Thursday, November 22, 2018

तथ्य और सत्य के बीच फेक न्यूज


पिछले दिनों बीबीसी ने फेक न्यूज के खिलाफ एक मुहिम शुरु किया है. इसके तहत लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि ‘जो लोग फ़ेक न्यूज़ को बढ़ावा दे रहे हैं, वो देशद्रोही हैं.’ साथ ही उन्होंने कहा कि ‘ये प्रोपेगैंडा है और कुछ लोग इसे बड़े पैमाने पर कर रहे हैं.’
ऐसी खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता ना हो फेक न्यूज कहलाता है. ऐसा नहीं है कि खबर की शक्ल में दुष्प्रचार,  अफवाह आदि समाज में पहले नहीं फैलते थे. पर उनमें और आज जिसे हम फेक न्यूज समझते हैं, बारीक फर्क है. वर्तमान में देश की राजनीतिक पार्टियाँ राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करती हैं. बात राष्ट्रवादियों की हो या सामाजवादियों की. उनके पास एक पूरी टीम है जो फेक न्यूज के उत्पादन, प्रसारण में रात-दिन जुटी रहती है. जाहिर है, 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए फेक न्यूज एक बड़ी चुनौती है. पर क्या राजनीतिक पार्टियों से यह उम्मीद रखनी चाहिए कि वे इस चुनौती से निपटेंगे?
फेक न्यूज मूलत: संचार क्रांति के दौर में आई नई तकनीकी से उभरी समस्या है. कंप्यूटर, स्मार्ट फोन, इंटरनेट (टूजी, थ्री जी, फोर जी) और सस्ते डाटा पैक की दूर-दराज इलाकों तक पहुँच ने मीडिया के बाजार में खबरों के परोसने, उसके उत्पादन और उपभोग की प्रक्रिया को खासा प्रभावित किया है. अब कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति चाहे तो संदेश का उत्पादन और प्रसारण कर सकता है, इसे एक खबर की शक्ल दे सकता है. कई बार फेक न्यूज की चपेट में मेनस्ट्रीम मीडिया भी आ जाता है. मेनस्ट्रीम मीडिया पर जैसे-जैसे विश्वसनीयता का संकट बढ़ा है, फेक न्यूज की समस्या भी बढ़ी है.
बीबीसी की साख हिंदी क्षेत्र में काफी है. वह खबरों को विश्वसनीय ढंग से परोसने के लिए वह जानी जाती है. पर सवाल है कि फेकन्यूज क्या महज प्रोपेगैंडा है? यदि हम प्रोपेगैंडा को फेक न्यूज मानें तो इसकी जद में बीबीसी जैसे संगठन भी आ जाएँगे.
फेक न्यूज के पीछे जो तंत्र काम करता है उसकी पड़ताल करते हुए बीबीसी के शोध में पता चला है कि लोग ‘राष्ट्र निर्माण’ की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाले फ़ेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं और राष्ट्रीय पहचान का प्रभाव ख़बरों से जुड़े तथ्यों की जांच की ज़रूरत पर भारी पड़ रहा है. हालांकि बीबीसी की इस शोध प्रविधि (मेथडोलॉजी) पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. राष्ट्रवादी विचारधारा वाले,  बीबीसी के इस शोध को मोदी सरकार के खिलाफ एक प्रोपेगैंडा कह रहे हैं.  बीबीसी ने भारत में महज 40 लोगों के सैंपल साइज़ के आधार पर लोगों के सोशल मीडिया के बिहेवियर को विश्लेषित किया है. बीबीसी का यह निष्कर्ष आधा-अधूरा ही माना जाएगा. हालांकि बीबीसी का कहना है कि फेक न्यूज से जुड़े मनौवैज्ञानिक पहलूओं का अध्ययन इस शोध की विशिष्टता है. पर मीडिया के शोधार्थी हाल के वर्षों में खबरों के उत्पादन और उपभोग में भावनाओं की भूमिका अलग से रेखांकित करते रहे हैं. फेक न्यूज को इसका अपवाद नहीं माना जाना चाहिए. सच तो यह है कि भावनाएँ हर समय खबरों के प्रचार-प्रसार में प्रभावी रही है.
