Sunday, March 12, 2023

ऑस्कर में भारत की दावेदारी, कितनी उम्मीद


सिनेमा जगत में ऑस्कर वाली शाम को लेकर एक बार फिर से हलचल है. 
रविवार (भारत में सोमवार की सुबह) को लॉस एंजेलिस में 95वें ऑस्कर पुरस्कारों की घोषणा होगी.

कयास लगाए जा रहे हैं कि विज्ञान आधारित फंतासी को लेकर मानवीय रिश्तों के इर्द-गिर्द बनी एबसर्ड कॉमेडी ड्रामा एवरीथिंग एवरीव्हेर आल एट वंस को बेस्ट फिल्म का पुरस्कार मिलेगा  या ट्रेजिक कॉमेडी द बंशीज ऑफ इनिशरिन को? ‘द बंशीज ऑफ इनिशरिन में जिस तरह से कहानी बुनी गई है  वह देखने वालों को आकर्षित करती है. इस फिल्म में रचनात्मकता को लेकर जो आत्महंता आस्था दिखाई देती है, अचंभित भी करता है. इस फिल्म में कलाकारों के अभिनय की उत्कृष्टता विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिन्हें विभिन्न वर्गों में नामांकन मिला है.  इस फिल्म के निर्देशक मार्टिन मेकडनाह को भी बेस्ट डाइरेक्टर के लिए नामित किया गया है. वहीं एवरीथिंग एवरीव्हेर आल एट वंस’ को सबसे ज्यादा विभिन्न श्रेणियों में नामित किया गया है. इस फिल्म के निर्देशक डैनियल क्वान और डैनियल शाइनर्ट के साथ फिल्म की अभिनेत्री मिशेल योह की चर्चा है. योह को बेस्ट एक्ट्रेस के लिए नॉमिनेशन मिला है. उल्लेखनीय है कि मलेशिया मूल की चर्चित अभिनेत्री योह पहली एशियाई अभिनेत्री है जिसे ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया है.

ऑस्कर पुरस्कारों पर बहुलता की अनदेखी करने और नस्लवाद का आरोप दशकों से लगता रहा है. पिछले वर्षों में सदस्यों में स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की भागेदारी बढ़ी है फिर भी इनमें अधिकांश श्वेत पुरुष ही है. क्या योह इतिहास रचने में कामयाब होगी? प्रसंगवश, उन्हें इस साल बेस्ट एक्ट्रेस के लिए गोल्डन ग्लोब पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है.

साल भर से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी युद्ध विरोधी फिल्म ऑल क्वाइट ऑन द वेस्टर्न फ्रंट की भी दावेदारी है. सवाल है कि क्या हम प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध से कोई सबक सीख पाए हैंयह फिल्म 'बेस्ट पिक्चर' और 'बेस्ट इंटरनेशनल फीचर' दोनों ही श्रेणी में नॉमिनेटेड है. दिग्गज निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की आत्मकथात्मक फिल्म द फेबलमैन्स की भी चर्चा है.

भारत में लोगों की दिलचस्पी के केंद्र में एसएस राजामौली की फिल्म आरआरआर’ का गाना नाटू-नाटू’  है जिसे म्यूजिक (ओरिजनल सांग)’ की श्रेणी में नामित किया गया है. इसे बेस्ट पिक्चर के अंतिम दस में नामांकन नहीं मिल पाया था, हालांकि देश-विदेश में इसे काफी सराहना मिली है.

