, फिल्मिस्तान, कमल, पारस, सावित्री कुछ ऐसे ही नाम हैं. किसी भी शहर के लिए सिनेमाघर लैंडमार्क की हैसियत रखते हैं. सिनेमाघरों की रोशनी से शहर के कोने प्रकाशित होते रहे हैं.
यूँ तो किसी भी सिनेमा हॉल के नवीनीकरण की घटना सामान्य ही कही जाएगी, लेकिन दिल्ली की सिनेमा संस्कृति में प्रिया सिनेमाहॉल खास महत्व रखता है. कोरोना महामारी से पहले ही इसे नए रूप में लाने की तैयारी शुरु हुई थी. महामारी के दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेनसिंग की वजह से करीब दो साल के बाद इसे आम दर्शकों के लिए फिर से खोला गया है.
प्रसंगवश, महामारी के दूसरी लहर के बाद ‘बैल बॉटम’ बॉलीवुड की पहली बड़े बजट की फिल्म है जिसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया है. हालांकि सिनेमाघरों में अभी भी पचास प्रतिशत सीट ही दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं. ऐसे में डिस्टेनसिंग का पालन करते हुए परिवार या दोस्तों के साथ सिनेमा देखने का लुत्फ नहीं उठाया जा सकता है. जाहिर है, कोरोना महामारी के दौरान ओटीटी प्लेटफार्म ने मध्यवर्गीय दर्शकों के सिनेमा देखने की संस्कृति को काफी बदल दिया है. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान जोर देकर कहा कि “अभी लोग लैपटॉप, टीवी, मोबाइल पर सिनेमा देख रहे हैं, पर सिनेमा को वापस हॉल में आना ही होगा. यह एक सामूहिक अनुभव है. छोटे परदे पर आप दृश्य, ध्वनि की बारीकियों से वंचित हो जाते हैं. घर में बहुत तरह के व्यवधान भी मौजूद रहते हैं.” महीनों बाद जब हम सिनेमाहॉल (पीवीआर प्रिया XL) में पहुँचे तो इसे बखूबी महसूस किया. हालांकि यह नोट करना उचित होगा कि अक्षय कुमार अभिनीत ‘बैल बॉटम’ हाल ही में ओटीटी पर रिलीज हुई मलयालम फिल्मों के टक्कर की नहीं कही जा सकती. कोरोना महामारी के दौरान इस फिल्म की शूटिंग हुई थी जिसका दबाव इस फिल्म के निर्माण-निर्देशन में है.
बहरहाल, उदारीकरण-भूमंडलीकरण के कारण पिछले सदी के नब्बे के दशक में समाज में आए बदलावों के साथ ही महानगरों में सिनेमा देखेने की संस्कृति भी प्रभावित हुई. सिंग्ल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले लिया और सिंग्ल स्क्रीन थिएटर धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए. आज देश में करीब तीन हजार स्क्रीन मल्टीप्लेक्स में उपलब्ध हैं. प्रिया सिनेमा के मालिक अजय बिजली ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोडशो के साथ साझेदारी में प्रिया विलेज रोडशो लिमिटेड (1995), जिसे पीवीआर से नाम से हम जानते हैं, शुरु किया. इस साझेदारी को वे प्रिया के साथ ही आरंभ करना चाह रहे थे, इसलिए इसे पीवीआर नाम दिया गया, पर दक्षिण दिल्ली में स्थित अनुपम सिनेमाघर को मल्टीप्लेक्स में बदल कर वर्ष 1997 में इसकी विधिवत शुरुआत हुई, प्रिया भी वर्ष 2000 में पीवीआर प्रिया में तब्दील हुआ. इसे आज भी सिंग्ल स्क्रीन ही रखा गया है.