गौरतलब है कि भारत की आजादी के दौरान जब राष्ट्रवाद का उभार हो रहा था तब आधुनिक संचार के साधनों के अभाव में, मौखिक संचार के माध्यम से फैलने वाली अफवाहों से साम्राज्यवादियों के खिलाफ मुहिम में राष्ट्रवादियों को फायदा भी पहुँचता था. वर्ष 1857 में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अफवाह किस तरह लोगों को एकजुट कर रहे थे, इतिहासकार रंजीत गुहा ने इस बात को नोट किया है. शाहिद अमीन ने भी चौरी-चौरा के प्रंसग में लिखा है कि किस तरह मौखिक खबरों के माध्यम से अफवाह (गोगा) तेजी से फैल रहे थे.
दूसरी तरफ साम्राज्यवादी ताकतें भी प्रोपेगैंडा से बाज नहीं आ रही थी. याद कीजिए कि बीबीसी में काम करते हुए लेखक-पत्रकार जार्ज ऑरवेल ने क्या लिखा था. उन्होंने बीबीसी के प्रोपेगैंडा से आहत होकर,  1943  में अपने इस्तीफा पत्र में लिखा था- “मैं मानता हूं कि मौजूदा राजनीतिक वातावरण में ब्रिटिश प्रोपेगैंडा का भारत में प्रसार करना लगभग एक निराशाजनक काम है. इन प्रसारणों को तनिक भी चालू रखना चाहिए या नहीं इसका निर्णय और लोगों को करना चाहिए लेकिन इस पर मैं अपना समय खर्च करना पसंद नहीं करुंगा,जबकि मैं जानता हूँ कि पत्रकारिता से खुद को जोड़ कर ऐसा काम कर सकता हूं जो कुछ ठोस प्रभाव पैदा कर सके.” साथ ही, नहीं भूलना चाहिए कि इराक युद्ध (2003) के दौरान बीबीसी ने जिस तरह से युद्ध को कवर किया, प्रोपगैंडा में भाग लिया,उसकी काफी भर्त्सना हो चुकी है.
वर्तमान में हिंदी में ऑनलाइन न्यूज मीडिया के जो वेबसाइट हैं, वहाँ क्लिकबेट (हेडिंग में भड़काऊ शब्दों का इस्तेमाल ताकि अधिकाधिक हिट मिले) और सोशल मीडिया (फेसबुक,ट्विटर आदि) पर खबरों के शेयर करने की योग्यता (शेयरेबिलिटी) पर ज्यादा जोर रहता है. निस्संदेह ऑनलाइन मीडिया की वजह से बहस-मुबाहिसा का एक नया क्षेत्र उभरा है जिससे लोकतंत्र मजबूत हुआ है, पर कई बार जल्दीबाजी में या जानबूझ कर जो असत्यापित या अपुष्ट खबरें (फेक न्यूज?)दी जाती है वह इन्हीं सोशल मीडिया के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुँचती है. ऐसे कई उदाहरण है जिसमें हाल के दिनों में बीबीसी भी इससे नहीं बच पाया है.
असल में, फेक न्यूज की वजह से फेसबुक, व्हाट्सऐप, ट्विटर जैसे प्लेटफार्म की विश्वसनीयता पर भी संकट है. बड़ी पूंजी से संचालित इन न्यू मीडिया पर राष्ट्र-राज्य और नागरिक समाज की तरफ से भी काफी दबाव है. खबरों के मुताबिक गुजरात सरकार सोशल मीडिया पर फेक न्यूज की बढ़त को रोकने के लिए कानून लाने का विचार कर रही है. मीडिया पर किस तरह की कानूनी बंदिश लोकतंत्र के लिए मुफीद नहीं है. पर फेक न्यूज की समस्या और उसके स्रोत को वामपंथी और दक्षिणपंथी खांचे में बांट कर देखना, जैसा कि बीबीसी अपने शोध में करता दिख रहा है, विषय को विचारधारात्मक नजरिए से देखने का नतीजा है. इससे भारत में फेक न्यूज का सवाल राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है. और शायद इसी वजह से सूचना एवं प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बीबीसी के फेक न्यूज पर दिल्ली में हुए कांफ्रेंस में आखिरी समय में भाग लेने से इंकार कर दिया.  ठीक इसी समय ट्विटर के सीईओ जैक डोरसे ने कहा कि फेक न्यूज और दुष्प्रचार की समस्याओं से निपटने के लिए कोई भी समाधान समुचित नहीं है. हाल-फिलहाल फेक न्यूज की समस्या का सीधा हल भले ही नहीं दिखे, यदि मुख्यधारा का मीडिया नागरिक समाज और सरकार के साथ मिल कर,एकजुट होकर इस दिशा में सार्थक पहल करे तो कोई रास्ता जरूर निकल आएगा.
(जानकी पुल पर प्रकाशित)

