Monday, November 05, 2012

प्रेम की भाषा: मैथिली



बोली, बानी और भाषा की बात हो तो स्वभाविक है कि मैथिली की चर्चा होगी. इस बार  दिल्ली में संपन्न हुए भारतीय भाषा महोत्सव, समन्वय की मूल अवधारणा इसी के इर्द-गिर्द थी. एक सत्र ‘प्रेम की अपरूप भाषा: भाषा का अपरूप प्रेम’ के ऊपर था. अपरूप शब्द विद्यापति की कविताओं में बार-बार आता है और यहीं से यह शब्द सूरदास की कविताओं की तरफ भी जाता है. आश्चर्य नहीं कि हिंदी की चर्चित प्रेम कहानी ‘रसप्रिया’ में फणीश्वरनाथ रेणु भी चरवाहे मोहना को देख कर अपरूप रूप की बात करते हैं.

बहरहाल, विद्यापति प्रेम और श्रृंगार के कवि के रूप में इतने प्रसिद्ध हुए कि उनके व्यक्तित्व और साहित्य के अन्य पहलूओं की उपेक्षा हुई. निस्संदेह उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति ‘पदावली’ प्रेम का काव्य है. इस काव्य को उन्होंने देशी भाषा मैथिली में लिखा था. प्रेम और भाषा को लेकर विद्यापति जितने सजग थे, भारतीय भाषाओँ में उनका कोई सानी नहीं. मध्ययुग में जब देशी भाषाओं की लहर पूरे देश में फैल रही थी तो इसके अगुआ विद्यापति थे. संस्कृत के वे पंडित थे लेकिन उनका ‘भाखा प्रेम’ अद्वितीय था. उनके ही शब्दों में कहें तो अपरूप था.’  कबीर ने बाद में ‘संसकिरत है कूप जल, भाखा बहता नीर कहा.’ विद्यापति ने संस्कृत को कूप जल कहे बिना कहा- देसिल बयना सब जन मिट्ठा. एक मायने में भारतीय भाषाओं के समन्वय की वे वकालत कर रहे थे, जो वर्तमान संवेदनाओं के नजदीक कही जा सकती है. 

(समन्वय, 2-4 नवंबर 2012)
मैथिली भाषा अपनी मिठास के लिए जानी जाती है. पर ऐसा नहीं कि सिर्फ उसमें कोमलकांत पदावली में गीत ही लिखे गए और सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति नहीं हुई. विद्यापति दरबारी कवि थे. उनसे कबीर की तरह सामाजिक सच को ठोस रूप में हमारे सामने लाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन अपनी महेशवाणी और नचारी में मध्ययुग के समाज की गरीबी, पराधीनता और विभेद को जिस रूप में उन्होंने सामने रखा वह विशेष अध्ययन और शोध की मांग करता है. 

उनकी कविता वस्तुत: सामंती मनोवृत्ति के विरोध की कविता है. मध्ययुगीन समाज में वे नारी के दुख के भी कवि हैं. तुलसीदास ने बहुत बाद में कहा- पराधीन सपनेहु सुख नाहिं. सामंती समाज में स्त्रियों की वेदना को इन शब्दों में विद्यापति ने व्यक्त किया- कौन तप चूकलहूँ भेलहूं जननी गे (हे विधाता, तपस्या में कौन सी चूक हो गई कि स्त्री होके जन्म लेना पड़ा!)

विद्यापति ही अपने अराध्य शिव से कह सकते हैं कि ‘क्यों भीख मांगते फिर रहे हो/ खेती करो इससे गुण गौरव बढ़ता है’ (बेरि बेरि अरे सिब हमे तोहि कइलहूँ, किरिषि करिअ मन लाए/ रहिअ निसंक भीख मँगइते सब, गुन गौरब दुर जाए).

विद्यापति और शिव को लेकर कई तरह के मिथक मिथिला के समाज में आज भी प्रचलित है. कहते हैं कि उनके गीतों और कविताओं को सुनने खुद शिव एक नौकर, उगना का रूप धर उनके यहाँ रहने आए थे. मिथिला की संस्कृति के निर्माण में विद्यापति की एक बड़ी भूमिका है. आज भी मिथिला में शादी-विवाह या खेती-बाड़ी विद्यापति के गीतों के बिना नहीं होती.

मधुबनी जिले में इसी मिथक को लेकर ‘उगना महादेव’ का एक प्राचीन मंदिर हैं. मंदिर के प्रांगण में एक मूर्ति विद्यापित की भी है. ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि हमारा समाज कवि की मूर्ति भी उसी प्रांगण में स्थापित करे जहाँ उसके अराध्य हो. 

साहित्य के अनुरागी और शिव के भक्त एक साथ वहाँ जाते हैं. वैसे ही जैसे कि दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सिर नवाने वाला अमीर खुसरो की कब्र पर अकीदत करना नहीं भूलता.

