Sunday, November 24, 2019

अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का संसार


गोवा में चल रहे भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के पचासवें संस्करण का ऐतिहासिक महत्व है. वर्ष 1952 में जब भारत के चार महानगरों में पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया, यह एशिया का भी पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव था. इसमें 23 देशों के फिल्मकारों ने भाग लिया था, जबकि पचासवें समारोह में 76 देशों के फिल्मकार भाग ले रहे हैं.

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस समारोह के आयोजन में व्यक्तिगत रूचि ली थी. वे दुनिया के सामने सिनेमा के माध्यम से एक स्वतंत्र राष्ट्र की ऐसी छवि प्रस्तुत करना चाह रहे थे जो किसी महाशक्ति के दबदबे में नहीं है. साथ ही देश के फिल्मकारों और सिनेमाप्रेमियों को विश्व सिनेमा की कला से परिचय और विचार-विमर्श का एक मंच उपलब्ध कराना भी उद्देश्य था. गुट निरपेक्षता के सिद्धांत की नींव नेहरू ने 1961 में भले ही डाली हो, वे इस पर 50 के दशक के शुरुआत से ही काम कर रहे थे. पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह को हम इसकी एक कड़ी के रूप में देख सकते हैं.

महात्मा गाँधी और सरदार बल्लभभाई पटेल के विपरीत नेहरू खुद एक सिनेमाप्रेमी थे और नए भारत के निर्माण में सिनेमा की एक महत्वपूर्ण भूमिका देख रहे थे. वे सिनेमा के कूटनीतिक महत्व से परिचित थे. नेहरू ने उद्धाटन भाषण में कहा था कि लोगों के जीवन में सिनेमा एक शक्तिशाली प्रभाव के रूप में उपस्थित है’. उन्होंने सिनेमा के माध्यम से जीवन में कलात्मक और सौंदर्यात्मक मूल्यों को समाहित करने पर जोर दिया था. नेहरू सांस्कृतिक शिष्टमंडलों में बॉलीवुड के कलाकारों को शामिल करते थे.

समारोह के पहले संस्करण में राज कपूर की फिल्म आवारा के साथ एनटी रामाराव अभिनीत पाताल भैरवी (तेलुगू)’, वी शांताराम की अमर भूपाली (मराठी)और अग्रदूत की बाबला (बांग्ला)दिखाई गई थी. अमेरिकी निर्देशक फ्रैंक कापरा हॉलीवुड के शिष्टमंडल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. सोवियत संघ से मिखाइल चियायुरली की फिल्म फॉल ऑफ बर्लिनके अतिरिक्त इटली की नव-यथार्थवादी धारा के फिल्मकारों विटोरियो डी सिका की चर्चित बाइसिकिल थिव्सऔर रोबर्टो रोजीलीनी की रोम: ओपन सिटीआदि का भी प्रदर्शन किया गया था. रोजीलीनी के करीबी रहे मकबूल फिदा हुसैन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ओपन सिटी ने दुनिया भर में हलचल मचा दी, लेकिन जब इटैलियन प्रेजिडेंट को पहली बार थिएटर में दिखाई गई तो उन्होंने उस फिल्म की नुमाइश पर पांबदी लगा दी.” 

नेहरू ने रोजीलीनी को भारत के ऊपर फिल्म बनाने का न्यौता दिया, जो इंडिया: मातृ भूमिडाक्यूमेंट्री के रूप में सामने आई. 70 और 80 के दशक में समारोहों के दौरान दिखाई गई दुनिया के नामी फिल्मकारों मसलन, आंद्रे तारकोव्सकी, जोल्तान फाबरी, फेदेरीकी फेलीनी, इंगमार बर्गमान, फ्रांसिस फोर्ड कोपोला, कोस्ता गावरास, रोमान पोलंस्की आदि की फिल्मों की चर्चा पुराने दौर के लोग आज भी करते हैं. हिंदी के चर्चित कवि कुंवर नारायण ने इन फिल्म महोत्सवों का जिक्र अपनी किताब- लेखक का सिनेमामें बखूबी किया है. हालांकि इंडियन पैनोरमा खंड में व्यावसायिक फिल्मों को शामिल करने को लेकर हाल के वर्षों में सवाल उठते रहे हैं.

कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित असमिया फिल्मों के चर्चित निर्देशित जानू बरुआ कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में देश में फिल्म समारोह कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं. व्यावसायिक दृष्टि ज्यादा हावी है, सिनेमा को कला के रूप में देखने-सुनने का अवसर नहीं मिलता. अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह इस मायने में सफल रहा है कि यहाँ सिनेमाप्रेमियों और फिल्मकारों को दुनिया भर के सिनेमा की कला से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है.फिल्म समारोह के पचासवें संस्करण में इस बात का भी लेखा-जोखा  किया जाना चाहिए कि भारतीय फिल्म उद्योग और फिल्मकारों पर इन समारोहों का क्या प्रभाव पड़ा है? भूमंडलीकरण के इस दौर में विदेश नीति में बॉलीवुड के साफ्ट पावरकी खूब चर्चा होती है, सवाल यह भी है कि नेहरू दौर के 'आइडिया ऑफ इंडिया' से  नरेंद्र मोदी के न्यू इंडियातक का सिनेमाई सफर कैसा रहा?

(प्रभात खबर, 24 नवंबर 2019)

Thursday, November 21, 2019

संघर्ष का परिसर: जेएनयू

किसी भी व्यक्ति या संस्थान के जीवन में पचास साल का ख़ास महत्व होता है. दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का यह पचासवां वर्ष है. होना तो यह चाहिए कि विश्वविद्यालय के लिए यह उत्सव का वर्ष होता, जहां उसकी उपलब्धियों और खामियों की समीक्षा होती. लेकिन छात्रावास की फीस में अप्रत्याशित बढ़ोतरी और जेएनयू की लोकतांत्रिक जीवन शैली पर प्रशासन के दबिश देने की मंशा के खिलाफ जेएनयू के विद्यार्थियों को सड़कों पर उतरना पड़ा.

जेएनयू उच्च शिक्षा के लिए देश और विदेश मे एक जाना-पहचाना नाम है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) की ओर से जारी नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग में जेएनयू उच्च पायदानों पर रहा है. हालांकि वर्ष 2016 से जेएनयू की चर्चा शिक्षा के एक उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान से ज्यादा देशद्रोह, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को लेकर विचारधारात्मक संघर्ष के परिसर के रूप में होती रही है. अब लोगों को समझ में आने लगा है कि इसके पीछे किस तरह की राजनीति और कारोबारी प्रचार और संचार तंत्र का हाथ रहा है.

शुरुआती दौर से जेएनयू की छवि एक प्रगतिशील विचारधारा और राजनीतिक रुझान वाले संस्थान की रही है, लेकिन किसी भी उत्कृष्ट विश्वविद्यालय की तरह यह एक लोकतांत्रिक परिसर है जहाँ बहस-मुबाहिसा और प्रतिरोध के स्वर हमेशा बुलंद रहे हैं. खासतौर पर आपातकाल के दौरान जेएनयू सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का एक केंद्र बन कर उभरा था. सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ छात्र-छात्राओं ने एक बड़ा संघर्ष किया था. राजनीतिक सक्रियता जेएनयू के छात्रों को विरासत में मिली है. एक बार फिर से खबरिया चैनलों में जेएनयू को लेकर पूर्वाग्रह है और सोशल मीडिया में कई लोगों ने शट डाउन जेएनयू’ जैसे हैशटैग के साथ जेएनयू बंद करोका अभियान चलाया.

मुझे याद है कि पिछले दशक में जब मैं जेएनयू का छात्र था तो समाजशास्त्र में राजस्थान के भील समुदाय से एक छात्र ने एमए में नामांकन लिया था. हम एक ही हॉस्टल में रहते थे. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि  मेरे मन में अपनी आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि का ख्याल हर वक्त रहता हैपर सहपाठीमित्रोंऔर शिक्षकों ने किसी भी तरह की हीनमन्यता को मेरे अंदर घर नहीं करने दिया.” बहरहाल, एक आंकड़ा के मुताबिक 2017-18 के दौरान जेएनयू में पढ़ने वाले करीब 40 प्रतिशत छात्रों के परिवार की मासिक आय 12 हजार रुपए से कम  आंकी गई थी. जेएनयू की नामांकन पद्धति में सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रछात्राओं को नामाकंन के लिए ‘डेप्रिवेशन पाइंट्स’ दी जाती है.