Tuesday, November 20, 2018

उम्मीद-ए-सहर की बात


दीवाली के हफ्ते भर पहले से पांच साल की कैथी कुछ पंक्तियां गुनगुना रही थी- चकरी, बम, हवाई इनसे बचना भाई/ दीवाली आयी, खुशियों की बहार है लायी. मैंने उससे पूछा कि कहां से सीखी? उसने कहा कि स्कूल में मैडम ने सिखाया. फिर उसने मुझे दीवाली में बम-पटाखों से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण, बड़े-बूढ़ो को आने वाली दिक्कतें और इसकी वजह से जानवरों के अंदर होने वाले भय के बारे में बताया. आश्चर्य हुआ मुझे कि उसने मुझसे ग्रीन पटाखों के बारे में बात की और कहा कि अगले साल से हम उसे जलायेंगे.

 उच्चतम न्यायालय ने इस साल दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की ब्रिकी और इस्तेमाल पर रोक लगा दिया था और सिर्फ ग्रीन पटाखे की इजाजत दी थी.

 साथ ही रात आठ से दस बजे के बीच ही पटाखे फोड़ने की समय सीमा तय कर दी थी. काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के नेशनल इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट की वैज्ञानिक डॉक्टर साधना रायलु से फोन पर जब मैंने पिछले दिनों बात की थी, तब उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वर्तमान में भारत में ग्रीन पटाखों का उत्पादन नहीं होता है.

 इस दीवाली कैथी ने कोई भी पटाखा खरीदने की जिद नहीं की. पर दीवाली की रात ऐसा लगा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना जम कर हुई और लोगों ने मन से आतिशबाजी की. मीडिया में जो रिपोर्ट आयी, उसमें मास्क पहन कर लोग पटाखे जलाने में मशगूल दिखे. जाहिर है पहले से ही दिल्ली की प्रदूषित हवा, दीवाली की सुबह ‘अवैध पटाखों’ की वजह से फैली गर्दो-गुबार से और भी प्रदूषित हुई.

 क्या पर्यावरण की चिंता सिर्फ न्यायालय की है? क्या इसमें नागरिकों और नागरिक समाज की कोई भूमिका नहीं है? स्पष्ट है कि न्यायालय की बात और आदेश का असर आम नागरिकों पर नहीं पड़ा और राजनीतिक पार्टियों में भी पर्यावरण के मुद्दों पर कोई आम सहमति नहीं दिखती. 

मैं कई ऐसे बुर्जुगों को जानता हूं जो दशकों से दिल्ली में रहते आए हैं, पर हाल के वर्षों में, दीवाली के दौरान, दिल्ली-एनसीआर छोड़ कर हफ्ते-दस दिन के लिए शहर से बाहर चले जाते हैं.  पर उनका क्या हाल है जो शहर छोड़ने में असमर्थ हैं? उन गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों की किसे चिंता है जो  प्रदूषण की मार झेल रहे हैं?

मुझे ऐसा लगा कि पांच साल की एक बच्ची जो बात आसानी से समझ सकती है, वह तथाकथित पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के पल्ले नहीं पड़ा. पर्यावरण उनकी चिंता का विषय है ही नहीं. खाओ, पीओ और ऐश करो को मंत्र की तरह दुहारने वाला और वर्तमान में जीने वाला यह वर्ग, भविष्य के प्रति न तो संवेदनशील है, न हीं समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार. फिर उम्मीद किस से है? मेरी समझ से उम्मीद स्कूली शिक्षा ले रहे इन्हीं बच्चों से है.

(प्रभात खबर, 20 नंवबर 2018 को प्रकाशित)

Thursday, November 15, 2018

दिल्ली में दरभंगा घराना


किसी भी राज्य और समाज की आर्थिक बदहाली की कहानी सांस्कृतिक बदहाली से भी गहरे जुड़ी होती है. जहाँ आर्थिक बदहाली के आंकड़े अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और मीडिया के लिए महत्वपूर्ण होते हैं वहीं सांस्कृतिक रुग्णता इनके सरोकार का हिस्सा नहीं बन पाते. यह स्थिति कहीं भी देखी जा सकती है. लेकिन अगर बिहार की बात करूँ तो जैसे-जैसे वहाँ की आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितयाँ प्रतिकूल होती गई, सदियों पुरानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा भी सिमटती चली गई. बिहार की राज्य सत्ता और समाज अपनी परंपरा को सहेज नहीं सका. इन सब बातों को लक्ष्य कर दरभंगा-अमता घराने में प्रशिक्षित, ध्रुपद के गायक और लेखक जर्मनी के पीटर पानके ने दरभंगा घराने के ऊपर लिखी अपनी किताब का नाम ‘सिंगर्स डाई ट्वाइस’ रखा है.  ऐसा लगता है कि पिछली सदी में दरभंगा ध्रुपद घराने के चर्चित कलाकारों की इहलौकिक मौत के बाद बिहार राज्य और समाज की नजर में उनकी स्मृति शेष हो गई.