फीचर फिल्मों से अलग भारत की दो डॉक्यूमेंट्री फिल्में ऑल दैट ब्रीद्स’ और द एलीफेंट व्हिस्परर्सभी अंतिम पाँच में शामिल है. उम्मीद है कि डॉक्यूमेंट्री की श्रेणी में भारत को इस बार ऑस्कर मिलेगा. आश्चर्य है कि शौनक सेन निर्देशित डॉक्यूमेंट्री ऑल दैट ब्रीद्स को भारत में अभी तक रिलीज नहीं किया गया है, लेकिन दुनिया भर के फिल्म समारोहों में इसने खूब सुर्खियां बटोरी है. पिछले साल इस डॉक्यूमेंट्री को कान में बेस्ट डॉक्यूमेंट्री के लिए गोल्डेन आई’ पुरस्कार और सनडांस फिल्म समारोह में विश्व सिनेमा वृत्तचित्र श्रेणी में ग्रांड ज्यूरी पुरस्कार मिल चुका है. इस फिल्म में जिस तरह से बिंब और ध्वनि का इस्तेमाल किया गया है वहाँ फीचर और डॉक्यूमेंट्री को लेकर श्रेणीगत विभाजन मिट जाता है.

ऑल दैट ब्रीद्स एक साथ कई विषयों को खुद में समेटे है. दिल्ली में प्रदूषण की समस्या इसके केंद्र में है, वहीं वजीराबाद में रहने वाले दो मुस्लिम भाई (सऊद और नदीम) और उसके सहयोगी (सलीक) के सहारे यह वृत्तचित्र आगे बढ़ती है. पिछले बीस साल से आसमान से गिरते चीलों और अन्य घायल पक्षियों की देखभाल वे करते रहे हैं.  पृष्ठभूमि में नागरिकता कानून (सीएए) और दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों की अनुगूंज भी सुनाई पड़ती है. यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म जितना मानवीय संबंधों को चित्रित करती है उतना ही पर्यावरण के साथ हमारे रिश्ते को भी. धर्म के नाम पर विभेद की राजनीति भी बहसतलब है. दिल्ली की प्रदूषित हवा’ में न सिर्फ चील बल्कि इंसान भी घुट रहे हैं. यह सब मानव निर्मित है.

कुल एक घंटे छत्तीस मिनट की इस वृत्तचित्र में इंसान और आस-पास के जीव-जंतुओं के बीच जो एक बिरादरी’ का भाव है वह देखने वालों के मन को छू जाता है. आत्म और अन्य का विभेद यहाँ मिट जाता है. फिल्म के शुरुआत में ही चूहेचीलमेंढककुत्तेबिल्लीसूअर दिखाई देते हैं. चील की निरीह आँखे हमसे संवाद करती हुई प्रतीत होती है.

इसी तरह कार्तिकी गोंसाल्वेस की द एलीफेंट व्हिस्परर्स’ के केंद्र में एक हाथी (रघु) है. इसके इर्द-गिर्द हाथियों की देखभाल करने वाले बोम्मन और बेली के बीच पनपते हुए रिश्ते को हम देखते हैं. असल में बेहद संवेदनशीलता के साथ चालीस मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री में इंसान और जानवर के बीच लगाव को दिखाया गया है. साथ ही नीलगिरी का मनमोहक सौंदर्य भी यहाँ लिपटा हुआ चला आता है.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, March 05, 2023

बच्चों के विनोद कुमार शुक्ल


हिंदी के चर्चित साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को मिले पेन/नाबाकोव पुरस्कार की चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है. उनके उपन्यासकार, कवि, कथाकार रूप की एक बार फिर मीडिया में बात हो रही है. नौकर की कमीज और  ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी उपन्यास के अलावे लगभग जय हिंद’, ‘सब कुछ बचा रहेगा जैसा कविता संग्रह से उन्हें साहित्य जगत में काफी प्रतिष्ठा मिली. वे पहले भारतीय एशियाई मूल के लेखक हैं जिन्हें पचास हजार डॉलर का यह सम्मान मिला है.

विनोद कुमार शुक्ल की एक विशिष्ट भाषा और लेखन शैली है. यथार्थ चित्रण में भी एक रागात्मकता यहाँ दिखाई देती हैहालांकि कई बार यह बोझिल भी हो जाती है. पर उनके प्रशंसकों का एक अलग वर्ग रहा है, इससे इंकार नहीं.