जेएनयू में सबसिडी की वजह से पढ़ाई लिखाई के खर्चे, छात्रावास की फीस वगैरह बेहद कम हैं और इस लिहाज से शुरुआती दौर से देश के कोने-कोने से प्रतिभावान छात्र पढ़ने और शोध करने आते रहे हैं. इनमें से कई विद्यार्थी अपने परिवार और रिश्तेदारों में पहली पीढ़ी के होते हैं, जिन्होंने उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय का रूख किया होता है.  पिछले दिनों1981-83 के दौरान जेएनयू के छात्र रहेअर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेताअभिजीत बनर्जी ने भी बातचीत में इस बात का जिक्र किया था कि उनके दौर में भी जेएनयू में देश के विभिन्न हिस्सों से छात्र मौजूद थे, जो इसकी खूबी थी. इस तरह जेएनयू अखिल भारतीय स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता रहा.

पूरी दुनिया में शिक्षा को ‘पब्लिक गुड’ मानने और शिक्षा के निजीकरण को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है. अमेरिका और ब्रिटेन में विद्यार्थियों को कर्ज लेकर महंगी उच्च शिक्षा पूरी करनी होती है. नतीजतन, एक खास वर्ग तक ही उच्च शिक्षा की पहुँच है. इसके उलट जर्मनी और फ्रांस में उच्च शिक्षा में कई तरह का वित्तीय अनुदान यानी सबसिडी देकर सस्ता बनाया गया है. इस दशक में इंग्लैंड में उच्च शिक्षा में महंगी ट्यूशन फीस को लेकर कई बार छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया है.

मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में देश में उच्च शिक्षा को विभिन्न तरह के अनुदान देकर सुलभ बनाया गया था. उदारीकरण के बाद कई निजी विश्विद्यालय उभरे हैं, जिनका जोर गुणवत्ता पर कम अपने कारोबार को बढ़ाने पर ज्यादा है. महंगी फीस होने के कारण एक खास वर्ग के बच्चे ही इन विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं. उच्च शिक्षा में निवेश को हम तात्कालिक नफे-नुकसान के आधार पर नहीं तौल सकते हैं.

राजनेताओं-शिक्षाविदों ने देश निर्माण में शिक्षा के महत्व को हमेशा महत्वपूर्ण माना है. उच्च शिक्षा कई तरह की जातीय-वर्गीय-लैंगिक बाधाओं को तोड़ता है और समाज के हाशिए पर रहने वाले कमजोर तबकों को आगे बढ़ने के अवसर देता है. पिछले पचास वर्षों में जेएनयू ने देश को बेहतरीन शिक्षक, अध्येता, राजनेता, नौकरशाह, समाजसेवी और पत्रकार दिए हैं. कहा जा सकता है कि भारत जैसे विकासशील देश में जेएनयू सामाजिक न्याय और समानता का एक सफल मॉडल है. जेएनयू की स्थापना के पचासवें वर्ष में उच्च शिक्षा को लोक हित में मानते हुए एक सार्थक विमर्श होना चाहिए, ताकि हम राष्ट्र निर्माण की सही दिशा में आगे बढ़ सके. यही जेएनयू की परंपरा रही है. 

(जनसत्ता, 21 नंवबर 2019)

Thursday, November 14, 2019

भारतीय सिनेमा पर नेहरू की छाया


पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बॉलीवुड के फिल्मकारों, अदाकारों और सितारों से मुलाकात की. इस मुलाकात में उन्होंने महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के अवसर पर उनके विचारों को सिनेमा के माध्यम से फैलाने पर जोर दिया. खुद गाँधी सिनेमा से प्रभावित नहीं थे. वे सिनेमा के बारे में अच्छी राय नहीं रखते थे. अपने जीवन में उन्होंने महज दो-एक फिल्में ही देखी थीं. हालांकि महात्मा गाँधी के विचारों ने कला के अन्य माध्यमों की तरह भारतीय सिनेमा और खास तौर पर बॉलीवुड को गहरे प्रभावित किया. खुद गाँधी का जीवन कई चर्चित फिल्मों मसलन गाँधी, द मेकिंग ऑफ महात्मा, लगे रहो मुन्ना भाई आदि का हिस्सा रहा है.