(चित्र साभार आईएचसी, कथक गुरु शोभना नारायण 'उगना रे' की प्रस्तुति में. ब्लॉग लेखक महोत्सव में परिचर्चा के दौरान. जनसत्ता के समांतर स्तंभ में 7 नवंबर 2012 को प्रकाशित)

Saturday, September 22, 2012

शिमला में निर्मल वर्मा

सितंबर की इस शाम बारिश की गंध और हवा में रोमांस है. बादलों का घेरा शहर को अपने आगोश में लिए हुए हैं. शर्ट में ठंड लगती है पर स्वेटर या स्वेट शर्ट पहनने का मन नहीं होता. ऊंची पहाड़ियों पर देवदार के पेड़ शांत और स्थिर खड़े हैं. जैसे वे सिर्फ आपको सुनेंगे भर, कहेंगे कुछ नहीं. एक आकाशधर्मा गुरु की तरह जिसके पास आपके विचारों, भावों को सुनने का पर्याप्त समय होता है.

रात की इस खामोशी और अंधेरे में गेस्ट हाउस में सिर्फ हमारी साँसे सुनाई दे रही है. पता नहीं बगल के कमरे में कोई है भी या नहीं. मैंने धीरे से रीना से कहा- 'भूत से डर तो नहीं लगता!

दिल्ली की भागमभग से दूर, मैदानों में पले-बढ़े हमारे लिए हिल स्टेशनों की नीरवता एक ख्याल सी लगती है. यूँ तो शिमला कई बार आया, पर शादी के बाद यह शिमला की पहली यात्रा थी. कुछ शब्द हमारी जबान पर मुश्किल से चढ़ते हैं. मेरे लिए हनीमून एक ऐसा ही शब्द है.

बहरहाल, छाता लेकर जब हम अगले दिन शहर घूमने निकले तो धूप के छोटे-छोटे टुकड़े खिले थे. आसमान पूरी तरह साफ नहीं था. कुछ दिनों से यहाँ बारिश हो रही थी. पर ऐसा क्यों लग रहा है कि शिमला से हर वर्ष शिमला छीजता जा रहा है. या यह सिर्फ मेरे मन का वहम है!

शहर तो वही है. मॉल रोड, गिरजा घर, गेयटी थियेटर, पुरानी किताबों की दुकानें और दूर  सामने की जाखू की पहाड़ी पर स्थित हनुमान की विशाल मूर्ति.  फिर ऐसा क्यों लगता है मुझे?

शाम होते ही मॉल रोड पर सैलानियों की भीड़ इतनी कि पाँव रखने की जगह नहीं. शोर-शराबा और बीयर की गंध!  रात होते ही सड़कों पर आवारा कुत्ते. पता नहीं पहाड़ पर स्थित शहरों में रोमांस होता है या उसकी ओबा-हवा में जो हमें अपनी ओर खींचती है.

अपने अंदर इतिहास की कई गाथाएँ समेटे वॉयसराय लॉज (वर्तमान में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान) एक ऐतिहासिक धरोहर (हेरिटेज ब्लिडिंग) है. पर बाहर से यह जितना भव्य दीखता है अंदर से उतना ही खोखला. छत से टप टप रिसता पानी, लकड़ियों में लगे घुन और रख-रखाव की बुरी व्यवस्था इस इमारत की बदहाली की कहानी बयां करती है. कहते हैं कि निर्मल वर्मा ने अपने चर्चित उपन्यास ‘लाल टीन की छत’ यहीं रह कर लिखा था.

निर्मल वर्मा की कहानियों, यात्रा वृत्तांतों में शिमला कई बार, कई तरहों से आया है. बचपन की स्मृतियाँ किसी भी लेखक, रचनाकर के लिए बेहद कीमती होती हैं. और यदि वह रचनाकार निर्मल वर्मा की तरह प्रतिभावान हो तो रचनाकार की स्मृतियों के साथ शहर एक पाठक के मन में अपना संसार गढ़ते हैं.

शिमला जब-जब गया मन हर बार लाल टीन की छत वाले निर्मल वर्मा के उस शहर को ढूंढ़ता रहा. शाम में मॉल रोड स्थित गेयटी थिएटर में निर्मल वर्मा की दो कहानियों ‘धूप का एक टुकड़ा’ और ‘डेढ़ इंच ऊपर’ का मंचन है. बाहर सड़कों पर जितनी ही ज्यादा भीड़ है, इस खूबसूरत थिएटर के अंदर उतने ही कम लोग. 

नाटक खत्म होने के बाद थिएटर से निकल कर हम सामने ही एक किताब की दुकान में घुस गए. तरह तरह की किताबों से सजे इस दुकान में निर्मल वर्मा की कोई किताब नहीं मिली. मैंने दुकानदार से लगभग चिढ़ कर कहा, ‘आपका शहर निर्मल वर्मा को याद कर रहा है और आपके यहाँ उनकी एक भी किताब क्यों नही है.

जवाब में यह चिर-परिचित जुमला सुनने को मिला- हिंदी की किताबें कहाँ बिकती हैं!

‘चीड़ों पर चाँदनी’ संस्मरण में निर्मल वर्मा ने लिखा है, ‘क्या यह शिमला है-हमारा अपना शहर-या हम भूल से कहीं और चले आए हैं? 

इस बार शिमला से आने के बाद मेरे मन में यह सवाल गूँजता रहा.