बहरहाल, पिछले दिनों दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य नए कलेवर में पाठकों के लिए उपस्थित रहा. साथ ही मेले के दौरान इकतारा ट्रस्ट से छपी उनकी बच्चों के लिए लिखी किताबों- एक चुप्पी जगह’ , ‘गोदाम’, ‘एक कहानी’, ‘घोड़ा और अन्य कहानियाँ’ तथा बना बनाया देखा आकाश: बनते कहाँ दिखा आकाश’ (कविता संग्रह) दिखाई दिया. इन सब के बीच उनके बाल साहित्यकार रूप में उनकी चर्चा छूट जाती हैजबकि हाल के वर्षों में 86 वर्षीय विनोद कुमार शुक्ल बच्चों के लिए साहित्य रचने पर जोर दे रहे हैं.

पुरस्कार के बाद एक बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे कहा कि अभी मेरी सोच में बच्चों के लिए लिखने का अधिक रहता है. मैं इस उम्र में छोटा लिखता हूँ और कम लिखता हूँ क्योंकि ज्यादा देर तक किसी एक चीज पर कायम रहना बहुत कठिन हैलेखन में भी. ज्यादा देर तक खड़े नहीं रह सकताबैठ भी नहीं सकता. मेरी शारीरिक और मानसिक स्थिति अब वैसे नहीं हैलेकिन तब भी मैं बच्चों के लिए लिख रहा हूँ.

वे जोर देकर कहते हैं कि बच्चों पर लिखते हुए वे अपने बचपन में लौट रहे हैं. बातचीत के क्रम में वे अपनी अम्मा को याद करते हुए कहते हैं कि मेरी अम्मा के घर में हम बच्चों पर एक अच्छा प्रभाव पड़ा थाखासकर अपने साथ वह बंगाल के साहित्य का संस्कार भी लेकर आ गई थी.

पिछले कुछ सालों में पुस्तक मेले में बाल साहित्य में बच्चों और वयस्कों की दिलचस्पी काफी दिखाई देती रही हैलेकिन हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों का लेखन यहाँ नहीं दिखता. सच तो यह है कि हिंदी में साहित्यकारों ने बच्चों को ध्यान में रख कर बहुत कम लिखा है. प्रकाशकों ने भी इस वर्ग के पाठकों में रुचि नहीं दिखाई. इसके क्या कारण हैजहाँ हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशक बच्चों के लिए किताबें छापने से बचते रहे हैं वहीं हाल में एकलव्यइकताराकथाप्रथम जैसी संस्थाओं में हिंदी में रचनात्मक और सुरुचिपूर्ण किताबें छापी हैं. नेशनल बुक ट्रस्ट बच्चों के लिए किताबें छापता रहा हैपर बदलते समय के अनुसार विषय-वैविध्य और गुणवत्ता का अभाव है यहाँ. ऐसे में विनोद कुमार शुक्ल का बाल साहित्यकार रूप अलग से रेखांकित करने की मांग करता है.

(प्रभात खबर, 5 मार्च 2023 को प्रकाशित)

Saturday, March 04, 2023

वयस्कों के लिए ही नहीं, बच्चों के लिए भी है पुस्तक मेला पर बाल साहित्य है कहाँ ?


दिल्ली में लगा विश्व पुस्तक मेला इस हफ्ते में समाप्त हो जाएगा. तीन साल बाद लगे इस मेले का इंतजार प्रकाशक, लेखक और पुस्तक प्रेमी शिद्दत से कर रहे थे.

इंटरनेट क्रांति ने पिछले दो दशक में हमारे पढ़ने-लिखने, प्रकाशन और ज्ञान उत्पादन के तरीकों को काफी प्रभावित है. मध्यमवर्ग के पास किताब पढ़ने के लिए समय की कमी हुई है, साथ ही पाठकों का समय ऑनलाइन सर्फिंग, वीडियो देखने, ऑडियो सुनने में जाया होता है. यह समय पुस्तक संस्कृति के लिए चुनौती का है, लेकिन तकनीक ने संभावनाओं का विस्तार भी किया है. किताबों के किंडल, ई बुक, ऑडियो संस्करण आने लगे हैं. प्रकाशकों के लिए सोशल मीडिया किताबों के प्रचार-प्रसार का एक अच्छा मंच बन कर उभरा है. साथ ही यहाँ पुस्तक प्रेमी किताबों की समीक्षा और टीका-टिप्पणी करते रहते हैं.

