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Sunday, July 24, 2022

नदी के लहरों में जीवन संघर्ष

 
कोरोना महामारी की मार सबसे ज्यादा प्रदर्शनकारी कला पर पड़ी है. पहली और दूसरी लहर के दौरान नाट्यकर्मियों की सुध लेने वाला कोई नहीं था, ये दर्शकों से दूर थे. सुखद है कि उस दौर को पीछे छोड़ते हुए एक बार फिर से नाट्यकर्मी दर्शकों से आमने-सामने जुड़ रहे हैं. पिछले दिनों दो साल के बाद दिल्ली में महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स एंड फेस्टिवल- (मेटा) का आयोजन किया गया.

इसमें हिंदी, असमिया, मलयालम, बांग्ला के चार नाटकों का मंचन किया गया, जिसे मेटा 2020 में पुरस्कृत किया गया था. सबसे ज्यादा चर्चा साहिदुल हक निर्देशित ‘द ओल्ड मैन’ नाटक की हुई. यह नाटक अर्नेस्ट हेमिंग्वे की प्रसिद्ध कृति ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’ पर आधारित है, पर इसकी भावभूमि ब्रह्मपुत्र नदी है और भाषा असमिया है. हेमिंग्वे के मुख्य पात्र सेंटियागो की तरह ही इस नाटक में एक बूढ़ा, वोदाई, बिना कोई मछली पकड़े लगातार 84 दिनों तक नदी से खाली हाथ लौटता है. निराशा और अवसाद के साथ-साथ उसे सामाजिक उपेक्षा भी झेलनी पड़ती है. युवा रोंगमोन को उसके पास नहीं जाने की सलाह दी जाती है. एक तरह से लोग उसे अपशकुन की तरह देखते हैं. पर वोदाई जिजीविषा और संघर्ष से अपनी परिस्थिति पर विजय पाता है.
यह नाटक जहाँ मानवीय भावों के इर्द-गिर्द बुना गया है, वहीँ एक बड़े सवाल जो प्रकृति और मानवीय रिश्तों से से जुड़ा हुआ उसे अपने घेरे में लेता है. इस समय असम में बाढ़ से लाखों लोग बेघर हुए हैं और जान-माल का काफी नुकसान हुआ है. सच तो यह है कि यह तबाही हर साल आती है. जो अपनी जीविका के लिए नदी पर निर्भर हैं, वे नदीपुत्र कैसे जीवन-बसर करते हैं, किस तरह झंझावतों से लड़ते हैं? वोदाई प्रकृति और मानव के बीच संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है. हाल के वर्षों में मुख्यधारा के मीडिया में भले पर्यावरण की चिंता देखने-सुनने को मिल रही हो, पर सिनेमा-नाटक में अभी भी यह विषय अपवाद स्वरूप ही दिखाई देते हैं. ऐसे में 'द ओल्ड मैन’ नाटक अपने विषय-वस्तु की वजह से अलग से रेखांकित किए जाने योग्य है.
इस नाटक की भाषा असमिया है, लेकिन निर्देशक ने रंगयुक्ति के बल पर वाचिक पक्ष को गौण कर दिया और यहाँ आंगिक पक्ष प्रधान है. साथ ही प्रकाश संयोजन इस नाटक का एक सशक्त पक्ष है. नदी में आई बाढ़ की विकरालता, लहरों में फंसे नाव को बिंब और ध्वनि के मेल से बेहद कौशल से निर्देशक ने मंच पर जीवंत किया है. अनायास नहीं कि नाटक देखते हुए सिनेमाई तत्वों का ख्याल मन में आता रहता है, जबकि यहाँ किसी कैमरे या यंत्र की कोई भूमिका नहीं थी. निरंजन नाथ वोदाई की भूमिका में प्रभावी थे. मंच पर साज-सज्जा बेहद सीमित था. एक छोटा सा नाव उनके लिए जीवन-यापन का साधन और घर भी है. असल में नाव अपना रूप बदलता रहता है. साहिदुल कहते हैं कि ‘द ओल्ड मैन’ में वोदाई और रोंगमोन में अपने पिता और खुद को देखते हैं. मूलत: असम से ताल्लुक रखने वाले साहिदुल की ‘बबल्स इन द रिवर’ नाटक भी काफी चर्चित रहा है.

