कोरोना महामारी की मार सबसे ज्यादा प्रदर्शनकारी कला पर पड़ी है. पहली और दूसरी लहर के दौरान नाट्यकर्मियों की सुध लेने वाला कोई नहीं था, ये दर्शकों से दूर थे. सुखद है कि उस दौर को पीछे छोड़ते हुए एक बार फिर से नाट्यकर्मी दर्शकों से आमने-सामने जुड़ रहे हैं. पिछले दिनों दो साल के बाद दिल्ली में महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स एंड फेस्टिवल- (मेटा) का आयोजन किया गया.
Sunday, July 24, 2022
नदी के लहरों में जीवन संघर्ष
कोरोना महामारी की मार सबसे ज्यादा प्रदर्शनकारी कला पर पड़ी है. पहली और दूसरी लहर के दौरान नाट्यकर्मियों की सुध लेने वाला कोई नहीं था, ये दर्शकों से दूर थे. सुखद है कि उस दौर को पीछे छोड़ते हुए एक बार फिर से नाट्यकर्मी दर्शकों से आमने-सामने जुड़ रहे हैं. पिछले दिनों दो साल के बाद दिल्ली में महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स एंड फेस्टिवल- (मेटा) का आयोजन किया गया.
Saturday, January 15, 2022
सिनेमा की सरकारी समझ बहुत खराब है
बारह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित असमिया फिल्मों के निर्देशक जानू बरुआ जीवन के सत्तरवें वर्ष में हैं। ‘सागरलै बहु दूर’ (1995), ‘हालोदिया चराय बाओ धान खाय’ (1987) उनकी बहुचर्चित फिल्में हैं। चालीस साल की फिल्मी यात्रा में उन्होंने समाज के हाशिए के लोगों पर चौदह फिल्में असमिया में बनाई हैं, जिनमें असम का समाज और स्त्री स्वाधीनता का सवाल प्रमुखता से दिखा है। पैरलल सिनेमा की धारा के वह एक प्रमुख फिल्मकार हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा की संस्कृति, समांतर सिनेमा और उनकी लंबी फिल्मी यात्रा के इर्द-गिर्द अरविंद दास ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :
पिछले दिनों गोवा और लद्दाख में हुए फिल्म समारोह में उत्तर-पूर्वी राज्यों की फिल्में दिखाई गईं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में फिल्म निर्माण की संस्कृति को आप कैसे देखते हैं?
मैं इन फिल्म समारोहों में नहीं गया था, इसलिए वहां दिखाई गई फिल्मों के बारे में मैं कुछ
नहीं कह पाऊंगा। आपको समझना होगा कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा का बाजार
बहुत छोटा है। लोकल स्तर पर जो फिल्म उद्योग है उस पर सरकार का ध्यान नहीं है। जो
फिल्मकार हैं वे व्यावसायिक फिल्मों की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, उन पर हिंदी फिल्मों का असर है। लेकिन कुछ युवा फिल्मकार
काफी अच्छा काम कर रहे हैं। उन्हें यदि सहायता मिले तो निस्संदेह अच्छी फिल्में
लेकर आएंगे। सिनेमा बाजार पर निर्भर है। उत्तर-पूर्वी राज्यों की फिल्मों के विकास
के लिए वहां के लोगों और सरकार दोनों को ही ध्यान देना होगा।
बाजार विकसित नहीं होने के बाबजूद आप असमिया फिल्म
निर्माण-निर्देशन में पिछले चालीस साल से सक्रिय हैं..
किसी भी अन्य फिल्मकार की तरह मुझे भी काफी संघर्ष
करना पड़ा, पर उसे लेकर कोई मलाल नहीं है। मैं व्यावसायिक
फिल्में नहीं बनाता। मैं जिन सामाजिक मुद्दों को लेकर फिल्म बनाता रहा हूं वे भारत
की किसी भी क्षेत्रीय भाषा में फिल्में बनाने वालों के लिए चुनौतीपूर्ण रहे हैं।
स्त्री-पुरुष संबंध आपकी फिल्मों के केंद्र में हैं।
बात ‘अपरुप’
(1981) की हो,
‘फिरंगति’
(1991) की या हाल ही रिलीज हुई शॉर्ट फिल्म ‘दैट गस्टी मार्निंग’ (2016) की,
इनमें स्त्री पात्र काफी सशक्त दिखाई देते हैं...
