Saturday, September 04, 2021

समांतर सिनेमा और मणि कौल

वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म ‘उसकी रोटी’, बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ और मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ ने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को ‘अनपापुलर फिल्म’[i] कहते हैं. जाहिर है, भारतीय सिनेमा और खास कर बॉलीवुड की मनोरंजन प्रधान फिल्मों, जिसमें नाच-गाने पर जोर रहता है और सितारों (‘स्टारों’) की केंद्रीयता रहती है, उससे अलगाने के लिए समीक्षक इस तरह की संज्ञा देते हैं. इसे कला सिनेमा भी कहा गया. मणि कौल (1942-2011), फिल्म संस्थान, पुणे के उनके समकालीन कुमार शहानी और कैमरामैन के के महाजन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में मनोरंजन से अलग सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया. इसके लिए हिंदी साहित्य (नयी कहानियों) की ओर उन्होंने रुख किया.

मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा से ही बड़ी पूंजी की मांग करता है और वितरक प्रयोगशील सिनेमा पर हाथ डालने से कतराते रहते हैं. सन 1969 में ही ‘फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन’ ने प्रतिभावान और संभावनाशील फिल्मकारों की ‘ऑफ बीट’ फिल्मों को कर्ज देकर सहायता पहुँचाने का निर्देश जारी किया था. इसका लाभ मणि कौल जैसे निर्देशक उठाने में सफल रहे. इसी दौर में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं मसलन, मलयालम, बांगला, कन्नड़ आदि में भी कई बेहतरीन फिल्मकार उभरे जिनकी फिल्में दर्शकों के सामने एक अलग भाषा और सौंदर्यबोध लेकर आई. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन फिल्मों की आज भी चर्चा होती है.
समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए 70 और 80 का दशक मुफीद रहा. हालांकि इन फिल्मों की आलोचना एक बड़े दर्शक तक नहीं पहुँच पाने की वजह से होती रही है. उसी दौर में सत्यजीत रे (2012: 99) ने फिल्म को मास मीडिया मानते हुए एक अलहदा दर्शक वर्ग के लिए फिल्म बनाने के विचार की आलोचना की थी. उन्होंने 'भुवन सोम' के बारे में कटाक्ष करते हुए सात शब्दों में फिल्म का सार इस तरह लिखा था- ‘बिग बैड ब्यूरोक्रेट रिफार्मड बाय रस्टिक बेल’[ii]. वे कुमार शहानी की ‘माया दर्पण’ से भी बहुत प्रभावित नहीं थे. पर मृणाल सेन, मणि कौल, कुमार शहानी जैसे फिल्मकार, सत्यजीत रे से अलग रास्ता अपनाए हुए थे और अपनी फिल्मों में प्रयोग करने से कभी नहीं हिचके. वे चाहते थे कि उनकी फिल्में देखकर दर्शक सोचें, विचारें और उद्वेलित हों. पॉपुलर सिनेमा की तरह उनकी फिल्में हमारा मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि संवेदनाओं को संवृद्ध करती हैं. यहाँ नोट करना उचित होगा कि समांतर सिनेमा के बीज सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों में छुपे थे.
वर्ष 2006 में दिल्ली में हुए एक फिल्म महोत्सव के दौरान मैंने मणि कौल से उनकी फिल्मों, समांतर और मुख्यधारा की फिल्मों के बीच रिश्ते और ऋत्विक घटक के बारे में लंबी बातचीत की थी. मणि कौल ने कहा था कि उन्हें मोहन राकेश की इस कहानी में जो इंतजार और विछोह है, काफी प्रभावित किया था. ‘उसकी रोटी’ में बालो अपने पति सुच्चा सिंह के लिए रोज रोटी बना मीलों पैदल चल कर हाई वे की सड़क पर आती है, जहाँ सुच्चा सिंह बस चलाता है. हफ्ते में वह एक दिन घर आता है. इंतजार की इस चक्र की तरह बालो का जीवन बीतता है. हिंदी की नई कहानियों की तरह ही इस फिल्म में आदि, मध्य, अंत के क्रम का पालन नहीं किया है, फिल्म एक रैखिक नैरेटिव के तहत नहीं चलती है. इस फिल्म की पटकथा मोहन राकेश के साथ मिल कर लिखी थी, पर मणि कौल ने शूटिंग के दौरान उसका पालन नहीं किया. आशीष राजध्यक्षया (2012: 322-323) ने ठीक ही नोट किया है कि “यह अस्पष्ट है कि उसकी रोटी में ऐसा क्या था जिसने मणि कौल को इस तक जाने के लिए अनुशंसित (रिकॉमेंड) किया...जो भी कारण हो, तथ्य यह है कि पंजाब के एक दोपहर की इस कहानी को भारतीय सिनेमा की पूरी तरह से पहली अवांगार्द प्रयोग के असंभाव्य विषय के रूप में चुना गया.”[iii] मणि कौल ने मुझे कहा था कि ‘यह इंतजार हमें अनुभवजन्य समय से दूर ले जाता है, जहाँ एक मिनट भी एक घंटा हो सकता है.’[iv] बाद में जब वे संगीत की शिक्षा ले रहे थे (वे ध्रुपद के सिद्ध गायक थे), तब सम और विषम के अंतराल में इस बात को काफी अनुभव करते थे. ‘उसकी रोटी’ की तरह ही ‘ आषाढ़ का एक दिन’ और ‘दुविधा’ में भी स्त्रियों के द्वारा विभिन्न देश-काल में इस इंतजार का चित्रण मिलता है. इन तीनों फिल्मों की अवस्थिति साफ अलग है. पंजाब, कश्मीर (पहाड़) और राजस्थान का देश-काल इनमें उभर कर आया है. खास कर चर्चित रचनाकार विजयदान देथा की कहानी पर आधारित ‘दुविधा’ फिल्म में चटक रंगों का इस्तेमाल है. बालो, मल्लिका और लच्छी के इंतजार के साथ ही अंतर्मन की पीड़ा उभर कर आती है, जिसे हम लेख में आगे देखेंगे. इन फिल्मों में पार्श्व संगीत का मणि कौल ने बेहद सादगी से इस्तेमाल किया है. पर हिंदुस्तानी संगीत के प्रति उनका लगाव 'ध्रुपद' और 'सिद्धेश्वरी' डॉक्यूमेंट्री फिल्म में दिखता है. मणि कौल साहित्य, संगीत और चित्र कला के बीच सहजता से आवाजाही करते थे.
हिंदी के चर्चित रचनाकार उदय प्रकाश ने पिछले दिनों मुझसे एक बातचीत के दौरान मणि कौल की इसी सहजता को रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध पर बनी उनकी फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ का उदाहरण दिया था और कहा था कि ‘मणि ही मुक्तिबोध को दाल-भात खाता हुआ दिखा सकते थे.’[v] सत्यजीत रे (2012) ने मणि कौल और समांतर सिनेमा के एक और प्रतिनिधि फिल्मकार कुमार शहानी की फिल्मों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि इनकी फिल्मों में ऋत्विक घटक की तरह ही ‘ह्यूमर’ नहीं मिलता. ये दोनों फिल्म संस्थान (एफटीआईआई), पुणे में घटक के शिष्य थे. पर निजी मुलाकातों में मणि कौल बेहद मजाकिया थे. बातचीत में उन्होंने हँसते हुए कहा था- ‘मुझसे ज्यादा एक्सट्रीम में बहुत कम लोग गए. जितनी फिल्में बनाई, सारी फ्लॉप!’
मणि कौल की फिल्में हिंदी सिनेमा को एक कला के रूप में स्थापित करती है. मणि कौल हालांकि एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. वर्ष 2010 में जब मैं फिल्म एप्रिसिएशन का पाठ्यक्रम पूरा कर रहा था तब पुणे फिल्म संस्थान में एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि ‘सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए.’[vi] उस व्याख्यान के बाद हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म ‘सिद्धेश्वरी’ दिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि ‘अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा, यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है.’ लेकिन ‘सिद्देश्वरी’ देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.
सत्यजीत रे जब मणि कौल की फिल्मों की आलोचना यह कह कर करते हैं कि उनकी पहुँच बेहद सीमित तबके तक रही तो यह सच के करीब है. उनकी फिल्मों का सिनेमाघरों में प्रदर्शन नहीं हुआ. पर वे इस बात को खुद भी स्वीकार करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म की पहुँच को लेकर उन्होंने मुझे एक वाकया सुनाया था. हिंदी सिनेमा के चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, ‘जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह? रोटी के ऊपर फिल्म! और वह भी उसकी रोटी?तुम मेरे साथ आ जाओ हम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.” बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ.’ उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज’ हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं?
मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में हमेशा वित्तीय संकट से जूझना पड़ा था. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. जीवन के अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति ‘खिलेगा तो देखेंगे’ को सिनेमाई भाषा में रच रहे थे. समांतर सिनेमा के निर्देशक इस बात पर जोर देते रहे हैं कि व्यावसायिकता को लेकर मुख्याधारा और कला फिल्मों की तुलना नहीं की जा सकती. कुमार शहानी कहते हैं, “हम पूंजीवादी व्यवस्था में रहते हैं जिसमें कारोबार मुख्य होता है, हम इसे चाहें या ना चाहें. मेनस्ट्रीम फिल्में लाभ से संचालित होती हैं, बिना इसके उनका खर्च नहीं निकल सकता. उनका कला से कोई ताल्लुक नहीं होता. इस लिहाज से हमें मेनस्ट्रीम और कला सिनेमा की तुलना नहीं करनी चाहिए.”[vii]
वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन अक्सर बातचीत में यह बताते हैं कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना था “मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नव यथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.” अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.