जेएनयू के बेहद करीब होने की वजह से कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के मिलने-जुलने, डेटिंग का प्रिया सिनेमा एक प्रमुख अड्डा था. बदलती दिल्ली की एक छवि यहाँ आने पर मिल जाती थी. 70 के दशक में शुरु हुए इस सिनेमा हॉल के बारे में सिनेमा समीक्षक जिया उस सलाम ने ‘दिल्ली: फोर शोज’ में लिखा है, “वर्षों तक प्रिया धनी-मनी सिनेमा प्रेमियों, महिलाओं और पुरुषों के लिए ऐसी जगह रहा जिनके लिए सिनेमा का मतलब हॉलीवुड की ताजातरीन फिल्में थी. कभी-कभी यहां मध्यमार्गी हिंदी फिल्में भी दिखाई जाती थी, पर व्यावसायिक मसाला फिल्मों से निश्चित दूरी रही.” हालांकि बाद के दशक में ही बॉलीवुड की फिल्मों पर यहाँ जोर बढ़ा. इसी बीच समाज में नव मध्यमवर्ग का उभार भी हुआ, जिसे हम बॉलीवुड की फिल्मों की विषय-वस्तु में भी देखते हैं. प्रसंगवश, पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की आवक से नए तरह की सिनेमा के बनने और प्रसारण का रास्ता भी निकला है. कम बजट की ऑफ बीट फिल्में, जो बॉलीवुड के स्टारों की लकदक से दूर हैं, आसानी से यहाँ दिखाई जाने लगी है.
यह तय है कि आने वाले समय में बॉलीवुड को ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मों, वेबसीरिजों से चुनौती का सामना करना पड़ेगा. सवाल है कि सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींच लाने के लिए क्या बॉलीवुड तैयार है? सवाल यह भी है कि सिनेमाघरों तक जाने के लिए युवा दर्शक तैयार हैं या सिनेमाहॉल आने वाले समय में नॉस्टेलजिया का हिस्सा बन कर रह जाएगी?
(न्यूज 18 हिंदी के लिए)
Thursday, August 26, 2021
जे नाची से बाची: रामदयाल मुंडा का मंत्र
पिछले दिनों विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया, पर आदिवासी बुद्धिजीवियों की चर्चा कहीं नहीं दिखी. मुख्यधारा के विमर्श में वे अक्सर छूट जाते हैं. आज झारखंड के आदिवासी बुद्धिजीवी रामदयाल मुंडा का 82वां जन्मदिन है. डॉक्टर रामदयाल मुंडा (1939-2011) बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वे झारखंड आंदोलन के अगुआ थे. उनकी पहुँच देश-विदेश के साहित्यिक- सांस्कृतिक-राजनीतिक मंचों तक सहज रूप में थी. रामदयाल मुंडा की प्रतिष्ठा गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर-पूर्
वे अक्सर कहते थे- जे नाची से बाची. आदिवासी संस्कृति उनकी चिंता के केंद्र में था. ढोल-मांदर, नगाड़े के साथ, बांसुरी बजाते हुए उनकी छवि लोगों के जेहन में अभी भी है. उन्हें पद्मश्री के साथ ही संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. ‘नाची से बाची’ (2017) नाम से ही झारखंड के डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार मेघनाथ और बीजू टोप्पो ने एक वृत्तचित्र बनाई है जो उनकी जीवन यात्रा और रचनाशीलता को आत्मीयता के साथ हमारे सामने लेकर आती है. झारखंड के त्योहार सरहुल को लोकप्रिय बनाने में उनका खास योगदान रहा है. इस वृत्तचित्र की शुरुआत मुंडा की आवाज में सरहुल के मंत्र से ही होती है. इस फिल्म में राँची के पास दिउड़ी जैसे छोटे से गाँव से अमेरिका तक की उनकी यात्रा को दर्शाया गया है, जहाँ वे पीएचडी के लिए गए और मिनिसोटा विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे थे. अमेरिका से वापस आकर वे राँची विश्वविद्यालय में आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के निदेशक के रूप में नियुक्त हुए और बाद में इस विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने. विषय-वस्तु के साथ ही फिल्म निर्माण के दृष्टिकोण से भी यह वृत्तचित्र खास है. मुंडा की इस यात्रा में दर्शक भी सहज रूप से साथ हो लेता है.