पर महात्मा गाँधी से उलट देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सिनेमा में गहरी रूचि थी. वे लोगों के जीवन को प्रभावित करने में सिनेमा को एक सशक्त माध्यम मानते थे. और अकारण नहीं कि बॉलीवुड के विकास में नेहरू की नीतियों का काफी योगदान है, जिसकी चर्चा आज कम ही होती है. देश में ऐसी हवा बह चली है कि जवाहरलाल नेहरू के बारे में कही कोई भी बात तथ्य से परे जाकर राजनीतिक रंग ले लेती है.

देश की आजादी के बाद वर्ष 1949 में सिनेमा उद्योग की वस्तुस्थिति की समीक्षा के लिए नेहरू ने फिल्म इंक्यावरी कमेटीका गठन किया था. इस समिति ने सिनेमा के विकास के लिए सुझाव दिए थे. इसी के सुझाव के आधार पर फिल्म फाइनेंस कार्पोरेशन, जो बाद में नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन के नाम से जाना गया, का गठन 1960 में किया गया. इसी साल तत्कालीन सोवियत संघ की राजधानी मास्को स्थित सरगी ग्रासीमोव फिल्म संस्थान की तर्ज पर पुणे स्थित फिल्म संस्थान (एफटीआईआई) की स्थापना हुई. सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सिनेमा को संरक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म संस्थान की स्थापना के कुछ ही वर्ष बाद 1964 में फिल्म संस्थान में ही राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना की गई. अपने आप में देश में यह एक मात्र ऐसा संस्थान है जो फिल्मो के संग्रहण, प्रसार और संरक्षण में जुटा है.

50 के दशक की फिल्मों पर नेहरू के विचारों की स्पष्ट छाप है. इस दौर में बनी बॉलीवुड की फिल्मों में नेहरू के आइडिया ऑफ इंडियाकी अभिव्यक्ति मिलती है. एक तरह का रोमांटिक नजरिया इन फिल्मों में दिखता है. राजनीतिशास्त्री मेघनाद देसाई दिलीप कुमार को नेहरू का हीरोकहते हैं.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ममलापुरम में मोदी के साथ हुई मुलाकात में लोकप्रिय फिल्म दंगल का जिक्र किया था, जिसका उल्लेख मोदी ने बॉलीवुड कलाकारों के साथ किया. नेहरू सिनेमा के कूटनीतिक इस्तेमाल को बखूबी जानते थे. सांस्कृतिक शिष्टमंडलों में वे बॉलीवुड के कलाकारों को शामिल करते थे. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बॉलीवुड के साफ्ट पावर को आज हर कोई महसूस करता है. वर्ष 1955 में रिलीज हुई राजकपूर की फिल्म-श्री 420, में शैलेंद्र का लिखा यह गाना- मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी/ सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी, जैसे नेहरू के दौर को इंगित करता है.

(राजस्थान पत्रिका, 14 नवंबर 2019)