‘उसकी रोटी’ फिल्म में जिस तरह के आख्यान शैली का इस्तेमाल किया गया है, उसे आशीष राजध्यक्षया (2012) ने लिखा है, मणि कौल के शब्दों में ‘यथार्थवाद में द्रष्टा का निवेश’ के तहत ही समझा जा सकता है. यहाँ दर्शक जो ग्रहण कर रहा है, उसकी व्यक्तिनिष्ठता पर जोर है. वे कहते थे कि ‘देखने के तरीके में बहुत कुछ छुपा होता है’. यहां मणि कौल यथार्थवाद की गति को अपने प्रयोगात्मक विजुल्स से पकड़ने की कोशिश करते हैं. जाहिर है फिल्म देखने के क्रम में दर्शकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो उठती है और उसे अपने अनुभवों का निवेश फिल्म देखने के क्रम में करना पड़ता है. फिल्म के कई दृश्यों के फिल्मांकन की शैली पेंटिंग (अमृता शेरगिल) से प्रभावित है. फिल्म की गति बेहद धीमी है और बॉलीवुड की फार्मूला फिल्मों के अभ्यस्त दर्शकों के लिए यह फिल्म बहुत धैर्य की मांग करती है! यहाँ हम मणि कौल की एक अन्य फिल्म ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर एक दृष्टि डालते हैं.
जहाँ हिंदी में आधुनिक नाटक के प्रणेता मोहन राकेश के चर्चित नाट्य कृति ‘आषाढ़ का एक दिन’ की चर्चा होती रहती है, मणि कौल निर्देशित इस फिल्म की चर्चा छूट जाती है. उन्होंने वर्ष 1971 में इस फिल्म को निर्देशित किया था. ‘उसकी रोटी’, ‘दुविधा’, ‘सिद्धेश्वरी’ की तरह ही सिनेमाई दृष्टि और भाषा के लिहाज से ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इस फिल्म में मल्लिका (रेखा सबनीस) कालिदास (अरुण खोपकर) और विलोम (ओम शिव पुरी) की प्रमुख भूमिका है. मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है. हिमालय की वादियों में बसे एक ग्राम प्रांतर में दोनों के बीच साहचर्य से विकसित प्रेम है. कालिदास को उज्जयिनी के राजकवि बनाए जाने की खबर मिलती है. मल्लिका और राजसत्ता को लेकर उनके मन में दुचित्तापन है. वहीं मल्लिका कालिदास को सफल होते देखना चाहती है और उन्हें स्नेह डोर से मुक्त करती है. उज्जयिनी और कश्मीर जाकर कालिदास सत्ता और प्रभुता के बीच रम जाते हैं. वे मल्लिका के पास लौट कर नहीं आते और राजकन्या से शादी कर लेते हैं. और जब वापस लौटते हैं तब तक समय अपना एक चक्र पूरा कर चुका होता है. सत्ता का मोह और रचनाकार का आत्म संघर्ष ऐतिहासिकता के आवरण में इस फिल्म के कथानक को समकालीन बनाता है.
दृश्य, प्रकाश, ध्वनि के संयोजन और परिवेश (मेघ, बारिश, बिजली) के माध्यम से सिनेमा में यह सब साकार हुआ है. कोलाहल के बीच एक रागात्मक शांति पूरी फिल्म पर छाई हुई है. मोहन राकेश के नाटक से इतर एक अलग अनुभव लेकर यह फिल्म हमारे सामने आती है. फिल्म में भावों की घनीभूत व्यंजना के लिए ‘क्लोज अप’ का इस्तेमाल किया गया है. मणि कौल के सहयोगी रह चुके, चर्चित फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप कहते हैं कि इस फिल्म में मणि कौल ने ‘विजुअल्स’ पर ज्यादा ध्यान रखा था. वे कहते हैं, “बजट कम था और उसी के हिसाब से ही फिल्म बनी है. सिंक साउंड में ज्यादा खर्च होता इसलिए नाटक के संवाद ट्रैक को पहले रिकॉर्ड कर लिया गया था. जैसे हम गाना प्ले बैक करते हैं उसी तरह फिल्म में साउंड प्ले बैक करती है. सबनीस भी पहले से सत्यदेब दुबे के प्ले में एक्टिंग करती थीं और बहुत अच्छी अदाकार थीं. मणि को बहुत कुछ रेडिमेड मिल गया था. उन्होंने आउटडोर सेट बनाया. इसमें प्रकृति और अंदर का सेट दोनों आ गया है.”[viii]
मणि कौल की फिल्में साहित्यिक कृतियों पर बनी, हालांकि सबका आस्वाद अलग है. उनकी फिल्मों में एक उत्तरोतर विकास दिखाई पड़ता है, पर पेंटिंग, स्थापत्य और संगीत का स्वर सबमें मुखर रहा है. असल में, उनकी फिल्मों में विभिन्न कला रूपों की आवाजाही सहजता से होती है. जहाँ वे भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगे थे और ध्रुपद संगीत के गुरु थे, वहीं वे अपनी कला में फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां और आंद्रेई तार्कोवस्की के प्रभाव को स्वीकार करते थे. ब्रेसां की फिल्मों की ‘मिनिमलिज्म’ यानी सादगी का प्रभाव उनकी फिल्मों पर है. ब्रेसां का प्रभाव कुमार शहानी की फिल्मों पर भी है, जिसे वे सहज रूप से स्वीकार भी करते हैं. बातचीत में वे अक्सर एक गधे को केंद्र पर रख कर बनाई गई उनकी फिल्म ‘बालथाजार’ की चर्चा करते हैं. प्रसंगवश, कुमार शहानी रॉबर्ट ब्रेसां के सहयोगी भी रह चुके हैं.
मणि कौल बातचीत में अक्सर ‘स्व भाव’ की बात करते थे. सारे प्रभावों के बावजूद जिस ‘स्पेस’ में वे अपनी कला रच थे वह नितांत वैयक्तिक है, जो फिल्म के हर शॉट और फ्रेम में महसूस किया जा सकता है. इस फिल्म में प्रेम पूरी गरिमा और लालित्य के साथ मौजूद है. मल्लिका की आँखें जिस तरह से अंतर्मन के भावों, अंतर्द्वंद को सामने लाती हैं बरबस वह कृष्ण के वियोग में गोपियों के कहे-‘अंखियां अति अनुरागी’ की याद दिलाती है. पर यहाँ आषाढ़ मास में जायसी के नागमती का विरह नहीं है. नागमती कहती हैं-‘मोहिं बिनु पिउ को आदर देई’. जबकि फिल्म के शुरुआत में ही मल्लिका कहती है- ‘मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है. वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है?’ इस फिल्म में मल्लिका के अपरूप रूप और सौंदर्य के साथ उसकी चेतना उभर कर सामने आई है. इस फिल्म में मणि कौल के ऊपर भारतीय सौंदर्यशास्त्र का प्रभाव स्पष्ट दिखता है. वे अपनी फिल्मों में ‘ध्वनि’ पर बहुत जोर देते थे. इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जहाँ परस्पर संवाद करते पात्रों में अजंता भित्तिचित्र और मिथिला चित्रकला शैली की झलक मिलती है. छायांकन में एक लय है. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल देश-विदेश की पेंटिंग शैली के रेफरेंस को सामने रख कर सचेत होकर फ्रेम बनाते थे. वे सिद्धेश्वरी फिल्म के एक दृश्य का खास तौर पर उदाहरण देते हैं, जहाँ वे पिकासो की पेंटिंग-थ्री म्यूजिशियन, से प्रेरित हैं. खुद मणि कौल हेनरी मातिस के प्रभाव को स्वीकार करते थे. पर मणि की फिल्मों में संगीत, चित्र और ध्वनि मिल कर एक ऐसा कला संसार रचता है जो सिनेमा कला की महत्ता को सिद्ध करता है.
उल्लेखनीय है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ के बाद, वर्ष 1972 में, कुमार शहानी ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ को निर्देशित किया था. दोनों ही फिल्मों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था. दोनों निर्देशकों के फिल्म निर्माण की शैली मिलती जुलती भले हो (संगीत, पेंटिंग के इस्तेमाल को लेकर), विषय-वस्तु का ट्रीटमेंट काफी अलहदा है. मसलन, शहानी की तरण (माया दर्पण) फिल्म में सामंतवादी उत्पीड़न को तोड़ती है. जबकि निर्मल वर्मा की कहानी में सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता है. शहानी का रुझान मार्क्सवादी विचारों की ओर रहा, जबकि मणि कौल अपनी कला में विचारधारा की सीमा का अतिक्रमण करते रहे. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल राजनीतिक नहीं, रसिक थे.
बहरहाल, न सिर्फ मणि कौल की फिल्में, बल्कि 70 और 80 के दशक में समांतर सिनेमा के दौर में बनी अधिकांश फिल्मों का प्रदर्शन मुश्किल था. मलायमल फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन अपवाद कहें जाएँगे जिनकी फिल्में सिनेमाघरों में पहुँची. पर अधिकांश कला फिल्मकारों के दर्शकों का एक सीमित वर्ग था. ज्यादातर फिल्म समारोहों, समीक्षकों तक ही इन फिल्मों की पहुँच रही. कोई आश्चर्य नहीं कि 90 के दशक में होश संभालने वाली हमारी पीढ़ी की पहुँच से ये फिल्में बाहर थीं. जैसा कि हमने ऊपर नोट किया मणि कौल से उनकी फिल्मों के बारे में पूछने पर वह बेतकल्लुफी से बात करते थे. उनकी फिल्में भी अमूमन सिनेमा समारोहों तक ही सीमित थीं. उदयन वाजपेयी से बातचीत करते हुए (2012:45) उन्होंने 'अभेद आकाश' किताब में स्वीकारा था, “शायद हमें फिल्म देखने की नयी पद्धति विकसित करनी होगी. फिल्मकार तो हैं लेकिन देखने वाले नहीं हैं. अगर देखने वाले हों तो फिल्मो में बहुत बदलाव आएगा. बिना देखने वालों के फिल्मकार नहीं होता.”[ix]
सिनेमा को एक कला माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने में समांतर सिनेमा के प्रयोगशील फिल्मकारों की भूमिका ऐतिहासिक है. पिछले दशकों में संचार की नई तकनीकी, इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने के बाद मणि कौल जैसे प्रयोगशील फिल्मकारों को एक नया दर्शक वर्ग मिला है. आज कई समकालीन फिल्म निर्देशकों मसलन अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, अनूप सिंह आदि की फिल्मों में समांतर सिनेमा के पुरोधाओं की छाप स्पष्ट दिखाई देती है. युवा प्रयोगशील फिल्मकारों में एक तरह से समांतर सिनेमा की धारा का विकास देखने को मिल रहा है. मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में भी बदलाव की इस बयार को महसूस किया जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि एफटीआईआई से निकले कई युवा फिल्मकार मणि कौल को अपना गुरु मानते हैं. वे मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं. यही उनकी फिल्मों की सार्थकता है.
संदर्भ:
[i] चिदानंद दास गुप्ता (2008), सीइंग इज विलिविंग, पेंग्विन रेंडम हाउस: इंडिया
[ii] सत्यजीत रे (2012), आवर फिल्मस देयर फिल्मस, ओरियंट ब्लैक स्वान: नय़ी दिल्ली पेज, 81-99
[iii] आशीष राजाध्यक्षया (2012), इंडियन सिनेमा इन द टाइम ऑफ सेल्यूलाइड, तुलिका बुक्स: नयी दिल्ली
[iv] अरविंद दास, समांतर सिनेमा के पचास साल, प्रभात खबर, 9 जुलाई 2019
[v] निजी बातचीत
[vi] अरविंद दास (2019), बेखुदी में खोया शहर, अनुज्ञा बुक्स: नयी दिल्ली
[vii] अरविंद दास से कुमार शहानी की बातचीत, फिल्मों में तकनीकी दखल ज्यादा हो गया है, नवभारत टाइम्स, 29 जून 2019
[viii] निजी बातचीत
[ix] उदयन वाजपेयी (2012), अभेद आकाश, वाणी प्रकाशन: नयी दिल्ली