हिंदी क्षेत्र में जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर सुधरा है, नए पाठक वर्ग भी उभरे हैं जिनमें पढ़ने की खूब ललक है. आर्थिक विकास से मध्यवर्ग की आमदनी में बढ़ोतरी भी हुई. यह अलग बात है कि कोरोना महामारी ने अर्थव्यवस्था को झटका दिया जिससे मध्य और निम्न मध्यवर्ग खूब प्रभावित हुआ. इसका असर इस साल पुस्तक मेले में भी दिखा. पुस्तक मेले में शनिवार-रविवार के दिन चहल-पहल थी, पर बाकी दिनों में रौनक नहीं दिखा. हिंदी के कुछ प्रकाशकों ने पाठकों की अरुचि को कोरोना से जोड़ कर देखा, जिसने किताब पढ़ने की संस्कृति को प्रभावित किया है.

बहरहाल, किताब पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति की शुरुआत बचपन से होती है. इंटरनेट, मोबाइल के दौर में बच्चों को किस तरह से किताब पढ़ने की तरफ मोड़े यह एक चुनौती है. पर क्या हिंदी के प्रकाशक की चिंता में पाठकों का यह वर्ग हैअंग्रेजी या बांग्ला में जिस तरह से बाल साहित्य दिखाई देता है, वैसा हिंदी में नहीं दिखता. ऐसा क्यों हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान के स्टॉल पर बच्चों के लिए कुछ भी दिखाई नहीं देता.

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में अठारह साल से कम उम्र के करीब सैंतालीस करोड़ बच्चे हैं. जाहिर है, एक बहुत बड़ा बाजार है जो प्रकाशकों के इंतजार में है. ऐसा नहीं हिंदी में बच्चों के लिए किताबें नहीं छपती है. नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) से कम कीमत पर विभिन्न विषयों पर किताबें दिखती रही हैं. साथ ही नेहरू बाल पुस्तकालय के तहत भी एनबीटी ने खूब किताबें छापी हैं. पर बच्चों की किताबों में चित्रों, रेखांकन पर जोर होना चाहिए, जिसका अभाव यहाँ हैं. साथ ही नए विषयों को समाहित करने, प्रकाशन मे प्रयोग करने की कोशिश भी यहाँ नहीं दिखती है. फिर भी मेले में एनबीटी के स्टॉल पर भीड़ दिखाई दे रही थी. पर यहां बच्चे कम और उनके अभिभावक ज्यादा थे.

हाल में एकलव्यइकताराकथाप्रथम जैसी संस्थाओं में हिंदी में रचनात्मक और सुरुचिपूर्ण किताबें छापी हैं. इन किताबों की कीमत भी ठीक-ठाक है. अच्छी बात यह है कि इकतारा ट्रस्ट से प्रकाशित किताबों में चर्चित साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल, अरुण कमल, स्वयं प्रकाश, प्रियंवद आदि का लिखा बाल साहित्य दिखाई देता है.

विनोद कुमार शुक्ल को पिछले दिनों साहित्य में योगदान के लिए पेन/नाबाकोव पुरस्कार मिला जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय जगत में है. वे पहले भारतीय एशियाई मूल के लेखक हैं जिन्हें पचास हजार डॉलर का यह सम्मान मिला है. जहाँ उनके लिखे नौकर की कमीज’ और  दीवार में एक खिड़की रहती थीखिलेगा तो देखेंगे’ जैसे उपन्यास, 'महाविद्यालयऔर 'पेड़ पर कमरा जैसे कहानी संग्रह, लगभग जय हिंद’, ‘सब कुछ बचा रहेगा जैसे कविता संग्रह की चर्चा हो रही है वहीं पिछले एक दशक में उन्होंने जो बाल साहित्य लिखा है उसकी चर्चा नहीं होती. मेले में इकतारा के स्टॉल पर बच्चों के लिए उनका लिखा एक चुप्पी जगह, ‘तीसरा दोस्त’ गोदाम, , एक कहानी, ‘घोड़ा और अन्य कहानियाँ तथा बना बनाया देखा आकाशबनता कहां दिखा आकाश’ (कविता संग्रह) आदि दिखाई दिया.