Saturday, January 15, 2022

सिनेमा की सरकारी समझ बहुत खराब है

 


बारह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित असमिया फिल्मों के निर्देशक जानू बरुआ जीवन के सत्तरवें वर्ष में हैं। सागरलै बहु दूर’ (1995), ‘हालोदिया चराय बाओ धान खाय’ (1987) उनकी बहुचर्चित फिल्में हैं। चालीस साल की फिल्मी यात्रा में उन्होंने समाज के हाशिए के लोगों पर चौदह फिल्में असमिया में बनाई हैं, जिनमें असम का समाज और स्त्री स्वाधीनता का सवाल प्रमुखता से दिखा है। पैरलल सिनेमा की धारा के वह एक प्रमुख फिल्मकार हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा की संस्कृति, समांतर सिनेमा और उनकी लंबी फिल्मी यात्रा के इर्द-गिर्द अरविंद दास ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

पिछले दिनों गोवा और लद्दाख में हुए फिल्म समारोह में उत्तर-पूर्वी राज्यों की फिल्में दिखाई गईं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में फिल्म निर्माण की संस्कृति को आप कैसे देखते हैं?


मैं इन फिल्म समारोहों में नहीं गया था, इसलिए वहां दिखाई गई फिल्मों के बारे में मैं कुछ नहीं कह पाऊंगा। आपको समझना होगा कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा का बाजार बहुत छोटा है। लोकल स्तर पर जो फिल्म उद्योग है उस पर सरकार का ध्यान नहीं है। जो फिल्मकार हैं वे व्यावसायिक फिल्मों की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, उन पर हिंदी फिल्मों का असर है। लेकिन कुछ युवा फिल्मकार काफी अच्छा काम कर रहे हैं। उन्हें यदि सहायता मिले तो निस्संदेह अच्छी फिल्में लेकर आएंगे। सिनेमा बाजार पर निर्भर है। उत्तर-पूर्वी राज्यों की फिल्मों के विकास के लिए वहां के लोगों और सरकार दोनों को ही ध्यान देना होगा।

बाजार विकसित नहीं होने के बाबजूद आप असमिया फिल्म निर्माण-निर्देशन में पिछले चालीस साल से सक्रिय हैं..

 

किसी भी अन्य फिल्मकार की तरह मुझे भी काफी संघर्ष करना पड़ा, पर उसे लेकर कोई मलाल नहीं है। मैं व्यावसायिक फिल्में नहीं बनाता। मैं जिन सामाजिक मुद्दों को लेकर फिल्म बनाता रहा हूं वे भारत की किसी भी क्षेत्रीय भाषा में फिल्में बनाने वालों के लिए चुनौतीपूर्ण रहे हैं।

स्त्री-पुरुष संबंध आपकी फिल्मों के केंद्र में हैं। बात अपरुप’ (1981) की हो, ‘फिरंगति’ (1991) की या हाल ही रिलीज हुई शॉर्ट फिल्म दैट गस्टी मार्निंग’ (2016) की, इनमें स्त्री पात्र काफी सशक्त दिखाई देते हैं...


हां, मैं उन सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाना पसंद करता हूं, जो एक फिल्मकार के रूप में मुझे अपील करती हैं और मुझे लगता है कि उस पर फिल्म बनानी चाहिए। जहां तक स्त्री पात्रों की बात है, असम के समाज में स्त्रियों की स्थिति देश के अन्य राज्यों से अलग है। यहां स्त्री-पुरुष संबंधों में समानता है। बचपन से मैंने जो देखा, उसकी तुलना मैं भारतीय सिनेमा में स्त्रियों के चित्रण से करता रहा हूं। जिस रूप में परदे पर उनका चित्रण होता रहा है उसे देख कर मुझे दुख है। मैं अपनी मां के काफी करीब रहा हूं। स्त्रियों का चरित्र जब मैं स्क्रिप्ट में लिखता हूं, अपनी मां को एक रोल मॉडलके रूप में सामने रखता हूं।


न सिर्फ फिल्म में, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर भी आप खुल कर राय रखते आए हैं। आपने नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ आवाज उठाई थी। हाल ही में नगालैंड में सेना की गोली से कई निर्दोष लोगों की मौत हुई। आप क्या कहना चाहेंगे?