(संवाद पथ पत्रिका में प्रकाशित, जनवरी-मार्च 2020)

Thursday, September 02, 2021

सिनेमा संस्कृति की बदलती तस्वीर


मुंबई भले ही मायानगरी हो, सिनेमा की संस्कृति दिल्ली में फली-फूली. आम दर्शकों के अलावे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कई नेता सिनेमाप्रेमी हुए हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक. पिछले दिनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमाहॉल के आधुनिक साज-सज्जा और तकनीक से लैस, नवीन रूप का उद्घाटन किया तो उन्होंने शिद्दत से सिनेमा के प्रति अपने प्रेम को याद किया. प्रिया में ही ‘बैल बॉटम’ फिल्म के ट्रेलर के लांच के अवसर पर अभिनेता अक्षय कुमार ने उन दिनों को याद किया जब ‘ब्लैक’ में टिकट लेकर उन्होंने दिल्ली के अम्बा सिनेमाहॉल में ‘अमर अकबर एंथोनी’ देखी थी. किसी भी शहर की संस्कृति को सिनेमा के रास्ते भी हम देख-परख सकते हैं.  दिल्ली में कई पुराने सिनेमाघर आज बंद हो गए हैं, पर उन सिनेमाघरों की स्मृति लोगों के जेहन में है. मिनरवा, फिल्मिस्तान, कमल, पारस, सावित्री कुछ ऐसे ही नाम हैं. किसी भी शहर के लिए सिनेमाघर लैंडमार्क की हैसियत रखते हैं. सिनेमाघरों की रोशनी से शहर के कोने प्रकाशित होते रहे हैं.

यूँ तो किसी भी सिनेमा हॉल के नवीनीकरण की घटना सामान्य ही कही जाएगी, लेकिन दिल्ली की सिनेमा संस्कृति में प्रिया सिनेमाहॉल खास महत्व रखता है. कोरोना महामारी से पहले ही इसे नए रूप में लाने की तैयारी शुरु हुई थी. महामारी के दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेनसिंग की वजह से करीब दो साल के बाद इसे आम दर्शकों के लिए फिर से खोला गया है.

प्रसंगवश, महामारी के दूसरी लहर के बाद ‘बैल बॉटम’ बॉलीवुड की पहली बड़े बजट की फिल्म है जिसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया है. हालांकि सिनेमाघरों में अभी भी पचास प्रतिशत सीट ही दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं. ऐसे में डिस्टेनसिंग का पालन करते हुए परिवार या दोस्तों के साथ सिनेमा देखने का लुत्फ नहीं उठाया जा सकता है. जाहिर है, कोरोना महामारी के दौरान ओटीटी प्लेटफार्म ने मध्यवर्गीय दर्शकों के सिनेमा देखने की संस्कृति को काफी बदल दिया है. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान जोर देकर कहा कि “अभी लोग लैपटॉप, टीवी, मोबाइल पर सिनेमा देख रहे हैं, पर सिनेमा को वापस हॉल में आना ही होगा. यह एक सामूहिक अनुभव है. छोटे परदे पर आप दृश्य, ध्वनि की बारीकियों से वंचित हो जाते हैं. घर में बहुत तरह के व्यवधान भी मौजूद रहते हैं.” महीनों बाद जब हम सिनेमाहॉल (पीवीआर प्रिया XL) में पहुँचे तो इसे बखूबी महसूस किया. हालांकि यह नोट करना उचित होगा कि अक्षय कुमार अभिनीत ‘बैल बॉटम’ हाल ही में ओटीटी पर रिलीज हुई मलयालम फिल्मों के टक्कर की नहीं कही जा सकती. कोरोना महामारी के दौरान इस फिल्म की शूटिंग हुई थी जिसका दबाव इस फिल्म के निर्माण-निर्देशन में है.

बहरहाल, उदारीकरण-भूमंडलीकरण के कारण पिछले सदी के नब्बे के दशक में समाज में आए बदलावों के साथ ही महानगरों में सिनेमा देखेने की संस्कृति भी प्रभावित हुई. सिंग्ल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले लिया और सिंग्ल स्क्रीन थिएटर धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए. आज देश में करीब तीन हजार स्क्रीन मल्टीप्लेक्स में उपलब्ध हैं. प्रिया सिनेमा के मालिक अजय बिजली ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोडशो के साथ साझेदारी में प्रिया विलेज रोडशो लिमिटेड (1995), जिसे पीवीआर से नाम से हम जानते हैं, शुरु किया.  इस साझेदारी को वे प्रिया के साथ ही आरंभ करना चाह रहे थे, इसलिए इसे पीवीआर नाम दिया गया, पर दक्षिण दिल्ली में स्थित अनुपम सिनेमाघर को मल्टीप्लेक्स में बदल कर वर्ष 1997 में इसकी विधिवत शुरुआत हुई, प्रिया भी वर्ष 2000 में पीवीआर प्रिया में तब्दील हुआ. इसे आज भी सिंग्ल स्क्रीन ही रखा गया है.