(समांतर स्तंभ के तहत जनसत्ता, 26 सितंबर 2012 को प्रकाशित)

Sunday, July 29, 2012

दम तोड़ती सिक्की कला


उत्तरी बिहार के दरभंगा, मधुबनी और सीतामढ़ी जिले की महिलाएँ मिथिला पेंटिग के साथ-साथ वर्षों से सिक्की कला से जुड़ी रही है. जहाँ मिथिला पेंटिंग को देश-विदेश में प्रतिष्ठा और सम्मान मिला वहीं यह कला शुरु से ही संरक्षण और सहयोग के अभाव से जूझती रही है.

इस कला में एक तरफ मिथिला की ग्रामीण महिलाओँ की रचनात्मक ऊर्जा और लोक चेतना की झलक मिलती है वहीं ये उनके लिए मनोरंजन और समय के सदुपयोग का एक जरिया भी है. सदियों से एक परंपरा के रुप में यह कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक फलती-फूलती रही. रंग-बिरंगी सिक्की को टकुआ से गूंदती, मौनी-पौती बनाती दादी-नानी की एकाग्र आँखें अब भी लोगों के जेहन में है. पर दो दशकों में मिथिलांचल के गाँवों से भारी मात्रा में लोगों के पलायन और अपनी जड़ और जमीन से उखड़ने की वजह से यह कला दम तोड़ रही है. पहले मिथिला के हर गाँव में ‘सिक्की आर्ट’ विस्तार पाती थी, लेकिन अब यह महज कुछ गाँवों में सिमट कर रह गई है. वर्तमान में रैयाम, उमरी बलिया, सरिसबपाही, सुरसंड, यदुपट्टी और करुणा-मल्लाह जैसे कुछ गाँव इस कला के केंद्र हैं. हालांकि हाल के कुछ वर्षों में सिक्की कला को एक व्यवसायिक आधार मिला है जिससे इससे जुड़ी महिलाओं की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आया है.

मधुबनी जिले के बेलारही गाँव की 92 वर्षीया जानकी देवी वर्षों तक इस कला से जुड़ी रही. वृद्धावस्था के कारण अब वह इस कला को नहीं साधती पर जैसे ही मैंने उनसे सिक्की कला का जिक्र छेड़ा वो मुस्कुरा दी और बोली, “कैसे आपको इसकी याद आई. अब तो कोई याद नहीं करता.” वे कहती हैं कि उन्होंने इसे खेलते-कूदते बचपन में अपनी चाची से सीखा था पर अब युवतियों में इसके प्रति कोई आकर्षण नहीं दिखता.

जहाँ बारिश की प्रचुरता हो सिक्की की उपज वहाँ ज्यादा होती है. विशेष रुप से नदी, तालाबों के कछार पर दलदल जमीन में इसकी पैदावार होती है. मिथिलांचल नदी और तालाबों के लिए विख्यात है और यहाँ सिक्की प्रचुर मात्रा में मिलती रही है, फलत: सिक्की कला विशेष रूप से उत्तरी बिहार की उपज है! जो इसे देश के अन्य भागों में बांस, सरकंडा, मूंज या खर से बनाई जाने वाली कलाकृतियों से विशिष्ट बनाता है.

सिक्की कलाकार सुनहरे रंग की सिक्की को पहले विभिन्न रंगों से रंगते हैं फिर टकुआ (पाँच-छह इंच लंबी लोहे की मोटी सुई जिसके पेंदी में चौड़ा बेंट लगा रहता है, ताकि पकड़ने में सुविधा हो) और कैची की सहायता से वे तरह तरह की आकृतियाँ बनाते हैं. मिथिला पेंटिंग में जिन विषयों का इस्तेमाल होता है अमूमन उसे ही कलाकार सिक्की आर्ट में भी उकेरते रहे हैं. मसलन, मछली, सूर्य, कदंब,आम का पेड़, आँख, गुलदान, दुर्गा, शिव, नाग-नागिन, कछुआ आदि. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मिथिला पेंटिंग की तरह ही इसके विषय-वस्तु में भी विस्तार आया है. अब वे इसे बाजार की माँग के मुताबिक भी तैयार करने लगे हैं.

इस कला की विशिष्टता यह है कि जहाँ एक ओर इसे घर-दीवारों की सजावट के रुप में काम में लिया जाता है, वहीं इसका इस्तेमाल, ड्राइ फ्रूटस, मसाले, गहने, फूल-पत्ती आदि रखने के काम में लिया जाता रहा है.

60-70 के दशक में इस कला को मधुबनी ज़िले में रैयाम गाँव की विंदेश्वरी देवी और सीतामढ़ी जिले के सुरसंड की कुमुदनी देवी जैसी प्रतिभा मिली जिन्होंने इसे राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया. दोनों ही कलाकारों को राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया था. इन्हीं दशकों में गंगा देवी और सीता देवी भी मिथिला पेंटिंग को बुलंदी पर पहुँचा रही थी. 