पर परंपरा से नि:सृत प्रतिभाएँ समय और स्थान से प्रभावित भले हो, विषम परिस्थितियों में भी वह अपना रास्ता तलाश लेती है. पिछले दिनों दिल्ली ध्रुपद घराने के युवा कलाकार प्रशांत और निशांत मल्लिक को सुनना अह्लादकारी अनुभव रहा. जहाँ बिहार की एक अन्य ध्रुपद शैली- बेतिया घराने की परंपरा सिमट रही है, वहीं दरभंगा घराना के युवा कलाकार देश-विदेश में एक बार फिर से अपनी छाप छोड़ रहे है. गौरतलब है कि दरभंगा ध्रुपद घराने के संगीतकार खुद को तानसेन की परंपरा से जोड़ते हैं.

दरभंगा संगीत घराना दरभंगा राज की छत्रछाया में 18वीं सदी से फलता-फूलता रहा. पर दरभंगा राज की जमींदारी के विघटन के बाद संरक्षण के अभाव में यह घराना दरभंगा से निकल कर इलाहाबाद, वृंदावन, दिल्ली आदि जगहों पर फैलता गया.

कहते हैं कि सत्यजीत राय की फ़िल्म ‘जलसाघर’ (1958) दरभंगा राज घराने से ही प्रेरित है. ध्रुपद गायक प्रेम मल्लिक के पुत्र और विदुर मल्लिक के पौत्र प्रशांत और निशांत इस घराने की तेरहवीं पीढ़ी के गायक हैं. हालांकि जब मैंने प्रशांत और निशांत मल्लिक के ध्रुपद कार्यक्रम के आख़िर में ‘विद्यापति’ सुनने की फरमाइश की तो उनका कहना था कि ‘ध्रुपद शैली पर यह प्रोग्राम आयोजित किया गया है और मंच को देखते हुए यह उचित नहीं.’ उन्होंने मुझे यह कहीं और सुनाने की बात कहीं. निश्चित रूप से इसके पीछे कोई वाजिब वजह होगी.

दरअसल, दरभंगा घराना के संगीतज्ञ अपनी गायकी के आख़िर में विद्यापति के पद गाया करते थे और इस वजह से ही मैंने फरमाइश की थी. दो साल पहले जब मैं दरभंगा घराने के वयोवृद्ध गायक, संगीत नाटक अकादमी से पुरस्कृत पंडित अभय नारायण मल्लिक से मिला था तब उन्होंने भी मुझे ‘उगना रे मोर कतय गेला’ गाकर सुनाया था. शायद ये उनकी परंपरा थी. दरभंगा घराने के गायक जिस रागात्मकता से ध्रुपद गाते थे उसी रागात्मकता से विद्यापति के पद भी. मल्लिक बंधुओं की प्रस्तुति सुन कर मुझे ऐसा लगा कि उनके गायन में ध्रुपद का नोम-तोम था पर मैथिल मिठास गायब थी. साथ ही उस लयकारी का अभाव था जिसकी वजह से दरभंगा घराना पूरे देश में पिछले तीन सौ वर्षों में अपनी विशिष्टता बनाए रखा.