जेएनयू के बेहद करीब होने की वजह से  कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के मिलने-जुलने, डेटिंग का प्रिया सिनेमा एक प्रमुख अड्डा था. बदलती दिल्ली की एक छवि यहाँ आने पर मिल जाती थी. 70 के दशक में शुरु हुए इस सिनेमा हॉल के बारे में सिनेमा समीक्षक जिया उस सलाम ने ‘दिल्ली: फोर शोज’ में लिखा है, “वर्षों तक प्रिया धनी-मनी सिनेमा प्रेमियों, महिलाओं और पुरुषों के लिए ऐसी जगह रहा जिनके लिए सिनेमा का मतलब हॉलीवुड की ताजातरीन फिल्में थी. कभी-कभी यहां मध्यमार्गी हिंदी फिल्में भी दिखाई जाती थी, पर व्यावसायिक मसाला फिल्मों से निश्चित दूरी रही.” हालांकि बाद के दशक में ही बॉलीवुड की फिल्मों पर यहाँ जोर बढ़ा. इसी बीच समाज में नव मध्यमवर्ग का उभार भी हुआ, जिसे हम बॉलीवुड की फिल्मों की विषय-वस्तु में भी देखते हैं. प्रसंगवश, पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की आवक से नए तरह की सिनेमा के बनने और प्रसारण का रास्ता भी निकला है. कम बजट की ऑफ बीट फिल्में, जो बॉलीवुड के स्टारों की लकदक से दूर हैं, आसानी से यहाँ दिखाई जाने लगी है.

यह तय है कि आने वाले समय में बॉलीवुड को ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मों, वेबसीरिजों से चुनौती का सामना करना पड़ेगा. सवाल है कि सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींच लाने के लिए क्या बॉलीवुड तैयार है? सवाल यह भी है कि सिनेमाघरों तक जाने के लिए युवा दर्शक तैयार हैं या सिनेमाहॉल आने वाले समय में नॉस्टेलजिया का हिस्सा बन कर रह जाएगी?

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Thursday, August 26, 2021

जे नाची से बाची: रामदयाल मुंडा का मंत्र


पिछले दिनों विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया
, पर आदिवासी बुद्धिजीवियों की चर्चा कहीं नहीं दिखी. मुख्यधारा के विमर्श में वे अक्सर छूट जाते हैं. आज झारखंड के आदिवासी बुद्धिजीवी रामदयाल मुंडा का 82वां जन्मदिन है. डॉक्टर रामदयाल मुंडा (1939-2011) बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. वे झारखंड आंदोलन के अगुआ थे. उनकी पहुँच देश-विदेश के साहित्यिक- सांस्कृतिक-राजनीतिक मंचों तक सहज रूप में थी. रामदयाल मुंडा की प्रतिष्ठा गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर-पूर्वी आदिवासी समाजों में जैसी रही, वैसी बहुत कम आदिवासी बुद्धिजीवियों की रही है. आदिवासी समाज, साहित्य, कला और संस्कृति के संदर्भ में उनके योगदान का सम्यक मूल्यांकन अभी बाकी है.

वे अक्सर कहते थे- जे नाची से बाची. आदिवासी संस्कृति उनकी चिंता के केंद्र में था. ढोल-मांदर, नगाड़े के साथ, बांसुरी बजाते हुए उनकी छवि लोगों के जेहन में अभी भी है. उन्हें पद्मश्री के साथ ही संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. ‘नाची से बाची’ (2017) नाम से ही झारखंड के डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार मेघनाथ और बीजू टोप्पो ने एक वृत्तचित्र बनाई है जो उनकी जीवन यात्रा और रचनाशीलता को आत्मीयता के साथ हमारे सामने लेकर आती है. झारखंड के त्योहार सरहुल को लोकप्रिय बनाने में उनका खास योगदान रहा है. इस वृत्तचित्र की शुरुआत मुंडा की आवाज में सरहुल के मंत्र से ही होती है. इस फिल्म में राँची के पास दिउड़ी जैसे छोटे से गाँव से अमेरिका तक की उनकी यात्रा को दर्शाया गया है, जहाँ वे पीएचडी के लिए गए और मिनिसोटा विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे थे. अमेरिका से वापस आकर वे राँची विश्वविद्यालय में आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के निदेशक के रूप में नियुक्त हुए और बाद में इस विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने. विषय-वस्तु के साथ ही फिल्म निर्माण के दृष्टिकोण से भी यह वृत्तचित्र खास है. मुंडा की इस यात्रा में दर्शक भी सहज रूप से साथ हो लेता है.

लगभग तीस साल तक मुंडा के नजदीक रहे मेघनाथ बातचीत में कहते हैं कि एक संस्कृतिकर्मी के रूप में मुंडा औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त थे. वे कहते हैं, “ रामदयाल मुंडा ने आदिवासी नृत्य को मेहमाननवाजी के रूप में किए जाने को हतोत्साहित किया. उन्होंने इसे वैल्यू से जोड़ कर देखा.”  मेघनाथ अखरा (ओपन ऑडिटोरियम) का उदाहरण देते हैं. वे कहते हैं कि आदिवासी अखरा में श्रोता और गाने वाला, देखने और नाचने वाला होता है. इसमें ‘परफार्मर’ और ‘ऑब्जर्वर’ का सामंती दृष्टिकोण है. देखने वाला यह सोचता है कि कोई मेरे लिए नाच रहा/रही है. उनके सानिध्य में रह कर मैं यह समझा की अखरा में परफार्मर और ऑब्जर्वर की भूमिका अलग-अलग नहीं है. मेघनाथ स्वीकारते हैं कि इस फिल्म में मुंडा के राजनीतिक जीवन का चित्रण नहीं हो पाया है.

हिंदी में रामदयाल मुंडा के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन नहीं दिखता है. डॉक्टर वीर भारत तलवार की किताब ‘झारखंड में मेरे समकालीन’ (2019) अपवाद है, जिसमें एक लंबा संस्मरणात्मक और विश्लेषणात्मक लेख मुंडा के ऊपर है. इस लेख के शुरुआत में ही तलवार लिखते हैं: “भारत के आदिवासी बुद्धिजीवों पर जब भी विचार किया जाएगा, रामदयाल मुंडा का नाम उनके श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों में गिना जाएगा. रामदयाल को सिर्फ आदिवासी बुद्धिजीवी के रूप में नहीं देखना चाहिए. उन्हें भारतीय बुद्धिजीवी के रूप में भी देखा जाना चाहिए. लेकिन झारखंड बुद्धिजीवियों के तो वे सिरमौर ही थे.” असल में तलवार झारखंड आंदोलन में उनके संघर्ष में साथी थे और उनके साथ लंबा संग-साथ रहा था. मुंडा जब अमेरिका में थे तब 70 के दशक में उनके साहित्य को तलवार ने ही प्रकाशित किया था.

आदिवासी भाषा और लिपि के विमर्श के बरास्ते इस लेख में मुंडा का ईमानदार एवँ लोकतांत्रिक चरित्र उभर कर सामने आता है. पर ऐसा नहीं है कि तलवार मुंडा के व्यक्तित्व से मुग्ध या आक्रांत हैं. जहाँ वैचारिक रूप से विचलन दिखता है उसे वे नोट करना नहीं भूलते. पिछले साल हेमंत सोरेन की सरकार ने झारखंड विधानसभा में 'सरना आदिवासी धर्म कोड बिल' को पास किया. इसमें आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड का प्रस्ताव है. यह बिल फिलहाल मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास है. यहाँ पर इस बात का उल्लेख जरूरी है कि रामदयाल मुंडा ने आदिवासियों के धर्म के सवाल को अपनी किताबों में गंभीरता से विश्लेषित किया है. वे आदिवासियों को हिंदू नहीं मानते थे. सत्ता के द्वारा आदिवासियों के ऊपर हिंदू धर्म थोपने के खिलाफ थे.

आदिवासियों की अस्मिता के सवाल को उठाते हुए हालांकि तलवार नोट करते हैं- ‘यह अजीब बात है कि मुंडाओं के पूर्वजों को हिंदू ऋषियों-मुनियों से जोड़ने के लिए एक ओर वे सागू मुंडा की आलोचना कर रहे थे, दूसरी ओर खुद अपने लेख में यही काम कर रहे थे.’ मुंडा अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त बुद्धिजीवी और संस्कृतकर्मी थे, जिनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी. पर जैसा कि तलवार ने लिखा है उनका विकास एक जननेता के रूप में कभी नहीं हुआ. मुंडा आखिरी दिनों में कांग्रेस के सहयोग से राज्यसभा के सदस्य बने थे. तलवार क्षोभ के साथ लिखते हैं- ‘राजनीतिक सत्ता हासिल करने के मोह में रामदयाल ने अपने जीवन की जितनी शक्ति और समय को खर्च किया, अगर वही शक्ति और समय उन्होंने अपने साहित्य लेखन और सांस्कृतिक क्षेत्र के कामों में लगाया होता-जिसमें वे बेजोड़ थे और सबसे ज्यादा योग्य थे-तो आज उनकी उपलब्धियाँ कुछ और ही होती.’ एक बुद्धिजीवी हमेशा प्रतिरोध की भूमिका में रहता है और उसकी पक्षधरता हाशिए पर रहने वाले उत्पीड़ित-शोषित जनता के प्रति रहती है. राजनीतिक सत्ता एक बुद्धिजीवी को बोझ ही समझती है और इस्तेमाल करने से नहीं चूकती. 