एक नागरिक के रूप में मुझे लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं इसकी राजनीति में नहीं जाना चाहूंगा। मैं खुद को मानवतावादी मानता हूं और इस नाते कहीं भी हत्या हो, वह मुझे दुखी करती है। हमें ऐसा कुछ करना चाहिए ताकि शांतिपूर्ण ढंग से समस्या का समाधान हो सके। हमें हिंसा की तरफ नहीं बल्कि बातचीत की तरफ बढ़ना चाहिए।

आपकी फिल्म फिरंगतिऔर सत्यजीत रे की फिल्म आगंतुकको एक साथ राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। आपकी फिल्मों के बारे में रे की क्या प्रतिक्रिया थी?
मेरी उनसे दो बार मुलाकात थी। कलकत्ता में वह मेरी फिल्म देखने आए थे। पर कुछ देर के लिए ही- पांच से दस मिनट। एक बार मेरी उनसे मुलाकात चिदानंद दास गुप्ता ने कराई थी। उन्होंने कहा था, ‘तुममें काफी संभावना है। मैं तुम्हारी फिल्म देख कर बहुत खुश हूं। उनसे प्रशंसा के शब्द सुन कर मैं रात भर सो नहीं सका था। एक तरह से यह मेरे लिए सपने के सच होने जैसा था।



फिल्म इंस्टिट्यूट, पुणे से निकले अडूर गोपालकृष्णन (मलयालम), गिरीश कसरावल्ली (कन्नड़) और आपने खुद असमिया में पैरलल सिनेमा की धारा को पुष्ट किया है। इस यात्रा को आप किस रूप में देखते हैं?

 

क्षेत्रीय भाषा के फिल्मकारों में बड़ा स्ट्रॉन्ग पैशन रहा है कि वे एक अर्थपूर्ण सिनेमा बनाएं जो भारतीय है। यह अडूर गोपालकृष्णन से शुरू हुआ। असल में समस्या यह रही कि पैरलल सिनेमा ठीक से पंख नहीं फैला सका। सरकार सहायता के लिए आगे नहीं आई। माफ कीजिएगा, सच यह है कि सरकार की सिनेमा की जो समझ है वह बहुत ही खराब है। उसे नहीं पता कि देश में इस सशक्त माध्यम का कैसे इस्तेमाल हो। पर ऐसा नहीं कि पैरलल सिनेमा की धारा सूख गई हो, वह अभी भी जारी है। असम, बंगाल, केरल, मणिपुर, मेघालय और मराठी सिनेमा के युवा फिल्मकार नए और अलग विचार लेकर आगे आ रहे हैं।

आहोम साम्राज्य के सेनापति और योद्धा लचित बोरफुकन पर आप लंबे समय से काम करते रहे है, कब तक फिल्म पूरी होने की संभावना है?


मैं इस प्रॉजेक्ट के मध्य में हूं। यह एक ऐतिहासिक फिल्म हैं। इस विषय पर अभी तक सिनेमा नहीं बना है। मैंने स्क्रिप्ट पूरी कर ली है। उम्मीद करता हूं कि वर्ष 2023 तक इसे मैं पूरी कर लूंगा।


आप पर किस भारतीय फिल्मकार का प्रभाव रहा है, जिसका उल्लेख आप करना चाहें?