यह पूछने पर कि उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने कैसे बाल साहित्य लिखने की सोचा, शुक्ल ने एक बातचीत में मुझसे कहा: “बच्चों के बारे में मैं लिखता नहीं थापर साइकिल पत्रिका (इकतारा) के संपादक सुशील शुक्ल ने मुझे बच्चों के बारे में लिखने को कहा. मैंने कभी बच्चों के लिए लिखा नहीं था. मैंने अपने लेखन में कभी नहीं सोचा कि इसका पाठक कौन होगा. मैंने कहा कि अब मुझे सोच करके लिखना पड़ेगा कि मेरे पाठक बच्चे हैं. कितनी उम्र के बच्चे पढ़ेंगे और कैसे पढ़ेंगे. फिर उन्होंने कहा कि किसी भी विषय पर लिखिए-हाथी परघोड़े परचींटी परमछली पर.”  इसके बाद उन्होंने बच्चों की पत्रिका प्लूटो, साइकिल आदि के लिए लिखना शुरु किया. 86 वर्षीय शुक्ल इन दिनों बच्चों के लिए ही लिख रहे हैं. बाल साहित्य के लिए यह आश्वस्तिकारक और अन्य रचनाकारों के लिए प्रेरणादायक है.

हर बड़े रचनाकार के दिल में एक बच्चा छिपा बैठा रहता है. दिक्कत यह है कि हिंदी के प्रकाशक उन्हें टटोलने की जहमत नहीं उठाते हैं, उन्हें रचने के लिए प्रेरित नहीं करते. पुस्तक मेला वयस्कों का ही नहीं, बच्चों का भी है. भविष्य में पुस्तक संस्कृति कौन सा रूप लेगी आज के बच्चे ही इसके जिम्मेदार होंगे. 

Friday, March 03, 2023

विनोद कुमार शुक्ल से एक बातचीत

 


इन दिनों दिल्लीमें चल रहे विश्व पुस्तक मेले में विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य नए कलेवर में पाठकों के लिए उपस्थित हैं. साथ ही मेले के दौरान इकतारा ट्रस्ट से छपी उनकी बच्चों के लिए लिखी किताबों- ‘एक चुप्पी जगह’ , ‘गोदाम’, ‘एक कहानी’, ‘घोड़ा और अन्य कहानियाँ’ तथा ‘बना बनाया देखा आकाश: बनते कहाँ दिखा आकाश’ (कविता संग्रह) दिखाई देता है. इन सब के बीच उनके बाल साहित्यकार रूप में उनकी चर्चा छूट जाती है, जबकि हाल के वर्षों में विनोद कुमार शुक्ल बच्चों के लिए साहित्य रचने पर जोर दे रहे हैं.

पिछले कुछ सालों में पुस्तक मेले में बाल साहित्य में बच्चों और वयस्कों की दिलचस्पी काफी दिखाई देती रही है, लेकिन हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों का लेखन यहाँ नहीं दिखता. सच तो यह है कि हिंदी में साहित्यकारों ने बच्चों को ध्यान में रख कर बहुत कम लिखा है. प्रकाशकों ने भी इस वर्ग के पाठकों में रुचि नहीं दिखाई. इसके क्या कारण है? जहाँ हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशक बच्चों के लिए किताबें छापने से बचते रहे हैं, वहीं हाल के दशकों में एकलव्य, इकतारा, कथा, प्रथम जैसी संस्थाओं में हिंदी में रचनात्मक और सुरुचिपूर्ण किताबें छापी हैं. नेशनल बुक ट्रस्ट बच्चों के लिए किताबें छापता रहा है, पर बदलते समय के अनुसार विषय-वैविध्य और गुणवत्ता का अभाव है यहाँ. ऐसे में विनोद कुमार शुक्ल का बाल साहित्यकार रूप अलग से रेखांकित करने की मांग करता है.