Wednesday, October 30, 2019

हारिल हैं हम तो

स्मृतियां अक्सर अनकहे दस्तक देती हैं. कभी किसी बातचीत के बीच या कभी किसी सिनेमा, संगीत के माध्यम से या कई बार बिना किसी आश्रय के. करीब 23 वर्षीय युवा अचल मिश्र की मैथिली फिल्म-गामक घर (गांव का घर)की इन दिनों मीडिया में खूब चर्चा है. इस फिल्म में मिथिला में बसे एक गांव की यादें हैं, जहां से निर्देशक का जुड़ाव है. इस फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद मेरा भी मन बचपन के दिनों में लौट आया.
पिछले कुछ वर्षों में बिहार के बाहर मीडिया में लोक पर्व छठ की खूब चर्चा होती रही है. वहीं छठ के इर्द-गिर्द ही मिथिला में एक और लोक पर्व- सामा-चकेवाभी मनाया जाता रहा है, लेकिन वह अनदेखा रह जाता है. कार्तिक महीने में छठ के अगले दिन सामा-चकेवाकी शुरुआत होती है, जो आठ दिनों तक चलती है.
यह लोक पर्व भाई-बहन के आपसी प्रेम को दिखाता है. इसी मौसम में हिमालय से मैदान की ओर पक्षियां प्रवास के लिए आते हैं. युवतियां मिट्टी की आकृतियों में विभिन्न पक्षियों को अपने रंग में रंगती हैं. सामा-चकेवा पक्षियों का स्वागत इस पर्व से जुड़ा है. लोक गीतों के साथ सामा की विदाई होती है, इस आग्रह के साथ कि वे फिर से लौट कर मिथिला की धरती पर आयें.
मिथिला की चर्चित सिक्की कला भी सामा की पौतीके रूप में दिखायी पड़ती है. मेरे लिए सामा-चकेवा मिथिला की संस्कृति का एक अहम हिस्सा है, जिसमें मिथिला पेंटिंग, सिक्की कला, लोक गीतों की झलक है. दूसरे स्तर पर देखें, तो प्रकृति के साथ मनुष्य के सहज संबंधों की अभिव्यक्ति भी इस लोक पर्व में मिलती है.
जब से गांव-घर छूटा है, मैंने इस पर्व को मनाते हुए नहीं देखा. दिल्ली-एनसीआरमें तो इसकी चर्चा भी नहीं होती, जहां मिथिला समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग रहता है. बहरहाल, मेरा एक दोस्त कहता है, ‘यार, शाम होते ही आजकल तुमपे उदासी क्यों छाने लगती है.मैं उसके जवाब में नहीं तोकह कर उसकी बात को टालने की कोशिश करता हूं. मैं होमसिककभी नहीं रहा, लेकिन अक्सर इस मौसम में शाम ढलते-ढलते एक अजीब सी नॉस्टेल्जियामेरे अंदर घर करने लगती है.
जेएनयू के दिनों में मेरे हॉस्टल के कमरे की बालकनी में ठीक सामने एक बरगद का पेड़ था और टेरेस पर एक झुरमुट पीपल. इन पेड़ों पर हर साल प्रवासी पक्षियों के झुंड आते थे. नवंबर आते ही मैं इनका इंतजार करता था. मुझे नहीं पता होता कि ये किस देश से आते थे.
वियोग में होते थे या प्रेम में? निर्वासन की पीड़ा झेल रहे थे या सैर-सपाटे के मूड में. या किसी सहचर की खोज में भटक रहे थे? कवि उदय प्रकाश ने नींव की ईंट हो तुम दीदीशीर्षक कविता में लिखा है- हमारा क्या है दिदिया री!/ हारिल हैं हम तो/ आयेंगे बरस दो बरस में कभी/ दो-चार दिन मेहमान-सा ठहर कर/ फिर उड़ लेंगे. गामक घरएक रूपक है, हम जैसे हारिलोंके लिए.