लगभग तीस साल तक मुंडा के नजदीक रहे मेघनाथ बातचीत में कहते हैं कि एक संस्कृतिकर्मी के रूप में मुंडा औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त थे. वे कहते हैं, “ रामदयाल मुंडा ने आदिवासी नृत्य को मेहमाननवाजी के रूप में किए जाने को हतोत्साहित किया. उन्होंने इसे वैल्यू से जोड़ कर देखा.” मेघनाथ अखरा (ओपन ऑडिटोरियम) का उदाहरण देते हैं. वे कहते हैं कि आदिवासी अखरा में श्रोता और गाने वाला, देखने और नाचने वाला होता है. इसमें ‘परफार्मर’ और ‘ऑब्जर्वर’
हिंदी में रामदयाल मुंडा के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन नहीं दिखता है. डॉक्टर वीर भारत तलवार की किताब ‘झारखंड में मेरे समकालीन’ (2019) अपवाद है, जिसमें एक लंबा संस्मरणात्मक और विश्लेषणात्मक लेख मुंडा के ऊपर है. इस लेख के शुरुआत में ही तलवार लिखते हैं: “भारत के आदिवासी बुद्धिजीवों पर जब भी विचार किया जाएगा, रामदयाल मुंडा का नाम उनके श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों में गिना जाएगा. रामदयाल को सिर्फ आदिवासी बुद्धिजीवी के रूप में नहीं देखना चाहिए. उन्हें भारतीय बुद्धिजीवी के रूप में भी देखा जाना चाहिए. लेकिन झारखंड बुद्धिजीवियों के तो वे सिरमौर ही थे.” असल में तलवार झारखंड आंदोलन में उनके संघर्ष में साथी थे और उनके साथ लंबा संग-साथ रहा था. मुंडा जब अमेरिका में थे तब 70 के दशक में उनके साहित्य को तलवार ने ही प्रकाशित किया था.
आदिवासी भाषा और लिपि के विमर्श के बरास्ते इस लेख में मुंडा का ईमानदार एवँ लोकतांत्रिक चरित्र उभर कर सामने आता है. पर ऐसा नहीं है कि तलवार मुंडा के व्यक्तित्व से मुग्ध या आक्रांत हैं. जहाँ वैचारिक रूप से विचलन दिखता है उसे वे नोट करना नहीं भूलते. पिछले साल हेमंत सोरेन की सरकार ने झारखंड विधानसभा में 'सरना आदिवासी धर्म कोड बिल' को पास किया. इसमें आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड का प्रस्ताव है. यह बिल फिलहाल मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास है. यहाँ पर इस बात का उल्लेख जरूरी है कि रामदयाल मुंडा ने आदिवासियों के धर्म के सवाल को अपनी किताबों में गंभीरता से विश्लेषित किया है. वे आदिवासियों को हिंदू नहीं मानते थे. सत्ता के द्वारा आदिवासियों के ऊपर हिंदू धर्म थोपने के खिलाफ थे.
आदिवासियों की अस्मिता के सवाल को उठाते हुए हालांकि तलवार नोट करते हैं- ‘यह अजीब बात है कि मुंडाओं के पूर्वजों को हिंदू ऋषियों-मुनियों से जोड़ने के लिए एक ओर वे सागू मुंडा की आलोचना कर रहे थे, दूसरी ओर खुद अपने लेख में यही काम कर रहे थे.’ मुंडा अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी और संस्कृतकर्मी थे, जिनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी. पर जैसा कि तलवार ने लिखा है उनका विकास एक जननेता के रूप में कभी नहीं हुआ. मुंडा आखिरी दिनों में कांग्रेस के सहयोग से राज्यसभा के सदस्य बने थे. तलवार क्षोभ के साथ लिखते हैं- ‘राजनीतिक सत्ता हासिल करने के मोह में रामदयाल ने अपने जीवन की जितनी शक्ति और समय को खर्च किया, अगर वही शक्ति और समय उन्होंने अपने साहित्य लेखन और सांस्कृतिक क्षेत्र के कामों में लगाया होता-जिसमें वे बेजोड़ थे और सबसे ज्यादा योग्य थे-तो आज उनकी उपलब्धियाँ कुछ और ही होती.’ एक बुद्धिजीवी हमेशा प्रतिरोध की भूमिका में रहता है और उसकी पक्षधरता हाशिए पर रहने वाले उत्पीड़ित-शोषित जनता के प्रति रहती है. राजनीतिक सत्ता एक बुद्धिजीवी को बोझ ही समझती है और इस्तेमाल करने से नहीं चूकती.