फिल्म संस्थान, पुणे के दिनों में और बाद के फिल्मी सफर में मैं यह नहीं कहूंगा कि मैं प्रभावित रहा हूं, पर रे और ऋत्विक घटक की फिल्मों में जो पैशन है, उसे मैं पसंद करता रहा हूं।


(नवभारत टाइम्स, 15 जनवरी 2022)

Friday, December 24, 2021

असमिया सिनेमा का समकालीन स्वर

पिछले महीने गोवा में आयोजित 52वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के भारतीय पैनोरमा की उद्घाटन फिल्म के रूप में सेमखोरको चुना गया था. डिमासा भाषा में बनी इस फिल्म को असमिया अभिनेत्री एमी बरुआ ने निर्देशित किया है. बकौल बरुआ  यह फिल्म सेमखोर लोगों की प्रथाओं, रीति-रिवाजों और लोक धारणाओं का प्रतिनिधित्व करती है जो बाहरी दुनिया से 'अछूते' रहना चाहते हैं.डिमासा असम और नागालैंड के कुछ हिस्सों के जातीय-भाषाई समुदाय की एक बोली है.  सेमखोर डिमासा में बनी पहली फिल्म है.

जब रीमा दास की असमिया फिल्म बुलबुल कैन सिंगऔर विलेज रॉकस्टारको राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया तब सबकी नजर समकालीन असमिया फिल्मों की ओर गई. गौरतलब है कि वर्ष 2019 में विलेज रॉकस्टारको भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेजा गया था.  इसी तरह भाष्कर हजारिका की असमिया फिल्म आमिसकी भी खूब चर्चा हुई थी. मांस के रूपक के माध्यम से यह फिल्म समकालीन भारतीय राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों को अभिव्यक्ति करने में सफल है. फिल्म का ताना-बाना मानवीय प्रेम को केंद्र में रख कर बुना गया है.

जहां रीमा दास की फिल्म बुलबुल कैन सिंगअसम के ग्रामीण इलाके में अवस्थित है और किशोर और युवा की वय संधि पर खड़े बोनी, सुमन और बुलबुल की कहानी कहती है, वहीं आमिसमें शहरी इलाके में रहने वाले युवा सुमन, जो एक शोधार्थी है, और पेशे से डॉक्टर निर्मली के मध्य पनपे परकीया प्रेम को रचा गया है. इस विवादास्पद फिल्म ने असमिया सिनेमा के 85 वर्ष के इतिहास में एक तीखे बहस को जन्म दिया. आमिस गुवाहाटी में अवस्थित है जिसे खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है.

असमिया भाषा में बनने वाली फिल्मों में पर्याप्त विविधता रही है जो इस सिनेमा के इतिहास के अनुकूल है. वर्ष 1935 में ज्योति प्रसाद आगरवाला ने पहली असमिया फिल्म जयमती का निर्माण और निर्देशन किया था. उन्होंने फिल्म के तकनीकी पक्ष को सीखने के लिए जर्मनी की यात्रा की थी और हिमांशु राय के साथ रह कर फिल्म निर्माण को सीखा. फिर उन्होंने असम की ओर रुख किया था. आगरवाला के बाद बाद के दशक में प्रवीण फूकन, निप बरुआ और भूपने हजारिका जैसे हस्तियों ने असमिया सिनेमा जगत को संवारा था.

सही मायनों में असमिया सिनेमा को देश-विदेश में प्रसिद्धि जानू बरुआ ने दिलवाई जो पिछले चालीस वर्षों से असमिया भाषा में सिनेमा बना रहे हैं. अब तक उनकी फिल्मों को बारह राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है. फिल्म संस्थान, पुणे से प्रशिक्षण के बाद बरुआ ने पहली फिल्म अपरूप (1982)’ निर्देशित किया था. अपनी कथानक की वजह से यह फिल्म आमिस की तरह ही चर्चित रही. इसमें में भी परकीया प्रेम को दर्शाया गया है. एक विवाहिता स्वेच्छा से दूसरे पुरुष के साथ रहने चली जाती है. उनकी फिल्म सागरलै बहु दूर (1995)’ और हालोदिया चराय बाओ धान खाय (1987)’ को देश-विदेश के फिल्म समारोहों में काफी सराहना मिली. हालोदिया चराय बाओ धान खायअसमिया में बनने वाली पहली फिल्म थी जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए स्वर्ण कमल से नवाजा गया था. बरुआ सामाजिक चेतना से संपन्न फिल्मकार हैं. उनकी फिल्मों में हाशिए का समाज और स्त्री स्वाधीनता का स्वर प्रमुखता से अभिव्यक्त होता रहा है. हिंदी समाज और दर्शकों के बीच बरुआ की फिल्में हालांकि उस रूप में चर्चा का विषय कभी नहीं बनी जैसा कि सत्यजीत रे या मृणाल सेन की फिल्में रही. इसकी एक वजह उत्तर-पूर्व की संस्कृति से अलगाव है जो बॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों में भी दिखाई देती है.