तलवार राम दयाल मुंडा की भाषाई संवेदना और समझ को उनके समकालीन अफ्रीकी साहित्य के चर्चित नाम न्गुगी वा थ्योंगो के बरक्स रख कर परखते हैं और पाते हैं कि जहाँ न्गुगी अंग्रेजी को छोड़ कर अपनी आदिवासी भाषा की ओर मुड़ गए थे, वहीं मुंडा मुंडारी भाषा में लिखना शुरु किया, ‘धीरे धीरे अपनी भाषा छोड़कर हिंदी की ओर मुड़ते गए.’  यह बात वृहद परिप्रेक्ष्य में अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों पर भी लागू होती है जो प्रसिद्धि और पहुँच के लिए अंग्रेजी पर अपनी नजरें टिकाए रहते हैं.

आज रामदयाल मुंडा के नाम पर झारखंड में कई आयोजन रहे हैं जिसमें उनकी प्रतिमा का अनावरण भी शामिल है. इन प्रतीकात्मक आयोजनों से अलग जरूरत इस बात की है कि मुंडा ने लेखन और सांस्कृतिक कर्म के द्वारा जो अलख जगाया उसे दूर तक पहुँचाया जाए, उनके कार्य की सम्यक आलोचना हो. एक बुद्धिजीवी को याद करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता.


(न्यूज 18 हिंदी के लिए, 23 अगस्त 2021)

Monday, August 16, 2021

सांस्कृतिक विविधता की विरासत

 


देश के विभिन्न इलाकों में कला और सांस्कृतिक रूपों की आवाजाही होती रही है. कला विदुषी कपिला वात्स्यायन ने ठीक ही नोट किया है कि ‘भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की यह विशेषता है कि इतिहास के किसी विशेष युग में देश के किसी भाग में जन्मे आंदोलन, कलारूप और शैली को देश के किसी सर्वथा दूरस्थ प्रदेश में फलने फूलने का अवसर मिलता है.’ आजादी के बाद सांस्कृतिक विविधता के बीच एकता और देश के विकास के लिए कला और संस्कृति की महत्ती भूमिका को आधुनिक भारत के निर्माताओं ने स्वीकारा था. पं. नेहरू ने भले ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ पर जोर दिया, पर वे कला और सांस्कृतिक संस्थानों के निर्माण को लेकर भी उतने ही तत्पर थे.

इसी का परिणाम था कि आजादी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर संगीत नाटक अकादमी (1953), साहित्य अकादमी (1954), ललित कला अकादमी (1954), राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय (1964) जैसे संस्थानों की स्थापना हुई. प्रदर्शनकारी, दृश्य, पारंपरिक और आधुनिक कला रूपों, साहित्य, सिनेमा के पोषण और संरक्षण में इन संस्थानों का ऐतिहासिक योगदान है. जहाँ संगीत नाटक अकादमी के हिस्से संगीत, नृत्य और नाटक कला को बढ़ावा देने और विविध संस्कृतियों की विरासत को सहेजन की जिम्मेदारी रही, वहीं ललित कला अकादमी के जिम्मे मूर्तिकला, चित्रकला आदि रहे. आधुनिक और समकालीन के साथ साथ लोक, जनजातीय कला और कलाकारों का संरक्षण भी इसमें शामिल है. साहित्य अकादमी विभिन्न भाषाओँ में लिखे गए साहित्य का प्रचार-प्रसार और अनुवाद का काम करता रहा है. देश में साहित्यिक गतिविधियों की देख-रेख में भी इसकी भूमिका रेखांकित करने योग्य है. ये संस्थान देश के प्रमुख कला-सांस्कृतिक संस्थानों के साथ ही साथ विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार और अकादमियों के साथ समन्वय और मेल-जोल भी करती रही है.

देश की आजादी के समय विभाजन की त्रासदी ने साहित्य, कला और संस्कृति जगत से जुड़े कलाकारों को गहरे प्रभावित किया था, लेकिन राष्ट्र निर्माण की भावना उनके अंदर हिलोरें मार रही थी. यही कारण है कि पचास-साठ के दशक में एक साथ अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य, संगीत, सिनेमा, चित्रकला, प्रदर्शनकारी कलाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का विस्फोट दिखाई देता है. इन प्रतिभाओं ने विभिन्न संस्थानों को सहेजा-सवाँरा.

बाद के दशकों में अन्य संस्थानों में आए गिरावट के साथ ही इन संस्थानों में भी भाई-भतीजावाद, अंदरुनी राजनीति और खींचतान के स्वर सुनाई पड़ने लगे. स्वायत्तता होने के बावजूद परोक्ष रूप से सत्ताधारी राजनीतिक दलों का दखल पुरस्कारों, छात्रवृत्तियों से लेकर प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियों में देखने को मिला. कई संस्थानों में ऐसे लोग शीर्ष पर पहुँचे जिन्हें कला-संस्कृति से कोई सरोकार नहीं रहा. ऐसे में हर क्षेत्र में प्रतिभाशाली कलाकारों की पहचान मुश्किल हो गई और उनमें कुंठा जन्म लेने लगी. हाल के वर्षों में ऐसा कम ही देखने को मिला है जब साहित्य अकादमी पुरस्कारों की घोषणा के समय वाद-विवाद न हो. फिर भी जहाँ राष्ट्रीय स्तर के इन संस्थानों में कम से कम पारदर्शिता और जवाबदेही की गुंजाइश दिखती है, वहीं हिंदी क्षेत्र में राज्य स्तरों पर कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए जो संस्थान अस्तित्व में आए उनमें ज्यातादर पतनशील हैं, उनमें किसी तरह के नवाचार की गुंजाइश नहीं दिखती.

उदाहरण के लिए यह नोट करना उचित होगा कि मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग के क्षेत्र में विभिन्न कलाकारों का सम्मान हुआ है और देश-विदेश में इस कला की प्रतिष्ठा हुई है, लेकिन पेंटिंग के गढ़ दरभंगा-मधुबनी में एक भी कला-दीर्घा नहीं है जहां पेंटिंग का प्रदर्शन हो सके. यही बात अन्य लोक कलाओं और कलाकारों के बारे में भी सच है. लोक कलाकारों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है. भोपाल में स्थित जनजातीय संग्रहालय अपवाद ही कहे जाएँगे. इसी तरह भारत भवन, भोपाल (1982) ने भी कला के विभिन्न रूपों के संरक्षण और संवर्धन में योगदान दिया है. प्रसंगवश, अस्सी के दशक में मशहूर कलाकार जगदीश स्वामीनाथन जब भारत भवन के निदेशक थे, तब भूरीबाई की प्रतिभा को पहचाना था और उन्हें चित्र बनाने को प्रेरित किया. इस वर्ष भीली चित्रकला के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

इसी तरह सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सिनेमा को संरक्षित करने के उद्देश्य से पुणे में फिल्म संस्थान की स्थापना के कुछ ही वर्ष बाद 1964 में संस्थान में ही राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना की गई. अपने आप में देश में यह एक मात्र ऐसा संस्थान है जो फिल्मों के संग्रहण, प्रसार और संरक्षण में जुटा है. भारत में हर साल करीब पंद्रह सौ से ज्यादा फीचर फिल्में बनती है, इस लिहाज से यहां पर जो संग्रहण हो रहे हैं वह बेहद कम है. देश को एक सूत्र में जोड़ने में बॉलीवुड प्रभावी है, पर भारत में पचास भाषाओं में फिल्मों का निर्माण होता है. करीब पचासी प्रतिशत फिल्में बॉलीवुड के बाहर बनती हैं. राज्य स्तरों पर भी फिल्म संग्रहालय की व्यवस्था होनी चाहिए जहाँ विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्में संग्रहीत की जा सके.

विभिन्न राष्ट्रीय अकादमियों से जुड़े कलाकारों, अधिकारियों से बात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में ये संस्थान संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, ऐसे में किसी भी तरह की योजनाओं और नई गतिविधियों के लिए बजट का हर वक्त टोटा लगा रहता है. वर्तमान वित्तीय वर्ष (2021-22) के बजट में संस्कृति मंत्रालय के लिए 2687.99 करोड़ रुपए का प्रावधान है जो भारत सरकार के कुल बजट का करीब 0.08 प्रतिशत है जबकि वर्ष 2020-21 में यह 3149.96 करोड़ रुपए था जो कि कुल बजट का लगभग 0.1 प्रतिशत था. इस तरह इस साल बजट में पिछले साल के अनुमानित बजट से करीब 15 प्रतिशत की कटौती की गई.