प्रभात खबर, 30 अक्टूबर 2019

Sunday, October 20, 2019

हिंदी सिनेमा का चमकता सितारा: अमिताभ बच्चन

पिछले साल अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर लिखा था कि भारतीय फिल्म उद्योग का इतिहास हमेशा ‘दिलीप कुमार से पहले और दिलीप कुमार के बाद’ के रूप में लिखा जायेगा. भारतीय सिनेमा के इतिहास में युगों और उनकी प्रवृत्तियों की ठीक ढंग शिनाख्त अभी नहीं हुई है. भले अमिताभ की पीढ़ी के पंसदीदा अभिनेता दिलीप कुमार हैं, लेकिन भारतीय सिनेमा के सबसे चर्चित और लोकप्रिय सितारे की जब बात होगी, तब बिना किसी दुविधा के अमिताभ बच्चन का ही नाम लिया जायेगा. पिछले पचास वर्षों से बॉलीवुड के आकाश में उनकी चमक बरकरार है. यह भी महज एक संयोग ही है कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार के 50वें वर्ष में उन्हें यह सम्मान दिया गया.
पचास और साठ के दशक की रोमांटिक फिल्मों में नेहरूयुगीन आधुनिकता, राष्ट्र-निर्माण के सपनों की अभिव्यक्ति मिलती है. अमिताभ की सिनेमा-यात्रा का वितान नक्सलबाड़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि से होते हुए आपातकाल, उदारीकरण-भूमंडलीकरण और नयी सदी में बदलते भारत तक फैला हुआ है. ‘सात हिंदुस्तानी’ (1969) फिल्म से जारी इस सफर में उन्होंने परदे पर विभिन्न किरदारों को जिया और किसी एक छवि में कैद नहीं हुए.
हालांकि, ‘एंग्री यंग मैन’ छवि की चर्चा आज भी होती है. सलीम-जावेद की जोड़ी ने अमिताभ के इस रूप को परदे पर मूर्त किया. ‘दीवार’ (1975) फिल्म का विजय व्यवस्था से विद्रोह करता हुआ, हाशिये पर पड़ा एक आम आदमी है. इस आम आदमी के असंतोष, क्षोभ, हताशा, सपने और मोहभंग को अमिताभ ने स्वर दिया. एक बातचीत में जावेद अख्तर ने कहा है, ‘इसमें आश्चर्य नहीं कि उस समय की नैतिकता यह थी कि यदि आप न्याय की चाहत रखते हैं, तो उसके लिए आपको खुद लड़ाई लड़नी होगी.
फिल्म ‘जंजीर’ का पुलिस इंस्पेक्टर ‘दीवार’ में एक स्मगलर बन जाता है. अमिताभ की इस छवि के निर्माण में तत्कालीन राजनीति, सामाजिक व्यवस्था और शहरी मध्यमवर्ग की बड़ी भूमिका थी. विजय ‘एंटी होरी’ बनकर आजादी, न्याय और समानता की अवधारणा को परदे पर पुनर्परिभाषित करता है.
इसी दौर में हिंदी के कवि धूमिल ने अपनी कविता में पूछा था- ‘क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है/ जिन्हें एक पहिया ढोता है/ या इसका कोई खास मतलब होता है?’
हालांकि, अमिताभ की फिल्में जब ‘मेलोड्रामा’ और ‘फैंटेसी’ के सहारे यथार्थ को परदे पर रच रही थीं, ठीक उसी समय बांग्ला, मलयालम और हिंदी के समांतर सिनेमा में राजनीतिक सवालों, सत्ता के दमन और आम आदमी के ‘आक्रोश’ की कलात्मक अभिव्यक्ति भी हुई. लेकिन यह सच है कि पॉपुलर और व्यावसायिक सिनेमा का अपना अर्थशास्त्र है, जिसे समांतर सिनेमा के मानकों से नहीं समझा जा सकता.
पूंजीवादी समाज की सांस्कृतिक जरूरतों को बॉलीवुड पूरा करता रहा है, अमिताभ इसके प्रतिनिधि कलाकार हैं. सिनेमा के अध्येताओं ने अमिताभ के 80 के दशक की फिल्मों के प्रसंग में परदे पर ‘दर्शन’ के तत्व को रेखांकित किया है, जैसा कि भगवद् भक्ति में होता है. ‘मैं आजाद हूं’ (1989) फिल्म में यह मसीहाई अंदाज स्पष्ट है. इसी दशक में अमिताभ का ‘स्टारडम’ ढलान पर था और कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर पिट गयीं.
नयी आर्थिक नीतियों के बाद समृद्ध हो रहे भारत में सैटेलाइट और केबल टीवी के माध्यम से टीवी और सिनेमा के बीच एक एक नया संबंध उभरा. ‘कंप्यूटर जी’ से संवाद करते अमिताभ बच्चन रुपहले परदे से उतर कर आम दर्शकों के ड्राइंग रूम में पहुंच गये.
साथ ही पिछले दशकों में व्यावसायिक और समांतर सिनेमा की रेखा भी कुछ धुंधली हुई है. फिल्म ‘ब्लैक’, ‘पा’, ‘पीकू’, ‘पिंक’ आदि फिल्मों में उन्होंने जिस किरदार को जिया है, वह समकालीन समय और संवेदना के बहुत करीब है, जिसकी व्याख्या सत्तर के दशक के परिवेश के परिप्रेक्ष्य में नहीं की जा सकती. ‘मिलेनियल पब्लिक’ और ‘मेलोड्रामैटिक पब्लिक’ दोनों से उनका राब्ता कायम है.