तलवार राम दयाल मुंडा की भाषाई संवेदना और समझ को उनके समकालीन अफ्रीकी साहित्य के चर्चित नाम न्गुगी वा थ्योंगो के बरक्स रख कर परखते हैं और पाते हैं कि जहाँ न्गुगी अंग्रेजी को छोड़ कर अपनी आदिवासी भाषा की ओर मुड़ गए थे, वहीं मुंडा मुंडारी भाषा में लिखना शुरु किया, ‘धीरे धीरे अपनी भाषा छोड़कर हिंदी की ओर मुड़ते गए.’ यह बात वृहद परिप्रेक्ष्य में अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों पर भी लागू होती है जो प्रसिद्धि और पहुँच के लिए अंग्रेजी पर अपनी नजरें टिकाए रहते हैं.
आज रामदयाल मुंडा के नाम पर झारखंड में कई आयोजन रहे हैं जिसमें उनकी प्रतिमा का अनावरण भी शामिल है. इन प्रतीकात्मक आयोजनों से अलग जरूरत इस बात की है कि मुंडा ने लेखन और सांस्कृतिक कर्म के द्वारा जो अलख जगाया उसे दूर तक पहुँचाया जाए, उनके कार्य की सम्यक आलोचना हो. एक बुद्धिजीवी को याद करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता.
(न्यूज 18 हिंदी के लिए, 23 अगस्त 2021)
Monday, August 16, 2021
सांस्कृतिक विविधता की विरासत
देश के विभिन्न इलाकों में कला और सांस्कृतिक रूपों की आवाजाही होती रही है. कला विदुषी कपिला वात्स्यायन ने ठीक ही नोट किया है कि ‘भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की यह विशेषता है कि इतिहास के किसी विशेष युग में देश के किसी भाग में जन्मे आंदोलन, कलारूप और शैली को देश के किसी सर्वथा दूरस्थ प्रदेश में फलने फूलने का अवसर मिलता है.’ आजादी के बाद सांस्कृतिक विविधता के बीच एकता और देश के विकास के लिए कला और संस्कृति की महत्ती भूमिका को आधुनिक भारत के निर्माताओं ने स्वीकारा था. पं. नेहरू ने भले ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ पर जोर दिया, पर वे कला और सांस्कृतिक संस्थानों के निर्माण को लेकर भी उतने ही तत्पर थे.
Thursday, August 05, 2021
लोकतंत्र में विरोध की प्रवृत्ति उसकी आत्मा है: मैनेजर पांडेय
प्रोफेसर मैनेजर पांडेय हिंदी के वरिष्ठ आलोचक हैं. सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना दोनों क्षेत्र में इन्होंने लेखन किया है. आलोचना की विचारधारा, सामाजिकता और साहित्य के समाजशास्त्र पर इनका विशेष जोर रहा है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रतिष्ठित भारतीय भाषा केंद्र से ये लंबे समय तक जुड़े रहे. प्रोफेसर पांडेय जीवन के अस्सीवें साल में हैं और आलोचना कर्म में अभी भी सक्रिय हैं. दिल्ली स्थित आवास पर उनसे अरविंद दास ने बातचीत की, एक अंश प्रस्तुत है:
Thursday, July 29, 2021
कथाकार शेखर जोशी का ओलियागाँव
तस्वीर: प्रदीप पांडे (साभार)
शेखर जोशी नई कहानी आंदोलन के एक महत्वपूर्ण रचनाकार रहे हैं. उनकी कहानी ‘कोसी का घटवार’ 'परिंदे' (निर्मल वर्मा) और 'रसप्रिया' (फणीश्वर नाथ रेणु) के साथ हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानियों में गिनी
जाती हैं.