 आपने वयस्क पाठकों के लिए ‘नौकर की कमीज’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ जैसी औपन्यासिक कृतियाँ रची हैं, ‘महाविद्यालय’ और ‘पेड़ पर कमरा’ जैसे कहानी संग्रह. ‘वहीं लगभग जय हिंद’, ‘सब कुछ बचा रहेगा’ जैसा कविता संग्रह भी उपलब्ध है. पिछले करीब एक दशक से आप बच्चों के लिए लिख रहे हैं. उम्र के इस पड़ाव पर बच्चों के लिए साहित्य लिखने का आपने कैसे सोचा?

बच्चों के बारे में मैं लिखता नहीं था, पर साइकिल पत्रिका (इकतारा) के संपादक सुशील शुक्ल ने मुझे बच्चों के बारे में लिखने को कहा. मैंने कभी बच्चों के लिए लिखा नहीं था. मैंने अपने लेखन में कभी नहीं सोचा कि इसका पाठक कौन होगा. मैंने कहा कि अब मुझे सोच करके लिखना पड़ेगा कि मेरे पाठक बच्चे हैं. कितनी उम्र के बच्चे पढ़ेंगे और कैसे पढ़ेंगे. फिर उन्होंने कहा कि किसी भी विषय पर लिखिए-हाथी पर, घोड़े पर, चींटी पर, मछली पर …इसी तरह की उन्होंने बात की.

जब मैं बच्चों के लिए लिखने बैठा तब सबसे पहले यही सोचा कि एक पाठक के रूप में अभी तक मैंने बच्चों के बारे में जो पढ़ा है, ऐसा लगता है कि यह बहुत छोटे बच्चे के लिए लिखा गया है. संभवतः जिसे खुद बच्चे नहीं पढ़ते होंगे कोई दूसरा पढ़ कर सुनाता होगा. मुझे लगा कि बच्चों को स्वयं का एक पाठक वर्ग तैयार होना चाहिए. मैंने मान लिया कि मैं बच्चों के लिए लिखूंगा यह सोच करके कि संभवत: शायद इसे पाँच साल या छह साल या आठ साल के बच्चे समझेंगे. मैं उनसे कहीं ज्यादा उम्र के बच्चों की समझ के अनुसार लिखूंगा. यदि कहीं इसका पाठक कई दस साल का लड़का है जो मैं लिखूंगा वह संभवत: 15 साल के किशोर के उम्र तक की पहुँच का होना चाहिए. इकतारा से दो पत्रिका प्रकाशित होती थी जैसा कि सुशील ने बताया था. मैं ‘प्लूटो’ पत्रिका के लिए लिखता था, बाद में ‘साइकिल’ पत्रिका के लिए लिखा (सुशील साइकिल में चले गए और उनसे एक संपर्क बन गया). ‘प्लूटो’ के लिए मैं छोटे बच्चों के लिए लिखता था पर तब भी यह सोच कर लिखता था कि इनकी समझ कुछ बड़ी होगी.

मैंने फिर बाद में बड़े बच्चों के लिए साइकिल में लिखा. मैंने इस तरह से लिखा कि इसे बड़े लोग या किशोर लोग भी पढ़े तो उनको लगना चाहिए कि उन्होंने भी कुछ पढ़ा और बच्चे तो पढ़ेंगे ही. यही मेरी सोच का हिस्सा रहा.