विंदेश्वरी देवी के भाई रामानंद ठाकुर बताते हैं कि कला के पारखी और कलाविद उपेंद्र महारथी ने विंदेश्वरी देवी को पटना स्थित ‘शिल्प अनुसंधान संस्थान’ से जोड़ा था और उनकी बनाई आदमकद शंकर की मूर्ति की काफी चर्चा हुई थी. रामानंद ठाकुर बताते हैं “1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के हाथों विंदेश्वरी देवी को पुरस्कार दिया गया था, लेकिन उसके बाद सरकार ने कोई सुध नहीं ली.” उन्होंने बताया कि विंदेश्वरी देवी ने इस कला को लेकर जर्मनी और अमेरीका की भी यात्रा की थी. विंदेश्वरी देवी के परिवार की महिलाएँ और इस गाँव की अन्य 25-30 महिलाएँ अब भी सिक्की कला से जुड़ी हुई है. पिछले पाँच सालों से गरीबों और ग्रामीण महिलाओं के उत्थान के लिए बिहार सरकार की पहल ‘जीविका’ ने इस गाँव की महिला कलाकारों में एक नई ऊर्जा भरा है. रैयाम की सुधा देवी बताती हैं, “15-20 वर्ष पहले लगने लगा था कि यह कला अब समाप्त हो जाएगी, लेकिन फिर से जीविका ने हमें एक आशा दी है.” वो बताती हैं “जीविका ने हमें एक बड़ा बाजार मुहैया कराया है और साथ ही हमें नए डिजाइन भी इनसे मिलता है जिससे हम इस कला में रुप में तरह तरह के प्रयोग कर रहे हैं.” इस गाँव के कलाकार दिल्ली, कोलकाता, चैन्नई, गोवा आदि शहरों में होने वाली विभिन्न प्रदर्शनियों में अपनी कला लेकर जाते रहे हैं.

मिथिला में शादी-विवाह के अवसर पर और लड़कियों के ‘द्विरागमन (गौना)’के समय दहेज के रुप में सिक्की से बनी कलाकृतियों को भेजने का पुराना रिवाज है जो आज भी कायम है. हालांकि कलाकारों का कहना है कि इस कला में जितनी रुचि इस क्षेत्र के बाहर, देश-विदेश के लोगों की है उतनी स्थानीय स्तर पर नहीं. स्थानीय स्तर पर इस कला का कोई बाजार अभी तक विकसित नहीं हो पाया है.

पिछले दिनों बिहार के 100 साल पूरे होने पर दिल्ली हाट में एक प्रदर्शनी लगाई गई थी जिसमें बिहार के विभिन्न कला रुपों की झांकी थी. प्रदर्शनी में जहाँ मिथिला पेंटिंग के कई स्टॉल थे वहीं सिक्की कला का कोई नामलेवा नहीं था.

कुमुदनी देवी के पुत्र और मिथिला कलाकार चक्रधर लाल कहते हैं, “जितना समय इस कला को साधने में लगता है उतना मेहनताना नहीं मिलता. इसलिए अब लोगों की रुचि इसमें नहीं रही है. इतने ही समय में मिथिला पेंटिंग बनाने पर ठीक ठाक कमाई हो जाती है.” चक्रधर लाल कहते हैं कि इस कला को व्यवसायिक रुप से बाजार मुहैया कराने की जरुरत थी और कलाकारों को संरक्षण दिया जाना चाहिए था पर सरकार ने गैर सरकारी संस्थानों के भरोसे सब कुछ छोड़ रखा है. उनकी चिंता कलाकारों की कम और खुद के हित साधने की ज्यादा है.

E book: Link http://pothi.com/pothi/book/ebook-arvind-das-gardish-mein-ek-chitra-shaili

(जनसत्ता, रविवारी में 29 जुलाई 2012 को प्रकाशित)

Tuesday, July 17, 2012

विचलन के दौर में विचारधारा


पिछले दिनों मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने जेएनयू स्थित अपनी छात्र इकाई एसएफआई को भंग कर युवा नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया. जेएनयू के छात्र रहे सीपीएम के एक युवा नेता प्रसेनजीत बोस ने राष्ट्रपति पद के यूपीए प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी को दिए जा रहे पार्टी के समर्थन के खिलाफ खुलेआम आवाज उठाई थी और जेएनयू के छात्र नेताओं ने भी प्रसेनजीत बोस को अपना समर्थन दिया था.

जेएनयू को एक बौद्धिक और प्रगतिशील तेवर देने में एसएफआई की एक बड़ी भूमिका रही है. सीपीएम के दो कद्दावर नेता प्रकाश करात और सीताराम येचुरी ने वाम राजनीति का ककहरा यहीं सीखा था और वे छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे. गौरतलब है कि आपातकाल के दौरान कांग्रेस विरोध के ये अगुआ थे.

हाल ही में एक लेख में जेएनयू के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में एनसीपी के नेता और राज्यसभा सांसद डीपी त्रिपाठी ने सीपीएम के खिलाफ युवा छात्र नेताओं के इस कदम को अप्रत्याशित और ‘कॉमन सेंस से रहित’ कहा.  उनका कहना है कि जेएनयू के छात्र नेता समय की नब्ज नहीं पहचान रहे!