पिछले दशकों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ‘सॉफ्ट पावर’ पर जोर बढ़ा है. जरूरत है भारतीय कला और संस्कृति की विविधता का अतंरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार हो. लोकतांत्रिक भारत की पहचान को कला-संस्कृति के रूपों की बहुलता और विविधता पुख्ता करते हैं. साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर आम नागरिकों, स्कूल-कॉलेज के छात्रों का जुड़ाव इन अकादमियों से बढ़े. डिजिटल तकनीक इसमें सहायक हो सकती है. बदलते वैश्विक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए कला और सांस्कृतिक अकादमियों को आजादी के पचहत्तरवें वर्ष में नए सिरे से अपनी भूमिका को परिभाषित करने की जरूरत है. इन संस्थानों की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा है

(15 अगस्त 2021, प्रभात खबर)

Thursday, August 05, 2021

लोकतंत्र में विरोध की प्रवृत्ति उसकी आत्मा है: मैनेजर पांडेय


प्रोफेसर मैनेजर पांडेय हिंदी के वरिष्ठ आलोचक हैं. सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना दोनों क्षेत्र में इन्होंने लेखन किया है. आलोचना की विचारधारा, सामाजिकता और साहित्य के समाजशास्त्र पर इनका विशेष जोर रहा है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रतिष्ठित भारतीय भाषा केंद्र से ये लंबे समय तक जुड़े रहे. प्रोफेसर पांडेय जीवन के अस्सीवें साल में हैं और आलोचना कर्म में अभी भी सक्रिय हैं. दिल्ली स्थित आवास पर उनसे अरविंद दास ने बातचीत की, एक अंश प्रस्तुत है:

देश 75 वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है. पिछले कुछ वर्षों में लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी राजनीतिक दल का वर्चस्व बढ़ा है, विपक्ष की भूमिका कम हुई है. ऐसे में समाज में साहित्यकार की क्या भूमिका आप देख रहे हैं?
किसी भी लोकतंत्र में विरोध की प्रवृत्ति उसकी आत्मा है. विरोध स्वीकार्य नहीं भी हो तो भी सत्ता को उसका सम्मान करना चाहिए. साहित्यकार वर्तमान और भविष्य की चिंता के बारे में बताता है. जब विरोध की राजनीति परिदृश्य से गायब हो रही हो तब साहित्यकारों की भूमिका बनती है. वे जनता की समस्याओं के बारे में सहीं ढंग से सोचे, लिखें और बोलें ताकि लोग सजग हों. असल में दिक्कत यह है कि सत्ताधारी वर्ग साहित्य पढ़ते ही नहीं. वे नहीं जानते कि साहित्य क्या कह रहा है, क्या कहना चाह रहा है. समस्या यह है कि अबकी सरकार विरोध को बर्दाश्त नहीं करती है. अनेक पत्रकार सत्ता विरोधी लेखन की वजह से पकडें गए उन पर ब्रिटिश कालीन राजद्रोह (सिडिशन) का कानून लगा है.
आप आलोचना में सामाजिकता पर जोर देते रहे हैं. कोरोना महामारी के समय में समाज के विभिन्न वर्गों के बीच एक दूरी दिखाई दी है...
साहित्य के माध्यम से ही आलोचकों की भूमिका तय होती है. यदि कविता सत्ता विरोधी है तो आलोचक का काम है कि उसका विवेचन कर लोगों के सामने ले आए. साथ ही भाषा का खेल को खोलना आलोचना का दायित्व है. कोरोना काल में बिहार, उत्तर प्रदेश के बहुत सारे मजदूरों का विभिन्न शहरों- दिल्ली, बैंगलौर, हैदराबाद, से पलायन हुआ है. दर्दनाक स्थितियों में यातना सहते हुए वे भागे. बैचेन करने वाले ये दृश्य हमने टीवी पर देखे. इन्हें प्रवासी मजदूर कहा गया. बिहार का मजदूर जो दिल्ली आया वह प्रवासी कैसे हो गया? दूसरे देश में जाने वाले, गिरमिटिया, को प्रवासी मजदूर कहा जाता था. अगर एक प्रांत से दूसरे प्रांत में जाना ही प्रवासी होना है तो फिर सारा केंद्र सरकार प्रवासियों की सरकार हो जाएगी. ऐसे ही ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ जैसे नारे कोराना से बचाव के लिए बने हैं. सोशल डिस्टेंसिंग इस देश में पाँच हजार वर्षों से है. दलितों को दूर रखने का काम सवर्ण करते रहे हैं. आप इसे फिजिकल डिस्टेंसिंग (शारीरिक दूरी) कहिए. एक आलोचक इन्हीं सब चीजों पर विचार कर सकता है, लोगों का ध्यान आकृष्ट कर सकता है. पिछले दिनों मैंने वेबिनारों में इन पर बातचीत की है.
किसान आंदोलन, एनआरसी, सीएए के खिलाफ आंदोलनों में साहित्यकारों का जुड़ाव किस रूप में आप देख रहे हैं?
कुछ लोग इन आंदोलनों से जुड़े. दिल्ली के अगल-बगल में वे धरना-प्रदर्शन में भी गए. लेकिन जेपी मूवमेंट के दौरान जिस तरह साहित्यकार जुडें, जैसे रेणु या नागार्जुन, उस तरह से बड़े लेखक इन आंदोलनों से नहीं जुड़े है. कारण चाहे जो भी हो. यह भी भय हो कि सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करे. जितने बड़े पैमाने पर साहित्यकारों को इनमें शामिल होना चाहिए था, वे नहीं हुए.
सूरदास पर आपने पीएचडी की थी, अनेक समकालीन रचनाकारों पर भी लिखा है. आपके प्रिय रचनाकार कौन रहे हैं?
मैंने अपने समय के ही रचनाकारों का नाम लूँगा. सूर-तुलसी-कबीर सबके प्रिय हैं. एक हैं बाबा नागार्जुन. उनसे मेरा व्यक्तिगत संबंध था. वे जब दिल्ली आते थे तब मेरे घर पर रुकते थे. बाबा नागार्जुन मुख्यत: किसान-मजदूरों के कवि थे. वे जन आंदोलनों के कवि थे. दलित, आदिवासी पर उन्होंने कविता लिखी है. इन सब कारणों से वे मुझे पसंद हैं. वे जटिलता को कला नहीं मानते थे. एक उनकी कविता है-जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं, जनकवि हूँ मैं साफ कहूंगा क्यों हकलाऊं. बहुत लोग हकलाहट को ही कविता समझते हैं, नागार्जुन उनमें से नहीं हैं. दूसरे मेरे प्रिय कवि हैं आलोकधन्वा जिन्होंने लिखना बंद कर दिया है. तीसरे मेरे प्रिय कवि हैं, जिन पर मैंने लिखा भी है, कुमार विकल. पंकज चतुर्वेदी, बोधिसत्व की कविता भी मुझे पसंद हैं.
आपको नामवर सिंह ‘आलोचकों का आलोचक’ कहते थे...
नामवर सिंह मुझे किनारे करने के लिए इस तरह के फतवे देते थे. उनके कहने का अर्थ ये था कि मैं व्यावहारिक आलोचनाएँ नहीं लिखता. जो आदमी सूरदास पर पूरी किताब लिखा हो उसे व्यावहारिक आलोचना नहीं लिखने वाला कहना कैसी ईमानदारी है! मैंने उपन्यास और लोकतंत्र किताब में अनेक उपन्यासों की आलोचना की है. अभी मेरी किताब आई है-हिंदी कविता का अतीत और वर्तमान. उसमें कई लेख हैं व्यावहारिक आलोचना के. और तो और देश के विभाजन को लेकर अज्ञेय ने जो कविता-कहानी ‘शरणार्थी’ में लिखी उसका विवेचन-विश्लेषण भी मैंने किया. विभाजन त्रासदी पर छायावादी कवियों, प्रगतिशीलों ने भी नहीं लिखा. फुटकर कविता की अलग बात है. हम रचना का मूल्यांकन करते हैं, रचनाकार का नहीं. इसलिए आलोचकों का आलोचक कहना झूठ है.
जेएनयू से आप लंबे समय तक जुड़े रहे हैं. जिस तरह का आरोप-प्रत्यारोप इन दिनों सुनाई दे रहा है वह विश्वविद्यालय की स्वतंत्रता/स्वायत्तता पर सवाल खड़े करता है?
जेएनयू की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को नष्ट करने के लिए कुछ लोग लगे हुए हैं. फिर भी अगर जेएनयू के छात्र और अध्यापक, जो इसकी प्रतिष्ठा करना चाहते हैं, जीवित, जागृत और सजग रहें तो नष्ट नहीं होगा. मेरी जितनी समझ बनी है, देश की उच्च शिक्षा ही संकट में है उसी में जेएनयू भी है.
आप 'दारा शिकोह' पर लंबे समय से काम करते रहे हैं. कब तक किताब प्रकाशित होने की उम्मीद है.
ऐसा है, ये आप जो आप देख रहे हैं (सोफे पर फैली किताबों की तरफ इशारा करते हुए), दारा शिकोह पर मैं काम कर रहा हूँ. एक-दो महीने में पूरा कर लूँगा, फिर किताब प्रेस में जाएगी.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Thursday, July 29, 2021

कथाकार शेखर जोशी का ओलियागाँव


                                                          तस्वीर: प्रदीप पांडे (साभार)

शेखर जोशी नई कहानी आंदोलन के एक महत्वपूर्ण रचनाकार रहे हैं. उनकी कहानी ‘कोसी का घटवार’ 'परिंदे' (निर्मल वर्मा) और 'रसप्रिया' (फणीश्वर नाथ रेणु)  के साथ हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानियों में गिनी जाती हैं.