पिछले वर्ष रिलीज हुए निकोलस खारकोंगोर की अखोनीजैसी फिल्म को छोड़ दिया जाए तो बॉलीवुड की चिंता के केंद्र में उत्तर-पूर्व का समाज और संस्कृति कभी नहीं रहा है. प्रसंगवश, वर्ष 1992 में जब बरुआ की फिरंगतिको दूसरी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया गया और सत्यजीत रे की फिल्म आगंतुक  को पहली तो यह कहा गया कि रे की वजह से फिरंगतिसर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार पाने से वंचित रही. हालांकि बरुआ सत्यजीत रे से हुई अपनी मुलाकात को शिद्दत से याद करते हैं. उनके प्रशंसा के शब्द को वे आज भी भूल नहीं पाए हैं और कहते हैं कि मेरे लिए यह सपने के सच होने जैसा था.पर बॉलीवुड की बेरुखी को बरुआ भी बातचीत में रेखांकित करते हैं. वे उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा की समकालीन संस्कृति के बारे में कहते हैं: आपको समझना होगा कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिनेमा का बाजार बहुत छोटा है. लोकल स्तर पर जो फिल्म उद्योग है उस पर सरकार का ध्यान नहीं है. जो फिल्मकार हैं वह व्यावसायिक फिल्मों की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, उन पर हिंदी फिल्मों का असर है. लेकिन कुछ युवा फिल्मकार काफी अच्छा काम कर रहे हैं. उन्हें यदि सहायता मिले तो निस्संदेह अच्छी फिल्में लेकर आएँगे.

सिनेमा बड़ी पूंजी की मांग करता है और निर्माण-वितरण का कारोबार बाजार पर निर्भर है. लेकिन बाजार नहीं होने के बावजूद बरुआ जैसे फिल्मकार असमिया समाज और संस्कृति को सिनेमा के माध्यम से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पटल पर लाने में सफल रहे हैं. सच्चाई यह है कि आज भी सेमखोरजैसी फिल्में बन रही है. यह कहने में कोई संकोच नहीं कि क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्में भारत की विविध संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती हैं, न कि हिंदी में बनने वाली बॉलीवुड की फिल्में. और इस बात से जानू बरुआ भी सहमत हैं.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Friday, November 29, 2019

चुन-चुन खाइयो मांस: आमिस

आमिस 

एक बार मैं एक दोस्त के साथ खाना खा रहा था. अचानक से दाल की कटोरी से उसने झपटा मार के कुछ उठाया और मुँह में डाल लिया. जब तक मैं कुछ समझता, हँसते हुए उसने कहा- चिंता मत कीजिए मैं आपको नहीं खिलाऊँगी. दाल में गलती से एक टुकड़ा मछली का आ गया था.

भाष्कर हजारिका की असमिया फिल्म आमिसदेखते हुए यह प्रसंग मेरे मन में आता रहा. प्रसंगवश, मैं वेजिटेरियन हूँ और मेरी दोस्त उत्तर-पूर्व से थी,  जहाँ पर खान-पान की संस्कृति उत्तर भारतीयों से भिन्न है.