जेएनयू परिसर वामपंथी रुझानों के लिए शुरुआती दिनों से ही जाना जाता रहा है. वर्ष 1971 में जबसे जेएनयू छात्रसंघ अस्तित्व में आया कैंपस में वामपंथी पार्टियों का वर्चस्व रहा. लेकिन जहाँ 90 तक चुनाव मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की छात्र इकाई एसएफआई और फ्री थिंकर्स के बीच मुकाबले तक सीमित रहता था, 90 के बाद एबीवीपी, एनएसयूआई और भाकपा माले की छात्र इकाई आइसा के स्वर और नारे भी कैंपस में सुनाई पड़ने लगे. राष्ट्रीय राजनीति में जो मंडल और कमंडल की अनुगूंज थी वह कैंपस तक पहुँचने लगी. इन वर्षों में दक्षिणपंथी राजनीति ने कैंपस में सिर उठाने की कोशिश की, लेकिन एक-दो अपवादों को छोड़ छात्र संघ चुनावों में दबदबा विशेष कर एसएफआई का ही रहा.

कुछ महीने पहले चार वर्षों के अंतराल पर हुए जेएनयू छात्र संघ चुनाव में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के प्रत्याशी चारों प्रमुख पदों पर काबिज रहे. एसएफआई की बुरी हार हुई. इससे पहले भी नवंबर 2007 में हुए चुनाव में सिंगुर और नंदीग्राम में सीपीएम की नीतियों के खिलाफ कैंपस में छात्रों ने एसएफआई को नकारा था और आइसा की जीत हुई थी. प्रेसनजीत बोस ने भी सिंगूर और नंदीग्राम में जो किसान विरोधी नीतियाँ सीपीएम ने अपनाई थी उसे लेकर पार्टी को कोसा है.

राजनीतिक नारे अपने समय की राजनीति को बयां करने में कई बार घोषणा पत्रों से ज्यादा प्रभावशाली और सटीक होते हैं. कहते हैं कि वर्ष 1992 में जेएनयू छात्रों का एक नारा था,  ‘जब लाल लाल लहराएगा तो होश ठिकाने आएगा!’ नव उदारवादी नीतियों की पृष्ठभूमि में यह नारा वामपंथियों के जोश और जुनून को व्यक्त करता था. लेकिन नवउदारवादी नीतियों के 20 वर्षों के बाद होने वाले इस चुनाव के दौरान और ‘प्रेसिडेंशियल डिबेट’ में एसएफआई की तरफ से ऐसा कोई नारा सुनाई नहीं पड़ा जो देश-दुनिया के सरोकारों को स्वर दे सके. बस, एक नए विहान का वादा था!

जेएनयू की छात्र राजनीति हाशिए पर रहने वालों के प्रति अपने सरोकार और सक्रियता के लिए जानी जाती रही है. लेकिन इन वर्षों में बाजार और कैरियर का दबाव वाम कार्यकर्ताओं पर भी भारी पड़ा है. पिछले वर्षों में जेएनयू के आस-पास की दुनिया भी बड़ी तेजी से बदली है. जेएनयू के ठीक पीछे वसंत कुंज में बने बड़े-बड़े मॉल और आस-पास दिल्ली में आई 'खुशहाली' से एक समय टापू माने जाने वाले यह कैंपस भी अछूता नहीं रहा है. ऐसे में आश्चर्य नहीं कि कामरेडों को कैरियर की चिंता ज्यादा और देश-दुनिया की चिंता कम ही सताती रही! कई छात्र बताते हैं कि अब तो ज्यादातर कामरेड राजनीति को अपनी बायो-डाटा में एक और उपलब्धि के रूप में जोड़ते हैं, ताकि किसी विश्वविद्यालय में या गैर सरकारी संगठनों में नौकरी मिलने में आसानी रहे. ऐसे में सत्ता के नजदीक रहने में ही ये भी अपनी भलाई समझते रहे. 

वामपंथी बुद्धिजीवी और नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान सेंट स्टीफेंस कॉलेज के छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे अरविंद एन दास ने डीडी कौंसाबी के हवाले से अपने एक लेख में लिखा है कि ‘शुरु से ही जेएनयू में ऑफिशियल मार्क्सवादी सत्ता के इशारों पर काम करते रहे...चंद्रशेखर जैसे छात्रों ने जब किसानों के बीच जाकर उग्र राजनीतिक एक्टिविज्म और अकादमिक सिद्धांतों के बीच तालमेल बनाई तब कहीं जा कर जेएनयू कुछ समय के लिए अपनी खोई जमीन को पुन: पा सका.'  कैंपस के अंदर आज भी छात्र चंद्रशेखर के जीवन और उनके जुझारू व्यक्तित्व को याद करते है. 'चंदू तुम जिंदा हो, खेतों में खलिहानों में छात्रों के अरमानों में', ये नारा आइसा आज भी दोहराते नहीं थकती. चंद्रशेखर दो बार आइसा से छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए थे. वर्ष 1997 में सिवान में कथित तौर पर शहाबुद्दीन के गुंडों ने तब उनकी नृशंस हत्या कर दी थी जब वे एक राजनीतिक सभा को संबोधित कर रहे थे. एसएफआई चंद्रशेखर जैसे छात्र नेता को ढूंढने में विफल रहा है जो अकादमिक वामपंथ के सिद्धांतों और राजनीतिक पक्षधरता को मूर्त रूप दे सके. 