हां,
मैं उन सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाना पसंद करता
हूं, जो एक फिल्मकार के रूप में मुझे अपील करती हैं और
मुझे लगता है कि उस पर फिल्म बनानी चाहिए। जहां तक स्त्री पात्रों की बात है, असम के समाज में स्त्रियों की स्थिति देश के अन्य
राज्यों से अलग है। यहां स्त्री-पुरुष संबंधों में समानता है। बचपन से मैंने जो
देखा, उसकी तुलना मैं भारतीय सिनेमा में स्त्रियों के
चित्रण से करता रहा हूं। जिस रूप में परदे पर उनका चित्रण होता रहा है उसे देख कर
मुझे दुख है। मैं अपनी मां के काफी करीब रहा हूं। स्त्रियों का चरित्र जब मैं
स्क्रिप्ट में लिखता हूं, अपनी
मां को एक ‘रोल मॉडल’
के रूप में सामने रखता हूं।
न सिर्फ फिल्म में, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर भी आप खुल कर राय
रखते आए हैं। आपने नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ आवाज उठाई थी। हाल ही में
नगालैंड में सेना की गोली से कई निर्दोष लोगों की मौत हुई। आप क्या कहना चाहेंगे?
एक नागरिक के रूप में मुझे लगता है कि यह
दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं इसकी राजनीति में नहीं जाना चाहूंगा। मैं खुद को
मानवतावादी मानता हूं और इस नाते कहीं भी हत्या हो, वह मुझे दुखी करती है। हमें ऐसा कुछ करना चाहिए ताकि
शांतिपूर्ण ढंग से समस्या का समाधान हो सके। हमें हिंसा की तरफ नहीं बल्कि बातचीत
की तरफ बढ़ना चाहिए।
आपकी फिल्म ‘फिरंगति’ और सत्यजीत रे की फिल्म ‘आगंतुक’
को एक साथ राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। आपकी फिल्मों
के बारे में रे की क्या प्रतिक्रिया थी?
मेरी उनसे दो बार मुलाकात थी। कलकत्ता में वह मेरी
फिल्म देखने आए थे। पर कुछ देर के लिए ही- पांच से दस मिनट। एक बार मेरी उनसे
मुलाकात चिदानंद दास गुप्ता ने कराई थी। उन्होंने कहा था, ‘तुममें काफी संभावना है। मैं तुम्हारी फिल्म देख कर
बहुत खुश हूं’। उनसे प्रशंसा के शब्द सुन कर मैं रात भर सो नहीं
सका था। एक तरह से यह मेरे लिए सपने के सच होने जैसा था।
फिल्म इंस्टिट्यूट, पुणे से निकले अडूर गोपालकृष्णन (मलयालम), गिरीश कसरावल्ली (कन्नड़) और आपने खुद असमिया में
पैरलल सिनेमा की धारा को पुष्ट किया है। इस यात्रा को आप किस रूप में देखते हैं?
क्षेत्रीय भाषा के फिल्मकारों में बड़ा स्ट्रॉन्ग
पैशन रहा है कि वे एक अर्थपूर्ण सिनेमा बनाएं जो भारतीय है। यह अडूर गोपालकृष्णन
से शुरू हुआ। असल में समस्या यह रही कि पैरलल सिनेमा ठीक से पंख नहीं फैला सका।
सरकार सहायता के लिए आगे नहीं आई। माफ कीजिएगा, सच यह है कि सरकार की सिनेमा की जो समझ है वह बहुत ही
खराब है। उसे नहीं पता कि देश में इस सशक्त माध्यम का कैसे इस्तेमाल हो। पर ऐसा
नहीं कि पैरलल सिनेमा की धारा सूख गई हो,
वह अभी भी जारी है। असम, बंगाल,
केरल,
मणिपुर,
मेघालय और मराठी सिनेमा के युवा फिल्मकार नए और अलग
विचार लेकर आगे आ रहे हैं।
आहोम साम्राज्य के सेनापति और योद्धा लचित बोरफुकन पर
आप लंबे समय से काम करते रहे है,
कब तक फिल्म पूरी होने की संभावना है?