88 वर्षीय शेखर जोशी ने उम्र के इस पड़ाव में आकर अपने बचपन को ‘मेरा ओलियागाँव’ में पंक्तिबद्ध किया है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस किताब में कुमाऊँ पहाड़ियों के गाँव में बीता लेखक का
बचपन है, विछोह की स्मृतियां हैं. बचपन से लिपटा हुआ
औपनिवेशिक भारत का समाज चला आता है. स्मृतियों में अकेला खड़ा सुंदर देवदारु,
कांफल का पेड़ है, बुरुंश के फूल हैं. पूजा-पाठ और तीज-त्यौहार हैं. लोक मन में
व्याप्त अंधविश्वास और सामाजिक विभेद भी. किसी भी
रचनाकार के रचना का उत्स उसके बचपन में ढूंढ़ा जा सकता है. शेखर जोशी इसके अपवाद
नहीं हैं. अपने ऊपर पड़े साहित्यिक प्रभाव को याद करते हुए वे एक जगह लिखते हैं:
“दूसरे
विश्व युद्ध के समय में बच्चा ही था. उन दिनों के.एम.ओ.यू (कुमाऊँ मोटर ओनर्स
यूनियन) की मोटर गाड़ियाँ फौजियों से भरी रहती थीं. आम जनता को सामान्यत: पैदल ही यात्रा करनी पड़ती थी... हम लोग पैदल ही मोटर मार्ग पर अल्मोड़ा
के लिए चल पड़े. रास्ते में थोड़ी- थोड़ी दूर पर बस्तियों के निकट किसी रणबाँकुरे
फौजी को विदा करने के लिए उसके परिवार के स्त्री-पुरुष बस की प्रतीक्षा करते हुए
मिलते. विदा देने वालों में अधिकतर महिलाएँ होतीं-संभवत: माँ, भाभी, चाची और बहिनें थीं
और कभी-कभी कम उम्र की पत्नी भी. बस आ पहुँचती तो कड़क फौजी वर्दी में सजा जवान बस
के अंदर आ बैठता और ‘घुर्र’ की
आवाज कर गाड़ी आगे बढ़ जाती, तब जो रुलाई का स्वर उठता वह
बहुत ही हृदय विदारक होता. रास्ते भर हमें ऐसे ही दृश्य देखने को मिलते रहे. युद्ध
में समिधा बनते गए उन नौनिहालों मे से बहुत कम लोग सकुशल लौटे थे.”
शेखर जोशी टिप्पणी करते हैं कि ‘शायद कोसी का घटवार का नायक
गुसाई भी इसी घटना का परिणाम हो.’ गुंसाई का चरित्र हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय है. इस
प्रेम कहानी में गुंसाई की ‘फौजी पैंट की चाहत’ और उससे उपजा अकेलापन मर्म को
भेदती है.
आधुनिक काल में पहाड़ों से विस्थापन बड़ी मात्रा में हुआ है. उत्तराखंड के हजारों गाँव ‘भुतहा गाँव’ की संज्ञा पा चुके हैं. उदारीकरण-भूमंडलीकरण
के बाद न सिर्फ पहाड़ी गाँवों की बल्कि मैदानी भागों में बसे गाँवों की छवियाँ भी बदल रही है. इन बदलावों का समाजशास्त्रीय अध्ययन होना
अभी बाकी है. यह किताब छोटे-छोटे अट्ठाइस अध्यायों में
विभक्त है. इसका रचना विधान और संयोजन अलहदा है, जो पाठकों
को अगले एक के बाद एक अध्याय पढ़ने को प्रेरित करता है.