बाजारीकरण और विचारधाराओं के विचलन के इस दौर में ‘ऑफिशियल लेफ्ट’ ने जो रास्ता अख्तियार किया है उसके खिलाफ जाकर एसएफआई के कामरेडो ने असल में जेएनयू के बहुसंख्यक छात्रों की आवाज उठाई है. कैंपस में खोई हुई जमीन को पुन: पाने का एसएफआई का यह एक प्रयास था, जिसे सीपीएम के अलाकमान ने मटियामेट कर दिया. जब देश के अन्य हिस्सों में सीपीएम के किले ढह रहे हैं, वाम के इस गढ़ में युवा कामरेडो के खिलाफ जाकर सीपीएम ने कितना सही कदम उठाया है यह समय के गर्भ में है.  
 (जनसत्ता के समांतर स्तंभ में 24 जुलाई 2012 को प्रकाशित)

Tuesday, April 24, 2012

सपनों का समंदर: कोलंबो डायरी


शाम हो रही है और थोड़ी बूंदा बांदी भी. समंदर के  किनारे करीब डेढ़ किलोमीटर में फैले, साफ-सुथरे गॉल फेस पर प्रेमी जोड़े दुनिया से बेखबर छाता हाथ में लिए खुद  में मशगूल हैं. 

ज़मीज़ा कहती है कि समंदर की लहरें आपको अपनी ओर खींचती है. वे कराची की हैं और लहरों से उनका पुराना वास्ता है. मैं उनकी बातों पर यकीन करता हूँ.

मुझे करुत्तम्मा और परीकुट्टी की याद हो आई.

स्कूल के दिनों में जब पहली बार तकषी शिवशंकर पिल्लई का कालजयी उपन्यास चेम्मीन (मछुआरे) पढ़ा था तब मन समंदर देखने को मचल उठा था. करुत्तम्मा और परीकुट्टी का रोमांस हमें अपना लग रहा था. तब पढ़ कर खूब रोया था.

मछुआरे और उनके जीवन को तो हमने देखा था, पर समंदर और उसकी आबो-हवा से हम अपरिचित रहे.

उत्तरी बिहार के हमारे आँगन में नदी बहती थी. कमला-बलान, कोसी, गंडक, गंगा का पानी पीते और संग खेलते हम बड़े हुए पर समंदर हमारे सपनों में पलता रहा.

कोलंबो के जिस गॉल फेस होटल में मैं रुका हूँ वह एक ऐतिहासिक धरोहर है. करीब 150 साल पुराना. कभी चेखव, यूरी गैगरिन, नेहरु जैसे लोग यहाँ रुके थे...आज की रात मैं भी यहीं हूँ, लेकिन इतिहास हमें कहां याद रखेगा!

बहरहाल, इस होटल का बरामदा सीधे लगभग समंदर में जाके खुलता है. बस दस फर्लांग की दूरी पर समंदर का अपार साम्राज्य.

मछलियों की गंध और लहरें मुझे छूती निकल जाती है. यूँ तो मैं मछली नहीं खाता पर बचपन से ही मछली की गंध अच्छी लगती रही है. घर में यात्रा से पहले मछली देखना शुभ माना जाता था. 

सामने ठेले पर तला हुआ झींगा (फ्राइड प्रॉन) बेचने वाला वृद्ध मुंह बिचका कर इस बारिश को कोस रहा है.

अब बारिश तेज हो रही है. मेरे पास छाता नहीं है, इसलिए बारिश से बचने के लिए मैं किसी तरह उस ठेले की आड़ में खड़ा हो गया. बूढ़े व्यक्ति ने ठेले के ऊपर लगे पन्नी को और खोल दिया है. उसकी भाषा मैं नहीं समझ पता,  न वह मेरी. मैंने बस मुस्कुरा दिया.

अभी मानसून नहीं आया है, पर लोग कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन का ये असर है. पिछले दो-तीन दिनों से  यहाँ काफी बारिश हो रही है. 

रात ढल गई है. पर बारिश से समंदर की नींद में कोई खलल नहीं पड़ता. दरअसल उसे नींद आती ही कहां है! कभी खरगोश के शावक की तरह कोई झक सफेद गुच्छा मेरी ओर लंबी छलाँगे लगाता दिखता है, तो कभी बूढ़ी दादी की तरह किसी बच्चे पर कुपित.

बाहर कोलंबों की सड़कों पर कार, बसों, और टुक टुक की हल्की शोर के बीच एक ठहराव  है.  लोगों के मुस्कुराते चेहरे पर विषाद झलकता है. 

उत्तरी श्रीलंका में एलटीटीई के साथ संघर्ष को खत्म हुए तीन वर्ष हो गए पर कोलंबों की फिजा में उदासी अब भी छाई है.  लोग युद्ध के बारे में बात नहीं करना चाहते.

शहर की सड़कों पर शांति भले दिखे पर समंदर की लहरों में शोर है.  मेरी खिड़की से भी समंदर झांक रहा है. लहरों की झंझावात और चीख मुझे सुनाई दे रही है. मैंने एसी बंद कर दिया है, खिड़की खुली छोड़ दी है और सोने की कोशिश कर रहा हूँ.
(जनसत्ता, समांतर स्तंभ में 4 मई 2012 को प्रकाशित)

Saturday, April 14, 2012

दंगों के दस बरस और मीडिया का मोदी प्रेम


हाल ही में दो खबरों ने खूब सुर्खियाँ बटोरी हैं. पहली, चर्चित अमेरिकी पत्रिका टाइम के कवर पृष्ठ पर गुजरात के विवादास्पद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर और दूसरी दुनिया भर में सौ प्रभावशाली व्यक्तियों के चुनाव के लिए टाइम पत्रिका के ही करवाए ऑन लाइन पोल में नरेंद्र मोदी को सबसे ज्यादा मिले नकारात्मक वोट रहे.