ध्रुपद गायकी की चार शैलियां- गौहर, डागर, खंडार और नौहर में दरभंगा गायकी गौहर शैली को अपनाए हुए है. इसमें आलाप चार चरणों में पूरा होता है और जोर लयकारी पर होता है. ध्रुपद के साथ-साथ इस घराने में खयाल और ठुमरी के गायक और पखावज के भी चर्चित कलाकार हुए हैं. पखावज के नामी वादक पंडित रामाशीष पाठक दरभंगा घराने से ही थे. ध्रुपद के सिरमौर राम चतुर मल्लिक (पद्मश्री) के बारे में बड़े-बड़े संगीत साधक आज भी आदर से बात करते हैं. संगीत समीक्षक गजेंद्र नारायण सिंह (पद्मश्री) ने उनके बारे में लिखा है- रामचतुर दरअसल गानचतुर थे. गायकी की हर विधा पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी.’
रामचतुर मल्लिक के छोटे भाई विधुर मल्लिक 80 के दशक में वृदांवन चले गए और वहाँ पर उन्होंने ध्रुपद एकेडमी की स्थापना की थी. वर्ष 2002 में उनकी मौत हो गई. बातचीत के दौरान प्रशांत मल्लिक ने बताया कि हर राज्य के आयोजक और वहाँ के सांस्कृतिक विभाग अपने राज्य के कलाकारों को पहले आगे करते हैं, लेकिन अफसोस यह है कि बिहार सरकार और बिहार के आयोजकों ने कभी अपने कलाकारों की अहमियत नहीं समझी.’ बहरहाल, निस्संदेह विधुर मल्लिक ने कई योग्य शिष्यों को ध्रुपद गायकी में प्रशिक्षित किया जिनमें पंडित सुखदेव चतुर्वेदी और पंडित वृज मोहन गोस्वामी आदि प्रमुख हैं. पर यह यह घराना अपने सामाजिक आधार का विस्तार नहीं कर सका.

मशहूर शास्त्रीय संगीतकार और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टीएम कृष्णा कर्नाटक संगीत में सामाजिक विस्तार और समरसता की वकालत करते हैं, ताकि शास्त्रीय संगीत में वर्ग और जाति के वर्चस्व को तोड़ा जा सके. समकालीन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी यह ज़रूरत है. दरभंगा घराना यदि इस दिशा में पहल करे तो उसकी परंपरा की जड़ और मजबूत होगी.
(जनसत्ता, 15 नवंबर 2018 को, संस्कृति और सरोकार शीर्षक से प्रकाशित)

Thursday, November 08, 2018

बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स

मेरी किताब बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स' की प्री बुकिंग हो रही है।  अमेज़न से आप ख़रीद सकते हैं। किताब अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से छपी है।

https://www.amazon.in/dp/B07K3CDC5J

किताब के बारे में: 


यह किताब वैचारिक लेखन में बहुआयामी है। लेखक की संवेदनशील दृष्टि, विषय-वस्तु का दायरा, मार्मिक अंदाज़ और सहज भाषा एक अलग आस्वाद लिए है जिसे लेखन की किसी एक विधा में अंटाया नहीं जा सकता।

संकलित लेखों में निजीपन, व्यक्ति विशेष, लोक-शहर के प्रति अनुराग एकाधिक बार है। लंदन, पेरिस, वियना, शंघाई, कोलंबो, दिल्ली, बंगलुरु, पुणे, श्रीनगर के साथ-साथ मैकलोडगंज, मगध, मिथिला व बेलारही, तिलोनिया, तरौनी जैसे गाँव भी हैं। जेएनयू और जिगन विश्वविद्यालय भी है। ‘ग्लोबल’ और ‘लोकल’ की इस घुमक्कड़ी में जहाँ कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही। समंदर की आवाज़ के साथ-साथ डबरा, चहबच्चा की अनुगूंज भी है। होटल-रेस्तरां के साथ-साथ ढाबा भी।

इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज़ है। उदारीकरण के बाद अख़बार के पन्नों पर फैली ‘ख़ुश ख़बर’ है। ‘न्यूज़रूम नेशनलिज्म’ की आहट भी। बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का शोक गीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की ख़ुशबू एक तरफ़ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ़।

उदास गिरगिट से बात करता हुआ एक विद्रोही कवि है। हाथ पकड़ कर सिखाने वाला एक कबीरा पत्रकार है। स्वभाव के विपरीत नहीं जाने की सलाह देने वाला एक फक्कड़ फ़िल्मकार भी। एक तरफ़ नॉस्टेल्जिया, स्मृति और विस्मृति के गह्वर हैं, दूसरी तरफ़ वर्तमान का यथार्थ है और भविष्य के रोशनदान भी।

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में, 21वीं सदी के दो दशकों के बीच, लिखे गए इन लेखों में एक पत्रकार और शोधार्थी का साझा अनुभव है। वादी स्वर एक ब्लॉगर का है। शैली-‘मैं’ और ‘टोका-टोकी’ की है।