मैंने अपनी नौ साल की बेटी-कैथी के लिए ‘गोदाम’ किताब खरीदी, पर जब मैंने इसे पढ़ा तो मुझे इस कहानी का कथ्य और संवेदना ने प्रभावित किया. इसमें पेड़-पौधे के प्रति जो लेखक का लगाव है, वहीं मकान मालिक की जो समझ है वह आज के समय को प्रतिबिंबित करता है. आप लिखते है: ‘पेड़ वाले घर मुझे अच्छे लगते है.’ कहानी के आखिर में मकान मालिक पेड़ कटवा कर कहता है: ‘आपका अब यह एक पेड़ वाला घर नहीं है.’ ऐसा लगता है आधुनिक सभ्यता में क्या हम गोदाम में रहने को अभिशप्त है, वहीं दूसरी तरफ यह आपके जीवनानुभवों से पाठकों को जोड़ता है.

जी, मैंने जो कुछ लिखा है अपने अनुभव से लिखा है. मेरा लिखा हुआ मेरी आत्मकथा ही है. मेरा सारा कुछ मेरा जाना-पहचाना रहा है. मैंने जो अनुभव किया- आस-पास के लोगों से, मिलने-जुलने वालों से, जो किताबें मैंने पढ़ी थी, उन किताबों के अनुभव से जो मैंने पाया और जो अनुभव बनाया वही मेरा अनुभव रहा है. वही मेरे लेखन में रहा है.

बड़ों के लिए लेखन और बच्चों के लिए लेखन की भाषा-शैली के बारे में आप क्या सोचते हैं? आप किस रूप में बच्चों के लिए लेखन की तैयारी करते हैं?

जब मैं बड़ों के लिए लिखता हूँ तब बिलकुल नहीं सोचता हूँ कि कितने बड़ों के लिए लिख रहा हूँ. उसमें ऐसा कोई कारण नहीं है. एक स्थिति में आकर के पुस्तक से, अपने अनुभव के अनुसार से… अपना अनुभव बनाने की उम्र तो कभी भी हासिल हो सकती है. आदमी जब 18-19 या 20 साल का हुआ तो वह किताबों की समझ को अपने में चाहे वह किसी के लिए लिख रहा हो, एक पाठक के रूप में अपनी समझ में एक स्थिति तो बना ही लेता है.

तीसरा दोस्त’ कहानी पढ़ते हुए मैं अपने बचपन में लौटा. आप लिखते हैं: ‘उसी की चप्पल पहनकर मैं उसे ढूंढने निकला. मैं अपने मन से और चप्पल के मन से चल रहा था कि चप्पल मुझे वहाँ तक पहुँचा देगी जहाँ वह जाता है.’ क्या लिखते हुए आप अपने बचपन में लौट रहे हैं इन दिनों?

हां, इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है. मैं अपने बचपने को याद करता हूँ जो भूला हुआ सा है. इसलिए पास-पड़ोस के जो बच्चे हैं, सड़क पर जो मेरे घर के सामने खेलते हैं जिन्हें आता-जाता मैं देखता है. बच्चों को देख कर मैं अपने बचपने को याद करता हूँ. इस उम्र में वो क्या सोचते हैं? मनुष्य रूप में एक बच्चे का जन्म होता है जिसके पास सोचने समझने की शक्ति होती है. जो नवजात शिशु होता है वह इस संसार का अनुभवहीन एक जीव होता है. उस बच्चा की दुनिया के बारे में कोई खबर नहीं है. लेकिन मैंने देखा कि उनमें एक प्रतिक्रिया का अनुभव जन्म लेते ही बन जाता है. चिड़िया चहचहाती है तो नवजात शिशु की आँख उस ओर मुड़ जाती है, ऐसा मैंने अपने बच्चों के जन्म में महसूस किया था अस्पताल में.

बचपन में पढ़ने-लिखने का कैसा अनुभव रहा है आपका?

घर में एक साहित्यिक वातावरण था, मैं पढ़ता था. मैं नाँदगाँव का हूँ, पदुमलाल बख्शी नाँदगाँव के ही थे. मेरी माँ जो थी उसके बचपन का काफी समय बांग्लादेश के जमालपुर में बीता, वहां क्या स्थिति थी मुझे ठीक से मालूम नहीं. मेरे नाना लोगों का परिवार कानपुर का था, मेरे बाबा भी उत्तर प्रदेश के थे जो नाँदगाँव में बसने आ गए थे. मेरी अम्मा के घर में हम बच्चों पर एक अच्छा प्रभाव पड़ा था, खासकर अपने साथ वह बंगाल के साहित्य का संस्कार भी लेकर आ गई थी. दूसरे भाई-बहन भी लिखने की कोशिश करते थे, पर उनका लिखना रस्ते में ही छूट गया, बढ़ती उम्र के साथ. लेकिन मैंने लिखना जारी रखा.