इन्हीं दिनों इंडिया टुडे, कारवां और आउटलुक पत्रिकाओं के कवर पर भी नरेंद्र मोदी छाए हुए रहे.  इंडिया टुडे में जहाँ एक ओपिनियन पोल के हवाले से प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को लोगों की पहली पसंद बताया गया. वहीं कारवां और आउटलुक पत्रिका ने गुजरात नरसंहार और मोदी की छवि को लेकर कुछ तल्ख सवाल किए. 

जाहिर है कि गुजरात नरसंहार की दसवीं बरसी पर नरेंद्र मोदी एक बार फिर से खबरों में हैं और मीडिया के अंदर राय बंटी हुई है. पर इन खबरों की अंत: प्रवाहित धारा में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रुप में खुद को ‘ब्रांडिंग’ करने पर जोर और उसमें मीडिया की सहभागिता चकित करती है.  इससे पहले उन्होंने इसी पहल के तहत सद्भावना यात्रा और सम्मेलनों का आयोजन किया जिसे मीडिया ने हाथो हाथ लिया.

वर्ष 2001-02 के दौरान भारतीय जनसंचार संस्थान में एक छात्र के रुप में हम पत्रकारिता के सिद्धांतों, तथ्य और सत्य के बीच संबंधों और इस पेशे से जुड़े नीतिगत मसलों से उलझ रहे थे. देश में अन्य लोगों की तरह हमने टेलीविजन पर गुजरात में लोगों को लूट पाट में शामिल होते, दंगा भड़काते, और प्रशासन की विफलता को देखा. एक छात्र के नाते हम अपनी कक्षा में रिपोर्टिंग के सिद्धांतों और पत्रकार की भूमिका वगैरह पर शिक्षकों-पत्रकारों से बहस किया करते थे. उसी दौरान देश के सबसे ज्यादा बिकने वाले एक अखबार के समाचार संपादक हमें पढ़ाने आए थे. हमने उनसे सवाल किया था कि ‘अखबार के संपादक दंगों को लेकर मुख्यमंत्री की भाषा और उनकी टोन में क्यों लिख रहे हैं.” इसका जवाब उन्होंने नहीं दिया पर तब हमें पता था कि उस अखबार के संपादक भारतीय जनता पार्टी के राजसभा में सांसद थे!

बहरहाल, दंगों के दौरान भाषाई पत्रकारिता की संदिग्ध भूमिका हमें अचंभित नहीं करती पर दस  साल बाद टाइम जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का नरेंद्र मोदी के एक प्रधानमंत्री के रुप में प्रोजेक्ट करना आश्चर्यचकित करता है. ऐसा लगता है कि लोकतंत्र, सहिष्णुता और सद्भाव का पाठ पढ़ाने वाला मीडिया एक चक्र पूरा कर अब मोदी की विरुदावली गाने में लगा हुआ है. इससे भूमंडलीकरण के रथ पर सवार मीडिया के चरित्रगत विशेषता का भी पता चलता है.

कोई भी पाठक यदि सरसरी तौर पर भी टाइम के लेख को पढ़े तो उसे समझने में यह देर नहीं लगेगी कि यह एक महज पीआर (जन संपर्क) का काम है जिसे नरेंद्र मोदी के मीडिया मैनेजरों ने बखूबी अंजाम दिया है.  गौरतलब है कि इस साल के आखिर में गुजरात में चुनाव होने वाले हैं और अगले साल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी का कार्यकाल खत्म होने वाला है. स्व घोषित ‘विकास पुरुष’ नरेंद्र मोदी जहाँ गुजरात की सत्ता ऐन-केन-प्रकारेण फिर से अपने पास रखने की कोशिश में हैं वहीं भाजपा के अध्यक्ष के रुप में अपनी दावेदारी भी पेश करने में वे लगे हैं.  ऐसे में मीडिया से दूर रहने वाले मोदी मीडिया के इस्तेमाल को लेकर तत्पर हैं, वहीं ऐसा लगता है कि मुख्यधारा की मीडिया उन्हें नाराज और निराश नहीं करना चाहती.

टाइम पत्रिका ने मोदी के शान में कसीदे काढ़ते हुए लिखा है, “ हालांकि, ज्यादातर भारतीय नेताओं से अलग मोदी अपनी आस्था को सबके सामने दिखाते नहीं फिरते. उनके कार्यालय में कोई धार्मिक मूर्ति नहीं है, बस उनके हीरो दार्शनिक स्वामी विवेकानंद की दो प्रतिमा कार्यालय की शोभा बढ़ाती है.”