इस आत्मवृत्तात्मक किताब में एक संवेदनशील मन का प्रतिबिंब दिखता है. ऐसा नहीं
है कि लेखक को अपनी सामाजिक अवस्थिति का बोध नहीं है. जिसे उन्होंने स्वीकार भी
किया है. पर श्रम के महत्व और हाशिए के समाज के प्रति लेखक की
संवेदना और सहानुभूति मुखर होकर व्यक्त हुई है, दृष्टि
परिवर्तनकारी है. जाहिर है अपने कथ्य और बनावट में यह किताब दलित आत्मकथाओं से साफ
अलग है. इसकी तुलना ‘जूठन’ (ओमप्रकाश
वाल्मीकि) या ‘मुर्दहिया’ (तुलसी
राम) से नहीं की जा सकती.
हिंदी में कथा-साहित्य का इतना जोर रहता है कि कथेतर साहित्य की चर्चा कम ही
हो पाती है. कथेतर गद्य की भाषा बरतने के लिहाज से भी यह किताब पढ़ी जानी चाहिए. न
केवल साहित्य में बल्कि हिंदी आलोचना में भी आजकल अबूझ भाषा के प्रयोग का चलन बढ़ा
है. संप्रेषण से ज्यादा लेखकों-आलोचकों का जोर अपनी गुरुता सिद्ध करना रहता है.
अनायास नहीं कि आज ‘नई वाली हिंदी’ की खूब चर्चा है, जो लोक से दूर
है. यह किताब याद दिलाती है कि कैसे साफ-सुथरी और सहज भाषा से पाठकों तक अपने
विचारों को संप्रेषित किया जा सकता है. सवाल है कि क्या हिंदी में अंग्रेजी के
शब्दों को ठूंस देने से, वक्रोति भर देने से कोई भाषा ‘नई’ हो जाती है? भाषा बनाने का काम पूरा समाज करता है. जिसे हम ‘नई वाली हिंदी’ कहते हैं वह भूमंडलीकरण के दौर
में उभरे नव-मध्यम वर्ग की भाषा है. ओलियागाँव में ‘मडुगौड़े’, ‘धानरोपै’ और ‘अखोडझड़ैं’ जैसे बोलचाल
की भाषा के शब्द भी मौजूद हैं जिनमें लेखक के शब्दों
में ‘विराट जनकल्याण
की भावना और सामूहिकता की ध्वनि छिपी हुई है’ और इससे इंकार भी नहीं.
Sunday, July 25, 2021
भारतीय भाषाओं में मलयालम सिनेमा का बुलंद वर्तमान
शायद ही कोई इससे इंकार करे कि हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की हिंदी मीडिया में बहुत कम चर्चा होती हैं. सवाल है कि क्यों हम इन्हें क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के खाते में डाल कर छुट्टी पा लेते हैं, जबकि सिनेमा के विकास में विभिन्न भाषा-भाषी समाज की ऐतिहासिक भूमिका रही है.
सच तो यह है कि भारत में पचास भाषाओं में फिल्मों का निर्माण होता है. करीब पचासी प्रतिशत फिल्में बॉलीवुड के बाहर बनती हैं. तकनीक के विस्तार के साथ आए ओटीटी प्लेटफॉर्म के मार्फत क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को भी देश-विदेश के स्तर पर आज दर्शक देख व सराह रहे हैं. ऐसी फिल्में हिंदी क्षेत्र में पहले महज फिल्म समारोहों तक ही सीमित रहती थी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई मलयालम फिल्में हैं.