आपके प्रिय रचनाकार कौन हैं, जिन्हें आप अभी याद करते हैं?

नाम लेकर के तो बताना नहीं है लेकिन बहुत सी किताब के लेखक मेरे प्रिय रचनाकार रहे हैं. मैं बहुत से बड़े लेखकों के संपर्क में रहा. मेरे लिखने की याद के शुरुआत दिनों में जैनेंद्र भी कुछ सालों तक रहे, मेरी उनसे मुलाकात नहीं हुई. अज्ञेय से मेरी मुलाकात रही. अशोक वाजपेयी से मेरी मुलाकात रही, लंबे समय तक संबंध बना रहा. केदारनाथ सिंह, नामवर सिंह से भी मेरा लंबे समय तक संबंध बना रहा. तो बड़े लेखकों के संपर्क में एक साधारण छोटे लेखक के रूप में मैं हमेशा उपस्थित रहता रहा.

गद्य के अलावे आपने कविता की पुस्तक भी बच्चों के लिए लिखी है-‘बना बनाया देखा आकाश, ‘बनते कहां दिखा आकाश’ आदि

हां, जैसा मैं बच्चों के पाठक के रूप में अभी देख रहा हूँ, मैंने सोचा कि बच्चे भी इस तरह अपने देखने को सुधारें. उनका देखना भी सुधरना चाहिए और यह महसूस होना चाहिए आकाश कितना अनंत होता है और हम कितना थोड़ा सा देख पाता हैं. यह आकाश है जिसको दूसरों ने जमाने से देखा. इसे ऋषि-महर्षियों ने देखा. उन्होंने सितारों-तारों की गणना की, पंचांग बनाया. जिससे उन्हें नक्षत्रों की क्या स्थिति थी, इस बात की जानकारी मिली. उन्होंने पंचांग को वैज्ञानिकों की मेल खाती स्थिति के रूप में बनाया है, यह बड़ी अद्भुत सी बात है. ये सारी चीजें उस जमाने में कैसे सोचते होंगे. उस सोच का दायरा कितना संपूर्ण था. मनुष्यों की उपस्थिति कितनी कम थी. ऐसी उपस्थिति मनुष्य की नहीं थी, जैसी आज की दिखती है. आज मनुष्य तो केवल भीड़ में ही दिखता है. चाहे वह घर की भीड़ हो या बाहर की भीड़ हो. या चाहे जैसी स्थितियाँ हों.

क्या लिख रहे हैं बच्चों के लिए अभी आप?

अभी मेरी सोच में बच्चों के लिए लिखने का अधिक रहता है. क्योंकि मैं इस उम्र में छोटा लिखता हूँ और कम लिखता हूँ क्योंकि ज्यादा देर तक किसी एक चीज पर कायम रहना बहुत कठिन है, लेखन में भी. ज्यादा देर तक खड़े नहीं रह सकता, बैठ भी नहीं सकता (हंसते हैं)…मेरी शारीरिक और मानसिक स्थिति अब वैसे नहीं है, लेकिन तब भी मैं बच्चों के लिए लिख रहा हूँ. आज ही मैंने बच्चों के लिए एक-डेढ़ पेज की कहानी के रूप में भाजी वाले को सोचा. उस भाजी वाले के संबंध में, कुछ अपनी ही स्थिति के अनुसार एक कहानी पढ़ने का कारण बन जाए ऐसा कुछ लिखूं. एक कहानी जो सात-आठ पेज की हो, ऐसा सोच रहा हूँ.

(समालोचन वेबसाइट के लिए, मधुमती पत्रिका, मई, पेज-56-58)