(प्रभात खबर, 20 अक्टूबर 2019)

Saturday, October 19, 2019

बहस-मुबाहिस के पक्ष में अभिजीत बनर्जी


इस बार अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार अमेरिकी नागरिक अभिजीत बनर्जी, एस्थर डुफलो और माइकल क्रेमर को गरीबी उन्मूलन के लिए किए गए उनके शोध के लिए दिया गया है. प्रोफेसर अभिजीत बनर्जी की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा भारत में हुई और वह प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन के बाद एमए करने जेएनयू, दिल्ली आ गए थे. चूँकि बनर्जी की जड़ें भारत में है, इस वजह से उनकी उपलब्धियों पर गर्व स्वाभाविक है और मीडिया में जेएनयू की खास तौर पर चर्चा है.

वर्ष 2016 से जेएनयू की चर्चा में नकारात्मक तत्वों का बोलबाला रहा है. इसमें देश की वर्तमान राजनीति और सोशल मीडिया का भी योगदान है. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1969 में जब जेएनयू की स्थापना हुई, देश में नक्सलबाड़ी आंदोलन का दौर था. एक तरह से जेएनयू की जन्मकुंडली में ही राजनीतिक सरोकारों और हाशिए पर रहने वाले समाज के लोगों के प्रति संवेदना का भाव रहा है.

प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्सके बदले जेएनयू में नामांकन उन्होंने क्यों लिया इसे याद करते हुए अभिजीत बनर्जी ने खुद लिखा है कि जेएनयू की फिजा अलग थी. जेएनयू की ऊबड़-खाबड़, बेढ़ब खूबसूरती कुछ अलग थी जबकि डी-स्कूल (दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स) किसी भी दूसरे भारतीय संस्थान की तरह ही था. खादी कुर्ते में, पत्थरों पर बैठे बहस करते छात्रों में मैंने खुद को देखा था.

एक गर्बीली गरीबी और बहस-मुबाहिसा की परंपरा जेएनयू में आज भी कायम है. वामपंथी रुझान के बावजूद जेएनयू एक लोकतांत्रिक जगह है.
अभिजीत बनर्जी अपनी किताब के साथ

पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक दुनिया में लोकतांत्रिक ढंग से बहस-मुबाहिसा के लिए जगह सिकुड़ी है. यह बात ना सिर्फ राजनीति बल्कि मीडिया के लिए भी सच है. प्रसंगवश, एस्थर डुफलो के साथ लिखी हाल ही में प्रकाशित उनकी किताब- गुड इकानामिक्स फॉर हार्ड टाइम्समें उन्होंने जिक्र किया है कि किस तरह लोकतंत्र के ऊपर सोशल मीडिया का नाकारात्मक प्रभाव पड़ा है. उन्होंने लिखा है: इंटरनेट का विस्तार और सोशल मीडिया के विस्फोट से पक्षपातपूर्ण रवैए में बढ़ोतरी हुई है.इस संदर्भ में वे फेक न्यूज और सोशल मीडिया में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को भी रेखांकित करते हैं जिससे विचार-विमर्श प्रभावित हुआ है.

वर्ष 2016 में जब जेएनयू में तथाकथित देश विरोधी नारे लगाने की बात को लेकर सरकार ने छात्र नेताओं को जेल भेजा तब उन्होंने जोर देकर कहा था देश को जेएनयू जैसे सोचने-विचारने वाली जगह की ज़रूरत है और सरकार को निश्चित तौर पर दूर रहना चाहिए. प्रसंगवश, वर्ष 1983 में कुलपति प्रोफेसर पीएन श्रीवास्तव के कार्यकाल के दौरान जब जेएनयू में छात्र आंदोलन हुआ था तब सैकड़ों छात्रों को तिहाड़ जेल जाना पड़ा. अभिजीत बनर्जी भी उनमें शामिल थे. हालांकि बाद में सरकार ने सारे आरोप वापस ले लिए थे.

(राजस्थान पत्रिका, 19 अक्टूबर 2019)