किताब अंश: 

https://satyagrah.scroll.in/article/122229/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-writer-arvind-das

https://www.thelallantop.com/bherant/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-by-arvind-das/

https://www.jankipul.com/2018/11/special-write-up-on-baba-nagarjun.html



Tuesday, October 30, 2018

बीते जमाने की तस्वीर

मौसम चाहे बहार का हो या पतझड़ का, वह आपके मन और मिजाज पर प्रभाव डालता है. इसलिए कवियों के यहाँ वसंत, या कह लें कि उम्मीद के मौसम का जिक्र ज्यादा होता है. मनोवैज्ञानिक भी इस बात पर जोर देते हैं कि सुबह-शाम, धूप-छांव के कारण पड़नेवाला असर मौसमी रोगों को बढ़ावा देते हैं. 
बहरहाल, जैसे ही ठंड की दस्तक हवाओँ में होती है मैं थोड़ा सा उदास और थोड़ा नॉस्टेलजिक होने लगता हूँ. मन बचपन की स्मृतियों, यानी गांव की ओर लौटने लगता है. हम जैसे प्रवासियों के लिए यह मौसम दशहरा, दीवाली, छठ की यादें लेकर आता है और आँखें भींग जाती है.
पिछले दिनों पटना से मेरी मौसी ने माँ-पापा की एक धुंधली सी तस्वीर की मोबाइल से ली गई तस्वीर भेजी, जो 27 साल पुरानी थी. माँ-पापा की एक साथ पुराने जमाने की ऐसी तस्वीर बमुश्किल एक-दो ही हैं. कहते हैं कि तस्वीर बीते समय के साथ एक समझौते की तरह होती है. जैसे ही मैंने माँ को यह तस्वीर दिखाई, माँ चौंक कर बोली- यह तो मैं हूँ. फिर उसने कहा कि मैंने इसे अपनी साड़ी से पहचाना.
मेरे लिए यह तस्वीर कवि आलोकधन्वा की कविता से भी जुड़ती है- एक जमाने की कविता. पापा जब भी गाँव आते, माँ के लिए साड़ी लाते थे. आलोकधन्वा ने लिखा है- माँ जब भी नयी साड़ी पहनती/गुनगुनाती रहती/हम माँ को तंग करते/ उसे दुल्हन कहते/माँ तंग नहीं होती/ बल्कि नया गुड़ देती/गुड़ में मूँगफली के दाने भी होते. 
पापा इन दिनों अस्वस्थ रहने लगे हैं. तस्वीर देख कर माँ ने कहा- आदमी भी क्या से क्या हो जाता है! मैंने आलोकधन्वा से फोन करके पूछा कि ‘एक ज़माने की कविता’ पढ़ते हुए मैं भावुक हो गया, क्या लिखते हुए आप भी भावुक हुए थे? उन्होंने कहा- स्वाभाविक है. कविता अंदर से आती है. मेरी माँ 1995 में चली गई थी, जिसके बाद मैंने यह कविता लिखी. अब माँ तो सिर्फ एक मेरी ही नहीं है. भावुकता स्वाभाविक है.
मैंने उनसे कहा कि आपने लिखा है-‘ माँ थी अनपढ़ लेकिन उसके पास गीतों की कमी नहीं थी/ कई बार नये गीत भी सुनाती/रही होगी एक अनाम ग्राम कवि'. जब मैंने उनसे कहा कि मेरी माँ भी गाना गाती थी (है) शाम में और अक्सर पापा उससे गाना सुनने की फरमाइश करते. तो इस पर उन्होंने कहा कि देखिए आप मेरी ही बात कह रहे हैं. फिर मैंने पूछा कि क्या यह नॉस्टेलजिया नहीं है? तब उन्होंने जवाब दिया कि नहीं, यह महज नॉस्टेलजिया नहीं है.
आलोकधन्वा ने कहा कि जो आदमी माँ से नहीं जुड़ा है, अपने नेटिव से नहीं जुड़ा है वह इसे महसूस नहीं कर सकता है. वह इस संवेदना को नहीं समझ सकता है. अपने नेटिव से जुड़ाव हर बड़े कवि के यहाँ मिलता है. चाहे वह विद्यापति हो, रिल्के हो या नेरुदा. मुझे याद हो आया कि बाबा नागार्जुन ने भी लिखा है- ‘याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम…’

(प्रभात खबर, 30 अक्टूबर 2018, कुछ अलग कॉलम के तहत प्रकाशित)

Tuesday, September 18, 2018

सबाल्टर्न स्वर का सौंदर्य: कविता वीरेन


नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित
समकालीन हिंदी कविता की बनावट और बुनावट दोनों पर लोक की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है. लोक की यह परंपरा निराला-मुक्तिबोध-नागार्जुन-केदारनाथ सिंह से होकर अरुण कमल-मंगलेश डबराल-आलोकधन्वा-वीरेन डंगवाल तक जाती है. हालांकि समाज के अनुरूप और समय के दबाव के फलस्वरूप लोक चेतना के स्वर और स्वरूप में अंतर स्पष्ट है.