मैं इस प्रॉजेक्ट के मध्य में हूं। यह एक ऐतिहासिक
फिल्म हैं। इस विषय पर अभी तक सिनेमा नहीं बना है। मैंने स्क्रिप्ट पूरी कर ली है।
उम्मीद करता हूं कि वर्ष 2023 तक
इसे मैं पूरी कर लूंगा।
आप पर किस भारतीय फिल्मकार का प्रभाव रहा है, जिसका
उल्लेख आप करना चाहें?
फिल्म संस्थान, पुणे
के दिनों में और बाद के फिल्मी सफर में मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं प्रभावित रहा
हूं, पर रे और ऋत्विक घटक की फिल्मों में जो पैशन है, उसे
मैं पसंद करता रहा हूं।
(नवभारत टाइम्स, 15 जनवरी 2022)
Friday, December 24, 2021
असमिया सिनेमा का समकालीन स्वर
पिछले महीने गोवा में आयोजित 52वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के भारतीय पैनोरमा की उद्घाटन फिल्म के रूप में ‘सेमखोर’ को चुना गया था. डिमासा भाषा में बनी इस फिल्म को असमिया अभिनेत्री एमी बरुआ ने निर्देशित किया है. बकौल बरुआ ‘यह फिल्म सेमखोर लोगों की प्रथाओं, रीति-रिवाजों और लोक धारणाओं का प्रतिनिधित्व करती है जो बाहरी दुनिया से 'अछूते' रहना चाहते हैं.’ डिमासा असम और नागालैंड के कुछ हिस्सों के जातीय-भाषाई समुदाय की एक बोली है. सेमखोर डिमासा में बनी पहली फिल्म है.
जब रीमा दास की असमिया फिल्म ‘बुलबुल कैन सिंग’
और ‘विलेज रॉकस्टार’ को राष्ट्रीय
पुरस्कार से नवाजा गया तब सबकी नजर समकालीन असमिया फिल्मों की ओर गई. गौरतलब है कि
वर्ष 2019 में ‘विलेज रॉकस्टार’ को भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेजा गया था. इसी तरह भाष्कर हजारिका की असमिया फिल्म ‘आमिस’ की भी खूब चर्चा हुई थी. मांस के रूपक के माध्यम से यह फिल्म समकालीन भारतीय
राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों को अभिव्यक्ति करने में सफल है. फिल्म का
ताना-बाना मानवीय प्रेम को केंद्र में रख कर बुना गया है.
जहां रीमा दास की फिल्म ‘बुलबुल कैन सिंग’
असम के ग्रामीण इलाके में अवस्थित है और किशोर
और युवा की वय संधि पर खड़े बोनी, सुमन और बुलबुल
की कहानी कहती है, वहीं ‘आमिस’ में शहरी इलाके में रहने वाले युवा सुमन, जो एक शोधार्थी है, और पेशे से डॉक्टर निर्मली के मध्य पनपे परकीया प्रेम को रचा गया है. इस
विवादास्पद फिल्म ने असमिया सिनेमा के 85 वर्ष के इतिहास में एक तीखे बहस को जन्म दिया. आमिस गुवाहाटी में अवस्थित है
जिसे खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है.
असमिया भाषा में बनने वाली फिल्मों में पर्याप्त विविधता रही है जो इस सिनेमा
के इतिहास के अनुकूल है. वर्ष 1935 में ज्योति
प्रसाद आगरवाला ने पहली असमिया फिल्म जयमती का निर्माण और निर्देशन किया था.
उन्होंने फिल्म के तकनीकी पक्ष को सीखने के लिए जर्मनी की यात्रा की थी और हिमांशु
राय के साथ रह कर फिल्म निर्माण को सीखा. फिर उन्होंने असम की ओर रुख किया था.
आगरवाला के बाद बाद के दशक में प्रवीण फूकन, निप बरुआ और भूपने हजारिका जैसे हस्तियों ने असमिया सिनेमा
जगत को संवारा था.