88 वर्षीय शेखर जोशी ने उम्र के इस पड़ाव में आकर अपने बचपन  को ‘मेरा ओलियागाँव’ में पंक्तिबद्ध किया है. जैसा कि नाम से स्पष्ट है इस किताब में कुमाऊँ पहाड़ियों के गाँव में बीता लेखक का बचपन है, विछोह की स्मृतियां हैं. बचपन से लिपटा हुआ औपनिवेशिक भारत का समाज चला आता है. स्मृतियों में अकेला खड़ा सुंदर देवदारु, कांफल का पेड़ है, बुरुंश के फूल हैं. पूजा-पाठ और तीज-त्यौहार हैं. लोक मन में व्याप्त अंधविश्वास और सामाजिक विभेद भी. किसी भी रचनाकार के रचना का उत्स उसके बचपन में ढूंढ़ा जा सकता है. शेखर जोशी इसके अपवाद नहीं हैं. अपने ऊपर पड़े साहित्यिक प्रभाव को याद करते हुए वे एक जगह लिखते हैं:

“दूसरे विश्व युद्ध के समय में बच्चा ही था. उन दिनों के.एम.ओ.यू (कुमाऊँ मोटर ओनर्स यूनियन) की मोटर गाड़ियाँ फौजियों से भरी रहती थीं. आम जनता को सामान्यत: पैदल ही यात्रा करनी पड़ती थी... हम लोग पैदल ही मोटर मार्ग पर अल्मोड़ा के लिए चल पड़े. रास्ते में थोड़ी- थोड़ी दूर पर बस्तियों के निकट किसी रणबाँकुरे फौजी को विदा करने के लिए उसके परिवार के स्त्री-पुरुष बस की प्रतीक्षा करते हुए मिलते. विदा देने वालों में अधिकतर महिलाएँ होतीं-संभवत: माँ, भाभी, चाची और बहिनें थीं और कभी-कभी कम उम्र की पत्नी भी. बस आ पहुँचती तो कड़क फौजी वर्दी में सजा जवान बस के अंदर आ बैठता और ‘घुर्र’ की आवाज कर गाड़ी आगे बढ़ जाती, तब जो रुलाई का स्वर उठता वह बहुत ही हृदय विदारक होता. रास्ते भर हमें ऐसे ही दृश्य देखने को मिलते रहे. युद्ध में समिधा बनते गए उन नौनिहालों मे से बहुत कम लोग सकुशल लौटे थे.”

शेखर जोशी टिप्पणी करते हैं कि ‘शायद कोसी का घटवार का नायक गुसाई भी इसी घटना का परिणाम हो.’ गुंसाई का चरित्र हिंदी साहित्य में अविस्मरणीय है. इस प्रेम कहानी में गुंसाई की ‘फौजी पैंट की चाहत’ और उससे उपजा अकेलापन मर्म को भेदती है.

आधुनिक काल में पहाड़ों से विस्थापन बड़ी मात्रा में हुआ है. उत्तराखंड के हजारों गाँव ‘भुतहा गाँव’ की संज्ञा पा चुके हैं. उदारीकरण-भूमंडलीकरण के बाद न सिर्फ पहाड़ी गाँवों की बल्कि मैदानी भागों में बसे गाँवों की छवियाँ भी बदल रही है. इन बदलावों का समाजशास्त्रीय अध्ययन होना अभी बाकी है. यह किताब छोटे-छोटे अट्ठाइस अध्यायों में विभक्त है. इसका रचना विधान और संयोजन अलहदा है, जो पाठकों को अगले एक के बाद एक अध्याय पढ़ने को प्रेरित करता है.

इस आत्मवृत्तात्मक किताब में एक संवेदनशील मन का प्रतिबिंब दिखता है. ऐसा नहीं है कि लेखक को अपनी सामाजिक अवस्थिति का बोध नहीं है. जिसे उन्होंने स्वीकार भी किया है. पर श्रम के महत्व और हाशिए के समाज के प्रति लेखक की संवेदना और सहानुभूति मुखर होकर व्यक्त हुई है, दृष्टि परिवर्तनकारी है. जाहिर है अपने कथ्य और बनावट में यह किताब दलित आत्मकथाओं से साफ अलग है. इसकी तुलना ‘जूठन’ (ओमप्रकाश वाल्मीकि) या ‘मुर्दहिया’ (तुलसी राम) से नहीं की जा सकती. 

हिंदी में कथा-साहित्य का इतना जोर रहता है कि कथेतर साहित्य की चर्चा कम ही हो पाती है. कथेतर गद्य की भाषा बरतने के लिहाज से भी यह किताब पढ़ी जानी चाहिए. न केवल साहित्य में बल्कि हिंदी आलोचना में भी आजकल अबूझ भाषा के प्रयोग का चलन बढ़ा है. संप्रेषण से ज्यादा लेखकों-आलोचकों का जोर अपनी गुरुता सिद्ध करना रहता है. अनायास नहीं कि आज ‘नई वाली हिंदी’ की खूब चर्चा है, जो लोक से दूर है. यह किताब याद दिलाती है कि कैसे साफ-सुथरी और सहज भाषा से पाठकों तक अपने विचारों को संप्रेषित किया जा सकता है. सवाल है कि क्या हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों को ठूंस देने से, वक्रोति भर देने से कोई भाषा ‘नई’ हो जाती है? भाषा बनाने का काम पूरा समाज करता है. जिसे हम ‘नई वाली हिंदी’ कहते हैं वह भूमंडलीकरण के दौर में उभरे नव-मध्यम वर्ग की भाषा है. ओलियागाँव में ‘मडुगौड़े’, ‘धानरोपै’ और ‘अखोडझड़ैं’ जैसे बोलचाल की भाषा के शब्द भी मौजूद हैं जिनमें लेखक के शब्दों में ‘विराट जनकल्याण की भावना और सामूहिकता की ध्वनि छिपी हुई है’  और इससे इंकार भी नहीं.

 

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, July 25, 2021

भारतीय भाषाओं में मलयालम सिनेमा का बुलंद वर्तमान

शायद ही कोई इससे इंकार करे कि हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों की हिंदी मीडिया में बहुत कम चर्चा होती हैं. सवाल है कि क्यों हम इन्हें क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के खाते में डाल कर छुट्टी पा लेते हैं,  जबकि सिनेमा के विकास में विभिन्न भाषा-भाषी समाज की  ऐतिहासिक भूमिका रही है. 

सच तो यह है कि भारत में पचास भाषाओं में फिल्मों का निर्माण होता है. करीब पचासी प्रतिशत फिल्में बॉलीवुड के बाहर बनती हैं. तकनीक के विस्तार के साथ आए ओटीटी प्लेटफॉर्म के मार्फत  क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को भी देश-विदेश के स्तर पर आज दर्शक देख व सराह रहे हैं. ऐसी फिल्में हिंदी क्षेत्र में पहले महज फिल्म समारोहों तक ही सीमित रहती थी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पिछले दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई मलयालम फिल्में हैं.

महामारी के दौरान मलयालम में रिलीज हुई ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, ‘जोजी’, ‘आरकारियम’, ‘मालिक’ आदि मलयालम फिल्मों की चर्चा देश-विदेश में हो रही है. लॉकडाउन के बीच मध्यवर्गीय दर्शकों ने इन फिल्मों को हाथों-हाथ लिया. ‘जोजी’ और ‘आरकारियम’ फिल्म में तो ‘लॉकडाउन’ और ‘मास्क’ के रूपक का कथ्य में खूबसूरती से निरूपण भी हुआ है.  पिछले दिनों ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ के निर्देशक जियो बेबी ने एक बातचीत के दौरान मुझे बताया कि इस फिल्म को अमेजन और नेटफ्लिक्स ने पहले अस्वीकार कर दिया था. उन्होंने इसे ‘नीस्ट्रीम’ पर रिलीज किया था. जब फिल्म की चर्चा होने लगी, अच्छे रिव्यू आने लगे तब इसे अमेजन प्राइम ने रिलीज किया. इसी तरह ‘आरकारियम’ फिल्म पहले सिनेमा हॉल में रिलीज हुई थी, पर महामारी के दौरान ओटीटी पर फिल्म को व्यापक दर्शक वर्ग मिला. मलयालम सिनेमा की इस नई धारा की चर्चा प्रतिष्ठित विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में भी हो रही है.