नवारुण प्रकाशन से हाल ही में प्रकाशित वीरेन डंगवाल (1947-2015) की संपूर्ण कविताओं की किताब-कविता वीरेन, को पढ़ते हुए यह बोध हमेशा बना रहता है. उनकी कविता का स्वर और सौंदर्य समकालीन कवियों से साफ अलग है. मंगलेश डबराल ने इस किताब की लंबी भूमिका में ठीक ही नोट किया है: “...रामसिंह, पीटी ऊषा, मेरा बच्चा, गाय, भूगोल-रहित, दुख, समय और इतने भले नहीं बन जाना साथी जैसी कविताओँ ने वीरेन को मार्क्सवाद की ज्ञानात्मक संवेदना से अनुप्रेरित ऐसे प्रतिबद्ध और जन-पक्षधर कवि की पहचान दे दी थी, जिसकी आवाज अपने समकालीनों से कुछ अलहदा और अनोखी थी और अपने पूर्ववर्ती कवियों से गहरा संवाद करती थी.” उनकी कविताओं में जो चीजें ‘सबाल्टर्न’ चेतना से लैस है, साधारण दिखती है वह गहरे स्तर पर जाकर हमारे मन के अनेक भावों को एक साथ उद्वेलित करने की क्षमता रखती है. अधिकांश कविताएँ 1980 के बाद की हैं. अपने समय और समाज से साक्षात्कार करती ये कविताएँ आत्मीय और सहज है. यह सहजता कवि के सायास कोशिश से ही संभव है. उन्हीं के शब्दों में:  एक कवि और कर ही क्या सकता है/सही बने रहने की कोशिश के सिवा.

वीरेन की कई कविताएँ जन आंदोलनों के लिए गीत बन चुकी हैं, ऐसे ही जैसे गोरख पांडेय की कविताएँ. उनकी मात्र तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुई थी.  इस समग्र में तीनों संग्रहों के लिए लिखी गई भूमिका को भी शामिल किया गया है. ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, में शामिल इन पंक्तियों में- किसने आखिर ऐसा समाज रच डाला है/ जिसमें बस वही दमकता है, जो काला है?’क्षोभ और हताशा है. पर कवि ‘उजले दिन जरूर आएँगे’को लेकर आश्वस्त भी है. ‘मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ/हर सपने के पीछे सच्चाई होती है/हर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है/ हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है’, ये आशा और संघर्ष उनकी कविता का मूल स्वर भी है.

परमानंद श्रीवास्तव ने 1990 में ‘समकालीन हिंदी कविता’नाम से एक किताब लिखी थी जिसे साहित्य अकादमी ने छापा था. सभी प्रमुख समकालीन कवि और उनकी कविताएँ इसमें शामिल हैं. कॉलेज के दिनों में जब मैं हिंदी साहित्य का छात्र नहीं था तब मेरे लिए यह एक रेफरेंस बुक की तरह था और इस किताब में शामिल समकालीन कवियों की कविताएँ ढूंढ़ कर पढ़ता था. आश्चर्य है कि इस किताब में वीरेन नहीं हैं. मेरी मुलाकात वीरेन की कविताओं से विश्वविद्यालय में जाकर ही हुई.

‘कविता वीरेन’ इस कमी को पूरा करता है. इस खूबसूरत संग्रह में उनकी असंकलित और कुछ नयी कविताओं के साथ नाजिम हिकमत की कविताओँ के अनुवाद भी शामिल है. इस किताब के सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए नवारुण प्रकाशन के कर्ता-धर्ता संजय जोशी बधाई के पात्र हैं.


(जानकीपुल पर प्रकाशित)