सही मायनों में असमिया सिनेमा को देश-विदेश में प्रसिद्धि जानू बरुआ ने दिलवाई
जो पिछले चालीस वर्षों से असमिया भाषा में सिनेमा बना रहे हैं. अब तक उनकी फिल्मों
को बारह राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. फिल्म संस्थान,
पुणे से प्रशिक्षण के बाद बरुआ ने पहली फिल्म ‘अपरूप (1982)’ निर्देशित किया था. अपनी कथानक की वजह से यह फिल्म आमिस की
तरह ही चर्चित रही. इसमें में भी परकीया प्रेम को दर्शाया गया है. एक विवाहिता
स्वेच्छा से दूसरे पुरुष के साथ रहने चली जाती है. उनकी फिल्म ‘सागरलै बहु दूर (1995)’ और ‘हालोदिया चराय
बाओ धान खाय (1987)’ को देश-विदेश के
फिल्म समारोहों में काफी सराहना मिली. ‘हालोदिया चराय बाओ धान खाय’ असमिया में बनने
वाली पहली फिल्म थी जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए स्वर्ण कमल
से नवाजा गया था. बरुआ सामाजिक चेतना से संपन्न फिल्मकार हैं. उनकी फिल्मों में
हाशिए का समाज और स्त्री स्वाधीनता का स्वर प्रमुखता से अभिव्यक्त होता रहा है.
हिंदी समाज और दर्शकों के बीच बरुआ की फिल्में हालांकि उस रूप में चर्चा का विषय
कभी नहीं बनी जैसा कि सत्यजीत रे या मृणाल सेन की फिल्में रही. इसकी एक वजह
उत्तर-पूर्व की संस्कृति से अलगाव है जो बॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों में भी
दिखाई देती है.
पिछले वर्ष रिलीज हुए निकोलस खारकोंगोर की ‘अखोनी’ जैसी फिल्म को
छोड़ दिया जाए तो बॉलीवुड की चिंता के केंद्र में उत्तर-पूर्व का समाज और संस्कृति
कभी नहीं रहा है. प्रसंगवश, वर्ष 1992 में जब बरुआ की ‘फिरंगति’ को दूसरी
सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया गया और सत्यजीत रे की फिल्म ‘आगंतुक’ को पहली तो यह
कहा गया कि रे की वजह से ‘फिरंगति’ सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार पाने से वंचित
रही. हालांकि बरुआ सत्यजीत रे से हुई अपनी मुलाकात को शिद्दत से याद करते हैं.
उनके प्रशंसा के शब्द को वे आज भी भूल नहीं पाए हैं और कहते हैं कि ‘मेरे लिए यह सपने के सच होने जैसा था.’ पर बॉलीवुड की बेरुखी को बरुआ भी बातचीत में
रेखांकित करते हैं. वे उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा की समकालीन संस्कृति के
बारे में कहते हैं: “आपको समझना होगा
कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा का बाजार बहुत छोटा है. लोकल स्तर पर जो फिल्म
उद्योग है उस पर सरकार का ध्यान नहीं है. जो फिल्मकार हैं वह व्यावसायिक फिल्मों
की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, उन पर हिंदी
फिल्मों का असर है. लेकिन कुछ युवा फिल्मकार काफी अच्छा काम कर रहे हैं. उन्हें
यदि सहायता मिले तो निस्संदेह अच्छी फिल्में लेकर आएँगे.”
सिनेमा बड़ी पूंजी की मांग करता है और निर्माण-वितरण का कारोबार बाजार पर
निर्भर है. लेकिन बाजार नहीं होने के बावजूद बरुआ जैसे फिल्मकार असमिया समाज और
संस्कृति को सिनेमा के माध्यम से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पटल पर लाने में सफल रहे
हैं. सच्चाई यह है कि आज भी ‘सेमखोर’ जैसी फिल्में बन रही है. यह कहने में कोई संकोच
नहीं कि क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्में भारत की विविध संस्कृति का
प्रतिनिधित्व करती हैं, न कि हिंदी में
बनने वाली बॉलीवुड की फिल्में. और इस बात से जानू बरुआ भी सहमत हैं.
(न्यूज 18 हिंदी के लिए)
Friday, November 29, 2019
चुन-चुन खाइयो मांस: आमिस
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| आमिस |