इसी लेख में रिपोर्टर लिखता है, ‘यह पूछने पर कि वर्ष 2002 में गुजरात में जो हुआ इसका उन्हें किसी भी तरह का पश्चाताप है.’ उनका कहना था, ‘ मैं इस विषय पर बात नहीं करना चाहता, लोगों को जो कहना है वह कहे, मेरा काम बोलता है.”

पाँच साल पहले एक निजी चैनल के इंटरव्यू में एक चर्चित पत्रकार ने पूछा था कि,  “लोग आपके मुँह पे आपको मास मर्डरर कहते हैं और आप पर मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रही होने का आरोप लगाते हैं. क्या आपकी छवि के साथ कोई परेशानी है?’ और आधे घंटे का यह इंटरव्यू महज तीन मिनट चल पाया था!

जानकार बताते हैं कि मोदी अपने मन के मुताबिक पत्रकारों से बात करते हैं और जिनसे वे वही सुनना चाहते हैं जो उनके मन में हैं. ऐसे में मीडिया के साथ अचानक उनकी निकटता कई सवाल खड़े करती है.

जाहिर है, नरेंद्र मोदी अपनी ‘इमेज’ बदलने की कोशिश में है. उन्हें पता है कि दिल्ली की तख्त पर पहुँचने से पहले उनके सफेद कमीज पर लगे दाग धोने होंगे. जिन लोगों ने मीडिया के माध्यम से दंगों से दौरान पुलिस, प्रशासन की असफलता और दंगाइयों को मिली छूट को देखा, बिलकिस बानो की चीख सुनी और वली दकनी के मजार को उजड़ते देखा वे इन्हीं मीडिया के झूठ को नहीं पहचानेंगे, यह मानना भूल होगी.

इससे पहले पिछले साल अमेरीकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस (सीआरएस) ने आर्थिक सुधारों के लिए नरेंद्र मोदी की काफी तारीफ की और 2014 के आम सभा चुनावों में उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रुप में देखा.

एक समय अमेरिका जाने के लिए वीसा देने की मनाही झेल चुके मोदी के प्रति अचानक उमड़ा यह प्रेम एक ‘ब्रांड’ के रुप में मोदी की पहचान पुख्ता करने के लिए लगे एक अमरीकी पीआर और लॉबिंग फर्म एपीसीओ वर्ल्डवाइड की मेहनत का नतीजा है. खबरों के मुताबिक गुजरात सरकार ‘वाइब्रेंट गुजरात’ के तहत अपनी छवि सुधारने के लिए हर महीने लाखों रुपए खर्च करती है. ‘महानायक’ अमिताभ बच्चन का आग्रहपूर्वक गुजरात आने का न्यौता इसी की अगली कड़ी है!

आश्चर्य है मोदी ‘कारवां’ के पत्रकार से नहीं मिलते पर वे ‘टाइम’ के पत्रकार से मिलने के लिए सहर्ष राजी हो जाते हैं!

यहाँ पर उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि एक समय ‘टाइम’ ने बिहार कैडर के आईएएस डॉक्टर गौतम गोस्वामी को 2004  में ‘पसर्न ऑफ द इयर’ पुरस्कार से नवाजा था. बिहार में आई बाढ़ के दौरान उनके काम की काफी सराहना हुई थी, लेकिन बाद में बाढ़ पीड़ितों के फंड में बड़े पैमाने पर हुए घोटाले में उनका नाम उजागर हुआ था.

बहरहाल, जब अंबानी और टाटा घराने के उद्योगपति मंच से मोदी के कुशल नेतृत्व क्षमता का बखान करते नहीं अघाते तब भारतीय और अमरीकी मीडिया के मोदी के पक्ष में मत बनाने की कार्रवाई अचंभित नहीं करती. उदारीकरण के बाद भारतीय राष्ट्र-राज्य का चरित्र बदला है. अब सारा जोर प्रबंधन पर है. कारपोरेट जगत की नीतियों से राज्य अपने क्रिया-कलापों को दुरुस्त करती है. मीडिया में जहाँ ब्रांड मैनजरों की अहमियत संपादकों से ज्यादा है वहीं, राज्य और सत्ता में मीडिया मैनेजरों की घुसपैठ किसी भी सक्षम नौकरशाहों से कम नहीं.

ऐसे में, मीडिया राजनीतिक पार्टियों की सूचनाओँ को बिना जाँचे-परखे, आलोचनात्मक कसौटी पर कसे परोस रही है. कारपोरेट मीडिया एक तरफ मनमोहन सिंह सरकार के ‘पॉलिसी पैरेलिसिस’ से पीड़ित होने की वजह से कोस रही हैं वहीं विकास पुरुष मोदी से उम्मीद पाले बैठी है. ऐसे में दस साल बाद वह गुजरात दंगा पीड़ितों को न्याय, दोषियों को सजा और समाज के ध्रुवीकरण जैसे मौजू सवालों से मुँह चुराने में ही अपना भला समझ रही है.

पता नहीं विधानसभा और आने वाले लोक सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की ‘इमेज’ को कितना फायदा होगा पर मीडिया की इमेज खतरे में है. वर्तमान में भारतीय राजनेताओं पर 'वैधता का संकट' मंडरा रहा है, कहीं ये संकट मीडिया को भी अपनी गिरफ्त में ना ले लें. 


(समयांतर, मई, 2012 में प्रकाशित)