Wednesday, September 12, 2018

लोक नाट्य विधाओं की बदहाल स्थिति: रंगमंच पर नेटुआ


किसी मंत्र की तरह अक्सर ही यह सुनने को मिलता है कि लोक उत्सवधर्मी होता है। लेकिन जिन परंपराओं, लोकविधाओं के कारण लोक में उत्सव आकार लेता रहा है आधुनिकता के संसर्ग में उसका विघटन भी हुआ है, इस पर बात कम की जाती है। यह अच्छी बात है कि आधुनिक रंगमंच के कलाकारों के बीच इस तरह का मंथन चल रहा है। पिछले दिनों रतन वर्मा के लिखे नाटक ‘नेटुआ करम बड़ा दुखदायी’ का दिलीप गुप्ता के निर्देशन में दिल्ली में मंचन हुआ। इस नाटक में बिहार की लोक नाट्य शैली, नेटुआ को लेकर आधुनिक मन में जो दुचित्तापन है, समाज में जेंडर को लेकर जो स्टिरियोटाइप है, कलाकारों के साथ जो भेदभाव है उसे नृत्य-संगीत के साथ प्रस्तुत किया गया। मौजूदा समय में लोक नाट्य शैली की बदहाली पर भी यह एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है।
बिहार में नेटुआ एक प्रकार का नृत्य है जिसे पुरुष पात्रों के द्वारा स्त्री के भेष में किया जाता रहा है। पैरों में घुंघरू बांध, स्त्रियों की आंगिक भाव-भंगिमाओं से नर्तक लोक का मनोरंजन करते रहे हैं। मेरे बचपन की अनेक स्मृतियों में यह भी सुरक्षित है। अपने इलाके, मिथिला की बात करूं तो वहां इसे नटुआ कहा जाता था। शादी-ब्याह के अवसर पर शामियाने के नीचे या किसी पर्व-त्योहार पर चौकियां जोड़ कर मंच तैयार किया जाता था, जिस पर ये नर्तक नाचते थे। ढोल, ढाक और अन्य वाद्य यंत्रों के बीच नाचते पैर देखने वालों को अपने सम्मोहन में बांधे रखते थे। हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध गायक उदित नारायण अपने कई इंटरव्यू में इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि इन्हीं महफिलों, मंचों से निकल कर उन्होंने बॉलिवुड की ऊंचाइयों को छुआ है।
प्रसंगवश, छह-सात साल पहले मैंने मनोज वाजपेयी से पूछा था कि आप ‘नेटुआ’ लेकर मंच पर कब आ रहे हैं? उन्होंने कहा था- जल्दी ही। पर लगता नहीं कि वे मंच पर फिर लौटेंगे। रंगमंच से जुड़े एक मित्र कहते हैं कि अब वे कहां वापस लौटेंगे! फिल्मों से पहले 90 के शुरुआती वर्षों में उन्हें दिल्ली रंगमंच पर ‘नेटुआ’ नाटक से ही प्रसिद्धि मिली थी।
इसी तरहपिछले साल भारत रंग महोत्सव में नौटंकी की वर्तमान समाज में स्थिति, उसके उरूज और अवसान को लेकर भी एक नाटक का मंचन किया गया था। बात चाहे नौटंकी की हो, जात्रा की, तमाशा या भवाई की, आधुनिक समाज में लोक नाट्य विधाओं की जो स्थिति है, वह सुखद नहीं कही जा सकती।
जब से पॉपुलर कल्चर और खासतौर पर सिनेमा का प्रचार-प्रसार हुआ लोक में प्रदर्शनकारी कला के जो रूप चलन में थे वे हाशिये पर आ गए। जाहिर है सिनेमा के प्रचलन में आने से पहले और बाद के दशकों में भी ये लोक नाट्य विधाएं लोगों की रुचि और प्रोत्साहन की वजह से चलन में रहीं। अगर आज ये दर्शकों या मंच के लिए तरस रही हैं तो इसके लिए हमारा समय और समाज भी जिम्मेदार है।
सच तो यह है कि हमारे समाज में अभिनेताओं को वह स्थान कभी नहीं दिया गया जो साहित्यकारों या मूर्तिकारों को प्राप्त रहा है। आधुनिक काल में फिल्मों के अभिनेताओं की प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा अपवाद है। इसी बात को लक्ष्य कर संजीव के लिखे चर्चित उपन्यास ‘सूत्रधार’ के नायक, भोजपुरी के प्रसिद्ध लोक कलाकार भिखारी ठाकुर क्षोभ के साथ कहते हैं: जिस साहित्य और साहित्यकार को वे इतनी बड़ी चीज मानते आए थे, वहां भी वही कनफुसुकिया और चपड़-चालाकी, वही डाह, वही बाभन-सूद चलता है क्या?’
असल में लोक कलाओं, नाट्य विधाओं से जुड़ने वाले अधिकांश कलाकार समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदाय से आते रहे हैं। सामंती और पूंजीवादी समाज की जाति और वर्ग व्यवस्था इस कला के सम्यक मूल्यांकन और कलाकारों के प्रति संवेदनशील दृष्टि में बाधा बन कर उपस्थित रही है। पर नृत्य जीवन है और इसलिए लोक में यह स्वर हमेशा सुनाई पड़ता है-जे नाची से बाची।

(नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर 12 सितंबर 2018 को प्रकाशित)