इस फिल्म का मुख्य पात्र सुमन एक शोधार्थी है जो एंथ्रापलॉजी विभाग में उत्तर-पूर्व में मांस खाने की संस्कृतियों के ऊपर शोध (पीएचडी) कर रहा है. निर्मली जो पेशे से डॉक्टर है और स्कूल जाते बच्चे की माँ है अपने वैवाहिक जीवन से नाखुश है. उसका डॉक्टर पति अपने सामाजिक काम से ज्यादातर शहर से बाहर रहता है और निर्मली के जीवन में नीरसता है. उसके जीवन में सुमन का प्रवेश होता है और दोनों के बीच तरह तरह के मांस खाने को लेकर मुलाकातें होती है, प्रेम (?) पनपता है- शास्त्रीय शब्दों में जिसे परकीया प्रेम कहा गया है. लेकिन फिल्म में दोनों के बीच साहचर्य का अवसर कम है और सहसा विकसित प्रेम के इस रूप से खुद को जोड़ना मुश्किल होता है. सिनेमा देश-काल को स्थापित करने में असफल है.  क्या हम इसे खाने के पैशन से विकसित ऑब्सेशन कहें?

खान-पान को लेकर विकसित संबंध को हमने लंच बाक्सफिल्म में भी देखा था, पर आमिस फिल्म के साथ किसी भी तरह की तुलना यहीं खत्म हो जाती है.

इस फिल्म में मांस एक रूपक है जो समकालीन भारतीय राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों को अभिव्यक्ति करने में सफल है. पर यह मानवीय प्रेम के आधे-अधूरे जीवन को ही व्यक्त कर पाता है. क्या संपूर्णता की तलाश व्यर्थ है?  क्या दोनों के बीच प्रेम का कोई भविष्य नहीं?

फिल्म में अदाकारी, सिनेमैटोग्राफी, संपादन और बैकग्राउंड संगीत उत्कृष्ट है. सिनेमा गुवाहाटी में अवस्थित (locale) है, जिसे सिनेमा में खूबसूरती के साथ चित्रित किया गया है. सिनेमा चूँकि श्रव्य-दृश्य माध्यम है इस वजह से महज कहानी में घटा कर हम इसे नहीं पढ़ सकते. जाहिर है आमिस के कई पाठ संभव हैं, पर यह फिल्म अपने अकल्पनीय कथानककी वजह से चर्चा में है. जहाँ अंग्रेजी मीडिया में आमिस को लेकर प्रशंसा के स्वर हैं, वहीं असमिया फिल्मों के करीब 85 वर्ष के इतिहास में इस फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच तीखी बहस जारी है.

परकीया प्रेम को लेकर पहले भी फिल्में बनती रही हैं, साहित्य लिखा जाता रहा है. फिल्म खान-पान की संस्कृति को लेकर किसी नैतिक दुविधा या समकालीन राजनैतिक शुचिता पर चोट करने से आगे जाकर लोक में व्याप्त तांत्रिक आल-जाल में उलझती जाती है. मिथिला की बात करुँ तो कुछ जातियों में शादी से पहले वर-वधू की अंगुली से थोड़ा सा नाम मात्र का खून (नहछू?) निकाला जाता है, जिसे खाने में मिला कर एक-दूसरे को खिलाया जाता है. यह परंपरा के रूप में आज भी व्याप्त है. मिथिला की तरह असम में भी तंत्र-मंत्र का प्रभाव रहा है और ख़ास तौर पर कामरूप प्रसिद्ध रहा है. फिल्म में मांस के बिंब को प्रेमी-प्रेमिका के (स्व) मांस भक्षण के माध्यम से स्त्री-पुरुष के संयोग की व्याप्ति तक ले जाना, दूर की कौड़ी लाना है. कला में तोड़-फोड़ अभिव्यक्ति के स्तर पर जायज है, पर कल्पना के तीर को इतना दूर खींचना कि तीतर और बटेर की जगह मानव के मांस के टुकड़े हाथ आए तो इसे हम क्या कहेंगे? इसे हम अभिनव प्रयोग तो नहीं ही कह सकते.

प्रेम के स्याह पक्ष को चित्रित करते हुए यह फिल्म आखिर में एब्सर्ड की  तरफ मुड़ जाती है.

प्रेम में कागा से चुन-चुन खाइयो मांसकी बात करते हुए दो अँखियन को छोड़ने की बात भी की गई है जिसे पिया मिलन की आस है. यहाँ तो प्रेम उन आँखों को ही निगलना चाहता है. आँखें ही नहीं बचेंगी तो फिर दर्शक (प्रेमी) देखेगा क्या?

(जानकी पुल पर प्रकाशित)