सत्तर-अस्सी के दशक में समांतर सिनेमा की धारा को मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, के जी जार्ज, जी अरविंदन, शाजी करुण ने संवृद्ध किया था. उनकी फिल्मों ने मलयालम सिनेमा को देश-दुनिया में स्थापित किया, पर उसके बाद ऐसा लगा कि कथ्य और शैली में मलयालम सिनेमा पिछड़ गई. पिछले एक दशक में बनी मलयालम फिल्मों को देखकर हम कह सकते हैं कि मलयालम सिनेमा में यह एक नए युग की शुरुआत है जहाँ पापुलर और समांतर की रेखा मिट रही है. कम लागत से बनने वाली इन फिल्मों में इन विषय-वस्तु  और सहज अभिनय पर जोर है. यही कारण है कि फाहाद फासिल जैसे अभिनेता (कुंबलंगी नाइट्स, जोजी, मालिक) की खूब प्रशंसा हो रही है. महेश नारायणन निर्देशत मालिक इस फिल्म में सुलेमान के ‘एंटी होरी’ के किरदार को जिस खूबसूरती से फासिल ने निभाया है लोग इसकी तुलना ‘गॉड फादर’ और ‘नायकन’ फिल्म से कर रहे हैं. मलयालम में बनने वाली अन्य फिल्मों की तरह यह फिल्म भी केरल के समाज में रची-बसी है. इस फिल्म में राजनीतिक स्वर भी मुखर रूप से व्यक्त हुआ है, जो बॉलीवुड में इन दिनों मुश्किल से सुनाई पड़ता  है. उल्लेखनीय है कि इससे पहले महेश नारायणन की फाहाद फासिल और पार्वती थिरूवोथु अभिनीत ‘टेक ऑफ’ (2017) फिल्म ने भी खूब सुर्खियाँ बटोरी थी.  

(प्रभात खबर, 25.07.2021)


Sunday, July 04, 2021

गोपालकृष्णन का सिनेमा संसार: अस्सी के अडूर

भारत में पचास भाषाओं में फिल्मों का निर्माण होता है. करीब पचासी प्रतिशत फिल्में बॉलीवुड के बाहर बनती हैं. हिंदी से इतर समकालीन फिल्मों, उनके निर्माता-निर्देशकों की मुख्यधारा के मीडिया में हालांकि बेहद कम उल्लेख होता है. सच तो यह है कि बॉलीवुड इतना हावी है कि अन्य भाषाओं में बनने वाली फिल्मों को हम क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के खाते में डाल कर छुट्टी पा लेते हैं, जबकि सिनेमा के विकास में बांग्ला और मराठी समाज की ऐतिहासिक भूमिका रही है. इंटरनेट और डिजिटल तकनीकी के विस्तार के बाद, हाल के दशक में, क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों को भी अखिल भारतीय स्तर पर दर्शक देख रहे हैं, सराह रहे हैं. ये फिल्में हिंदी क्षेत्र में पहले महज फिल्म समारोहों तक ही सीमित रहती थी.

यहाँ हम बात बॉलीवुड की दुनिया से दूर एक ऐसे साधक के बारे में कर रहे हैं जो पिछले पचास वर्षों से सिनेमा निर्माण और निर्देशन में सक्रिय हैं, जिनकी पहचान राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जगत में है. मलयालम फिल्मों के विख्यात निर्देशक अडूर गोपलकृष्णन तीन जुलाई को अस्सी वर्ष पूरे कर रहे हैं. सिनेमा में योगदान के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अडूर गोपालकृष्णन सत्यजीत रे के बाद देश के प्रमुख ‘ओतर’ यानी फिल्म निर्देशक माने जाते रहे हैं. खुद अडूर सत्यजीत रे को अपना गुरु कहते हैं. आश्चर्य नहीं कि उनकी फिल्मों में मानवतावादी दृष्टि की समीक्षक चर्चा करते हैं. वे इस बात को स्वीकारते हैं कि वे सौभाग्यशाली थे जो उन्हें सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन जैसे फिल्मकारों का संग-साथ मिला. इन तीनों निर्देशकों ने बांग्ला में सिनेमा की नई धारा को पुष्ट किया था.
अडूर गोपालकृष्णन की जड़ें केरल में स्थित एक छोटे शहर अडूर में हैं, जो उनके नाम में जुड़ा है. युवावस्था में वे थिएटर से गहरे जुड़े थे. वर्षों पहले एक मुलाकात में उन्होंने मुझे बताया था कि ‘कालेज के दिनों में मेरी अभिरुचि नाटकों में थी. मैंने फिल्म के बारे में कभी नहीं सोचा था. जब मैंने 1962 में पुणे फिल्म संस्थान में प्रवेश लिया, तो वहां देश-विदेश की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को देख पाया. मुझे लगा कि यही मेरा क्षेत्र है, जिसमें मैं खुद को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकता हूं.’ फिल्म इंस्टीट्यूट, पुणे में ऋत्विक घटक उनके शिक्षक रहे थे. वहाँ से प्रशिक्षण के सात साल बाद उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'स्वयंवरम (1972)' बनाई जिसे चार राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. इस फिल्म के माध्यम से लोगों को एक युवा निर्देशक का अलहदा स्वर सुनाई पड़ा. यह स्वर मलायलम सिनेमा में समांतर सिनेमा को बुलंद करने वाला साबित हुआ जिसकी अनुगूंज मलयालम फिल्म के युवा निर्माता-निर्देशकों के यहाँ आज भी सुनाई पड़ती है.
पिछले दिनों बातचीत के दौरान अडूर ने बताया कि “फिल्म, असल में, मेरे लिए दर्शकों के साथ एक अनुभव साझा करना है. और ये अनुभव साझा करने लायक होने चाहिए.” अपने इस अनूठे अनुभव को दर्शकों से बांटने के क्रम में वे अपने पूरे फिल्मी करियर के दौरान कमर्शियल फिल्मों के दायरे से बाहर रहे. ‘स्वंयवरम’ फिल्म में कोई नाच-गाना नहीं था. सिनेमा निर्माण के व्यावसायिक दायरे से बाहर रहने के कारण उन्होंने पूरे करियर में महज बारह फिल्में ही निर्देशित किया है. गौरतलब है कि अडूर विषय-वस्तु के लिहाज से किसी फिल्म में खुद को दोहराया नहीं. उनकी फिल्मी यात्रा को देखने पर यह स्पष्ट है. जहाँ ‘एलिप्पथाएम’ में आजादी के बाद के सामंती समाज और घुटन का चित्रण है वहीं ‘मुखामुखम’ में एक मार्क्सवादी राजनीतिक कार्यकर्ता फिल्म के केंद्र में है. ‘अनंतरम’ में एक फिल्मकार की रचना प्रक्रिया से हम रू-ब-रू होते हैं, जहां यथार्थ और कल्पना में सहज आवाजाही है. यहाँ रचनाकार के सामने शाश्वत सवाल है कि हम रचें कैसे? वहीं ‘मतिलुकल’ में ‘स्वयंवरम’ की तरह स्वतंत्रता एवँ मुक्ति का प्रश्न प्रमुखता से उभरा है, हालांकि फिल्म निर्माण की दृष्टि से अनंतरम के करीब है. ‘कथापुरुषन’ में आत्मकथात्मक स्वर है, इस फिल्म में सामंती हदबंदियों को तोड़ा गया है. फिल्म की शूटिंग भी उन्होंने अपने पुश्तैनी घर में ही की. अडूर का सिनेमा आजादी के बाद परंपरा और आधुनिकता के कशमकश को, केरल की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को, बदलती हुई राजनीति के परिप्रेक्ष्य में निरूपित करता है. यहां विभिन्न स्तरों पर विस्थापन और अस्मिता की खोज मौजूद है.
विषय-वस्तु में विविधता भले हो पर अडूर की फिल्मों में केरल की संस्कृति एक ऐसा सूत्र है जो उनकी पूरी फिल्मी यात्रा को व्याख्यायित करता है. वे आज भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं. पिछले साल उनकी एक छोटी फिल्म ‘सुखयांतम’ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई. उनकी फिल्मों में सामाजिकता के साथ वैचारिकता का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है. वे कहते हैं कि एक विचार के प्रभाव से बाहर निकलने में उन्हें काफी वक्त लगता है. सादगी में विश्वास करने वाले अडूर स्वभाव से मितभाषी हैं. यह उनकी फिल्मों में भी परिलक्षित होता है. उनकी फिल्में कम बोलती हैं. बिंबों और ध्वनि के जरिए यहाँ दर्शकों को अनुभव और कल्पना से चीजों की व्याख्या करनी होती है, गैप्स को भरने होते हैं.
यह पूछने पर कि क्या उन्होंने कभी किसी अन्य भाषा में फिल्म बनाने की नहीं सोची? अडूर कहते हैं- नहीं. वे कहते हैं कि भाषा महज विचारों की अभिव्यक्ति का जरिया नहीं है, उसमें संस्कृति फलती-फूलती है. उनकी फिल्मों में केरल की आबोहबा और संस्कृति गहरे रची-बसी है. केरल की स्थानीय जमीन पर खड़ी होकर उनकी फिल्में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जगत तक पहुँची है. अडूर का सिनेमा मनोरंजन से आगे बढ़ ऐसे सामाजिक यथार्थ और अंतर्मन के भावों को हमारे सामने पेश करता है जो स्थानीयता और समय की सीमा से पार जाता है. यही उनकी कला की विशेषता है.

(न्यूज 18 हिंदी वेबसाइट पर प्रकाशित)