महामारी के दौरान मलयालम में रिलीज हुई ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, ‘जोजी’, ‘आरकारियम’, ‘मालिक’ आदि मलयालम फिल्मों की चर्चा देश-विदेश में हो रही है. लॉकडाउन के बीच मध्यवर्गीय दर्शकों ने इन फिल्मों को हाथों-हाथ लिया. ‘जोजी’ और ‘आरकारियम’ फिल्म में तो ‘लॉकडाउन’ और ‘मास्क’ के रूपक का कथ्य में खूबसूरती से निरूपण भी हुआ है. पिछले दिनों ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ के निर्देशक जियो बेबी ने एक बातचीत के दौरान मुझे बताया कि इस फिल्म को अमेजन और नेटफ्लिक्स ने पहले अस्वीकार कर दिया था. उन्होंने इसे ‘नीस्ट्रीम’ पर रिलीज किया था. जब फिल्म की चर्चा होने लगी, अच्छे रिव्यू आने लगे तब इसे अमेजन प्राइम ने रिलीज किया. इसी तरह ‘आरकारियम’ फिल्म पहले सिनेमा हॉल में रिलीज हुई थी, पर महामारी के दौरान ओटीटी पर फिल्म को व्यापक दर्शक वर्ग मिला. मलयालम सिनेमा की इस नई धारा की चर्चा प्रतिष्ठित विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में भी हो रही है.
सत्तर-अस्सी के दशक में समांतर सिनेमा की धारा को मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, के जी जार्ज, जी अरविंदन, शाजी करुण ने संवृद्ध किया था. उनकी फिल्मों ने मलयालम सिनेमा को देश-दुनिया में स्थापित किया, पर उसके बाद ऐसा लगा कि कथ्य और शैली में मलयालम सिनेमा पिछड़ गई. पिछले एक दशक में बनी मलयालम फिल्मों को देखकर हम कह सकते हैं कि मलयालम सिनेमा में यह एक नए युग की शुरुआत है जहाँ पापुलर और समांतर की रेखा मिट रही है. कम लागत से बनने वाली इन फिल्मों में इन विषय-वस्तु और सहज अभिनय पर जोर है. यही कारण है कि फाहाद फासिल जैसे अभिनेता (कुंबलंगी नाइट्स, जोजी, मालिक) की खूब प्रशंसा हो रही है. महेश नारायणन निर्देशत मालिक इस फिल्म में सुलेमान के ‘एंटी होरी’ के किरदार को जिस खूबसूरती से फासिल ने निभाया है लोग इसकी तुलना ‘गॉड फादर’ और ‘नायकन’ फिल्म से कर रहे हैं. मलयालम में बनने वाली अन्य फिल्मों की तरह यह फिल्म भी केरल के समाज में रची-बसी है. इस फिल्म में राजनीतिक स्वर भी मुखर रूप से व्यक्त हुआ है, जो बॉलीवुड में इन दिनों मुश्किल से सुनाई पड़ता है. उल्लेखनीय है कि इससे पहले महेश नारायणन की फाहाद फासिल और पार्वती थिरूवोथु अभिनीत ‘टेक ऑफ’ (2017) फिल्म ने भी खूब सुर्खियाँ बटोरी थी.
(प्रभात खबर, 25.07.2021)
Sunday, July 04, 2021
गोपालकृष्णन का सिनेमा संसार: अस्सी के अडूर
भारत में पचास भाषाओं में फिल्मों का निर्माण होता है. करीब पचासी प्रतिशत फिल्में बॉलीवुड के बाहर बनती हैं. हिंदी से इतर समकालीन फिल्मों, उनके निर्माता-निर्देशकों की मुख्यधारा के मीडिया में हालांकि बेहद कम उल्लेख होता है. सच तो यह है कि बॉलीवुड इतना हावी है कि अन्य भाषाओं में बनने वाली फिल्मों को हम क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के खाते में डाल कर छुट्टी पा लेते हैं, जबकि सिनेमा के विकास में बांग्ला और मराठी समाज की ऐतिहासिक भूमिका रही है. इंटरनेट और डिजिटल तकनीकी के विस्तार के बाद, हाल के दशक में, क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों को भी अखिल भारतीय स्तर पर दर्शक देख रहे हैं, सराह रहे हैं. ये फिल्में हिंदी क्षेत्र में पहले महज फिल्म समारोहों तक ही सीमित रहती थी.





